Wednesday, December 27, 2017

शिक्षक का रोल प्रतिबद्ध होना चाहिए और राजनैतिक भी

Shashi Bhooshan केंद्रीय विद्यालय में हिंदी पढ़ाते है। मेधावी है और बहुत करीबी मित्र और अनुज है उन्हें तब से जानता हूँ जब वो इंदौर में एम ए कर रहे थे फिर नौकरी, उत्तर पूर्व के स्कूल में काम, उनका लिखा , कहानियाँ और त्वरित की गई टिप्पणियाँ आदि का मुरीद हूँ। रीवा विश्वविद्यालय के होनहार छात्र है और अब हिंदी में स्थापित युवा चेहरा।
मेरी आदत है कि लेखक को छेड़ा जाए और पूछा जाए कि पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है। यह सबको पूछता हूँ। पर शशि ने एक अलग संदर्भ में बेहद संश्लिष्ट और घोषणापत्र की तरह जवाब दिया है जिसे पढ़ा जाना चाहिए।
एक शिक्षक मैं भी रहा और आजीवन रहूंगा क्योकि ये संस्कार और पेशा मुझे माँ से मिला था। सारे संघर्षों को याद करता हूँ तो लगता है कि यही वो जगह थी जहां मैं संतुष्ट था और मनोनुकूल कार्य कर पाता था।
एक शिक्षक को सतही तौर पर ही नही विचार और प्रतिबद्धता के स्तर पर भी स्पष्ट होने की जरूरत है और यह सिर्फ काल्पनिक नही घोषित तौर पर व्यवहार में भी परिलक्षित हो तो ज्यादा फायदेमंद होगा
दुर्भाग्य से हम शिक्षकों ने गत 70 सालों में एक नाकारा, उज्जड, भ्रष्ट और हरामखोर पीढ़ी पैदा की है इसलिए यदि आज शिक्षक की गरिमा खत्म हुई है तो कोई आश्चर्य नही है।
अफसोस नही खुशी भी है कि हम सब जिस समाज से आते है वह सब सिर पर लादे शिक्षा में भी चलें आये और बगैर किसी विचारधारा और समझ के दो दूनी चार रटाते रहें और अपने क्षुद्र स्वार्थों में सुलझे रहें
जरूरी है कि हर शिक्षक को एक सन्दीप शशि की तरह बार बार बेहद अपना समझकर छेड़े और उसे बताएं कि हम सबका काम क्या है क्योंकि अब उम्मीद सिर्फ शिक्षक से ही बची है।
शशि, तुम डाक्टर कृष्ण कुमार, प्रोफेसर यशपाल से भी आगे जाओ और शिक्षा साहित्य में कीर्ति की पताकाएं लहराते हुए कीर्तिमान स्थापित करो और इस सुप्तावस्था में पड़े "माष्टर" को जगाओ। 'माट साब' एक गाली ना होकर सम्मान का और संघर्ष का वास्तविक पर्याय बनें यही शुभेच्छा है। इस मास्टर ने अपने 30-35 बरस के कार्यकाल में 10-15 भी प्रतिबद्ध लोग बना दिये जो सिर्फ सवाल करते हो बाकी कुछ नही तो शायद आगे आने वाली पीढ़ी में कोई संदीप किसी शशि से कुछ नही पूछेगा यह विश्वास है, समझ रहे हो ना।
अच्छा लिखा, बल्कि एक उत्तेजना में लिखा यह एक तरह ऐतिहासिक घोषणापत्र है जिसे हर शिक्षक को अपनी नौकरी ज्वाइन करने के पहले जरूर पढ़ना चाहिए और मढ़वाकर घर, स्कूल, आंगन और ओसारो में टांग देना चाहिए ताकि सनद रहे।
बहुत स्नेह
*****
आदरणीय संदीप जी,
आपने पूछा है 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?' और आप दो-तीन बार यह पूछ चुके हैं तो मैं आपसे कुछ कहता हूँ। ध्यान रहे, मैं जो कहने जा रहा हूँ उसका साहित्यिक महत्व कितना है, वह कितनी पोलिटिकली करेक्ट बात है या नहीं हैं और वह कितनी उम्दा या औसत बात हो सकती है मुझे नहीं मालुम। इस बारे में विचार करना भी शायद अभी ठीक न हो। यह मेरा व्यक्तिगत पक्ष, संलग्नता या प्रतिबद्धता है यही सोचकर कह रहा हूं। इसे ध्यान में रखिये और कभी भी इसे घाघ वक्तव्यों से कम्पेयर मत कीजियेगा। मैं कथित निष्पक्ष या बीच का व्यक्ति नहीं हूं। मैंने महान लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी को पढ़कर संतुलित रहने के बारे में यही सीखा है कि संतुलित होना सही-गलत, इसके या उसके बीच में रहे आना नहीं है, बल्कि संतुलित होना जो अधिकतम सही हो उसके पक्ष में होना है। मेरे जवाब को इस तरह पढ़ें कि यह एक शिक्षक का प्रतिबद्ध किंतु तटस्थ अराजनीतिक बयान है-
1. हिंदी जगत के लोगों में दो कथन बड़े मशहूर और मुंहलगे हैं। पहला प्रेमचंद का 'साहित्य राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल है' और दूसरा मुक्तिबोध का 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?' सब जानते हैं कि मुक्तिबोध का सवाल एक मुकम्मल कथन भी है। अतिरिक्त समझदार इसे ठप्पे की तरह भी इस्तेमाल करते हैं। यह भी सभी को मालुम है कि मुक्तिबोध और प्रेमचंद साहित्यकार ही थे राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं। संयोग से दोनों ही शिक्षक भी रहे। जीवन भर कोई समझौता नहीं किया न विचारों से न अपनी भूमिका से। दोनों महान लेखक हैं। उनका लेखन भी जनशिक्षण ही अधिक है।
2. मैं शिक्षक हूँ। राज्य व्यवस्था में यह पेशवर नागरिक होना और वेतनभोगी कर्मचारी होना दोनों है। मैं इन सब कुछ के साथ और इन सबके बावजूद शिक्षक सबसे अधिक हूँ। अब लिखना-पढ़ना सब मेरे शिक्षक होने के ही पूरक हैं। दोहराने की ज़रूरत नहीं कि लिखना, पढ़ना और पढ़ाना दोनों मेरे काम हैं। कोई-कोई मुझे आलोचक भी समझते और कहते भी हैं क्योंकि विवेचना मेरे स्वभाव में है। स्वीकार हो या अस्वीकार मैं समीक्षा साथ रखता हूँ। मैं तर्कों के पीछे खूब भागता हूँ उनसे दो-दो हाथ भी करता हूँ। एक सही तर्क मुझे किसी कृति जैसा ही महत्वपूर्ण लगता है। लेकिन मुझे जानने वालों को पता है मैं शिक्षक की तरह ही चीज़ों को देखने का पक्षपाती हूँ। मैं यह सोचे बिना रह नहीं पाता कि अमुक रचना आगे किस काम आएगी। इससे किनका भला होगा। मेरी दिली ख़्वाहिश है कि मैं शिक्षक की तरह जिऊँ और मरूं भी। मेरे सामने तोल्स्तोय का महान उदाहरण है। वे अंत में बच्चों के बीच ही चले गए। हालांकि उनका महत्व गांधी के लिए भी उतना ही था। अगर मेरे जाने के बाद लोगों ने कहा कि शशिभूषण मास्टर था और कवि कहानीकार तो मुझे बड़ी ख़ुशी होगी। जब सब लोग शिक्षक होने को नौकरी भी समझते हैं मैं जाने क्यों इसे कुछ बहुत बड़ा मानता हूं। मैं किसी राजनीतिक दल का सबसे विश्वासपात्र होने की बजाय भारत के अच्छे शिक्षकों में गिना जाना चाहता हूँ। मुझे दिल से लगता है वह कौन सा दिन होगा जब मैं प्रो. यशपाल या प्रो.कृष्ण कुमार जैसा बड़ा सोच पाऊंगा। इसके लिए मुझे बहुत पढ़ना और जानना होगा। मेरी सीमा यह है कि समय बहुत कम निकाल पाता हूँ। मैं हिंदी के विश्व प्रसिद्ध लेखक उदय प्रकाश जी की इस बात से कभी निकल नहीं पाता कि लेखक के लिए पढ़ने और सोने का खूब समय होना चाहिए।
3. शिक्षक होकर मैं मानता हूं कि प्रेमचंद की पंक्ति मेरे सबसे अधिक काम की है। लोग इसे बोलते तो बहुधा हैं लेकिन बहुत कम लोगों को पता है यह पद केवल दोहराने से नहीं मिल सकता। इसके लिए जो साधना और त्याग चाहिये वह किसी किसी के पास होता है। प्रतिभा तो सभी शिक्षितों में होती ही है। मेरी समझ यह है कि किसी भी समय में राजनीति राजपुरुषों की होती है। शिक्षक अपने दैनिक कार्यव्यापार में हर वक़्त राजनीतिक नहीं होता। एक बात और थोड़ी अटपटी भी लग सकती है कि राजनीति इतनी महत्वपूर्ण भी नहीं होती कि कोई शिक्षक उसमें अपना जीवन लगा दे। हां वह अच्छी राजनीति के लिए भी प्रेरक और मार्गदर्शक हो सकता है। मेरे विचार से शिक्षक की शिक्षानीति होनी चाहिए। ज्ञान और शोध के प्रति उसका समर्पण होना चाहिए। शिक्षक को यह पता होना चाहिए कि जो भी बदलाव होगा वह विद्यार्थी ही लाएंगे। शिक्षक रहते मैं इस या उस राजनीति का कार्यकर्ता नहीं हो सकता। यह मेरा अनुशासन है। मेरी कक्षा में सब दलों के अनुयायियों के विद्यार्थी बैठते हैं। मार्मिक बात यह कि वे सब नाबालिग होते हैं। उनके मां बाप के भी उन्हें लेकर सपने होते हैं। कोई पिता अपने बेटे को भविष्य में किसी दल का बड़ा नेता ही बनाना चाहता है तो उसकी ख़ुशी। क्या मैं उससे लड़ने लगूंगा? इससे कौन या क्या बचेगा? मेरे या किसी और के शिक्षक रहते कई सरकारें आयी गयीं। लोकतंत्र है, यह चलता रहेगा। सेवा शर्तों, नियमों से भी मैं किसी राजनीतिक दल का सक्रिय सदस्य नहीं हो सकता। हूँ भी नहीं। दूसरे, मैं राजनीति का भी नहीं भाषा का शिक्षक हूँ। साहित्यिक संगठनों से जुड़ाव रखता हूँ। सांस्कृतिक आयोजनों में भाग भी लेता हूँ। मेरी सबसे बड़ी आस्था लोकतंत्र में ही है। दुनिया ने सब प्रकार की राजनीति देख ली है। अब केवल लोकतंत्र ही बचा है जिससे उम्मीद की जा सकती है।
4. यदि फिर भी जैसा कि आप सोचते हैं मेरी राजनीति होनी चाहिए और उसे प्रकट भही होते रहना चाहिए क्योंकि मैं नागरिक हूँ, लेखक हूँ, मतदाता भी हूँ, देश में लोकतंत्र भी है और पिछले कुछ साल से बहुत कुछ भारी गड़बड़ भी चल रहा है तो साफ़ कर दूं मेरी राजनीतिक निष्ठा लोकतांत्रिक समाजवाद की राजनीति की है। जो राजनीति लोकतंत्र के साथ समाजवाद के लिए काम करे या उसे सर्वोपरि रखे मैं उसे पसंद करता हूँ। उसके प्रति मेरा व्यक्तिगत समर्थन है। मेरा न तो धर्म में न ही धर्म की राजनीति से कोई वास्ता है न रहेगा। जात पांत, क्षेत्रीयता आदि मानता नहीं। कोई मुझे उपहास में भी सेक्युलर कहे तो बड़ा गर्व होता है। भारत में रहते अतिवादी ताकतों, अलगाववादी, चरमपंथी विचारों से बचा रहूं यही प्रार्थना है।
5. यह मेरा दुर्भाग्य हो सकता है कि मुझे बड़ी उम्र के बाद पिछले कुछ सालों में लगा यानी इतनी उम्र यों ही बीत गयी तब जाना और मैं जिसे दृढ़तापूर्वक अपने जीवन का लक्ष्य मानता हूं वह है लोकतांत्रिक समाजवाद। मैं समझता हूं मेरा लिखना-पढ़ना, नागरिक आचरण इसी के लिए होना चाहिए, और होगा भी। मैं इसकी कोशिश करता हूँ, तैयारी भी। मैं इसके लिए खूब पढ़ना और जानना चाहता हूं कि इसके लिए खुद से क्या-क्या काम ले सकता हूँ। मैं इस बात को दिल की गहराई से महसूस करता हूँ कि भारत में जो कुछ भी बाढ़ की तरह आया है उसके पीछे एक ही वजह है हमारे देश की शिक्षा फेल हो गयी। ग़ौर करने की बात है कि वे शिक्षा के फेल होने के बाद ही अपनी कथित शिक्षा और स्वव्याख्यात्मक सांस्कृतिक दुरभिसंधि से आये। वे इतने हल्के में कुछ चुनावों से ही जाएंगे भी नहीं। उनके हज़ारों विद्यालय हैं और लाखों विद्यार्थी एवं कार्यकर्ता। पूंजीपति और धर्म के कारिंदे तो सब उनके होते ही हैं।
यही बात हैं जो मैंने ऊपर कहीं। इसके अलावा इस नेता या उस नेता के ख़िलाफ़ या समर्थन में रोज़ कलम घसीटना मुझे बचकाना लगता है। इससे होने जाने वाला भी कुछ नहीं है। सच तो यह है कि हम जिन अपराधी, बचकाने और मनुष्यविरोधी तथा पूंजी समर्थित राजनीतिकों की निंदा कर कुछ कर लेने का दम भरते हैं वास्तव में हम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाने की स्थिति में तो हैं ही खुद को भी यों ही खर्च कर रहे हैं। इसे कहते हैं अपनी ही आग में ख़ाक हो जाना। कोई दावा नहीं है कि मैं बड़ा कर जाऊंगा लेकिन मैं करना तो चाहता ही हूँ। यह भी तय है कि मैं शिक्षक ही रहना चाहता हूं। कोशिश करूंगा और देखूंगा भी कि शिक्षक रहकर मैंने क्या किया। एक शिक्षक वैसे भी रातों रात कुछ नहीं करता।
इस देश और दुनिया के जो भी लोग सामाजिक न्याय, पंथ निरपेक्षता और समाजवाद के लिए कृत संकल्प हैं उनको मेरा बेशर्त समर्थन है। भारत में रहते मैं गांधी, भगत सिंह और अम्बेडकर का सजल उर शिष्य बनना, रहना चाहता हूँ। दुनिया के लिहाज़ से वे सब बड़े और सच्चे लोग तथा राजनेता जिन्होंने मनुष्यता को सर्वोपरि रखा। शोषणविहीन, बराबरी की दुनिया की नींव रखी मेरे शिक्षक हैं। शिक्षक रहते हुए केवल यही विश्वास दिला सकता हूँ कि चरमपंथी, अतिवादी और दक्षिणपंथी कुंओ में कूदकर अपनी बुद्धि, ईमान और मनुष्यता की हत्या कभी नहीं करूँगा। लेकिन वामपंथी हों या किसी समय के विपक्ष के अतिचार उनके सामने भी सर नीचा नहीं रखूंगा।
कृपया मुझे कुछ भी मानने से पहले शिक्षक मानें। शिक्षा ही मेरी नीति और कर्मभूमि है। यह लगभग तय जैसा है कि अब हम लोगों से कुछ खास नहीं होगा। हम एक बड़े फेलयुर से नत्थी लोग हैं। अब जो भी होगा आनेवाली पीढ़ी से होगा, और यह होगा। शिक्षक होने के कारण मैं थोड़ी अधिक उम्मीद में रहता हूँ और किसी से भी थोड़ा ज्यादा भारत को प्रेम करने का दम भी भर सकता हूँ। होता है। यह नेचुरल है। लेकिन याद रहे अब बेहतर तभी होगा जब आनेवाली पीढ़ी हम जैसों पर यक़ीन करेंगी और हमें सही मानेंगी।
यदि संभव हो तो सोचियेगा कि हम कैसे और सचमुच यक़ीन के लायक और मेंटर होने लायक बन सकते हैं। यह देश कैसे अपनी बहुलतावादी, सहिष्णु संस्कृति को बचाये रख सकेगा। नफ़रत सिखानेवालों से हम कैसे आगे निकल पाएंगे। भारत कैसे सबका प्रिय देश बन सकेगा। आखिर इसे महामानव समुद्र और विश्व बंधुत्व का अगुआ यों ही तो नहीं कहा गया है। बताइयेगा मैं पॉलिटिक्स में पड़े बिना शिक्षा के रास्ते लोकतंत्र की उन्नति के लिए क्या कर सकता हूँ। भारत के किस काम आ सकता हूँ।
इतना ही।
-शशिभूषण
27/122017 

Tuesday, December 26, 2017

यादें 27 दिसंबर 2017



असल में इतनी ठण्ड पड़ी ही नही कि वो सब मै भर निकाल पाऊं और दिखा पाऊं कि यह सब भी मेरे पास है मसलन माँ के हाथ बुने हुए कुछ स्वेटर्स, एक बड़ा गुलबंद, एक बन्दर टोपी जो बीमारी के समय पिताजी पहना करते थे, वैष्णो देवी गया था तब के लाये हुए पाँव और हाथ के मोज़े, माँ की आखिरी शाल जो कश्मीरी थी और बहुत महंगी भी जिसे अब तक ओढ़ रहा था, पाँव के घुटनों पर लगाने वाले इलास्टिक के दस्ताने जो मरने तक भाई पहनता था क्योकि बहुत दुखते थे.
ठण्ड के आने के साथ ही इन कपड़ों की धुलाई करता और फिर चकाचक तैयार होकर निकलता जेब में चार छः रेवड़ियां भी रखी होती और डिब्बे में गजक. दाने की पट्टी या गुड पट्टी भी कभी कभी पाकर एक राजकुमार सी फीलिंग होती थी, बरसात के गीले चिपचिपे मौसम से निकलकर खूब सारी लहसन छिलते बैठे हम लोग सोचते अबकी बार गर्मी की छुट्टियों में फलना करेंगे ढीमका करेंगे, स्कूलों में अर्ध वार्षिक परीक्षाओं का दौर शुरू होने को होता पर अल्हड बचपन को कहाँ परवाह होती थी.
यह सुबह उठकर पिताजी के साथ किसी रविवार को मंडी में जाकर अचार के लिए मोटी ताज़ी हरी मिर्च लाने का समय था, पीले पड़ते जा रहे रसीले नीम्बू लाने का काल होता था ताकि कांच की साफ़ बरनियों में रस के साथ शकर मिलाकर गर्मियों के लिए शरबत बन सकें और घर लौटते समय कोने की दूकान से गर्मागर्म जलेबी बांधकर लाने का भी ललचाने वाला समय था. माँ दोपहर में मटर छिल रही होती और खूब गलियाती रहती कि कमबख्त सारे मटर खा गए अब खिचडी में क्या ख़ाक डालूंगी और हम हँसते हुए दौड़ पड़ते दोस्तों की छतों पर हाथों में मांजा लिए पतंग को किसी आसमान के पार पहुंचाने को और जब लौटते शाम को तो सूरज ढल चुका होता.
घर में रामरक्षा का पाठ करवाती माँ हमें खाना परोसकर पिताजी से हमारे बारे में बोलती रहती. कितने स्वप्न देखते थे वे दोनों हम सबके लिए और आज जब सोचता हूँ तो लगता है एक भी जगह खरा नही उतर पाया, आज जब दोनों का साया सर पर नही तो सोचता हूँ गर वो ऊपर भी बैठकर यही सब सोच रहे हो और मेरा जीवन देख रहे हो तो कितना अफसोस करते होंगे कि बच्चों ने कुछ नही दिया उस तीन पैसे के सिक्के के बदले !!!

तुलसी जयंती और क्रिसमस की शुभकामनाएं

साई बाबा हो, श्रीराम हो, श्रीकृष्ण हो, पैगम्बर हो, गुरु गोविंदसिंह हो या जीसस हो - ये सब बहुत ही सामान्य इंसान थे और अपने कर्मों से अपने उच्च आचरण और व्यवहार से इन लोगों ने आदर्श स्थापित किये -निजी जीवन मे भी और सार्वजनिक जीवन मे भी और मानवता के उच्च मूल्यों को अपने जीवन मे ही नही अपनाया - बल्कि वृहद समुदाय को अपने साथ जोड़कर सृष्टि में नवनिर्माण भी किया। इसलिए ये देवदूत है और वंदनीय है आज और हमेंशा।
हम किंचित या उनके कार्यों को करना तो दूर अगर सहज मन से स्वीकार भी कर पाएं या उन्मुक्त मन से प्रशंसा भी कर पाएं तो मनुष्य हो सकते है।
क्रिसमस की शुभकामनाएं आप सबको। दया जैसा उच्चतम मूल्य जिस व्यक्ति ने सीखाया उसके लिए मानवजाति हमेंशा नतमस्तक रहेगी।
उन सबको विशेष बधाई जो रात से तुलसी जयंती की बधाई देते नही अघा रहें। एक लोटा पानी अपने आंगन की तुलसी में रोज डाल दें तो प्रकृति पर कृपा होगी बशर्तें अपने ओसारे में कोई गमला लगा हो तुलसी का !!!

तुलसी के औषधीय पौधे से हम सब परिचित हैं यह पौधा सिर्फ पौधा नहीं बल्कि एक आवश्यक पौधा है जो अमूमन हर घर में पाया जाता है इसके महत्व से हम सब वाकिफ हैं , हमारे यहां संस्कृति में देवउठनी ग्यारस पर तुलसी विवाह की समृद्ध परंपरा है -  हर हिंदुस्तानी घर में लगभग तुलसी विवाह होते हैं । 

मैंने अपनी 50 वर्ष की उम्र में आज तक तुलसीदास जयंती जो जुलाई में आती है और तुलसी विवाह के अलावा तुलसी दिवस के बारे में कभी नहीं सुना, ना इसका जिक्र किसी पुराण या धर्म ग्रंथ में है - ऐसा सुना है फिर अचानक आज सुबह से देश विदेश से वे लोग तुलसी दिवस के संदेश भेज रहे हैं जो तुलसी के पौधे को ना देखे होंगे,  ना कभी चखा होगा या यह सूंघकर देखा होगा !  अपने बच्चों को  गेंहूँ के पेड़ "रूरल एरिया" में होते है सिखाने वाले अचानक तुलसी पर मेहरबान क्यों ? बख्श दीजिये भारत को। 

मजेदार यह है कि यह सब आज यानी क्रिसमस पर याद आ रहा है सबको, क्या हो गया है हम लोगों को कितने घटिया और संकीर्ण हो गए हैं , एक कौम अपना त्यौहार मना रही है और हम वही वैमनस्य फैला रहे हैं बेहद शर्मनाक है यह सब। जबकि हमारे संस्कार तो कंस, शकुनि को मामा कहते है, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम रावण को मारने के पश्चात लक्ष्मण को उसके पाँव पड़कर ज्ञान लेने जो कहते है। 

कैसा समाज हम रचना चाहते है। यह पीड़ा उन लोगों की ज्यादा है जो अमेरिका या इस्लामिक देशों में रह रहे है और मुझे लगता है कि अपने ऊपर अल्पसंख्यक होने और अलग थलग पड़ जाने की पीड़ा से ग्रस्त है और जिस थाली में खाया उसी में छेद करने की प्रवृत्ति दर्शा रहा है। ये युवा हिंदुस्तान में रहे और मेडिसिन स्क्वेयर के भाषण सुनना छोड़कर भारत की हकीकत से वाकिफ हो तो समझेंगे कि देश किसे कहते है। ये जिसकी रोटी खा रहे है, जहां से कमा रहे है उसी देश और समाज से गद्दारी कर रहे है। 

यह सब आने वाले भारतीय समाज के लिए बहुत घातक सिद्ध होने वाला है, कल हम जैन, बौद्ध, सिख, दलितों और आदिवासियों को अलग करके एकाधिकार जतलायेंगे और फिर इस तरह से यह सुंदर रंग बिरंगा देश खत्म हो जायेगा। मेहरबानी करके यह सब रोकिये और इसका विरोध करिये, समझाइये प्यार से, हम विविध है इसलिए एक है, ताकतवर है और आज महाशक्ति है, कल हम कमजोर हो जायेंगे। त्योहारों को त्यौहार ही रहने दें, इन्हें अपनी गन्दी सोच, राजनीती और इमेज बनाने का साधन ना बनाएं प्लीज़ !!!

आयोजन वीर के किस्से और पत्रिकाओं का बुरा हाल पाखी जैसा है


1

एक जगह मित्र लोग कुछ बड़ा आयोजन कर रहे थे। अच्छा कार्यक्रम था,सोचा जाऊं कुछ काम करेंगे - मेहनत मजदूरी का और कुछ सीखेंगे। आयोजक मित्र से बात हुई। उन्होंने बड़ी गर्म जोशी से कहा स्वागत है फिर बोले एक दो बातें बता दूं - मैंने कहा जी बताएं....
एक - आपका किराया हम नही देंगे।
मैं - जी, मैंने तो माँगा ही नही और ना माँगूँगा।
दो - हमारी रहने वाली जगह पर सब लोग, कलाकार रहेंगे, जगह नही है हमारे पास, आपको कोई सस्ता सा होटल दिलवा देंगे पर भुगतान आपको करना होगा। यदि आपका कोई यहाँ दोस्त रिश्तेदार हो तो टिक जाना । आपको महंगा नही पड़ेगा।
मैं - जी, वह मैं देख लूंगा चिंता ना करें ।
तीन - हम खाना लिमिटेड का बनाएंगे आपको....
मैं- नही जी, मैं खुद खा लूंगा - आप चिंता ना करें , आपकी चाय भी नही पियूँगा और पानी भी ले आऊंगा।
चार - आप कुछ आर्थिक सहयोग दे देंगे - पांच दस हजार तो मदद रहेगी और रोज के कार्यक्रम अटेंड करने के पांच सौ रुपये। क्या है ना - दिल्ली - मुम्बई से कलाकार आएंगे, स्थानीय कवि भी कविता पढ़ेंगे, कुछ विश्वविद्यालयों के बड़े बड़े लोग आएंगे तो भाषण देंगे - तो खर्चा होगा ना, वो हम कहां से एडजस्ट करेंगे ?
मैंने कहां और कुछ ? बोलें - नही भाई जी, आप आइये, बड़े सम्मानित हो हमारे लिये आपके आने से हिम्मत रहेगी और फिर आप तो घर के हो , हम सब आपको बहुत प्यार करते है। हमारी टीम को आपसे सीखने को मिलेगा। बोलिये कब आओगे ..... हेल्लो , हेल्लो ...हेल्लो !!!
मूर्खो और घटिया लोगों से संसार भरा पड़ा है। आज से इन महान कलावन्तों और पुजारियों का "फेडबुक" अपडेट देखना शुरू किया तो ख्याल आया और रिकॉर्ड की बातचीत सुनी अभी। चूतियों मेरे भरोसे पैदा भी हुए थे क्या ? भगवान की कसम एक से एक नमूने है और फेसबुक के बकलोल। कभी चले मत जाना यहाँ के अपडेट्स देखकर किसी कार्यक्रम में।
है ना गजब !!!
उनको बताना भूल गया कि मैं कोई आई ए एस अफसर नही जो कउता - कहानी लिखता हो .

2
हिंदी पत्रिकाएं लापरवाह और अव्यवस्था की भारी शिकार है।
#पाखी के जून 2017 अंक में मेरी कविताएं छपी थी। आज तक अंक नही मिला - पारिश्रमिक तो दूर। सब विज्ञापन और हिंदी संस्थानों से अनुदान लेकर छापते है, पर लेखकीय प्रति पंजीकृत डाक से ही भेज दें ।
पता नही साहित्यिक समझ वाले सम्पादक है जो खुद भी इस दौर से गुजरे है वो भी इतने खुरदरे हो गए कि असर नही पड़ता । पाखी के सम्पादक साहब को 4 बार बोला, अब साल खत्म होने को है पर कोई एक्शन नही।
सरकारीकरण हो गया है सबका।
कई बार फेसबुक पर इसलिए लिखता हूँ कि यहाँ मित्र लोग पढ़ तो लेते है, तुम्हारी 400-500 प्रतियां तो ढंग से पहुंचा नही पाते देश मे सिवाय कमीशनखोरी के लोगों को , तो क्या पत्रिका आंदोलन जिंदा रखोगे ? एक लेखक को उसकी प्रति नही दे सकते तो दिल्ली में मैनेज कर रहे दफ्तर में बैठे निठल्ले और नाकारा लोग क्या खाक काम कर रहे है, एक पत्रिका पोस्ट नही कर सकते तो क्या अनपढ़ गंवार भर्ती कर रखी है सारी ? आज गुस्सा हूँ इसलिए कि यह पाखी की बात नही और भी लोगों की है।
शर्म आती है कि इतने गैर जिम्मेदार लोग हिंदी के मठाधीश होकर बैठे है और धंधा चला रहे है। 12 माह के चंदे में से आपको 5-6 अंक भी मिल जाएं तो आप गंगा नहा लिए यह मानिए।
खैर , इन्हें जब तक सार्वजनिक नही करेंगे नामजद तब तक कुछ नही होगा। ज्यादा से ज्यादा क्या करेंगे रचना नही छापेंगे - ना छापें कौनसा इनसे रोटी बेटी का सम्बंध करना है। जो लोग अपने दफ्तर की डाक व्यवस्था जिम्मेदारी से नही सम्हाल सकते वे क्या खाक हिंदी के साहित्य संसार को सँवारेंगें।

राजनीति, सत्ता और संस्कृति के बरक्स साहित्य - - संदीप नाईक


राजनीति, सत्ता और संस्कृति के बरक्स साहित्य
-  संदीप नाईक
युद्धे , युद्धेवहे , युद्धामहे
(अर्थात मैं युद्ध कर रहा हूँ, हम दोनों युद्ध कर रहे है और हम सब युद्धरत है।)
-      प्रकाशकांत की एक कहानी से
राजनीति, सत्ता, संस्कृति और साहित्य पर लिखने से पहले हमें वैश्विक परिदृश्य को समझना होगा। तभी शायद हम समग्र दृष्टि से समकालीन भारतीय परिदृश्य को जान सकेंगे। क्योंकि वर्तमान समय की बहुलतावादी राजनीति ने विश्व के जनमानस और समुदाय को बृहद स्तर पर प्रभावित किया है। यह प्रभाव आर्थिक स्तर से होता हुआ समाज, व्यवहार, संस्कृति और अंत में साहित्य पर अपनी छाप छोड़ रहा हैं। अगर देखा जाये तो बीते हुये समय में जिस तरह तानाशाही ताकतों और सवर्णवादी शक्तियों ने अपनी बेजा हरकतों से दुनिया में बदलाव और विकास के नाम पर विध्वंस का तांडव रचा है, वह बेहद चिंताजनक है। संयुक्त सोवियत रूस के विघटन के बाद वैश्विक शक्ति के नाम पर शेष एक मात्र देश अमेरिका में पिछले समय में हुए राष्ट्रपति के चुनाव पूर्व, चुनावों के दौरान और अब जिस तरह का माहौल बदला है वह बहुत मायने रखता है। अमेरिका की नीतियों से लेकर विश्व के छोटे देशों के साथ जो व्यवहार हुआ है वह यह दर्शाता है कि हम कहाँ थे, कहाँ है और कहाँ होगे? इसी क्रम में भारत में सन् 2014 के बाद का पूरा भारतीय परिदृश्य भी बदला है। भारत में तेजी से एक भयावह संक्रमण से गुजरते जा रहे समाज में जो कुछ घटित हुआ वह यह समझने के लिए पर्याप्त है कि भारत की तस्वीर कैसी उजली होने वाली है? शाईनिंग इंडिया से लेकर ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ के नारों की गूँज के बीच मीडिया और संस्कृति का ह्रास होता गया है और एक प्रवृत्ति विशेष को थोपने के जो कुत्सित प्रयास चल रहें है वे बेहद चौकाने वाले हैं। यह सिर्फ इसलिए नहीं कि यहाँ समाज में बदलाव विकास के नाम पर हो रहे हैं। विकास के नाम पर भारत के बहुसंख्य दलित और पिछड़े वर्ग को हाशिये पर धकेला जा रहा है। अत्याचार सुसंगठित और राज्याश्रय पर हो रहे हैं। अल्पसंख्यकों को सुनियोजित तरीके से निपटाया जा रहा है या पुरस्कार वापसी गैंग को भी अब सी.बी.आई. जैसी एजेंसियों के माध्यम से जांच के घेरे में लाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का खेल खेला जा रहा है। यह संभवतः दुनिया के इतिहास में पहली बार हो रहा होगा कि देश के बुद्धिजीवी वर्ग को निशाना बनाकर सत्ता ने अपने लिए सुरक्षा के घेरे बढ़ा लिए हो।
विश्व के परिदृश्य पर नजर गड़ाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि पूरी दुनिया में यह बेहद उठापटक और खलबली मचने वाला समय रहा है। जिसे साधारण भाषा में हम संक्रमण कह सकते हैं। परन्तु इस संक्रमण काल में इतिहास में कभी ना घटित हुई घटनाओं ने समूची मानवता को प्रभावित किया और एक बेहतर दुनिया को देखने का महास्वप्न भंग होने लगा है। इन षडयंत्रों को जानने के लिए निश्चय ही हिन्दी या विश्व की किसी भी भाषा का साहित्य एक दृष्टि प्रदान करता है। सन 1991 में गोर्बाच्योव के ग्लास्तनोस्त और पैरेस्त्रोईका ने जिस तरह से रूस का खात्मा किया, वह बहुत ही कठिन समय था जिससे सदी का महास्वप्न भंग हुआ है ऐसा यह मेरा मानना है। ठीक इसी समय से दुनिया के परिदृश्य पर एक नजर डालें तो हम देखते हैं  कि उदारवाद, सुधारवाद और वैश्विकीकरण के दौर में श्रमजीवी समुदायों को हाशिये पर धकेलने का काम बहुत सुसंगठित तरीके से किया जाने लगा था और एक संघर्षशील वर्ग को धीरे-धीरे पूरे विकास से हटाने का काम किया गया। जिस पूंजी को एक अभिशाप मानकर एक नई दुनिया देखने का स्वप्न हमने संजोया था, वही पूंजी राजनीति पर हावी होती गयी और अंततः सर्वोपरि हो गई। नए उद्योग घरानों का प्राकृतिक संसाधनों पर सत्ता के साथ मिलकर उदय और फिर पूरी दुनिया से सर्वहारा वर्ग के हकों, लड़ाईयों और ट्रेड यूनियनों को सिरे से नकार कर ठेकेदारी प्रथा के मार्फ़त मानव श्रम को हांकना, टास्क आधारित काम पर पूंजी का वितरण आदि भी इसी वर्ग की एक चाल थी। मजदूरों को ना मात्र खत्म किया गया बल्कि उन्हें ज़िंदा रहने के लिए भी नहीं छोड़ा। अमेरिका और रूस की द्वीध्रुवीय व्यवस्था के ख़त्म होने के बाद जन विश्व संस्था के रूप में यु.एन.ओ. जैसे संगठन एकाएक ताकत बनकर उभरे और इन्होंने रूस के खात्मे के बाद अमेरिका के बढ़ते वर्चस्व को विश्व में स्थापित किया। यहाँ तक कि एक ठोस उदाहरण से अपनी बात कहूं तो ईराक पर किया गया हमला बगैर सहमति के किया गया और सिर्फ तेल पर अपना दबदबा कायम करने के लिए हजारों जानें ली गयी। इसी से दुनिया में तेल की राजनीति पनपी जिसने कालान्तर में दुनिया भर में रिसेशन या मंदी थोपी जिसका नुकसान ज्यादातर गरीब मुल्कों पर हुआ जो संसाधनविहीन थे। इस मंदी में इन्हें अपना सब कुछ बेचना पड़ा। भारत जैसे देश को अपना सोना भी गिरवी रखना पड़ा है।
नब्बे के बाद विश्व फलक पर तेजी से बदलते रहे परिदृश्य के दौरान दुनिया के इतिहास में सभ्यताओं के संघर्ष बढ़ गये जो अपने आप में बेहद रोचक, डरावने और बहुत कुछ सिखाने वाले रहे हैं। दक्षिण एशिया में उभरे गुट निरपेक्ष आंदोलनों की महत्ता ख़त्म हो गयी और एशियाई देशों के सामने चुनौतियां अपने पड़ोसी मुल्कों और गरीब देशों से ही मिलने लगी। लिहाजा वे अपनी सारी ताकत बनिस्बत विकास, गरीबी, बेरोजगारी या महिला समानता, दलित और वंचित लोगों की भलाई करने के नामपर आपस में ही लड़कर ऊर्जा और संसाधन ख़त्म करने लगे। जिससे वे खुद लगातार गरीब होते चले गए। गृह युद्धों की स्थिति में जी रहे इन देशों के सामने अमेरिका के समक्ष घुटने टेकने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा और अमेरिका अपने हथियार बेचने के लिए एक से दूसरे मुल्क में यात्राएं करता रहा। अमेरिका किसी सिद्धहस्त खिलाड़ी की तरह बाजार में अपने प्रोडक्ट परोसता रहा और दुनियां के बाजार में छा गया। उसने दूसरे देशों के स्थानीय उद्योग धंधों को ख़त्म कर अपना वर्चस्व स्थापित कर की चाल चली। उत्तरशती में हमने यूरोप के राजनैतिक नक़्शे में हुये बदलाव को भी देखा है। जहां एक ओर दोनों जर्मनी का एकीकरण हुआ और सीमाओं की दीवारें टूटकर गिरी। वही युगोस्लोवाकिया, चेकोस्लोवाकिया और सोवियत संघ जैसे देशों का या शक्तियों का विघटन हुआ जो कि बहुत चिंतनीय था। परन्तु बदलती अर्थ व्यवस्था और राजनैतिक ध्रुवीकरण के समय में कही से कोई आवाज उठाने वाला नहीं था। इसका असर अभी तक मौजूद है। हाल ही में एक छोटे से देश को विश्व मुद्रा कोष ने खरीदने की बात की थी परन्तु अच्छी बात यह थी कि जन मानस ने पूरे जनमत के साथ इसे नकार दिया।
विश्व में हो रही उथल-पुथल के दौरान अगर भारतीय परिदृश्य पर एक नजर डालेंगे तो पता चलता है कि भारत जैसा देश भी वैश्विक आघातों से अछूता नहीं रहा है। पिछली सदी के अंतिम कुछ वर्षों में लगभग पचास साल की आजादी के बाद देश ने करवट बदलना शुरू किया था और यहाँ के लोग जब आजादी का मतलब समझ ही रहे थे कि आर्थिक मंदी ने उनके जीवन पर प्रभाव डालना शुरू किया और सब कुछ तहस-नहस हो गया। यह बहुत पुरानी बात नहीं है जब डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि “लम्हों ने खता की है और सदियों ने सजा पाई है” लिहाजा देश को गिरवी रखकर आर्थिक सुधार करना होंगा। विश्व बाजार को अपने आँगन में बुलाकर मिश्रित अर्थ व्यवस्था के मॉडल को हमने एक झटके में तोड़ दिया। उदारवाद की बयार में छोटे मोटे लोग बह गए और एक ग्लोबल विश्व और मॉल संस्कृति की चकाचोंध भरी दुनिया उभरी। इस नई संस्कृति ने मध्यमवर्ग को लुभावने सपने दिखाकर संघर्ष की चेतना को सिरे से खत्म कर दिया। इस समय में मिश्रित या यूँ कहें कि गठबंधन की सरकारों का दौर शुरू हुआ जिसने समूचे राजनैतिक ढाँचे को एक अजीब स्थिति में ला खड़ा किया। इस गठबंधन से ना मात्र आर्थिक बदलाव करना पड़े बल्कि सामाजिक और राजनैतिक बदलाव एक अनिवार्य तत्व की तरह से आये जिसने भारतीय विकास के सोपान में नये अध्याय लिखना आरम्भ किया। इस उथल-पुथल भरे समय में ही हमने मिश्रित अर्थ व्यवस्था की विदाई की और मध्यप्रदेश जैसे राज्य के एक छोटे से जिले बडवानी से उभरे नर्मदा आन्दोलन ने विकास और विनाश के प्रश्न उछाले। इससे जमीनी आन्दोलनों से पूंजी का जहां महत्त्व बढ़ा वही पूंजी के प्रति एक नफ़रत भी समाज ने देखी। पूंजीविहीन समाज का एक बड़ा तबका सामने आया और बेहद प्रतिबद्धता से जमीनी आन्दोलनों में नेतृत्व के रूप में उभरा। फिर एक बार नक्सलवाद, माओवाद, एक्टिविज्म को परिभाषित किये जाने की मांग उठी। ठीक इसके विपरीत जातिगत ध्रुवीकरण और हिन्दू-मुस्लिम शक्तियों के कारण समाज में कमजोर और वंचित समुदाय को लगातार हाशिये पर धकेला गया। इस साम्प्रदायिकता में सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और शोषित वर्ग का हुआ। इसी के साथ-साथ राजनीति में दलित और हाशिये के वंचित वर्ग ने अपनी जगह बनाई। इनकी राजनीति और निर्णय में बहाली भी इसी दौर की उपज है। दूसरा संदर्भ देखें तो यह समय भारतीय समाज के ध्रुवीकरण की शुरुआत का समय भी है। भारतीय समाज एकरूप समाज के लिए जाना जाता रहा है। हिंदी की महत्त्वपूर्ण ‘पहल’ पत्रिका तो इस देश को महादेश कहती है और इस महादेश में तो कहा जाता है कि कई समय और कई समाज एक साथ रह रहे हैं। इतने बड़े समावेशी समाज में ध्रुवीकरण खतरनाक होता है जैसे कि हम देखते हैं कि उत्तरशती का जो आख़िरी का समय है वह समाज को अधिक से अधिक ध्रुवीक्रत करने वाला रहा है। इस समावेशी समाज में धर्म, सम्प्रदाय और जातियों के ध्रुवीकरण लगातार हो रहे हैं। हिन्दू अधिक हिन्दू हो गया है और मुसलमान अधिक मुसलमान हो गया है। इनके रंग-ढंग भी अलग-अलग दिखने लगे हैं। यदि कोई जाति अपनी संस्कृति का निर्वाह करती है तो कोई बुराई नहीं है लेकिन वह दूसरी जाति के विरुद्ध कुछ क्रियाकलाप करती है तो यह खतरनाक है। इसी तरह एक धर्म के लोग दूसरे धर्म के ख़िलाफ़ सिर्फ़ यह दिखाने के लिए खड़े होते है कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है। यह धर्मांधता मनुष्यता के लिए घातक है। ध्रुवीकरण की यह प्रवृत्ति मनुष्यता के लिए बहुत घातक है। इस तरह उत्तरशती ही हमारे लिए मनुष्यता का सबसे बड़ा संकट भी लेकर आई जिसमें भारतीय समाज ज्यादा से ज्यादा ध्रुवीक्रत हो गया। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव उन समाजों पर ज्यादा पड़ा जो हाशिये पर थे और धीरे-धीरे मुख्यधारा में आने का प्रयास कर रहे थे। फलस्वरूप हाशिये के समाज और ज्यादा हाशिये पर चले गए। इससे साहित्य को बहुत नुकसान पहुंचा है। क्योंकि साहित्य समाज के भीतर मनुष्यता पैदा करता है और जीवन के पक्ष में खड़ा होता है। मनुष्यता और जीवन पर जो खतरे हैं वे हमारे साहित्य और संस्कृति के भी बड़े खतरे हैं। सोवियत रूस के पतन के बाद जो परिस्थितियाँ बहुत तेजी से बदली और अमरीका को खुलकर अपनी मनमानी करने का मौका मिला उससे भारतीय मानस भयाक्रांत हुआ था जिससे उभरने के लिए साहित्य ने नई चेतना पैदा की है और एक वैकल्पिक समाज की कल्पना करते हुए मनुष्यता का पक्ष प्रबल किया है। अगर देखा जाये तो सबसे ज्यादा उत्तरशती की कविताओं में अमेरिका के आर्थिक एवं सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का पुरजोर विरोध मुखर हुआ है। अमेरिका जैसे देशों की अतिवादी और दोहरी राजनीति के ख़िलाफ़ लिखा ही नहीं गया बल्कि इनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी किये गये हैं।
समाज को विकल्पहीन बनाने में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद दोनों ने महती भूमिका निभाई है। जीवन और मनुष्यता को बचाने के लिए जहाँ एक साहित्य अपना काम कर रहा था, वहीं दूसरी और समतामूलक समाज के स्वप्न को ख़त्म करने और वर्गीय समाज बनाने की कोशिशें भी जारी रही है। नब्बे के बाद बार-बार यह कहा जाने लगा था कि ‘विचारों का अंत’ हो गया है और इसी तरह ‘इतिहास का अंत’ भी हो गया है। असल में यह विचार संभ्रम निर्मित करनेवाले रहे है। इसे दोहराने के पीछे की मंशा यह थी कि हमारे लिए अब कोई विकल्प नहीं बचा है। जो एक ही विकल्प बचता है वह पूँजीवाद है। इसका परिणाम यह हुआ कि तीसरी दुनिया के विकासशील देशों में जहाँ कहीं वैकल्पिक समाज के खड़े होने की संभावना बन रही थी वह ख़त्म हो गयी। समाजवादी विचारक किशन पटनायक कहते थे कि ‘ये दुनिया कभी भी विकल्पहीन नहीं हो सकती’। ऐसे में यह सवाल उठता है कि यह भ्रान्ति कौन फैला रहे हैं? दरअसल ये वही पूंजीवादी और साम्राज्यवादी ताक़तें हैं जो इकहरी और विकल्पहीन दुनिया बनाना चाहते हैं। ये तीसरी दुनिया के देशों को अपना क्लोन बनाना चाहते हैं। जबकि विकल्प हमेशा से रहे हैं और रहेंगे। इसी से मनुष्य का विकास होता है और होता आया है। हमारी संस्कृति और साहित्य भी इन विकल्पों को बचाने की जद्दोजहद है। साहित्य हमारे सामने कई विकल्प प्रस्तुत करता है ताकि एक अच्छे और सभ्य समाज का निर्माण किया जा सके।
साहित्य के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण उत्तरशती की कहानियाँ रही है। इस समय में हिन्दी की चार पीढियां बराबरी से सक्रीय थी। बहुत प्रतिबद्धता से चार पीढ़ियों का एक साथ समान रूप से सक्रिय रहना हमें निकट इतिहास में कही देखने को नहीं मिलेगा। यहाँ तक की क्षेत्रिय भाषाओं में भी ऐसा बिरला उदाहरण देखने को नहीं मिलता है। हिंदी में निर्मल वर्मा, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश से लेकर संजीव, राजेन्द्र दानी, उदय प्रकाश, प्रकाशकांत, हरी भटनागर, संजीव ठाकुर, भालचंद्र जोशी आदि कई लेखकों ने बेहद सक्रीय होकर कहानी लेखन किया है। इन्ही के साथ-साथ साठोत्तरी पीढ़ी के सक्रीय दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, रविन्द्र कालिया जैसे कहानीकार भी सक्रीय रहे हैं। जीतेन्द्र भाटिया, रमेश उपाध्याय, मृणाल पांडे, गोविन्द मिश्र, स्वयंप्रकाश, सत्येन कुमार, पंकज बिष्ट, मन्नू भंडारी, रमाकांत श्रीवास्तव आदि प्रतिबद्ध और गैर प्रतिबद्ध दोनों प्रकार के साहित्यकार भी साहित्य सृजन में सक्रीय दिखाई देते हैं। इन चार पीढ़ियों की सघन और रचनात्मक यात्रा में कहानी कई तरह के धरातलों पर चल रही थी। जहां एक ओर राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और भीष्म साहनी, ज्ञानरंजन कहानी को अपने अनुभवों से परिभाषित कर रहे थे, इनके द्वारा नई कहानी की संरचना पर बात हो रही थी वही कहानी के मूल स्वर में महास्वप्न के भंग की आहट हिन्दी में भी बनी हुई थी। नई दुनिया के स्वप्न भंग होने की बात कहानी ने भारत की आजादी के दो दशकों में ही भांप ली थी और इसी तर्ज पर एक भयावह  दुनिया का मंजर कहानी में सामने आने लगा था। औद्योगिकीकरण और तेजी से बढ़ाते जा रहे शहरीकरण के कारण परिवारों का जो विघटन हो रहा था उससे उभारने में कई कहानीकार सफल रहे हैं। इनकी सृजनात्मकता इक्कीसवीं सदी में भी जारी रही है। समाज में जमीनी आन्दोलनों से उभरे मुद्दों ने हिंदी कहानी को प्रभावित किया है। वीरेन्द्र जैन के उपन्यास डूब ने विस्थापन जैसे मुद्दे को उभारा वही उनकी दर्जनों कहानियों ने भारत में फैलते बेरोजगारी के मुद्दे को एक चिंतन के रूप में मुखर किया है जिसने एक बड़े युवा वर्ग को प्रभावित किया और साहित्य से भी जोड़ा है। बढ़ता तथाकथित मध्यमवर्गीय समाज का इस दौर में बढ़ना भी एक संकेत के जैसा है जो अपनी महत्वकांक्षाएं बढाता जा रहा है। उसे लगता है कि बदलाव का यही शार्ट कट सही है जहां उसे ना लम्बी कतार में लगना है, ना इंतज़ार करना है। जेब में अगर रुपया है तो वह दुनिया की हर सुविधा भोग सकता है, खरीद सकता है। मध्यवर्ग के लिए संसार में हर चीज बिकाऊ है। यहाँ तक की साहित्य की मूल संवेदनाएं भी वह खरीद सकता है।  चकाचौंध की दुनिया से प्रभावित मध्यवर्ग हमारे सामने हैं और अब वह सवाल नहीं खोजना चाहता। वह सिर्फ विन विन के सिद्धांत पर जीना चाहता है और बाजार के ट्रेप में, किश्तों के जाल से दुनिया की हर सुविधा को अपने लिए हर कीमत पर हासिल करना चाहता है।
भूमंडलीकरण के इस दौर में कुछ साहित्यकारों ने बाजारवाद एवं उदारीकरण से आ रहे परिवर्तनों की पड़ताल भी की है। इस सन्दर्भ में स्वयंप्रकाश की चर्चित कहानी ‘मंजू फ़ालतू’ उल्लेखनीय है। इस दौर की महत्वपूर्ण समस्या साम्प्रदायिकता को केंद्रीय तत्व बनाकर कई लेखकों ने सृजन किया है। इस संदर्भ में अजगर वजाहत से लेकर  प्रकाशकांत तक के कई लेखक महत्वपूर्ण है। परन्तु इस मुद्दे पर अखिलेश की कहानी ‘अगला अन्धेरा’ इतिहास में उल्लेखनीय रही है। जहाँ ‘और अंत में प्रार्थना’ जैसी कहानी लिखकर उदय प्रकाश ने समाज, सत्ता, परिवर्तन और संवेदना को एक नया अर्थ दिया, वही प्रियंवद ने ‘बूढ़े का उत्सव’ तथा ‘खरगोश’ जैसी कहानियां लिखी है जो संवेदना के स्तर पर एक अलग तरह का अर्थ ग्रहण करती है। नब्बे के बाद की हिन्दी कहानी में संवेदना दो स्तरों पर देखी जा सकती है- एक नागर संवेदना और दूसरी ग्रामीण संवेदना। नागर संवेदना के तहत निर्मल वर्मा, उदय प्रकाश, जया जादवानी, एस आर हरनोट आदि ने बेरोजगारी, शहरीकरण, एकाकीपन, त्रासदी, प्रेम से उभरी और खत्म हुई त्रासदियों को उभारा है। ग्रामीण संवेदना की कहानियों में गाँव की मूल समस्याएं, बेरोजगारी, विस्थापन, जमीन से बेदखली, खेती की जमीन पर कल कारखानों का उग आना आदि कई मुद्दे उभारे गये हैं। ग्रामीण संवेदना को पुन्नी सिंह, संजीव, महेश कटारे, कुंदन सिंह परिहार, प्रकाशकांत, अखिलेश आदि कई लेखकों ने अपनी कहानियों में दर्ज किया है। संजीव ठाकुर की कहानी ‘झौआ बेहार’ ग्रामीण संवेदना की सशक्त कहानी है जिसमें शहर में आये एक युवा के अस्तित्व खो जाने की विडम्बना मौजूद है। कहानी के क्षेत्र में नये सिरे से प्रस्तुत हुई दलित-आदिवासी संवेदना भी विशेष मायने रखती है। विशेषकर दलित-आदिवासी समाज की चिंताएं ‘युद्धरत आम आदमी’ जैसी कई महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों में मुखर हुई है। इसके अलावा हंस, वागर्थ, आजकल, पश्यंती, सारिका, गंगा, समकालीन जनमत आदि पत्रिकाओं ने भी आमजन पर केन्द्रित अंक निकालकर नए समाज का स्वप्न देखा है। नब्बे के बाद साहित्य के क्षेत्र में विशेषकर कहानी लेखन में दलित और स्त्री विमर्श भी मुख्य रूप से उभरकर आये जिसने जनमानस की संवेदनाओं को प्रभावित किया है। ओम प्रकाश वाल्मिकी, मोहनदास नैमिशराय, विमल थोरात, तुलसीराम, जयप्रकाश लीलवान, द्वारका भारती, दयानंद बटोही, कैलाश वानखेड़े, अजय नावरिया आदि कई लेखकों-आलोचकों ने कविता के साथ-साथ कहानियाँ लिखकर दलित चेतना को मुखर किया और मनुष्यधर्मी चिंतन को सामने लाया है। कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, रमणिका गुप्ता, मैत्रेयी पुष्पा, नासिरा शर्मा, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, अनामिका, नीलेश रघुंवंशी, लवलीन, जया जादवानी, प्रभा खेतान, मनीषा कुलश्रेष्ठ, मेहरुनिसा परवेज आदि लेखिकाओं ने स्त्री अस्मिता एवं चेतना को मुखर करके विमर्श की धारा विकसित की है। इस स्त्री विमर्श ने साहित्य के द्वारा स्त्री संबंधों की पड़ताल, स्त्री स्वतंत्रता, मुक्ति की आकांक्षा को नये संदर्भो से व्याख्यायित किया है। सीमोन-द-बोऊवार को एक बार फिर से व्याख्यायित किया, खारिज किया और फिर  स्वीकार भी किया है।
समकालीन समय तक आते-आते हिन्दी कविता एक लंबा रास्ता पार कर चुकी थी। कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, चंद्रकांत देवताले, विनोद कुमार शुक्ल आदि कई कवि अपनी कविता को एक नई जमीन पर ला चुके थे। समकालीन कविता हमारे समय की सबसे सचेत कविता है। इन कविताओं ने समय की चिंताओं को सबसे ज्यादा पकड़ा। इस समय की हिंदी कविताएँ ही नहीं बल्कि भारतीय कविताओं की भी यही चिंता रही है। एक ही समय में भारतीय कविता चाहे वह किसी भी प्रादेशिक या क्षेत्रीय भाषा की क्यों न हो उनकी चिंता भी इसी समय को लेकर रही है। क्योंकि कविता कभी भी अपने समय से विमुख नहीं होती है। भारतीय कविताओं ने इस समय को लेकर जो प्रतिरोध दर्ज किया उसका उजला पक्ष यह है कि वैचारिक रूप से इन भाषाओं की कविताओं ने एक दूसरे को भी समृद्ध किया है। समकालीन समय में तेजी से राजनैतिक घटनाक्रम बदले हैं। इसी कारण यह बेहद घटना प्रधान समय भी रहा है। इसी के चलते भारत दुनिया के नक़्शे पर तेजी से उभरा भी है जिस पर सभी ध्यान देने लगे हैं और हमारी बातें सुनी भी जाने लगी है। इसकी गूंज हिंदी कविता में सुनी जा सकती है। हिंदी कविता उन क्षेत्रों में भी लिखी जा रही है जो भारतीय क्षेत्र नहीं है। राष्ट्रवाणी पत्रिका जो महाराष्ट्र से प्रकाशित होती थी जिसमें हिंदी के लेखक बहुतायत में प्रकाशित हुए। मुम्बई से निकलने वाली कई हिंदी पत्रिकाएं जैसे- धर्मयुग, सबरंग आदि में भी कई कविताएँ प्रकाशित है। कोलकाता से वागर्थ जैसी पत्रिका आज भी निकल रही है। इन सभी पत्रिकाओं में हमारे समय की चिंता मुखर हुई है। यही चिंताएं भारतीय कविता में भी देखी जा सकती है।
हमारे समय में कविता की पृष्ठभूमि को देखेंगे तो एक विशेष बात दिखाई देती है और वह है अपने समकाल और समस्याओं की अभिव्यक्ति। आलोक धन्वा, वेणुगोपाल जैसे कवि अपनी कविता में जिस आक्रामक तेवर में दिखाई देते हैं, वह अपने पूर्ववर्ती धूमिल की याद दिलाते हैं। धूमिल ने लिखा है- “कविता भाषा में मनुष्य होने की तमीज है।” आलोक धन्वा की ‘गोली दागो पोस्टर’ जैसी कविताएँ एक ख़ास तरह के बदलाव को इंगित करती है। अर्थात् कविता में विषयों की बहुलता के साथ-साथ कवियों के स्वर भी विविधता लिए हुए हैं। जिसमें हर वर्ण और वर्ग के साथ-साथ विभिन्न पेशों से जुड़े स्त्री-पुरुष अपनी विशिष्टता के साथ अपनी बात या अपने जीवनानुभव कविता में लेकर आये हैं। आज हमारे सामने समकालीन कविता कई रूपों में हैं। हमारे पूर्ववर्ती कवियों के प्रतिरोध के स्वर इधर के दिनों में धारदार हुये है। अगर जोखिम उठाने वाले पुराने कवियों के कविकर्म को देखेंगे तो पता चलता है कि पंजाबी में लिखनेवाले पाश तथा हिंदी के मानबहादुर सिंह जैसे कई कवियों की हत्याएं हुई। त्रिलोचन, नागार्जुन, शमशेर, रघुवीर सहाय, धूमिल, मुक्तिबोध जैसे कई कवि हैं जिनकी गूंज आज भी बहुत दूर तक सुनी जा सकती है। वे वर्तमान कविता के मार्गदर्शक है। इधर के दिनों में लिख रहे नए कवियों के समक्ष नए संकट और चिंताएँ है जिसका जिक्र समाज में चल रहे संघर्षों के साथ-साथ कविताओं में आ रहा हैं।  समकालीन कविता को जब हम देखते हैं, तो उसमें राजेश जोशी, लीलाधर मंडलोई, कुमार अम्बुज, देवी प्रसाद मिश्र, बद्रीनारायण, जितेन्द्र श्रीवास्तव आदि कई महत्वपूर्ण कवियों ने अपनी निजता और सामाजिक सरोकारों को बहुत गहरे ढंग से एक विशेष प्रकार की यथार्थपरक दृष्टि के साथ मुखर किया है। इस नई सदी में वसंत सकरगाये, बहादुर पटेल,  अशोक कुमार पाण्डेय, निशांत, अरुणाभ सौरभ, उमाशंकर चौधरी, शिवदत्त वावलकर, सुजाता, विमलेंद्र त्रिपाठी आदि कई कवियों ने कविता में सामाजिक सरोकारों के निर्वाह का अगला चरण शुरू किया हुआ है। मनुष्य की चिंता को लेकर अभी भी सबसे ज्यादा संभावनाशील विधा कविता है। इस बदलते हुए समय में बड़ी तेजी से सामाजिकता आहत होने लगी है और मनुष्यविरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जाने लगा है। इसीलिए इसके प्रतिपक्ष में खड़े होकर कविता के मार्फ़त मनुष्यधर्मी संवेदनाओं संवारने का कार्य विभिन्न पत्रिकाओं के कविता केंद्रित कई विशेषांक प्रकाशित करके किया जा रहा है।
इधर के दिनों में हमारे देश की स्थिति गृह युद्ध से ज्यादा घातक है। हर जगह जाति, वर्ग, वर्ण, राजनीति, अर्थ और वर्चस्व के मुद्दों पर हिंसा हो रही है। सबसे घातक इस समय में सत्ता पर आसीन वर्चस्ववादी ताकतों के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठ रही है। जबकि एक बार अपने वक्तव्य में भूतपूर्व महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी जी ने कहा था कि ‘जनता ने सवाल पूछने चाहिए’। सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति और सत्ता में बैठे लोगों से सवाल होना चाहिए, खासतौर पर ऐसे समय में जब सबसे ऊंची आवाज में बोलने वालों के शोर में असहमति की आवाजें डूब रही हैं! हमारे देश में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद उभर हुई राजनीति और पिछले तीन वर्षों से आई सत्ता ने देश के जनमानस को बहुत प्रभावित किया है और इससे राजनीति भी प्रभावित हुई है। निष्पक्ष और तटस्थ भाव से देखा जाये तो अनुशासनात्मक आचरण वाली कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं है तथा सत्ता व्यक्तियों पर केंद्रित होकर रह गई है। यह समाज के लिए नुकसानदायक है। समय रहते ही यदि तानाशाही और व्यक्ति केंद्रित सत्ता को नियंत्रित नही किया गया तो अगले दस सालों में अनुशासन की सीमा ख़त्म हो जायेगी और लोग बगावत पर उतर आयेंगे। उसके बाद सबका राजनीतिक अस्तित्व खतरे में होगा। इसकी अनगुंज अभी से धीरे-धीरे साहित्य में उठने लगी है। मतलब राजनीति और सत्ता के प्रतिपक्ष में साहित्य अपना प्रत्याख्यान प्रस्तुत कर रहा है।
वैसे देखा जाये तो हिन्दी साहित्य जगत फूहड़, छिछोरे, नाटकबाज और तथाकथित विचारधाराओं को ओढ़कर चलने की नौटंकी वालों से भरा पड़ा है। कुछ लेखकों एवं आलोचकों द्वारा रोज नया विचार गढ़ा जाने लगा है। यह सिर्फ और सिर्फ प्रसिद्धि (?) पाने के लिए और अपनी कुंठाएं निकालने के लिए किया जा रहा है। रही सही कसर फेसबुक जैसा सोशल मीडिया पूरी कर रहा है। आये दिन मेरे पेज को लाईक करों, मेरा स्टेटस शेयर करो, मेरे स्टेटस पर कमेन्ट करों, मेरी किताब मंगवा लो, मेरे वाल पर टिप्पणी करो, मेरे चित्र देखो आदि बीमारी से हिन्दी के बड़े नामी गिरामी कवि, कहानीकार और उपन्यासकार ग्रस्त है। कई लोग इसी कुंठा में मर रहे हैं। विचारधारा वाट्स एप जैसे माध्यम पर भी लड़ाई का शक्ल ले चुकी है और वहां भी रूठना-मनाना और छेड़ना जैसे मुद्दे जोर पकड़ रहे हैं। इससे रचनात्मकता मर रही है और नये नये साहित्यिक राजनीति के अखाड़े बन रहे हैं। कोई वरिष्ठ लेखक कुछ कहता है और उसका अर्थ कोई और लिया जा रहा है। कई साहित्यकार आपस में ही दोषारोपण करने लगे हैं। इससे निजात पाने की आवश्यकता है। आजकल  तो हो यह रहा है कि बात बात पर किसी साहित्यकार या बुद्धिजीवी को धमकाया जा रहा है। किसी को पाक भेजने की धमकी मिल रही है तो किसकी दिन-दहाड़े हत्या की जा रही है। इस पर अगर इंसानियत के तर्ज पर सोचा जाये तो जो हो रहा है वह समूची दुनिया और मानवता को कई सदियाँ पीछे ले जाने के जैसा है। इस आपाधापी के समय में शिक्षा, स्वास्थ्य, जल, जंगल, जमीन, कुपोषण, भूख, बेरोजगारी और विकास के महत्त्वपूर्ण मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं। सत्ता की कुर्सी को बचाये रखने के लिए अवसरवाद को हवा दी जाने लगी है। इस कठिन समय में अपने परिवार को पालने और ज़िंदा रखने के लिए कड़ी मेहनत करने वालों के जीवन  संघर्ष और जद्दोजहद बढ़ रही है। लम्पट, लठैत और गुंडे मवाली जब सत्ता में आते हैं तो भाषा का सबसे पहले चीर हरण होता है। यह सब दुखद है कि एक सबसे बड़े लोकतन्त्र में भाषा का उचित इस्तेमाल करना भी हम सीख नहीं पा रहे हैं। हमारी संस्कृति बदल रही है और साहित्य के अपने गुट और खेमे बने हुये हैं जहां रोज नया कुछ बनता बिगड़ता है। अगर आपके मन में पूंजी के लिए अदम्य लालसाएं जोर मारती हो, अगर आप सबसे सौहार्द्र की बात करते हुए भयानक तानाशाह है तो आप अच्छे लोकप्रिय और चर्चित साहित्यकार कैसे हो सकते हैं। ज्ञानपीठ, ऑस्कर, बुकर और नोबल तथा बाकी छोटे-मोटे पुरस्कार, प्रमाणपत्र, प्रशस्तियाँ और अमीक्षा-समीक्षा तो यूँही मिल जाती है। बस अपनी रीढ़ की मजबूती को मरोड़ना और बिछने की कला में पारंगत होना होगा। दरअसल पीड़ा वहाँ से शुरू होती है जब आपके अंदर बरसों का जमा मवाद साहित्य बनकर कुंठा के रूप में फूटता है और आप प्रतिबद्ध, पंक्तिबद्ध और छंदयुक्त बनकर सबको एक सिरे से नकारने के लिए किसी एक विधा पर सवार होकर विश्व के पुरस्कारों को फतह करने की आस में निकलते हैं। इन स्थितियों में हम ये भूल जाते हैं कि जिस सरजमीं से रेंगना सीखा था, उसे दलदल बनाकर वही एक वटवृक्ष बनने का स्वप्न संजो लेते है जिसके नीचे पौधे तो दूर, दूर्वा का एक हरित तिनका भी सांस ना ले सकें! आजकल तो साहित्य की मंडी में छपास की भूख वालों की तमन्ना पूरी हो रही है। इस मंडी सजायी गयी किताबें चुपचाप अपने जिस्म रुपी पन्नों को लहराते बिखराते और इंतज़ार करने लगी है कि उन्हें कोई ग्राहक मिल जाये। प्रकाशक और लेखक के दुःख दर्द, लेखकों की आपसी होड़, जलन, ईर्ष्या, और अपने ही साथ के लेखकों को गड्ढे में धकेले जाने के भयानक षड्यंत्र होने लगे हैं। साहित्य का पूरा माहौल रणनीति और राजनीति में बदल रहा है। इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार करके संभावना की तलाश करने की आवश्यकता है।
साहित्य की उपादेयता को लेकर एक सवाल जिज्ञासावश उभरता है कि सिर्फ कविताओं और कहानियों से क्रान्ति हो पाती तो पाश की ह्त्या कैसे हुई? गोरख पाण्डेय और दुष्यंतकुमार ने आत्महत्या ही क्यों की थी? साहित्यकार कविता, कहानी और साहित्य में क्रान्ति की बातें कर सकते हैं। वे लोक जीवन, भाषा और बोलियों के मिथकों का दोहन और शोषण करके खूब पुरस्कार, यश, नाम और कीर्ति भी छीन-छानकर अपने खाते में बटोर सकते हैं। लेकिन क्या वे वास्तविक जीवन में अच्छे इंसान कह्लायंगे? असल में इस तरह के साहित्यकार राजनीति, सत्ता और व्यवस्था के गुलाम होते हैं। अगर वे अपने लिए बने-बनाये फ्रेम और कम्फर्ट ज़ोन से निकलेंगे तो उन्हें जीवन की हकीकत मालूम पड़ेगी। वस्तुतः ये सब पूंजी को पाने के घटिया और शॉर्टकट वाले तरीके है जो आजकल ज्यादा प्रचलन में है। जनता के हमदर्द बनकर जनता का शोषण करना, पूंजी का मोह मन में लिए चाटुकारिता की दुनिया में छदम रहना या बुद्धि की बात को नकारकर मूर्खों की दुनिया में फ्रेमबद्ध लोगों को सलाम ठोकना कहाँ की कविता या साहित्य है। यह सब तो मोह माया है। असली साहित्य ग़दर का है जिसमें व्यवस्था को नकारकर, घर-परिवार छोड़कर, संसार में रहकर पारंपरिक संस्कृति के विरुद्ध क्रान्ति करने का आह्वान किया जाता हो। असली साहित्य वह है जो छत्तीसगढ़ के जंगलों में अनुराधा कोबार्ड गांधी रचती है तथा पी. साईनाथ जैसा आदमी दुनियाभर में घूमकर असल में हाशिये पर पड़े लोगों का दर्द कोरे पन्नों पर उकेरता है तथा समूचा जीवन एक मिशन की शक्ल में जी लेता है। वह समाज के लिए आईकॉन बन जाता है। महानगरों में रहनेवाले और प्रशासनिक सेवाओं के अफसरों की घटिया कविता, कहानी या थोथे ललित निबंधों में से साहित्य की नश्वरता बघारने वाले स्वयंभू लेखकों की कमी नहीं है। साहित्य के नाम पर चिरौरी करके प्रतिष्ठित होनेवाले लोग रचनाधर्मिता मर्म क्या समझेंगे? इन हालातों के बीच हिन्दी का यह दुर्भाग्य है कि इसमें वह तहजीब नहीं है जो उर्दू या फ्रेंच में होती है। कितने भाषाओं के शब्दों को लेकर बनी यह हिंदी भाषा कुछ शिक्षाविदों एवं राजनैतिक रूप से कमजोर लोगों की महत्वकांक्षा और ऊँचे एम्बीशन की शिकार हो गयी है। हिन्दी की लेखन-परंपरा में से जो भी विश्वविद्यालयों में लिखाया-पढ़ाया जा रहा है वह कालातीत हो गया है। वीर गाथाकाल से लेकर आज तक बंटे हुए साहित्य-समय में और दोहा, सोरठा से लेकर श्रृंगार रस और वीभत्स रस में डूबा हिन्दी का संसार विश्व फलक पर क्यों नहीं छा सकता? हाँ, यह दीगर बात है कि इधर किसी की भी दो-तीन किताबे आने के बाद अब हिन्दी में बुकर, मैगसेस और नोबल के लिए विश्व विचारवान हो रहा है। परन्तु अभी भी यह प्रश्न विचारणीय है कि इन दिनों जो पत्रिकाएं संपादित की जा रही है उसमें आन्दोलन से लेकर जमीनी हकीकतों का यथार्थ परिलक्षित क्यों नहीं होता है? अतः वास्तव में राजनीति, सत्ता और संस्कृति के बरक्स साहित्य को नए परिवेश और सामयिकता के आलोक में देखने-परखने की आवश्यकता है।
(इस आलेख के लिये बहादुर पटेल ने भी अपने विचारों से सहायता प्रदान की है।)

Friday, December 22, 2017

आलोक झा को 2017 का भारतीय ज्ञानपीठ का युवा लेखक पुरस्कार

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आलोक झा को 2017 का भारतीय ज्ञानपीठ का युवा लेखक पुरस्कार 
ये है श्रीमान आलोक झा जो इन दिनों नवोदय विद्यालय, एर्नाकूलम , केरल में हिंदी के पी जी टी है और भले से आदमी है. मूल रूप से सहरसा, बिहार के रहने वाले है और बड़े पढ़ाकू और होशियार है - दिल्ली से पढ़े है इसलिए यह तो कह ही सकता हूँ. सच्चा और निश्छल प्रेम क्या होता है इनसे सीखना चाहिए - इसमें कोई शक नही है.
बात बहुत पुरानी है एक बार दिल्ली गया था शायद 2003 में - इंडिया हेबीटेट सेंटर में रुका था, मै भयानक बीमार पड़ गया तो होटल में देखभाल करने वाला कोई था नही. एक मित्र को फोन किया तो उसने कहा कि रुको किसी को भिजवाता हूँ, एकाध घंटे में झोला टाँगे एक युवा बल्कि किशोर चला आया और बोला "जी सर क्या हुआ आपको, हम ले चलते है डाकटर के पास " ले गया एक अभिभावक की तरह से और ले भी आया सम्हालकर होटल में, फिर दवा दिलवा कर वो चला गया. बात आई गई हो जाती पर दोस्ती और स्नेह की ऐसी गाँठ बाँध गया कि आज तक ससुरी टूटती ही नही फिर तो दिल्ली जाना हो और इनसे ना मिलें तो गजब हो जाए. दिल्ली में इनकी पढाई जब तक चलती रही ये मियाँ मकान दर मकान बदलते रहें -
पर यमुना के इस पार कभी ना आयें. फिर एम ए, बी एड और अंत में एम एड करते समय शिक्षा पर जबरजस्त बहस होती मुझसे क्योकि मै स्कूल में प्राचार्य था, नवाचार में संलग्न था और लिखता पढता था खूब उन दिनों . खूब बात होती व्यवस्था से लेकर कृष्ण कुमार और अनिता रामपाल के पढ़ाने के तौर तरीकों पर बातचीत. मेरे लिखने के पीछे जिन लोगों का बड़ा हाथ रहा कि लिखो, फ़ालतू काम छोडो उनमे से आलोक एक है. हमेशा डांटने वाला कि दादा क्या कर रहे हो समय निकल रहा है लिखो यार, यहाँ आ जाओ यहाँ लिखो..........

अपने पुत्र के समान और जवान होते इस लायक और बहुत लाडले मित्र के समान दुलार देने वाले इस शख्स को इस वर्ष भारतीय ज्ञानपीठ ने पैतीस वर्ष से कम उम्र के लेखकों की किताब छापने वाली योजना में चयनित किया है और पचास हजार की राशि से सम्मानित भी किया है.  भारतीय ज्ञानपीठ की संस्तुति यह है;-
"भारतीय ज्ञानपीठ की नवलेखन पुरस्कार योजना के अंतर्गत वर्ष 2017 के लिए दिये जाने वाले पुरस्कार के लिए वरिष्ठ लेखक, पत्रकार विष्णु नागर की अध्यक्षता में गठित निर्णायक समिति द्वारा सर्वसम्मति से आलोक रंजन की दक्षिण भारत पर केन्द्रित यात्रा-वृतांत की पांडुलिपि को नवलेखन पुरस्कार दिये जाने का निर्णय लिया गया है।केरल में पदस्थापित श्री आलोक रंजन का यात्रा-विवरण दक्षिण भारत की सघन तस्वीर प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से आलोक रंजन केरल के दुर्गमतम इलाकों में गये हैं। इस तरह के यात्रा और यात्रा-विवरण हिंदी में अब दुर्लभ हैं। आलोक रंजन के पास ग़जब का भाषा-संयम है और प्रकृति तथा लोगों से लगाव है। उनमें तमाम असुविधाओं में यात्रा करने का साहस है और चुनौती स्वीकार करने का माद्दा है। पुरस्कृत लेखक को 50 हज़ार का नगद पुरस्कार, प्रशस्ति-पत्र और वाग्देवी की प्रतिमा प्रदान की जाएगी। पुरस्कृत पांडुलिपि को भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित भी किया जाएगा। निर्णायक समिति के अन्य सदस्य थे- श्री मधुसूदन आनंद, श्री ओम निश्चल और श्री देवेन्द्र चौबे"
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आलोक ने पिछले दिनों बहुत झटके सहें है, आज मुझे लगा कि झटके सहें बिना लेखन नही हो सकता. गज़ल या शायरी में तो बाकायदा इसे एक तजुर्बे की तरह से नसीहत की तरह से कहा जाता है. ये पुरस्कार या सार्वजनिक स्वीकृति आलोक के लिए बहुत छोटी तरह का पुरस्कार है परन्तु जिस लगन से वह अपना ब्लॉग, जनसता से लेकर विभिन्न शैक्षिक -साहित्यिक पत्रिकाओं में लगातार सक्रीय रहकर लिखता रहा है वह सिर्फ प्रशंसा के काबिल नही बल्कि स्तुत्य और प्रेरणादायी है. मै मजाक में कहता हूँ - " हे मेरी नालायक औलाद, मास्टर हो, फुर्सत होती है और फिर पढ़ाना ही क्या है बच्चों को गल्प और बस - लिखोगे नही तो क्या करोगे और फिर काम क्या है तुम्हारे पास, इतनी दूर हो कि साला आना हो तो दस बीस हजार का तो हवाई टिकिट ही आ जाता है, मेरे जैसे माह में 28 दिन यात्रा करके लिखों तो जानूं " पर आज यह खबर जब पढ़ी तो मैंने आलोक से अभी लम्बी बात की और लगा कि जब अपने किसी का कुछ, कही भी पुरस्कृत होता है तो जो शान्ति और तसल्ली मिलती है - वह अकल्पनीय है. मेरे लिए यह किताब का छपना और पुरस्कार मानो खुद को बुकर या नोबल मिल जाने जैसा है. यह ख़ुशी शायद शब्दों में व्यक्त नही हो सकती. इस साल ने जाते जाते मुझे परम सुख दिया है.
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तीनों भाई विलक्षण है - मंझला राजीव दिल्ली में है नाटक कलाकार और लोक गायक है, जी करता है बस सुनते ही रहें और छोटे मियाँ रवि बाबू - जिन्हें पहलवानी का शौक है - शरीर सौष्ठव में सहरसा में सबसे आगे. आलोक - जाहिर है तीनों में सबसे बड़े है तो जिम्मेदारियां भी है और खुद भी बेहद संवेदनशील है घर परिवार समाज और रिश्तों को लेकर. हम दोनों ने अपने मुश्किल समय में घंटों बातें की है - संबल बनें है, एक दुसरे का और आज भी यही है सब. इस लड़के ने जीना सीखाया है बेख़ौफ़ और मस्त अलहदा सा जीवन - अभी जब यह सब लिख रहा हूँ तो बहुत भावुक हो गया हूँ और सिर्फ दिल से यही दुआएं निकल रही है कि मै तो बहुत कुछ लिखने - पढ़ने में कर नहीं पाया पर अब मेरी सारी उम्मीदें तुमसे है मेरे लाडले बच्चे और तुम वो फतह हासिल करो - जहां किसी ने कभी सोचा भी नही हो.
आलोक की वजह से मुझे बेहतरीन युवा दोस्त मिलें जो आलोक के ख़ास सर्किल में है - सुशील कृष्णेत, श्रीश पाठक, शरद, बलराम, अभिषेक सिंह खुशबू, श्रुति और ना जाने कौन कौन पर आज वे सब याद भी नही आ रहे बस आलोक का की किताब "सियाहत" जो करीब 180 के करीब पृष्ठों की लगभग होगी और एक जीवन यात्रा का वर्णन है. यह किताब मई जून तक आने की उम्मीद है.
गिरीश देख लो - "म्हारा छोरा किसी बड़े लेखक से कम है क्या?" मै और गिरीश अभी केरला जाने का कार्यक्रम बना ही रहे थे कि यह सुखद खबर आई है और अब इससे बेहतर क्या हो सकता है कि आलोक को खुद जाकर गले लगकर बधाई दी जाए और शुभाशिर्वादों की बरसात कर दी जाएँ. आलोक तुम भी आओ, देवास, भोपाल, होशंगाबाद जहां - जहां मै रहा यह खिलंदड बन्दा मेरे साथ मेरे दुःख बांटने हमेशा एक आवाज पर दौड़ा चला आया, क्या आपने ऐसा निश्छल और भोला स्नेह देखा है जो रक्त संबंधों से ज्यादा और पवित्र हो?
बहरहाल बधाई और अशेष शुभकामनाएं , तुम्हारे हिस्से में आकाश भर कीर्ति की पताकाएं आयें और किसी एक की छाँह में मै बैठा तुम्हे पढता रहूँ...........अब बहुत जीने की तमन्ना भी नही तुम स्थापित हो ही रहे हो आलोक............खुश रहो और खूब आगे बढ़ो

Tuesday, December 19, 2017

Posts of III Week Dec 2017


"मैं मोबाइल नही रखता" - मैंने कहा।
"अजीब आदमी हो तो सम्पर्क कैसे करूँगा" उसने भयभीत होकर पूछा
मैं बोलता रहा - "पता नही इन दिनों मैं खुद अपने संपर्क में नही हूँ और जिस दिन संपर्क होगा या तुम्हारी भाषा में कहूँ कि कवरेज में आऊंगा तो जग जाहिर हो जाऊंगा और वायवीय भी - इसलिए डरता हूँ। अपना मोबाइल मैं उस दिन गंगा किनारे घूमते हुए मणिकर्णिका घाट पर फेंक आया था और यकीन मानो मेरा सब कुछ तिरोहित और विलोपित हो गया। बैंक, संपर्क, मेरे खाते, मेरा नेटवर्क, रिश्तेदार, दोस्त और सबसे महत्वपूर्ण मेरे सारे पासवर्ड। अब मैं खुला हूँ और किसी भी तरह से आंकड़ों के जाल में उलझकर पासवर्ड्स की दुनिया को बोझ की तरह से जीना नही चाहता"
मैं चला आया हूँ वहां से अभी - उसे अचकचा सा छोड़कर और यहाँ इस उजाड़ में जहां धूप बहुत कम आती है, में नीम के नीचे हरी कच्च तीखी खुशबू वाली कच्ची निम्बोलियाँ ढूंढ रहा हूँ। विश्वास है कि कड़वाहट के भीतर भी फूल, बीज और अंत मे फ़ल आ ही जाते है अक्सर! बस उसी का इंतज़ार करूँगा, मौसम का क्या है गुजर ही जायेगा !!!

हरी घास पागलों की तरह हंस रही थी, जो कुछ दिनों बाद झुलसकर खत्म होने वाली थी।

पुस्तक मेले (मैले) की सुगबुगाहट होते ही हिन्दी के लेखकों का मन बल्ले बल्ले उछलने लगता है, पुरानी सड़ी - गली और ना बिकी किताबों का प्रचार करने लगते है, ऐरे गैरु - नथ्थू खैरे से प्रायोजित समीक्षा लिखवाकर यहाँ चेंपने का मौसम है कि लोग माने कि वाह गुरु क्या लिखा था और पूछे कि नई किताब कब आ रही है. लिखने की और टैग करने की गति द्रुत हो जाती है तीन ताल में निबद्ध होकर रोज लिखने लिखाने का पापड बड़ी उद्योग शुरू हो जाता है घर घर.
प्रकाशक नामक महानतम व्यक्ति और धुर्तराज अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से लेखक को फांसता है, किताबों के पृष्ठ यहाँ चेंपकर ग्राहक फंसाने का जुगाड़ करता है, दूर दूर के लेखक समझने के मुगालते पालने वालों के फोन नम्बर खोजकर हाल चाल लेता है और उन्हें दिल्ली में बलि का बकरा बनाने को आमंत्रित करता है. लेखकों को समझाता है कि तुम लिखो और तुम्हारी किताब मै रिकॉर्ड तोड़कर बेचूंगा और तुम्हे रोयल्टी दूंगा ; बाद में ससुरा हिसाब भी नहीं देता कि कितने बिकी या कहाँ खपी . यह कहकर वह साल भर के लिए गायब हो जाता है और फिर नवम्बर में निकल आता है कुकुर मुत्तों की तरह बदबू फैलाते हुए.
हे सखी सावन आयो की तर्ज पर यह मुगालतों का मौसम है और भैंसों के पाडे जनने का सर्द मौसम है. खैर बने रहें स्वप्न बस हिंदी का विकास हो और पढ़ने की संस्कृति बढे बस और कुछ नहीं चाहिए........

जो भी हो परिणाम 
पर सबको इससे सबक लेने की भयानक जरूरत है

पार्टियां, मीडिया, प्रशासन, चुनाव आयोग, सोशल मीडिया और मूर्ख उर्फ समझदार जनता को भी।
2017 जैसे अशुभ अंक वाले साल के अंत पर खड़े हम लोग यह भी समझे कि अगले बरस में उत्तर पूर्वी राज्यों में ही नही मप्र, राजस्थान, छग में भी चुनाव है और इशारों को समझने की जरूरत है।
अच्छी बात यह है कि डंडा सबको पड़ा है और जोरदार तमाचा भी बस इसे दिलेरी से स्वीकार कर आगे आना होगा, क्योकि अब भुलावे, वादों और जुमलों से काम नही चलेगा। अम्बानी, अडानी से लेकर उद्योगपतियों की चाटुकारी, दलाली और चापलूसी से सब वाकिफ हो गए है।
यह भी निहितार्थ है कि मंदिर, मस्जिद, धर्म, पाकिस्तान, गाय, गब्बर सिंह , बीफ , औरंगजेब या भरमाने वाले मुद्दों से कुछ होने वाला नही है।मुल्क की समस्याएं भिन्न है अगर यह समझ राजनेताओं की नही है तो मुआफ़ कीजिये आप लोग देश छोड़ दीजिए।
चुनावी मोड़ से बाहर आयें हम सब लोग और 2018 के संकल्प लें किसी के लिए नही बस अपने लिए।


Tuesday, December 5, 2017

Meeting Padmanabh Upadhyay at Banglore Airport on 5 Dec 2017 at 2 am.




रात को दो बजे के आसपास जब आप अकेले हो एयरपोर्ट पर एक फोन आये, साथ ही प्यार भरी एक मीठी सी जादू की झप्पी अपनत्व ,सम्मान और स्मृतियों के साथ मिलें और एक खूब बड़ी बढ़िया सी विदेशी चॉकलेट भी बोनस में - तो इससे बड़ी खुशी दुनिया में कोई हो सकती है क्या ?
पर दोस्ती की दुनिया मे ही यह सम्भव है। पदमनाभ उपाध्याय से परिचय फेसबुक के माध्यम से ही हुआ था। चित्रकूट के रहने वाले है। जब पढ़ रहे थे तो खूब बातचीत और फेसबुक पर वाद विवाद होता था। मजा आता था इस युवा होते किशोर के साथ वाद करने में। जब मैं लखनऊ में नौकरी करने गया तो एक बार हड़बड़ी में हम मिलें और खूब देर तक बातें करते रहें। बाद में कुछ गड़बड़ी में मेरे बहुत सारे दोस्त डिलीट हो गए थे - उनमें से एक ये भी थे। अभी बहुत मित्रो को खोज खोज कर जोड़ रहा हूँ क्योकि ये सब मेरी ताकत है। आज Prakalpa Sharma भी सौभाग्य से मिल गए।
आज अभी मेरा अपडेट देखकर पदमनाभ ने पूछा कि मैं भी एयरपोर्ट पर हूँ क्या मिलें, दुर्भाग्य से मैं अंदर लाउंज में आ गया था और ये बन्दा थाईलैंड, मकाऊ, हांगकांग की यात्रा कर लौटा था और बाहर हो गया था। दौड़कर पहुँचा मैं गेट पर और सुरक्षाकर्मियों से अनुरोध किया कि पांच मिनिट तो मिल लेने दें। वे तैयार हो गए तब हम मिलें, मजा आ गया सन 2012 के बाद यह आकस्मिक मुलाकात बहुत ही चौकानें वाली थी और बहुत ही भावुक भी। सुरक्षाकर्मी यह भरत मिलाप देखकर आश्चर्यचकित थे - उन्होंने पदमनाभ को अंदर आने दिया और दो मिनिट के बदले सात आठ मिनिट बातें करने दी हमें।
पदमनाभ आजकल पढ़ाई पूरी करके बैंगलोर में सिस्को में काम कर रहे है, मेरी तबियत का पूछा और बोले कि "ओह शुगर बढ़ी हुई है,मैं तो चॉकलेट लाया था भैया आपके लिए" मैंने कहा - "अरे भाड़ में गई शुगर तुम लाये हो तो दो" , वह दौड़कर ले आया और थमा दी हाथों में -यह सिर्फ एक चॉकलेट नही बल्कि एक मजबूत रिश्ते की पहचान है जो इस फेसबुक पर पिछले दस बारह वर्षों में विकसित हुआ है और अब स्थाई है। कौन मूर्ख कहते है कि फेसबुकिया दोस्ती, रिश्ते बेकार होते है। मुझे तो सबसे ज्यादा अपनत्व, भातृत्व और मानवीयता में यकीन करने वाले लोग - मित्र - साथी यही से मिलें है।
इसके दो भाई विदेश में है - एक शोध कर रहा है और दूसरा एम बी बी एस । माताजी चित्रकूट में दस वर्षों से राजनीति में सक्रिय है और समाज सेवा के काम जोश से करती रहती है।
ख़ुश रहो भाई, तुम्हारा गिफ्ट ड्यू रहा जो फरवरी में तुम्हे मिलेगा जब फिर आऊंगा लौटकर। आज तुम्हे इतना बड़ा, समझदार और जिम्मेदार देखकर मन बहुत भावुक है और दिल से सिर्फ दुआएँ ही निकल रही है।
बहुत स्नेह और दुआएँ तुम्हारे लिए लाड़ले भाई..... Padmanabh Upadhyay

Tuesday, November 21, 2017

"तुम्हारी सुलू" का टैक्स फ्री होना जरुरी 21 Nov 2017

"तुम्हारी सुलू" का टैक्स फ्री होना जरुरी
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कल जब फिल्म देखकर लौटे तो मनीष ने कहा कि घर चलकर एक कप चाय पीते है, इस ठन्डे मौसम में और बेहद ठंडी फिल्म देखकर एक कप चाय तो बनती है ना, घर जाते ही मनीष की पत्नी शक्ति ने ही जाते पूछा कि भैया फिल्म कैसी है "तुम्हारी सुलू", तो मै दो मिनिट के सोच में पड़ गया कि क्या कहूं.......
मेरी जानकारी में भारतीय फिल्म इतिहास में संभवतः पहली फिल्म होगी जिसमे एक भारतीय पत्नी पति को कहती है "सुनो पाँव दुःख रहे है , ज़रा दबा दो ना" और पति बनें मानव कौल बहुत सहज भाव से पत्नी के पैरों की हलके से मालिश करने लगते है. यह फिल्म का वह टर्निंग बिंदु है जो पूरी फिल्म का आगाज़ है और धीरे धीरे जेंडर, स्त्री अस्मिता, मायाजाल, बाजार, घर, परिवार, समाज, रिश्तेदारी, अपार्टमेन्ट की दुनिया, स्त्रियों का गिल्ट और स्त्री स्वतन्त्रता के बदलते मायने, रेडियो जैसे उपेक्षित माध्यम का एक ताकतवर माध्यम में उभरना और समाज के घटिया या निम्न वर्गीय चरित्रों का चित्रण आदि के बीच बच्चों की वाजिब चिंताएं और सरोकार को एक सूत्र में "बहुत आहिस्ते से अपनी पेस" पर चलती फिल्म है "तुम्हारी सुलू"
ऐसा नही कि यह स्त्री अस्मिता पर बनी पहली फिल्म है मुझे याद आती है फिल्म अनुराधा जहां एक डाक्टर अपने शोध की दीवानगी में पत्नी को लगातार उपेक्षित कर अपने काम में लगा रहता है और जब उसका सुपरवाईजर आता है काम को जांचने तो उसे घर आकर कुछ चित्र देखता है और उसकी पत्नी को गाना गाने को कहता है और फिर फिल्म अपना राग और ढर्रा बदलती है. यहाँ मुआमला थोड़ा अलग है, एक मध्यमवर्गीय छोटे से परिवार में जीवन की कशमकश है रोज की. यह परिवार अमूमन महानगरीय प्रवृत्ति का है पति पत्नी और एक बेटा पर एक बेटी कि तमन्ना है पर महंगाई और सिमित जगह के कारण हिम्मत नही कर पा रहे है. तिन कमरों का मल्टी में मकान है और छोटी सी गृहस्थी पत्नी के पिता और दो बड़ी बहनें है जो हर पल हर बात और निर्णय में टांग अडाने के लिए हरदम तैयार है, तीन बहनों में दो बैंक में और एक गृहिणी है जिसे हर पल ताने सुनाये जाते है और वह बगैर बोले चाय बनाकर परोस देती है इन सबको जो उसे लगातार उसकी काम पढाई का उलाहना देते रहते है. ऐसे में यह छोटी बहन जीवन में बेहद छोटी छोटी उपलब्धियों से खुश है जिसमे एल ई डी बल्ब से लेकर प्रेशर कूकर भी शामिल है जो बाजार की चालाकियों कि ओर इशारा करता है कि किस तरह से कम्पनियां दोपहर में घरों में लगभग फ्री रहने वाली महिलाओं को अपने जाल में फंसाकर अपना उल्लू सीधा करती है.
इस फिल्म में पति - पत्नी के बहुत सामान्य रिश्ते है जिसमे रोमांस भी मौसम की तरह ही उभरता है और जल्दी ठंडा होता है, अड़तीस चालीस की उम्र पर पहुंचे जोड़ों की असली हकीकत बताना निर्देशकीय सुझबुझ है , स्कूल में जाते और किशोर वय के बच्चों की मानसिकता को दर्शाया गया है जहां बच्चे सेक्स, फिल्म और अश्लीलता के प्रति जल्दी ही आकर्षित होते है और इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार है जाहिर है ऐसे में माँ बाप के पर्याप्त ध्यान देने के बाद भी बच्चे बिगड़ ही जाते है क्योकि यह दुनिया है ही ऐसी, स्कूल में प्राचार्य का माँ बाप को बुलाकर डाँटना और पत्नी को अपराध बोध होना या पति द्वारा करवाया जाना भी स्वाभाविक ही है और इस समय में पत्नी द्वारा भी इसे एक स्वयं का अपराध मान लेने का जो अभिनय विद्या ने किया है वह एक औसत भारतीय स्त्री की छबि को दर्शाने के लिए पर्याप्त है, पर एक समय आने पर वह फटती भी है और पूछती है क्या बच्चे की जिम्मेदारी सिर्फ मेरी है? ऐसे कुछ छोटे छोटे प्रसंगों से सुलू ना सिर्फ सवाल करती है बल्कि वह रेडियो जोकी जैसे व्यवसाय में रात्रिपाली की नौकरी करके पूरी व्यवस्था को भी चुनौती देती है.
रेडियो में नौकरी करना एक वैकल्पिक रोजगार और आजीविका का बड़ा क्षेत्र है इस बात को भी समझना जरूरी है जिसे प्रायः हमारी युवा पीढ़ी भूल रही है या उपेक्षा कर रही है इसी के साथ सुलू को लेने जो महिला ड्राईवर आती है वह भी एक नए प्रकार का प्रतीक है- देर रात में एक महिला ड्राईवर का लेने और छोड़ने आना वो भी एकल महिला ड्राईवर का वह बहुत बड़ा सन्देश है जसी शायद हम नगण्य मान लें पर यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव है बगैर शोर के किया गया संगठित प्रयास, और इसके लिए निर्देशक प्रशंसा के पात्र है. मुझे याद है मेरी मित्र और साथी मीनू वढेरा और राजेन्द्र बंधू दिल्ली और इंदौर में महिलाओं को वाहन चालन में प्रशिक्षित कर आजाद फाउंडेशन के माध्यम से अभी तक सैंकड़ों लड़कियों को रोजगार दिला चुके है. यह भी एक सार्थक सन्देश है इस फिल्म में . इसी के साथ तेजी से ग्लोबल होते जा रहे बाजार के दौर में छंटनी और कारपोरेट में विश्वस्त कर्मचारियों को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर बाहर निकालने की प्रक्रिया को बारीकी से दर्शाया गया है. ऐसे में विकल्पों की भी बात की गई है बशर्ते आप किसी काम को छोटा या बड़ा ना समझे .
आपकी सुलू फिल्म भारतीय फिल्मों में फार्मूलाबद्ध तो नहीं अपर रोचक संदेशों वाली एक अच्छी फिल्म है जसी परिवार के साथ देखा जा सकता है और स्त्री स्वतन्त्रता के नए बिम्ब और उभरते ट्रेंड्स को समझा जा सकता है. यह फिल्म युवा होती लड़कियों के लिए एक पाठ्यक्रम है और युवा लड़कों के लिए मानव कौल जैसे अभिनेता का पति के रोल का आदर्श देखना चाहिए जो बेहद कूल है . मेरी नजर में इस फिल्म को टैक्स फ्री किया जाना चाहिए ताकि आसानी से समाज के हर तबके का आदमी देख सकें. विद्या बालन से ज्यादा मुझे मानव ने प्रभावित किया क्योकि विद्या तो मंजी हुई कलाकार है ही परन्तु मानव कौल ने जो परिपक्वता मंच से उठाकर फ़िल्मी परदे पर रखी है वह अप्रतिम है, दो जोड़ी कपड़ों में - घर में काला चेक का पायजामा और बाहर फेक्ट्री का पिंक शर्ट पहनकर वे इतने स्वाभाविक है कि लगता ही नही कि उन्हें कुछ करना पडा होगा अभिनय जैसा. ऐसी फ़िल्में भारतीय समाज की धरोहर है जो परिवर्तन की कहानी बहुत धीमे से लिख रही है और लोगों के अन्दर एक चिंगारी पैदा कर रही है.

Friday, November 17, 2017

कवि कुँवर नारायण जी को सादर नमन विनम्र श्रद्धांजलि 16 नवम्बर 2017

हिंदी के महत्त्वपूर्ण और वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण हमारे बीच नहीं रहे। विनम्र श्रद्धांजलि।

जन्म : 19 सितम्बर 1927
अवसान : 15 नवम्बर 2017



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'कहीं कुछ भूल हो
कहीं कुछ चूक हो कुल लेनी देनी में
तो कभी भी इस तरफ़ आते जाते
अपना हिसाब कर लेना साफ़
ग़लती को कर देना मुआफ़
विश्वास बनाये रखना
कभी बंद नहीं होंगे दुनिया में
ईमान के ख़ाते।''

19 सितम्बर 1927 को जन्मे हिंदी के विलक्ष्ण कवि कुंवर नारायण का छः माह कोमा में रहने के बाद शान्ति से गुजर जाना स्तब्धकारी है. हिंदी कविता के एक मात्र ऐसे कवि है जो चेतना से लबरेज और मनुष्यता से परिपूर्ण है. मुक्तिबोध के युग के महत्वपूर्ण हिंदी के कुंवर नारायण जितने सहज जीवन में है उतने ही सहज कविता में भी है, उनकी कविता मनुष्य के जीवन की सरल कविता है जो अपने आसपास के शब्दों, बिम्ब और उपमाओं से भरकर वे एक ऐसा वितान रचते है मानो कवि ने शब्दों के भीतर ही थाह पा ली हो.
अपने संकलन वाजश्रवा के बहाने से चर्चा में आये इस कवि ने समकालीन हिंदी कविता में नये प्रयोग किये और कविता को बहुत बारीकी से बुनते हुए आम जन तक पहुंचाया, इसलिए कुंवर नारायण को मनुष्यता का कवि कहा गया. कुँवर नारायण हिंदी में उन बहुत थोड़े से कवियों में से थे जिन्हें महाकवि कहा जा सकता है। वे मुक्तिबोध युग की सबसे बड़ी आवाज़ों में से एक थे। अपने संस्कारों में रहते हुए भी एक विश्व नागरिक थे। जब उनकी चिता सजाई जा रही थी, ठीक उसी समय निज़ामुद्दीन की ओर से मग़रिब की नमाज़ की आवाज़ आ रही थी। कुँवर जी के लिए इससे अच्छी विदाई नहीं हो सकती थीअसद ज़ैदी का यह कहना बिलकुल सही है कि वे सच में महाकवि थे क्योकि उन्होंने दर्शन में उपनिषदों की और बौद्ध परमपरा दोनों को अपनी कविता में स्थान दिया और सूक्ष्म संवेदना के धरातल पर कविता रची. पिछले साथ वर्षों में उन्होंने ना मात्र बहुत पढ़ा बल्कि इतना लिखा कि हिंदी का साहित्य कभी उऋण नही हो पायेगा. हमारे सामने मुक्तिबोध जैसा काल से होड़ लेता हुआ कवि आता है जो मूल रूप से विद्रोही है और अपने क्लिष्ट बिम्ब और संरचना लेकर साहित्य का विपुल कनवास रचता है ठीक इसके विपरीत कुंवा र्नारायन जैसे कवि है जो बेहद सुकोमल हृदय के साथ कविता को अपना ओढना बिछाना करके हिंदी के लिए एक वृहद संसार तैयार करते है. दोनों मनुष्य ही है पर ज्ञानात्मक संवेदना के धनी, प्रेम और दार्शनिकता से भरपूर कवि हिंदी में कुंवर नारायण ही हुए है अगर यह कहा जाएँ तो अतिश्योक्ति नही होगी. वे अपने समय से परे जाकर बहुत साफ़ दृष्टि से विश्व फलक में घटित होने वाले अघ्तय को भी सामने लाते है जिसके लिए एक दृष्टि सम्पन्न होना जरुरी है और यह दृष्टि हमें उनके समकालीनों में कम देखने को मिलती है. इसलिए वे अपने काल को भी देखते है और कहते है अबकी लौटा तो वृहत्तर लौटूंगा / अगर बचा रहा तो / कृतज्ञतर लौटूंगा / अबकी बार लौटा तो / हताहत नहीं / सबके हिताहित को सोचता / पूर्णतर लौटूंगा। 15 नवम्बर को उनके निधन से हिंदी ने ना मात्र एक कवि खोया बल्कि एक दुस्साहस से सबको प्रेम कर जीने का सलीका सिखाने वाले व्यक्ति भी खोया है. जाना सबको है, उनकी भी उम्र हो चली थी, दुःख सिर्फ यह है कि एक बार वे आँखें खोल लेते और बहुत कह देते या कम से इतना कि कविता में क्या और होना बाकी है तो संभवतः हम समृद्ध  ही होते उनके आप्त्वचनों से. 

'.....एक शुभेच्छा की 
विघ्नहर विनायक छाया में 
अगर झुकते माथे जुड़ते हाथ 
तो उस जुड़ने को हम प्रेम कहते''

“ अमरत्व से थक चुकी
आकाश की अटूट उबासी
अकस्मात टूट कर
होना चाहती है
किसी मृत्यु के बाद की उदासी ! “

अबकी अगर लौटा तो 
हताहत नहीं 
सबके हिताहित को सोचता 
पूर्णतर लौटूंगा

"समय हमें कुछ भी 
अपने साथ ले जाने की अनुमति नहीं देता, 
पर अपने बाद 
अमूल्य कुछ छोड़ जाने का
पूरा अवसर देता है...."

अभी भी बचे हैं कुछ वर्ष।

आने जाने के उलटफेर में
कौन जाता है पहले, कौन बाद में -
कुछ पता नहीं ।

तुम्हारा इत्मीनान
और मेरी आशंका
दोनों ही निर्मूल हैं।

आओ, आयोजित करें तब तक
कौंधती बिजलियों की तीव्रता से
एक जीवनोत्सव और...।

फ़ोन की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया
दरवाज़े की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया
अलार्म की घंटी बजी
मैंने कहा- मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया
एक दिन
मौत की घंटी बजी...
हड़बड़ा कर उठ बैठा-
मैं हूँ... मैं हूँ... मैं हूँ..
मौत ने कहा-
करवट बदल कर सो जाओ।

अबकी बार लौटा तो
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अबकी बार लौटा तो 
बृहत्तर लौटूंगा 
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं 
कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं 
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को 
तरेर कर न देखूंगा उन्हें 
भूखी शेर-आँखों से 

अबकी बार लौटा तो 
मनुष्यतर लौटूंगा 
घर से निकलते 
सड़को पर चलते 
बसों पर चढ़ते 
ट्रेनें पकड़ते 
जगह बेजगह कुचला पड़ा 
पिद्दी-सा जानवर नहीं 

अगर बचा रहा तो 
कृतज्ञतर लौटूंगा 

अबकी बार लौटा तो 
हताहत नहीं 
सबके हिताहित को सोचता 
पूर्णतर लौटूंगा।

*****
"तुम्हारे शब्दों में यदि न कह सकूँ अपनी बात,
विधि-विहीन प्रार्थना
यदि तुम तक न पहुँचे तो
क्षमा कर देना,
मेरे उपहार--मेरे नैवेद्य--
समृद्धियों को छूते हुए
अर्पित होते रहे जिस ईश्वर को
वह यदि अस्पष्ट भी हो
तो ये प्रार्थनाएँ सच्ची हैं... इन्हें
अपनी पवित्रताओं से ठुकराना मत,
चुपचाप विसर्जित हो जाने देना 
समय पर... सूर्य पर..."

('आत्मजयी' से एक अंश)
(आज शाम साहित्य अकादेमी में कुँवर नारायण पर आयोजित शोक-सभा में प्रस्तुत वक्तव्यों के मुख्य अंश : )
"कुँवर नारायण हिंदी में उन बहुत थोड़े से कवियों में से थे जिन्हें महाकवि कहा जा सकता है। वे मुक्तिबोध युग की सबसे बड़ी आवाज़ों में से एक थे। अपने संस्कारों में रहते हुए भी एक विश्व नागरिक थे। जब उनकी चिता सजाई जा रही थी, ठीक उसी समय निज़ामुद्दीन की ओर से मग़रिब की नमाज़ की आवाज़ आ रही थी। कुँवर जी के लिए इससे अच्छी विदाई नहीं हो सकती थी।" (असद ज़ैदी)
"उनकी कविताएँ सीधे-सीधे व्यक्ति को, समाज को, दुनिया को संबोधित होती हैं; उनका सम्प्रेषण बहुत सहज है। कविताओं के अलावा अन्य कलाओं में उनकी दिलचस्पी का दायरा व्यापक था।" (प्रयाग शुक्ल)
"कुँवर जी हमारे समय में प्रेम और दार्शनिकता के सबसे बड़े कवि थे। मनुष्यता और नैतिकता उनका सबसे बड़ा दर्शन है। वे विश्व कविता की बिरादरी में शामिल हैं। बाज़ार को लेकर एक दार्शनिक विराग मिलता है उनमें।" (मंगलेश डबराल)
"आज जब हमारे जीवन में जल तत्त्व विरल हो रहा है, इनके और इनके परिवार वालों के पास बैठना एक विशाल शांत जलाशय के निकट बैठने जैसा लगता है। हमारे भाषिक पर्यावरण में जो क्षरण हो रहा है इसमें संतुलन के लिए वे जातीय स्मृति, इंडो-इस्लामिक और इंडो-यूरोपियन परम्पराओं के साथ संवाद कायम करने का प्रस्ताव रखते हैं।" (अनामिका)
"कुँवर जी की उदारता उत्तर-उदारवाद के दौर की उदारता है। वे मनुष्य की स्वायत्त चेतना के हिमायती हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि हम लगातार सिविलाइज़्ड होते जा रहे हैं। मैं उन्हें एक राजनीतिक कवि के रूप में पढ़ना चाहूँगी।" (सविता सिंह)
"वे एक आम आदमी की तरह इतिहास में जाते हैं, कोई विशेष मुद्रा बनाकर नहीं। लखनऊ स्थित उनका घर 'विष्णु कुटी' मेरे लिए एक विश्वविद्यालय की तरह था।" (विनोद भारद्वाज)
"कुँवर नारायण सम्पूर्णतः एक 'जेंटल मैन' थे। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो जब उनकी भौहें तनी हों। उनकी सदाशयता एक दुर्लभ गुण थी जो बहुत कम लोगों में दिखलाई पड़ती है।" (इन्द्रनाथ चौधुरी)
"शुरू से ही उनकी कविताओं में एक अंतरराष्ट्रीय ध्वनि सुनाई पड़ती है। उन्हें जितनी बार और जितनी तरह पढ़ा जाय, उतनी बार कुछ नई चीजें सामने आती हैं। वे विचारशील कवि के साथ-साथ एक विवेकवान कवि थे। ऐतिहासिक उपन्यासकार तो बहुत हुए हैं लेकिन ऐतिहासिक कवि केवल कुँवर नारायण ही हुए हैं।" (हरीश त्रिवेदी)
"समकालीन परिप्रेक्ष्य में वे एक ऐसे रचनाकार थे जो सामाजिक सरोकार को नैतिक ढंग से बहुत पारदर्शी होकर प्रकट करते थे। इतिहास के क्षेत्र में वे अतीत की वर्तमानता को मानते थे, उसे विगत नहीं मानते थे। पिछले 60 वर्षों का उनका काम मुक्तिबोध से थोड़ा भिन्न है लेकिन एक युग का निर्माण करता है।" (मुरली मनोहर प्रसाद सिंह)
"बड़ा शामक व्यक्तितव था उनका। बहुत पढ़े लिखे व्यक्ति थे। 'ज्ञानात्मक संवेदन' जिसे कहते हैं वैसे। उनका जो ज्ञान था उसे बहुत सहज रूप से व्यक्त किया है। वे बहुत ईमानदार कवि थे--अपने प्रति और अपने कविता के प्रति।" (विश्वनाथ त्रिपाठी)
"कुँवर जी का व्यक्तित्व सभी सीमाओं से परे था। उनके लिए 'न सीमाएँ न दूरियाँ' संज्ञा बिल्कुल सटीक है। भारत में ज्ञान की जो दो परम्पराएं हैं--उपनिषदों की परंपरा और बौद्ध परंपरा--कुँवर जी ने दोनों को आत्मसात करते हुए कविताएँ लिखी हैं। जो लोग विचार को कविता में ले आते हैं वे प्रायः संवेदना के सूख जाने पर ऐसा करते हैं। कुँवर जी में इन दोनों का संतुलन है।" (मैनेजर पांडेय)
"कुँवर जी के पास आप पन्द्रह मिनट भी बैठ जाइए; सज्जनता, शालीनता और सहजता; इन तीनों गुणों का अनुभव आपको होता। वे बेहद ईमानदार आदमी थे--अपने प्रति, जिनसे मिलते थे उनके प्रति और पूरे कायनात के प्रति। उनसे बात करने पर लगता कि बेहद पढ़े-लिखे लेकिन बेहद ही शीलवान व्यक्ति से बात कर रहे हैं। उनका असली मूल्यांकन अब शुरू होगा।" (निर्मला जैन)
"हमलोगों ने जब साहित्य में लिखना-पढ़ना शुरू किया तो कुँवर जी की कविताएँ हमारी चर्चा का केंद्रबिंदु होती थीं। हम सबको लगता था कि वे एक ऐसे दृष्टिसम्पन्न कवि हैं जो अपनी राह तो बना ही रहे हैं, दूसरों के लिए भी राह बनाते चल रहे हैं।" (गंगाप्रसाद विमल)
"कुमारजीव के बारे में हिंदी का कोई कवि लिखेगा, यह तो कोई सोच ही नहीं सकता था। आपसी बातचीत में उन्होंने कभी भी किसी कवि की निंदा नहीं की। कुँवर जी के बारे में सदाशयता की बात कोई अतिशयोक्ति नहीं है। कौन ऐसा समकालीन कवि है जो 'आत्मजयी' लिखे, 'वाजश्रवा के बहाने' लिखे और 'कुमारजीव' भी लिखे! 'अपूरणीय' शब्द का सटीक प्रयोग कुँवर नारायण जी के लिए ही हो सकता है।" (विश्वनाथ प्रसाद तिवारी)

"कुँवर नारायण अपनी सृजनधर्मिता के कारण केवल समकालीन रचनाकारों के प्रति ही नहीं, बल्कि परवर्ती पीढ़ी के लिए भी अनुकरणीय रहे। उनका पूरा कृतित्व भारतीय साहित्य की परंपरा में एक जीवन्त उपस्थिति की तरह है।" (साहित्य अकादेमी का शोक-प्रस्ताव)