Saturday, November 26, 2016

लेपटॉप बाबा के आश्रम "कबीर कुल" में पत्रकार Navodit Shaktavat



लेपटॉप बाबा के आश्रम "कबीर कुल" में पत्रकार Navodit Saktawat
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भाषा और समझ के स्तर पर पत्रकार होना और व्यक्ति, भाषा, दुनियावी समझ के साथ धर्म, राजनीति और व्यवहार के स्तर पर पत्रकार होना एकदम भिन्न है। संगीत की अदभुत जानकारी, माइकल जैक्सन से लेकर कर्कश कुमार उर्फ किशोर कुमार , लता मंगेशकर और बाकी सबके बारे में तर्क और विश्लेषण करने वाले नवोदित इन दिनों इंदौर में काम कर रहे है। जीवन की दूसरी नौकरी करने वाले इस युवा की दुनिया, साहित्य और मीडिया को लेकर गहरी पैठ और समझ है। वे कहते है कि बार बार नौकरी बदलना भी एक तरह का प्रोफेशनल प्रोसटीट्यूशन है इसलिए बारह साल भास्कर में काम किया और अब नईदुनिया जागरण में संतुलन बनाकर नौकरी कर रहे है।
पिछले तीन चार वर्षों से इस आभासी दुनिया में दोस्ती थी पर मिलना आज हुआ जब वो घर आये और बहुत तसल्ली से देर तक अनुभव बाँटते रहे बतियाते रहे। राजनीति पर आकर बातचीत ख़त्म तो नही पर आगे मिलने और विस्तृत विश्लेषण के वादे पर रुकी। जाते समय मेरे कमरे की तारीफ़ इतनी की और फोटो खींचे कि मैं लगभग शर्मिंदा हो गया और इतना ही कहा कि अपनी जरूरतों का सामान भर है और जैसे तैसे सफाई कर लेता हूँ कभी खुद कभी किसी की मदद से बाकि तो कुछ लक्ज़री नही है। पर नवोदित को यह "कबीर कुल" अच्छा लगा, मैंने भी कह दिया जब मन करें यहां आ जाना यह जगह सबके लिए है और आओगे तो अच्छा लगेगा। आज हम दोनों ने अपने कार्य क्षेत्र से लेकर निजी जीवन के दुख दर्द भी बांटे तो समझ आया कि हम सब लोग बहुत संघर्ष कर आये है और शायद हम अब सोचते है तो विश्वास भी नही होता कि ये सब दास्ताँ इतनी पीड़ादायी थी और फिर भी हम कर गुजरे।

शुक्रिया नवोदित, जो तुमने जो कहा था याद रहेगा कि हम कमजोर के साथ पूरी विनम्रता के साथ है हमेशा, पर अक्खड़, गंवार, चतुर और धूर्त को जब तक ध्वस्त ना कर देंगे तब तक चैन से नही रहेंगे। राजनीति में लोग कभी अच्छे हो ही नही सकते - चाहें ये हो या वो और हमें दो खराब में से थोड़े बेहतर को चुनना है, बस - बाकि सबका कोई अर्थ नही है, इसलिए हम जहां है वही से उसके साथ खड़े हो जो उपेक्षित और दुखियारा है और सबके जुल्मों का मारा है।

Thursday, November 24, 2016

Waseem, Karmuram and Super - Three Successful Cases of Changing Chhatisgarh


Waseem and CG state 


राशिद बस सर्विस, अम्बिकापुर और बलरामपुर, अभी उन्नीस बरस के हुए वसीम के वालिद की है - जो गैरेज भी चलाते है, और बसों के साथ अन्य कई कारोबार भी है। वसीम ने बी ए पहला वर्ष पास होने के बाद पढ़ाई छोड़ दी और बसों का काम देखने लगे, रोज 500 किमी तक बस के साथ आते जाते है और चोखा हिसाब रखते है। " आधा रुपया थानों और आर टी ओ में बंट जाता है" वसीम कहते है।
बस के साथ अगरबत्ती के प्रोडक्शन का काम भी देखते है थोक का, जब मैंने कहा कि अगरबत्ती तो बोला अल्लाह ने बुतपरस्ती को मना किया है ना कि धंधा करने को, गलत काम नही करता बस, ब्याज नही लेता मैं। नोट बन्द होने के क्या असर है पूछा तो कहते है नोट बन्द होना ठीक है, पर बड़े लोग तो पहले ही सेटिंग कर चुके है और अब आम लोगों को दिक्कत है, बस में हम आदिवासी लोगों को बिठा नही पा रहे, क्या करें ना छुट्टे है - ना बड़े नोट। बाजार से चिल्लर भी गायब है अब तो आदमी क्या करें अब।
वसीम कहते है छग में अगला चुनाव भाजपा ही जीतेगी क्योकि यदि जोगी को तीस और कांग्रेस को तीस वोट मिलेंगे और भाजपा वाले को चालीस भी मिले तो सरकार बन ही जायेगी ना जैसे छोटी लड़ाइयों में 31 वोट से मोदी जी मुखिया बन गए और अब अपनी वाली चला रहे है। जोगी वोट काटेगा और अब हर जगह घूम - घूमकर वो अपनी पार्टी बड़ी कर रहा है। " हाँ 2019 में मैं पहली बार वोट दूंगा तब जरूर सोचूंगा कि मेरा जेब खर्च बंद कर दिया था मोदी जी ने, वालिद साहब अब सौ रूपये नहीं देते और शाम को दोस्तों को समोसे नही खिला पाता और सब बचते है राजश्री खिलाने से भी, साले दोस्त भी कंजूस हो गए है पर क्या करें खुल्ले पैसे नही है और गांधी चौक वाला चौरसिया भी उधार नही दे रहा अब" !!!
वसीम को अब छग में मज़ा नही आ रहा , बोर हो गया है - वह दिल्ली, मुम्बई और नाशिक देखना चाहता है और जब खूब सारे सौ-सौ के नोट जमा हो जाएंगे तो लंदन और अफ्रीका में जाकर क्रिकेट मैच देखने की इच्छा है।
अल्लाह हाफ़िज़ कहकर वह विदा हो गया, हाँ बोला - अगली बार आओ तो मेरे घर आना, मटन बिरियानी मेरी माँ बहुत अच्छी बनाती है। मैने कहा " इंशा अल्लाह जल्दी ही आता हूँ, खूब सारे सौ के नोट लेकर "

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Karmuram and His Zeal to fight 

करमुराम जी 65 बरस के है, जब लक्ष्मणगढ़ में था उदयपुर ब्लॉक, जिला सरगुजा, छग के तो, इन्हें लाठी के साथ जाते हुए देखा। इन्होंने राम राम की तो मैं रुक गया और इनकी उम्र देखकर मैंने कहा कि दादा इस गाँव का नाम लक्ष्मणगढ़ क्यों है, तो बोले क्या है कि यहां से थोड़ी दूर रामगढ़ का जिला है जिसके अब " भग्नावशेष" ही मिलेंगे, जाहिर है लक्ष्मणगढ़ पास होना ही था।
मुझे करंट लग गया क्योकि एक दूरस्थ आदिवासी गाँव में इतनी साफगोई और उच्च हिंदी ! करमुराम जी हंसने लगे बोले बेटा चौको मत, मैं पुराने जमाने की ग्यारहवीं पास हूँ और अपने जमाने का अपने गाँव का सर्वाधिक शिक्षित।
मैं नतमस्तक हो गया और बात करने लगा , उन्होंने कहा कि आजकल हम अनावृष्टि और अतिवृष्टि से परेशान है और सरकार यद्यपि अच्छा काम कर रही है पर किसान और आदिवासी हाशिये पर है। वे कहने लगे कि सरकार ने हर 1 किमी पर प्राथमिक, 3 किमी पर माध्यमिक और 10 किमी पर हाई स्कूल बना दिए है, धीरे से जागृति आ रही है, स्ट्रक्चर बन गए है, कल शिक्षा भी आ जायेगी और हालात बदलेंगे।
उफ़, मैं पागल हो रहा था और वे बोले जा रहे थे कि हम बिंझिया आदिवासी है कुल मिलाकर यहां 90 बिंझिया आदिवासी परिवार है पर हमें आरक्षण नही मिलता सो लड़ रहा हूँ - डा रमन सिंह एक बार गजट नोटिफिकेशन कर दें तो बिंझिया जो रायपुर, बलौदा बाजार, सूरजपुर , कोरबा में बसे है, को नौकरी का लाभ मिलने लगेगा। अगर नही माना तो हाई कोर्ट जाऊंगा या माननीय सुप्रीम कोर्ट में।
बेहोश होते होते बचा मैं। उफ़ क्या आदमी था जीवंत और जीवन से भरा हुआ, ज्ञान और दुनियादारी से समृद्ध - जिसने अपने बचपन में गाँव से उदयपुर तक रोज बीस किमी पैदल चलकर शिक्षा पूरी की।
क्या सच में हमे अभी भी बाहरी रोल मॉडल ढूंढने है और किसी नेता की जरुरत है।
सलाम और बहुत सारी दुआएँ।
जो मित्र पूछते है कि मैं इतनी शुगर, ब्लड प्रेशर, फ्रोजन शोल्डर के बाद कैसे घूम लेता हूँ - तो मैं कहता हूँ मेरी ताकत तो करमुराम, बैतूल की महिला कुली दुर्गा या ऐसे सारे मित्र है जो संघर्ष कर नई दुनिया बसाने की जिद में है इस नारे के साथ कि
लड़ेंगे , जीतेंगे !

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Super, the young enthusiastic Bega boy of Teliyapani

सुपर
जी हां, सुपर नाम है इस युवा का, जो मराडोबरा गाँव का रहने वाला है, पंडरिया (कवर्धा) से ऊपर पहाड़ पर बसे गाँव का यह सुपर बारहवीं के बाद पढ़ना चाहता है और खूब मेहनत करके बैगा समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करना चाहता है।
इसका नाम पिताजी ने रखा था, यह मजाक में कह रहा था कि शायद वे पलायन पर कही गये रहे होंगे और शहरों की सुपर चाय पसन्द आई होगी तो मेरे जन्म पर मेरा नाम ही सुपर रख दिया, बहरहाल, गजब के उत्साह और जोश से भरे है ये युवा और अब इन्हें राजनीति भी समझ आ रही है और शिक्षा का महत्व भी।
सुपर ने कहा कि "अबकि बार बस बदलना है" पूछने पर क्या तो हौले से मुस्कुरा दिया और बोला बस इंतज़ार करिये बस बदलना है ! मै भी मुस्कुरा दिया और मैंने कहा बदलो यार बहुत साल हो गए !!!

Demonetization यानी नोट बंदी पर कुछ फूटकर नोट्स



50 % काली कमाई को आयकर विभाग में जमा करो सुबह 11 बजे जाकर, प्रमाणपत्र लो
250 रूपये में मॉल के पी वी आर में राष्ट्रगीत सुनकर "सैयाजी से ब्रेक अप कर लिया" " मैं कमली हो गयी यार" "जग घूमिया थारे जैसा ना कोई" टाइप गाने का लुत्फ़ उठाओ डेढ़ बजे
घर लौटो दो चार कुत्तों को कुचलते हुए और लाईंन में खड़े टुच्चे नागरिकों को देखते हुए शाम को
सच कहता हूँ एकदम राष्ट्रभक्त टाइप फीलिंग आती है भगवान कसम रात को
थ्री चीयर्स फॉर सरकार राज !!!

29/XI/16

आमात्य जी
जी महामात्य ?
ये काला धन 50-50 तर्ज पर इकठ्ठा कर रहे हो क्या राम मंदिर बनवाया जा रहा है ?
महामात्य, सीमा में रहे और चुपचाप अपना बुढ़ापा काटें, फ़ालतू बात ना करें आप लोग, अंदर जाईये, पूज्य अम्बानी जी और अडानी जी उष्ण पेय पर अर्थ और अर्थ नीति की चर्चा करने आते ही होंगे, मुझे राजधर्म का पालन करने दें।

रघुकुल रीत, राम और एक वचन की बात करने वाले इतनी बार रोज बदलेंगे कि खुद को भी याद नही रहता कि क्या कहा था थोड़ी देर पहले। और यह 50 - 50 का बंटवारा किसी ठग या दलाल से कम है क्या और एक लोक कल्याणकारी राज्य में कितनी बेशर्मी से और किस मुंह से यह लागू कर रहे है ? यार संविधान खत्म कर दो साला टंटा ही खत्म, हम जैसे लोग मान लेंगे कि अबकि बार धंधेबाज सरकार। वैसे भी देश बेच ही दिया है अपने दामादों को, रॉबर्ट वाड्रा ने तो एनसीआर और हरियाना में जमीन हथियाई थी आप तो देश ले बैठे हो माई बाप !!!

हम अपने किशोरों, युवाओं और शोधार्थियों को इस तरह की चार सौ बीसी करके क्या शिक्षा दे रहे है, क्या मूल्य स्थापित कर रहे है। मनमोहन सिंह ने तो खुलेपन की नीति में देश का सोना गिरवी रख दिया था और आज हमारी चुनी हुई सरकार और हमने देश के मूल्य, ईमानदारी और न्याय बेच दिया। बार बार राम और रघुकुल रीत में वचन की दुहाई देने वाले रोज़ बदले ही नही वरन् धूर्तता से देश में ऐसी परम्परा डाल दी कि अब हम कभी अपने किशोरों, युवा और बच्चों को नैतिकता और ईमानदारी की बात नही कर पाएंगे।

हम हमेशा से व्यापारियों को गलियाते आये है पर सरकार से बड़ा व्यापारी कोई नही हो सकता। सिर्फ इस सरकार की बात नही इतिहास उठाकर देख लें। इन्होंने सिर्फ खुलकर दिखा दिया कि ये काले धन को सरकारी तरीक़े से सफ़ेद करके देंगे क्योकि कोई और फायदा उठाये इससे बेहतर है कि खुद ही धंधा करें और कमाई करें, और पूरी बेशर्मी से अपने इरादे जाहिर कर दिए है और अब क्रियान्वित भी कर रहे है। बस यही बात इन्हें भारत के इतिहास में सबसे धूर्त सरकार कहा जा सकता है।

50% in 50 DAYS
Good Going Sarkar Raj

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वादे भूला दे कसम तोड़ दे वो 

हालत पे अपनी हमे छोड़ दे वो

*नोट बदलने का काम ठीक से इसलिए नहीं हो पा रहा है, क्योंकि इसमें अध्यापकों को नहीं लगाया गया है....*
चुनाव,
जनगणना,
पशुगणना,
पेड़गणना,

मकानगणना,
पल्स पोलियो,
नसबंदी.....
जैसे हर राष्ट्रीय अभियानों में हमारी सेवा सरकार ने ली है लेकिन इस बार हमें याद ही नहीं किया गया...


*बेइज्ज़ती टाइप फीलिंग आ रही है....*
शिक्षक/अध्यापक/ गुरूजी संघ

भक्तों को अब विपश्यना में जाना चाहिए ताकि वे "सेल्फ हीलिंग" से थोड़े ठीक हो सकें, कुतर्कों की सीमा और देशप्रेम में इतने बड़े वाले हो गए है कि उन्हें अपने खुद के अस्तित्व में होने, इंसान होने या परिवार या वृहद समुदाय का हिस्सा होने का भी भान नही है।
ईश्वर इन सब मृतात्माओं को गहरी शान्ति दें ।
ॐ शान्ति !!!


22 जुलाई को गुम हुए विमान का क्या हुआ ?
देश के जे एन यू में अध्ययनरत युवा नजीब का क्या हुआ?
पेटीएम करूँ ?


पिछले डेढ़ माह से सफर में हूँ और याद नही पड़ता कि किसी भी जगह ढंग से लगातार नेट कवरेज तो दूर, मोबाइल का कवरेज भी मिला हो। दूरस्थ इलाकों में सुधीर चौधरी और रजत शर्मा को देखा नही तो मनोरंजन से भी वंचित रहा और देश गान भी नही सुना
पे टी एम करो
क्या खाक नेट बैंकिंग करूँ, जाते समय जो पांच कड़क सौ के पत्ते मित्र Chandrakant Goure ने इंदौर में पकड़ाये थे उसे अपने खाते से जोड़ भी नही पाया हूँ क्योकि नेट नही, स्पीड नही और देश बदल रहा है, भक्त कहते है !

जियो क्यों बेचा , अब समझे ठाकुर
घर से, दूकान से, परिवार से, देश से और अब उस इमारत से जिसकी देहरी को चूमा था !
कब तक भागोगे ठाकुर ?
(सन् 2019 में निर्मित होने वाली सुपर फ्लॉप फिल्म शोले का डायलॉग)

जो हमने दास्ताँ अपनी सुनाई 
आप क्यों रोये

किसी देश में एक जमींदार था जो अपनी जहागिरदारी में किसी मुश्किल के आने पर रो देता था और इस तरह वह अपनी प्रजा की नजरों में जमींदारी अगली बारी के लिए सेट कर लेता था।
(पाषाण युग के सिंधु घाटी सभ्यता से निकली मुग़ल कालीन कथा)

जब अकबर की प्रजा राजमुद्रा बन्द होने से दुखी हुई और त्राहि त्राहि मची तो अकबर ने पूछा अपने सभी नवरत्न और बीरबल से तो सबने कहा राजन एक सर्वे करवा लो, अकबर तैयार हो गया।
बीरबल ने ऐसी प्रश्नावली बनाई कि उसके जवाब भरने से अकबर भी खुश, प्रजा भी खुश और नवरत्न भी खुश, क्योकि जवाब अकबर के पक्ष में ही थे और कोई नकारात्मक जवाब दे ही नही सकता था। बस दुखी तो सिर्फ मेहनतकश थे जो दिन में मजदूरी के बदले राजकोष के सामने खड़े असहाय थे और घर में रोज मौत देख रहे थे।
(पाषाण युग में सिंधु घाटी से निकले देश में मुगल बादशाहों की परती परिकथा)
8 नवम्बर को ही तुरंत लिखा था कि यह डूबते बैंकों को और सरकार के खजाने से खाली मुद्रा को बचाने या समेटने की कोशिश है।
आखिर टेटली ने अभी स्वीकार किया है। और यह भी कहा कि इससे गरीबी दूर होगी यह तर्क मुझ मूर्ख को समझ नही आया।

इनकम टैक्स
सेल्स टैक्स
आई बी 
कोषालय 
कलेक्टर्स

सतर्कता विभाग
सीबीआई
भ्रष्टाचार नियामक आयोग
लोकायुक्त
पुलिस 
बैंक्स
विभागों की अपनी निगरानी समितियां 
आदि .....


एक जरूरी सवाल आप से माननीय प्रधानमंत्री जी -
ये सब क्या कर रहे थे जब लोग करोड़ों रूपये इकट्ठे कर रहे थे, तिजोरियां भर रहे थे और मार्केट में लाखों करोडो अरबों का लेन देन हो रहा था शेयर बाजार से, हवाले से और सराफा बाजारों से । आज आपकी पुलिस रास्तों पर गाड़ियां रोककर चेकिंग कर रही है, लोग माँ गंगा में नोट बहा रहे है, और ठंड में अलाव जला रहे है जब आपने यह कड़ा निर्णय लिया। इतने साल का हिसाब छोड़िए वे तो भ्रष्ट थे ही पर आपके ढाई साल में , आपके राज्यों में जहां मुख्यमंत्रियों के खातों में दस दस करोड़ जमा हो रहे थे तो ये सब होनहार क्या आरती में या यज्ञ में व्यस्त थे ?
इसका स्पष्ट अर्थ है कि ये सारे विभाग मदमस्त सफ़ेद हाथी है, मक्कार है , देश द्रोही है और सत्तर बरसों में अपना काम मुस्तैदी से नही किया है और सिर्फ मुफ्त की तनख्वाह खाये है बल्कि जिस अंदाज़ में लोगों के घरों से नोटों की गड्डियां निकल रही है उसका एक हिस्सा भी इन विभागों ने हड़पा है।
प्रधानमंत्री जी आपने बढ़िया काम किया, अब जरा हिम्मत हो तो कांग्रेस शासनकाल में पलें इन विभागों के हरामखोर कर्मचारियों से भी निपटें और हिसाब लें, साथ ही और थोड़ी हिम्मत जुटा लें तो ये सब बन्द कर दें और सरकार का और हमारे टेक्स का रुपया देश हित में बचा लें। या फिर इनके काम और तनख्वाह को पुनर्परिभाषित करें स्पष्टता से ।
भक्तों को बुरा भला ना लगे इसलिए पहले पढ़े इसे फिर ही कमेंट करें वरना तो प्रणाम है ही आपको 

मेरे घर की परंपरा और महान हिन्दू संस्कृति के अनुसार मेरे घर आँगन में उगी हुई तुलसी की मुझे शादी करनी है। बैंक से निवेदन है कि मेरे अकाउंट से ढाई लाख नगदी भुगतान करने का कष्ट करें।
पंछी बाई डडसेना
ये तेलिया पानी, पंडरिया, जिला कवर्धा छग में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता है। तेलिया पानी जमीन से 1400 फुट ऊंचा और पंडरिया से 50 किमी दूर है। कोई भक्त जाएगा, किसी में हिम्मत है तो आये यहां, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ।
यह अब तैयारी करेगी कि नेट बैंकिंग सीखे क्योकि सरकार अब सारा काम नेट से करने जा रही है, यह दीगर बात है कि इसके यहां मोबाइल कवरेज भी बड़ी मुश्किल से मिलता है, गाँव में बिजली सोलर से शाम को सात से सुबह पांच बजे तक मात्र तीन खम्बों पर ही मिलती है, पानी है नही पहाड़ पर और ऊपर से इसकी और आंगनवाड़ी वाले बच्चे, जो ज्यादातर कुपोषित है, की खाद्य सुरक्षा भी नही है। अंग्रेजी तो दूर हिंदी भी मुश्किल से बोल समझ पाती है ये।
मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया के बारे में इसने सुना नही है जब पूछा तो औचक सी देखने लगी यह। 500 और 1000 के नोट बन्द हो गए है इसे खबर नही 50 किमी नीचे उतर कर यह तेल, नमक और राशन लेने पैदल आती है।
नए स्वर्णिम युग में इसका स्वागत है।

हमारे कामरेड्स कहाँ है सड़कों पर या कांग्रेस मुख्यालय में चेंज करवा रहे है। 60 साल कांग्रेस के पल्लू से बंधे रहे गिरगिटों की तरह और सिंगुर, नांदीग्राम में असली रंग दिखाया, और अब गायब है ।
कामरेड का कोट कहानी याद आ रही है !


कुपोषण से निपट नही सकते
एक प्रवेश परीक्षा करवा नही सकते भ्रष्टाचार के बिना
सबको संडास में बैठा नही सकते
पीने का पानी नही दे सकते
सड़क नही बनवा सकते
अपराध रोक नही सकते
मोबाइल टॉवर का कवरेज नही ठीक करवा सकते
सबको शिक्षा नही दे सकते
सबको स्वास्थ्य सुविधा नही दे सकते
कांग्रेस को कोसना बन्द नही कर सकते ढाई साल में
पर
सबको नेट बैंकिंग सिखाएंगे और ई ट्रांजेक्शन करवाएंगे 
गजब की समझ और जमीनी पकड़ है माई बाप !!!


जिस देश में लोगों को बच्चों को पोलियो का ड्राप पिलाने को घर घर जाना पड़ता हो, जिस देश में शौचालय बनाने के लिए सरकार को हमारी मेहनत के रूपये देश के लोगों को सबसीडी के रूप में देना पड़े और हगना सीखाना पड़े, जिस देश में बैंक का फ़ार्म या पोस्ट ऑफिस का फॉर्म भरने को बाबू दस बीस रुपया गटक लें आप उस देश में लोगों को इ ट्रांजेक्शन, नेट बैंकिंग और ऑनलाइन काम सीखाना चाहते है, कमाल है आपकी भारत को लेकर क्या समझ है और क्या पकड़ है जमीनी मुद्दों और हकीकतों की और उनसे उम्मीद करते है कि लोग यह सब कर लेंगे .यदि हाँ तो आपसे बड़ा वाला कोई नहीं है श्रीमान जी......

कितने शर्म की बात है कि देशभक्ति और राष्ट्र प्रेम ऐसे लोग सिखा रहे है जिनकी इंटीग्रीटी संदेहास्पद है और इतिहास गवाह है कि ये वो लोग है जो ना स्वतन्त्रता आन्दोलन में शरीक हुए, ना सत्तर सालों में कभी आम गरीबों के साथ हुए. चोर - उचक्के, मवाली किस्म के धंधेबाज लोग जो चवन्नी अठन्नी के लिए आम आदमी के कपडे उतार लिए और अपने घर भर लिए वे लोग आज हमें देश प्रेम सिखा रहे है, धिक्कार है तुम लोगों पर और मजेदार यह है कि ये कमीने खुद भी लाइन में नहीं खड़े है और अन्दर से सांठ गाँठ करके अभी भी तिजोरी भर लिए है.

अबकि बार बस बदलना है
10 दिन में व्यवस्था सुधरी नही है और देशवासी त्रस्त हो गए है। सरकार होती कौन है मेरे ही रूपये पर कब्जा करने वाली, निकम्मी निठल्ली व्यवस्था और तानाशाह के होते देश के लोग सड़कों पर परेशान है और इन भ्रष्ट लोगों ने कार्पोरेट्स के कर्ज माफ कर दिए, देश के कमीने कार्पोरेट्स इनके दामाद है जिनके लिए मेरे जैसे आम आदमी को पिछले आठ दिनों से परेशान होना पड़ रहा है ?
इतने दिनों में जब ये रुपया ए टी एम में नही डाल पा रहे तो बचे हुए 40 दिनों में क्या खाक कर लेंगे, कितनी और मौतों का इंतज़ार है साहब को अभी और कितना हमे बर्बाद करके कार्पोरेट्स को देश से भगवाने में मदद करोगे ?
कमाल की बात है सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति स्वतः संज्ञान ना लेकर चुप है और एक तानाशाह ने देश को मात्र ढाई साल में सड़क पर ला दिया !

ज्यादातर दोष राजा के नही उसके सिपहसालारों के होते है और ये रत्न जड़ित नगीने हर राज्य में , हर जगह और हर कालखंड में होते है, इसलिए राजा को कोसा जाना ठीक नही, हाँ इसके लिए राजा को दोषी मानना इसलिए उचित है क्योंकि वह उस गर्दभ सभा में शीश झुकाकर अपनी महत्वकांक्षा को पूरा करने को और अमर होने की प्रक्रिया में सब कुछ कर गुजरने को सहर्ष तैयार हो जाता है।

जितनी बकैती बैठक के बाद चैनल्स और अधिकारी कर रहे है, उसका असर जमीन पर दिख नही रहा। जो भी हो, बैंक्स ने बड़े हरामी कर्जदारों से वसूली करना दूर, नाम बताना दूर पर अपनी कंगाली दूर कर ली है। 
भाण्ड और बकैत बयान उगल रहे है, नौटंकीबाज सक्रीय है, मीडिया को पन्ने भरने को मसाला मिल गया है पर हम भारत के लोग संविधान के दायरों में रहकर भी हैरान, त्रस्त और संताप में है। राष्ट्र भक्ति के उन्माद में डूबे लोगों की मति मारी गयी है और किसी में हिम्मत नही कि कह दें कि राजा ....


समान आचार संहिता, एक के बदले दस सिर, राम मंदिर, 15 लाख में 500 और 1000 के नोट बदलना कही नही था भिया
याद दिला रहा हूँ

मेरी मेहनत की कमाई और उसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने वालों की निंदा करता हूँ। ये होते कौन है मेरे जीवन के फैसले लेने वाले। मेरे रूपये पर लगा बैन उठाओ और होश में आओ, अगर तुम्हारे बैंक और एटीएम मेरा रुपया नही दे सकते तो तुमसे बड़ा निकम्मा कोई नही है।

ये दांव महंगा पड़ेगा ठाकुर 
याद रखना

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता वर्ष 1990 के बाद एर्नाकुलम जिला साक्षर घोषित हुआ था, फिर तो होड़ लग गयी थी साक्षर बनने की और इस तरह से सभी जिले साक्षर घोषित हो गए - देश शिक्षित और साक्षर है अब।
अब होड़ है खुले में शौच से मुक्त जिले बनने की, देखते जाईये सभी जिले जल्दी ही मुक्त हो जाएंगे। हरदा, इंदौर से लेकर सब इस प्रतिस्पर्धा में शामिल है !
हमारे परिवक्व, होनहार, सशक्त गिरगिटवतार और दिमागी क्रीम मतलब ब्यूरोक्रेट्स इस भारत को खुले में शौच से मुक्त करवाकर ही मानेंगे।अब दो हजार के नोट पर भी स्वच्छ भारत का स्वर्णिम चश्मा आ गया है तो फिर देर किस बात की !
अग्रिम बधाई देशवासियों।
Very nice apparent Eye Wash cum Face Lift to clean up Pak, Surgical attack, Rafel deals, Simi encounter and many more things, indeed the best move . This is how a Politician should deal & manage things like public, corporates, Shivraj, Raman singh and other budding prospective PMs 
थोड़ा पीछे जाएँ, रघु राजन के रहते यह सब नही हो सकता था, इसलिए उनके साथ आख़िरी में विवाद होते रहे।
अंत में अम्बानी के जीजा ने यह प्रस्ताव माना होगा, और ज्वाइन करते ही तैयारी शुरू की होगी क्योंकि लंबी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है, ₹2000 का नोट जो जी पी एस से युक्त है इतनी बड़ी मात्रा में छापने और कम्प्यूटराइज करने में समय तो लगा होगा।
निश्चित ही इसमें एक बड़ा मानव संसाधन लगा होगा जो बेहद गुप्त तरीके से काम कर रहा होगा और सरकार के वित्त मंत्री या कुछ और लोग ही इसमें शामिल होंगे , ने भी गोपनीयता बरती है।

अब सवाल यह है कि 8 नवम्बर की रात्रि का समय ही क्यों चुना गया मोदी जी के द्वारा, दूसरा बाईस बिलियन के नोट एकदम रद्दी हो गये । कागज, पर्यावरण, मानव श्रम और व्यवस्थागत नुकसान की कल्पना ही बेमानी है।
थोड़ा और इंतज़ार करिये, पेन्डौरा बॉक्स अभी खुला ही है....

समझिये, आपको कैश जमा कराना है अपने अकाउंट में, फिर आप सिर्फ दो हजार ही रोज निकाल पाएंगें। मतलब यदि मैं 100000 जमा कराता हूँ परसों तो मुझे पचास दिन चाहिए 2000 रोज निकालने को। अर्थात सरकार के पास 1 से 49 दिनों के लिए मेरा रूपया सुरक्षित है और सरकार उस पर ब्याज़ कमा लेगी। अगर देवास शहर में चार लाख लोग है और पांच हजार रुपया लोग जमा करते है तो कितना नगद सरकार के पास हो जाएगा। इस तरह से मुद्रा की कमी दूर होगी और विदेशी मुद्रा का जुगाड़ होगा और आर्थिक हाजमा सुधरेगा।
मुझे लगता है देश में विदेशी मुद्रा का भयानक संकट है और इसके लिए यह सब किया गया है, देश के छोटे खुदरा व्यापारी और लोग सडकों पर होंगे । देर रात किये गए इस बदलाव की घोषणा से जो अफरा तफरी मची है वह बहुत चिंताजनक है और सत्तासीन पार्टी को यह भुगतना पड़े हो सकता है पर आम लोगों के लिए यह फायदे मन्द हो पाए। 
मोदी सरकार का निर्णय प्रशंसनीय जरूर है पर क्या हमारे बैंक और बाकी संस्थाएं यह सब क्राईसिस मैनेजमेंट के लिए सक्षम है और क्या हमारे पास ₹100 के नोट पर्याप्त मात्रा में है ? देवास में रहने से करेंसी के प्रकाशन का ज्ञान है, सो इसलिए इसकी विकरालता को समझ सकता हूँ।


एक जरूरी कविता- जो पढ़ी जाना चाहिए
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पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आये,
मैं चुप था, क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था ।
फिर वे ट्रेड यूनियनिस्टों के लिए आये,
मैं चुप था, क्योंकि मैं ट्रेड यूनियनिस्ट नहीं था ।
फिर वे यहूदियों के लिए आये,
मैं चुप था, क्योंकि मैं यहूदी नहीं था ।
अंत में वे मेरे लिए आये,
और मेरे लिए बोलने वाला कोई नहीं था ।
- मार्टिन नीमोलर


Tuesday, November 1, 2016

मध्य प्रदेश स्थापना दिवस 1 नवम्बर, लोकतंत्र और 1 नवम्बर की पोस्ट्स



यह आस्थाओं, विश्वासों और मूल्यों के चूक जाने का विक्षप्त समय है जहां लोकतंत्र में मुझे अपने ही मत और मत देने के अधिकार पर अब शक शुबहा होने लगा है और मैं कुछ बेहतर या किसी से थोड़ा ठीक मानकर सरकार को चिन्हित करता हूँ, लोग चुनकर आते है, संविधान की कसम खाते है जो कहता है कि जाति, धर्म, उम्र और लिंग के आधार पर भेदभाव रहित समता मूलक समाज के निर्माण के लिए जनता के चुने प्रतिनिधि कार्य करेंगे और वैज्ञानिक चेतना के प्रसार में संविधान के दायरे में रहकर यथा कार्य, न्याय पालिका और विधायिका को सशक्त करने ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

पर अब मेरी जब से यह समझ बनी है कि सरकार, संविधान और लोक क्या है, पंथ निरपेक्षता क्या है - तब से सारी प्रक्रियाओं पर से विश्वास उठ सा गया है। एक ओर मेरा देश है जो करोड़ो साल पुराना सुसंस्कृत और ज्ञान विज्ञान से भरपूर है वही कोलम्बस के द्वारा खोजा गया अमेरिका है या दूसरे छोटे देश है जहां लोकतंत्र में इतना खुलापन, पारदर्शिता और धैर्य है कि हरेक नागरिक को कम से कम अपनी बात कहने सुनने की पूरी आजादी है।
चुनाव में हमने नोटा का भी प्रयोग करके देखा, राइट टू कॉल बेक का भी विकल्प खोजा - परंतु हम आगे बढ़ नही पाये है, यह बेहद दुखद है।
अगली बार मुझे किसी भी ऐसी प्रक्रिया में जाने से पहले सोचना भी होगा और शायद मैं अपने आपको हर जगह से विथड्रा भी कर लूं क्योकि नक्कारखाने में तूती की आवाज का अब कोई अर्थ भी नही है। बहुत धीर गम्भीर होकर यह बात मैं अपने आपको समझाने की कोशिश कर रहा हूँ, देखिये कहाँ तक हो पाता है।

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दरअसल में पार्टियों के अन्दर इतना ज्यादा प्रतिस्पर्धी माहौल हो गया है कि बने रहने के लिए, आने वाले चुनावों में अपनी कुर्सी सुरक्षित रखने के लिए हरेक को जो प्रयास करना पड़ रहे है वह बेहद चिंतनीय है और प्रमोशन तो दूर की बात यही पद और प्रतिष्ठा भी (यदि अगली बार सरकार बनती है तो) बनी रहें तो भी बड़ी बात होगी. इस तारतम्य में सभी के लिए अपने आका और पार्टी सुप्रीमो के सामने किसी भी तरह से बने रहना है और इसके लिए आज जब सत्ता हाथ में है, तन्त्र और ताकत हाथ में है तो वे कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार है और कहते है ना "कुछ भी करेगा" और इस खेल को हम लोकतंत्र के अदने से पिछलग्गू लोग देश के कमोबेश हर क्षेत्र में, राज्य में और पार्टी में देख रहे है, दुर्भाग्य तो सिर्फ इतना है कि लोकतंत्र में चुनने वाले इसके लिए बलि के बकरे बन रहे है नीचे से ऊपर तक और दाए से बाए तक बाकी तो सब ठीक ही है और सब चलता है. आज एक पार्टी और नेता को दूसरी पार्टी या नेता से उतना खतरा नहीं है जितना उसे अपने अन्दर के बेहद करीबी, विश्वासु - जिज्ञासु और निष्ठावान लोगों से है इसलिए वे बेहद शातिराना तरीके से सारे ताने बाने बुन रहे है. आप मुलायम -अखिलेश से लेकर तमाम तरह के नेताओं के आचार - व्यवहार और इन दिनों का आचरण देखकर इस सरल सी बात को समझ सकते है और इसके बाद अपना स्यापा बंद कर सकते है. बहुत सारे मित्र कह रहे है कि ताजा घटनाओं पर कुछ लिखो कुछ लिखो पर मेरी अल्प बुद्धि में तो यही समझ आया, सो लिख दिया बाकी आप लोग ज्ञानी ध्यानी है.

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"दो आँखे बारह हाथ"
क्या फिल्म है, गजब ....
और वो प्रार्थना जो फ़िल्मी इतिहास में गाई गयी तीन श्रेष्ठ प्रार्थनाओं में से एक है --------

हे मालिक तेरे बन्दे हम ऐसे हो हमारे करम
बाकी दो प्रार्थनाएं है ......
हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें (गुड्डी फिल्म से)
इतनी शक्ति हमे देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना (अंकुश)

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1 नवम्बर मप्र का स्थापना दिवस है। यशस्वी मन्त्रीमण्डल, यशस्वी राज्यपाल, यशस्वी अधिकारी और यशस्वी मीडिया के पैरोकारों को दिल से बधाई कि सच में इन सबके श्रम से हमारा एम पी अजब है सबसे गजब है।
दशहरे पर एक बहादुर महिला आय ए एस ने खुलेआम दिन दहाड़े खण्डवा में ही - जो सिमी का गढ़ है, में बंदूकें दागी थी और सरकारी शस्त्रागार का पूजन कायम करके शानदार परंपरा को जारी रखा और जीर्णोद्धार किया, और दीपावली पर एक आय पी एस के कुशल नेतृत्व में कल असुरों का संहार किया।
प्रदेश के नव नियुक्त मुख्य सचिव भी आज चार्ज लेंगे विधिवत और उनसे हम सब गरीब लोगों और प्रजाजनों की आशा है कि वे इसी तरह से ब्यूरोक्रेसी को चुस्त दुरुस्त और तंदुरस्त रखें।

आने वाले 2018 के चुनाव में हमारे यशस्वी मुख्यमंत्री का ताज बना रहें और वे उत्तरोत्तर प्रगति करें। मप्र के निवासी जो प्रदेश, देश और विदेश में फैले है, उन सभी इन्वेस्टर्स को जो सालों से यहां इन्वेस्ट करके प्रदेश का भाग्य संवार दिए है को और आप सबको जो हमारे हितैषी है, लख लख बधाईयां और अशेष शुभकामनाएं।
आमीन !