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Posts of 7 to 9 Sept 16



Teji Grover हिंदी की वरिष्ठ कवियत्री है और बहुत संवेदनशील भी। प्रेमचंद सृजन पीठ उज्जैन पर रहते हमने देवास में उनके रचना पाठ किये है।
हाल ही में हिंदी कविता में छद्म बनाम असली कविता की एक बहस छिड़ी है जिसमे अविनाश मिश्र जैसे तथाकथित कुआलोचक ने बहुत गन्दगी Umber R. Pande को लेकर फैलाई और tota bala thakur के खिलाफ भी लिखा। ऐसे में तेजी का यह आलेख पठनीय है कि किस तरह से हिंदी कविता को देखने समझने की जरूरत है। वरिष्ठ कवि और आलोचक Archana Verma जी ने भी तोता ठकुराइन के नाम का उपयोग करते हुए कविताएं पढ़ी और यदा कदा टिप्पणियां की है। बहरहाल तेजी का यह आलेख आपके हवाले मित्रों। 
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आप सब मित्र मुझे क्षमा करेंगे, कि मैं इतनी हड़बड़ी में यह मेल लिख रही हूँ. सिवा इसके कोई चारा नहीं. जीवन इन दिनों इतना कठिन और विकट चल रहा है कि जितना धैर्य और सौम्यता मेरे हिस्से में आई है, उसका भरपूर उपयोग अपने आप हो रहा है. खैर, आज के दिन सिर्फ इतना, कि पिछले कई दिनों से तोता बाला की कविताओं को बीच बीच में पढ़ रही हूँ. उनकी identity का रहस्य कोई भी हो, उससे कविता को कोई फर्क नहीं पड़ता. (हालाँकि अगर वे तोता नहीं कोई और हैं, तो हिंदी का सौभाग्य कि यह ज़बरदस्त क्रीडा-भाव अभी तक जिंदा है) लोग तरह तरह की अटकलें लगा रहे हैं, मैं वाकिफ भी नहीं हूँ. सिर्फ इतना कहूँगी, कि ठीक उसी तरह जैसे मैं पारुल पुखराज और शैलेन्द्र दुबे की कविताओं से मुतासिर हुई, वैसे ही तोता की कुछ कविताओं से भी . यह दो नाम इसलिए कि इन दोनों के पहले संग्रह अभी अभी छपे हैं. और हिंदी ही नहीं, इन दोनो कवियों ने कविता की ज़मीन पर कुछ विलक्षण कर दिखाया है. जो बात रुचती नहीं वो यही कि कई लोग जो शायद कविता कर्म को ठीक ठीक समझते नहीं( हो सकता है मैं भी न समझती होऊं) वे तोता की इन नयी और हिला देने वाली कविताओं को पढ़ कर हिंदी के कई कवियों पर हल्ला बोल रहे हैं. खास तौर पर स्त्री-कवियों पर. (कवयित्री शब्द तो कब का लद चुका)..हालाँकि हल्ला बोलना ही था, तो हर कवि पर बोलते, क्योंकि किसी पुरुष ने भी तो अभी तलक यह तोता झलक नहीं दिखलाई.( कोई किसी दूसरे कवि की ऐसे झलक दिखलाये भी तो कैसे. वह तो वही कर सकता है जो उसे करने को मिला हुआ है) कोई कवि किसी अन्य कवि से असुरक्षित नहीं होता अगर वह कवि है तो. वह तो पगला जाया करता है कि वाह यह कौन आकर मेरे पास एक बिलकुल नयी धुन गुनगुना रहा है. वह तो उसकी चरण-धूल से तिलक लगा लेना चाहता है अपने धड़कते ह्रदय पर. कविता को लेकर युद्ध रचाना तो एकदम आत्मघाती कर्म है. आप सब से पहले अपना अहित खुद ही कर रहे होते हैं. (संयोग से मैंने अभी तक तोता से किसी को असुरक्षित होते हुए देखा भी नहीं है, इतना FB से नाता भी नहीं मेरा.) कविता का सब से पहला काम तो खुद कवि ही को जीवित रखना है. वह जितना अपने लिखने से जीवित रहता है, उतना ही कविता के अस्तित्व मात्र से भी. अच्छे-बुरे की परख तो दीगर बातें हैं. अभी तो हम शुरुआत की बात कर रहे हैं -- कोई रोने को मुंह खोले और गाने लग जाए. डूडल करते करते कोई ग़ज़ब का चित्र बना जाए.( एक बांगला कवि ऐसा करते करते क्या गजब का चित्रकार ही हो गया!) और कवि-मित्रो आप से बेहतर कौन जानेगा कि कविता की हर बार नए सिरे से कोशिश करनी पड़ती है. बहुत सी कविताएँ doodle जैसे ही किसी चीज़ से शुरू होती हैं, कभी चित्र बन जाता है कभी नहीं. कभी-कभी डूडल ही चित्र भी होता है. कोई कवि अपने को कवि कहे भी तो कैसे , क्योंकि एक और दूसरी कविता के बीच वह प्रतीक्षा में खून बहाता हुआ सा कोई निरीह जीव है, जिसे यह भी नहीं पता कि अब उस पर कविता रहम करेगी भी या नहीं, आएगी या नहीं उसके पास. लेकिन उस गरीब का काम तो किसी की भी कविता को अच्छे से आत्मसात कर लेने से चल जाता है.. उसकी अपनी कविता तो कई बार उसकी पकड़ में भी नहीं आती, उसे अपनी कविता को भी एक पाठक की तरह पढना होता है. इसलिए वह अपनी मुफलिसी में भी बहुत बहुत अमीर शख्स है, उसका gender कोई भी हो. तोता, आपको मेरा नमस्कार और बहुत बहुत प्यार मिले . एक ऐसे कवि की ओर से जो चाहता है कि उसके कविता-कर्म की असुरक्षा सुरक्षित रही आये. हिंदी को बधाई कि एक अच्छा कवि और मिला उसे ...और उसे अपने लिए बचा ले जाना हम पाठकों का सबसे अहम काम! हम तोता पर अपने ही टिप्पणियों से भारी न पड़ जाएँ कभी

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इतनी ढीट सरकार है कि संविधान का खुले आम उल्लंघन करके रेल भाड़ा बड़ा दिया। बगैर लोकसभा में पारित किये किराया कैसे बढ़ाया ?
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जिन लोगों ने मेहनत करके आंगनवाड़ी से दलालों को हटाया उसकी तो बात नही और श्रेय लेने ये आ गई । जब पद पर थी तो कुछ सार्थक किया नही और अब अपना एनजीओ बरसों से चला रही है और जहाँ सुना कि फिर आंगनवाड़ी में काम की संभावना बन रही है तो अपनी दुकान के लिए धंधे की तलाश में निकल पड़ी। पिछले 20 बरसों से वे आंगनवाड़ी प्रशिक्षण केंद्र चला रही है वे एक भी प्रयोग, नवाचार बता दें जो उन्होंने इन सेवाओं में लाने के लिए किया हो, सरकार में रहकर भी और सरकार से बाहर रहकर भी इन्होंने ICDS का विस्तृत अध्ययन किया पर रिपोर्ट दबाकर बैठ गयी। ब्यूरोक्रेट्स की असली नुमाइन्दगी करने वाली श्रीमती निर्मला बुच ने जिस तरह से और बड़ी बेशर्मी से अपनी संस्था महिला चेतना मंच को ठेका देकर काम करवाने का घटिया प्रस्ताव रखा है वह शोचनीय है, इसका अर्थ यह नही हुआ कि सरकार एक ठेकेदार को निकालकर इन जैसे कागजी कीड़ों को फिर से ठेकेदार बनाना चाहती है। इन्होने छतरपुर से लेकर दूर दराज के जिलो में जो डेयरी के नाम पर कबाड़ा किया, और रोजगार प्रशिक्षण के नाम पर काम किया उसका हिसाब ज़रा पूछिए इनसे, संस्था में काम करने वालों के साथ शोषण के अलावा कुछ किया ? रिटायर्ड हो गयी पर ऐंठ नही गयी अभी तक !!!
यह आसान इसलिए हो जाता है डोनर संस्थाओं को कि इन जैसे ब्यूरोक्रेट्स के कारण वे सरकार में अपनी जगह बनाकर अपना माल खपा देते है। Vijay Manohar Tiwari और उनकी टीम ने मप्र में मीडिया की पैरवी करने वाले एक सशक्त समूह और सैंकड़ों जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत को आधार बनाकर जिस तरह से पिछले दस वर्षो में तथ्यों को इकठ्ठा कर, विश्लेषण करके ठेकेदारों और सरकार में बैठे इन्ही ब्यूरोक्रेट्स के नेक्सस का काला सच सामने लाया जिसमे मप्र एग्रो भी शामिल है, जो ये लोग धोकर फिर से बच्चों के पोषण आहार को हड़पना चाहते है। शर्म आना चाहिए इस तरह के ब्यूरोक्रेट्स को। बीच भोपाल शहर में केतकी, कल्याणी से लेकर सूदूर विदिशा रायसेन में जमीनों की संपत्ति होने के बाद भी रूपये की हवस नही मिट रही।
मदर्स क्लब बनाना ठीक है पर उससे ज्यादा बड़ी बात है पूरे समुदाय और पंचायती राज की जवाबदेही तय करना। और इसके बिना कुपोषण खत्म नही हो सकता, मदर्स क्लब की अवधारणा ही गलत है यदि माता इतनी ही जागरूक होती यो बच्चा कुपोषित क्यों होता। सरकार को इन ब्यूरोक्रेट्स के लाभ कमाऊ एनजीओ को दूर रखना चाहिए, ये ज्यादा बड़े वाले ठेकेदार है और कम से कम इन माताजी को तो बिलकुल दूर रखा जाए ये अपने पूर्व पद का प्रभाव दिखाकर प्रोजेक्ट ले लेती है और जमीन पर कुछ नही होता। जरा इनकी अकूत जमीन और संपत्ति देख ली जाएँ एक बार, अब इन्हें घर बैठकर आराम करने दिया जाए।

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