Wednesday, August 31, 2016

NH-12 & other one Poem, Umber and Tarun Sagar in Assembly Posts of Aug 16 last week.


कविता की जमीन पर एक नया विमर्श, भाषा, विन्यास और कल्पना के साथ बेहद संजीदा किस्म की कविता लेकर आते है Umber R. Pande. इधर कविता को लेकर थोड़ी सी समझ विकसित करने की कोशिश कर रहा हूँ, सफर में नामवर जी की किताब नई कविता के प्रतिमान रख ली थी जिससे दृष्टि साफ़ हो सके क्योकि उस दिन देवताले जी और मदन कश्यप जी से बात करते बदलते शिल्प और समझ को लेकर काफ़ी बात हुई थी।
अगर उन्ही प्रतिमानों और खत्म होती जा रही कविता की बात करें तो यह अनुष्ठान अब नए सिरे से सृजित करना होगा और सब पुराने को लाल दफ़्ती में बांधकर मैले कुचैले कोनों में रखकर किसी शोधार्थी को कभी काम आ सके , उस भर लायक रखकर कवियों के साथ ही विलोपित कर देना होगा। क्योकि बात शमशेर, मुक्तिबोध से शुरू होकर अम्बुज, राजेश जोशी से होते हुए एकदम विचारधारा में जकड़े और पैठे हुओं के बीच खत्म हो जाती है पर अब समय है Anuj Lugun से लेकर Jacinta Kerketta Aditya Shukla और अम्बर का और हमें यह स्वीकारना ही होगा और अब अगर "सबसे नई कविता के प्रतिमान" या पैमाने खोजने या बनाने है तो इनकी भाषा में रचा जा रहा सब कुछ समझना होगा फिर वो गद्य हो कविता या एक सांझी समझ, हिंदी और दीगर भाषाओं के पुरानी समझ वाले जड़ बुद्धि प्राध्यापकी के नकली ठसकों से कविता को निकालने की जरूरत है।

अब ना कवियों को कविता की परख और समझ है (कुछ को छोड़ दें तो) और आलोचक को तो आप सिर्फ नाम भर बता दीजिए, वह आपका खेमा जानकार ध्वस्त करने में कोई कसर नही रखेगा। इसलिए अब नए लोग, नए कवियों और नई भाषा-तेवर पर बात कीजिये अगर समझ हो तो, वरना वाट्स पर से लेकर तमाम ब्लॉग खुले पड़े है 100 से 200 लोग झेल ही लेंगे आपको, रोज सुबह से देर रात तक चिल्लपों करने वाले और चरण रज चूमने वाले मौजूद है वहाँ ।
बहरहाल परसों खत्म हुए सावन मास और अगस्त के आख़िरी दिन जब बरसात ने मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है और इधर दूर खेतों में कांस भी नजर आने लग गई है तो धूजते तलुए और अधगीले चौके में प्रेम और भूख के बीच एक छंद सुनने की आहट गुनिये और इसे अंदर तक महसूस करिये।
'अधगीले चौके में वह'
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अधगीले चौके में वह
छौंकती है खिचड़ी आधी रात
उजाले को बस ढिबरी है 
सब और सघन अंधकारा है

मावठा पड़ा है पूस की काली रात
शीत में धूजते है 
उसके तलुवे
मुझे लगता है मेरे भीतर
बाँस का बन जल रहा है

सबसे पहले धरती है पीतल
भरा हुआ लोटा सम्मुख, फिर पत्तल पर 
परसती हैं भात धुन्धुवाता
सरसों-हल्दी-तेल-नौन से भरा

'यही खिला सकती हूँ
मैं जन्म की दरिद्र, अभागिन हूँ 
खा कर कृतार्थ करें
इससे अधिक तो मेरे पास केवल यह
देह है 
मैल है धूल है, शेष कुछ नहीं'

संकोच से मेरी रीढ़ बाँकी होती 
जाती है ज्यों धनुष 
वह करती रहती है प्रतीक्षा 
मेरे आचमन करने की
कि माँग सके जूठन

और मेरी भूख है कि शांत ही नहीं होती
रात का दिन हो जाता है
अन्न का हो जाता है ब्रह्म

*****
जिसे आप गिनते थे आश्ना जिसे आप कहते थे बावफ़ा
मैं वही हूँ "मोमिन"-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो के न याद हो…

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आप सफ़र में हो लंबे सफ़र में और आपके साथ कोई महाज्ञानी फंस जाए जो अनथक बोलता रहें, उसके पास हर जगह की तथ्यात्मक जानकारी हो, फिल्मों की बकवास कथाएं हो, यात्राओं के उबाऊ विवरण हो, अपने घर परिवार, गोलू मोलू और किसी दोस्त के साथ बिताए पलों की विशुद्ध मूर्खतापूर्ण स्मृतियां हो, लम्वे चौड़े कामों की महानता के किस्से हो जिसमें वह हर बार सही और श्रेष्ठ रहा हो, ज्ञान की दूकान हो खाने से लेकर गंगोत्री और जमनोत्री तक की जड़ी बुटियों और वियतनाम से लेकर दूर दराज के हेण्ड पम्प मैकेनिक की कुंडली हो और जन आन्दोलनों से लेकर ठेठ अकादमिक बहस के गंवई अनुभव हो बावजूद इसके कि दस ठो जगह से हकाले जाने की असलियत सब जानते है फिर भी आपके साथ और सब पर भी पूरी यात्रा में चढ़ बैठे और पेलता रहें तो आपकी इस लोक की ही यात्रा ही नहीं परलोक की यात्रा की भी बुकिंग कंफर्म हो जाती है।
तंग आ गया हूँ कहानियां और बकवास सुनते सुनते, हो सकता हो वह मुझे आपको या हम सबको भी यूँही दिल मसोजकर कोस रहा हो पर शायद उसके पास यह अभिव्यक्ति करने के मौके या भाषा की शक्ति ना हो। पर दीगर समाज में रहना है तो इन्हें झेलना ही होगा पर अब तय किया है कि सबसे भली चुप और एक किताब साथ रखने से ये पुराण बांचने वालों से मुक्ति मिलेगी।
खग ही जाने खग की भाषा !
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अलोक यानी इस लोक के नहीं रहें अब हम, लिहाजा हरियाली अब नसीब में ना होगी और ग़र कभी फिर यह अवसर मिला तो शायद समेटने लायक ना रह पाएं इस या उस तरह से, इसलिए किसी दूर कोने में खड़े होकर हाथो की उँगलियों में नर्मदा के पानी का अर्ध्य देकर मुआफी .... अफसोस रहेगा और इस बात को दर्ज किया जाता देखकर संताप से भर उठूंगा कि जरूरत में अपने ही धोखा दे जाते है.
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फेसबुक को जो लोग गम्भीर नही मानते, जरा एक बार किसी मूर्धन्य के लिए, समर्थन या विरोध में प्रशंसा, समालोचना या व्योम में नारा उछालकर देखिये फिर देखिये तीर कैसे कहाँ और किस हद तक लगता है। धमकी से लेकर तमाम तरह के हथियार शुरू कर देंगे ये लोग।
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ताश के पत्तों की मानिंद है ज़िन्दगी फराज

जिस किसी ने भी खेला, तकसीम मार दिया मुझे .

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जीवनयात्रा, तनाव, संताप, खुशी और दुखों के बीच पानी का वेग, नर्मदा, इंसान का अदम्य साहस कि नदी के ऊपर से झुला बनाकर पार कर जाना........यह सब सभ्यता का ही तो विकास है परन्तु यह विकास मानव की सुविधाओं को बढाने के लिए हुआ पर जीवन के स्तर को बदलने के लिए अभी सैकंडो युग लगेंगे शायद..........
फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है और तमाम विघ्न संतोषी ताकतों के बाद भी सभ्यता में ऐसे परिवर्तन जरुर आयेंगे जो छोटे से जीवन को शान्ति और सुकून के सिर्फ दो पल दें सकें - मौत को एकदम करीब पाकर हम कह सकें कि जो जिया वो बहुत था और अब चिर शान्ति मिलें तो चैन पाऊं, यह सब तभी होगा जब हम कुछ पल अपने लिए चुरा कर एक असली जिन्दगी जी सकें पानी और प्रकृति के सानिध्य में.
होगा सब होगा, होना ही होगा क्योकि मौत का दिन मुकरर्र है और लाजिम है कि हम भी देखेंगे........
यूँ तो नर्मदा से मेरा नाता है गहरा और वात्सल्य वाला पर जब भी किसी तट से गुजरता हूँ तो इसका पानी जो सौम्य हो या चिंघाड़ता मुझे खींच ही लेता है पिछले दिनों भेडाघाट से गुजरते हुए फिर नर्मदा की बेचैनियाँ और खामोशियाँ सुनते हुए............
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शाम तो ढल ही जाती है बस रात शुरू होती नहीं वो जो एक शुभ्र सुबह ला सकें
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हाजी अली की दरगाह पर महिलाओं के जाने पर जिन कठमुल्लों को दिक्कत है वे बीमार है और यदि ज्यादा बीमार है तो किसी इस्लाम पसंद देश चले जाएं ।
सारे धर्म स्थल सबके लिए खुले हो या फिर बन्द कर दो और वहां अस्पताल खोल दो या सब तोड़कर गरीबों के लिए प्रधानमंत्री योजना में मकान बनवा दो।
कोर्ट के निर्णय सबको मानना होंगे कोई भी हो। जिसे भी देश में शेष रहना है उसे कोर्ट और न्याय मानना होगा अन्यथा रास्ता खुला है बाहर का। मुल्लाओं को अब कुरआन और मनगढ़ंत आयतों से बाहर आना ही होगा।
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पिछले दिनों में हुई घटनाओं के लिए सरकार नही जनता जिसमे आप, तुम, वह, और मैं शामिल हूँ क्योंकि वोट हमने दिया है और हम चुप बैठ गए।
सवाल उठाइये, अपने पार्षद, पंच, सरपंच, विधायक, महापौर के पास जाईये उसे एक बार प्यार से बुलाकर सम्मान कर दीजिए, कुछ मूर्खतापूर्ण कार्यक्रम कर लीजिए और फिर उसे सार्वजनिक रूप से गलियाइये, सबसे खरी खरी सुनवाईये। फिर उसे सब लोग उसे वाट्स एप से लेकर फेसबुक पर घिसिये और इतने आवेदन दीजिये कि यदि मरने लगे तो कफ़न के साथ लकड़ियों कण्डों की जरूरत ना पड़े।
अपने पत्रकारों पर नजर रखें यदि आपकी खबरें ना आये तो पूरा मोहल्ला और कॉलोनी में उस अखबार का बहिष्कार कर दें और सुबह जाकर हाकर से छिनकर जला दें।
प्रशासन से जुड़े लोगों को भी गुलाब या बेशर्म के फूल दें और उसके बाद दफ्तर के बाहर सब लोग मिलकर अच्छे से पूजा करें ताकि वे सही समय पर सही न्याय संगत काम करें।
वकीलों डाक्टर और तमाम सेवा प्रदाताओं से भी बातचीत को रिकार्ड कर लें और मुहल्ले के मंदिर मस्जिदों से बजने वाले भोंपुओं पर सबको सुनाये ताकि इनकी असली औकात सामने आये।
जो भी करें मिलकर करें और जो साथ आने में आना कानी करें उसके घर के सामने कचरा फेंके और सामजिक बहिष्कार करें।
अगर आप बोलेंगे नही तो आपकी लाश को जलाने को कोई नही मिलेगा, आप वैसे भी जिंदा नहीं है एक लाश बनकर रह गये है, सबूत दीजिये जिन्दा होने के। याद है ना Uday भाई की कविता की अंतिम पंक्ति
कुछ नही सोचने और 
कुछ नही बोलने से 
आदमी मर जाता है

जस्टिस ठाकुर, प्रमुख न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट, ने भी आज कह दिया है कि हम पर भरोसा ना करें हम भी कुछ नही कर सकते। पिछले दिनों प्रशांत भूषण ने भी कान्हा में यही कहा था कि कोर्ट अब जनहित की बात नही सुनता, ना ही फैसले देता है। इसलिये बेख़ौफ़ होकर क़ानून हाथ में लीजिये और तत्काल अपना न्याय खुद कीजिये
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हम सब पहाड़, धरती और आसमान है
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तुम्हारी आँखों में हरियाली देखना चाहता हूँ, ये हरापन समेट रहा हूँ ....
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NH 12 , पर स्थित गाँव खलोड़ी में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पिछले 6-7 वर्षों से कोई स्टाफ नही है, एक चपरासी अशोक दास के भरोसे यह केंद्र चल रहा है और हम कितने चिंतित है स्वास्थ्य को लेकर ? शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर को और कुपोषण लेकर अक्सर तनाव में रहते है। यह केंद्र मण्डला जिले में है मवई ब्लॉक में। गौंड बैगा आदिवासी बहुल गाँव का विकास कैसे हुआ होगा यह सोचने वाली बात है जबकि यह गाँव समेकित कार्य योजना में स्वीकृत है। यह केंद्र 34 गाँवों को कव्हर करता है।
गांव में 3 टी बी के मरीज है जो भगवान के भरोसे है, लेबर रूम की स्थिति भी भयावह है चार प्रकार के डस्ट बीन वही है और छह ट्रे की व्यवस्था छिन्न भिन्न है। अगर आदिवासियों के लिए यह आपका सुशासन और प्राथमिकता है तो देश के हर हिस्से से दानी माझी अपनी पत्नी उमंग की लाश लेकर निकलेगा, क्यों ना इन सबको दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट भेज दिया जाए क्योंकि नालायक नेता और अधिकारी तो कुछ करने से रहें।
कल मैंने लिखा था कि बिछिया और मवई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भी एक - एक डॉक्टर के भरोसे चल रहा है।
मामाजी कहाँ है आपका सुशासन और विकास ?
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मीडिया में चोरी बहुत सामान्य है।पिछले दिनों एक नामी गिरामी तथाकथित लेखक जो बौद्धिक आतंकवाद का पर्याय बन रहा था और यहां जबरन ज्ञान पेल रहा था , की लेखनी को विकी पीडिया और गूगल से मारा हुआ पाया और मैंने लिख दिया तो कल मुझे ब्लॉक करके भाग गया।
मजेदार यह है कि यह चोरी वह एक लिंक पर भी पेलता है
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एन एच 12 
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एन एच 12 पर ट्रक दौड़ रहे है
रायपुर से जबलपुर की तरफ
लदा है लोहा इतना कि दब गए है ट्रक
परेशान है चालक, क्लीनर और बारीक
दिल्ली मुम्बई और बड़े शहरों में जाएगा
लोहा देश की ताकत है, विकास का पैमाना
लोहा जमीन से निकालकर बनाया जाता है
चार दिन में इतना लोहा ढोये जाते देख लिया 
कि
मुझे नफरत हो गयी है लोहे से 
मुझे इस लोहे में छत्तीसगढ़ के पहाड़ी कोरबा या 
विलुप्त होते उजाड़ दिए गए आदिवासियों के आंसू 
जवान होती आदिवासी लड़कियों का खून नजर आता है
धान के कटोरे के खेतों से जवान लड़कों के खात्मे का, 
जंगल को बेचने और पर्दे के पीछे के चट्टानी सरकारी 
नजरिये, निर्णय और पुलिस का दमन याद आता है
सोना सोड़ी के अभियान पर बन्दूक चलाता प्रशासन 
नजर आता है जो नक्सल के नाम पर लोहा बनाता है 
जिंदल, अम्बानी और अडानी की बू इस लोहे से आती है मुझे
ये ट्रकों पर दौड़ता लोहा मुझे अपनी छाती पर रखा
विकास का बोझ लगता है जिसने 
मेरी साँसे, संस्कृति और परम्परा छिनकर 
सदा भटकने के लिये एक इंसानी जंगल में छोड़ दिया है।

-संदीप नाईक

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नर्मदा किनारे की बेचैनियां बरकरार है बुरी तरह से, बहता जल भी जब कालिमा लिए हो और अपना ही अक्स नदी के पानी में नजर ना आये तो समझ लीजिए मुआमला गड़बड़ है।
ये सिर्फ नदी नही है मेरे लिए , एक उथल पुथल है, झंझावात है जीवन का और अनहद की तरह बजता हुआ नाद है जो मुझे बेचैन करता है, आल्हादित करता है, शोक से भर देता था, संताप से भरा हुआ जब नर्मदा के किसी पुल से गुजरता हूँ या दूर किसी किनारे पर एकजीव होने की कोशिश में अपने अंदर से उठते आवेग और नदी के उद्दाम वेग से जूझता हूँ तो मुझे मंडलेश्वर में जन्मी माँ के कहें और सुनाये नर्मदा के आख्यान याद आते है, अमरकंटक के छोटे से गोमुख से निकली वेगवती याद आती है, नेमावर तट पर मुकुल शिवपुत्र के राग और कबीर याद आते है, जबलपुर के भेड़ाघाट पर उफनती चिंघाड़ सुनाई देती है , महेश्वर में अहिल्या देवी के बनाये घाटों से क्रुद्ध और टनकार बजाती नर्मदा याद आती है, होशंगाबाद के सेठानी घाट पर पूजा पाठ और पाखण्ड का बोझ ढोकर रेतघाट से मुर्दो के पाप बहाकर ले जाती नर्मदा याद आती है। खेड़ीघाट, बड़वाह में पहले पिता, फिर माँ और अभी छोटे भाई की अस्थियां खमाकर आया था, मृत्यु को देखते - भुगतते हुए जीवन से दो चार होना आपने नही देखा हो शायद, पर मैंने जाना है। आज फिर मण्डला में साथ साथ गुजरती नदी में सुन रहा हूँ पुकार और चीख, वात्सल्य और क्रंदन !!!
अब ये बेचैनी खत्म करना ही होगी, ये सब नही चलेगा अब
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जन्माष्टमी की शुभकामनाएं। 

कृष्ण के समान पक्षपाती बनें, युद्ध करवाएं, गीता सा ज्ञान पेलते रहें, भोग विलास में लिप्त रहें और राधा, रुक्मणि, मीरा से लेकर 16000 सूक्तियों तक भी संलग्न रहें पर सबमे रहकर भी तटस्थ रहें जो एक साधारण कर्मवीर पुरुष, माखनचोर कृष्ण को श्रीकृष्ण बनाकर कालजयी कर देता है।

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आशुतोष गोवारिकर को कोसने का कारण जे एन यू में ना पढ़ पाने का फ्रस्ट्रेशन भी है और किसी छोटे मोटे कस्बे में नकल कर घटिया किस्म का काम करते हुए बौद्धिक आतंकवाद फैलाने में हुई बाधा भी है।
शाबाश आशुतोष !!!
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सफर है जिल्लत, जलालत तो होगी ही
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हिंदी में कुछ बेरोजगार पी एच डी होल्डर स्वयम्भू कवि उर्फ़ आलोचक नौकरी ना मिल पाने के कारण कुछ गरिष्ठ कवियों और तथाकथित जुगाडू लोगों की कठपुतली बनकर अपना भविष्य तो बर्बाद कर ही रहे है बल्कि जिस कविता और पक्षधरता की बात प्रतिबद्धता से करने के मुगालते में सबको गाली देकर अपने कुसंस्कार यहां दर्शा रहे है वह चिंतनीय है, इस तरह वे अपना और कविता एवं आलोचना का भी नुकसान कर रहे है।
मजेदार यह है कि छोटे कस्बों और सरकारी महाविद्यालयों में रट्टा मारकर संविदा कर्मचारी से स्थायी व्याख्याता बने ये लोग, रिश्वत और चापलूसी से एक गाँव में बरसों से टिके रहने वाले और प्रोफेसर कहलाने की इच्छा रखने वाले इन्हें शह दे रहे है क्योकि अपनी ओछी बुद्धि से किसी विवि के विभाग या बड़े महानगर में नौकरी पा नही सकें तो इन युवाओं के कंधों पर रखकर बंदूक चला रहे है।
ये तथाकथित प्रोफेसर ना बनें निराश्रित, दया के पात्र जीव ना अपने विषय अनुशासन के रहें, ना दीगर भाषाओं के , ना हिंदी के - सिर्फ दलित और पराये होकर रह गए हर जगह से , इसलिए अब परजीवी की तरह से गुजर - बसर कर बुढापा सुधार रहे है - लौंडों लपाड़ों पर हाथ फेरकर !!!
*****
सूरज निकला फिर सुबह हुई
शाम ढली, अन्धेरा हुआ , इस तरह से
नए नवेले कमरे में रात हुई

चींटियां आई, फिर छिपकली

चूहे आये और इस तरह से
नए नवेले कमरे में संसार आया

भरी धूप में पतरे तपे
हवाओं के साथ धूल आई, इस तरह से 
नए नवेले कमरे में पसीना निकला

पहली बरसात में छत टपकी
दीवारों में सीलन आई, इस तरह से
नए नवेले कमरे में दुःख आया

अब इंतज़ार है ठंड का
कांपने और गर्माहट का, इस तरह से 
नए नवेले कमरे में जीवन का

- संदीप नाईक 
17 अगस्त 16

एक बरसाती शाम को गर्मी महसूस करते हुए नए नवेले कमरे में 
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Friday, August 19, 2016

Posts of 10 to 19 Aug 16

सूरज निकला फिर सुबह हुई
शाम ढली, अन्धेरा हुआ , इस तरह से
नए नवेले कमरे में रात हुई

चींटियां आई, फिर छिपकली
चूहे आये और इस तरह से
नए नवेले कमरे में संसार आया

भरी धूप में पतरे तपे
हवाओं के साथ धूल आई, इस तरह से 
नए नवेले कमरे में पसीना निकला

पहली बरसात में छत टपकी
दीवारों में सीलन आई, इस तरह से
नए नवेले कमरे में दुःख आया

अब इंतज़ार है ठंड का
कांपने और गर्माहट का, इस तरह से 
नए नवेले कमरे में जीवन का

- संदीप नाईक 
17 अगस्त 16

एक बरसाती शाम को गर्मी महसूस करते हुए नए नवेले कमरे में !!!
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राखी की बधाई इस उम्मीद के साथ कि कभी तो बहनें भाईयों से मुक्त होकर अपनी रक्षा और जिंदगी स्वयं संवार सकेंगी।
संस्कृति, लेन-देन, प्यार, सम्मान एवं गरिमा बनाएं रखिये - अपनी भी और महिलाओं की भी , लेकिन खुदा के वास्ते संरक्षक बनकर किसी महिला की रक्षा करने की ठेकेदारी मत कीजिये।आपकी ठेकेदारी ने ही महिलाओं को हिंसा और नारकीय जीवन जीने पर मजबूर कर दिया है। खाप से लेकर तमाम उदाहरण मेरे सामने मौजूद है।
त्यौहार मना लीजिये कोई हर्ज नही पर मेहरबानी करके पितृ सत्ता की दादागिरी को बरकरार मत रखिये।
जमाना बदल रहा है।
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हिंदी में कुछ बेरोजगार पी एच डी होल्डर स्वयम्भू कवि उर्फ़ आलोचक नौकरी ना मिल पाने के कारण कुछ गरिष्ठ कवियों और तथाकथित जुगाडू लोगों की कठपुतली बनकर अपना भविष्य तो बर्बाद कर ही रहे है बल्कि जिस कविता और पक्षधरता की बात प्रतिबद्धता से करने के मुगालते में सबको गाली देकर अपने कुसंस्कार यहां दर्शा रहे है वह चिंतनीय है, इस तरह वे अपना और कविता एवं आलोचना का भी नुकसान कर रहे है।
मजेदार यह है कि छोटे कस्बों और सरकारी महाविद्यालयों में रट्टा मारकर संविदा कर्मचारी से स्थायी व्याख्याता बने ये लोग, रिश्वत और चापलूसी से एक गाँव में बरसों से टिके रहने वाले और प्रोफेसर कहलाने की इच्छा रखने वाले इन्हें शह दे रहे है क्योकि अपनी ओछी बुद्धि से किसी विवि के विभाग या बड़े महानगर में नौकरी पा नही सकें तो इन युवाओं के कंधों पर रखकर बंदूक चला रहे है।
ये तथाकथित प्रोफेसर ना बनें निराश्रित, दया के पात्र जीव ना अपने विषय अनुशासन के रहें, ना दीगर भाषाओं के , ना हिंदी के - सिर्फ दलित और पराये होकर रह गए हर जगह से , इसलिए अब परजीवी की तरह से गुजर - बसर कर बुढापा सुधार रहे है - लौंडों लपाड़ों पर हाथ फेरकर !!!
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कुछ लोग पैदा होते है बकवास करने और झगड़ने के लिए । जब इनके बौद्धिक हथियार भोंथरे हो जाते है तो अक्सर ये आतंक फैलाते है, कोई जरूरी नही कि तुम्हारी तरह सोचा जाये और कोई जरूरी नही कि हर जगह विकी पीडिया का चोरी वाला रायता फैलाया जाए।
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गूगल और विकीपीड़िया बंद हो जाए तो लोगों की रोजी रोटी ही बन्द हो जायेगी।
भगवान कसम ये लोग बस एक दिन हड़ताल कर दें हमारे कई मित्र अपनी असली औकात पर आ जाएंगे। इसलिए बेचारे नेट और बिजली के बारे में चिंतित रहते है इन्हें निर्बाध रूप से ये दो सेवायें तो चाहिये ही चाहिये नही तो धंधा चौपट !!!
ज्ञान का झोला उठाये बौद्धिक आतंकवाद का रायता फैलाने वाले मीडिया, समाज सेवा और अर्थ शास्त्र के कई विद्वान भीख मांगने लायक भी नही रहेंगे।
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यूनिसेफ वाले भूल जाते है कि उनकी रोटी, टैक्स फ्री तनख्वाह और उनके पले हुए दूम हिलाने वाले निकम्मे सलाहकार जो किसी काम के नही - सिवाय आंकड़ों के ग्राफ बनाने और जिला कलेक्टरों के चापलूस बनकर यूनिसेफ वालों की होटल बुकिंग करते है और ज्ञान के नाम पर गरीबी बेचकर ऐसी रिपोर्ट बनवाते है। किया क्या सुधार के नाम पर इन सफ़ेद हाथियों ने प्रदेश में ?
पत्रकारों से लेकर सबको चने जैसी दो दो रोटियां फेंकने से काम नही होते, मप्र में यूनिसेफ बताए कि इतने बरसों में ब्यूरोक्रेट्स की चाटुकारिता करने के अलावा क्या किया है - हर वर्ष जहांनुमा , नूर-उस-सभा या पलाश होटल, भोपाल में रिपोर्ट जारी करने के अलावा ? वो भी अंग्रेजी में क्योकि हिंदी के नाम पर इन काले अंग्रेजों को दस्त लग जाते है और दीगर बात ये है कि बापड़े अपनी रिपोर्ट हिंदी से अनुदित करवाने में मोटा रुपया खर्च करते है !!
एक भी कार्यक्रम को लंबे समय तक सार्थक रूप से कर पाएं क्या , शिक्षा, स्वास्थ्य या विकेंद्रीकरण? राज्य का प्रमुख बदलते ही जिस संस्थान की प्राथमिकता बदल जाती हो , सलाहकार भर्ती करने का ठेका जो अपने स्वार्थ और मतलब के लिए दिल्ली की लाभकारी फर्म को दे दें वो क्या रिपोर्ट पर कार्यवाही करेंगे।
जो कर्मचारी ₹4000 से ₹ 8000 रोज के कमरों में रुकते हो, एसी गाड़ियों में सफर करते हो, जिनका 90 % समय बैठक और ब्यूरोक्रेट्स की दहलीज पर या बंगलों में गुजर जाता हो वो क्या मप्र की समस्या पर बात करेंगे।
एक कविता थी- 
इंद्र आप यहां से जाए तो ढंग से बरसात हो
ब्रह्मा आप यहां से टरे तो ढंग की संततियां जन्म ले

समझ रहे है ना, याद रखें यह प्रदेश गरीब है, भ्रष्ट भाजपा है और अकर्मण्य ब्यूरोक्रेट्स है तब तक आपकी नौकरी है वरना सड़क पर आ जाओगे यह याद रखना !!!

Sunday, August 7, 2016

आजादी के सात दशकों का हश्र - कालीचाट 7 Aug 2016


आजादी के सात दशकों का हश्र - कालीचाट

ये महज एक फिल्म नहीं, एक आर्ट वर्क नहीं, एक कहानी नहीं, एक अभिनय की पारंगतता को दिखाने की होड़ नहीं, एक सधा हुआ निर्देशन का लंबा चौड़ा आख्यान नहीं, एक सेट का चमत्कृत वर्णन नहीं, एक प्रकाश और वेशभूषा का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन नहीं, एक डायलोग और कलाकारों की महत्ता को नकली दंभ से भरने और स्थापित करने का माध्यम नहीं बल्कि एक लम्बी यातना, एक विकास का दंभ भरते देश और कृषि प्रधान होने की प्रलंबित तान और कृषक और किसानी के बीच झूलते समाज और पूरी ग्रामीण अर्थ व्यवस्था, विश्व में ग्लोबल होते जा रहे देश की एक पूरी पीढी को धोखा देकर जमीनी हकीकतों को छुपाकर देश को वास्तविकता से परे हटाकर अपनी ही जमीन में गड्ढा खोदकर या अपनी ही नाव में छेद कर पानी में खुद के डूबने के साथ पूरी व्यवस्था को डूबोने की कहानी है.

यह कहानी मालवा के देवास जिले के सतवास क्षेत्र के गाँव सिन्दरानी की कहानी है जहां विकास ना सिर्फ करवट ले रहा है और इस बहाने वहाँ की जमीन, जल और जंगल के खत्म होने की कहानी है पर बात सिर्फ यहाँ नहीं रुक रही, इस क्षेत्र के किसान जो सदियों से यहाँ खेती कर रहे है उनके संघर्ष और जीजिविषा को ज़िंदा रखने की कहानी है. सरकार के नाम पर किस तरह से सेवा प्रदाताओं के संजाल ने पूरे परिवेश को लूटपाट का एक बड़ा अड्डा बना रखा है जिसमे पटवारी, बैंक, पंचायत से लेकर जिला और राष्ट्र स्तर पर सरकार के सारे तन्त्र शामिल है और इस धार्मिक होते जा रहे माहौल में किस तरह से एक श्रद्धा भाव से अनुष्ठान के तहत किसान को मारने मरने को मजबूर कर रहे है.

पानी जिस तरह से मालवा में भी आहिस्ते आहिस्ते खत्म हुआ और डग डग रोटी पग पग नीर वाला मालवा भी सूखे की चपेट में आ गया , कपिल धारा कुएं जैसी महती योजनाओं ने किसानों में आशाएं जगाई परन्तु अमली जामा पहनाने में किस तरह से किसानों को दिक्कतें आई यह देखना हो तो इस फिल्म को देखा जाना चाहिए. डा सुनील चतुर्वेदी के उपन्यास “काली चाट” की एक उपकथा के माध्यम से किसानी संघर्ष, भयानक भ्रष्टाचार, तंत्र की विफलता, तंत्र में कार्यरत सेवा प्रदाताओं का लूट खेल और इस सबमे खत्म होती परिवार नाम की संस्था का विवरण है. ग्राम जीवन में भी किस तरह से आपसी विश्वास, भरोसा और आस्थाएं खत्म हुई है और बाजार के दलालों ने घुसपैठ अन्दर तक बना ली है इस की समानांतर कथाएं और असर देखना हो तो यह फिल्म निश्चित ही समझ बढाने में मदद करेगी. तकनीकी पक्ष और लय की दृष्टि से सधी हुई फिल्मों की कड़ी में इस फिल्म ने एक नई जमीन तैयार की है और विकास के साथ नई बहस को खडा करने की तकनीक भी इजाद की है.

सुधांशु शर्मा का हुआ निर्देशन, डा सोनल शर्मा की पटकथा और मालवा और मुम्बई के कलाकारों का अभिनय और पूर्व तथा उत्तर निर्माण में तकनीकी टीम का बहुत साधा हुआ काम दर्शाता है कि यह एक बड़ा टीम वर्क है. मालवा की लोक परम्परा, कबीर और लोक गीतों की बानगी देखनी हो तो इसे जरुर देखा जाना चाहिए, आज जो कबीर के नाम पर पूरी दुनिया भर में पसरी व्यवसायिक शास्त्रीयता और बंद कमरों में बंद एलिट की ठसक है, उससे दूर ठेठ ग्रामीण और मेहनतकश लोगों की वाचिक और समृद्ध परम्परा को अपने में बेहद खूबसूरती से समेटे है. पूरी फिल्म आपको बांधे रखती है एक छोटी सी फिल्म आखिरी में आपको सिर्फ "निशब्द श्रोता" के रूप में छोड़ती है.

उम्मीद है कि यह फिल्म शीघ्र ही दुनिया और देश के फिलोम्त्सव  में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करके पुरस्कार हासिल करके कला और व्यवसायिक दुनिया की फिल्मों के बीच अपना स्थाई और प्रभावी स्थान बनायेगी.

पूरी टीम को हार्दिक बधाई और ढेरों शुभकामनाएं

Posts of 7 Aug 16 - मोदी जी गौ रक्षा पर






आज बहुत सोचा और लगा कि छोडो सबकी बातें और विचार, "जिन्दगी ना मिलेगी दोबारा" अदभुत फिल्म ही नहीं जीवन दर्शन है.........जितनी बार देखता हूँ, कम पड़ता है. बस अब दुनिया जाए भाड में.........
चाहत के दो पल भी, मिल पाये 
दुनिया में ये भी कम है क्या 
दो पल को तो आओ खो जाएं 
भूले हम होता ग़म है.....

चाहत के दो पल भी अनमोल है जीवन में फिर चाहे अपने आप से किये हो ये चाहत और रूमानियत........
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गौ रक्षा के धंधेबाजों को मोदी जी ने कल कड़ी चेतावनी दी, स्वागत योग्य बात है, मोदी जी की मेधा और बुद्धि को प्रणाम, वे दुनिया में देश को जग सिरमौर बनाएं और इतिहास के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री सिद्ध हो यह दिल से दुआएं है मेरी। मेरी अल्प बुद्धि में दो तीन बातें आई
एक - दलितों को ही मरे जानवरों की खाल उतारना है और इसका अर्थ यह है कि उन्हें मारो मत नही तो वे बगावत कर रहे है तो यह वीभत्स काम कौन करेगा और फिर दुनिया में प्रचारित हो रहे स्वच्छ भारत की ....
दो - 70 % गौ रक्षक जो बीफ निर्यातक है, रेवेन्यू उगा रहे है और देश को नम्बर 1 की जगह रखने का बीड़ा उठाये है, वे शान्ति से काम करें ।
तीन - उप्र में चुनाव है, पंजाब में चुनाव है और इस तरह से माहौल बिगड़ेगा तो मुआमला थोड़ा मुश्किल हो जाएगा, साले दलित अहमदाबाद में इकठ्ठे हुए और यह मैसेज इस तरह से जाएगा तो सारा खेल बिगड़ जाएगा।
चार - अमित जी भाई शाह अभी रूप के राजा, चोरों की रानी और फिसलते गुजरात से उबर नही पाये है इसलिए मोदी जी को ही अभी थोड़े दिन ये सब गृह कलह देखना होंगे, इसलिए कन्फेशन ही विकल्प है।
पांच - राज्यों और ब्यूरोक्रेसी को यह सन्देश है कि इन्हें रोके, इंसानों के लिए खाने का जुगाड़ नही कर पा रही सरकार, जी एस टी से उम्मीद है कि धन आएगा, तब तक इन गाय ढोरों के लिए चारे का जुगाड़ कहां से करें, वो महारानी इतने बड़े राज्य में इतनी जमीन् हथिया कर बैठी है तो चारा नही दे पाई 70 गायों को, मैं विदेश घूमूँ या चारा इकट्ठा करता फिरूँ ? और वैसे भी चारा लालू ने खा लिया देश का और ससुर छूट गया, अब क्या होगा, वो अमूल वाला भी मर गया क्या नाम था - भूल गया। खैर, ध्यान रहें शिवराज, रमण और बाकी सबको, तुम सब तलवार की धार पर हो !!!
छः और अंतिम - ढाई साल तक गाय, बीफ, दादरी - अब समय आधा बचा है कुछ देखना पड़ेगा, उधर ऊ ससुरा ट्रम्प कार्ड खेल गया तो पाक के साथ बना बनाया खेल बिगड़ जाएगा। इसलिये मित्रता दिवस पर इश्किया सम्बन्ध और दोस्ताने की कसम खाते हुए खांसकर थूको, सब भूलो और चलो साले दलितों , ससुरों, आरक्षण दिए जाने के बदले मरे पशुओं की खाल भी ना उतारोगे, टाटा और बाटा क्या तुम्हारे बाप के पीठ की चमड़ी का जूता बनाएंगे ?
और सुनो संघियों और हिन्दू राष्ट्र के पुरोधाओं, ठहरो और विचारों यदि ये दलित रूठ गए और अपनी जात पर उतर आये तो तुम क्या जनेऊ को कान पर लपेटे चमड़ा उतारोगे, अभी तो डी एम के दफ्तर के सामने पशु फेंके थे , कल तुम्हारे बंगलो और मंदिरों में फेंक आएंगे, फिर क्या करोगे, याद है ना उस मुसड्डे अजगर वजाहत का नाटक - "सबसे सस्ता गोश्त" !!
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सन 1995 की याद चित्रकूट ग्रामोदय विवि का पहला बी एड का बैच और नानाजी देशमुख जैसे विद्वान कुलपति थे, पर उन्होंने कभी शिक्षा में विचारधारा को नहीं लाया और हमे बोलने, सीखने और लिखने की छूट दी।
दोस्तों के साथ की तस्वीर Bhanubhai Patel के सौजन्य से और इसमें है Kuldeep Yadavबाकी को खोज रहा हूँ ।
Samrathmal Rathore तुम्हे कोई मिले क्या ?


Friday, August 5, 2016

Posts of 4 Aug 16


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खूबसूरत बरसात में बूंदों का तांडव
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"मैं जिसका पट्ठा हूँ
उस उल्लू को खोज रहा हूँ
डूब मरूँगा जिसमें
उस चुल्लू को खोज रहा हूँ।"
- भारत भूषण अग्रवाल

Wednesday, August 3, 2016

हिन्दी कविता के अर्थ, मायने और कवियों की आत्म मुग्धता - नवोदित शक्तावत

हिन्दी कविता के अर्थ, मायने और  कवियों की  आत्म मुग्धता 
नवोदित शक्तावत 




कविताएं   व्‍यक्ति केवल एक ही कारण से लिखता है। दूसरों को पढ़वाने के लिए अभिमत जानने के लिए। वह पक्ष में हो या विपक्ष में। पक्ष में हुआ तो वाहवाही मिलेगी, विपक्ष में हुआ तो पूरी चेतना उसका विरोध करने में लग जाएगी लेकिन रहेगा केंद्र में दूसरा ही। हर प्रकार की कविता केवल और केवल दूसरों कोपढवाने के लिए लिखी जाती है, ताकि दूसरों से हमें प्रमाण पत्र मिल सके कि कविता अच्‍छी है। यानी हम दूसरों की आंखों का उपयोग आईने की भांति कर रहे हैं। यदि मैंने अच्‍छा लिखा है तो मुझे पता ही है कि ये अच्‍छा है। अब इसमें मुझे आगे जानने के लिए बचा ही क्‍या है। अब अगर सामने वाला कहता है कि वाह वाह अदभुत, तो मैं ये जानकर क्‍या हासिल कर लूंगा। यानी कुल मिलाकर कविता दूसरों को पढवाई ही इसलिए जाती है कि हम अपने अहंकार को अधिक से अधिक श्रृंगारित कर सकें। तालियों की गडगडाहट से हम खुद को समझें कि हम भी ऐसे वैसे नहीं हैं। हम भी कुछ हैं। समबडी।


जो भी   व्‍यक्ति ये बोलता है कि वह स्‍वयं के लिए लिखता है, एकांत में लिखता है, स्‍वयं की संतुष्टि के लिए लिखता है, वह झूठा है। क्‍योंकि उससे पूछा जा सकता है कि यदि स्‍वयं को केंद्र में ही रखकर लिखा है तो इसे उजागर करने के पीछे क्‍या कारण है। यह सामने ही नहीं आना चाहिए कभी। खुद लिखो खुद पढो। फिर वह बाहर कैसे आया। और बाहर आया है तो इस सच को स्‍वीकारो कि हमें वाह वाही चाहिए, हम प्रशंसा पिपासा के चलते दिन रात शब्‍द निवेश कर रहे हैं। शब्‍दों का वमन कर रहे हैं। सीधे सीधे क्‍यों नहीं बोलते कि हम खुद को खुदा मानते हैं, खुद को श्रेष्‍ठ मानते हैं, अहं ब्रम्‍हस्मि, आत्‍मकेंद्रित हैं, आत्‍मश्‍लाघा से भरे हैं। इतना भी साहस नहीं। तो फिर इसे सीधे न बोलते हुए काव्‍यात्‍मक बकवास का सहारा लेते हैं, और सामने वाले से बुलवाते हैं कि नहीं नहीं, आप तो महानतम हो। जिस क्षण यह बोध प्रगाढ़ रूप से हो जाता है कि दूसरों की अटेंशन पाना एकदम बेमानी है, नितांत व्‍यर्थ है, तत्‍काल क्रांति घटित होती है। एक रूपांतरण होता है। उस रूपांतरण के क्षण में सारी व्‍यर्थ चेष्‍टाएं बिखर जाती हैं। फिर ऐसा नहीं होता कि हम किसी इच्‍छा का दमन करते हैं, वह नष्‍ट ही हो जाती है। प्रशंसा की ग्रंथि ही खत्‍म हो जाती है।

कविता   लेखन विधा का एक आयाम है। है यह लेखन ही। लेखन मात्र ही दूसरों को प्रभावित करने और खुद को श्रेष्‍ठ बताने के लिए किया जाता है। एक अहंकारी आदमी जो सीधे हिंसा नहीं कर सकता, गालियां नहीं दे सकता, दमन नहीं कर सकता, कूटनीति नहीं कर सकता लेकिन फिर भी घोर अहंकारी है, वह शब्‍दों पर टूट पड़ता है। वह चुन चुनकर शब्‍द बुनता है। शब्‍दों का निवेश करता है और शब्‍दों के पहाड़ पर बैठकर शब्‍दों का वमन करके दुनिया को दिखाता है कि देखो मैं कितना प्रतिभाशाली हूं, कितना मेधावी हूं। मैं कैसी काव्‍य की बातें करता हूं, तुम लोग तो मेरे आगे कुछ नहीं हो। ऐसा करके वह केवल अपनेअहंकार को और अधिक विकृत बनाता है और कुछ नहीं। यानी एक आक्रांता और एक लेखक, कवि में चेतना के तल पर कोई भेद नहीं है। वे समान ही हैं। अभिव्‍यक्ति के तल पर वे अलग हैं लेकिन दोनों का मनोविज्ञान एक ही है। दूसरों को प्रभावित करना। हिंसा के बल पर या काव्‍य के बल पर। और ऐसा करके खुद की वाहवाही बटोरना और आईने में खुद को निहारते रहना।

अभिव्‍यक्ति   का मंत्‍वय ही अभिमत जुटाना है। फलां चीज के बारे में मैं ऐसा सोचता हूं, उस पर सामने वाला क्‍या सोचता है, यह पता करना होता है। यदि मैं गुलाब को पसंद करता हूं तो करता ही रहूंगा। किसी के विरोध करने से मेरी पसंद कैसे बदल सकती है। जब मेरी पसंद बदल ही नहीं सकती तो मैं किसी के विरोध या समर्थन की चिंता भी क्‍यों कर रहा हूं। किसी भी विषय पर मेरी क्‍या राय है, यह तो मेरे तल पर है। इसे मैं सबके सामने रखकर क्‍या साबित कर रहा हूं। मैं ये साबित कर रहा हूं‍ कि जरा कोई मैदान में आए। फिर मैं उससे बहस करुंगा, शास्‍त्रार्थ करुंगा और किसी भी प्रकार से सामने वाले का मुंह बंद करना ही मेरा लक्ष्‍य होगा। ऐसा करके फिर मैं कहूंगा कि देखा, कर दिया ना चारों खाने चित्‍त। है और केाई सज्‍ज्‍न जो खुद का ज्ञान आजमाना चाहता है। आए मैदान में। और ऐसा कहके मैं मन ही मन अपनी बलाइयां लूंगा। खुद पर और अधिक मोहित हो जाउंगा। ये अहंकार के श्रृंगार के अपने अपने ढंग हैं।

ये   तथ्‍यगत बात है। असल में, हम क्‍या करते हैं इससे अधिक महत्‍वपूर्ण ये है कि हम क्‍या हैं। क्‍या हम पाखंडी हैं, क्‍या हम द्विखंडित हैं, क्‍या हमारी कथनी करनी में भारी भेद है। प्रेम की बात करने वालों के जीवन में कितना प्रेम है, वे कितने प्रेम का प्रदर्शन करते हैं, ये अहम है। एक कवि लगातार सौम्‍यता की बातें कर सकता है लेकिन अपने मूल में वह कर्कश मालूम हो सकता है। इसलिए हमारी डूइंग से अधिक हमारी बीइंग का महत्‍व है।

एक   श्रमिक, जो कि वास्‍तव में सार्थक परिश्रम करता है, वह किसी भी चीज का क्‍लेम ही नहीं करता, सिवाय मेहनताने के। वह प्रशंसा पिपासा की नाटकीयता से मुक्‍त रहता है। ऐसे कई लोग जो समाज में छोटे मोटे काम करते हैं। एकदम ऑड जाब। पंचर वाला, खोमचे वाला, चमार, नाई, सब्‍जी वाला आदि, ये लोग समाज की आधारशिला हैं। समाज में बैठे कवि, लेखक, बुदिजीवी लोग केवल परजीवी हैं। ये पढे लिखे लोग न केवल खुद को श्रेष्‍ठ बताते हैं, बलिक्‍ गैर बिरादरी को हेय समझते हैं। यह विकृत अंहकार नहीं तो क्‍या है। फेसबुक पर लगातार प्रेम, संवेदना की बात करने वाले निजी जीवन में इतने अधिक घाघ, सुरक्षित, दुनियादार हैं कि हैरत होती है कि क्‍या इसी आदमी ने वह सब लिखा है।

- नवोदित  शक्तावत  इंदौर में रहते है और पत्रकारिता और साहित्य के युवा तुर्क और अध्येता है. 

Tuesday, August 2, 2016

शेखर सेन बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता - देवास में हुए शेखर सेन के कार्यक्रम की आलोचना पर अंध भक्तों की प्रतिक्रिया पर जवाब


शेखर सेन बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता - देवास में हुए शेखर सेन के कार्यक्रम की आलोचना पर अंध भक्तों की  प्रतिक्रिया  पर जवाब 
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भांड जब आत्म मुग्ध होकर किसी प्रतिष्ठित मंच पर चढ़ता है तो उसके मुंह खोलते ही सारी गन्द बाहर आ जाती है ।

देवास के संगीत समारोह में एक नजारा लाइव चल रहा है ।

अब समझ में भी आ रहा है कि क्यों ये भांड लोग संगीत कला अकादमी से लेकर फिल्म संस्थानों में काबिज है, राम भजन के साथ भद्दे चुटकुले सुनाने वाले और बेहद गलीज तरीके से आत्ममुग्ध ये लोग पता नहीं क्या समझने लगे है. 

आज जो देवास के एक मंच से देश की संगीत कला अकादमी के अध्यक्ष को देखा सुना उससे अंदाज लगाया जा सकता है कि ये लोग किस तरह से घटिया लोगों को संस्थाओं में काबिज करके संस्कृति को क्या स्वरुप देना चाहते है. मेरे लिए मेरी व्यक्तिगत राय में यह सबसे घटिया कार्यक्रम था उस मंच पर जहां भीमसेन जोशी से लेकर बिस्मिल्लाह खान साहब या तीजन बाई जैसी कलाकार ने प्रस्तुतियां दी हो.


यह मेरी व्यक्तिगत राय है, आपकी राय अलग हो सकती है। पोस्ट की समझ को समझकर ही टिप्पणी करें अपने विवेक से अन्यथा दूसरों के विचार अपने काँधे पर लादकर कृपया मोहरा ना बनें और ना ही अपनी बुद्धि का प्रदर्शन करें। किसी भी व्यक्ति या कार्यक्रम के बारे में निजी राय रखना मेरा अपना मत है और आपका सहमत होना आवश्यक नही। जिस अंदाज में भांड चाटुकारों को पदमश्री बंटे है उसके लिए भारत सरकार की आलोचना कर चुका हूँ और बड़े संस्थानों में अयोग्य लोगों को बिठाना यदि आपको नही चुभता तो मै सिर्फ आपको मुआफ़ ही कर सकता हूँ। आपकी छोटी दृष्टि के लिए मैं जिम्मेदार नही ।


फेसबुक  पोस्ट  31 जुलाई  16

सुनो, बेहूदा लोगों। तुम बेहूदा हो, कोई शक नहीं, दुनिया भी बेहूदा है और बेहूदगी के इस शिखर काल में बेहूदगी ही गुणधर्म है। बेहूदा लोग ही बेहूदाओं को आगे बढा रहे हैं। यही मापदंड है। लेकिन चूंकि मैं दुर्भाग्‍य से बेहूदा नहीं हूं, इसलिए आप को पूरा अधिकार है मुझे परेशान करने का। आप कर सकते हैं, करते रहेंगे। काश मैं भी आपकी तरह बेहूदा होता। चूंकि नहीं हूं, इसलिए इंजॉय योर बेहूदगी।

लेकिन अपने मूल्‍यों पर कायम रहना ठीक है।

किसी भी कला को पसंद करने या ना करने के अपने पैमाने होते है, चाहे बात संगीत की हो, कविता की या कहानी की. देवास में शेखर सेन का एक कार्यक्रम हुआ था, 31 जुलाई को तो मुझे पसंद नहीं आया क्योकि उन्होंने जो भजन, या कुछ रचनाएँ सुनाई वो मुझे पसंद नहीं आई इसलिए मैंने थोड़ा तल्ख़ लिखा और यह भी लिखा कि राम भजन गाने से लोग संगीत कला अकादमी में अध्यक्ष बन जाते है और विभिन्न अलंकरण भी प्राप्त कर लेते है, रजत शर्मा से लेकर अनुपम खैर के उदाहारण सामने है. मुझे शेखर सेन का गायकी वाला पक्ष समझ नहीं आया, हो सकता है वे महान हो, नाटक बेहतर करते हो, समझ निश्चित ही मुझसे उम्दा होगी, क्योकि पदमश्री प्राप्त है और उनका अपना एक श्रोता वर्ग है. पर यदि मुझे किसी की कहानी या कविता पसंद नहींआती तो हम समालोचना करते ही है पर जवाब में कभी किसी साहित्यकार ने खुद या किसी का कान्धा इस्तेमाल करके बिना हड्डी की जुबान वाला कुत्ता जैसे शब्दों से जवाब नहीं दिया, लोकतांत्रिक तरीकों से अपना विरोध जताया है. इस समय में किसी को भांड कहना कोई गाली नहीं है. यदि इतिहास की समझ इतनी कच्ची है तो मुझसे बहस मत कीजिये और जाकर पहले समझ बढाईये अपनी.

अफसोस हुआ कि बेहद संस्कारित माने जाने वाले तथाकथित लोगों ने शर्मनाक ढंग से टिप्पणी की वो भी असंयत भाषा में. दूसरा श्रोताओं को एक प्रतिष्ठित मंच से जब एक बेहद भद्दा या चलताऊ किस्म का चुटकुला यदि कोई पदमश्री कलाकार सुनाएँ जो महिलाओ के लिए अपमानजनक हो तो क्या हम इसके लिए गए थे, यह चुटकुला था 'पत्नी को पति कभी घूमाता नहीं और एक दिन वादे के अनुसार श्मशान घाट ले आता है और पत्नी के पूछने पर कहता है, पगली यहाँ आने के लिए लोग मरते है". यह चुटकुला बिलकुल भी अश्लील नहीं है पर कहाँ और किस श्रोता वर्ग को और किस प्रसंग के प्रत्यार्थ सुनाया जा रहा है यह मेरे लिए कम से कम विचारणीय है. लोग कपिल शर्मा के शो में भी आख़िरी तक बैठे रहते है इसका यह मतलब नहीं कि वह श्रेष्ठ शो है. देवास के इसी मंच पर उस्ताद से लेकर मूर्धन्य गायकों ने प्रस्तुतियां दी हैऔर इस सारे संदर्भ में मुझे लगा कि टिप्पणी करनी चाहिए. मुझे यह भी लगा कि हमारे शहर की कई भजन मंडलियाँ रसखान से लेकर मीरा, दादू, कबीर और ज्ञानदेव, तुकाराम तक के भजन सुनाते है फिर ये सज्जन जोआये थे इनका क्या?
दरअसल में हमने इस समय में सहनशकित के सारे पैमाने खो दिए है और बेहद आक्रामक होकर हम संस्कार, सभ्यता भूलकर जोश में या किसीअपढ़ के बहकावे में आकर टिप्पणी कर देते है पर जब तर्क की बात की जाती है तो भाग खड़े होते है. यह स्वाभाविक भी है क्योकि किसी और की भावना हम गाली - गलौज में निकाल लेते है और जब खुद को जवाब देने की बनती नहीं तो चुप्पी साध लेते है.
मुझे अपनी टिप्पणी का कोई अफसोस नहीं, ना मै डिलीट करूंगा, संगीत कला अकादमी के पदेन अध्यक्ष होने के नाते मै शेखर सेन का सम्मान करता हूँ पर उस दिन उनकी प्रस्तुती मुझे अच्छी नहीं लगी यह बात कहने के लिए स्वतन्त्र हूँ और जिसे आपत्ति है वे मेरी वाल ना पढ़े और ज्यादा दिक्कत है तो रुखसत ले लें पर मेरी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर बोलने और ओछे शब्द कहने का अधिकार किसी को नहीं है. और ध्यान रहें मुझे आपसे रोटी बेटी का सम्बन्ध नहीं निभाना है और ना मै आपकी दी हुई रोटी खाकर ज़िंदा हूँ और नाही मुझे आपसे या किसी से किसी प्रमाणपत्र की दरकार है या पुरस्कार की जिसे चाहिए वो लोग लगे है जुगाड़ और सेटिंग में ना मुझे कलाओं के धंधे चलाना है. बदतमीजी मुझे आपसे ज्यादा और कारगर तरीके से आती है.

घटिया किस्म के  कमेंट्स  आने  के बाद  फेसबुक टिप्पणी  2 अगस्त 16