Friday, June 30, 2017

नर्मदा यात्रा , पौधारोपण और राज्य के मूल कर्तव्य - नागरिकों के संदर्भ में



नर्मदा यात्रा , पौधारोपण और राज्य के मूल कर्तव्य - नागरिकों के संदर्भ में 

मप्र में पिछले 15 वर्षों में नाटक, लुभावने नारे, घोषणाओं और मूर्खताओं के अलावा कुछ नही हुआ।
व्यापमं, रेत खनन से लेकर फर्जी एनकाउंटर, किसान आत्महत्या के कारण हजार से ज्यादा लोग जान गंवा चुके है। राज्य क्या कर रहा है - सिंहस्थ में 3000 करोड़ रूपये बर्बाद, घर पर पंचायतें बुलाकर घोषणाएँ, सिर्फ और सिर्फ नाटक।


पिछले साल से एक बड़ा मेलोड्रामा नर्मदा के नाम पर चल रहा है जिसमे राज्य का खजाना खाली कर दिया गया है। पहले पांच माह नर्मदा यात्रा चली और प्रशासन ठप्प रहा, और अब 2 जुलाई को पौधारोपण के नाम पर एक माह से राज्य में सारे काम ठप्प पड़े है। कई अधिकारियों से बात की तो वे कह रहे है कि कुछ काम नही कर पा रहें , सारा समय इस नौटँकी में जा रहा है। मतलब मूर्खता यह है कि विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए महिला कर्मचारियों को जो चपरासी, लिपिक, शिक्षक, डाक्टर या प्राध्यापक है का पौधें कैसे लगाएं इसकी ट्रेनिंग पर खर्च, फिर इन्हें दूरदराज के गांव में 1जुलाई की रात पहुंचना है और रात वही रुककर अगले दिन सुबह से अनुश्रवण का काम करना है वो भी ऑन लाईन । इसके सारे प्रपत्र अंग्रेजी में है। एक प्रशिक्षण में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने जब हिंदी में प्रपत्र की मांग की तो उन्हें डाँट दिया गया। महिला डॉक्टर्स, लिपिको और प्राध्यापकों ने पूछा कि रात कहां रुकेंगे तो जवाब मिला हमे नही मालूम, फालतू सवाल मत पूछो।

सभी को जानकारी ऑन लाईन भरना है एक मोबाइल एप में जानकारी देना है , क्या सबके पास स्मार्ट फोन है ?  ये मूर्खतापूर्ण सलाह कौन देता है इस ज्ञानी को जनता के चौराहे पर सामने लाकर पूजा की जाना चाहिए।

एक आदमी की कुर्सी प्रदेश में जब भी खतरे में पड़ी है प्रदेश ने करोड़ों रुपयों की नौटँकी देखी और देखते देखते खजाना खाली हो गया। ठीक इसके विपरीत प्रदेश में महिला हिंसा के ग्राफ से कुपोषण, मातृ मृत्यु दर, सरकारी अस्पतालों में लापरवाही से मौतें, स्कूलों में अव्यवस्था बढ़ी है। पर हम शर्म, लाज या हया बेच चुके है। केंद्रीय नेतृत्व को यहाँ बुलाकर विचारमंथन,शहीद स्मारक या नर्मदा के गुणगान करने बुला लिया जाता है । इतने बड़े फंड से किसानों का कर्ज माफ हो सकता था, बेरोजगारों को नौकरी दी जा सकती थी, संविदा कर्मचारियों को नियमित किया जा सकता था।

प्रदेश का मीडिया , कुछ को छोड़कर, बिका हुआ है जो एक डील में सब कुछ बेच देता है, जमीर तो बचा नही है इनमे , अब जाकर देखना होगा कि बीबी बच्चे सलामत है या वो भी देहरी पर सजे - धजे तैयार है बिकने को।और बात जनता की, आखिर में वो तो हिन्दू राष्ट्र के कृषि कर्मण प्रदेश की नागरिक होने पर गर्व महसूस करती है। धन्य है ये लोग और इनकी बुद्धि जो नर्मदा पर रेत खत्म हो जाने पर पौधों के झुनझुनों को अपना जीवन मानती है। कर्मचारी यूनियन निष्क्रिय है जो कल सत्ता के गाय भैंस और बकरी भी चराने चले जायेंगे। काहे के प्राध्यापक और डॉक्टर इंजीनियर जो "ना" कहने की औकात नही रखते और भेड़चाल में कुचले जाते है। तुम लोग ऐसे ही तानाशाह को डिजर्व करते हो। और ब्यूरोक्रेट्स - वे तो गिरगिट है ही और अब इस सरकार की नींव में ऐसे उलजुलूल सुझाव देकर मठ्ठा डाल रहे हों।

मैं भी सोच रहा हूँ भगवा चोला पहन लूँ और मित्रों और बच्चों के लिए कमा लूँ । क्या रखा है सच्चाई बयान करने से, अभी यहां ज्ञानी आकर भड़केंगे जो भूख नही राज्य या राष्ट्रभक्ति का तराजू लेकर चलते है आंखें बंद करके। धिक्कार है इस प्रदेश के बुद्धिजीवियों पर।

एम पी अजब है, सबसे गजब है

Wednesday, June 28, 2017

Rest in Peace Sameer Sheikh 27 June 2017 - End of a Joyful Life at an early age.....


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Sameer Shaikh ये क्या हो गया बच्चे, अभी पता चला कि आज तुमने यह देह त्याग दी हार्ट अटैक के कारण।
मेरे लिए यह बहुत दुखद और वेदना के क्षण है। कल तुम्हे ईद मुबारक कहा था, तुमने घर बुलाया था और मैने भी कहा था कि जल्दी ही आता हूँ । तुमने मजाक किया था कि आ जाओ लिपिड प्रोफ़ाइल भी टेस्ट कर दूँगा। उस दिन यानी 25 जून को तुम्हारे जन्मदिन पर भी कितनी देर तक हम बातें कर रहे थे, तुम मुझे कह रहे थे कि अब मैं भी बूढा हो रहा हूँ आपकी तरह - तो मैने कहा था बूढा होगा तेरा बाप और खूब जोर से हंस दिए थे हम दोनों !!!

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यदि ऐसा पता होता तो कल मैं मिलने ही आ जाता, किसी को नही पता था कि आज सुबह 930 बजे तुम हम सबको यूँ अकेला छोड़कर जन्नत में चले जाओगे बिलखता सा छोड़कर समीर !!!

समीर मेरा बहुत पुराना छात्र था, सन 1987 से 89 तक देवास के एक विद्यालय में। पिताजी की प्रसिद्ध दुकान थी - टेलरिंग की, सिलेक्शन टेलर्स। बाद में समीर ने एक डॉक्टर लड़की से प्रेम विवाह किया था। पत्नी इंदौर की जानी मानी पैथोलोजिस्ट है। समीर बहुत ही हंसमुख , ज़िंदादिल और मस्त मौला था। वर्जिश और व्यायाम के शौकीन इस बंदे को आप हमेशा सहयोगी की भूमिका में पाएंगे।

अभी हाल ही में मिला था तो रेडिसन चौराहे से मुझे घर ले जाकर अपने बेटे से मिलवाना चाहता था। कह रहा था कि पुराने मित्रों का एक गेट टुगेदर कर लेता हूँ मांडव में , बस थोड़ी बरसात हो जाये। मैंने कहा बिल्कुल कर लो, मजा आएगा।

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पर आज यह सब सुनकर सन्न सा रह गया हूँ उम्र ही कितनी थी बच्चे तुम्हारी,और अभी तो तुम्हारा बेटा बहुत छोटा है और मुझे उससे मिलवाना भी था। यह ठीक नही किया समीर तुमने, बरसात भी नही हुई है और मांडव का ट्रीट अधूरा रह गया है।

तुम जैसे छात्र ही तो मेरी ताकत थे बच्चे, ये क्या हो गया कैसे अचानक जबकि तुम खुद जमाने भर के लोगों की जांचें करते थे, सी 21 के पास वाले जीम के तुम रोल मॉडल थे और अपने बच्चों के हीरो।
समीर , दोस्त यह ठीक नही किया तुमने, इस तरह कोई जाता है क्या ??? ईद पर यह ईदी मुझे स्वीकार नही है, मुझे यह ठीक नही लग रहा समीर।

बहुत नाराज हूँ तुमसे , लौट आओ बच्चे प्लीज़ लौट आओ, मेरे लिए ना सही - अपने प्यारे बेटे के लिए लौट आओ समीर ...... जाने के दिन हमारे है, मेरे है , क्या अब मुझे तुम्हारे लिए ये सब लिखना पड़ेगा , क्या यही बचा है , क्या यही सज़ा है ??? उफ्फ, ये क्या हो गया समीर
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Tuesday, June 27, 2017

Eid 2017



फैज़ साहब को याद करते हुए उन्ही की ये दुआएं कुबूल हो...........
आईए हाथ उठायें हम भी
हम जिन्हें रस्म-ए-दुआ याद नहीं
हम जिन्हें सोज़-ए-मोहब्बत के सिवा
कोई बुत, कोई खुदा याद नहीं

आईए अर्ज़ गुज़रें कि निगार-ए-हस्ती
ज़हर-ए-इमरोज़ में शीरीनी-ए-फ़र्दां भर दे
वो जिन्हें तबे गरांबारी-ए-अय्याम नहीं
उनकी पलकों पे शब-ओ-रोज़ को हल्का कर दे

जिनकी आंखों को रुख-ए-सुबह का यारा भी नहीं
उनकी रातों में कोई शमा मुनव्वर कर दे
जिनके कदमों को किसी राह का सहारा भी नहीं
उनकी नज़रों पे कोई राह उजागर कर दे

जिनका दीन पैरवे-ए-कज़्बो-रिया है उनको
हिम्मत-ए-कुफ़्र मिले, जुर्रत-ए-तहकीक मिले
जिनके सर मुन्ताज़िर-ए-तेग-ए-जफ़ा हैं उनको
दस्त-ए-कातिल को झटक देने की तौफ़ीक मिले

इश्क का सर्र-ए-निहां जान-तपां है जिस से
आज इकरार करें और तपिश मिट जाये
हर्फ़-ए-हक दिल में खटकता है जो कांटे की तरह
आज इज़हार करें ओर खलिश मिट जाये

---- फैज़ अहमद फैज़

Saturday, June 24, 2017

रेलवे और ट्वीटर सरकार, निठल्लों की चांदी और यात्रियों की मुसीबत

कल रात लोकमान्य तिलक टर्मिनल, मुम्बई से हम 5 साथी ट्रेन 11015 में बैठे।

ट्रेन में इतनी भीड़ थी कि लग ही नही रहा था कि रेलवे को ईद की कोई खबर होगी। क्या त्योहारों पर अतिरिक्त ट्रेन चलाने का या बोगियां लगाने का कोई रिवाज़ नही है। देश के नागरिक परेशान होते जा रहे है। टी टी ने मुम्बई से गौंडा, गाजीपुर, गोरखपुर तक के टिकिट के अलावा  ₹ 1000 तक वसूले और बच्चोँ के भी ले लिए जबकि ना सीट थी ना जगह । यह कैसा सलूक है लोगों को परेशान करने का। भाई Md Khursheed Akbar भी उसी समय दूसरी ट्रेन से घर जा रहे थे उन्होंने भी बताया कि उनकी ट्रेन में यही हाल है। ये भेदभाव करते है आप देश वासियों के साथ। रात तो मैं लोगों पर गुस्सा था पर असली जड़ रेलवे है जो निहायत लालची, भ्रष्ट और आदमखोर हो गया है।

ट्रेन में जैसे तैसे घुसे और देखा कि फ्लाईंग स्क्वाड वाले सबकी रसीद बना रहे है।

बाद में पाया कि बाथरूम में पानी नही है, टी टी को बोला तो बोला मैं कुछ नही कर सकता।

मैने, सचिन जैन और राकेश मालवीय ने सुरेश प्रभु को ट्वीट करना शुरू किया। कुल 20 से ज्यादा ट्वीट किए पर मक्कार अधिकारियों को फर्क नही पड़ा।

परंतु कोई जवाब नही आया। रात भर भीड़ बढ़ती रही, और टी टी साहब जमकर कमाते रहे और हमारे बार बार कहने पर भी कुछ नही कर रहे थे।

मैं चूंकि शक्कर का मरीज हूँ अतः बाथरुम जाना पड़ता है पर रात में एक बार भी जाने को नही मिला क्योकि भीड़ बदतर थी।

लोग इफ़्तार कर रहे थे, महिलाएं, बच्चे बुरी तरह कुचले जा रहे थे। सुबह से सेहरी कर रहे थे और एक अफरा तफरी मची हुई थी।

सुबह रेलवे ने हमसे ट्विटर पर पी एन आर नम्बर मांगे सो हमने दिए।

मामला भुसावल को हस्तगत किया गया था यही संदेश बार बार सबको आता रहा।

आखिर फिर मैंने लिखा कि 7 बार ट्वीट करने के बाद भी भीड़ पानी और पुलिस का कुछ नही हो रहा था तो लगा कि यह सिर्फ मूर्ख बनाने का धन्धा है।

1 जुलाई से रेलवे कन्फर्म टिकिट देने वाला है कैसे देगा इतने अक्षम मंत्री, निठल्ले कर्मचारी और ट्वीटर पर बैठकर मंत्रालय चलाने वाले लोग बैठे है तो ये क्या खाकर व्यवस्था और तन्त्र चलायेंगे ?

भारतीय रेल की दुर्दशा के लिए सुरेश प्रभु और उनकी पूरी टीम जिम्मेदार है।

आखिर तंग आकर मुझे खण्डवा उतरना पड़ा और वहां से बस से घर पहुंचा हूँ।

मुझे जो सन्त्रास और शारीरिक नुकसान हुआ उसके लिए यह ट्वीटर सरकार जिम्मेदार है।

सुरेश प्रभु और उनका मंत्रालय गैर जिम्मेदार और लापरवाह है और इनके अधिकारी, स्टाफ , रेलवे पुलिस और टी टी हद दर्जे तक धूर्त और भ्रष्ट है।

#sueshpprabhu @sureshpprabhu, #IndianRail ,#DRMMumbai, #DRMBhusawal

Sunday, June 18, 2017

तादेउष रोज़ेविच और माँ की बात

तादेउष रोज़ेविच
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हमारी मां की आंखें जो हमारे दिल और दिमाग़ को चीरकर भीतर तक घुस आती हैं, वही आंखें दरअसल हमारा ज़मीर हैं. वही हमें प्‍यार करती हैं, वही हमारे सही ग़लत का आकलन करती हैं. जब बच्‍चा पहला डग भरता है, तो मां की आंखें उसे देखती हैं. वही आंखें उसे देखती हैं, जब वह सबकुछ छोड़कर दूर जा रहा होता है.

काश, मेरी आवाज़ उन सब मांओं तक पहुंचे, जो अपने बच्‍चों को सड़क किनारे कूड़े के ढेर के पास लावारिस छोड़ जाती हैं या काश, मेरी आवाज़ उन बच्‍चों तक पहुंच जाए, जो अपने मां-बाप को वृद्धाश्रमों और अस्‍पतालों में भूल आते हैं.

मुझे याद है, मेरी मां ने मुझसे सिर्फ़ एक बार कहा था, सिर्फ़ एक बार, तब मेरी उम्र पांच साल थी. मां ने कहा था- "तुम बहुत शरारती हो, देखना, मैं तुम्‍हें छोड़कर चली जाऊंगी, चली जाऊंगी और फिर कभी लौटकर नहीं आऊंगी."

मुझे याद है कि मेरे दिल से खून बहने लगा था. हां, ऐसा ही कहना चाहिए, दिल से ख़ून. मैंने ख़ुद को खालीपन और अंधेरे में पाया था. मां ने तो सिर्फ़ एक बार कहा था, मैं सारी उम्र इस बात से डरा रहा कि मां चली जाएगी.

और एक दिन मां चली गई. लेकिन जिस समय उसने कहा था, उस समय नहीं गई. ना ही उस तरह से गई. वह इस तरह गई कि मैं यह कह सकता हूं कि वह हमेशा मेरे साथ है. मां की आंखें मुझे लगातार देख रही हैं. किसी दूसरी दुनिया में बैठकर वह मुझे देख रही हैं. मैं दूसरी दुनिया में यक़ीन नहीं रखता. सिर्फ़ पहली दुनिया मानता हूं. पहली दुनिया में मारकाट मची हुई है. लोग एक-दूसरे के ख़ून के प्‍यासे हैं.

मैं एक कवि, मैं आधी सदी से अपनी दुनिया बना रहा हूं. मेरी दुनिया मकानों, अस्‍पतालों और मंदिरों के मलबे के नीचे धंसी हुई है. मेरी दुनिया टूट रही है. इंसान मर रहा है. भगवान मर रहा है. इनके साथ उम्‍मीदें मर रही हैं. इनके साथ प्रेम मर रहा है. जब मैं छोटा था, तो विश्‍वयुद्ध हुआ था. रातों को भयानक सपने आते थे. उसी उम्र में मैंने तय किया था कि इस सारे विनाश के बीच मैं एक कवि बनूंगा- सृजन का कवि. मैं कविता की रोशनी में जाऊंगा और वहां से और रोशनी लाऊंगा. उस भयंकर विनाशलीला के बीच भी मेरे भीतर उम्‍मीद की यह रोशनी क्‍यों आई थी? क्‍योंकि मां की आंखें मुझे देख रही थीं. मां की देखती हुई आंखें हमारी उम्‍मीद होती हैं. आज जब मैं 77-78 साल का हो चुका हूं, दुनिया में वैसी ही मारकाट मची हुई है. मैं आज भी उम्‍मीद से भरा हूं. क्‍योंकि मां की आंखें मुझे देख रही हैं. जाने कहां से. जाने दूसरी दुनिया से. पर मां की आंखें अपने बच्‍चे को हमेशा देखती रहती हैं. तुम पर अपनी मां की आंखें हैं- यह अहसास जैसे ही तुम्‍हें होता है, तुम ख़ुद को उम्‍मीद और साहस से भरा हुआ पाते हो. मैंने आधी सदी यह उम्‍मीद और साहस पाया है.

मैं अपना सिर घुमाता हूं, अपनी आंखें खोलता हूं, मुझे रास्‍ता नहीं सूझता, मैं गिर जाता हूं. खड़ा होता हूं. ऐसे में मुझे अपना बचपन व मां याद आती है. लोगों के दिलों में नफ़रत भरी रहती है, उनके शब्‍दों में बारूद जमा रहता है, मैं अपनी मां की याद के बीच लोगों से कहना चाहता हूं- पोलिश, जर्मन, यूनानी, यहूदी सोचकर नहीं, इंसान को इंसान मानकर प्‍यार करो. और कुछ न मानो. नीला, पीला, हरा, काला, न मानो. इंसान को इंसान मानो. अगर मां का प्‍यार तुमने दिल से महसूस किया है, तो तुम जीवन-भर इस प्‍यार में यक़ीन रखोगे और लोगों से नफ़रत नहीं करोगे.

अगर इस प्‍यार को हमने महसूस नहीं किया, तो हम कैसी दुनिया बनाएंगे? एक ऐसी दुनिया, जहां हम शैतान को फ़रिश्‍ता मान लेंगे. एक ऐसा नर्क, जहां किसी के पास रूह न होगी. हमारा स्‍वर्ग खो चुका होगा. उसमें अवसाद और पीड़ा का प्रसार होगा. राजनीति कबाड़ बन जाएगी. प्‍यार, पोर्नोग्राफ़ी बन जाएगा. संगीत बेवजह का शोर बन जाएगा. खेल, वेश्‍यावृत्ति बन जाएंगे और धर्म, विज्ञान बन जाएगा.

अगर तुम्‍हारी मां तुम्‍हारे सामने नहीं है, तो भी महसूस करो कि उसकी आंखें तुम्‍हें हर घड़ी देख रही हैं.

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तादेउष रोज़ेविच पोलैंड के महान कवि थे. ये अंश उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक 'मदर डिपार्ट्स' से लिए गए हैं. यह अनुवाद 2014 में 'नवभारत टाइम्स' में छपा था.

Geet की वाल से साभार

शाम की मेढ़ पर ढलते सूरज ने जाते हुए स्मृतियों की एक चादर ढँक दी कि हवा के झोंकें रात को कालिमा से ना पोत दें।




पिता के बारे में ओरहान पामुक

पिता के बारे में
ओरहन पमुक
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उस रात मैं देर से घर पहुंचा था। पता चला, पिताजी की मृत्यु हो गई है। क़रीब दो बजे रात मैं उनके कमरे में गया, ताकि उन्हें आख़िरी बार देख सकूं। सुबह से फोन आ रहे थे, लोग आ रहे थे, मैं अंत्येष्टि की तैयारियों में लगा हुआ था। लोगों की बातें सुनते हुए, पिताजी के कुछ पुराने हिसाब चुकता करते हुए, मृत्यु के काग़ज़ात पर हस्ताक्षर करते हुए बार-बार मेरे भीतर यही ख़याल आ रहा था, हर क़िस्म की मौत में, मरने वाले से ज़्यादा महत्वपूर्ण रस्में हो जाती हैं।

एक दिन मैं किसी को बता रहा था, मेरे पिताजी ने मुझे कभी डांटा नहीं, कभी ज़ोर से नहीं बोला, मुझे कभी नहीं मारा। उस समय मुझे उनकी दयालुता के कितने क़िस्से याद आए। जब मैं छोटा था, जो भी चित्र बनाता था, मेरे पिताजी कितनी प्रशंसा के भाव में भरकर उन्हें देखते थे। जब मैं उनकी राय पूछता था, तब वे मेरे लिखे हर वाक्य को इस तरह पढ़ते, जैसे मैंने मास्टरपीस लिख दिया हो। मेरे बेस्वाद और नीरस चुटकुलों पर वह ठहाके लगाकर हंसते थे। अगर बचपन में उन्होंने मेरे भीतर वह विश्वास न भरा होता, मैं कभी लेखक नहीं बन पाता। हम दोनों भाइयों में उन्होंने बचपन से ही यह विश्वास रोपा कि हम होनहार और दूसरों से अलग हैं। वह ख़ुद के बारे में यही सोचते थे कि वह सबसे अलग हैं और उनका मानना था कि हम उनके बेटे हैं, इसलिए हमें भी वैसा ही होना है।

उन्होंने कई किताबें पढ़ी थीं, वह कवि बनना चाहते थे, वैलरी की कविताओं का अनुवाद भी किया था। जवानी में उन्होंने कई किताबें जुटाई थीं और जब मैंने उन्हें पढऩा शुरू किया, तो उन्हें ख़ुशी हुई। वह किताबों को मेरी तरह उत्तेजना में भरकर नहीं पढ़ते थे, बल्कि वह दिमाग़ में चल रहे विचारों को हटा देने और आनंद के लिए पढ़ते थे और ज़्यादातर किताबों को बीच में छोड़ देते थे। दूसरे पिता अपने बच्चों से सेनापतियों की तरह बात करते थे, लेकिन मेरे पिता बताते थे कि कैसे उन्होंने पेरिस की गलियों में सार्त्र और कामू को चलते हुए देखा है। अठारह साल बाद जब मेरा पहला उपन्यास प्रकाशित हुआ, उन्होंने मुझे एक सूटकेस दिया। उसमें उनकी डायरी, कविता, नोट्स और साहित्यिक लेखन था। उन्हें पढक़र मैं बहुत असहज हो गया। वह सब उनके भीतर के जीवन के दस्तावेज़ थे। हम अपने पिता को एक आम इंसान की तरह कभी नहीं देख पाते, हम चाहते हैं कि वह हमेशा हमारे आदर्श के रूप में रहें, जैसा हम उन्हें अपने भीतर बनाते आए हैं।

कॉलेज के दिनों में जब मैं बहुत अवसाद में था, मैं सिर्फ़ उनकी प्रतीक्षा करता था कि वे आएं, डिनर टेबल पर हमारे साथ बैठें और ऐसी बातें बोलें कि हमारा मन खिल उठे। छुटपन में मेरा पसंदीदा शौक़ था कि उन्हें देखते ही मैं उनकी गोद में चढ़ जाऊं, उनकी गंध महसूस करूं और उनका स्पर्श करूं। मैं चाहता था कि मेरे पिता मुझसे कभी दूर न जाएं, फिर भी वह दूर गए।

जब वह सोफ़ा पर बैठकर किताबें पढ़ते थे, कभी-कभी उनकी आंखें पन्ने पर से हटकर कहीं दूर देखने लग जातीं, वह अपने में खो जाते। तब मुझे लगता, मेरे पिता के भीतर कोई और शख़्स भी रहता है, जिस तक मेरी पहुंच नहीं है और वह किसी और ही जीवन के स्वप्न देखता है, तब मुझे बुरा लगता। कभी-कभी वह कहते, मैं उस गोली की तरह महसूस करता हूं, जिसे बिना किसी कारण दाग़ दिया गया है। जाने क्यों मुझे इस बात पर ग़ुस्सा आता था। शायद भीतर ही भीतर मैं उनके इन पहलुओं से दूर भागना चाहता था।

बरसों बाद, जब मेरे भीतर से यह ग़ुस्सा निकल चुका था, मैंने अपने पिता को उस तरह देखना शुरू किया कि उन्होंने कभी हमें डांटा तक नहीं, मारना तो दूर है, मैंने पाना शुरू किया कि हम दोनों के बीच गहरी समानताएं हैं। जब मैं किसी मूर्ख पर गुर्राने लगता हूं, या वेटर से शिकायत करता हूं, या अपने ऊपरी होंठ काटता हूं, या किसी किताब को आधा ही पढक़र छोड़ देता हूं या अपनी बेटी का चुंबन लेता हूं, या जब जेब से पैसे निकालता हूं या किसी अजनबी के स्वागत में हल्की-फुल्की बातें करता हूं, मुझे लगता है, मैं अपने पिता की नक़ल कर रहा हूं। यह नहीं कि मेरे हाथ, पैर, कलाई या मेरी पीठ पर बना तिल उनके जैसा है, बल्कि यह ख़याल ही कई बार मुझे डरा देता है कि मैं तो बचपन से ही उनके जैसा बन जाने की प्रतीक्षा कर रहा था। इंसान की मौत उसी दिन से शुरू हो जाती है, जिस दिन उसके पिता नहीं रहते।

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पिता पर लिखे पमुक के दो निबंधों से चुनिंदा अंश. यह अनुवाद 2014 में नवभारत टाइम्स में छपा था.

Geet का बेहतरीन काम । शुक्रिया मित्र ।

साभार - Sarang Upadhyay

Friday, June 16, 2017

Ravi Sinha's Lecture in Bhopal and Andre Kartesh - A Great photographer

Ravi Sinha's lecture in Bhopal 

कल न्यू सोशल इनिशिएटीव्स की एक गोष्ठी , जो भोपाल के आईकफ आश्रम में आयोजित थी, में रवि सिन्हा ने "लोक जीवन और लोकतन्त्र" विषय पर एक अच्छा व्याख्यान दिया। सबसे अच्छा लगा कि वामियों को अपने ब्लैक स्पॉट दिखाए और गरियाया भी। उन्होंने प्रस्थापना रखते हुए कहा कि लोकतन्त्र को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से खतरा है और यह खतरा लोक जीवन से आता है। यह एक तरह से आत्म चिंतन था जिस पर 36 धड़ों में बंटे कम्युनिस्टों को सोचना चाहिए।
मजेदार यह है कि चन्द अंग्रेज और मुगलों ने यही के लोगों को अपने साथ जोड़कर यही की संस्कृति को ओढ़कर यही के लोगों पर कब्जा कर लिया। रवि ने कहा कि यदि जनता के बीच कुछ मुद्दों को आज ले जाए तो इन मुद्दों को सांविधानिक स्वीकृति मिल जायेगी जैसे जाति प्रथा, सामन्तवाद, बाल विवाह, सती प्रथा या विधवा विवाह को रोका भी जा सकता है। जनता मूर्ख नही है धर्मांध है और इसी जनता ने ट्रेड यूनियन या अपने हकों की लड़ाई में वामपंथ को साथ दिया था पर सत्ता कभी नही दी। इसलिए दक्षिण का जो उभार है और हम 31 % की भूल मानकर उम्मीद करते है वह हमारी मूर्खता है।
हमे मानना चाहिए कि यह उभार भारत से लेकर दुनियाभर में हुआ है और जनता दोषी नही बल्कि जबरजस्त जागरूक है। वामपंथियों ने यु पी ए से हटकर भी गलती की थी यह बात भी विस्तार से रखी। उन्होंने कहा कि जो मुसलमान यहाँ 14 से 15 % है वह आजीवन लड़ाई के लिए पर्याप्त है यदि ये 2 या 40 %भी होते तो बहुत कम या बहुत ज्यादा होते और फिर लड़ाई का मुद्दा ही नही रहता इस बात को उन्होंने रवांडा जैसे छोटे से देश में दो आदिवासी कबिलों के उदाहरण से बताया कि कैसे 85% आदिवासियों से शेष 15 % को हिंसक गतिविधियों से उपेक्षित और हैरास किया, और इसका असर महिलाओं और बच्चों पर सबसे ज्यादा पड़ा। जिन 85 % ने 15 % कबिलों की महिलाओं से शादी की थी उन्हें समाज में ज़िंदा रहने के लिए अपनी पत्नियों और बच्चों को मारना पड़ा और इस तरह से डेढ़ से दो लाख लोग मारे गए जो मात्र 15 % थे। भारत में ये हिन्दू मुस्लिम मुद्दों को समझने का अच्छा उदाहरण है।
रवि ने गांधी के महात्मा होने की बात भी ठीक रखी। अधनंगी जनता को देखकर मगा गांधी ने भी आधी धोती पहनी तो जनता ने उन्हें महात्मा कह दिया, देश आजाद हुआ तो राष्ट्रपिता कह दिया और अब इस राज में चतुर बनिया कह रहे है। कुल मिलाकर यह एक रोचक और विचारोत्तेजक व्याख्यान था जो खत्म हुआ था इस नोट पर कि अब जिन्हें आस्थाएं है मार्क्सवाद पर वे ही जद्दोजहद करें अन्यथा छोड़ दें। भोपाल के मार्क्सवादी और साहित्यिक धुरन्धर बहुत पचा नही पाये और बाहर आकर चा में लग गए थे।
बहुत दिनों बाद भोपाल के साथियों से रूबरू होने का मौका मिला शायद 2010 के बाद, यह उष्णता और स्नेह बहुत ही ऊर्जावान था। राजेश जोशी, रामप्रकाश त्रिपाठी, विजय बहादुर सिंह, हरदेनिया जी, अनवर जाफरी, राम नारायण स्याग, सुभाष गाताड़े, कंचन, प्रदीप, राजू कुमार, अंजू, राहुल शबाना, स्मिता, सुमित, ईश्वर सिंह दोस्त, मनोज निगम, वाल्टर पीटर, सर्वेश, ब्रजेश, विशाल, भारतेंदु, राकेश मालवीय, कार्तिक, अरघा, दीपा, विष्णु, चन्दन से लेकर कई पुराने साथियों का मिलना एक ही जगह पर अनूठा था।
जावेद और उपासना ने जिस जतन से आयोजक की भूमिका भोपाल के साथियों के साथ निभाई वह सराहनीय है। सांगठनिक क्षमता के धनी ये दोनों लोग गजब के इंसान है।
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आंद्रे कर्तेश
महान हंगेरियन फोटोग्राफर 
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लोग बड़े होने के बाद फोटोग्राफर बनते हैं, लेकिन मैं फोटोग्राफर के रूप में ही पैदा हुआ था। ऐसा कह सकते हैं कि आंखें खोलते ही मैंने अपनी दृष्टि से पहली तस्वीर खींच ली थी। यह बात और है कि मैंने छह साल की उम्र में पहली बार तस्वीरें देखीं। मैं अपनी बुआ के घर गया था। वहां अटारी पर कई पत्रिकाएं पड़ी थीं। मैंने कभी पत्रिकाएं नहीं देखी थीं। उनमें तस्वीरें देखकर मैं स्तब्ध रह गया। उसी समय मैंने सोच लिया था कि मैं बड़ा होकर दृश्य को इस तरह पकड़ूंगा।
पर मैंने बड़े होने का इंतज़ार नहीं किया। उसी दिन से मैंने अपने दिमाग के भीतर कैमरे का आविष्कार कर लिया था। उसके बाद से मैं हर दृश्य को एक तस्वीर की तरह देखता था। पहले मैं हाथों के सहारे एक चौखट बनाता था। उसमें से झांककर देखता था। बाद में वह चौखट मेरे दिमाग में बन गया। ज़ाहिर है, लोग मुझे सनकी समझने लगे थे।
कुछ ही समय बाद मुझे डायरी लिखने की आदत पड़ गई। मैं उनमें अपने दिन की घटनाएं नहीं लिखता था, बल्कि चित्र लिखता था। दिन में मुझे कोई दृश्य पसंद आ गया, तो मैं मन ही मन उसकी तस्वीर खींचता था। फिर शब्दों में उसके कंपोजीशन को व्यक्त करता। मुझे चित्र में क्या-क्या रखना है, क्या हटा देना है, किस पल को पकड़कर शाश्वत बना देना है, ये सब बातें उस डायरी में पूरी तफ्सील से होतीं। तब तक मैंने कैमरा छूकर भी नहीं देखा था। इतने पैसे ही नहीं थे कि कैमरा खरीदा जाए, न ही किसी मित्र-रिश्तेदार के पास कैमरा था। लेकिन उसके बाद भी मेरी डायरी मेरे खींचे चित्रों से भरी हुई थी। आज मैं अगर कहता हूं कि सफल फोटोग्राफर बनने के लिए आपको कैमरे की ज़रूरत नहीं पड़ती, तो इसके पीछे बचपन के मेरे वे अनुभव ही हैं।
जब मैं पंद्रह का हुआ, तो पार्ट-टाइम नौकरियों से पैसे बचाकर मैंने अपना पहला कैमरा खरीदा। उसके बाद मैंने खूब तस्वीरें खींचीं। उनमें से अधिकांश को मैं बचा नहीं पाया। लेकिन अब भी तस्वीरें पहले मेरे मन में खिंचती थी, उसके बाद ही उपकरण पर आती थीं।
कुछ बरसों बाद मैं हंगरी सेना में भर्ती हो गया। प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ चुका था। हम हमेशा मोर्चे पर ही रहते। मैं लगभग अकेला ऐसा सैनिक था, जिसके एक कंधे पर रायफल और दूसरे कंधे पर कैमरा टंगा होता। शुरू में अफसरों ने मुझे टोका, पर जल्द ही उन्होंने मेरा हुनर जान लिया और मेरा सम्मान करने लगे। युद्ध ने दृश्यों की संरचना के मेरे अभ्यास को मजबूत किया और मैंने तस्वीरों में जीवन की दार्शनिकता को छूना शुरू किया।
एक बार बमबारी में मैं बुरी तरह घायल हो गया। मैंने छर्रों से अपना कैमरा बचाया। मैं बिस्तर पर पड़ गया। मेरे बायें हाथ और बाकी शरीर ने काम करना बंद कर दिया था। पर मेरे पास एक हाथ बचा हुआ था। मैं अस्पताल में उसी हाथ से फोटो खींचने लगा। यह मेरे जुनून की हद थी। उस समय मेरी समझ में आ गया कि मैं सबकुछ छोड़ सकता हूं, फोटोग्राफी नहीं छोड़ सकता। सेना छोडऩे और पेरिस पहुंचकर अपने चित्रों के लिए नाम कमाने में मुझे पूरा एक दशक लग गया। युद्ध के दौरान व हंगरी में खींची तस्वीरों को आज मास्टरपीस माना जाता है।
मैं हमेशा कंपोजीशन को महत्वपूर्ण मानता हूं। किसी भी कला में यह सर्वोपरि है। आप अपने दृश्य में क्या रखना चाहते हैं और दुनिया को उसे किस एंगल से दिखाना चाहते हैं, यह पहले खुद आपको स्पष्ट होना चाहिए। चित्रों में बहुत सारे बिंदु होते हैं, पर एक बिंदु सबसे अहम होता है। आपको उस बिंदु को पहचानना आना चाहिए। तभी कला संपूर्ण बनती है।
बाद के बरसों में मुझे दुनिया के बहुत सारे फोटोग्राफर मिले। वे अक्सर मेरे सामने अपने हुनर का प्रदर्शन करते थे। सड़क पर मेरे साथ चलते हुए तस्वीरें खींचने लगते। वे एक ही दृश्य की बीस तस्वीरें खींच लेते, फिर बाद में उसमें से अपने काम की एक तस्वीर छांट लेते। मेरा मानना है कि ऐसे लोगों के मन में कोई कंपोजीशन नहीं बनता, वे बस कैमरे के साथ तुक्का खेलते हैं।
मुझसे हर बार पूछा जाता है, आप तस्वीरें कैसे खींचते हैं? मैं बताता हूं, मैं एक दृश्य की सिर्फ एक ही तस्वीर खींचता हूं। दूसरों की तरह बीस-पचीस क्लिक नहीं करता। तस्वीर खींचने से पहले मेरे दिमाग में देर तक उसकी कंपोजीशन बनती रहती है। मैं उस पर घंटों, कई बार महीनों सोचता हूं। और सही पल आने पर क्लिक करता हूं। क्योंकि कला को सबसे पहले हमारे दिमाग में जन्म लेना चाहिए, उसके बाद उपकरणों से बाहर आनी चाहिए। स्वत:स्फूर्त क्षणों के लिए भी हमारे दिमाग को ऐसा अभ्यास हो जाना चाहिए। 
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आंद्रे कर्तेश (1894-1985) को सार्वकालिक महान फोटोग्राफरों में से एक माना जाता है। उनकी श्वेत-श्याम छवियों ने बीसवीं सदी के मध्य में कला-जगत में वैसा ही सम्मान पाया था, जैसा पिकासो के चित्रों और स्त्राविन्स्की के संगीत ने। यह टुकड़ा कर्तेश लिखित 'हंगेरियन मेमरीज़', पीयर बोरहन लिखित 'हिज़ लाइफ एंड वर्क' तथा अन्य निबंधों से चुनकर बनाया गया है. यह 2013 में नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुआ था.
Geet Chaturvedi की मनभावन दीवार से

Friday, June 9, 2017

MP Farmer's Strike -Violence and Govt



कल का सारा दिन मालवा में किसान आंदोलन बेहद आहत करने वाला और उग्र रहा। मप्र के मुख्य मंत्री के प्रबन्धन और प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल थे और आंकड़े, तस्वीरें थी। और यह सब पूछना क्या गलत है सुशासन का क्या अर्थ है, आईये देखिये देवास में नगर निगम ने शहर को खोद कर कैसे बंटाधार कर दिया है, यदि नागरिक अपनी पीड़ा नही रखेंगे तो गवर्नेंस का क्या मतलब है, यही कर रही भाजपा 15 सालों से।
मुझे किसी पार्टी से लगाव या दुश्मनी नहीं ना किसी नेता से प्रेम या दुश्मनी, पर एक - टैक्स देता हूँ ,दो- संविधान ने मुझे जिम्मेदार नागरिक और सम्मान से जीने की छूट दी है, तीन- अभिव्यक्ति की आजादी दी है। आप लोगों के तो घर में ना संविधान होगा ना आपने देखा होगा, पत्राचार से एम जे करके या हॉकर से पत्रकार बन गए होंगे ! आपका आपरेटर ही लिखता होगा " नूज़" , आपकी अकादमिक क्षमता और सेटिंग, लिफाफा संस्कृति से वाकिफ हूँ भली भाँती मैं।
दुखद यह था कि कई पत्रकार और जिम्मेदार गम्भीर किस्म के मित्रों ने यहां लोगों को धमकी दी कि यदि शासन प्रशासन के ख़िलाफ़ लिखा तो वे पुलिस में रपट दर्ज करवा देंगे। यहां तक कि मेरे लिखे पोस्ट्स भी गायब है यह किसी अपने की ही चाल है , धिक्कार है।
जिन लोगों ने भी यह किया या धमकाया है उनमे से कुछ को तो लिस्ट से निकाल दिया है बाकी से निवेदन है कि वे स्वतः यहां से निकल जाएँ। आपमें ही यदि अपने व्यवसाय की दक्षताएं और कौशल नही, समझ नहीं और दो टके के बनिए के घटिया अख़बार में काम करके यहां शेखी बघारने की थोथी मर्दानगी दिखाने का भ्रम पैदा कर रहे हो तो जाकर अपनी रीढ़ की हड्डी देखिये है या नहीं।
शर्म आती है आप पर और आपकी सोच पर। अगर आपको यह समझ नही कि 14 साल तक एक व्यक्ति के सत्ता में शीर्ष पर बने रहने से भाजपा में अंतर कलह इतनी बढ़ गई है कि अब उनके ही लोग सत्ता के शीर्ष के ख़िलाफ़ हो गए है, बगैर इनके सहयोग के किसी की हिम्मत नही कि कोई इतने बड़े पैमाने पर हिंसा कर सकें। कांग्रेस को तो फ़ोकट में क्रेडिट मिल गया जबकि उनके चार लोग गिनती के नहीं है।
मुख्य मंत्री जी से पूछा जाना चाहिये कि उनके घर पर और जिलों में किसान पंचायतों में जितनी घोषणाएं की थी उनके अमल की क्या स्थिति है, 5 बार कृषि कर्मण अवार्ड का क्या फंडा है, मालवा के विधायक क्यों असन्तुष्ट है, सिंहस्थ का क्रेडिट अकेले लेने का क्या अर्थ है, रेत खनन बन्द एकाएक कर देने से कितनों की दूकान बन्द हुई - ये वो सवाल है जो इस पुरे हिंसक आंदोलन की जड़ है यह किसान आंदोलन नहीं यह Mutiny है। यह समझ आपकी नहीं है तो अंडे बेचना शुरू कर दो बजाय धमकाने के।
जनता का साथ देने के बजाय आप लोग मालिक, नेता और प्रशासन की स्तुतियां गा रहे है,धमका रहे है ? इससे तो बेहतर है आप कोठा खोल लें और मुजरा करना शुरू कर दें !
Just get lost ....

Monday, June 5, 2017

यहूदी की लड़की - आगा हश्र कश्मीरी का नाटक 7 जून 2017 को देवास में




यहूदी की लड़की 


देवास संगीत और कला के लिए प्रसिद्ध रहा है नाटक का यहां पर कोई व्यवस्थित मंच नहीं और समृद्ध परंपरा भी नहीं है परंतु पिछले कुछ दिनों से यहां नाटकों की सरगर्मी बढ़ी है । हाल ही में नटरंग थिएटर्स के द्वारा "ढाई आखर प्रेम" का नाटक किया गया था और अब किल्लोल कला अकादमी मुम्बई और देवास भारत भवन, भोपाल के सहयोग से 8 दिवसीय शिविर के माध्यम से आगा हश्र कश्मीरी का नाटक "यहूदी की लड़की" प्रस्तुत करने जा रहा है ।
नाटक की निर्देशिका कनुप्रिया है (स्थानीय नाट्यकर्मी और फ़िल्म कलाकार चेतन पण्डित की धर्म पत्नी) जो खुद एक ख्यात कलाकार और रंगकर्मी है । अपने साथी इम्तियाज के साथ वह नाटक का निर्देशन कर रही हैं । कनुप्रिया ने आज बातचीत के दौरान बताया कि वह पटना की रहने वाली है , संगीत साहित्य उन्हें बचपन में अपने घर से परंपरा में मिला है उनकी मां डॉक्टर उषा किरण खान - साहित्य की जानी मानी हस्ती है , और पुलिस अधिकारी पिता से संस्कार मिलें। उनके सानिध्य में रहकर उन्होंने साहित्य संगीत और अन्य ललित कलाओं की बेसिक शिक्षा ली और बाद में पढ़ने के लिए वे दिल्ली आ गई जहां से उन्हें हबीब तनवीर जैसे नाटककारों और श्रीराम कला केंद्र जैसे बड़ी संस्थाओं का एक्स्पोज़र मिला । बाद में वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए भी चयनित हुई।
कनुप्रिया कहती हैं मेरी रुचि बच्चों के साथ नाटक करने में थी तो मैं थिएटर इन एजुकेशन के काम की तरह बच्चों के साथ काफी समय लगाती थी , बाद में जब मुंबई में शिफ्ट हुई तो वही खुले पार्क में बच्चों के साथ काम करना शुरू किया । उन्हें लगता है कि पाठ्यक्रम से स्वभाविक अभिव्यक्ति खत्म होती जा रही है , हमारे खेल खत्म हो गए हैं , बच्चे बहुत सहमे हुए हैं , वे बोल नहीं पाते, कह नहीं पाते और पढ़ाई के बोझ से दबे जा रहे हैं - इसलिए मुझे लगता है नाटक वह चीज है जो उनकी कल्पनाशीलता , कौशल और अभिव्यक्ति को बढ़ावा देता है लिहाजा वह लगातार बच्चों के साथ नए प्रयोग कर रही है, आज वह बच्चों के साथ काम करने वाली अपनी तरह की अनूठी निदेशिका है। कनुप्रिया कहती है आज समाज में जो लोग बड़े है उनके साथ काम करके मानसिकता बदलना मुश्किल है, जिस तरह का माहौल बन गया है वहाँ विविधता को खत्म किया जा रहा है, ऐसे में जरूरी है कि बच्चों में बचपन से ऐसे मूल्य और संस्कार डाले कि वे बहुरूपता, अलग अलग संस्कृतियों का सम्मान करना सीखें और एक वैविध्यता से भरपूर खुशहाल समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भागीदारी निभाएं। और यह काम हर उस व्यक्ति को करना चाहिये जो इस देश का जिम्मेदार नागरिक है। कलाओं के अनुशासन से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है इस सबमे।
देवास में "यहूदी की लड़की" नाटक करने का उद्देश्य यह था कि धर्म और प्रेम आज भी समाज के महत्वपूर्ण मुद्दे हैं और यह जरूरी है कि आगा हश्र कश्मीरी जैसे महान नाटककारों के नाटकों को सामने लाया जाए । कश्मीरी साहब प्रेमचंद के समकालीन थे - जब प्रेमचंद कहानियों में प्रयोग कर रहे थे , तब वे बेहद संवेदनशील मुद्दों पर नाटक लिख रहे थे । यह नाटक पारसी शैली में किया जाने वाला है।
यदि आप यहां है तो अवश्य आकर बच्चों का उत्साहवर्धन करें। इसका प्रदर्शन 7 जून को शाम 7:00 बजे परिणय वाटिका , भोपाल चौराहा , देवास में होगा । इस नाटक में देवास और आसपास के 20 बच्चे और किशोर हिस्सेदारी कर रहे हैं।
चित्र - बच्चों की रिहर्सल

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