Sunday, July 31, 2016

Posts of 31 July 16 शेखर सेन देवास में


बहुत कुछ नही होना था जीवन में.

कई बार गधों, मूर्खों और विशुद्ध नालायकों को ज्ञान - विज्ञान, सामाजिकता और अर्थ शास्त्र या मीडिया की बात करते देखता हूँ तो लगता है इन दरिद्र और पागलों के साथ क्या करूँ, जिन्हें बचपन से एक अभद्रता से बढ़ते देखा और सारे धत करम जानता हूँ इनके तो क्या इनसे बहस करना, फिर लगा कि उम्र बढ़ गयी है तो अक्ल आ गयी हो तो समझा दूं, पर बहुत विचार करने के बाद लगा कि अब आज से इनके साथ ना बात करनी ना तर्क , सिवाय अपने को कीचड़ में लपेटने के अलावा होगा क्या, क्योकि कहते है ना सूअर आपको कीचड़ में लपेटकर ले जाता है और फिर आनंदित होता है ? इससे अच्छा है छोडो, माफ़ कर दो और आगे बढ़ जाओ ।

कस्बे के संगीत समारोह अक्सर रसीले हुआ करते थे साल में गणेश चतुर्थी से लेकर बारह माह कोई ना कोई आयोजन होता रहता था , कभी रफी के नाम पर कभी रज्जब अली खान के नाम और कभी तानसेन के नाम पर, शहर भर के लोग झकास वाला लाल काला पीला कुर्ता और पैजामें की नाड़ी कसते हुए एक मात्र हाल में पहुँच जाते, एक तरफ औरते भयानक जरी की मोटी काठ पहने लकदक साड़ी में मेकअप लिपटे बैठी होती दूसरी ओर मर्द बैठते, पीछे लौंडे लपाड़े खड़े रहते जो गुटखा फंसाकर आते और शास्त्रीय संगीत से लेकर सुगम संगीत पर बहस करते।

जिनके खानदान में किसी ने संगीत नही सुना वे भैरवी और दरबारी को प्रातः का राग बताते , सारंगी बजाने वाले उस्तादों को मन कामनेश्वर के सामने वाला बैंड वाला बताते ढोल बजने की तुलना तबले से करते और सारा समय उचक उचक कर महिलाओं की पंक्ति में ताका किया करते। मराठी परिवार के कुछ कस्बे में बासी सब्जी की तरह सड़ रहे लोग संगीत समझने का ऐसा नाटक करते कि गर्दन गर्दभ स्टाइल में हिलाते और साले दो दिन के बाद गर्दन में कुत्तों टाइप पट्टा डालकर सब्जी लेने जाते।

यह विचित्र समय था जब कस्बे के पत्रकार एक दुसरे को पूछते कि यार कुछ मसाला दिया है क्या, दो चार समझदार थे तो पन्ने रँगकर पूरे प्रभाष जोशी बन जाते और अशोक वाजपेयी की स्टाइल में घिस देते। प्रशासन का कोई टुच्चा अधिकारी होम गार्ड के जवान की सुरक्षा में आता और आयोजक के सारे गुलदस्ते घर ले जाता मरियल सी जीप में डालकर और नाश्ते में रखे बिस्किट भी।

शहर के बुद्धिजीवियों के लिए यह कुर्ते शिकार करने का समय होता और अपनी चप्पलें सम्हालते हुए वे जसराज, भीमसेन जोशी , बिस्मिल्लाह खां साहब किशोरी अमोनकर की महफिलों के किस्से यूँ बयाँ करते मानो कल ही उनके रसोई से बेसन के पकौड़े खाकर गये हो। ये कला में यूरोप और पिकासा की कला में मोजार्ट पर बात कर सकते थे, फटे जाली वाली बनियान् पहने टूटी स्लीपर पहने ये लोग सरकार को कोसने में माहिर कम, लोगों की जिंदगी में ताक झाँक में ज्यादा रूचि लेते थे ।

ग्लोबल होती दुनिया में संगीत समारोह इनके लिए रंजकता से भरा एक हसीन जलवा था जिसे ये शिद्दत से भोगना तो चाहते थे पर एक रुपया देने में यूँ कन्नी काटते थे मानो किसी ने जायजाद मांग ली हो। आयोजक भी कम ना होते वे भी छोटे मोटे ट्यूशन खोरों से लेकर टैक्स बचा कर उद्योग चलाने वालों को दूह लेते और बाप दादाओं के नाम पर संस्थाएं बनाकर फर्जी उर्फ़ झकास कार्यक्रम की मलाई काटते।

भांड जब आत्म मुग्ध होकर किसी प्रतिष्ठित मंच पर चढ़ता है तो उसके मुंह खोलते ही सारी गन्द बाहर आ जाती है ।
देवास के संगीत समारोह में एक नजारा लाइव चल रहा है ।
अब समझ में भी आ रहा है कि क्यों ये भांड लोग संगीत कला अकादमी से लेकर फिल्म संस्थानों में काबिज है, राम भजन के साथ भद्दे चुटकुले सुनाने वाले और बेहद गलीज तरीके से आत्ममुग्ध ये लोग पता नहीं क्या समझने लगे है. 
आज जो देवास के एक मंच से देश की संगीत कला अकादमी के अध्यक्ष को देखा सुना उससे अंदाज लगाया जा सकता है कि ये लोग किस तरह से घटिया लोगों को संस्थाओं में काबिज करके संस्कृति को क्या स्वरुप देना चाहते है. मेरे लिए मेरी व्यक्तिगत राय में यह सबसे घटिया कार्यक्रम था उस मंच पर जहां भीमसेन जोशी से लेकर बिस्मिल्लाह खान साहब या तीजन बाई जैसी कलाकार ने प्रस्तुतियां दी हो.


युद्धे , यूद्धेवहे , युद्धामहे
अर्थात मैं युद्ध कर रहा हूँ , हम दोनों युद्ध कर रहे है और हम सब युद्धरत है।
- प्रकाश कान्त जी की एक कहानी से ।

Thursday, July 28, 2016

Posts of 28 July 16 Modi and Kejriwal & Sad Demise of Mahashweta Devi


Prisma Effect



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श्रद्धाजंलि 1084 की माँ
आप हमेशा भारतीय साहित्य की अन्तरात्मा बनी रहेंगी।
महाश्वेता देवी को नमन ।
लाल सलाम और जोहार, आदिवासियों की सच्ची हमदम चली गई।
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जिस महादेश में एक मुख्यमंत्री लोकतंत्र के प्रधानमंत्री से आतंकित होकर अपनी हत्या की आशंका जाहिर कर रहा हो वहाँ दलितों का पीटना, महिलाओं का पुलिस के सामने धर्म रक्षकों से मार खाना और अखलाख का बाहर खींचकर मार दिया जाना कोई बड़ी बात नही।
इतिहास में इससे बड़ी दुखांत घटना नही मिलेगी और यह जान लें कि अरविन्द केजरीवाल की तार्किक, अकादमिक और बौद्धिक क्षमता मन मोहन से दस हजार गुना बेहतर है और इसलिए अगर वो कह रहे है तो गम्भीरता समझिये कि देश में हम आप किस स्तर पर है, प्रशासन में बैठे लोग कितने दबाव में काम कर रहे है, एनजीओ में कितना आतंक है, न्यायपालिका का क्या हश्र हो रहा है और नागरिकों की जान माल और अभिव्यक्ति की सुरक्षा देने में केंद्र में सरकार नाकाम हो गयी है।
मित्रों यह बेहद संकट की घड़ी है, इसे अरविन्द का नाटक ना समझा जाकर आये दिन रोज हो रहे हमलों, प्रताड़ना, बर्बर युगीन ट्रीटमेंट और फासीवाद के बरक्स देखना चाहिए। मन मोहन और अमित शाह की खतरनाक जोड़ी और देश भर में सत्ता के मद में अंधे होते जा रहे तथाकथित राष्ट्र वादी लोग जिन्हें ना समझ है ना अक्ल, बस अपने धंधे बढ़ाने और रुपया कमाने को हर तरह का जोखिम लेकर देश की संस्कृति, मूल्य और गंगा जमनी तहजीब का सत्यानाश कर रहे है।
लोकतंत्र का काला अध्याय लिखा जा रहा है। इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर विरोधियों को जेल में डाला था पर ये तो सीधे मार रहे है ह्त्या कर रहे है। क्या ख़ाक विदेश में छबि सुधर रही है ।
फिर कहता हूँ मन मोहन भारत के इतिहास में सबसे कमजोर प्रधानमंत्री और निरंकुश तानाशाह है। ये भारत की अक्षुण्णता के लिए सबसे घातक सरकार है जो दो साल में हर मोर्चे पर असफल रहने पर चुने हुए जन प्रतिनिधियों की गिरफ्तारी के साथ ह्त्या भी कर दें तो कोई बड़ी बात ना होगी।
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कल एक मित्र के यहां से जब बाहर निकले तो पाँव पोछ पर ध्यान गया। 


शायद पूरी दुनिया की यह हालत है और फेसबुक की भी !!!

क्या कहते है !


Sunday, July 24, 2016

नरेंद्र मोदी - सिर्फ एक बार आत्म विश्लेषण करो Posts of 24 july 16

नरेंद्र मोदी - सिर्फ  एक बार  आत्म विश्लेषण करो 

दलित , मायावती, दया शंकर की बीबी के बहाने और गुजरात दलित पिटाई की आड़ में देश और दुनिया के महानतम मन मोहन सिंह फिर अम्बानी, अडानी और अपने आकाओं को फायदा पहुंचाने की फिराक में है। यही मायावती भाजपा की गोद में जाकर बैठेगी और सत्ता हथियायेगी। अभी ढाई साल से चल रहे "ध्यान भटकाओ और देश का सत्यानाश करो" वाला फार्मूला अपनाया हुआ है मन मोहन ने और आततायी की तरह से दंगा, धंधा, लूट और छूट का खेल खेल रहे है। दलित स्त्री, रंडी, वेश्या, बेटी के लिए मैदान में और पाक्सो आदि तो दादरी, गौ माता और बीफ़ के आगे के मुद्दे है ।
दलित के बहाने से संघ तुम्हारी लुटिया डुबो रहा है, आरक्षण के मामले में भागवत पुराण ने बिहार में रायता फैलाया था, अब ये दलित मुद्दे और माँ बहनें उप्र में पर्दा फाश करेंगी। असल में दिक्कत ये है कि डा मन मोहन सोनिया की कठपुतली थे और तुम ....
क्या बेवकूफ बनाते है अफजल, कन्हैया, दादरी, बीफ , गाय, भैंस, कश्मीर, पठानकोट, गुजरात, से लेकर अब मायावती पर मंदिर, 370, समान आचार संहिता , पकिस्तान, भ्र्ष्टाचार, व्यापमं, नक्सलवाद , बोडोलैंड, सूखा बाढ़, कुपोषण , आदि पर ये क्यों नही बोलते, क्योटो का क्या हुआ, बुलेट ट्रेन और विकास के बारे में बोलोगे, जहां गये वोट की भीख मांगने भाषण पिलाने वहाँ हरित क्रांति आयेगी जैसा दिल फरेब नारा दे आये और देश को दो साल में कर्जें से पाट दिया।
कांग्रेस को गलियाते रहोगे, 60 साल का कचरा दो साल में नही उठा सकते तो काहे मेडिसिन चौक पर संडास की भीख माँगी विदेशियों से, एक रिजर्व बैंक का निदेशक तुम्हारी पोल खोलकर चला गया, तुम्हारे 80 मंत्रियो में एक भी तुमसे खुश नही , सिवाय अपने हमजाद अमित शाह के तुम्हे किसी पर भरोसा नही, सारे काम "मैं करूँगा की जिद में आता ना जाता भारत माता" की तर्ज पर हर फैसला गलत साबित हो रहा है तुम्हारा। चुनाव हार रहे हो, जनाधार खिसक गया है, सुप्रीम कोर्ट से दो राज्यों में मुंह की खाकर बैठ गए हो - इंदौरी लठैत से भी दो राज्यों में कुछ झंडे नही गाड़ नही पाएं - ना खरीद पाएं जमीर। एक शिवराज, रमणसिंह और एक वसुंधरा का विकल्प तो नही है तुम्हारी विशालतम सदस्यों वाली पार्टी में तो क्या करोगे मन मोहन ?
अपनी पार्टी के बड़बोले उजबक सांसदों के मुंह तो नही बाँध पाएं जो साधू के भेष में तुम्हारी नाव में छेद कर रहे है, एक बलात्कारी निहालचंद्र को कैबिनेट से निकालने में दो साल लग गए तो कैसे अच्छे दिन लाओगे मन मोहन !!! तुम्हारी नाक के नीचे अरविन्द के निर्दोष लोगों को पकड़ने में तुम्हारी शक्ति जाया हो रही है, एक जंग को मोहरा बनाकर दिल्ली में खेल खेलना बहुत महंगा सौदा पड़ गया वह अरविन्द तो पंजाब या कही और चला जाएगा पर तुम्हारा क्या होगा विश्व विजयी बनने का सपना अधूरा ही रहेगा। आम के लोग तुम्हारे रोज मजे लेते है सरे आम खिल्ली उड़ाते है और जो भद पीट रही है उसे पूरी दुनिया देख रही है। एक चूहे ने घण्टी बाँध दी और अब वह चिंदी लेकर रोज दौड़ता है और तुम दुनिया में जहां जाते हो वहाँ से किसी खूसट सास की तरह से दिल्ली में उलझे रहते हो, तुम्हारी सारी ताकत एक अरविन्द से लड़कर खत्म हो गयी पर उसका दिल्ली के बाद दुसरे राज्यों में आधार बढ़ गया। उफ़ , यही है तुम्हारी राजनैतिक समझ !!!
विश्व भर में घूम कर तालियां तो बटोरी पर लच्छों से देश दुनिया नही चलती - ना एन एस जी में गये, ना फ्रांस ने मदद की , ना चीन ने चाटा, अफ़सोस कि बराक भी जाते समय धोखा देकर जा रहा है।
थोड़ा ठहरो तो, आत्म मंथन करो जिस देश के 31 % ने भरोसा करके वोट दिया - वो लोग तुम्हारी डिग्री और तुम्हारी शिक्षा मंत्री पर तंज कसते हो, जो तुम्हारी निजी जिंदगी का मजाक बनाते हो, राहुल जैसा मूर्ख तुम्हारा राजनैतिक प्रतिद्वंदी हो, लालू , नितीश , ममता से लेकर जयललिता जैसे लोग आईना दिखा रहे हो तो क्या ख़ाक प्रधानमंत्री हो देश की अवाम के।
मेरी मन मोहन से कोई दुश्मनी नही पर दया आती है कि इतने बड़े पद पर होकर भी तुम्हे लोग सिर्फ और सिर्फ एक विकल्प से ज्यादा नही मानते , यहां तक कि तुम्हारी पार्टी के लोग भी। थोड़ा आराम कर लो, माँ के पास चले जाओ थोड़े दिन और एक बार फिर से अपने आप से कहो कि मैं भारत का प्रधान मंत्री हूँ गुजरात का मुखिया नही। नही होता तो छोड़ दो हम दूसरा और खराब आदमी झेल लेंगे मन मोहन !!! याद रखना ये माल्या, अम्बानी या अडानी और टाटा किसी के क्या अपने बाप के नही हुए तो तुम्हारे क्या होंगे !

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Friday, July 15, 2016

Posts of 10-15 July 16 कहानी रामनारायण का कुछ हिस्सा / कतील की गजल




ज़िंदा रहने के लिए समझौते कर लेते है लोग और यह भूल जाते है कि एक रीढ़ की हड्डी थी जो पैदा होते समय ठीक उनके पीछे पीठ से सटी थी और उसी के सहारे वे बड़े होते गए, उसी में से दिमाग के सारे आदेश तंत्रिकाओं से बह कर शरीर के उन अंगों तक पहुंचे जिन्होंने इंसान को चापलूस और गलीज बना दिया।

बिछते हुए देखता हूँ तो शर्म आती है ऐसे लोगों पर जो एक इंसान के ही आगे इतने झुक जाते है कि कैसे फिर आईना देख पाते होंगे, कैसे अपने घर आँगन में तन कर खड़े हो पाते होंगे, अपने बच्चों से कैसे नजरें मिलाते होंगे।
राजनीति और प्रशासन तो ठीक क्योकि वहाँ तो मानक पैमाने ही ज़िंदा रहने के ये है, पर आप तो व्यवस्था से अलग होकर प्रतिपक्ष बुन रहे थे ना, आप तो एक अलग राह पर चलकर कही और सबके साथ सबके हित साधते हुए चलते रहना चाहते थे ना, आप तो उस ज्वार का जज्बा लेकर आगे मशाले जुलुस में समिधा बन रहे थे जिसे नेतृत्व कहते है, आप तो व्यवस्था से मुठभेड़ लेकर सर्वजन हिताय की बात कर रहे थे ना , फिर क्या हुआ कि एक अदना सामान्य आदमी जो रट्टा मारकर एक परीक्षा पास कर आया है , आपसे ज्यादा छोटा, अनुभवहीन युवा है, बेहद अड़ियल और जिद्दी बन्दा जो आपके स्टेज पर सामाजिक जागरण का प्रणेता और पुरोधा होने का नाटक करता है, और अपने कक्ष में ऐयाश, भृष्ट तानाशाह की भांति काम करता है, आप उसके चरणों में झुक गए जिसे प्रशासक कहते है।
बाबू मोशाय आप उन्ही गरीब दबे और कुचले लोगों को इसी ढीट प्रशासक के सामने फूलदान में परोस कर अपनी रोटी का जुगाड़ कर रहे हो, तुमसे तो यह कहना भी बेकार है कि शर्म हया क्या होता है , काश कि तुम यह बहुत बारीक सा अंतर समझ पाते, अपनी शर्तों पर जीने और काम करने के मकसद समझ पाते, इससे तो अच्छा था कि तंत्र का पुर्जा बनकर डुगडुगी पीटते - जो असंख्य लोग करते है तो कुछ हासिल होता पर तुममे तो अब यह सोचने समझने की शक्ति भी चली गयी है।
बेहद शर्मिदा हूँ कि इस तरह से खत्म होते देख लिया है, मुआफी चाहता हूँ कि मुखौटों को बदलने के खेल में जितने तुम माहिर हो गए हो उसकी बराबरी तो विश्व इतिहास में कोई नहीं कर सकता।
ईश्वर अगर कही है तो तुम्हे जीते जी शान्ति प्रदान करें क्योंकि तुम अब अपनी लाश ढो रहे हो।
आमीन !!!
(बरसों से पेंडिंग अपनी एक कहानी का चरित्र जब एक कलेक्टर के सामने बिछ जाता है तो, को उभारते हुए - पर हकीकत आज भी बदली नही है, आज मीडिया या एनजीओ में मित्रों को एक व्यवस्था के लोक सेवक जैसे तहसीलदार, एस डी एम या एस पी, कलेक्टर के सामने बुरी तरह से दबा और घिघियाते हुए देखता हूँ तो मन के किसी कोने से शोक संतप्त भाव आते है और दिमाग में कीड़े रेंगने लगते है, उफ़ इंसानी फितरत)
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आप लोगों के लिए ये शेर जो घर बैठकर कश्मीर कश्मीर का रोना रो रहे है ।
***** निदा फ़ाज़ली जी के ये शेर ****
हर बार ये इल्ज़ाम रह गया..!

हर काम में कोई काम रह गया..!!
नमाज़ी उठ उठ कर चले गये मस्ज़िदों से..!
दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया..!!

खून किसी का भी गिरे यहां 
नस्ल-ए-आदम का खून है आखिर
बच्चे सरहद पार के ही सही 
किसी की छाती का सुकून है आखिर

ख़ून के नापाक ये धब्बे, ख़ुदा से कैसे छिपाओगे
मासूमों के क़ब्र पर चढ़कर, कौन से जन्नत जाओगे

कागज़ पर रख कर रोटियाँ, खाऊँ भी तो कैसे
खून से लथपथ आता है, अखबार भी आजकल

दिलेरी का हरगिज़ हरगिज़ ये काम नहीं है
दहशत किसी मज़हब का पैगाम नहीं है
तुम्हारी इबादत, तुम्हारा खुदा, तुम जानो
हमें पक्का यकीन है ये कतई इस्लाम नहीं है
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जिन लोगों ने अपने गाँव, कस्बे, शहर या राज्य की सीमा नहीं पार की, और सारी जिन्दगी गली मुहल्ले में चोर उचक्कों की तरह से लोगों से चवन्नी अठन्नी लूटने में लगा दी, गली मोहल्ले में लाठी घुमाते हुए उठक बैठक के खेल खेलते रहें, वे लोग कश्मीर की समस्या पर बात कर रहे है......राष्ट्रवाद लिखना ना आता हो ना इतिहास की समझ हो पर 370 पर बात कर रहे है, शेख अब्दुल्ला को अपने पोस्तीपुरा के टोस्ट बेचने वाले समझ रहे है........यह कोरी बुद्धिजीविता जरुर दो साल में बढी है खूब विकास हुआ बेचारे छदम क्रांतिकारी............
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बहुत मौजूँ है फैज़ अहमद फैज़ साहब आज....
"निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन कि जहां

चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहनेवाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जां बचा के चले"

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काले बादलों से निकला उजला सूरज
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अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको 
मैं हूँ तेरा नसीब अपना बना ले मुझको

मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी 
ये तेरी सादादिली मार न डाले मुझको


मैं समंदर भी हूँ, मोती भी हूँ, ग़ोताज़न भी 
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको

तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी 
ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको

कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ 
जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको

ख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन-दामन 
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको

मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन
मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको

मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामाँ प्यारे 
तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको

तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम 
तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझको

वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ "क़तील" 
शर्त ये है कोई बाँहों में सम्भाले मुझको

Tuesday, July 12, 2016

"बुद्धिजीवी माफिया"- - अनिल कार्की 12 July 16


युवा साथी और स्नेहिल मित्र Anil Karki की यह कविता सामयिक ही नही बल्कि हमारे पूरे परिवर्तन की ध्वजा उठाये साथियों की हकीकत बयाँ करती है और इस समय मानीखेज इसलिए है कि ये असलियत उघाड़कर सारी नंगाई सामने लाती है।
कामरेड का कोट कहानी याद आती है और अनिल बहुत खूबसूरती से इन सामाजिक गिरगिटों से बचने का इशारा भी करते है। जो राजनैतिक विचारधारा खुलेआम कर रही है उसे तो छोड़ ही दीजिये पर ये जो शातिर है हमारे बगल में बैठकर पाश , दुष्यंत कुमार और गोरख पांडेय को कोट करके धंधा चलाता है, रैली निकालकर EPW में लिखता है उसका क्या। यार, अनिल मजा आ गया, सौ सौ जिंदगियां कुर्बान इस कविता और तुम पर दोस्त।
कही शिल्प टूटा भी है और भाषा का गणित भी पर क्या कहते है भावना को समझो प्यारे !!
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"बुद्धिजीवी माफिया"
वह जो है
नेताओं की तरह
उसका कुरता झक्क सफेद नहीं है
बल्कि दीमक की त्वचा वाला रंग है
उसके कुरते का
खद्दर के झोले में
किताबें है जिसकी
चश्मा जिसका नाक पर
पेट बड़ा है
बावजूद वह
जनता के पक्ष में खड़ा है
वह हांफता है तो
चेले हवा देते हैं
वह बोलता है तो
तालियां बजती है
बिसलरी की बोतल
इतराती बलखाती चली जाती है पास
वह रुकता है
भाषण के बीच
भाँपता है
और फिर हाँपता है
पानी पीता है
तसल्ली से फेंकता है शब्द
फिसलनदार
जनता देखती है उसके मुंह
जबकि वह किसी पहुंचे हुए
जादूगर की तरह
खुद पीकर पानी
हमारी प्यास मिटा देता है
वह करामाती है
जहर खुरान है
उसके पास सुंघाने को नहीं है
जहर न खिलाने को
वह कान के पास आकर बोलता है
आम, गरीब, किसान, औरत,
मजदूर क्रान्ति, स्वराज, जल, जंगल,जमीन
और कई लोग देखने लगते है
नीद में सपना
जबकि वह अपनी चकमक आभा में
हमारी आँखों की रौशनी को छीन देता है
झंडे लहरा रहे हैं
स्वराज आ रहा है
पुलिस चाक चौबंद है
हम लडेंगे साथी कोई गा रहा है
दरियाँ बिछायी जा रही हैं
मायिक लागाये जा रहे हैं
हैलो चेक चेक कहते हुए
मायिक टेस्टिंग हो रही है
समवेत स्वर गूँज रहे हैं
और ठीक इसी समय में मंच पर
बैठा आदमी
धन्यवाद देता है
पत्रकारों का
पुलिस को कहता है
शांति व्यवस्था बनाने के लिए आभार
और जनता से कहता है
हमे और अधिक होना है
हम अभी कमजोर हैं
यह कहता हुआ वह मंच से उतरता है
और तालियां बजती है
हम कमजोर हो जाते हैं
वह कौन है
जिसकी नजर है
हमारे सपनों की गठड़ी पर
जिसने बेच खाये हैं
हमारे क्रान्तिदर्शी स्वप्न
वह जो अब
गिरगिट की तरह कलगी लिए
टपटपा रहा है मुंह
और हम उसके मुंह से अमृत झरने का कर रहे हैं इंतजार
हमें कभी कभी पीने चहिये
कड़वे घूँट सच के
मीठा सुनने के लिए अभिशप्त
कानों को कुछ समय के लिए
मुक्त कर देना चहिए।
- अनिल कार्की

Monday, July 11, 2016

Role of Press and Advertisements - Posts of 10-11 July 16


भीगा आसमान, गीली धरती और कोयल
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रिमझिम में नेह की अमृत बूँदें
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जिस देश में सेनेटरी नेपकिन, गुटखा, पान मसाले, टूथपेस्ट, और चड्ढी बनियान से राष्ट्रीय न्यूज प्रायोजित होती हो और नीम हकीम, संगम तेल, जापानी तेल और अंग वर्धक फर्जी उपकरणों से अखबार चलते हो, पोर्न तस्वीरों से अखबारों के ई संस्करण निकलते हो, ब्लैक मेल करके टेबलाईट या सप्लीमेंट निकलते हो, थानों से आई दारु और आय ए एस अधिकारी के बंगले पर हुई शराब, शबाब और कबाब पार्टी से देर रात लीड न्यूज बनती हो, सत्ता और सरकार के भृष्ट मंत्रियों के थोबड़े दिखाते विज्ञापन और कभी जमीन पर ना दिखने वाली योजनाओं से पत्रिकाएं छपती हो वहाँ आपको क्या उम्मीद है कि मीडिया चौथा स्तंभ है, मुआफ़ कीजिये आप भी निरे मूर्ख है फिर तो !!!
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जनसंख्या दिवस पर जनसंख्या रोकने वाले भूल चुके है कि वे पैदा हो चुके है !!!
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खालिद का बुरहान की तुलना चे से करना गलत है इसलिए कि चे ग्वेरा एक बड़ी क्रान्ति की बात करते है और बदलाव की बात करते है और अलग मुक्ति की बात करते है जबकि यहां एक घोषित लड़ाकू को, जो भाई की मौत का बदला लेना चाहता है, को महिमा मंडित किया जा रहा है। मुझे लगता है कश्मीर पर अलग से संविधान और बाकी पूर्वाग्रहों से हटकर बात करने और तुरन्त समाधान की जरूरत है। यह काम देश के सभी लोगों को मिलकर करना चाहिए नाकि सिर्फ मोदी महबूबा और मीडिया। हम सब जानते है कि ये तीनों खाली और पूर्वाग्रहों से ग्रसित है बुरी तरह से।

Saturday, July 9, 2016

Allhabad Tourist Diary by Subodh Shukla

मैंने हमेशा इसे अधबना पाया है. रोज़ थोड़ा सा ढह जाता है, बार-बार ज़रा सा मिट जाता है....सभ्यताएं इल्ज़ाम की तरह थोप दी जाती हैं इस पर और यह अपनी उजड्डता की ज़मानत पर रिहा हो जाता है........

इस शहर का कोई मालिक नहीं, कोई दावेदार नहीं.... बालू से लेकर ईश्वर तक सब यहाँ किराये पर रहते हैं..यह अलग बात है कि आज तक न बाकी वसूला गया और न ही बकाया चुकाया गया.....

जितनी भी काट-छांट कर ली जाय अपनी नाप से हमेशा बाहर निकल जाता है यह. इतिहास को बेनामी और वक़्त को दीवालिया बनाना कोई इससे सीखे......

फैसलों तक पहुँचने में जल्दबाज़ नहीं है यह शहर. मशवरे यह लेता नहीं. इशारे यह करता नहीं और पछतावों की इसे आदत नहीं...वंचनाओं के बियाबान में अपनी बेतरतीबी को सींचता रहता है यह - गुमसुम, चुपचाप और विस्मित...

विरासतों की दीमक लगी ज़िल्द के भीतर लगभग नम और पीली पड़ चुकी आस्थाओं के कागज़ पर यह शहर थूक लगी अँगुलियों के निशान की तरह दर्ज़ है....कागज़ जितना पीला पड़ता जाता है निशान उतने गहरे होते जाते हैं.....

हर कीमती चीज़ को धूल बनाने का आदी है यह शहर. हर आदर्श को स्वांग बना डालने में माहिर और हर उत्साह को टोटका...जितनी होड़ में हैं उतने ही संदिग्ध हैं आप इस शहर के लिए

स्पर्द्धाएं गिरवी रखे रहता है यह शहर.और काहिली को क़र्ज़ की तरह सौंपता है...क़र्ज़ चुकता हुआ नहीं कि आप सज़ायाफ़्ता हुए. आपका कर्ज़दार मरना ही इस शहर को ज़िंदा रखता है........

कल्पनाओं में जितना बेरहम है, प्रतीक्षाओं में उतना ही बेरोज़गार है यह. विस्मृति, उमस और नियति, सीलन की तरह फ़ैली है इस शहर में.....एक चिपचिपी सी बदमिजाज़ी इसीलिये हर वक़्त महसूस होती है इसके पास.......

यह नीम उजालों और मटमैले अंधेरों का शहर है. इस शहर की कोई कुंजी नहीं. इस शहर को कोई दस्तक नहीं देता... बिना आहट, चोर-पाँव बस इसकी देहरी लांघ ली जाती है, इसे कोई भनक दिये बगैर.....

यह शहर एक लत है. एक करवट पर लेटा हुआ, अपनी पिनक की नब्ज़ में हमारी चिढ़ का बुखार नापता हुआ.....अपनी गति में असाध्य, अपनी नियति में अछूत......

जैसे ही इसे दृश्य में बदलेंगे यह ओझल हो जाएगा. ज़िल्द चढ़ायेंगे, अपने को तितर-बितर कर देगा, दुलरायेंगे तो हिंसक हो उठेगा. खुद को चौंका देने के हर उतावलेपन को यह या तो कामचलाऊ बना डालेगा या हास्यास्पद.......

यह शहर पुकार नहीं लगाता..आपके बगल में खड़े होकर भी हो सकता है उम्र भर न बोले..... कब कुहनियों से धकियाता हुआ निकल जाय पता नहीं चलता..कब पीठ पर रेंगकर कंधे पर सवार हो जाय और सर चढ़कर बोलने लगे भनक नहीं लगती.....एक बेवजह ज़िद और बेमतलब ऊब के बीच उनींदा लेटा हुआ यह शहर जितना गुम है उतना ही हाज़िर भी है.....

इलाहाबाद एक लावारिस शहर है..इससे लापरवाह होकर मिलिये. अगर आपने इसे पालना-पोसना शुरु कर दिया तो यह आपको अपने पैरों पर खड़ा नहीं रहने देगा...

यह शहर झरोखों से नहीं पुकारता, आड़ से नहीं देखता. पूरी बेहयाई से यह आपको तब तक घूरता रहता है जब तक आप अपनी नज़रें नीची न कर लें - शर्म से या डर से...


Friday, July 8, 2016

Posts of July I week idd and Aam Bhat



अपने हर इक लफ्ज़ का खुद आइना हो जाऊंगा 
उसको छोटा कह के कैसे मैं बड़ा हो जाऊंगा।


"दुश्मनों ने हमें क्या कहा ये हम याद नहीं रखेंगे, लेकिन दोस्तों की खामोशी को हम कभी भुला नहीं सकते"


मार्टिन लूथर किंग जूनियर

ईद मुबारक
आज घर था तो सोचा आमभात बनाया जाए। सन 1976-77 की बात है , पापा मनावर में काम करते थी, छोटी सी ब्लॉक कॉलोनी में क्वार्टर था, इंदौर आदि के लोग थे। उनके परिजन और बच्चे छुट्टियों में धमाल करते थे। हम भी माँ के साथ पूरे दो महीने मनावर में रहते और मजे करते थे। मनावर में स्टेट बैंक की नई शाखा खुली थी, एक करकरे साहब आये थे उनका परिवार भी था। बैंक खुलने की पार्टी उन्होंने घर दी थी और उनकी पत्नी ने लजीज आमभात बनाया था, जिसका स्वाद आज तक भूला नही हूँ। तब से हर साल सीजन में एक बार जरूर बनाता हूँ।
बहुत सरल है बनाना, आप भी बनाइये इस तरह से और मेरी फीस के रूप में 25 % पार्सल कर दीजिए बस।
बासमती चावल को धोकर घी में भूरा होने तक बघार ले और फिर थोड़ा सा पानी डालें, आधे पकने के बाद गाढ़ा सिर्फ आम का रस डाल कर तक मद्धी आंच पर पकाएं, ध्यान रहे रस में दूध ना हो। फिर जब रस में चावल पक जाए तो शक्कर डाल दें और थोड़ा ज्यादा घी। चाशनी गाढी होने तक बिलकुल हल्की आंच पर पकाएं , फिर बारीक खोबरे का बुरादा डालकर ठंडा करें और बाद मेवे डालकर परोसे। इसे आप आठ दस दिन तक रख सकते है.