Monday, October 31, 2016

Diwali 30 Oct 2016


मैं मरूंगा सुखी
मैंने जीवन की धज्जियां उड़ाई हैं.
- अज्ञेय

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जिस अंदाज में देवास जैसे छोटे से कस्बे में पटाखों की गूँज है और रोशनी की जगमगाहट है उससे लगता नही कि मैं एक औसत मध्यम वर्गीय लोगों और प्रायः रूपये का रोना रोने वालों के बीच रहता हूँ और अब मुझे फिर से औद्योगिक क्षेत्र की समाप्ति के बाद उजड़े शहर में गरीबी, बेचारगी, बेरोजगारी, बाज़ार, मालरहित कस्बाई मानसिकता और अभाव जैसे शब्दो को परिभाषित करना होगा।
समझ नही आता कि रुपया आता कहाँ से कैसे है और कहाँ और क्यों जा रहा है बावजूद इसके कि यह कस्बा आज भी औसत जीवन जीता है और लगभग हर घर किसी ना किसी ऋण की किश्तें चुकाते हुए, हाँफते हुए साँसों के सफर में आगे बढ़ने की दौड़ में शामिल है।

पिछले 48 वर्षों में पहली बार मुझे यह एहसास हुआ है तो लगता है कि मैं गलत हूँ, देश सच में बदला है और लोग खुश है, तरक्की पर है और उन्नति कर रहे है। गलत मूल्यांकन करने के लिए मैं खुद दोषी हूँ, कल 30 करोड़ का सोना बिका इस कस्बे में अखबार आज दहाड़ रहे थे और वुडलैंड से लेकर रेड चीफ और सारे ब्रांड बेचने वाले मित्र खुश है कि माल खप गया है।
देश के कार्बन डेटिंग में भी अब हम हिस्सा बंटा सकते है क्योंकि अभी देख रहा हूँ तो दूर दूर तक आसमान में सिर्फ धुंआ ही दिख रहा है, ध्वनि प्रदूषण में भी हम देवासी सबसे आगे हो सकते है आज, कल इतना कचरा होगा कि सुबह हजार दस हजार लोगों की टीम को नगर निगम स्वच्छ भारत फंड से एक हफ्ते का काम दे सकती है। मुझे गर्व की अनुभूति है कि इस तरह से हम रोजगार का निर्माण कर रहे है।
सच में मैं बहुत खुश हूँ और इस तरह की खुशी अब देवास जिले के 1068 गांवो में देखने को ज़िंदा रहना चाहता हूँ । शायद वहाँ भी ये गूँज सुनाई दे रही हो, मित्र मुझे अपडेट करें।
आमीन !
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पुराने घाव अगर कही हो तो सबको चुकता करके रिश्तों की नई बही बनाओ और प्यार के इंद्राज करके अपना बेलेन्स बढाओ, जीवन की आपाधापी में वैसे ही हर कोई त्रस्त है, तनाव में है और अगर हमारी दोस्ती और भरपूर स्नेह से दो पल मुस्कुरा भी लें तो और क्या चाहिए।
किसी व्यापारी की भांति पुराना उधार बराबर कर लें , जी भर कर कोस लें मुझे और कल से फिर प्यार मुहब्बत और दोस्ती का नया खाता खोले।
यही दीवाली है मेरी और यही पैगाम देना चाहता हूँ आज के इस दिन पर।
आप सबको, मित्रों और परिजनों को मंगलमय दीवाली की मुबारकबाद और दिल से बहुत सारी प्यार भरी शुभकामनाएं।

Friday, October 28, 2016

Rest in Peace Dr BK Pasi, You will be Remembered Always


नमन डा बी के पासी

सन 1991-92 का साल था , एम ए अंग्रेज़ी में करने के बाद कुछ और पढ़ा जाए इस बात की इच्छा थी लिहाजा सोचा कि पीएच डी करने में तो समय लगेगा क्यों ना एम फिल कर लिया जाए, इंदौर के देवी अहिल्या विवि में थोड़ा परिचय था, स्याग भाई ( डा रामनारायण स्याग ) ने ताजा ताजा शोध पूरा किया था और शिक्षा विभाग में अक्सर आना जाना होता था, देवास की मीना बुद्धिसागर उन दिनों वहा शोध के लिए पंजीकृत हुई ही थी, डा उमेश वशिष्ठ, डा सुशील त्यागी, डा छाया गोयल और डा देवराज गोयल से परिचय था ही, सो सोचा कि क्यों ना यहाँ कुछ पढाई की संभावनाएं टटोली जाएँ. सीधा जाकर डा बी के पासी से मिला तो उन्होंने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा क्या करेगा अब पढ़कर और इतना अच्छा काम कर रहा है तो अब क्या करना है फिर मैंने जिद की तो उन्होंने कहा कि थोड़ा ठहर जा मै एक नया पाठ्यक्रम शुरू कर रहा हूँ भविष्य अध्ययन मान्यता के लिए प्रकरण यु जी सी गया है आते ही सूचना करूंगा.


बात आई गयी हो गयी, एक दिन बैतूल में गया हुआ था एक शिक्षक प्रशिक्षण में था तो डा पासी का फोन घर पहुंचा और कहा कि तुरंत मिलने को बुलाया है. मै आते ही विवि के शिक्षा विभाग में चला गया तो डा पासी ने कहा कि बोल कोर्स करना है, स्वीकृति आ गयी है. डा पी के साहू, इसके प्रभारी होंगे डा दास सह प्रभारी, डा पाल और प्रभाकर मिश्र के साथ सुशील त्यागी, उमेश वशिष्ठ आदि भी पढ़ाएंगे, और मै समय समय पर पढ़ने आया करूंगा, मैंने कहा आप पढने आयेंगे, तो बोले हाँ भाई, मै तो अभी भी सीख रहा हूँ और तुम लोग शिक्षा को जमीन पर उतार रहे हो और मै यहाँ एक कमरे में बैठा रहता हूँ और सबको डांटता रहता हूँ तो काम कैसे चलेगा, और अब सीखूंगा तुम लोगों से. प्रवेश प्रक्रिया होने के बाद पता चला कि इस पाठ्यक्रम में कई लोग थे देश भर के विवि से प्राध्यापक, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और भी ढेरों - नया विषय था और डा पासी का नाम और वे भी खूब समय देते थे. उन्ही दिनों उन्होंने इसी विभाग में बच्चों के लिए लड़ झगड़कर एक स्कूल चालू किया था, AVRC लेकर आये थे, अकादमिक स्टाफ कॉलेज को नया रूप देने में लगे थे. खूब देर तक शाम तक बैठे रहते थे और सबको प्यार से बिठाकर काम करवा लेते थे.
डा पासी एक विलक्षण व्यक्ति थे जो चंडीगढ़ के पंजाब विवि के एडवांस शिक्षा केंद्र में सबसे छोटी उम्र में सीधे प्रोफ़ेसर बनने वाले देश के संभवतः पहले व्यक्ति थे मात्र 23 या 25 बरस की उम्र में, माईक्रोटीचिंग को लेकर उनका काम पूरी दुनिया में अनूठा और अदभुत था.उनके निर्देशन में इसी विषय और इसके पहलूओं पर देश भर के बल्कि दुनियाभर के शोधार्थियों ने अपना शोध कार्य पूरा किया. मेरे साथ साधना खोचे, प्रभा निगम, गुलाब बोरकर और कई साथी थे. मैंने एम फिल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करके देवी अहिल्या विवि में सिल्वर मैडल प्राप्त किया.
बाद में डा पासी के साथ आदिवासी शिक्षा पद्धति को लेकर अपना शोध कार्य भी आरम्भ किया था दो तीन अध्याय भी लिखा गए थे, परन्तु उस समय देवी अहिल्या विवि के कुलपति बनने की होड़ में डा उमराव सिंह चौधरी और डा शोभा वैद्य से उनकी सार्वजनिक लड़ाई हुई और मीडिया में बहुत बुरी तरह से यह लड़ाई उछली जोकि एक पूरी प्रक्रिया का दुखद पहलू था. उन्होंने कभी डा चौधरी और डा शोभा वैद्य का जिक्र नही किया अपने लेक्चर में और ना कभी असम्मान किया जब अपने शोध के दौरान एक बार उनसे मिलने दिल्ली उनके घर गया था जब वे इग्नू में थे तो बोले यार ये विश्व विद्यालयों की राजनीति ही होती है और फिर मेरी शोभा से लड़ाई थोड़े ही है ना उमराव सिंह से वो तो भला आदमी एडवांस लिबरल स्टडी का विभाग चला रहा है और देर रात तक सबको बुला बुलाकर पढाता रहता है , अब भला बताईये जो लड़ाई इतनी ओछी हो गयी थी और मीडिया में हद से गुजर गयी थी वही वे इतने सम्मानजनक तरीके से अपनी बात रखते थे. प्रवर को भी कभी इसमें आने नहीं दिया ना सुभाषिनी जी को. बाद में डा पासी इग्नू में चले गए, फिर थाईलैंड, और फिर साक्षरता अभियान में पर बाद में वे लगातार व्यथित रहें और फॉर काम के लिए इंदौर नहीं आ सके. मेरा शोध कार्य मैंने छोड़ दिया डा साहू भी कोटा चले गए, डा गोयल बड़ौदा, और उमेश भाई लखनउ. असल में मेरे पास उनकी स्मृतियाँ इतनी है कि भाषा कुंद हो गयी है, व्यथित हूँ और बहुत बेचैन. उनका होना हम सबके लिए बड़ी धास्ती था और सम्बल पर अब सिर्फ स्मृतियाँ शेष है.
इधर उनकी तबियत की खबर लगातार मिल रही थी उनके मेघावी पुत्र, जो इंदौर के प्रसिद्द न्युरोलोगिस्ट है डा प्रवर पासी से भी बीच में बात हुई थी, Subhashini Passii जी, जो उनकी धर्म पत्नी है, से भी फेस बुक पर खबर मिलती रहती थी पर मिल नहीं पाया. एक दो बार कोशिश की तो पता चला वे इलाज के लिए दिली गए हुए थे.
कल खबर लगी और आज अग्रज डा उमेश वशिष्ठ, जो आजकल लखनऊ विवि में शिक्षा विभाग के हेड है, की पोस्ट से भी पता चला तो बहुत दुःख हुआ. इंदौर के शिक्षा विभाग को सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस बनाने का शपूरा श्रेय डा पासी और उनके नवोन्मेषी विचारों को जाता है, आज उनके विद्यार्थी पूरी दुनिया मे परचम फैला रहे है, देवी अहिल्या विवि के इस केंद्र, जो भंवर कुआं पर है, में ही उनके छात्र है जो इस विभाग को नित नई उंचाईयों पर ले जा रहे है. हमने जो भी शिक्षा शास्त्र में सीखा उसमे डा बी के पासी का बहुत बड़ा योगदान है.



डा बी के पासी को श्रद्धा पूर्वक नमन, और पूरे परिवार को यह दुःख सहने की शक्ति मिलें यह प्रार्थनाएं है.




Saturday, October 1, 2016

Posts of Sept_16 last week. Ranchi Raipur Teafe, of Priyank Patel and Friends of Raipur


सहिया यानी आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को गाँव में बहुत सम्मान है क्योकि वो गर्भवती और धात्री महिलाओं के साथ बच्चों का ख्याल रखती है और आधी रात को भी गाँव के लोगों की मदद करने को तैयार रहती है, गाँव की महिलाओं के साथ ये गा रही है स्वागत गीत हमारे लिए जिसका अर्थ है कि गाँव में कोई अतिथि आया है, हमारे जंगल, चारों ओर उग रहा धान का नवान्न और दूर तक फैले हुए पत्थर जो हमारे गाँव की सुरक्षा करते है, बांस के झूमते पेड़ और इक्का दुक्का महुए के पेड़, हमारे सारे जानवरों के साथ सूअर भी स्वागतातुर है - जो हमारे गाँव के लोहार पालते है, सभी फ़लों के साथ हमारे गाँव का नींबू जिसकी विशेष प्रजाति है - ये बहुत बड़े है और पक रहे है और हमारे बच्चों को देने से वे खटाई खाकर अन्न पचाते है, ये नीम, पीपल, बरगद और बबूल के पेड़ जो हमारे गाँव की शान है और मेड़ों पर उग रहे छोटे छोटे पौधे जो साक्षी है हमारी सभ्यता के कि सब उगता है और एक समय के बाद नष्ट होता है क्योंकि नया आने के लिए पुरानों को खत्म होना होता है और बड़े पेड़ों को स्थायी बनाने के लिए ये पौधे कुर्बानी देते है - एक मौसम में नन्हे से रंग बिरंगी फूल उगाकर खत्म हो जाते है, जिन्हें कोई शायद ही चिन्हित कर पाता हो, सब मिलकर स्वागत कर रहे है।

कोई शिकायत नही किसी को, गाँव में बारहवीं पास सिर्फ एक युवा है, एक जितेंद्र है जो दसवीं पढ़ रहा है और बहुत आदर से पूछकर मेरा फोटो लेता है और फिर पूछता है क्या शहर में सुविधाएं हमारे गाँव से ज्यादा होती है, वह पूछता है कि क्या हमारे गाँव में कभी रेल आ सकती है, हम लोग देखना चाहते है और उसमें बैठना चाहते है क्योंकि गाँव के लोग जब मुम्बई या दिल्ली या इलाहाबाद के पास शंकरगढ़ की पहाड़ियों पर ईंट भट्टों पर काम करने जाते है तो वे कहते है कि दो पटरियां रात भर में रेल को कहाँ से कहाँ छोड़ आती है।

ये है झारखंड के मुंडा आदिवासी और परम्परा। आज भी राज्य में लगभग 38 प्रकार की लोकभाषा बोली और समझी जाती है, 30 से ज्यादा लोकभाषाओं में पत्रिकाएं निकल रही है, खरीदी और पढ़ी जा रही है और तेजी से बढ़ते कार्पोरेट्स और उद्योगों के बाद भी लोग सहज और स्नेही है।

मैं शहर में रहता हूँ पर इनमें से एक भी गुण नही मुझमे, कितना पिछड़ा हूँ मैं - इतनी उच्च शिक्षा, शोध, संस्कृति और संस्कार प्राप्त करने के बाद भी।

मुझे लगता है 48 वर्ष की उम्र तक क्या किया मैंने ?


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डुलमी गाँव, खूंटी, झारखंड का दूरस्थ ग्राम जहां हम लोग है और सुबह पहुंचे है। जाते ही गाँव की कांकड़ पर मुंडा आदिवासी इकठ्ठे है और ढोल लेकर हमारा स्वागत करने को बेताब। हमे पवित्र नदी के पानी से भरे एक पीतल के लोटे से एक बड़े से भीगे पत्ते से पानी छिटकर हमारा स्वागत किया गया और फिर हमें स्थानीय मुंडारी भाषा के गीत में डुबोकर और प्यार में भिगोकर गाँव के अंदर ले जाया गया। बेहद सीधे और सहज लोग अपनी बात शुरू करते है और बताते है कि कैसे वे बच्चों और गर्भवती महिलाओं की देखभाल करते है, कोई बच्चा कुपोषित नही दिख रहा यहां, एकजुट का काम दिख रहा है जमीन पर ।

हमें कुर्सी पर बिठाकर पानी दिया गया। आश्चर्य यह था कि पानी गर्म था, पूछने पर हमें सहिया यानी आशा ने बताया कि आप लोग दूर से आये है, दूसरी जगहों का पानी पीते हुए, यहां का पानी आपको तकलीफ दे सकता है इसलिए हम गर्म पानी दे रहे है ताकि आपको कोई बीमारी ना हो, और अगर कोई बीमार पड़ गया तो हमारे गाँव की बदनामी होगी और हम नही चाहते कि कोई हमारे गाँव को कोसे और अतिथि बीमार पड़े क्योकि अतिथि तो सच में भगवान होते है।

और मैं सोच रहा था कि हम पढ़े लिखे समझदार है, सभ्य और सुसंस्कृत है , गजब के भोले लोग है यहां और पूर्ण वैज्ञानिक मानसिकता से परिपूर्ण।

हम तो घर में कोई आता है तो ये बारीकी वाली बात ध्यान नही रखते , कितना पिछड़ा हूँ मैं और कितना सीखना है मुझे अभी 
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जगजीत कौर की आवाज में सुने यह अदभुत गीत

तुम अपना रंजो गम अपनी परेशानी मुझे दे दो
तुम्हे उनकी कसम इस दिल की वीरानी मुझे दे दो ।

ये माना मैं किसी काबिल नहीं हूँ इन निगाहों मे
बुरा क्या है अगर ये दुःख ये हैरानी मुझे दे दो ।

मैं देखूं तो सही दुनिया तुम्हे कैसे सताती है
कोई दिन के लिए अपनी निगेहबानी मुझे दे दो ।

वो दिल जो मैंने माँगा था मगर गैरों ने पाया था
बड़ी शै है अगर उसकी पशेमानी मुझे दे दो ।

- साहिर
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उफ़, ये नज्म ....
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राजेंद्र नाथ 'रहबर' की एक बेहतरीन नज़्म-
तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुए खत मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे
जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाए रखा
जिनको इक उम्र कलेजे से लगाए रखा
दीन जिनको, जिन्हे ईमान बनाए रखा
तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे
जिनका हर लफ़्ज़ मुझे याद था पानी की तरह
याद थे जो मुझको जो पैगामे ज़बानी की तरह
मुझको प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह
तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे
तूने दुनिया की निगाहों से जो बचकर लिखे
सालहा साल मेरे नाम बराबर लिखे
कभी दिन में तो कभी रात को उठकर लिखे
तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे
प्यार में डूबे हुए खत मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे
तेरे खत मैं आज गंगा में बहा आया हूं
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूं...
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नुक्कड़ टेफे - रूमानी ख्यालातों की जमीनी हकीकत


"Tea is the answer to most of our Problems"
एक अदभुत प्रयोग Priyank Patel का 


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आज बहुत बड़े विश्वास के साथ लौट रहा हूँ, किस मिट्टी के बने है ये युवा, अदभुत और अप्रतिम कार्य और सबसे अच्छा कि इस टेफे में काम करने वाले सभी युवा मूक और बधिर है जिन्हें प्रियंक ने कड़े प्रशिक्षण और प्यार से सींचा है। रायपुर शहर में इन मूक बधिर युवाओं को 4500 से लेकर 10000 ₹ प्रतिमाह मिल रहे है जो निश्चित ही बड़ा काम है। रायपुर के श्रेष्ठ लोग आप यहां देख सकते है टेफे में जो चाय की चुस्कियों के साथ कुछ खाते हुए लूडो, कैरम या कुछ खेल खेल रहे होते है। यदि आप रिसेप्शन पर अपना मोबाइल जमा करा दें जब तक आप टेफे में है तब तक के लिए तो आपको 10% छूट मिलेगी क्योकि आप अपने दोस्तों के साथ आये है तो बात करिये मोबाईल तो लगा ही है अपने प्राणों के साथ चौबीसों घण्टे पर यहां बात कीजिये घर परिवार देश समाज और अपनी !!!
साल भर कई प्रकार के कार्यक्रम चलते है यहां - जो रायपुर शहर के दो जगहों - पंडरी और समता नगर, पर संचालित टेफे में होते रहते है। प्रियंक ने बताया कि अब वो थर्ड जेंडर के लोगों को साथ रखते हुए "अनुवाणी"टेफे खोल रहे है जहाँ चाय कॉफ़ी के साथ किताबें भी होंगी।
वैभव, आलोक से लेकर जितने भी युवा साथी थे उन्होंने कहा कि कविता हमे जोड़ती है। इस दिन दिल्ली से गोपाल शून्य और वर्षा भी मौजूद थे। गोपाल कार्टूनिस्ट है और इन दिनों छग में कार्टून बनाने आये हुए है। पहली बार मित्र हेमंत पाणिग्रही Hemant Panigrahi से मिला जिनसे फोन पर सन 2005 से बातें कर रहा हूँ। हेमंत बस्तर से है और निर्भीक , जुझारू पत्रकार है। दुनिया कितनी गोल और छोटी है और प्यारी भी, सब लोग अच्छे होते है यह विश्वास बार - बार पुख्ता होता है, साथ ही मेरे जैसे बदमाश भी हर जगह पहुंच जाते है यह भी !!!!
ये शाम इसलिए ख़ास थी कि हरदा में अजय विमल और विष्णु, Ajay PanditVimal Jat ,Vishnu Prasad Jaiswal, केसला में संदीप महतो Sandeep Mehto पांढुर्ना में एक युवा साथी, देवास में अमित दुबे कुछ नई सोच के साथ युवाओं को समझकर युवाओं के लिए पांचवा स्थान बनाने के लिए प्रयत्नशील है वही हर्षल खानविलकर Harshal Khanwilkar ने सुदूर उड़ीसा में काम शुरू कर दिया है, डूंगरपुर में Bedant Mishra Samar शिक्षा में गजब का काम कर रहे है, ऐसे में प्रियंक और उनके जोशीले साथियों को इस तरह से काम करते देख बहुत ही खुशी हुई और नई उमंग से दिल भर आया। प्रभावित हुआ हूँ और एक बार फिर लग रहा है कि सारे घटाटोप में ये लोग उम्मीद की किरण है।
आप रायपुर आये और इन दोस्तों से ना मिले तो जीवन व्यर्थ जान लीजिए।
Love and respect you all guys, stay blessed. I am sure we will be able to create V space and do some great work for society, my only request to you all is Stay Connected as well.