Saturday, May 27, 2017

इन परछाईयों को उजालों की दरकार है -नटरंग थियेटर्स की प्रस्तुति 31 मई को देवास में.



इन परछाईयों को उजालों की दरकार है

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देवास का सांस्कृतिक परिवेश बहुत समृद्ध रहा है संगीत, ललित कलाएं और चित्रकला यहाँ की प्रमुख विधाएं रही है परन्तु नाटय कर्म में यह शहर पिछड़ा रहा. मुझे याद पड़ता है मराठी का प्रसिद्द नाटक "फ़क्त एकच प्याला" के रचनाकार गडकरी जी यही के थे. स्थानीय महाराष्ट्र समाज ने काफी समय तक नाटकों को संरक्षण दिया कालान्तर में यह मुहीम धीमी पड़ गई जब लोग टेलीविजन में व्यस्त हो गए और शौक की बात व्यवसाय में बदल गई. इधर दो तिन समूह बनकर उभरें भी, परन्तु वह दम खम नहीं दिखा जो नाटक को स्थापित कर सकें. हमने अपने जमाने में नुक्कड़ नाटक करके बहुत चेतना और अलख जगाने का काम किया था जिले के लगभग सभी गाँवों में , परन्तु समय के साथ वह भी खत्म हो गया. स्व अमित कवचाले ने "अभिव्यक्ति संस्था" बनाकर काफी काम करने की कोशिश की थी परन्तु अल्पवय में उनके निधन के कारण यह भी गति नहीं पकड़ पाई. कहने को यहाँ से चेतन पंडित ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश लेकर नाटको और फिल्मों में बहुत झंडे गाड़े पर शहर में नाटक का माहौल दुर्भाग्य से नहीं बन पाया.

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Image may contain: 1 person, standing, sky, cloud and outdoorइधर शहर में एक नया समूह उभरा है "नटरंग थियेटर्स" जिसे प्रभात माचवे संचालित कर रहे है. प्रभात अनुभवी कलाकार है और उन्होंने अपनी दक्षता और कौशल वृद्धि के साथ शहर के युवाओं और बच्चों के साथ काम करके फिर से एक नया दांव लगाया है कि इस शहर की उसर भूमि में नाटक की विधा जीवंत हो. इसी क्रम में 31 मई को शाम आठ बजे वे अपने इस समूह का पहला नाटक "ढाई आखर प्रेम के" लेकर आ रहे है जिसमे नए पुराने कलाकार भाग ले रहे है.



कलाकारों में सर्वश्री दिलीप चौधरी, कल्पना नाग, प्रभात माचवे, रविश ओझा, अंकुर बैरागी, पिहू ठाकुर, कविता ठाकुर, निखिल वर्मा और वंशिका माचवे भाग ले रहे है. गत एक माह से मेहनत करके ये अपने पहले शो को एक बेहतरीन और एतिहासिक बनाना चाहते है. उम्मीद की जाना चाहिए कि सुप्त पड़ी यह विधा इस नाटक के माध्यम से नए कलाप्रेमी उभरेंगे और नए कलाकार प्रेरणा लेकर इस शहर में नाटको का अनुशासन और प्रयोग फिर से करेंगे.
प्रवेश पास और अन्य जानकारी के लिए श्री प्रभात माचवे से संपर्क किया जा सकता है इस नम्बर पर 9826245543. हमारी और से इस समूह को अशेष शुभकामनाएं और आप सबका 31 मई को मल्हार स्मृति मंदिर, देवास में बेसब्री से इंतज़ार है.

Friday, May 26, 2017

है देश ज़िंदा क्योकि देश सबका है.... संदीप नाईक



देश की स्थिति गृह युद्ध से ज्यादा घातक है, हर जगह जाति, वर्ग, वर्ण, राजनीति, अर्थ और वर्चस्व के मुद्दों पर हिंसा हो रही है। तीन सालों में यह सबसे घातक समय है और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी जी ने कल कहा कि जनता को सवाल और अधिक पूछने चाहिए ।कल जब वे एक मीडिया संस्थान में बोल रहे थे तो उन्होंने कहा कि सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति और सत्ता में बैठे लोगों से सवाल होना चाहिए, खासतौर पर ऐसे समय जब सबसे ऊंची आवाज में बोलने वालों के शोर में असहमति की आवाजें डूब रही हैं! अर्थात ये स्वर कोलाहल में ज्यादा तनाव पैदा कर रहे है।ठीक इसके विपरीत मीडिया में आज सभी अखबारों में रंगीन पृष्ठों पर 2, 3 जैकेट और थोथी उपलब्धियों में अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनने की प्रवृत्ति बहुत ही शर्मनाक है।
बहुत निष्पक्ष और तटस्थ भाव से कह रहा हूँ कि जनसंघ से शुरू हुई और संघ के अनुशासनात्मक आचरण वाली पार्टी जो आज भाजपा भी नही मात्र दो व्यक्तियों पर केंद्रित होकर रह गई है यह भी भाजपा के लिए नुकसानदायक है। समय रहते यदि इस आंतरिक तानाशाही और व्यक्ति केंद्रित सत्ता में बने रहने की राजनीति को नियंत्रित नही किया गया तो दस सालों में क्या अगले चुनावों में ही पार्टी अनुशासन की सीमा तोड़कर लोग बगावत कर देंगे। मप्र, छग, राजस्थान , झारखंड, जैसे राज्यों में गत 15 वर्षों से एक व्यक्ति ने जिस अंदाज में अंगद की तरह पाँव जमाकर राज्यों का तंत्र बिगाड़ा और पूरी नौकरशाही को भ्रष्ट किया वह शोचनीय है, वहां बगावत के सुर राज्य से लेकर नगरीय निकायों में सुनाई देने लगे है, ये दीगर बात है कि विरोधी को निपटाने के प्रचलित और नवोन्मेषी तरीके भी सत्ता के शीर्ष से ही आये है और बगावतकारी निपट रहे है। पर यह Mutiny आपको अगले चुनावों में जरूर दिखेगी जिसका अंदाजा अमित जी शाह को भली भांति है।
बहुत जरुरी है बचे हुए दो सालों में संघीय ढांचे के अनुरूप जन आकांक्षाओं को पूरा करना और देश की सामाजिक समरसता को बनाये रखना, यह मान लीजिए कि सत्ता और नौकरशाही की सहृदयता से ही हिंसा हो रही है और पूरा देश हिंसा की भट्टी में तप रहा है। इस बीच सरकार मनमाने आर्थिक सुधार और निर्णय जनता पर सौंप और थोप रही है। याद रखिये यही जनता आपको एक मौका और दे सकती है पर उसके बाद आपका अस्तित्व मिट जाएगा। कांग्रेस को 10 बार मौका दिया क्योंकि उस राज में इतनी ना दिक्कतें थी, ना महंगाई , ना जागरूकता, ना सूचना तकनीक । काँग्रेस ने हिन्दू मुस्लिम दंगों के बीज डाले और खूब प्रश्रय दिया आज काँग्रेस का नामोनिशान मिट गया। आप जाति हिंसा को बढ़ावा दे रहे है और पढ़े लिखे दलितों को आप आश्रय देकर सुनियोजित तरीके से हिंसा फैला रहे है, याद रखिये 2024 में आप का भी निशान मिट जाएगा।
दो लोगों को अब देश के साथ भाजपा के और संघ के लोगों को ही आगे आकर नियंत्रित करना होगा। वरना ना दीनदयाल जी बचेंगे , ना गुरुजी, ना हेडगेवार जी और जब तक आप कुछ "डेमेज कंट्रोल" करेंगे जनता का विश्वास खो चुके होंगे। इतिहास देखना हो तो नंद वंश को देखो, सीखो और जीवंत केस स्टडी देखना हो काँग्रेस छोड़कर , तो अरविंद केजरीवाल को ही देख लीजिए कि एक व्यक्ति के कारण कैसे एक पार्टी, प्रचंड बहुमत में आई सरकार आत्मघाती बन जाती है और खुद अपने कफ़न का हालिया इंतज़ाम कर लेती है।

Monday, May 22, 2017

देवास में सरकारी स्कूलों की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने की जरुरत 22/5/17


मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र का देवास एक महत्वपूर्ण शहर है, एक ज़माने में यह शहर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी हुआ करता था. सन 1970 में बैंक नोट प्रेस खुलने के बाद यहाँ उद्योग धंधों का प्रादुर्भाव हुआ और तेजी से कल कारखाने खुले. यदि थोड़ा और इतिहास में जाए तो ग्वालियर से धार तक का पूरा इलाका मराठा साम्राज्य के अधीन रहा है जहां शिक्षा एक महत्वपूर्ण और राज्य की जिम्मेदारी हुआ करती थी. क्या कारण है कि यह शहर लगातार पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ता गया और यहाँ के छोटे नौनिहालों और बच्चों को इंदौर तक रोज तक़रीबन तीन से चार घंटें यात्रा करके शिक्षा प्राप्त करने जाना पड़ता है.

सरकारी स्कूलों की स्थिति देखें तो हम पायेंगे कि शहर की आबादी के हिसाब से सरकारी स्कूल कम है खासकरके उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बहुत ही कम है प्राथमिक और माध्यमिक की संख्या ठीक ही है. निजी स्कूलों का जाल पुरे शहर में फैला हुआ है जो शिक्षा के नाम पर सिर्फ व्यवसाय कर रहे है. सरकारी विद्यालयों में प्रशिक्षित अध्यापक है जो विषय के ज्ञान के साथ पर्याप्त अनुभव भी रखते है परन्तु पालकों को निजी विद्यालयों की लोक लुभावन शैली पसंद आती है और वे जेब कात्कत महँगी फीस देकर अपने बच्चों को इन विद्यालयों में पढ़ा रहे है यहाँ तक कि इंदौर के पांच सितारा स्कूलों में भेज रहे है. निजी विद्यालयों में ना पर्याप्त अनुभवी शिक्षक है ना अनुभव और स्थाईत्व तो बिलकुल ही नहीं है स्कूल संचालक चाहे जब शिक्षकों को बीच सत्र में निकाल देते है जिससे बच्चों के मानसिक स्तर और अधिगम पर प्रभाव पड़ता है.

मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है देवास शहर में शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए हाई स्कूल और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों की संख्या बढ़ाई जाना चाहिए जो उत्कृष्ट विद्यालय जैसा माहौल, परिणाम और शिक्षनेत्तर गतिविधियों को प्रोत्साहित कर सकें. यहाँ के विद्यार्थी योग्य, प्रतिभावान और मेहनती भी है यदि उन्हें पर्याप्त माहौल और मौके मिले तो वे देश में जाकर अच्छा काम कर सकेंगे. सबसे महत्वपूर्ण है कि यहाँ कोई भी व्यवसायिक संस्थान नहीं है अभी तक , यह पिछले नेतृत्व की ही कमी थी कि इस शहर में पोलिटेकनिक कॉलेज अभी खुल पाया जो अभी भी शहर के विकास में कोई योगदान नहीं दे रहा. मेडिकल कॉलेज की बात वर्षो से होती रही है परन्तु अभी भी यह प्रयास मूर्त रूप लेता नहीं दिखता. तीसरा सबसे महत्वपूर्ण है कि अभी भी शहर में इतने औद्योगिल कारखाने है परन्तु यहाँ कोई व्यवसायिक पाठ्यक्रम नही है जो बच्चों को बारहवीं के बाद प्रशिक्षित करके आजीविका उपलब्ध यही करा सकें. कौशल विकास कार्यक्रम के नाम पर शहर में एनजीओं की भरमार है परन्तु वास्तव में स्थिति बहुत ही बुरी है. नौकरियां है नहीं ऐसे में यह समय की मांग हा कि बच्चों को सीधे ही व्यवसायिक पाठ्यक्रमों से जोड़ा जाए ताकि वे अपने ही शहर में रोजगार पा सकें. इस शहर में बाहर के लोग आकर रोजगार पा गए उनकी दूसरी या तीसरी पीढ़ी यहाँ खप गई परन्तु स्थानीय निवासियों को कुछ नहीं मिल पाया.


अब जरुरत है कि निजी स्कूलों के जाल से निकालकर बच्चों को सरकारी स्कूलों में लाया जाएँ और उनकी दक्षता और कौशल बढ़ाकर स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित करके आजीविका उपलब्ध करवाई जाएँ, इसके लिए सरकारी स्कूलों को भी तैयार करना होगा, शिक्षकों को प्रोत्साहित करना होगा और सरकारी स्कूलों की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना होगा. इस दिशा में सभी स्तर पर प्रयास करना होंगे, निजी विद्यालयों का सच सामने लाना होगा और पालकों में यह भावना जगाना होगी कि सरकारी स्कूल बेहतर और श्रेष्ठ है जो सही और योग्य दिशा निर्देशन कर सकते है. जब तक हम इस तरह के प्रयास नहीं करेंगे शहर में शिक्षा की स्थिति शोचनीय ही रहेगी. 

Jantar mantar BhimSena and Zee News & Sudhir Choudhary



जंतर मंतर दिल्ली पर जो योगी के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे है , हो सकता है वह सही हो - न्याय पाने के लिए सब कुछ किया ही जाना चाहिए , पर फिर वही सवाल है मेरा जो मैंने तमिलनाडु के किसान आंदोलन के समय किया था कि मित्रों लखनऊ जाओ ना दिल्ली में क्यों। यहां सिर्फ एक तमाशा बनकर रह जाओगे और होना जाना कुछ नही है।
दूसरा देश मे इतनी सेनाएं बन चुकी है कि अब किसी मे भरोसा नही रहा - ना हमें , ना दलितों को और ना आदिवासियों को - तो ये नया प्रपंच क्यों। आश्चर्य यह है कि अभी दो माह ही हुए है उप्र में चुनाव को, थोड़ा पहले चेतना जगा लेते तो शायद सत्ता में होते क्योकि जिस अंदाज में बौद्धिक और ज्ञान की बातें हो रही है -कम से कम सोशल मीडिया पर इस सेना के पैरोकार तो महानतम बता रहे है, यह बात थोड़ी पहले करनी थी।
वैसे यह बता दूँ कि स्व कांशीराम की पार्टी लाख प्रयास करने के बाद भी 20 सीट्स के आगे कम से कम उप्र में तो बढ़ नही पाई है बाकि चार राज्यों में तो बात मत करो जी, और मुआफ कीजिये दलितों और मुसलमानों ने ही ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देते हुए प्रचंड बहुमत दिया तो कुल मिलाकर कहना यह है कि यह जो "सनस्क्रटाइजेशन" की चाह में जो कुछ भी नया गढ़ने की और पाने की व्यूह रचना हो रही है वह बूमरेंग ना हो जाये।
तीसरा जिस अंदाज में कुछ तथाकथित छद्म पत्रकार IIMC में हवन कांड के बाद सामने आए है उसी तरह इस सेना के बहाने हमने कुछ और पढ़े लिखे सुगठित और सुज्ञानियों को फिर से नए काँधे तलाशते देखा है। सहारनपुर या दलितों के ऊना आंदोलन की राख में बाटियाँ सेंककर खाते हुए इसलिए आप तो ज्ञान बघारो ही मत।
खैर , गलियाते रहिये ब्राह्मण, अम्बेडकर, बुद्ध को - कौन फिक्र करता है, कमजोर जातियों को नास्तिक नही बना सकते यह भी तर्क प्रभावशाली है, फेसबुक पर मित्र लोग दलितों को बौद्ध धर्म मे ले जाने को प्रेरित कर रहे है- कितने दलित या आदिवासी फेसबुक पर है ? मुझे लगता है इस देश मे अब किसी को भी नया वैचारिक आधार बनाने के लिए एक शतक का इंतज़ार करना पड़ेगा, जिस अंदाज में आम लोगों ने और 85 % दलितों और पिछड़े, अल्पसंख्यकों ने जिस विचारधारा, संस्कृति और बाजारवाद की चकाचौन्ध में अपना देश और भाग्य कर्णधारों और फासीवादी ताकतों को सौंप दिया है उससे लड़ने के लिए हजार साल का शोषण, सदियों की पीड़ा नही - व्यापक तैयारी और बड़ा कैडर चाहिए जो अभी किसी तुर्रे खां के पास नही। आपके कबीर, रैदास और अम्बेडकर को सहेजकर सम्भाल कर रख लीजिए बाकी बुद्ध से लेकर और सबको तो उन्होंने अपना लिया है घर घर गणेश और हनुमानजी की मूरत पहुंच गई है और आपके लोग अभी भी मंदिर में प्रवेश के लिए लालायित है उन्हें तो समझा दीजिये पहले !!! शिक्षा, स्वास्थ्य या कुपोषण जैसे मुद्दों से लड़ने की ताकत जुटाइये, आजीविका सुनिश्चित करवाइये इनकी क्योकि दिमाग़ का रास्ता पेट से जाता है, आप तो बड़े पदों और बड़े विश्व विद्यालयों में पीठिकाओं पर विराजित है माह में पन्द्रह दिन सरकारी खर्च से विदेश घूम आते है पर इनका क्या, एक प्याज को तरस रहे है लोग !!!
जब बड़े जनाधार वाली कांग्रेस, सपा, तृणमूल, दक्षिण की पार्टियां या चवन्नी बराबर वामपंथियों का अस्तित्व मिट गया तो चालीस पचास हजार की भीड़ का क्या और कौन पूछता है इनके इस रविवारीय मनोरंजन को ? इसका नोटिस मीडिया ने नही लिया यह कहना है पर मीडिया इतना भी बेवकूफ नही जितना आपको लगता है और फेसबुक मीडिया भी नही कि आप अलग अलग कोनों से फोटोज चेंपकर अपने सबूत रखें। बहरहाल , इब्ने मरियम हुआ करें कोई !!!
थोड़ा तीखा जरूर लगेगा और ज्ञानी यहां तर्क लेकर आएंगे कोसते हुए पर एक बार पढ़कर आत्म मंथन करना प्रभु फिर भिड़ने आना।


*****

जंतर मंतर दिल्ली पर जो योगी के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे है , हो सकता है वह सही हो - न्याय पाने के लिए सब कुछ किया ही जाना चाहिए , पर फिर वही सवाल है मेरा जो मैंने तमिलनाडु के किसान आंदोलन के समय किया था कि मित्रों लखनऊ जाओ ना दिल्ली में क्यों। यहां सिर्फ एक तमाशा बनकर रह जाओगे और होना जाना कुछ नही है।
दूसरा देश मे इतनी सेनाएं बन चुकी है कि अब किसी मे भरोसा नही रहा - ना हमें , ना दलितों को और ना आदिवासियों को - तो ये नया प्रपंच क्यों। आश्चर्य यह है कि अभी दो माह ही हुए है उप्र में चुनाव को, थोड़ा पहले चेतना जगा लेते तो शायद सत्ता में होते क्योकि जिस अंदाज में बौद्धिक और ज्ञान की बातें हो रही है -कम से कम सोशल मीडिया पर इस सेना के पैरोकार तो महानतम बता रहे है, यह बात थोड़ी पहले करनी थी।
वैसे यह बता दूँ कि स्व कांशीराम की पार्टी लाख प्रयास करने के बाद भी 20 सीट्स के आगे कम से कम उप्र में तो बढ़ नही पाई है बाकि चार राज्यों में तो बात मत करो जी, और मुआफ कीजिये दलितों और मुसलमानों ने ही ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देते हुए प्रचंड बहुमत दिया तो कुल मिलाकर कहना यह है कि यह जो "सनस्क्रटाइजेशन" की चाह में जो कुछ भी नया गढ़ने की और पाने की व्यूह रचना हो रही है वह बूमरेंग ना हो जाये।
तीसरा जिस अंदाज में कुछ तथाकथित छद्म पत्रकार IIMC में हवन कांड के बाद सामने आए है उसी तरह इस सेना के बहाने हमने कुछ और पढ़े लिखे सुगठित और सुज्ञानियों को फिर से नए काँधे तलाशते देखा है। सहारनपुर या दलितों के ऊना आंदोलन की राख में बाटियाँ सेंककर खाते हुए इसलिए आप तो ज्ञान बघारो ही मत।
खैर , गलियाते रहिये ब्राह्मण, अम्बेडकर, बुद्ध को - कौन फिक्र करता है, कमजोर जातियों को नास्तिक नही बना सकते यह भी तर्क प्रभावशाली है, फेसबुक पर मित्र लोग दलितों को बौद्ध धर्म मे ले जाने को प्रेरित कर रहे है- कितने दलित या आदिवासी फेसबुक पर है ? मुझे लगता है इस देश मे अब किसी को भी नया वैचारिक आधार बनाने के लिए एक शतक का इंतज़ार करना पड़ेगा, जिस अंदाज में आम लोगों ने और 85 % दलितों और पिछड़े, अल्पसंख्यकों ने जिस विचारधारा, संस्कृति और बाजारवाद की चकाचौन्ध में अपना देश और भाग्य कर्णधारों और फासीवादी ताकतों को सौंप दिया है उससे लड़ने के लिए हजार साल का शोषण, सदियों की पीड़ा नही - व्यापक तैयारी और बड़ा कैडर चाहिए जो अभी किसी तुर्रे खां के पास नही। आपके कबीर, रैदास और अम्बेडकर को सहेजकर सम्भाल कर रख लीजिए बाकी बुद्ध से लेकर और सबको तो उन्होंने अपना लिया है घर घर गणेश और हनुमानजी की मूरत पहुंच गई है और आपके लोग अभी भी मंदिर में प्रवेश के लिए लालायित है उन्हें तो समझा दीजिये पहले !!! शिक्षा, स्वास्थ्य या कुपोषण जैसे मुद्दों से लड़ने की ताकत जुटाइये, आजीविका सुनिश्चित करवाइये इनकी क्योकि दिमाग़ का रास्ता पेट से जाता है, आप तो बड़े पदों और बड़े विश्व विद्यालयों में पीठिकाओं पर विराजित है माह में पन्द्रह दिन सरकारी खर्च से विदेश घूम आते है पर इनका क्या, एक प्याज को तरस रहे है लोग !!!
जब बड़े जनाधार वाली कांग्रेस, सपा, तृणमूल, दक्षिण की पार्टियां या चवन्नी बराबर वामपंथियों का अस्तित्व मिट गया तो चालीस पचास हजार की भीड़ का क्या और कौन पूछता है इनके इस रविवारीय मनोरंजन को ? इसका नोटिस मीडिया ने नही लिया यह कहना है पर मीडिया इतना भी बेवकूफ नही जितना आपको लगता है और फेसबुक मीडिया भी नही कि आप अलग अलग कोनों से फोटोज चेंपकर अपने सबूत रखें। बहरहाल , इब्ने मरियम हुआ करें कोई !!!
थोड़ा तीखा जरूर लगेगा और ज्ञानी यहां तर्क लेकर आएंगे कोसते हुए पर एक बार पढ़कर आत्म मंथन करना प्रभु फिर भिड़ने आना।

Sunday, May 14, 2017

Narmada Yatra in MP and People

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इस गर्मी में जब लोग बस स्टैंड पहुंच रहे है तो प्रशासन के लोग बसों को अधिगृहित कर रहे है , यात्रा के लिए बसें नही है, रोते बिलखते बच्चे, गर्भवती महिलाएं कड़ी धूप में 43 डिग्री तापमान पर झुलस रही है और बस नही है - पूछिये क्यों, क्योकि प्रधान मंत्री अमरकंटक आ रहे है।
तीन चार मूल सवाल है जो विरोध नही बस कानूनी दायरे में देखने की जरूरत है : -
1- क्या बसों को अधिगृहित कर भीड़ भेजना कलेक्टर या आर टी ओ का काम है ?
2- क्या यह किसी संविधान में लिखा है कि किसी महामहिम के आने पर इतनी दूर के जिलों से भीड़ को इकठ्ठा कर, जानवरों की भांति ठूंस ठूंसकर ले जाया जाए आखिर इसके मायने क्या है ?
3- बसों को इस तरह के मजमे जहाँ व्यक्ति या पार्टी या सत्ता विशेष की ब्रांडिंग होती हो उसमे आम लोगों को कष्ट देकर सार्वजनिक यातायात के साधनों का दुरुपयोग करना कितना जायज है ?
4- जिले में आये दिन फलाना ढिमका आता रहता है और जिला कलेक्टर स्कूल बंद करवाकर बसें अधिगृहित कर लेते है वो भी प्रायः मुफ्त में और एक चलते फिरते तंत्र को बर्बाद कर देते है ये शासन, प्रशासन या संविधान के किस नियम के तहत करते है इसकी जानकारी दी जाए या अमरकंटक जैसे निहायत ही व्यक्तिगत और करोड़ों रुपये खर्च कर नदी की परिक्रमा की नौटँकी कर अपनी छबि बनाने वाले मुखिया को ये सलाह किसने दी ? और आखिर प्रधानमंत्री जैसे ताकतवर शख्स को आखिर क्या मजबूरी आन पड़ी कि वे सिर्फ सवा घण्टे के लिए आ रहे है ?
5- क्या माननीय हाई कोर्ट या मप्र मानव अधिकार आयोग स्वतः संज्ञान लेकर इस पर कुछ करेगा, क्योकि हमारा चौथा खम्बा तो बेहद अंधा और भ्रष्ट हो चुका है और इस समय सड़क छाप स्कूलों के विज्ञापन चेंपकर रुपया उगाही में व्यस्त है !!!
पहले ही करोड़ों रुपये बर्बाद हो गए - बाबा, मौलवियों, पादरियों, हीरो - हीरोइन और जोकरों के नाच गाने और नौटँकी में जबकि ठीक इसके विपरीत अमरकंटक के आसपास उमरिया, अनूपपुर, शहडोल और बुढ़ार के दूर दराज के गांवों में पीने को पानी नही, रोजगार ग्यारंटी का पेमेंट 3 वर्षों से नही हुआ है, आजीविका के अभाव में लोग पलायन कर रहे है, बच्चे कुपोषण से मर रहे है, हालात बिगड़ते जा रहे है और उस पर से सवा घण्टे के लिए फिर करोड़ों का खर्च। क्या नौटँकी है यह सब।
अगर मेरी बातों पर विश्वास ना हो और जिसे इन इलाको के गांवों की वस्तु स्थिति जानना हो वे मित्र Santosh Kumar DwivediBirendra Gautam से पूछ सकते है कि इन लोगों के इस गर्मी में कड़े संघर्ष के बाद भी पीने को पानी नही मिल रहा है, रोजगार ग्यारंटी एक्ट होने के बाद रुपये का भुगतान तीन वर्षों से नही हुआ है। ये साथी नामजद ग्रामवार आंकड़ें बता देंगे। ये क्षेत्र हाल ही में दो दो चुनाव से उकता गया है जिसमे एक अरब रुपया कम से कम बहाया गया होगा कुल मिलाकर फिर स्थितियां सुधरने के बजाय बिगड़ी ही है।
जय नर्मदा मैया की, नर्मदे हर, हर हर !!!
सिंगरौली के कलेक्टर का पत्र जो सिर्फ एक मांग के लिए 86 लाख की मांग कर रहा है
(नोट - तार्किक और संवेदनशील लोग यहां अपनी बात तर्क से मुद्दे पर रखें - कोई पार्टी या राजनैतिक दल विशेष को लेकर यह पोस्ट नही लिखी गई है और अगर पोस्ट, इसका उद्देश्य और भाषा समझ ना आये तो मूर्खतापूर्वक कमेंट कर अपना मानसिक दिवालियापन यहां प्रदर्शित ना करें।)

Saturday, May 13, 2017

Justine Biever and Social Worker of CG state.



जिस अंदाज में जस्टिन वीबर मूर्ख बनाकर गया है उससे जस्टिस काटजू फिर एक बार सामयिक हो गए है ।
वैसे उसकी कोई गलती नही वह तो बच्चा है 23 साल का, उसे बताया गया होगा कि ये गत 70 साल से ये सुतिये बन रहे है और पिछले तीन साल से तो रोज बन रहे है, 15 लाख लेने के लिए अम्बानी अडानी जैसो को अमूल्य देश जोकरों के हाथों सौंप दिया तो 75 - 50 हजार का टिकिट तो यूँही बर्बाद कर सकते है, बाहुबलि जैसी घटिया फ़िल्म को अरबों रुपये से देख सकते है, कूड़े कचरे और प्रदूषित गाड़ियों को एक दिन में खरीद सकते है तो 5 हजार का निम्नतम टिकिट का क्या, अरबों रुपये लगाकर संसद के सत्र ठप्प रख सकते है तो स्टेडियम की सजावट में खर्च हुए करोड़ो का क्या, उसे समझ आ गया कि ये वो ही बेवकूफाना कौम है जो घण्टों लाइन में लगकर नोटबन्दी में जीवन बर्बाद कर देती है !!!
जो जनता शराब, वेश्यावृत्ति और नशे के लिये देश का सोना गिरवी रख देती है, एक जियो की मुफ्त सिम पाकर अपने देश का नाम सर्वाधिक पोर्न देखने वालों में शामिल कर लेती है, 5000 हजार करोड़ घण्टे वाट्स एप से वीडियो कॉल रोज करती है। वस्तुतः यह गाय और मंदिर मस्जिदों के लिए लड़ मरने वाली कौम है जो दंगे कर अपने ही इनकम टैक्स के रुपयों से बनी संपत्ति को जलाकर राख कर देती है, अपनी ही नदी पर परलोक में मोक्ष पाने को प्रदूषण कर देती है, पीर पैगम्बरों और बाबाओं के सत्संग और प्रवचनों पर करोड़ों रुपया रोज बर्बाद करने वाली कौम दुनिया मे कही नही है। यहां के कोर्ट कचहरी का समय तलाक और समलैंगिकता हो या ना हो पर जाया होता हो, जहाँ मशीनों को हैक करके दिखाने की होड़ में प्रशासन और राजनैतिक पार्टियाँ अपना समय और दिमाग़ लगाती हो, जहाँ कुपोषित बच्चों के बजाय नदियों की परिक्रमा पर राज्य प्रायोजित भौंडे नाचगाने फिल्मी हीरो हीरोइन करते हो, जहां नेता गरीब के घर खाना खाने जाते है और यह दिखाने के लिए भांड मीडिया करोड़ो वसूल लेता हो उस देश मे एक नही हजारों जस्टिन वीबर रोज आना चाहिए। जिस देश मे कुम्भ और सिंहस्थ जैसे मेलों में राज्य आगे बढ़कर अपना खजाना लूटा देता हो, जहाँ जनता के रुपयों से राजनेता और पदेन लोग मंदिर मस्जिदों में घूम आते हो, बाबाओं की दवाई फैक्ट्रियों में चूरण की गोलियों को बेचने हवाई जहाज से जाते हो या इज्जतिमा जैसे नितांत धार्मिक उत्सव में सरकारी मशीनरी लगकर अपना समय देती हो उस देश मे क्या रुपये की बर्बादी, अरे साहब सोने की चिड़िया है खूब नोचो और लूटो !!!
गलती जस्टिन वीबर की नही है पुरानी कहावत है जैसे को तैसा !!!
Vishnu Nagar जी आपने इस नौटँकी बाज के आने के पहले चिंता व्यक्त की थी और यह मेरा Post visit विश्लेषण है।
बधाई हिंदुस्तानियों !!!

*****
प्रदेश की स्ट्रांग एक्टिविस्ट,मैनेजमेंट में ट्रेंड, विदेशों से अंग्रेज़ी में पढ़ीलिखी, जमीन से जुड़ी हुई समाज सेविका जब दूरस्थ गांव में भ्रमण के लिए पहुंची तो चकाचक चार पहिया गाड़ी चलाने वाले गरीब ड्राइवर पर दबाव बनाया कि इसी नदी के रास्ते से गाड़ी गांव में ले चलो नही तो इम्प्रेशन कैसे पड़ेगा ? ड्राइवर बेचारा मालिक का गुलाम था, साली गाड़ी गड्ढे में डाली, पंचर हुई और सीधे जाकर धँस गई गड्ढे में और बुरी तरह से ससुरी फंस गई। अब तीन किलोमीटर तक समाजसेविका को पैदल जाना पड़ा, इस गर्मी में पसीना पसीना हो गई।
जाते ही गांव में आदिवासियों के घर भात और छोटे देशी टमाटर की चटनी खाकर उन्ही के एक कमरे में पसरकर सो गई अब क्या, दूसरे दिन सुबह दस बजे उठी और दहाड़ी कि आदिवासियों को बुलाओ और मीटिंग करवाओ। स्थानीय कार्यकर्ता डर गया, बोला मैडम जी बैठक तो हो गई , और लोग अब तेंदू पत्ता तोड़ने चले गए अब तो वो शाम को ही आएंगे।
उफ़्फ़ गाली देते हुए समाज सेविका ने ट्रेक्टर को बुलाने के लिए मात्र 500 दिए और 500 ड्राइवर को देने के लिए कहा ताकि ट्रेक्टर आये और गड्ढे में फंसी गाड़ी निकल सके। ड्राइवर भुनभुना रहा था और मैडम भी। मैडम का कहना था कि ये आधे रुपये ड्राइवर को देना ही होंगे क्योंकि उसे गाड़ी चलाना नही आता !!!
दोपहर ग्यारह बजे गाड़ी निकली फिर मैडम ने अपना शेष दौरा निरस्त किया , फिर कभी का बोलकर राजधानी की ओर निकल गई। जाते समय स्थानीय कार्यकर्ता को धमका गई कि अब तेरी नौकरी खा जाऊंगी, तुम ढंग के गांवों का चयन नही कर सकते पक्की सड़क हो जहां और नेटवर्क मिलता रहें कम से कम 3 जी । बेचारा काँप रहा था अब तीन हजार की तनख्वाह वाली नौकरी तो जाएगी और दूसरा इन दूरस्थ आदिवासी 20 गांवों के लिए काम करने वाला, सायकिल से घूमने वाला कहां से आएगा ?
देश मे आदिवासियों का उत्थान वाया एनजीओ वाया विदेशी रुपयों के जारी है और एक क्रांति बस होने ही वाली है !!!

Sunday, May 7, 2017

जीवन की कहानियां - जीवन की तपती धूप से


1-
कॉलोनी में घर के ठीक सामने रहने वाले श्री उमाकांत नागर जी की माताजी का आज देहांत हुआ। प्रवास के बाद आज आया तो यह खबर मिली। श्मशान से लौट रहा हूँ अभी ।
लग रहा है कि हम कितने अच्छे समाज मे रहते है जहां श्मशान में कोई भेदभाव नही, जात पात नही, ऊंच नीच नही, सब अपनी जिम्मेदारी समझ कर कंडे, पानी, लकड़ी आदि लाने में और सब काम बगैर किसी निर्देश के स्वचालित ढंग से करने लगते है, शांत रहते है, पहचान ना होकर भी सब कितने अनुशासित रहते है, शांत रहकर आपस मे तटस्थ भाव से बातचीत करते रहते है। एक दूसरे को घर या गली तक भी छोड़ देते है पेट्रोल डीजल की परवाह किये बगैर !!!
लगता है जीवन मे यह सीखने समझने के लिए और अपनाने के लिए माह में एक दो बार श्मशान जरूर जाना चाहिए, भले ही किसी की भी मिट्टी में चले जाएं - ताकि यह परिवार, समुदाय, समाज , प्रदेश और देश और सबसे ज्यादा भाईचारा बना और बचा रहें। अनुशासित और समझदारी दिखाते हुए साथ मिलकर सब रहें ।
नागर जी की माताजी को नमन

Saturday, May 6, 2017

निर्भया उर्फ़ दामिनी उर्फ़ भारत का ऐतिहासिक न्याय 5 मई 2017



निर्भया उर्फ दामिनी उर्फ एक नाबालिग लड़की उर्फ देश मे आंदोलन और मोमबत्ती की अंगड़ाई से हाहाकार !!!
सजा पाए 4 मर्दो को फांसी हो शायद अब, ग़र माफ़ी या पुनर्विचार में कुछ ना हुआ तो
सवाल वही कि क्या इससे किसी को भी सबक मिलेगा ?
क्या छेड़छाड़, बलात्कार रुकेंगे ?
मर्दवादी सोच बदलेंगी ?
पितृ सत्ता के ढांचे में बदलाव होगा महिलाओं को समता का अधिकार मिलेगा?
क्या महिलाएं खुद आगे आकर अपनी सोच और व्यवहार में बदलाव लाएंगी ?
क्या अपने जीवन के अधिकार - चाहे वो पढ़ाई का हो, नौकरी करने का, छोटे कपड़े पहनने का, रात बेरात बाहर जाने का, अपनी मर्जी से जीवन जीने का, शादी का या अकेले रहने का महिलाएं खुद लेंगी और क्या ये सब अधिकार उन्हें समाज या परिवार देगा ?
काम करने की जगह पर शोषण रुकेगा या महिलाएं खुद तरक्की के लिए अपने शरीर का इस्तेमाल नही करेंगी, या स्त्री ही स्त्री के विरुद्ध कोई रणनीतिक षड्यंत्र नही रचेंगी ?
इस फ़ैसले का दुरुपयोग धन ऐंठने और पुरुषों को परेशान करने में नही होगा DV Act 2005 की तरह ?
जेंडर के पुराने पड़ते मुद्दों और जेंडर समानता के नाम पर दुकान चलाने वाली और जेंडर की ताबड़तोड़ दवा बांटने वाली "घर बिगाड़ू" औरतों के व्यवहार और तौर तरीकों में बदलाव आएगा ?
ख़ैर , अब आगे देखना है कि स्व जस्टिस वर्मा के महत्वपूर्ण बदलावकारी परिवर्तनों के बाद आज की बेंच का यह फैसला कितना कारगर होता है भारतीय दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सीता, गीता, द्रोपदी, बिलकिस, रेहाना, परमिंदर, एलिजाबेथ, मैरी या दामिनी, निर्भयाओं के परिपेक्ष्य में।

Monday, May 1, 2017

कविता के नोट्स - एक कहानीकार के बानजरिये







स्त्रियों को अपनी कविता में घर गृहस्थी से, प्रेम के उलजुलूल बिम्बों और आत्ममुग्ध सौंदर्यबोध से बाहर निकलना होगा क्योकि यह सब लिखकर वह कुल मिलाकर पुरुष को ही सम्मोहित कर रही है और कविता की पितृ सत्ता उसकी इस कमजोरी का फायदा लेकर उसे पुनः उसी श्रृंगार और छायावादी युग ने धकेलने का कुचक्र रचता है जहां वह कहती रहें - मैं नीर भरी दुःख की बदली। स्त्रियों कविता लिखने के नए बिम्ब चुनो और सदियों पुराने अनुष्ठानिक उपक्रमों को तोड़कर नया रचो वरना सभ्यता की दौड़ में तुम फिर एक काँधा ही तलाशती रहोगी और शिकारी कहानियाँ लिखते रहेंगे तुम्हारे सर्वस्व समर्पण की।

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कविता में स्त्री को अब चूल्हा, चौका, रोटी- माटी या बेसन की गन्ध, फूल पत्ती से आगे आकर लिखना होगा क्योकि अब स्त्री भी बदली है बहुत। जीवनानुभव की चौहद्दी में रहकर शोषण, पीड़ा और काल्पनिक दुनिया में उपेक्षित रहने का उपक्रम बहुत हो गया। आज वस्तुस्थिति यह है कि पुरुष की दुनिया भी उतनी ही एकान्तिक, शोषित और पूर्वाग्रहों वाली है तो क्या पुरुषों ने दीगर विषयों पर लिखना छोड़ दिया है - नहीं बल्कि वे ज्यादा मुखर और प्रखर होकर आवाज उठा रहे है विविध विषयों से।

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हिंदी में कविता पाठ की शैली मंचीय कविताओं के हवाले कर देना चाहिए जहां तालियाँ है, वाह वाही है, देश भक्ति या श्रृंगार की बहुलता हो. गंभीर किस्म की कविताओं का आस्वाद सिर्फ पढ़कर लिया जाता है, यदि कविताएँ अच्छी हो और बहुत तल्लीनता से लिखी गई हो तो गोष्ठियों में फोटो कॉपी करवाकर बाँट दो, पोस्टर बना दो, छोटे कागजों पर प्रिंट करके टांग दो - लोग बारी बारी से तसल्ली से पढ़ लें पर यदि इन कविताओं को कवि मंच से माइक पर किसी अभिनेता सा पढेगा, समझ की उम्मीद करेगा, और तालियों की बाट जोहेगा तो माफ़ कीजिये वह कविता की यह निर्मम ह्त्या कर रहा है और शायद अपने अन्दर के कवि के वजूद की समाप्ति भी. ध्यान रहें कि अच्छी कविताओं को अच्छे कवि ही खत्म करते है और पाठको से दूरी बनाने के वे अजेय दुर्ग साबित होते है.

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कविता में एक उम्र होती है जो बिम्ब, उपमा, शिल्प और लय के साथ धीमे धीमे खत्म हो जाती है और बहुधा यदि इसे समय पर नहीं समझा गया तो कवि हंसी के पात्र हो जाते है. बुढापे में युवाओं के साथ साथ अपने पाठकों की स्मृति में वे विदूषक बन जाते है और उन्हें विद्रूपता के साथ याद किया जाता है. बेहतर है कि एक समय के बाद कवि लिखना भी बंद करें, यहाँ वहाँ जाना भी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में मंच से अपनी भद्द भी पिटवाने से बचें - अन्यथा इतिहास में जो भी चंद कागज़ आपके नाम पर दर्ज थे वे भी कालिख की शक्ल में जमा हो जायेंगे.

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इंसानी फितरत है या यह प्राकृतिक है कि हम अक्सर चीजों को, अपने आसपास को प्रायः खांचों में ही देखते है और यह बात को सोद्देश्य नही बल्कि अपने आप होती है इसलिए जब साहित्य को भी हम इसी तरह से विभिन्न विधाओं में बांटकर देखते है और उसमें भी छिद्रान्वेषण करते हुए काल, वाद, अदलित और दलित के रूप में बांट देते है तो यह विभाजन कविता के लिए थोड़ा मुश्किल या भारी हो जाता है। इसमें भी दिक्कत नही पर जब यह कविता के बहाने वर्ग, वर्ण या इंसानी बंटवारे पर आता है तो सबसे ज्यादा नुकसान होता है। इससे बाकी तो सब गड़बड़ होता ही है पर सबसे ज्यादा मोल कविता को चुकाना पड़ता है।


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सुरा, सुंदरी और कविता का सहसम्बन्ध हमेशा से ही समानुपातिक रहा है इसलिए यदि कविता गोष्ठी, कविता पाठ, कविता पर बातचीत या कविता के अनुशीलन की मीमांसा हो या निकष की बात हो तो आप मानकर चलिये यह कविता के बहाने व्यक्ति विशेष, किसी सुंदरी या समुदाय के चारित्रिक गुण दोषों तक जाकर खत्म होगा। मजेदार यह है कि बेचारी कविता या विचारधारा व्यर्थ ही माध्यम बनते है - जबकि यह नितांत कवियों के आपसी निजी मुआमले होते है - व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा और अहम तुष्टि या जातिवादी मुद्दे होते है जिसे कवि शाब्दिक चतुराई और धूर्तपन से कभी शिल्प, बिम्ब , उपमा के बहाने सामने रखता है या विचारधारा के नाम पर दूसरे की अवमानना करता है। इस सुरा की लौ में बहते हुए वह नए नवेले कवियों के सामने पूरी मर्दानगी साबित करने के लिए वह होश खोने का नाटक करते हुए उन सब कवियों को भी महफ़िल में जीवित कर देता है जिनकी चार घटिया कविता छपने के बाद षोडशी की जरूरत पड़ गई थी। कविता की ये कलुषित छबि घातक ही नही बल्कि शर्मनाक भी है।

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कविता छूटने लगे और कवि चुकने लगे तो फिर वह निरापद हो जाता है और सिर्फ अध्यक्षीय वक्तव्य, बीज वक्तव्य या गपोड़ी की भूमिका निभाने के लायक रहता है कुल मिलाकर वह एक गेरू पुता निर्लज्ज पत्थर हो जाता है भेरू, जिसे कही भी किसी भी हालात में बैठाया जा सकता है। हिंदी में इन दिनों बहुतेरे ऐसे कवि है जो निरापद है, इनके पास सिर्फ अतीत की वीभत्स कहानियाँ है। गपोड़ी किस्म की हरकतें झेलने, घर से बाहर दूसरे शहर में रात बिताने और इनकी भड़ास सुनने के लिए एक अवांगर्द भीड़ की इन्हें जरूरत होती है। अनुभव और बातचीत के नाम ये कविता की हत्या कैसे की गई और तत्कालीन साहित्य में कवि और कविता की छिछालेदारी कैसे , किसने की यही शेष होता है। विचित्र है कि इन्हें महान कहा जाता है समकालीन समय मे।


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लेखन एक शौक, एक अदा, एक अभिव्यक्ति, एक तरह का प्रतिपक्ष रचना और अपनी बात कहना है और इसे यदि हम अपने रोज के कार्यकलापों के साथ कर पाए तो बहुत बड़ी और सम्मानजनक बात है और मेरी नजरों में आप बहुत संवेदनशील और जवाबदेही से परिपूर्ण शख्स हो - मानवता से ओत प्रोत व्यक्तित्व है, पर यदि आप इसी लेखन को चाहे वो लेख, शोधपरक लेख, कहानी, आलोचना, ललित निबंध, उपन्यास या कविता को ही अपना धन्धा बनाकर बाजार में दुकान जमाकर बैठ जाओ, बेचने लगो और हर जगह मुंह मारकर पुरस्कारों की जुगाड़ और फिर पुरस्कार या घर वापसी में जुगत जमाकर समाज मे महान बनने की घटिया कोशिश कर रहे है या कर चुके है और अन्य बुरी आदतों की तरह इसके अभ्यस्त हो चुके है तो मुआफ कीजिये आप अपने जीवन का मूल मकसद खो चुके है , आपको किसी डॉक्टर शाहनी या चोपड़ा की जरूरत है । मेरी नजर में आपकी औकात दो कौड़ी की नही है।



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कुंठित वासनाओं, अतृप्त दमित इच्छाओं, अधूरी शिक्षा, भयावह बचपन, छोटे कस्बों के दंश, महानगरों के सीखे कुसंस्कार, विलोपित सी शब्द सम्पदा, किसी भी स्तर पर पारंगत ना होने का भान, अपढ़ अभिभावक, पहली शिक्षित पीढ़ी होने का गुमान, अंग्रेज़ी ना आने का गहन अपराध बोध, निम्न आर्थिक स्थिति, गहरा काला या गेहुआँ रंग, ऊंचे सम्पर्कों का अभाव और उच्च महत्वकांक्षाएं एक कमजर्फ शख्स को कविता में ले आती है खासकरके सन 1975-80 के बाद का परिदृश्य यही कहानी बयां करता है। ठेठ ग्रामीण या कस्बाई संस्कृति से आये कवियों में ये भाव व्यवहार में कम उनकी गंवई कविता में ज्यादा दिखते है और तीस पर त्यौरी ये कि कुछ महानगरों में धँसकर कुलीन भी हो गए कुलटाओं की तरह। हिंदी कविता की झिर इन्होंने बन्द करके नया पानी कुओं में आने से रोका है।




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कविता आग्रह की वस्तु है जैसा सदवाक्य बोलकर, लिखकर कविता की पोटली लेकर घूमने वाले इस संसार मे बहुतेरे है जो मौका मिलते ही दाग देते है बदबूदार कविताएं और पूरे वातावरण को दूषित कर देते है। ये कवि आपको बाजार से लेकर हलवाई के बूचड़खाने तक मिल जाएंगे और अपनी किताब को मरघट में कपाल क्रिया का इंतज़ार कर रहे लोगों को बेचने से भी परहेज नही करेंगे और यदि आपने कुछ बोला तो अपने ख़ौफ़ज़दा चेहरे की कालिख को ताक पर रखकर विचारधारा के पक्षधर बनते हुए अपने को क्रांतिकारी और आपको बुर्जुआ या दक्षिणपंथी घोषित कर देंगे। अपंग, लाचार, साहित्य या प्रशासनिक सेवा के रिटायर्ड खब्ती बूढ़ों के काँधों पर पैर रखकर अपनी हांकने वाले ये कवि नही वस्तुतः भाट और चारण है।



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जो लोग अपने व्यक्तिगत जीवन मे अपने घर, परिवार, बीबी, बच्चे या शहर कस्बे से एकसार ना हो सकें, जहाँ नौकरी की - वहाँ प्रतिबद्धता या इंटिग्रिटी नही दिखा सकें, बेहद अश्लील किस्म का व्यवहार करते हुए अलग दिखने के अपराध बोध से ग्रस्त रहते हुए भोग विलास में लिप्त रह रहे है और विचारधारा के नाम पर देश प्रदेश और अबोध युवाओं को ज्ञान का रायता पिलाने का स्वयंभू ठेका लेकर झंडाबरदारी कर रहे हो - जिनसे ना गद्य सधा, ना कविता - वे कविता में विचार और विचार में व्यभिचार पर ज्ञान दे रहें है , कमाल ये है कि ये कामरेडी तड़का दाल से मंचूरियन और खीर से आइसक्रीम में भी लग रहा है, हिंदी कविता को इन सड़कछाप ठेले वालों कवि टाइप लोगों से बचना चाहिए जो खाते तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की है शोध अध्ययन के नाम पर और बात करते है मजदूर और सर्वहारा की।



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जीवनभर सरकार, पब्लिक सेक्टर, बनियों ,साहूकारों, बीबियों और नगद नारायण की गुलामी करते हुए जो लोग घर - बाहर , दफ्तर और बाजार में लोगों का शोषण करते रहें, नौकरी छोड़कर कविता , कहानी और साहित्य की सेवा के नाम पर संगठन बनाकर यूनियनबाजी करते रहें वे हिंदी कविता के अश्लीलतम लोग है और इन लोगों को सिर पर बैठाकर इनकी हवाई कविता से आप उम्मीद करते है कि ये लोग अपनी ऐयाशी और कम्फर्ट ज़ोन छोड़कर हिंदी के आखिरी सिरे पर खड़े आदमी के लिए कविता लिखेंगे तो जनाब आप भी इनकी महफ़िल में जाकर जॉनी वाकर का एक पेग लगाइए और भावनाओं का दरिद्र व्यापार करने वाली कविता लिखिए और सरकार के मुखिया को जनपक्षधरता दिखाते हुए जनता को बरगलाइये किसी बांध या विस्थापन को लेकर - बस जॉनी वाकर सरकार प्रायोजित हो।


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महाकवि कहलाने की होड़ में कितने नीचे गिर जाते है - लोग जो विचारधारा के पहरुए बने फिरते है वे आम लोगोँ सा जन्मदिन मनाते है, मनवाते है और उद्घोषणाएं करवाकर अपने को महान सिद्ध कर ही लेते है भले ही दो कौड़ी के किसी अख़बार में टुच्ची सी नौकरी करते हुए उस दरुए मालिक के सामने पिद्दी बने रहते हो पर बाहर आकर यूं दहाड़ते है जैसे कोई बड़ा युग दृष्टा आगाह कर रहा हो , ये महाकवि दुर्गुणों की खान में ही खप जाते है क्योकि इनके आस पास वाले इन्हें महान बनाने से ज्यादा इनके मरने का इंतज़ार करते है। इन पर भरोसा करना यानी अपनी इज्जत दांव पर लगाना है पर एक बात है इनके चाटुकारों की जमात कविता ही नही, कहानी , उपन्यास और प्रकाशकों की गिद्ध बिरादरी में भी है।


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प्रकाशक किसी भी रचना का नियंता नही हो सकता, विशुद्ध रूप से वह वणिक बुद्धि का वाहक है जो रचना को सिर्फ पाठक तक ले जाने का माध्यम है। कवियों का आधा समय इस प्रकाशक नामक धूर्त प्राणी को रिझाने में चला जाता है जो पृष्ठों की संख्या या ले आउट के हिसाब से कतर ब्यौन्त करता है और कई बार तो इतना दुस्साहसी हो जाता है कि कविता के भाव ही बदल देता है और कवि उसके आश्वासनों पर - कि किताब की बिक्री दस लाख से ज्यादा करवा दूंगा, मर मिटता है और अपनी कविताओं की हत्या की सुपारी होशो हवास में इस प्रकाशक नामक सीरियल किलर को दे देता है।
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कवि को कविता से दिशा देने या सीधे कहूँ तो काडर बनाने की कोशिश छोड़ देना चाहिए, ये काम उन लोगों को करने दें जो सिर्फ और सिर्फ अपने को इतिहास के हर्फ़ों में जमा करने के लिए अपने ही ताबूत में कीलें खोंस रहे है यहां वहां मुखौटे लगाकर । ये लोग साहित्य के काँधे पर चढ़कर अपनी छबि बनाकर लाशों का सौदा करना जानते है जो दूसरों की इमेज बिगाड़कर ही हो सकता है। कविता का काम इस सबसे आगे का है - जो मूल रूप से चेतना जागृत करने का है और कवि को यही करने का भरसक प्रयास करना चाहिए।
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जो लोग कविता से सामाजिक, आर्थिक या राजनैतिक लक्ष्य हासिल कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते है वे सिर्फ बकैत ही हो सकते है, ये वो कवि है जो खुद तो गले गले तक तो अनाचार, पाप, तिकड़म, मक्कारी, वासना और साहित्य के कुटिल साम्राज्य के मकड़जाल में फंसे है पर ज़माने से ईमानदारी की उम्मीद कर रहे है कि वह कविता जैसे भोंथरे हथियार से बदलाव की बयार ला दें।
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कहानीकार और उपन्यासकार की भांति कवि भी अपने को स्वघोषित रूप से महान बनाने की अंधी दौड़ में लगा है पर वह यह नही जानता कि उनकी तरह से वह कविता में किसीको चीट नही कर सकता, कहानीकार और उपन्यासकार को यह छूट है कि वह कुछ भी वाहियात या अति लिखकर जमाने को बरगलाता रहें और घूम घूमकर अपनी महानता के किस्से छाती से चिपकाकर बांटता रहे पर कविता में बहुत थोड़े शब्दों में सच कहना होगा और कम से कम किसी आत्म दुष्प्रचार से बचना ही होगा।
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हिंदी कविता को भड़भूँजो से बचाने की बेहद जरूरत है जो भाड़ खोलकर बैठे है और जैसा ग्राहक मांग रहा है- वैसा भूनकर दे रहे है और दिक्कत उनकी भी यह है कि ग्राहक भी पसेरी भर ज्वार, मक्का, बाजरा, धान या देसी चने छोड़कर हाईब्रीड सोयाबीन से लेकर खेसारी दाल ला रहे है भुनवाने के लिए, बाजार नकली और मिश्रित दलिया के गुणों की चारण परम्परा का राजधर्म निभा रहा है और इसमें सब कुछ झंझावात में पड़ गया है - ऐसे में जाहिर है श्रोता, पाठक, पुस्तकों, पत्रिकाओं और कवि के सामने चुनौती का गम्भीर सवाल है ।
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कविता को कुछ लोगों से वाकई बचना चाहिए खासकरके उन लोगों से जो कविता को नुमाइश समझते है, कविता कोई पोस्टर या ब्रोशर नही है ना ही किसी की उम्र का हिसाब करने का पैमाना कि आप दस बरस से चालीस , सत्तर साला वय सन्धि पर शरीर का नख शिख वर्णन करते हुए लिखते जा रहे है, खासकरके स्त्रियां इसमे ज्यादा मुखर होकर सामने आई और कुछ स्त्रैण कवि भी । कविता की दुर्दशा यह तो नही है अगर दिशा ना भी हो तो !!!
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जब तक कवि अपने संत्रास, अवसाद, पीड़ा, संताप, अपराध बोध और जलन जैसी स्वाभाविक प्रवृत्तियों से मुक्त नही होगा तब तक वह कम से कम कविता तो नही लिख सकता। प्रेम, देह, फूल, पत्ती, जुल्फों, घटाओं और ज्यादा से ज्यादा शोषण और स्त्रियों के शरीर पर भले ही कुछ बकवास जैसा लिख लें या अपने अतीत को शब्दों की बाजीगरी में उलीचकर उल्टियां करता रहें उससे कविता तो नही बनेगी।
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कविता करना और कविता को जीना सिर्फ मुहावरा नही वरन एक शाश्वत सत्य है, इसके लिए विभिन्न प्रकार के अंतर आनुषंगिक सम्बन्ध, अनुशासनिक विषय और भाषाओं को सीखना होगा, खुद आगे होकर नया सीखने, पढ़ने, गढ़ने और रचने की तार्किक क्षमता बढ़ानी होगी, उम्र के लिहाजों से परे जाकर खुले दिल और उन्मुक्त दिमाग़ से सबको समझना और स्वीकारना भी होगा, आप सस्ते शब्दो, कुंद और जाले लगी मानसिकता से एक ही भाषा और पुरातन पंथी इतिहास के बरक्स अपने को महान मानकर कविता रचते रहेंगे तो वह कूड़े के अलावा कुछ और हो भी नही सकता।
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लोकप्रियता और पैठ तक जाना कविता के दो आयाम है, सड़क छाप कवि सम्मेलनों में भी कविता पैठ तक जाती है और लोकप्रिय होकर भी असर नही छोड़ती। कवि को यह तय करना होगा कि वह क्या और क्यों लिख रहा है अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए कविता के काँधे पर रखकर बंदूक चला रहा है या एक परस्पर जलन और पीड़ा में लोकप्रियता हासिल करने के लिए बेहद घटियापन पर उतरकर अपने झंडे गाड़ना चाहता है या सच मे कविता को एक परम्परा में पैठ करने की हद तक पहुंचाने की सम्यक दृष्टि से लिख रहा है।
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कविता और सामाजिक बदलाव का कोई सह सम्बन्ध नही है, यह बात कवियों को गांठ बांध लेना चाहिए । जिस दुष्यंत, गोरख पांडे , पाश या लाल सिंह को पढ़कर जोश में आये , कइयों ने एक्टिविज़्म की राह पकड़ी उनकी मौत की कहानी भयावह है। कवि या तो क्रांति लिखकर ये मौत को चुनें वरना श्रृंगार रस में रास रचें - सेनापति, बिहारी और रसखान बनकर इतिहास के सफों ने जगह पाएं, या फिर हिम्मत हो तो ग़दर बनकर लाखों की भीड़ के सामने गाने की हिम्मत करें और वरवर राव सा सीना रखें।
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हिंदी कविता से आप बदलाव की कोई उम्मीद ना करें और ना ही कविता किसी आंदोलन को लेकर लिखी जाती है नर्मदा आंदोलन जो तीस पैंतीस साल चला मुझे स्व श्याम बहादुर नम्र के अलावा कोई कवि याद नही पड़ता जिसने लाखों आदिवासियों की पीड़ा को साहित्य में दर्ज किया हो (और इस कविता को भी पाठकों ने दुर्लक्ष किया - सिर्फ एकलव्य नामक संस्था ने क़िताब छापी और फ्री में बांटी) जबकि मालवे में कवि इतने है कि पत्थर मारोगे तो ये उचक कर पकड़ लेंगे - जो नोबल लेने को बेचैन है ससुरे, पर निकृष्टता हमेंशा चरम पर रही है।
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हिंदी कविता से आप बदलाव की कोई उम्मीद ना करें और ना ही कविता किसी आंदोलन को लेकर लिखी जाती है नर्मदा आंदोलन जो तीस पैंतीस साल चला मुझे स्व श्याम बहादुर नम्र के अलावा कोई कवि याद नही पड़ता जिसने लाखों आदिवासियों की पीड़ा को साहित्य में दर्ज किया हो (और इस कविता को भी पाठकों ने दुर्लक्ष किया - सिर्फ एकलव्य नामक संस्था ने क़िताब छापी और फ्री में बांटी) जबकि मालवे में कवि इतने है कि पत्थर मारोगे तो ये उचक कर पकड़ लेंगे - जो नोबल लेने को बेचैन है ससुरे, पर निकृष्टता हमेंशा चरम पर रही है।
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आज की कविता को चुके हुए और इतिहास हो चुके कवियों के शिकंजे से निकलना और निकालना बहुत जरुरी है क्योंकि ये पुराने लोग जो निहायत ही निठल्ले थे और रोज़ी रोटी की चिंता से मुक्त थे, फांकाकशी में भी निभा लेते है, सिर्फ कविता करते थे इसलिए बहुत लिख गए पर आज के कवि बाज़ारवाद से जूझ रहे है और इन्हें अपनी जिजीविषा इनके सारे साहित्यिक घटिया कृत्यों के साथ बनाये रखना है।
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कविता का कोई धर्म नहीं होता - ना ही विचारधारा, वह सिर्फ कविता होने की मांग करती है पर हमारे कवि लट्ठ लेकर कविता में कविधर्म निभाते हुए विचारधारा का तडका लगाकर अपने को महान बना लेते है और इस तरह से कविता को खेमों में बांटकर कवि आत्ममुग्ध होता रहता है.
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हिंदी की कविता में लगभग तीस प्रतिशत योगदान प्राध्यापकों का है - कम से कम अस्सी के बाद की कविता में और इसमें भी अंग्रेजी पढाने वालों का और भी ज्यादा, इनके साथ दिक्कत यह है कि ये मानक अंग्रेजी से लेते है और घटिया कविता हिंदी में परोस कर भीड़ से अलग दिखने की कोशिश में वे इलियट या जॉन किट्स, कोल्रेज या वर्ड्सवर्थ को अपना आदर्श मानते है परन्तु इनके पास हिंदी का डिक्शन नहीं और प्रतीकों की तो स्पष्ट समझ भी नहीं है.
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ज्यादा भाषाई होने से या एकदम कम भाषाई होने से भी कविता का लालित्य और फ्लो खत्म होता है, हिंदी का कवि अपना ज्ञान या शेखी बघारने के चक्कर में ये दोनों भूलें अक्सर करता है और फिर फ्रस्ट्रेट होता रहता है, कुढ़न में कुंठित होकर आखिर में अपने आप को खत्म करता है.
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कविता का लिखा जाना एक घटना नहीं एक सायास षड्यंत्र है साहित्य में, इसकी व्यूह रचना से लेकर इसे पोषित करने और खडा कर परोसने में कवि माहिर ही नहीं निष्णात भी होता है.
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दरअसल में कविता को छोडकर कवि सब कुछ लिखता है और फिर उसकी बेचैनी और भटकन ही उसे अपयश देती है , यह शब्दों के घातक उपयोग, जबरजस्ती से प्रयोग, अतिवाद और लिखते समय यश की कामना ही एक खराब कविता को जन्म देकर कविता को दिव्यांग बनाता है.

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कविता को पढ़ना गुनना या ज्यादा उत्साही होकर अमर बनाने से उसे वर्तमान के सापेक्ष देखना जरूरी है , अक्सर कवि अतीतजीवी होते है जो ना खुद प्रासंगिक हो पाते है ना कवित्व कर पाते है
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भाषा, शिल्प, अलंकार, उपमा और शब्द खो देने पर कवि के पास कुछ भी नही बचता सिवाय निंदा, जलन , ईर्ष्या और कुंठा के और यह क्रमिक मौत की शुरुवात है .