Sunday, July 30, 2017

काले बादलों में सुरों का क्रंदन - इतिहास में शास्त्रीय गायिका की मौत - 30 July 2017


gangubai hangal എന്നതിനുള്ള ചിത്രം



kishori amonkar എന്നതിനുള്ള ചിത്രം


काले बादलों में सुरों का क्रंदन - इतिहास में शास्त्रीय गायिका की मौत
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1
मरना तो सबको ही होता है क्योकि बचा कौन है
अमरता का पट्टा कोई नही लिखाकर लाता
आम लोग हो, कलाकार या अभिनेता याकि इतिहासकार
बल्कि आम लोग बहुत धैर्य और शांति से मरते है 
कलाकार या अभिनेता उत्तेजना में मौत से याचना करते है

वो भी मर रही है ऐसे ही उत्तेजित होते हुए बगैर जाने कि
बेगम अख्तर, शमशाद बेगम या गंगुबाई भी मरी होगी
अभी किशोरी अमोनकर भी यूँही मरी थी यकायक
देख रहा हूँ कि वो भी मर रही है ऐसे ही हर पल हर रोज
जबसे उसने गाने के बजाय नकल को धँधा बना लिया

यह बाजार का जमाना है जो हमारे घर मे घुस आया है
यह अपने जन्मनाओं की कला को बेचने का समय है
यह रागों को छोड़कर घराने बनाने का समय है रसिकों
मौत से रुपया कमाकर कला की नुमाइश का समय हैे
देख रहा हूँ कि शास्त्रीयता की आड़ में बिक रही है कला

अब शास्त्रीयता का एक आवरण ओढ़े बाजार में है वह
जहां उद्योगपति जाम लेकर सराहते है कला का मर्म
अधिकारी पढ़ते है कविता बेहूदी सी वाहवाही के लिए
संगीत अब उनके कोठों ने दर्ज है जो अनुशासित है
ऐसे में एक शास्त्रीय गायिका की मौत का अचरज नही मुझे।

2
जब उसने कहा कि मैं संगीत की दुनिया मे स्थापित हूँ
विदुषी से लेकर गुरु के उदबोधन भी छोटे थे उसके लिए
इसी दुनिया की कहानी थी जो मौत खत्म कर रही थी
गायिका को तीक्ष्ण व्यवसायिक बुद्धि में बदल रही थी
यह इतिहास की एक घटना थी जो पृथ्वी पर घटित हुई।

संगीत के इस पृष्ठ पर दर्जनों जगह अंकित है कहानियां
किसी को नही बख्शा इस नामुराद मौत ने, ले गई हर बार
खत्म हो गई उन्ही के साथ उन्ही की रागिनियाँ बन्दिशें
सीखने की बातें और ताल टूटने के सड़ियल किस्से भी
संसार यह याद नही रखता, बल्कि याद रहते है कर्म।

एक शास्त्रीयता जीवन मे भी होती है बारीकी से बुनी हुई
जो मनुष्यता को इतर जीवनानुभवों से अलग करती है
यही से आता है सुरों का आरोह अवरोह और मूल तमीज
बस गर यही खो दिया तो खत्म हो जाता है मालकौंस
भैरवी की दहलीज पर देख दुखी हूं इतिहास बनते पन्ने।

कमसिन उम्र से प्रौढ़ावस्था में पूरे समर्पण का भाव खत्म हुआ 
सीखने की अदम्य लगन भी खत्म हुई इस पड़ाव पर अंत मे
यह दुखद था कि काली चार के सुर एक जगह जाकर फटे
और एक बेसुरे से माहौल में मंद सप्तक पर तीन ताल बिखरे
यह मौत का आनुष्ठानिक स्वस्फूर्त रोजनामचा था जो बुना था 
एक ऐसी चौखट पर जहां संगीत के बाद वणिक बुद्धि काम आती है

मुझे अफसोस ही नही है सिर्फ दो शब्द कहना है - ओम शांति !

Saturday, July 29, 2017

इंदु सरकार - मधुर भंडारकर की कमजोर फ़िल्म 29 जुलाई 17



इंदु सरकार मधुर भंडारकर की परिपक्व और गैर जिम्म्मेदार राजनीतिक समझ का भ्रूण है जो असमय "अबो्र्ट" हो गया । वे दरअसल में एक ढुलमुल किस्म की घटिया राजनीति को परोसकर दोनो दलों की थाली में करेला और कटोरी में गुलाबजामुन बने रहना चाहते है इसलिए वे मध्यम मार्ग अपनाकर वामपंथी भी होने की कोरी प्रतिबद्धता आखिर में इंदु के मुंह से अदालत में कहलवाना चाहते है और एक लिजलिजा अंत दिखाकर भारतीय जनमानस की जेब से रुपया भी बटोरना चाहते है।

इमरजेंसी की पृष्ठभूमि में जेपी आंदोलन, विपक्ष और आक्रोश को दिखाने के बजाय वे सीधे संजय गांधी से शुरुवात करते है जो अप्रत्यक्ष रूप से नसबंदी का समर्थन कर एक विषाक्त बीज बो रहे है। पूरी फिल्म में वर्ग विशेष को टारगेट करके वे अपनी ओछी मानसिकता को भी प्रदर्शित करते है जो कि घातक है। वे हर दृश्य में एक एक फ्रेम रखते है जो किसी भी विचार या समझ को नही दिखाती है बल्कि वे एक पैरोनोएड फिलिंग की तरह से एक यथार्थ बुनने की कोशिश करते है जबकि वे अपने आप मे बहुत स्पष्ट है कि वे क्यों यह नरेटिव रच रहे है। मधुर असल मे इस फ़िल्म में कम से कम देश के वर्तमान हालातों को चोट करते हुए अतीत का सहारा लेते है और एक यूटोपिया गढ़ने की राजनीति करते है और इसी बीच बहुत बारीकी से अपने मन की बात हिंसा और डेलिब्रेट हिंसा के मिथक रचकर जनमानस पर थोपकर एक तिलिस्म खड़ा करते है जो हर हालत में स्वीकार नही किया जाना चाहिए। वे अंत मे नेतृत्व की झलक दिखाकर 21 जनवरी 77 को जो 19 माह की काली रातों का अंत बताकर फ़िल्म को बम्बईया मोड़ पर सोढ़ी के मार्फ़त लाते है वह सिर्फ उनकी गुडी गुडी बनने की नाकाम कोशिश है। अब भारतीय जनमानस इतना मूर्ख और कच्चा नही है कि वह यह रूपक और हिडन नरेटिव समझ ना सकें।

यह एक बेहद कमजोर फ़िल्म है जो आंधी या सुधीर मिश्र कृत हजारों ख्वाहिशें ऐसी के मुकाबले कही नही ठहरती। सिर्फ शुरुवात का एक दृश्य रचकर इमरजेंसी की तस्वीर और आखेट बुनना मधुर के बस का कतई नही है - ना उनमे वो समझ है ना दृष्टि इसलिए यह फ़िल्म एक उनकी असफलता का पिटारा बल्कि पेन्डौरा बॉक्स बनकर रह गई है। वे बहुत शातिरी से नाना के रोल में अनुपम को लाते है जिसके निहितार्थ हम सबको मालूम है।

बहरहाल इस फ़िल्म को देखने से बेहतर है कि ₹ 120 या ₹ 150 में एक बियर पी ली जाए या एकाध दोस्त के साथ एक केपेचीनो और ब्राउनी खा ली जाए इस सुहाने मौसम में।

#मधुर_भंडारकर_की_घटिया_फ़िल्म

Thursday, July 27, 2017

पॉल ऑस्टर 27 July 2017



पॉल ऑस्टर


तीन हफ्ते पहले मुझे अपने पिता की मृत्यु की ख़बर मिली। पिता के पास कुछ नहीं था। बीवी नहीं थी, कोई ऐसा परिवार नहीं था जो सिर्फ़ उन पर निर्भर हो। यानी ऐसा कुछ नहीं था, जो सीधे तौर पर उनकी अनुपस्थिति से प्रभावित हो। उनके न रहने का दुख होगा, कुछ लोगों को सदमा लगेगा, कुछ दिनों का शोक होगा और फिर ऐसा लगेगा, जैसे कि वह कभी इस दुनिया में थे ही नहीं।
दरअसल, अपनी मृत्यु से काफ़ी पहले ही वह अनुपस्थित हो गए थे। लोग पहले ही उनकी अनुपस्थिति को स्वीकार कर चुके थे। उसे उनके होने के एक गुण की तरह मान चुके थे। अब जबकि वह सच में नहीं हैं, लोगों के लिए इसे एक तथ्य की तरह स्वीकार कर लेना कोई मुश्किल काम न होगा।
पंद्रह साल से वह अकेले रह रहे थे। ऐसे, जैसे कि उनके आसपास की दुनिया का कोई अस्तित्व ही न हो। ऐसा लगता ही नहीं था कि उन्होंने इस धरती पर कोई जगह घेरी है, बल्कि वह इंसान के रूप में उस बक्से की तरह हो गए थे, जिसमें कुछ भी घुस नहीं सकता। दुनिया उनसे टकराती थी, कभी-कभी टकराकर टूट भी जाती थी, कभी-कभी टकराकर चिपक भी जाती थी, पर कभी उनसे पार नहीं हो पाई। पंद्रह साल तक वह एक आलीशान मकान में भटकते रहे, और फिर वहीं उनकी मृत्यु हो गई।
वह इस मकान में आना नहीं चाहते थे। जब हमारा परिवार यह मकान ख़रीदना चाहता था, तो उन्होंने इसकी क़ीमत पर एतराज़ जताया था, लेकिन मां यही मकान चाहती थी। अंतत: उन्होंने ख़रीद लिया, वह भी पूरे नक़द भुगतान पर। कोई क़र्ज़ा नहीं, कोई क़िस्त नहीं। वे उनके अच्छे दिन थे। वह शाम को जल्दी घर आते थे और डिनर से पहले थोड़ी देर सोया करते थे। वह अपनी आदतों से मजबूर थे। जब इस मकान में आए उन्हें हफ्ता भी नहीं हुआ था, उन्होंने एक बड़ी अजीबोग़रीब ग़लती की थी। एक शाम दफ्तर से लौटने के बाद अपनी आदत के अनुसार, वह इस मकान में आने के बजाय, पुराने मकान में चले गए। बाक़ायदा वहां कार पार्क की। सामने का दरवाज़ा बंद देख पिछले दरवाज़े से अंदर घुसे, सीढिय़ां चढ़ीं, बेडरूम में घुसे और जाकर सो गए। क़रीब एक घंटा सोते रहे। जब उस मकान की नई मालकिन ने अपने बेडरूम में किसी अजनबी को सोया पाया, तो हल्ला मच गया। मेरे पिताजी जाग गए। लेकिन वह वहां से भागे नहीं। वह तो बस आदत के मुताबिक़ उस मकान में घुस गए थे। जब वहां इकट्ठा लोगों को यह बात समझ आई, तो सब बहुत हंसे। आज भी मैं उस क़िस्से को याद कर हंस पड़ता हूं।
धीरे-धीरे समय गुज़रा। मां तलाक़ लेकर अलग हो गईं। हम बच्चे बड़े हुए और अलग रहने लगे, लेकिन पिता उसी मकान में रहते रहे। उसमें उन्होंने ज़रा भी परिवर्तन नहीं किया। दीवारों का रंग वही, सारे फ़र्नीचर भी वही। आख़िर वह मकान उन्होंने अपने परिवार के लिए लिया था। पंद्रह बरसों से वह सिर्फ़ रहते आए, उस मकान में उन्होंने न कुछ जोड़ा, न कुछ घटाया। उसमें चलते हुए लगता, हम किसी अवसाद लोक में चल रहे हैं।
मरे हुए आदमी की चीज़ों का सामना करने से ज़्यादा भयावह कुछ नहीं होता। चीज़ें तो जड़ होती हैं, उनके भीतर अर्थ तो वह जीवन डालता है, जिससे वह जुड़ी होती हैं। जब जीवन ख़त्म होता है, तब चीज़ें भी बदल जाती हैं, भले उनके रूप में कोई बदलाव न आता हो। वे उन भूतों की तरह होती हैं, जिन्हें छुआ जा सकता है। उन कपड़ों का क्या करेंगे, जो ख़ामोशी से उस आदमी का इंतज़ार कर रही हैं, जो उन्हें पहनता आया था, लेकिन जो अब कभी नहीं आएगा। उस रेज़र का क्या करेंगे, जो बाथरूम में टंगा हुआ है, जिस पर पिछली शेव के निशान बचे हैं, लेकिन अब जिसका इस्तेमाल कभी नहीं होगा। उनके हनीमून की तस्वीरें वहां लगी हुई थीं। एक दराज़ में पुरानी चेकबुक्स पड़ी थीं। कुछ में हथौडिय़ां और कभी इस्तेमाल न होने वाली कीलें पड़ी थीं। बाथरूम की एक दराज़ के सबसे नीचे एक पुराना टूथब्रश पड़ा था, जिसे मां इस्तेमाल करती थीं। उसे देखकर ही पता चलता है कि इसे पंद्रह साल से छुआ तक नहीं गया है। हम सब उस मकान से निकल चुके थे, लेकिन हमारी चीज़ें अब भी वहां वैसे ही पड़ी थीं, जैसे हमारे पिता वहां वैसे ही थे। वह हम सबकी स्मृतियों के बियाबान में ठीक उसी तरह थे। पहले जैसे।
उस मकान की एक-एक चीज़ देखकर यह पता चलता है कि पिता ने अपने जाने की कोई तैयारी नहीं की थी। वह अचानक गए। जिस मकान में वह रहना नहीं चाहते थे, उसी मकान में उन्होंने पूरा जीवन गुज़ारा। जब सबने कहा कि यह मकान छोड़ दो, तो उन्होंने किसी की नहीं सुनी। अकेले ही रहे। मरने से एक हफ्ता पहले उन्होंने मकान बेच दिया था, लेकिन उसकी किसी चीज़ को बाहर नहीं निकाल पाए। वह रोज़ उस मकान में रहते थे, लेकिन मरते समय वह उसका सामना नहीं कर पाए। नए लोगों के लिए उस मकान को ख़ाली करने के बजाय उन्होंने अपनी देह को ही ख़ाली करना सही समझा। इसके लिए मृत्यु एकमात्र रास्ता होती है, एकमात्र जायज़ रास्ता।
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संस्मरण पुस्तक ‘इन्वेन्शन ऑफ सॉलीट्यूड’ से. 2013 में किया हुआ अनुवाद.

Saturday, July 22, 2017

प्राथमिक शिक्षा और भेदभाव की नीति 22 जुलाई 17 की पोस्ट


कल एनडीटीवी पर प्राइम टाइम पर मप्र के शाजापुर और आगर जिले में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की पोस्टमार्टम परक रपट देखकर बहुत दुख हुआ। प्रदेश में मैंने 1990 से 1998 तक बहुत सघन रूप से राजीव गांधी शिक्षा मिशन के साथ काम करके पाठ्यक्रम, पुस्तकें लिखना, शिक्षक प्रशिक्षण और क्षमता वृद्धि का कठिन काम किया था । अविभाजित मप्र में बहुत काम करके लगा था कि अब आगे निश्चित ही शिक्षा की स्थिति में सुधार होगा, इसके बाद कई स्वैच्छिक संस्थाओं में रहा, प्राचार्य के पदों पर रहा , फंडिंग एजेंसी में रहकर शिक्षा को बढ़ावा देने वाली परियोजनाओं को पर्याप्त धन उपलब्ध करवाया। राज्य योजना आयोग में रहकर भी प्राथमिक शिक्षा माध्यमिक शिक्षा और कालांतर में राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा के लिए काम किया पर कल अपने ही राज्य में इस तरह से की जा रही लापरवाही और उपेक्षा देखकर मन खिन्न हो गया।

ठीक इसके विपरीत केंद्र पोषित शिक्षा के भेदभाव भरे मॉडल। मुझे लगता है कि जिलों में स्थित केंद्रीय , नवोदय , उत्कृष्ट और मॉडल स्कूल एक तरह की ऐयाशी है और शिक्षा के सरकारी पूँजीवर्ग जो सिर्फ एक वर्ग विशेष को ही पोषित करते है। हालांकि यहां दलित, वंचित जरूर है पर अभावों की जमीन पर ये सर्व सुविधाओं से परिपूर्ण टापू है जिनका फायदा जिले में मात्र 1 % लोगों को भी मुश्किल से मिल पाता है।

एक मित्र जो केंद्रीय विद्यालय से जुड़े है जो कहते है कि केंद्रीय, नवोदय विद्यालयों में  RTE में एडमिशन में कोई इनकम क्राइटेरिया नहीं इसलिए यहां भी अफसरों के बच्चे 12वी  तक निःशुल्क शिक्षा में एडमिशन पा जाते हैं। आरक्षण में आर्थिक आधार चाहिए मगर RTE जो गरीबों का भला कर सकता है उसमें लॉटरी यदि यह क़ायदे से लागू हो जाये तो 4 सेक्शन विद्यालय में 40 गरीब बच्चे 12वी तक बढ़िया शिक्षा ले सकते हैं। किताबें और यूनिफार्म, ऑटो आदि का पूरा किराया मुफ़्त ! यानी देखिए कि किस तरह से अफसर , नेता और प्रशासन मिलकर वहां भी छेद करके अपने लिए रास्ते निकाल लेते है। बेहद शर्मनाक तंत्र हमने गत 70 वर्षों में विकसित कर लिया है। इन शिक्षकों को घर आने जाने के लिए हवाई यात्रा भी सरकार मुहैया कराती  है, बड़े स्तर पर क्षमता वृद्धि, रिफ्रेशर और अन्य काम होते है पर हमारे माट साब ढोर बकरी गिनते हुए और पंचों की गालियां खाकर ही नर्कवासी हो जाते है। ना छत, ना पानी,ना शौचालय, ना प्रशिक्षण , ना वेतन , ना भवन और ना इज्जत - बाकी सब तो दिवास्वप्न है।

अब शायद वर्तमान सरकार को यह चुनौती हाथ मे लेनी चाहिए कि हर जगह शिक्षा एक हो और कम से कम ये जो बहुविद्यालय पद्धति और तंत्र है इसे खत्म करें। एक ओर हमारे अतिथि शिक्षक मात्र ₹ 100 प्रतिदिन पर हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी पढ़ा रहे है वही केंद्रीय विद्यालय का चतुर्थ वर्ग का भृत्य तीस से पचास हजार माह के ले रहा है , यह घोर भेदभाव है जो सरकार प्रायोजित है।

शिक्षक संघ फालतू के मुद्दों और बाकी सबको छोड़कर एक देश और एक शिक्षा प्रणाली की बात करें । या तो केंद्र शिक्षा को राज्यों से छीनकर अपने हाथ मे ले लें या पूरी तरह से राज्यों को सौंप दें, अब यह भयानक भेदभाव नही चलेगा और ना करना चाहिए। यह पद्धति समाज मे भयानक खाई बढ़ा रही है और लोगों के जीवन को सीधा सीधा प्रभावित कर रही है।

#Bring_Back_Pride_to_Govt_Schools

Friday, July 21, 2017

Posts of 10 to 20 July 2017



जी मैं दलित हूँ - उसने कहा था घर मे घुसते ही।
ओह वाओ, ग्रेट ! पर एक बात बताओ मित्र - कौन से दलित -मैंने वहॉ टोक दिया उसे .......
मायावती वाले, 
कांशीराम वाले
चन्द्रशेखर वाले
जगजीवनराम वाले
मीरा कुमार वाले 
अम्बेडकर वाले
ज्योतिबावाले
मार्क्स वादी
लेनिनवादी
स्तालिनवादी

नौकरी के लिए 
प्रवेश के लिए 
प्रमोशन के लिए 
फेलोशिप लेकर हवाई जहाज में उड़ने वाले 
अधिकारी बनकर सरनेम बदलने वाले 
लोन लेकर हड़पने वाले 
सरकारी योजनाओं को भकोसने वाले
सबसीडी डकारने वाले

वोट बैंक वाले 
ऊना वाले 
बुद्धिजीवी वाले 
जे एन यू वाले 
रोहित वेमुला वाले 
फेसबुकिये शेर जो ब्राह्मणों को कोसते है दिनभर
साहित्य में दिन रात दलित विमर्श वाले 
विश्व विद्यालयों में सिर्फ बकर कर मोटी तनख्वाह वाले 
एनजीओ टाईप कोरी भावुकता वाले 
लेख, शोध और पर्चे लिखने वाले 
महिला जेंडर और शोषण के वेब पोर्टल और पत्रिका वाले 
सीवर से लेकर मैला ढोने वाले या मुआवजा चखने वाले

ओमप्रकाश वाल्मीकि वाले
दया पवार वाले
शरण कुमार लिम्बाले वाले
राजेन्द्र यादव वाले
तुलसीराम वाले
धर्मपाल वाले
या इन सबकी चटपटी भेल हो

कांग्रेस वाले
भाजपा वाले 
सपा वाले 
दक्षिण भारतीय 
नार्थ ईस्ट वाले

देशप्रेमी या विधर्मी
हिन्दू दलित 
मुस्लिम दलित
धर्मानान्तरण से ईसाई बने 
मन्दिर प्रवेश को लालायित 
बौद्ध धर्म अपनाने को आतुर

भाई साहब थोड़ा स्पष्ट कर दें आप कौनसे दलित है ताकि मैं आपसे यथायोग्य बातचीत करने के लिए अंदर जाकर मुखौटा लगा लूँ और बचूं साफ और ईमानदारी पूर्ण बात करने से ताकि कल मैं मेन स्ट्रीम में बना रहूं ।
अब क्या है ना देश के सर्वोच्च पद पर भी जाति से ही निर्णय और चुनाव की प्रक्रिया हुई । दूसरा महत्वपूर्ण पद भी अन्य पिछड़ा वर्ग से आता है । बाकी आप जैसा कहेंगे देख लेंगे !!!
बैठिए क्या लेंगे चाय, कॉफ़ी, नीम्बू पानी या कुछ बियर वाईन !!!

20/07/2017


अमेरिकन मालवी छोरी से मुलाक़ात हुई पिछले दिनों। यहां आई हुई थी , खूब बात की और खूब गिटिर पिटिर की अँग्रेजी में। मजा आ गया भिया।
म्हारी छोरी है या , तमारे नी मालम तो बतई दूं हूँ। इके तो हरो कारड भी मिली ग्यो वां को ।
अब वो अमेरिका में ठिकाना बना के रह रही है , की री थी कि गंज रुपया लगाया है और खूब बड़ो बंगलो बनायो है। और कह रही थी कि उधरईच एक मालवा बनाएगी और दाल बाटी और सेव का अड्डा !!!
सबको वही बुलाया बोली - या आओ तो टैम नी मिलें दां !!! उसका लाडा वई काम करें और नानी जिको नाम मीठी है अब 6 वीं में आ गई जो अब या आने में भी नखरा करें घणा - तो छाया बोली अब मिलणो हो तो वईज़ आवजो दाल बाटी बनाई के खिलाई दुआं अने सेव पोया भी लिम्बू डाली के !!! पण जिलेबी तमारे लेके आणि पड़ेगी, वां ऊना अमेरिकन मारवाड़ी हून के जिलेबी बनाता नी आये !
देवास की है या नानी और इको लाडो शाजापुर को पर गंज बरस हुई ग्या दोई जना अमेरिका में जई के बसी ग्या एने छोरी भी हुई गी अबे मीठी छटवीं भने अमेरिका में। अच्छो है सब सुख से रें तो कई बुरौ,म्हारो तो इत्तो केणो कि आता जाता रिवजो और सम्बन्ध बनाय रखजो , समिचार मिलता रें -योज़ भोत है म्हारा जैसा बूढ़ा मनक के।
हो बाई - म्हणे भी की , नी अई गयो म्हारे घरे -अपनी झोपड़ी में, अबे अमेरिका जाने का पैसा कोई कम लगे कई, ओ दादा अपनो देवास ईच भलो। सूखी बाटी खई लांगा याज, वा जदे रेवा दें तू तो बैन
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उन्होंने पूछा आपके घर सत्यनारायण की कथा है ?
मैंने कहा हां जी इस माह की 30 तारीख को है।
उन्होंने कहा तो क्या शर्मा जी, पांडे जी, अवस्थी जी सभी आएंगे ?
मैंने कहा शर्मा, वर्मा, पालीवाल, चौहान , मालवीय , हुजूर, कूजूर, गौर , जैन , अरोरा , माइकल , जॉर्ज, यूनुस,अफजल और शकील रहमान आदि भी सब आएंगे।
उन्होंने कहा क्या प्रसाद भी बंटेगा ?
मैंने कहा जी , भोजन भी रखा है - जाते समय मेहमानों और आमंत्रितों को दक्षिणा और धोती - कुर्ता और एक एक तांबे का लोटा देने का भी प्रावधान है।
उन्होंने फिर पूछा तो क्या पक्के में सतनारायण की कथा होगी?
मैंने कहा जी बिल्कुल होगी।
वह अपेक्षा से देख रहे थे कि मैं प्रसादी लेने के लिए बुला लूँ पर मैं भी चालाक हूं उनकी मंशा समझता हूं । मैंने टाल दिया छोड़िए जी आजकल कहां समय है , और आप तो व्यस्त रहते है , हमें तो पक्के से कथा करना ही है और फिर अब करना है तो करना है, घर का भी एक बजट है उसे भी खत्म करना है !!!
चलिए मिलेंगे फिर कभी यह कर कर मैं उन्हें औचक सा छोड़कर लौट आया ।
(कुछ लोग जबरन ही झिलवाते है और यही तरीका है कि उन्हें निगलेक्ट किया जाये)

ये है चेरी
हमारे घर की होने वाली पहरेदार अभी एक साल की हुई है , घर मे रहकर खूब भूंकती है और ख़ूब खाती है। चूंकि लेब्राडोर प्रजाति की है इसलिए सोशल भी बहुत है। घर के लोगों से छोड़कर - बाहर मुहल्ले भर के लोगों से अच्छी दोस्ती है इसकी।
घर के लोग तो सिर्फ खाने पीने के समय याद आते है इसे। जब नई नई थी मतलब जब जन्म के बाद लाया था तो बहुत मासूम और प्यारी थी पर अब जैसे जैसे बड़ी हो रही है इसका सोशल नेटवर्क बड़ा हो रहा है और खूब खाने को लगता है - चटक मटक, सिर्फ दूध - रोटियों से काम नही चलता। अब रात को भी भयानक भूंकती है।
पिछली कुछ रातों से मैंने इसे बाहर बांधना शुरू कर दिया है। हालांकि चिल्लाती है खूब और रात में चीखती भी है पर अब परवाह नही करता बल्कि खुश हूं कि अब यह बिल्कुल कुत्तों की तरह ही चिल्लाने और भूँकने लगी है। घर मे लेता भी नही और चिंता भी नही करता।
डरता भी नही मैं अब - इसके चीखने से , क्योकि मैं जानता हूँ कि कुत्तों का काम ही भूंकना है और कुत्ते घर के बाहर ही अच्छे लगते है। बहरहाल, अब एक बोर्ड लगवाना है घर कि
"कुत्ते से सावधान"
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अभी एक ऑटो में था और कल मित्र के साथ ओला में। शहर का नाम कुछ भी रख दें और वाहन चालक का भी चाँदभाई या देवीलाल।
दोनो हैरान थे और परेशान। कह रहे थे इस मुल्क की फिजाँ को क्या हो गया है। धर्म को घर क्यों नही रखते लोग, कमाए खाएं मेहनत मजदूरी करें या ये सब देखते रहें।
देवीलाल ने कहा कि मंदिर मस्जिद और गिरजाघरो में टैक्स लगा दो जी एस टी , आने जाने का और भजन पूजन का नमाज का और प्रार्थनाओं के लिए जब इंसान को नगदी देना पड़ेगा तो सब भूल जाएंगे। बालाघाट के देवीलाल ओला चलाते है, मेरे जिद करने पर भी फोटो नही लेने दिया।
चाँदभाई बुजुर्ग है और भोपाल के है, कबाड़खाना में रहते है। जब ऑटो किया तो चाय पी रहे थे, तसल्ली से चाय पीकर ग्लास धोया और ऑटो के ड्रावर में रख लिया, मैंने पूछा ये क्या तो बोले अब हमें कांच के ग्लास में चाय जानबूझकर नही दी जाती। क्यों , पूछने पर बोले मुलुक की हवा बदल गई है, बचे दिन ठीक से निकल जाएं यही बहुत है।
ये किस भोपाल में था। हम कहां आ गए है। लोग बहुत समझदार और साफ बात करने लगे है यह सबसे बड़ी तसल्ली है। देवीलाल ने कहा था कल - इंतज़ार करिये साहब , सिकन्दर और अशोक की भी जागीर खत्म हो गई तो हम तो खुद निज़ाम चुनते है। और दो पांच साल !!!
और आज चांदभाई गुनगुना रहे थे थोड़ी उदासी और थोड़े जोश में ----
चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता है ढल जाएगा , 
तू यहां मुसाफिर है , ये सराय पानी है
चार दिन की मेहमां तेरी जिंदगानी है !!!

Tuesday, July 18, 2017

मप्र सरकार – अज्ञान के अंधेरों से ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो 18 July 2017



मप्र सरकार – अज्ञान के अंधेरों से ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो

मप्र सरकार ने हाल ही में निर्णय लिया है कि प्रत्येक सरकारी अस्पताल में ज्योतिष बैठाये जायेंगे और ये ज्योतिष मात्र पांच रुपया लेकर सबकी समस्याओं का हल बताएँगे. इस संदर्भ में खबर यह है की सरकार ने किसी बड़ी संस्था से अनुबंध भी हस्ताक्षरित कर लिया है. मप्र सरकार का यह फैसला कई मायनों में अनूठा है और विचित्र भी है. प्रदेश में शिवराज सरकार गत तेरह वर्षों से और भाजपा पंद्रह वर्षों से राज कर रही है इस दौरान यदि मानव विकास सूचकांक देखे तो हम पायेंगे कि देश के बाकी राज्यों कि तुलना में यहाँ के आंकड़े पहले नम्बर या दुसरे नम्बर पर रहे है और इस तरह हमने लगभग हर जगह तरक्की करके नकारात्मक नाम रोशन किया है चाहे वह महिला हिंसा हो या कुपोषण या भ्रष्टाचार के आमले हो या अवैध खनन के, पर इस सबसे निजात पाने के लिए अपनी सत्ता के आखिरी दिनों में चल रहे और पिछले तेरह वर्षों में सबसे ज्यादा मुसीबत के दिन झेल रहे शिवराज सिंह चौहान के लिए यह फैसला लेना कितना तसल्ली भरा रहा होगा यह अकल्पनीय है.

मजेदार यह है की मप्र सरकार ने विदेशों की तर्ज पर देश में पहली बार अपने प्रदेश में आनंद मंत्रालय खोला है और इस मंत्रालय का कैलेंडर जारी करके एक भव्य कार्ययोजना भी बनाई थी. परन्तु एक वर्ष के बाद ना लोगों में आनंद  की अनुभूति हुई ना ही प्रशासन में या सत्ता के निकट जुड़े लोगों में आनंद का संचार हुआ. अब यह नया फैसला शायद लोगों को बीमारी, अवसाद तनाव और अन्य जटिल समस्याओं से छुटकारा पाने में शायद मदद कर दें यह देखना होगा.

जिस प्रदेश में लाखो बच्चे कुपोषण से प्रति वर्ष मर जाएँ, जचकी के लिए मूल सुविधाएं ना हो, जिस प्रदेश में जंग लगे औजारों से आँखों के आपरेशन हो और सैंकड़ों मरीज अंधे हो जाए, जहां लेबर रूम में कुतिया बच्चे दें और कोई देखभाल करने वाला ना हो, आक्सीजन के सिलेंडर चलते चलते मप्र जैसे बड़े राज्य के सबसे बड़े अस्पताल में सौ पचास मरीज मर जाए, नवजात शिशु गहन चिकित्सा कक्ष में आग लग जाए और बच्चे जलकर मर जाए, प्रदेश के दूरदराज ही नहीं बड़े शहरों के पोषण पुनर्वास केंद्र बंद पड़े हो और बच्चे कुपोषण से मर जाएँ तो वहाँ यह फैसला क्या और कैसे समस्याओं से निजात दिलाएगा यह समझ से परे है.

तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है एक ओर प्रदेश में सरकारी चिकित्सा महाविद्यालयों के साथ निजी चिकित्सा महाविद्यालय खोले जा रहे है, पैरा मेडिकल के पाठ्यक्रम शुरू किया जा रहे है बावजूद इसके डाक्टरों की कमी से यह प्रदेश जूझ रहा है साथ ही पैरा मेडिकल स्टाफ भी पर्याप्त संख्या में नही है और प्रदेश के सामुदायिक स्वास्थ्य के स्थिति बहुत बुरी है फिर इन मुद्दों पर काम करने के बजाय सरकार का यह फैसला बहुत ही अचरज दर्शाता है कि लोकतन्त्र  में कैसे सरकार अपने होने और ताकत का बेजा इस्तेमाल जनता के विरुद्ध करती है. यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान “वैज्ञानिक चेतना के प्रसार और प्रचार“ कल्याणकारी राज्य की भूमिका को महत्वपूर्ण मानता ही नहीं बल्कि निर्देशित भी करता है कि राज्य तमाम ऐसे उपाय करके योजनायें बनाएगा जिससे नागरिकों में वैज्ञानिक चेतना का विकास हो और वे तर्कपूर्ण तरीकों से समाज में जियें और रहना सीखें. परन्तु मप्र शासन ने जिस तरह से यह निर्णय लिया है वह बेहद आपत्तिजनक है जो इस तरह कि कूपमंडूकता को दर्शाता है जो नागरिकों को अवैज्ञानिक और अंधविश्वासों से भरे युग में ले जाने के लिए बाध्य अरता है. यह एक तरह से कहें तो अपनी जिम्मेदारी से पल्ला छुडाकर लापरवाही से आम लोगों को नर्क में जीने को अभिशप्त कर रहा है.  

दरअसल में इसकी पृष्ठभूमि में प्रदेश में होने वाले सरकारी धार्मिक आयोजन है जिसमे राज्य सरकारी खजाने से पंथ निरपेक्ष लोक कल्याणकारी राज्य में जनता के मेहनत कि गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च करता है. बारह वर्षों में आयोजित होने वाला उज्जैन के सिंहस्थ को अभी तक लोग अपना आयोजन मानकर मनाते थे और आयोजित करते थे जिसमे प्रशासन थोड़ी बहुत मदद करता था व्यवस्थाएं देखता था, परन्तु पिछले वर्ष हुए आयोजित हुए सिंहस्थ कि पूरी बागडोर शिवराज सिंह चौहान ने अपने हाथों में ले ली मानो यह उनका कोई निजी घरेलू आयोजन हो और पूरी मशीनरी को ना मात्र झोंका बल्कि खुद भी हर दूसरे तीसरे दिन सपत्निक वहाँ उपस्थित रहें, देशभर में लोगों को आने के लिए भव्य स्तर पर विज्ञापन दिए गए और बुलवाया गया. विचार मंथन हुआ. साढ़े तीन  हजार करोड़ रुपयों से आयोजित कुल जमा खर्च का फल किसे, कब, कहाँ और कैसे मिला यह तो खैर भगवान ही जानता है पर जनता का रुपया बर्बाद हुआ बेतहाशा यह सर्वविदित है. इस वर्ष नर्मदा यात्रा और छः करोड़ पौधे लगाने में २४ जिलों के प्रशासन को जिस तरह से इंगेज किया गया छः माह और कोई काम जमीनी स्तर पर नही हुए वह भी एक गंभीर लापरवाही है और इसमें भी जनता कि कमाई सरकार ने खर्च की.

यदि सरकार के इन निर्णयों और कार्यवाहियों के परिपेक्ष्य में अस्पतालों में ज्योतिष नियुक्त करने के अनुबंध को देखा जाए तो यह त्रस्त, हारी हुई और बेहाल जनता को मानसिक रोगी मानकर “मनोवैज्ञानिक” रूप से ट्रीट करने का एक थोथा उपाय है जिस पर रोक लगनी चाहिए. सरकार को मात्र पांच रूपये में लोगों को भरमाना आता है जबकि ओपीडी में रोगी कल्याण समिति से पर्ची ही दस रूपये में बनती है किसी भी सरकारी अस्पताल में ऐसे में ये पांच रूपये वाले डिप्लोमाधारी क्या खाकर लोगों का इलाज करेंगे और भविष्य बाचेंगे?

यह सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों से भागकर नवाचार और पाखण्ड के नाम पर ढोंग रचने और आने वाले चुनावों में बड़ी संख्या में एक वर्ग विशेष के लोगों और बेरोजगारों को सस्ता और शार्टटर्म रोजगार देने की  नुमाइश भर है जो दुनिया में सिर्फ मप्र में ही है. इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए ताकि हम अपनी संततियों  को पीछे धकेलने के बजाय स्वस्थ और वैज्ञानिक युग की ओर ले जाए.


Tuesday, July 11, 2017

Posts of 10/11 July 17


अभी अभी सुना गुजरात के मुख्य मंत्री ने अमरनाथ यात्रा पर आतंकी हमले में मारे गए लोगों को 10 लाख और घायलों को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की । बस ड्राइवर सलीम को ब्रेवरी अवार्ड भी दिया जाएगा ।
एक सवाल , कृपया ठंडे दिमाग़ से समझने का प्रयास करें
अपनी नाकामयाबियों का ठीकरा जनता के रुपयों पर क्यों फोड़ा जाए, यात्री क्या सरकार से पूछके पुण्य कमाने गए थे। मुआवजा किसी बात का हल नही है। नाकामयाबी की आड़ में मुआवजा बांटकर सरकार अपने मूल कर्तव्यों से हट रही है और फिर यथास्थिति बनी रहती है। इस पर बाद में कुछ नही होता ।

किसानों की हत्या एक करोड़ का मुआवजा,दुर्घटना लाखो रुपया मुआवजा , तीर्थ यात्रा में मरें मुआवजा। ये उस पार्टी फंड से दिया जाए जो वहां राज कर रही है या व्यक्तिगत तनख्वाहों से दिया जाना चाहिए जो अधिकारी इस तरह की घटनाओं के लिए जिम्मेदार होते है, सरकार सिर्फ इनका स्थानांतर करके इतिश्री कर लेती है । जनता की मेहनत की कमाई को यूं अपनी छबि बनाने के लिए बर्बाद बिल्कुल नही किया जाना चाहिए।
अब समय आ गया है कि इस मुआवजे पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक समिति बनें जो कब , क्यो , कैसे और कितना दिया जाए साथ ही दोषी सरकार, पार्टी और अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करें और सख्ती से लागू करवाएं। इन राजनेताओं का बस चलें तो ये लोग राज्य और देश मृतकों के नाम कर दें ।
#Amarnath_attack
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कल देवास इंदौर उपनगरीय बस के एक भयानक एक्सीडेंट में 35 से ज्यादा यात्री घायल हो गए। मैंने इसी प्लेटफॉर्म पर कई बार चेताया और इन बसवालों की गुंडागर्दी के खिलाफ लिखा है परंतु प्रशासन यानी कलेक्टर, आर टी ओ या पुलिस कोई कार्यवाही नही करते। देवास से इंदौर के सभी थानों पर हफ्ता जाता है और नेताओं और गुंडे मवालियों की चल रही बसें जो ड्राइवर कंडक्टर चलाते है नियमों को ताक पर रखकर अपनी मनमर्जी से लोगों को हांकते रहते है।
सीटी बस चलाने के लुभावने वायदे हर बार नगरनिगम दिखाता है और निजी बस संचालकों की रिश्वत और दादागिरी के दबाव में हर बार योजना दबा जाता है।

देवास बस स्टैंड पर एजेंट्स की गुंडागर्दी का यह आलम है कि किसी के बाप में हिम्मत नही कि इनके खिलाफ कुछ कर सकें। कई बार बस स्टैंड पर स्थित चौकी पर मैंने शिकायत की पर उपस्थित पुलिस वाले समझा बुझा कर मामला रफा दफा करने की कोशिश करते है।
नवागत कलेक्टर और एस पी से निवेदन है कि हजारों यात्रियों की सुरक्षा के लिए
इन बसों के परमिट की जांच करें
फिटनेस की जांच करें
खटारा बसों को बाहर करें
टिकिट देने को बाध्य करें
ड्राईवर, कंडक्टर को व्यवहार सुधारने की समझाइश दें
इनके मालिको को ठिकाने लगाएं चाहे वो कोई भी हो
निर्धारित रुट चार्ट, किराया और गति के कड़े नियम बनाये
देवास इंदौर के बीच के थानों पर निरीक्षण हो
नगर निगम सीटी बस की पहल शीघ्र करें
हर बस में आर टी ओ, कलेक्टर और एस पी के मोबाइल नम्बर लिखें हो
मीडिया के मित्र इस बात को गम्भीरता से लेकर प्रचार करें

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मप्र शासन निजी विद्यालयों में फीस नियंत्रण के लिए इस मानसून सत्र में एक बिल ला रहा है। यह एक अच्छा प्रयास है । सरकार की सदाशयता पर प्रश्न नही है पर मेरी मंशा है कि इसे ईमानदारी से लागू किया जाये और तुरंत किया जाये।
मेरी ओर से कुछ सुझाव और :----
स्कूल सिर्फ दस माह की ही फीस लें, पिकनिक आदि का आयोजन स्कूल ना करें यदि करें तो पालकों की समिति स्थान, व्यवस्था और शुल्क का निर्धारण करें ना कि स्कूल प्रबंधन
पुस्तकालय, खेल और अन्य कार्यक्रमों का शुल्क ना लें
यदि भोजन दिया जा रहा हो तो केटरिंग की मॉनिटरिंग के लिए शिक्षको के साथ पालकों की समिति बनाई जाए और इसमें प्रबंधन का कोई भी व्यक्ति ना हो। केटरिंग का ठेका पूरी पारदर्शिता से दिया जाये और गुणवत्ता ना होने पर बीच सत्र में ठेका निरस्त करके नए कैटरर्स को काम देने की बात हो
वाहन का शुल्क किलोमीटर के हिसाब से तय किया जाये यदि स्कूल बसें उपलब्ध करवाता है तो और इसमें भी उन बच्चों का बीमा करवाया जाए
गणवेश, किताबों, एप्रन, फाइल्स, स्टेशनरी आदि स्कूल ना बेचें ना ही किसी दुकान विशेष से लेने के लिए दबाव बनायें
स्कूल में सत्र समाप्ति पर विदाई पार्टी, फोटो सेशंस आदि के लिए रुपयों का दबाव ना बनाया जाये
खिलाड़ी बच्चों से बाहर जाने या प्रतिस्पर्धा में जाने के लिए पालकों की भागीदारी से पारदर्शिता पूर्ण खर्च किया जाये
विशेष व्याख्यान, मेडिकल चेक अप, विशेष कक्षाएं आदि के नाम पर लूट ना हो
शिक्षकों को वेतन के साथ सभी भत्ते यथा पी एफ, ग्रेज्युटी, पेंशन, बीमा और मेडिकल कार्ड की सुविधा मिलें

Monday, July 10, 2017

मध्यप्रदेश में अफसरशाही पर लगाम लगाना जरुरी है 10 July 2017




मध्यप्रदेश में अफसरशाही पर लगाम लगाना जरुरी है
-संदीप नाईक -

मप्र में ब्यूरोक्रेसी की आत्म मुग्धता चरम पर है और इसमे वे अपने को, अपने काम को और अपनी छबि को चमकाने के लिए किसी भी हद तक जाकर काम कर रहे है इसके विपरीत वे अपने मातहतों के साथ बहुत बुरा व्यवहार भी कर रहे है. यह बात इन दो उदाहरणों से समझी जा सकती है. ऐसा नहीं है कि या कोई आज की बात है, मप्र में ब्यूरोक्रेसी में टीनू और अरविन्द जोशी का उदाहरण सामने है जिन्होंने अरबों रुपयों का घोटाला करके करोडो रुपया खाया और सरकार ने ठोस कदम लेने में बहुत लंबा समय लिया. टीनू अरविन्द जोशी दंपत्ति ने प्रदेश में आरसीपीवी नरोन्हा- जो प्रदेश के पहले मुख्य सचिव थे और जिन्होंने तीन मुख्य मंत्रियों के साथ काम करके “ए टेल टोल्ड बाय एन इडियट” जैसी महत्वपूर्ण किताब लिखी, के आदर्श को ध्वस्त किया, शरदचंद्र बेहार जैसे प्रखर और मुखर अधिकारी के द्वारा स्थापित पारदर्शी प्रशासन का बेड़ा गर्क किया. ये उदाहरण तो ठीक थे जो भयानक भ्रष्टाचार की सीमा में आये परन्तु आजकल जो प्रदेश में ब्यूरोक्रेसी की हालत है वह बेहद चिंताजनक है. ब्यूरोक्रेट्स द्वारा नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ना आजकल सामान्य सी बात है पुर्व डीजीपी रुस्तम सिंह की सबको याद ही होगी.  भाजपा में यह फैशन बहुत चलन में है जो कि एक सकारात्मक बात भी है. लोकतंत्र में सब जायज है.
पिछले तीन वर्षों से नौकरी नहीं कर रहा हूँ . पिछले दिनों दिल्ली की एक कम्पनी का ऑफर मिला कि वे मप्र में सरकार के साथ मिलकर डिजिटल इंडिया के तहत तीन विभागों के साथ काम करना चाह रहे है और अनुबंध साईन हो गया है, जिसमे मुख्य काम था विभागों और सम्बंधित अधिकारियों की छबी चमकाना. एक लंबा दौर चला बातचीत का . जब तनख्वाह की बात आई तो मैंने कहा कि एक लाख रुपया प्रतिमाह तो वे सहर्ष तैयार हो गए. जब सारी बातचीत लगभग होने को थी तो अंत में मैंने पूछ लिया कि यह सरकारी काम है या कुछ और भी? तो उस कम्पनी के सीईओ ने लजाते हुए कहा कि सत्ता के एक व्यक्ति विशेष की फेसबुक पोस्ट्स, टवीटर हेंडल करना और उनके विभाग की सारी योजनाओं को जमकर चमकाना भी होगा. विडिओ बनाकर उन्हें लोकप्रिय बनवाना भी इसमे शामिल था. थोड़ा और पता किया तो उन लोगों ने मेरी दो साल की फेसबुक पोस्ट्स देखी थी और बावजूद इसके कि मै प्रतिपक्ष रचता हूँ वे सहर्ष तैयार थे, कारण भाषा और लाईक्स, कमेंट्स !!!
अब समझ आ रहा है कि डिजिटल के नाम पर कैसे ब्यूरोक्रेट्स, नेता और विभाग प्रमुख अपनी व्यक्तिगत छबि चमकाने का काम कर रहे है और इसके लिए जनता की गाढ़ी कमाई का रुपया इस काम में जा रहा है. यह बता दूं कि उस कम्पनी में काम करने वाले 30 से 38 साल के युवा थे जो आईपीएस इंदौर से लेकर आईआईएम् बेंगलोर तक के पढ़े लिखे है और इनका एक बड़ा जाल है जो प्रदेश में भयानक अन्दर तक सक्रीय है. ये युवा क्रिकेट टीम से लेकर विदेश मंत्रालय तक का काम करते है और ब्यूरोक्रेट्स की आकर्षक छबी बनाने के ठेके लेते है. रुपया कमाना कम्पनी बनाकर गलत नहीं है गलत है इस तरह से जनता की गाढ़ी कमाई को अपने हित में उपयोग करना और यह काम प्रदेश के नेता सेलेकर ब्यूरोक्रेट्स भलीभांति जानते है.
मप्र के क्या, भाजपा के सारे मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को भी आत्म मुग्धता की लम्बी बीमारी है उअर इन सबका का लंबा अभ्यास है और कई मुख्यमंत्री तो अब गत पन्द्रह वर्षों में लम्बी पारी खेलकर इसके पारंगत खिलाड़ी भी हो गए है. शिवराज सिंह चौहान को अवसर ज्यादा मिलें जिससे उन्होंने अपनी व्यक्तिगत छबि चमकाने के लिए राज्य के धन, का मशीनरी का दोहन ही नहीं किया बल्कि अपने अफसरों को यह छुट भी दी कि वे भी इस बहती गंगा में हाथ पाँव धो लें. सिंहस्थ, नर्मदा यात्रा, पौधारोपण तो ताज़ी बातें है इसके पहले वे अपने घर विभिन्न समुदायों और पेशे से जुड़े लोगों की पंचायतें बुलाकर या लाडली लक्ष्मी से लेकर तमाम केंद्र सम्स्र्थित योजनाओं को अपने नाम से घोषित करके अपनी छबि चमकाने का कार्य करते रहे है. उनके अफसरों की एक पूरी टीम इसमें उन्हें मार्गदर्शन देती है बाकायदा इवेंट मैन्जर्स को बुलाकर उनके कामों को शो केस किया जाता है और इमेज बनाई जाती है.
आंध्र प्रदेश के रहने वाले युवा आयएएस पी नरहरी, जो ग्वालियर से लेकर इंदौर जैसे मलाईदार जिलों में कलेक्टर रह चुके है काफी आई टी फ्रेंडली है. इंदौर में रहते हुए ज्यादातर समय इनका अपना फेसबुक पेज को निखारने संवारने में चला जाता था और लोगों से वे सोशल मीडिया साईट्स पर ही मिलाकर समस्याएं हल करते थे. इन्ही नरहरी ने हाल ही में अपने ऊपर एक डाक्यूमेंट्री बना डाली है जो उनके व्यक्तिगत कामों का गुणगान करती है, इसमे वे यह भूल गए कि उन्हें सभी प्रकार के काम करने के लिए पर्याप्त तनख्वाह भी मिलती है और सुख सुविधाएं भी, लिहाजा उन्होंने काम करके कोई ज़मीन तोड़ने का काम नहीं किया है. अपने खुद के ऊपर फिल्म बनाकर उन्होंने प्रदेश के अफसरों के सामने एक नई  मिसाल कायम की है. पुराने तो नहीं,  पर नए युवा अफसरों में इसको लेकर निश्चित ही एक अभिलाषा जागेगी और आने वाले समय में प्रशासनिक अधिकारी काम करने या जनता की समस्याएं सुनने के बदले फ़िल्में ही बनवा कर अपनी हिट्स बढ़वाते रहेंगे. हो सकता है शूटिंग के दौरान वास्तव में जनता को कुछ फ़ायदा मिल जाए. पी नरहरी ने कोई पाप नहीं किया है, कई लोग कहते है कि अब समय की मांग है कि जो दिखेगा वही बिकेगा, जब प्रदेश के मुख्यमंत्री को हर विज्ञापन में अपना चेहरा दिखाने का रोग लग जाए, बावजूद इसके कि सुप्रीम कोर्ट इस बारे में सख्त हिदायत दे चुका है , फिर भी तमाम मुख्यमंत्री अपने मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ हर दिन अखबारों के जैकेट में मौजूद रहते है.
दूसरा उदाहरण क्रूरता की हदें पार करके अपने एक छोटे से बीमार कर्मचारी को हैदस में डालकर राज करने की सामंती प्रवृत्ति को दर्शाता है. कल्पना करिए एक लोक प्रशासक की - जो आईआईटी, कानपुर से पढ़कर अखिल भारतीय सेवा पास करके आया, लाल बहादुर शास्त्री अकादमी, मसूरी में उसने प्रशिक्षण लिया और फिर किसी जिले में बतौर सी ई ओ या कलेक्टर नियुक्त हुआ ......क्यों.......क्योकि वह जनता की सेवा कर सकें, प्रशासनिक कार्यों को गति दे सकें और उम्दा प्रदर्शन करके शासन की मंशा अनुरूप कार्य कर सभी काम ठीक से कर सकें, परन्तु होता यह है कि वह जब पोस्टिंग पाता है तो एक निरंकुश सामंत की तरह से हो जाता है और जनता को दबाने का कार्य ही नहीं करता, वरन वह उनका भाग्य विधाता भी बनने की कोशिश करता है और इस दर्प में वह यह भूल जाता है कि वह एक मनुष्य भी है और जनता का नौकर. पर यह होता कहाँ है वह तो नीचता की हद कर देता है यह किसी से छुपा नहीं है.

ताजा मामला श्योपुर सीईओ ऋषि गर्ग का है जिनके दफ्तर आते ही एक होम गार्ड के 53 वर्षीय जवान ने कार का दरवाजा खोलने में क्षणिक देर की तो इस अधिकारी ने उस प्रौढ़ व्यक्ति और शक्कर के मरीज को अपने दफ्तर के दस चक्कर लगवाएं. बताइये कि ये कौन से युग में जी रहे है हम, और सबसे बड़ा सवाल क्या होमगार्ड के जवान की ड्यूटी में यह शामिल है कि अपने आका की गाड़ी का दरवाजा खोलें, नहीं...... ऊपर से ये अधिकारी होता कौन है, सजा सुनाने वाला
?
क्या लाल बहादुर शास्त्री अकादमी को अपने पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं करना चाहिए जो इन पढ़े लिखे माननीयों को "पैम्पर" करके मैदान में भेजती है. जिन्हें नैतिक मूल्यों और मनुष्यता के मूल सिद्धांत नहीं मालूम उन "माननीयों" को फिल्ड में भेजा जाता है ताकि ये मनमानी कर सकें, यहाँ यह उल्लेखनीय है कि यदि कलेक्टर / सी ई ओ का और सम्बंधित अधिकारियों का यह रवैया है तो सोचिये ये गरीब, आदिवासी वंचित लोगों के साथ क्या सुलूक करते होंगे. मप्र में ब्यूरोक्रेसी के ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे, राजगढ़ कलेक्टर का चित्र पिछले दिनों शाया हुआ था जिसमे वे ग्रामीणों की भीड़ के सामने किसी राजा की भाँती बैठे है. मप्र में यह सब बहुत बढ़ गया है और प्रदेश के मुख्य सचिव का किसी पर नियंत्रण नहीं है, वे सत्ता के साथ मिलकर चुनाव जीतने की रणनीति पर काम कर रहे है - लगता है. आय ए एस अधिकारी / कलेक्टर जिलों के "राजा बाबू" बन गए है और सामंती मानसिकता में प्रशासन चला रहे है. ऐसे अधिकारियों / कलेक्टरों को तो सीधे बर्खास्त कर देना चाहिए. पता नहीं क्यों प्रदेश के संवेदनशील मुख्यमंत्री (? )इन्हें झेलते है या प्रश्रय देते है?

बेहद शर्मनाक और इस अधिकारी की तो भर्त्सना की जाना चाहिए.


Sunday, July 9, 2017

IT Engineer and Digital India 9 July 2017



अभी सुबह एक युवा मित्र आये थे। सॉफ्ट वेयर इंजीनियर है। अमेरिका रहकर आये है 5 साल।
आकर बैठे ही थे कि कुछ याद आया तो फोन मिलाने लगे , बहुत देर तक रि -डायल करते रहें , साला फोन लगा नही , झुंझलाहट हो रही थी । मुझे भी कोफ्त हो रही थी क्योंकि मुझे भी कही जाना था। एक तो बगैर फोन किये आ गए - ऊपर से मोबाइल ।
आखिर मैंने पूछ लिया कि क्या दिक्कत है , बोले " सर दिल्ली फोन लगा रहा हूँ लग नही रहा " ओह, मैंने कहा लाओ दिखाओ मैं कोशिश करता हूँ - जब कॉल लॉग देखा तो नम्बर था -
011- 98105 *****
मैंने पूछा कि ये दिल्ली का एस टी डी कोड क्यों , तो बोलें
" सर मैं अभी मप्र में हूँ ना और दिल्ली या किसी भी राज्य के बाहर फोन लगाएंगे तो एस टी डी कोड तो लगाना पड़ेगा ना ? "
मैंने कहा हे प्रभु , यह मोबाइल नम्बर है ना, तो बोलें - तो क्या हुआ राज्य के बाहर का नम्बर तो है ना !!!
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि ये सज्जन डिजिटल इंडिया के लिए सरकार से ठेका लेकर सरकारी विभागों की सोशल मीडिया साइट्स के मॉडरेशन का कार्य करने वाली एक डिजिटल कम्पनी के टीम लीडर है।
अपन गंवार ही भले भिया !!!

Thursday, July 6, 2017

मौत का एक दिन मुअय्यन है - 6 जुलाई 2017

चारो ओर तेज ताप था, अग्नि की लटायें ऊंची उठ रही थी और कही दूर कुत्ते किसी चीज के लिए छीना झपटी कर रहे थे , एक आदमी दूर बेंच पर बैठा अपने पांवों को घूर रहा था। बगीचे में फूल थे पत्तियां थी जड़े भी होंगी ही हवा भी थी पर ना खुशबू थी ना सरसराहट - बस एक उदासी थी जो चहूँओर पसरी थी।

बचपन से अक्सर यहाँ आ जाता था वो क्योकि यही थे वो सब लोग जिन्हें वह लगभग ढोते हुए अपने काँधों पर लाया था कभी आंखों में आंसू थे और कभी मन मे तसल्ली कि जीवन के झंझावातों से शरीर मुक्त हो गया।

यह शहर के दूसरे किनारे पर बसा एक मैदान था जहाँ धीरे धीरे टपरे डलते गए, ईंट के चबूतरे बन गए, लोगों ने जीते जी तो माँ बाप को सम्हाला नही पर सब ओर संगमरमर के पत्थर नाम टाँक कर लगा दिए और खुद अमर होने के मुगालतों में जीने लगें।

अपने आप से कह रहा था वह - आज फिर उदास हूँ और आ गया हूँ इस जगह पर जहां सारे जाले साफ हो जाते है फिर तय किया है कि अघोरियों की तरह देर रात तक बैठेगा और अपने साथ लाये आलूओं को किसी जलती हुई लाश के सिर मुहाने बैठकर भूनकर खा लेगा पर हड़बड़ी में आज हरी मिर्च और नमक लाना भूल गया, कोई नई किसी हड्डी को फोडूंगा तो नमक का स्वाद तो मिल ही जायेगा।

यह दुनिया उसने बहुत समझने की कोशिश की पर कुछ समझ नही पाया बस हर बार एक लाश के रूप में अर्थ निकालता हुआ वह यहां तक आ गया और फिर वही देर रात तक बैठे रहते हुए वह भोर में शुक्र तारा देखकर घर लौटा । घर - उफ्फ, घर , दुनिया और यारी के नाम पर अब उसे चिढ़ होने लगी थी।

अचानक वह गिनने लगा कि कितनी बार अब तक वह यहाँ आया है और कौन लोग थे जिनके लिए वो आया और यह जगह उसके जीवन का ऐसा स्थान बन गई कि आये बिना वह रह ही नही सकता था , क्यों , पता नही कई बार रात डेढ़ बजे के आसपास उसे लगता कि दग्ध अग्नि से प्रेत निकलते है और वह उनसे बात करने लगता पर फिर वह कही खो जाता और उसे होश नही रहता कि वह ज़िंदा भी है या नही। इस सबमे उसने अपने हाथ पांव और बाल जला लिए है । चेहरे का एक दाग तो उसके जीवन से बड़ा है जो हर बार उसे श्मशान की याद दिलाता है।

उसे लगा कि उसके सारे काम पूरे हो चुके है, संसार को जो देना था और पाना था वह तो तीन वर्ष पहले ही पा चुका था पर एक और करीबी की मौत ने उसे ये तीन वर्ष और बख्श दिए पर अब उसके सामने कोई भी काम नही , उद्देश्य नही और लक्ष्य नही - लिहाज़ा अब उसे सही समय का ही इंतज़ार करना है बाकी सारे बन्धनों से तो मुक्त हो ही चुका है। परसो एक अंतिम चिठ्ठी लिखनी थी एक मित्र को - वह भी सोच विचारकर लिख दी और फिर बहुत हल्का महसूस किया था। देर तक हंसता रहा था वहशियों की तरह और उस रात और यहां के कुत्ते और शायद अधजली लाशें भी उसे हंसता देखकर डर रही थी।

आज दोपहरी का यह सुकून भरा समय था जब बादल भी काले थे - खूब पानी से भरे हुए और हवाएं भी अपने अंदर कुछ ओस की बूंदें समाएं हुए थी। धरती पर हरियाली की चादर बिछ चुकी थी , इस बियाबान में जीवन के नए अर्थ और क्या हो सकते है इसके लिए देह से परे जाना ही होगा । प्रेम देह से गुजरकर आता है और यही प्रेम मुक्तिकामी भी होता है इसलिए अब देह से गुजरे और पार गए बिना कही कोई सत्व नही है। आज यह तय करने पर कितना हल्का लग रहा है यह बताना मुश्किल था और लगा कि सदियों से जली हुई देहों से निकली आत्माएं ताज़े फूल लेकर उसके स्वागत में खड़ी हो गई हों प्रेमातुर और तत्परता से उसे ले जाने को उद्धत है।

Tuesday, July 4, 2017

रंगमंच को विदा कहने का समय 1 July 17


प्रेक्षकों के सामने मैं अकेला खड़ा हूँ और आसमान सन्न है, हवा के तेज थपेड़ों के सामने आज तक निर्विघ्न और अटल खड़ा रहा, मेरे अंदर ही जुलियस सीज़र, हेमलेट, ओथेलो, कालिदास, भृतहरि और दुनिया भर के कलाकार ज़िंदा रहें और सबको अपनी छाती में छुपाकर मैंने इन सबको जिया और अपने अंदर पाला -पोषित किया।
आज जब रिश्तों का यह घिघौना उजड़ता हुआ स्वरूप सामने आ रहा है तो प्रेक्षालय के दरवाजे फड़फड़ा रहे है, आँधियाँ तेज हो चली है, मेरे पांव काँप रहे है। जिसने इस अक्षत साँसों के रंगमंच को जीवन भर इतनी दृढ़ता से थामे रखा, संसार मे हजारों हजारों प्रेक्षकों को जीवन का अर्थ, महत्व और जीने का संज्ञान दिया, जिससे सीख लेकर लोग घरों में लौट गए और अपनी जीवन नैया को पार लगाया - आज वही कलाकार अपने ही प्रेक्षकों के सामने, गुणवंतों के सामने हार गया है।
यह रंगमंच को विदा कहने का समय है और एक असल जीवन मे प्रवेश करने का उत्तम समय है ऐसे में जब आस्थाएं और विश्वास खण्डित हो गए है तो इस नकली मुस्कुराहट, भ्रम, अर्थ, सन्ताप, अवसाद, आरोह - अवरोह और विस्मय के तिलिस्म को तोड़कर सारी मोहमाया को छोड़कर जीवन के उस रूप को अपनाना होगा जो इस अंतिम और बीतते जा रहे क्षण में चिर शांति और अमर निद्रा दे सकें जिसे पाने को युगों तपस्या करनी पड़ती है।
(प्रेरणा - नट सम्राट)

Sunday, July 2, 2017

पचास सरकारी स्कूलों की ह्त्या July 2, 2017




पचास सरकारी स्कूलों की ह्त्या
-संदीप नाईक-

यह इस वर्ष के नए स्कूली सत्र के शुरुवाती दौर की कहानी है. 28 जून को मप्र के सीहोर - जो राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का जिला है, में शिक्षकों के साथ एक बैठक कर रहे थे. एक स्वैच्छिक संस्था के साथ काम करने वाले लगभग तीस शिक्षक और मैदानी काम करने वाले साथी मौजूद थे. बैठक में सर्व शिक्षा अभियान के जिला प्रभारी भी थे उन्होंने औपचारिक उदघाटन के बाद कहा कि पिछले शिक्षा सत्र में सरकार को 50 सरकारी विद्यालय बंद करना पड़े क्योकि बच्चों की पर्याप्त संख्या नही थी, लिहाजा कार्यरत शिक्षकों का युक्तियुक्तकरण के कारण स्थानान्तरण कही और किया गया और स्कूल बंद कर दिए गए. इस बैठक में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने भी संबोधित कर शिक्षकों से इस कारण पर गंभीरता से विचार करने को कहा. यह मुद्दा उनके लिए एक प्रशासनिक समस्या था परन्तु इस मुद्दे ने सारे दिन की बैठक का एजेंडा तय कर दिया. फिर बगैर किसी नीति या आंकड़ों की बाजीगरी के शिक्षकों से खुलकर बात हुई कि आखिर ये सरकारी स्कूल क्यों बंद हुए? यह एक प्रकार से जीवंत स्कूलों की समुदाय द्वारा की गई सामूहिक ह्त्या है यदि यह माना जाए तो कोई अतिश्योक्ति नही होगा !!!

शिक्षकों ने बताया कि खराब बिल्डिंग, फर्नीचर के अभाव, पर्याप्त मात्रा में शिक्षकों का ना होना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का ना मिलना, बच्चों का पांचवी या आठवीं पास होने पर भी अधिगम यानी सीखने का स्तर शून्य होना और शिक्षकों का गैर शैक्षणिक कार्यों में वर्ष भर न रहना प्रमुख कारण है.  बात जब गहराई से की तो पता चला कि सरकारी स्कूलों में प्रवेश के समय न्यूनतम आयु पांच या छः वर्ष होना चाहिए जबकि आज के परिवेश में निजी विद्यालय ढाई साल के बच्चे को भी प्रवेश देकर पांच साल की उम्र तक तोता रटंत बनाकर गिनती या वर्णमाला रटवा देते है जो सामने दिखता है पालक को, अस्तु उनके लिए उनके पाल्य का सरकारी स्कूल में प्रवेश करवाने का कोई अर्थ नहीं है. निजी विद्यालयों में ना योग्य शिक्षक है ना आधारभूत ढाँचे परन्तु उनकी चमक दमक और आकर्षक सी लगने वाली सुविधाएं, अंग्रेजी माध्यम का पुछल्ला इतना प्रचारित हो जाता है कि गरीब से गरीब व्यक्ति भी शुल्क देकर अपने बच्चे को वहाँ पढवाने के लिए लालायित रहता है.

जब विस्तार से बात की तो यह निकला कि सरकारी विद्यालयों में बच्चों को कई प्रकार की सुविधाएं मिलती है – योग्य, अनुभवी और प्रशिक्षित शिक्षक, निशुल्क पाठ्यपुस्तकें, छात्रवृत्ति, मध्यान्ह भोजन एवं निशुल्क शिक्षण आदि जबकि ठीक इसके विपरीत निजी विद्यालयों में कुछ भी नहीं मिलता उलटे पालक की जेब से मोटी फ़ीस हर माह जाती है साथ ही खेल, पुस्तकालय और शाला विकास शुल्क के नाम पर प्रति वर्ष एक बड़ी नगद राशि रखवा ली जाती है जिसकी रसीद भी प्रायः नहीं मिल पाती. जिले के इछावर ब्लॉक के दूधलई नामक गाँव की कहानी सुनकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ से चार किलोमीटर दूर एक गाँव के एक निजी विद्यालय में जहां न्यूनतम सुविधाएं है योग्य शिक्षक भी नहीं वहाँ इस गाँव के बच्चे पढ़ने जाते है और पूरा गाँव  साल भर में लगभग बारह लाख रुपया इस निजी विद्यालय को देता है. गाँव में अधिकाँश गरीब, वंचित समुदाय के लोग रहते है.

सवाल यह था कि इस समस्या का क्या उपाय है. समाधान तो कई निकलें परन्तु उन्हें हल कौन करेगा यह बात पचाना थोड़ा मुश्किल था. एक महत्वपूर्ण सुझाव यह निकलकर आया कि यदि शाला प्रबंधन समिति अपने गाँव और आंगनवाडी को सक्षम बनाएं तो इस समस्या से मुक्ति पाई जा सकती है. मसलन- गाँव की आंगनवाडी में एक गाँव की ही पढ़ी लिखी लड़की रखें - जो पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों को गिनती, अक्षर ज्ञान और वर्णमाला सिएं.  शाला प्रबंधन समिति पहली से आठवीं तक के स्कूल में अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति करें जो अंग्रेजी, विज्ञान और गणित में दक्ष हो और बच्चों को आउटपुट आधारित शिक्षा दें, शाला भवन में शौचालय, अतिरिक्त कक्ष, सजावट, पीने के पानी की व्यवस्था, बिजली के लिए सोलर प्लांट, सफाई के लिए सफाईकर्मी की नियुक्ति करें. अब सवाल यह उठा कि यह सब कैसे होगा - रुपया कहाँ से आयेगा क्योकि शाला प्रबंधन समिति के पास ना तो कोई फंड होता है ना ही शासन से उम्मीद की जा सकती है. एकाध स्कूल में नवाचार के नाम पर यूनिसेफ या अन्य किसी बड़ी डोनर एजेंसी से हम मदद ले सकते है पर क्या यह लम्बे समय के लिए मॉडल व्यवहारिक है. तो फिर यह निकला कि पालक एक निश्चित फीस स्कूल में शाला प्रबंधन समिति को दें माहवार और समिति इस रूपये से ये सारे खर्च वहां करें. जब इस बात पर चर्चा हुई तो पाया कि जो रुपया पूरा गाँव निजी विद्यालयों को वार्षिक दे रहा है दस लाख के ऊपर उससे एक चौथाई खर्च में अपने गाँव में ही यह सब किया जा सकता है. जब गणना की गई तो दूधलई गाँव में यह खर्च लगभग दो ढाई लाख रुपया आया यानी बारह लाख किसी अन्य निजी विद्यालय को देने के बाजे मात्र ढाई लाख रूपये में अपने गाँव के विद्यालय में वे सारी सुविधाएं प्राप्त की जा सकती है जो आवश्यक और गुणवत्तापूर्ण है. साथ ही गाँव में यह सारा निवेश स्थाई होकर गाँव के लिए एक अचल संपत्ति के रूप में रहेगा ताकि आने वाली पीढियां इसका लाभ बरसों तक उठा सकें.

ऐसा नहीं है कि पूर्व प्राथमिक शिक्षा और आंगनवाडी को लेकर प्रयोग नवाचार नहीं हुए है कई संस्थाओं ने आंगनवाडी की बेहतरी के लिए प्रयोग किये है ताकि प्राथमिक विद्यालय में जाने से पूर्व बच्चे तैयार हो सकें. सीहोर के इछावर ब्लाक में ही विभावरी संस्था ने दो आदर्श आंगनवाडी में प्रयोग करके सफलता से यह धारणा तोड़ी है कि समुदाय सहयोग नहीं करता. संस्था ने दो जगहों पर गाँव की ही पढ़ी लिखी लड़की को प्रशिक्षित कर बच्चों को पूर्व प्राथमिक शिक्षा में दक्ष किया है. विकास संवाद संस्था ने प्रदेश के रीवा, सतना, पन्ना और उमरिया जिलों के आदिवासी बहुत गाँवों में आंगनवाडी में समुदाय को वृहत्तर स्तर पर शामिल करके नवाचार किये है और लगभग सौ आदिवासी गाँवों के पन्द्रह हजार गंभीर कुपोषित बच्चों को सामान्य श्रेणी में लाया है जिसकी तारीफ़ प्रशासन कर चुका है और अब इन गाँवों में शिशु और मात्र मृत्यु दर न्यूनतम है साथ ही संस्थागत प्रसव भी लगभग शत प्रतिशत हुआ है. ये प्रयास बच्चों को शिक्षा की ओर उन्मुख ही नहीं कर रहें वरन प्राथमिक शिक्षा की मजबूत नींव बनाने में भी सार्थक सिद्ध हो रहे है.

ऐसे में जब वंचित, दलित और गरीब समुदायों के लिए ही सरकारी स्कूल प्रतीक बनते जा रहे थे और अब सरकार इन्हें भी बंद करके इन समुदायों को शिक्षा से दूर रखने के लिए नित नए प्रावधान कर रही है उसमे समुदाय की भागीदारी से स्कूलों को सच में पंचायतों को संविधान के “73 वें संशोधन अधिनियम 1993” के तहत शिक्षा विभाग के जंजाल से मुक्त करके शाला प्रबंधन समिति के हस्तगत करना होगा ताकि वे अपने तई स्थानीय स्तर पर विकल्प खोजकर कुछ सार्थक प्रयास कर सके. शिक्षकों को यह समझना जरुरी है कि आज तो उनका स्कूल बंद होने से युक्तियुक्तकरण तरीके से स्थानांतर किया जा रहा है पर कल यदि स्कूल इसी तादाद में बंद होते गए तो सरकार  अनिवार्य सेवा निवृत्ति देकर घर बैठा देगी और फिर उनके पास करने और कहने को कुछ नहीं रह जाएगा. एक मुख्यमंत्री के जिले में यदि 50 स्कूल बंद हो सकते है तो यह चेतावनी भी बड़ी है कि कल समुदाय के किस स्कूल, सरकारी अस्पताल या संस्थान की बारी है. अब समय है कि हम सरकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता और साख को पुनः लौटाएं और स्थापित करें और यह काम समाज का उच्च वर्ग नहीं करेगा मानकर चलिए यह काम कार्यरत कर्मचारी और वहाँ के दबे ले लोग ही कर सकते है जो पीड़ित है.