Tuesday, May 31, 2016

Posts of 31 May 16 SNCU Dewas MG Hospital and High Death rate


SNCU यानी नवजात शिशुओं की देख रेख की विशेष इकाई।
देवास में जनवरी से 29 मई 2016 तक कुल 505 नवजात भर्ती हुए और 87 बच्चे मर गए , 39 बच्चों को रेफर किया गया।
अब बताईये, बच्चे सिर्फ एम व्हाय में नही मर रहे, रीवा में जलने के खतरे पर नही, सब जगह यही हालत है। देवास में यह इकाई ‪#‎यूनिसेफ‬ के सहयोग से चल रही है पर पिछले कई माहों से इसमें ना डाक्टर है और ना ही उपकरणों की मरम्मत हो रही है, अप्रशिक्षित और तदर्थ डाक्टरों के भरोसे चल रही है यह यूनिट। सब उपकरण खराब पड़े है - 20 में से 8 वार्मर, सक्शन 5 में से 4, सी पॉप मशीन दोनों, सीरीज मशीन 14 में से 5, एसी 11 में से 9, और मल्टीपेरा मीटर 5 में से 3 खराब है महीनों से ऐसे में आप उम्मीद करते है कि जो बच्चे भर्ती है या रोज लाये जा रहे है इलाज के लिए वो ज़िंदा बचेंगे ? अधिकाँश अनट्रेंड स्टाफ बच्चों को डील कर रहा है।
जो राज्य अपने बच्चों के सुरक्षित जीवन के लिए पहल नही कर सकता या माकूल इंतजाम नही कर सकता वह घोर लापरवाह और निकम्मा राज्य है और वहाँ का पूरा प्रशासन हत्यारा है इन पर बाकायदा रिपोर्ट की जाना चाहिए।
इसी राज्य ने आठ दिन पहले तक साधू संतों की सेवा के लिए दुनियाभर की पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी, रुपया और विदेशी लोगों के विशेषज्ञ बिठा दिए थे उज्जैन में तब कैसे मैनेज हुई सब बातें।
मित्रों, यूनिसेफ को मैं कोट करता हूँ तो निंदा के लिए बल्कि इसलिए कि वहाँ संवेदनशील लोग, बड़े भाई अनिल गुलाटी जैसे बेहतरीन शख्स बैठे है और इस पूरे अंधियारे में उम्मीद की किरण सिर्फ वही नजर आती है पर जब उनके प्रभारी सलाहकार, जो निश्चित ही होंगे, भी कुछ नही कर पा रहे, तो फिर मैं जो इस नाकाम तन्त्र को थोडा बहुत समझता हूँ किससे उम्मीद करूँ या किस ओर देखूँ।
और मामला बच्चों का है, मिलेनियम गोल की अवधि खत्म हो गयी पर शिशु मृत्यु दर कम नही हो रही। जब जिला स्तर के अस्पताल की यह हालत है , वो भी देवास जैसे जिले की जो पहुंच में है, कोई मण्डला डिंडौरी की बात नही कर रहा मैं , तो फिर बाकि ब्लाक और अन्य पिछड़े जिलों का क्या होगा।
बेहद हालात खराब है और सच लिखने पर निगेटिव, फ्रस्ट्रेशन और भाजपा विरोधी करार दे दिया जाता हूँ और अब इससे मुझे भी लगने लगा है कि क्या मैं सच में विकास विरोधी हूँ ? पर इन सब सत्यों का क्या जो सामने है ?
Sorry for tagging you Sachin Kumar Jain , since you are working on IMR rigorously, hence thought to put these harsh facts that infants are not dying merely because of calamity or irresponsible acts of doctors in Indore or Rewa but the system and state is delibrately attempting to kill them, I dont know why.

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हिंदी कविता के कुछ लोगों को छोड़ दूं तो बहुत गलीज लोगों से घिरा हुआ पाता हूँ कविता को जो बेबस है और मुक्ति की कामना में तड़फ रही है। ये वही लोग है जो अंदर से इतने घटिया और गन्दे है कि कवि तो दूर इंसान होने लायक नही है चापलूस, मक्कार, रीढ़विहीन, दोगले, जहर और बदले की भावना से भरे हुए और एकदम घटिया इतने कि आप जान जाए कि ये कवि है तो कविता पढ़ना छोड़ दें । हाँ दूसरों के दोष निकालने और सम्बन्ध बनाने में सिद्धहस्त और बटोरने में पारंगत चाहे फिर वो कूड़ा हो या दलाली या रास्ते में पडी भोग योग्य सामग्री !!
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हिंदी के स्थापित या घोर छपासू लेखक के काम को आगे बढ़ाने के लिए उसके घर में तीन चार लेखक होना जरूरी है यह काम कोई भी कर सकता है - बेटा, बहू, बेटी, दामाद, पोता, पतोहू या गिलहरी, बिल्ली, तोते या पालतू .....
ध्यान रखिये यह लेखन की पहली शर्त है !!!

Saturday, May 28, 2016

उफ़ गोविंदा ...........बकलम सुबोध शुक्ला 28 May 16

उफ़ गोविंदा ...........बकलम Subodh Shukla

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सुबोध ने एक वर्जित फल की तरह से बुद्धिजीवियों के बीच अछूत गोविंदा और उनके पूरे फिल्मी संसार को जिस अंदाज में लिखा है पिछले सात दिनों में यकीन मानिए मै तो क्या आप भी गोविंदा से प्यार करने को मजबूर हो जायेंगे. और हाँ सिर्फ इतना कि एक लगभग विक्षप्त, निर्लज्ज छबि को समाज में स्थापित करने वाले एक हीरो और एक विशेष दर्शक वृन्द को संबोधित करने वाले हीरो को हमारा साहित्य का अनुरागी और एक जवान होता युवा कैसे देखता था, आज जब वह पलटकर अपने उस काल को देखता और विश्लेषित करता है तो कैसे पूर्वाभासों और बदलाव को देखता है. यह छोटा सा प्रयोजन मूलक लेखन बहुत गहरे इशारे भी करता है और सतर्क भी.
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I
नब्बे के दौर में जवान होने के लिए गोविंदा एक वर्जित फल की तरह काम्य और निषिद्ध दोनों था. गोविंदा हमारी जवानी का सूचकांक था. भद्रता की पतलूनों में हम उसे चोर-जेब की तरह रखते थे. वह हमारे संस्कारों का रेड लाइट एरिया और आस्वादों का कॉफ़ी-हाउस हुआ करता था. उसने बताया कि कैसे लम्पटपन एक सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी है, झूठ एक प्रतिरोध है, ठगी एक दर्शन और इश्क हाथ की सफ़ाई है.
II
गोविंदा को बारगेन नहीं किया जा सकता था. वह ब्लैक में मिलने वाली चीज़ थी. उसके कट-पीस उपलब्ध नहीं थे....उसे तो पूरा थान में ही उठाना होता था....
III
उसने हमारे दौर को संस्कारहीन किया. शिष्टाचार के ट्रेड-मार्क बदले. जालसाज़ी को सौन्दर्य-बोध बनाया और कुतर्क को एक्टिविज़्म. वह हिन्दी सिनेमा में कट्टरपंथी मनोरंजन का प्राक्-पुरुष है.
IV
वह नसीहतों के कब्ज़ों पर मनमानी की जंग की तरह चढ़ा था...हमें जो गुनाह बताया गया था वह उसे अदब कह रहा था. शर्म को रैकेट की तरह इस्तेमाल करने वालों के बीच उसने बदमिजाज़ी को धर्म और फ़ितूर को कारोबार बनाकर खड़ा कर दिया.....
V
उसने लोकाचार के सारे नैरेटिव्स तोड़े...वह बेडरूम को चौराहों तक ले गया, विफलता को हुनर तक और हास्य को हिंसा तक......उसने निजता को जुमले की तरह इस्तेमाल किया और उसे लगभग अवैध बना डाला......
VI
उसने कला की ज़मींदारियां ख़त्म की.....नायक हमारे पड़ोस, नुक्कड़ों और गलियों का एक लावारिस और बदतमीज़ सा चेहरा हो गया.. उसने 'हैसियत' को उसकी 'औकात' दिखाई, अभिनय से हफ्ता वसूला और पटकथाओं से फ़िरौती.....
VII
उसने 'सार्वजनिकता' को गिरोहबंद किया और 'व्यक्ति' को तस्करी के माल में बदला... पर तात्कालिकता की कालाबाज़ारी करते हुए कब वह कल्पना की ख़रीद-फ़रोख्त में समय को बैंक्रप्ट करता चला गया पता ही नहीं चला... गोविंदा हमारे दौर का सबसे सफल, उत्सवधर्मी और दीर्घजीवी आत्मघात था, बिला शक.....
समाहार
इसी के साथ हर पोस्ट पर भाई Vivek Nirala के अदभुत कमेंट्स और सुबोध के साथ की गयी जुगलबंदी भी काबिले तारीफ़ थी. शायद ही किसी फ़िल्मी हीरो के बारे में ऐसा लिखा गया होगा. शुक्रिया दोनों का एक नई दृष्टि से देखने परखने और विकसित करने के लिए.

Satna Rewa Tour 25 to 30 May 16



पानी, भूख और आजीविका की समस्या देखना हो तो आईये बघेलखण्ड के दूर दराज बसे आदिवासी गाँवों में। यहां साम्राज्य है गरीबी, बेहाली और अव्यवस्था का पर है कोई जो इनकी बात मप्र की सरकार तक पहुंचाए जो धर्म, ऐयाशी और पाखण्ड में राज्य को डुबोना चाहती है ?
शिवराज जी के इतने मान मनोवल के बाद भी ये लोग पाप धोने उज्जैन नही आये जहां सरकार ने इतना पानी बहाया और साधू सन्तों ने इतना खाना खिलाया कि इन जैसे दस बीस गाँव तो दस वर्ष खा सकते थे और खेती भी कर सकते थे पर ये पिछड़े लोग सुधरना नही चाहते अब बारह साल भुगतेंगे !!!
यहां स्थितियां इतनी खराब है कि यदिं कोई बहुत ही संवेदनशील शख्स हो तो बुद्ध बन जाए या संसार त्याग दें, पर प्रशासन से लेकर सरकार को कोई फ़िक्र नही इनकी। सिरमौर के विधायक भी मिलें पर उन्होंने अगले चुनाव की गोटी खेलना शुरू कर दिया है। एक दूरस्थ ग्राम ओवरी में हमारे सामने बिजली स्वीकृत हो गई है और जल्द ही गाँव में आ जायेगी जैसा झुनझुना बजाकर फुर्र हो गए जबकि इस गाँव में आज तक कोई अधिकारी नही पहुंचा है। जाने का रास्ता नही इस गाँव में और ठीक इस बस्ती के ऊपर से आये खैरवार आदिवासी संकटों से सदियों से जूझ रहे है ।
रीवा जिले के पहले रेलवे स्टेशन डभौरा जैसे कस्बे में दो दिन तक बिजली नही थी आंधी की वजह से, पूछने पर पता चला कि स्टाफ ही नही है, तीन छोटे बच्चों की बिजली गिरने से मौत हो गयी जब उनमें से एक बच्चे के घर ग्राम भूमन में मैं गया तो जो दारुण दृश्य था, जो पीड़ा उन्होंने व्यक्त की वह शब्दों से परे है। उसके पिता शंकरगढ़ में ईंट भट्ठों पर काम करते थे, बड़ा भाई हैदराबाद में मजदूरी , माँ गाँव में तेंदू पत्ते बीनती है घर में खाने को कुछ नही, बूढ़े दादा दादी है जो बच्चे सम्हालते है । बच्चे की मौत के दूसरे दिन घर इकट्ठा हो पाया था और अब उनके पास रोने के सिवा कोई विकल्प शेष नही है।
जी हाँ ये सिंहस्थ प्रदेश है जहाँ 5000 करोड़ रुपया बर्बाद करके वैचारिक महाकुम्भ आयोजित किया गया और जमीनी हालात ये है ।
तय करिये कि दो साल की सरकार और उनके राज्यों में बैठे लोग किसके लिए और क्यों विकास की डुगडुगी पीट रहे है !!!

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सतना के मझगवां के पास कोई कुठला पहाड़ है जो मुड़िया देव पंचायत में है , इसके बारे में एक किवदन्ती है जहां मवासी, खैरवाह आदिवासी और लोध समुदाय रहते है। कहते है कि इन समुदायों को जिस बात की आवश्यकता होती थी वे इस पहाड़ पर स्थित एक गुफा पर पहुंचकर मांग करते थे मसलन उनके यहां शादी है तो कपड़ा चाहिए, राशन चाहिए, आभूषण आदि, गुफा का दरवाजा बन्द रहता था, जाने वाला व्यक्ति आने का समय बताकर लौट आता था। और अगले दिन निश्चित समय पर पहुंच जाता था, गुफा का द्वार स्वतः खुल जाता था और लोग अपने द्वारा चाही गयी सामग्री लेकर लौट आते थे, और फिर गुफा का पत्थर का द्वार स्वतः बन्द हो जाता था।
यह गुफा लोगों की जरूरत पूरा करती थी, आदिवासी सहज भाव से सामान भी वापिस कर देते थे और जितना चाहिए होता उतना ही मांगते थे। इस सामान की बरकत बहुत रहती थी। कहते है गुफा में कोई प्राकृतिक शक्ति थी जो गरीबों की मदद करती थी और आड़े समय में उनका हमेशा साथ देती थी।
अब से पचास वर्ष पहले तक यह कर्म जारी रहा, बाद में लोग ज्यादा मांगने लगे, लालच आ गया, और सामान वापिस नही करते तो आखिर वह गुफा हमेशा के लिये बन्द हो गई, और इस तरह से प्राकृतिक शक्ति का मददगार दरवाजा हमेशा के लिए बन्द हो गया है। बढ़ते बाजारवाद ने आदिवासी को चतुर और लोभी बना दिया और इस तरह से एक रहस्य खत्म हो गया।
यह कहानी दर्शाती है कि किस तरह से सहजपन, ईमानदारी और लौटाने की मानवीय प्रवृत्ति खत्म हो गई और बाजार ने हमे घोर अनैतिक, भृष्ट और बेईमान बना दिया है।
कहानी का स्रोत - शिव कैलाश मवासी, ग्राम मझगवां (भट्टन टोला)
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सारनाथ एक्सप्रेस, दुर्ग से छपरा, 
25/5/16
S-11
Berth no 61, 62, 63
तस्वीर सतना और डभौरा स्टेशन के बीच अपुन ने हिंची है। 
सिर्फ इसलिए कि तस्वीरें बोलती है


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Monday, May 23, 2016

Posts of 23 May 16 बच्चे जब दूर हो जाते है......


जिन बच्चों को हम जान हथेली पर रखकर पालते है उन्हें एक दिन भीड़ में छोड़ देते है हमेशा के लिए खो देने को और फिर वे भीड़ में भीड़ होकर हमें भूल जाते है और अक्सर हम उनकी परछाईयों से मिलते और जुदा होते है.
जब तक बच्चे घरों में रहते है महानगरों से लौटकर वे वाट्स एप, फेसबुक चलाते रहते है और जाने के बाद फोन पर लम्बी बात करते रहते है......असल में एक समय के बाद हम सबकी दुनिया अलग होती है और फिर सिर्फ अपनी तन्हाईयों में ही रहते है, यह भी एक प्रकार की खुशी है जिसे हम कड़े दुःख के बाद स्वीकार लेते है.
घर का खाली हो जाना एक दहशत से कम नही जब बच्चे चले जाते है उन शहरों और नोकरियों पर जहां खोजने पर बच्चों की जगह समय सारणी में बंधे हाड मांस के मशीनीकृत लोग मिलते है जो सिर्फ हूँ हाँ कहकर अक्सर फोन पर भी बात करने असमर्थ हो जाते है कई बार।

Sunday, May 22, 2016

Posts of 22 May 16 - MP Board Results and Suicidal Tendency Among Adolescents



कोटा शहर से फ़ैली आग अब मप्र के छोटे कस्बों में भी दानावल के रूप में जल रही है. जिस तादाद में किशोर वय के बच्चे आत्महत्या कर रहे है और मर रहे है वह कितना घृणास्पद है, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि 75 प्रतिशत से नब्बे प्रतिशत तक अंक लाने के बाद भी किशोर बच्चे निन्यानवें के फेर में मर रहे है और राज्य सरकार का मुखिया रोज अपील कर रहा है, विशेष अभियान चलाकर पुनः पास होने का मौका दिया जारहा है फिर भी बच्चों की आत्महत्या का सिलसिला रुक नहीं रहा है. कहाँ आ गए है हम आज क्या यही सर्व शिक्षा अभियान और सबके लिए शिक्षा की परिणिती थी ?
इसकी जड़ों में जाए तो महत्वपूर्ण कारक बड़े पद,आरक्षण, पॅकेज बंद नौकरियां, चमकीली और तड़क भड़क भरी जीवनशैली, बाजार, प्रतिस्पर्धा, विदेश यानी सिर्फ अमेरिका से एमएस या पीएचडी करने के ख्वाब, अपनों के बीच सर्वश्रेष्ठ होने का गुमान और स्कूल और कोचिंग संस्थाओं के भयानक दबाव, माँ-बाप के पारंपरिक धंधों - जैसे नर्सिंगहोम या वकालत या कंस्ट्रक्शन कंपनी, को चलाये रखने के लिए इनका जीवन स्वाहा करना एक आम बात है.
दूसरा महत्वपूर्ण कारण है देश भर में राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं की स्थापना से इनमें प्रवेश के लिए भयानक मानसिक दबाव. इन संस्थाओं में प्रवेश के लिए बच्चों से ज्यादा दबाव पालकों पर है और फिर रोते रहते है कि बच्चा दूर हो गया और आखिर में अपने लिए एकअदद वृद्धाआश्रम की तलाश.
देवास के कई स्कूल संचालकों और कोचिंग पढ़ाने वालों को मै व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ जो नक़ल करने के लिए एक जमाने में प्रसिद्द रहा के पी कॉलेज में रहकर भी सात सालों में बीएस सी नहीं कर पायें या गुंडागर्दी करके भी बीए नहीं कर पाए या टुच्ची राजनिती करके वे वकील या जुगाडू बन बैठे और आज स्कूल और कोचिंग क्लास चला रहे है. पिछले आठ दिनों से अखबारों में इनके स्कूल या कोचिंग का विज्ञापन देखता हूँ तो आश्चर्य लगता है कि कैसे इन्होने शत प्रतिशत रिजल्ट दिया, इनके शिक्षकों से बात करता हूँ तो मानवीयता के दुःख नजर आते है, इस तरह के चोर उचक्के आपको हर कस्बे और शहर में मिल जायेंगे, ये सब लोग भी पालकों के साथ बच्चों की आत्महत्या के दोषी है.
अबअपने 30 साला शैक्षिक अनुभव से मुझे लगता है कि हमारे शिक्षकों को यह जिम्मेदारी उठाना होगी कि बच्चों को अपनी कक्षा में पढ़ाने के बजाय शुरुवात के तीन माहों में बातचीत, हंसी मजाक, समाज के दीगर मुद्दों पर बातचीत, दोस्ताना व्यवहार, कक्षा में खुला माहौल जिससे वे अपने मन की बात और सपनों पर दिल खोलकर बता सकें और कह सकें. दिक्कत यह है कि शेयरिंग नामक चीज खत्म हो गयी है. हर स्कूल में सरकारी या निजी में समय सारणी में हफ्ते में तीन दिन परामर्श Guidance and Counseling का पीरियड अनिवार्य रूप से हो और हर स्कूल में इसके शिक्षक रखे जाएँ महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षकों की तरह. बच्चों के लिए बाहर से लोगों को बुलाया जाए जो सामान्य लोग है चाहे मजदूर हो, किसान हो, माली, हलवाई, गायक, वादक, या कोई प्रोफेशनल ताकि आम लोगो को उनके संघर्ष को सुनकर और प्रत्यक्ष देखकर बच्चे सीखेंगे कि पास होना,अच्छे अंक या प्रतिशत लाना ही जीवन का सार नहीं है.
जमीन तोड़ने के लिए अक्सर शिक्षा के पैमानों और चौखटों से दूर जाना होता है. मै हमेशा कहता हूँ कि शुक्र है जाकिर हुसैन या बिस्मिल्लाह खान से खैरागढ़ संगीत विवि से इनवाद्ययंत्रों में पी एच डी नहीं की वरना खां साहब एक फूंक मारते तो शहनाई टूट जाती और जाकिर भाई एक हाथ मारते और डग्गा बिखर जाता, स्वपंडित कुमार गन्धर्व जी शास्त्रीय संगीत में पी एच डी पढ़ते तो निश्चित ही इतना अप्रतिम और कालजयी संगीत और रागमाला संसार को नहीं दे सकते थे..बाबा आमटे, सुन्दरलाल बहुगुणा, अरुणा रॉय, राजेन्द्र सिंह या चिपको आन्दोलन की बहनों ने टाटा सामाजिक संस्थान से एमएसडब्ल्यू नहीं किया वरना वे सारी उम्र फर्जी रपट ही बनाते रहते हमारे इंदौर स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क के गधों की तरह और एक रुपया कही ज्यादा मिलता तो सारी नैतिकता छोड़कर अप्रतिबद्ध तरीके से रोज नौकरी बदलते. कोंकण रेलवे और मेट्रो के श्रीनिवास की कहानी हम सबको ज्ञात ही है, इन लोगों ने जमीन तोड़ने के लिए शिक्षा का सहारा नहीं लिया इसके अलावा भी दुनिया में स्टीवजॉब्स से लेकर बिलगेट्स के उदाहरण मौजूद है.
बहरहाल , नया सत्र एक बार फिर सामने है, आईये कोशिश करें कि अगले साल हम एक भी आत्महत्या नहीं होने देंगे, शिवराज जी सहित सभी जिम्मेदार लोगों से अनुरोध है कि स्कूलों पर शत प्रतिशत परिणाम लाने को प्राचार्यों और व्याख्यातों पर आदेश देकर दबाव ना बनाएं

Friday, May 20, 2016

उज्जैन सिंहस्थ 16 के आयोजन में पुलिस का सक्रीय योगदान Posts of 19 May 16


उज्जैन गया था, भीड़ तो जरुर थी पर अब वह जोश नहीं दिखा, साधू संत और कर्मचारी सब थक गए है इसलिए गन्दगी और कूड़े कचरे ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है, सफाई कर्मचारी घाट का कचरा सोरकर नदी में ही झोंक रहे है. पुलिस के जवान भी थके है. जाहिर है सब इंसान है और कितना करेंगे भीड़, धर्म और आस्था के नाम पर, इन पर अब दया आने लगी है.
आज उज्जैन में मुझे सबसे ज्यादा दुःख पुलिस को देखकर ही हुआ, उनकी आँखे लाल थी, नींद ना आने से, रात 12 बजे मुश्किल से ठंडा खाना खा रहे है, सोने की कोई व्यवस्था नहीं है, नहाने को समय नहीं है, लोगों ने उन्हें पागल कर रखा है, कुछ गलीज कमीने लोग वाहन में धक्का भी लगवा लेते है, सामान उठवा रहे है जवानों से अरे जब उठता नहीं तो घर से पूरे जिले का लगेज लेकर क्यों आये? और गालियाँ अलग खानी पड़ती है. बेचारे नई उम्र के अधिकाँश बच्चे / युवा एकदम गल गए है इस गर्मी में , शरीर बेधम हो गया है और ऊपर से निकम्मे साधूओं के नखरे .......उफ़ बहुत बुरी हालत है, सबसे ज्यादा मेहनत और सबसे ज्यदा दुःख पुलिस को, अगर आज व्यवस्थाएं माकूल है और सिंहस्थ सफल है तो इसका सफल होने का पूरा श्रेय पुलिस को जाता है.
इन सबकी मेहनत को सौ सौ सलाम और प्रणाम

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उज्जैन में कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत हुए और उन्होंने उदाहरण सहित बताया कि कैसे शोचालय से लेकर खान नदी के डायवर्शन में ढाई मीटर के पाईप डालने से लेकर बड़े कामों में भ्रष्टाचार हुआ और उनका यह मानना था कि प्रशासन से कम से कम एक हजार करोड़ का घपला किया है और नगद रुपया खाया है. सरकार ने जिस अंदाज में संतों को खासकरके सवर्ण संतों को रुपया बाँट कर अपना अजेंडा और थोबड़ा दिखाया है जनता को वो अकल्पनीय है. जिस तादाद में भंडारे खिलाये गए है वो रुपया सन्यासियों और साधुओं के पास कहाँ से आया, और उनके आलीशान पांडाल, उपर से विज्ञापनों के जरिये घर घर से पकड़कर लाये गये लोग.........उफ़ .
लोगों ने कहा कि पिछले अस्सी सालों में ऐसा जलसा नहीं देखा धर्म और पाखण्ड के नाम पर, शिवराज जी ने बार बार आकर जहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराई वही उनकी श्रीमती जी ने बोरा भरकर समेटने में कोई कसर नहीं छोडी, ऊपर से वैचारिक कुम्भ का एक नया तमाशा खडा करके देश को उल्लू बनाया.
सिंहस्थ में मीडिया के कुछ लोगों को अपनी छबि बनाने के लिए भयानक उपकृत किया और इसमे कुछ चैनल्स के पत्रकारों ने भी सात पीढ़ियों का धन धान्य भर लिया जिन्हें अठारह बीस हजार से ज्यादा नहीं मिलते उन्होंने LCD Projector से लेकर चार पहिया वाहन किराए पर चलाये और माल वसूला. बेहद शर्मनाक ढंग से गलीज होकर इन पत्रकारों और कुछ पत्रकारिता के सिद्धहस्त गुरुओं ने भी हद से ज्यादा गिरकर अपनी औकात गिरा ली पर रुपया जरुर बना लिया, एक छापा इनके घरों में भी पड़ना चाहिए कि कैसे ये लोग चार से पांच शहरों में संपत्ति बनाकर बैठे है, और इस सबमे सिंहस्थ, मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत समबन्ध क्या भूमिका अदा करते है ?

Saturday, May 14, 2016

साध्वी प्रज्ञा NIA and Clean cheat, Chakmak May_16 - Posts of 14 May 2016





31% बहुमत में NIA जैसी एजेंसी को गुलाम बना दिया , आईये पूरे देश की ग्राम पंचायतों से लेकर नगर निगमों, विधानसभाओं, लोकसभा और राज्यसभा में इन्हें जगह दे दो फिर देखों नंगा नाच इनका।
देश का जमीर जब मर जाता है और विद्वान् लोग इस फेसबुक जैसे माध्यम पर भी विरोध दर्ज नही करते, उस देश में कोई भी सुरक्षित नही और ना ही उस देश में अब कोई उम्मीद बाकि है।
बेहद शर्मनाक है गुजरात नरसंहार, हत्याओं का प्रणेता सत्तासीन पार्टी का अध्यक्ष हो जाता है, एक प्रधान हो जाता है देश को झांसे देकर, एक गुंडा टाइप शख्स एक शांतिप्रिय राज्य में चुनी हुई सरकार को गिराने का घटिया षड्यंत्र करके देश का समय और रुपया बर्बाद करता है, एक बलात्कारी मंत्री बना रहता है, 56 हत्याओं में शामिल शख्स राज्य का मुखिया हो जाता है, निर्दोष आदिवासियों को जड़ मूल सहित उखाड़ने वाला राज्य प्रमुख बना रहता है, नकली मिलावटी सामान बेचने वाला बाबा हो जाता है, उद्योगपति देश का रुपया लेकर जिम्मेदार मंत्री की शह पर देश से भाग जाता है, बाकि लोग पंत प्रधान के काँधे पर हाथ रखकर बैंकों से लोगों का रुपया हड़प लेते है, जन प्रतिनिधि के भेष में साधू सन्यासी उजबक टाइप बयान देते है, देश में न्याय से लेकर हर व्यवस्था बिकाऊ हो जाती है, क़ानून जेब में रखकर साठ सालों के सत्यानाश को सुधारने आये थे ना आप तो फिर दो साल में ही गुंडों, मवालियों और हत्यारों को छोड़ना शुरू कर दिया !!!
जिस समाज में लोग चुप रहकर रचनात्मक होने और समालोचना के बजाय नपुंसक शिखण्डी का रोल निभाने लगते है, जिस समाज में चौथा स्तम्भ के लोग नोकरी बचाने, मालिकों की हड्डियां चूसने और सत्ता से अवैध सम्बन्ध बनाकर अपने साम्राज्य खड़े करने लगते है, न्यायाधीश सार्वजनिक रूप से टसुये बहाते हो और पुलिस कुत्तों के माफिक सत्ता के आगे हाथ बांधे लार टपकाती हो वहाँ ब्यूरोक्रेसी से उम्मीद करना बेकार है जिनकी रीढ़ ही नही है !!!
भारत के इतिहास में ये सबसे काला दौर है जहाँ घुप्प अँधेरे के सिवा कुछ नजर नही आता और इसके परिणाम हमे नही आने वाली आपकी संततियों को भुगतना पड़ेगा, जब वे पढ़ लिखकर इस देश से बगावत करके किसी और देश में बस जाएंगे।
सूखे, किसान आत्महत्या से लेकर बच्चों के कुपोषण और महिला हिंसा पर ठोस काम करने के बजाय राज्य और सत्ता सिंहस्थ जैसे आयोजनों में जनता का रुपया बर्बाद करें, चांदी के बर्तनों में भोजन करें और करोड़ों रूपये पांडाल बनाने में उजाड़ दें वहाँ अगर आप बदलाव और विकास की उम्मीद कर रहे हो या न्याय की उम्मीद उस देश में कर रहे हो जहां सत्ता बदलते ही NIA दो साल सिर्फ एक मुख्य आरोपी को निर्दोष साबित करने में लगा दें वहाँ आप सांस लेने की भी उम्मीद कर रहे है तो आपको कोई नही समझा सकता, मुआफ़ कीजिये ये हिन्दू राष्ट्र आपको ही मुबारक हो 
जैसे अमित शाह और साध्वी प्रज्ञा के दिन फिरें और अच्छे दिन इनकी जिंदगी में आएं वैसे सबके दिन फिरें।
परम पिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि मोदी सरकार शत शत जियें और खूब फलें फूलें ।
अम्बानी, अडानी, माल्या, नित्यानंद, रामदेव, निहालचंद्र, प्रज्ञा से लेकर तमाम गोल्डन और सिल्वर बाबा और जीवराज, अमन सिंह जसुन्धरा सब पापों से मुक्त हो न्याय के दण्ड से आजाद रहें और देश में खुशहाली रामराज्य सी बनी रहें।
आमीन !!!
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ना नितीश कुछ सकते है ना मोदी, जब तक लोग खुद आगे आकर कुछ नही करेंगे तब तक पत्रकार भी मरते रहेंगे, किसान भी आत्महत्या करते रहेंगे और न्याय भी बिकता रहेगा ।
शिक्षा को नए ढंग से क्रांतिकारिता के संदर्भ में परिभाषित करना होगा और अब लोगों को व्यवस्था के खिलाफ खुले रूप में सामने आना होगा और जरूरत पडी तो हथियार भी उठाने होंगे।
इन चुने हुए प्रतिनिधियों से कुछ नही हो सकता साठ सालों में उनको और दो सालों में इनको और नितीश बाबू को भी देख लिया, अब अगर हमने कुछ नही किया तो निशाने पर आप, हम और मैं तो रहूंगा ही !
आईये हाथ उठाये हम भी !!!
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चकमक का मई 16 का अंक कल मिला। एक ही सांस में आज सुबह पढ़ गया। प्रियम्वद की कहानी मुन्ना बुनाईवाले पढ़कर लगा कि हिंदी कहानी में अभी वो क्षमता है जो बहुत बारीक संवेदनाओं को बुनती है और इंसान बनाने का और इंसानियत का ज़ज्बा कायम रखती है। "किसी हूनर का खत्म होना इंसानों की बहुत बड़ी हार होगी" उफ़, यकीन मानिए जिस तरह से चर्च में मुन्ना बुनाईवाले का चरित्र प्रियम्वद ने उभारा और उसके इंतकाल के बाद बेटे का अपने आपको एक हूनर ज़िंदा रखने के लिए नाम भी वालिद का रख लेना शायद संसार के इतिहास में बिरला ही उदाहरण होगा। ये छोटी सी कहानी पढ़कर दो घण्टे लगभग बेसुध रहा और इसके दृश्य चलते रहे और सोचता रहा कैसे हमने बेंत बुनने वालो से लेकर जिल्द चढ़ाने वाले या रजाई गादी बनाने वाले हूनर खत्म कर दिए। बहुत सरल भाषा में बुनी यह कहानी मुझे अंत में रुला गयी, इसका खुमार शायद कई साल ना उतरें ।
सुशील शुक्ल छोटे से संस्मरण कन्छेदी में कहते है "वह सच एक मरी मख्खी की तरह मेरी जिंदगी में आज भी पड़ा है" ।
अपने आप में बेजोड़ और दिनों दिन निखरती जा रही चकमक को संवारने में Sushil Kumar Shukla Shashi Sablok का बड़ा हाथ है ।
कम से कम एक साल सबको जरूर पढ़ना चाहिए चकमक उसके बाद आपको कहने की जरूरत नही होगी। सन 1987 से जो आदत लगी है वह छुटती नही और मैं इसका आजीवन सदस्य हूँ ।
यदि आप चाहे तो भाई Manoj Nigam से संपर्क कर सकते है। एक जमाने में जैसे धर्मयुग हर घर में पढ़ा जाता था, मुझे लगता है ज्ञान, विविधता, जानकारी और रोचकता के स्तर पर चकमक से श्रेष्ठ पत्रिका आज कोई नही है यह सिर्फ चकमक का विज्ञापन नही पर जो खुलापन और अपनत्व आपको वहाँ मिलेगा वह दीगर पत्रिकाओं में अब दुर्लभ है।



Thursday, May 12, 2016

Posts of 12 May 16 Amey Passed XII Board Exam with 75 %




Amey Naik Congrats for securing 75% in XII Board Exams for 2016. 
We are proud of you buddy. The real.life begins now ... Good Luck for up coming dazzling Future.


Students who have passed XII Board Exams today in MP. Congrats to all.
The real challanges are starting now and lot more successes and failures, learnings are yet to come in life. Remember guys - % and marks are mere reflection of stupid exam pattern and nt the parameters of your hidden competence and wonderful inbuilt skills. Keep the spirit up. Be positive, choose the line, career you want to do things in life, dont go by others, take a path you want to walk on and with full efforts and enthusiasm Crack the World. Think beyond imagination and do toil to achieve 100% in Life. Do what you enjoy. Lets celebrate this joy with family, friends and your self. Stay blessed.

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4411 दोस्तों में से लगभग दस प्रतिशत युवा मित्रों से पूछता हूँ तो कहते है दिल्ली, इलाहाबाद या कही और से UPSC की तैयारी कर रहा हूँ, IAS Aspirant हूँ...........आदि आदि !!!!
अरे मित्रों कोई बना क्या इस बार ?
बरसों से तैयारी करके क्यों माँ - बाप का रुपया दिल्ली में डुबो रहे हो और यहाँ झांसे दे रहे हो, चौबीसों घंटे यहाँ रहोगे और वाट्स एप पर ज्ञान बांटोगे तो अधिकारी क्या ख़ाक बनोगे......
सुधर जाओ और कुछ नहीं तो प्रधानमंत्री कौशल भारत में ट्रेनिंग लेकर मिस्त्री, लुहार, सुतार, बन जाओ कुछ तो कमा खाओगे और शादी ब्याह करने की हिम्मत करोगे और अब अपनी प्रोफाईल से IAS Aspirant हटा लो .ताकि मै कह सकूं कि युवा है दिल्ली, इलाहाबाद में बाप कमाई पर घूम फिर रहे है.
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उस जल्लाद के अन्दाज़-ए-क़त्ल का क्या कहिए,
करने गए थे उनको क़त्ल और सिपहसलार हो गए।

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अभी देखा विचार कुम्भ में ऐसे लोग पहुँच गए जो विचार शून्य है और हमारी मराठी में ऐसे लोगों को बोलते है कि इनका ऊपरी माला खाली है !!!
कुछ एनजीओ के लोग और लुगाईन भी पहुंच गए बन ठन के कि कुछ जुगाड़ हो जाए दाना पानी का या कुछ नही तो अपने स्वयंभू निदेशक के कार्ड का रायता ही बाँट आएंगे, या कुछ नही तो कार्पोरेट्स के चिकने चुपड़े चेहरों को ही अपना थोबड़ा दिखा आएंगे और परफ्यूम सूँघा आएंगे। अभी एक को देखा तो ये ख्याल आया।
सही भी लगा फिर कि वहाँ सुनना ही है बोलना, और सोचना मना है तो बाकि जाकर करेंगे क्या 

Wednesday, May 11, 2016

Posts of 11 May 2016 विभावरी में सम्मान और रूप वाणी का उज्जैन में कार्यक्रम राम की शक्ति पूजा





मुझे और बहादुर को प्रतिष्ठित वागीश्वरी पुरस्कार मिलने पर अग्रज सुनील चतुर्वेदी और सोनल ने एक बेहद ही नितांत अपने घरेलू माहौल में सम्मानित किया, देवास में हम पांच छः ही लोग है जो बहुत मजबूती से जुड़े है और सुनील भाई हम सबके संकट मोचक है. सोनल से दार्शनिक और दुनियावी मुद्दों पर बात होती है . कल इस छोटे से कार्यक्रम से बहुत अच्छा लगा. सुनील भाई के दो उपन्यास आ चुके है, और दो वर्ष पूर्व वे भी वागेश्वरी से सम्मानित हो चुके है और सोनल का एक कविता संकलन भी आया है जो पिछले दिनों चर्चित रहा है.
अपने ही लोग जब सामान्य उपलब्धियों और लेखन का सम्मान करते है तो संकोच होता है और ग्लानी भी होती है पर दिल से बहुत खुशी होती है, इससे ताकत भी मिलती है और लगता है कि अभी बहुत कुछ होना संभव है और उम्मीदें बाकि है.
काली चाट से पानी निकलेगा कि नहीं - पता नहीं, पर शब्दों की बहुत संभावनाएं है और बूंदों के बीच उभरी प्यास से नमक जरुर आयेगा और संसार की सारी महामायाओं के बीच बेचैनी की कथाएं बारम्बार लिखी जायेगी.



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उदासी यहां बहती है
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जब डूब जाता है सूरज क्षितिज में
नदियां बहती है खून में सनकर
समुद्र दहाड़े मारता है किनारे से 
पेड़ छोड़ते है पत्तियाँ हवा में
झींगुर रौरव गान गाते है एकालाप से
एक पक्षी लौटता है भूखा चोंच खालीकर
पहाड़ी की चोटी सूनी दिखती है
गहरे अतल में सूखता है पानी
आग छोड़ती नही किसी को भी
चिड़िया सन्न से निकल जाती है
सड़कें चित्त हो जाती है पिघलकर
धूप का छोर नजर नही आता कही
मैं देखता हूँ चहूँ ओर एक मद्धम चादर
उदासी बह रही है सब तरफ और हम
बेबस से खड़े इसमें डूबने को अभिशप्त.
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कल उज्जैन में Vyomesh Shukla के रूपवाणी बनारस द्वारा प्रस्तुत राम की शक्तिपूजा देखी। निराला रचित यह कविता नृत्य नाटिका के रूप में देखकर अच्छा लगा। व्योमेश को उज्जैन में आये तूफ़ान बरसात से दिक्कतें हुई, कार्यक्रम की जगह आखिर मंगलनाथ क्षेत्र में रावतपुरा सरकार के गोविंदा मंडपम में मिली। जिन दर्शकों की आवश्यकता थी वो तो नही थी पर हाँ एक औसत भीड़ थी जो श्रद्धा से देख रही थी।
अनुज Sughosh Mishra ने दिल्ली की तस्वीरें डाली थी तब से देखने की प्रबल इच्छा थी। व्योमेश ने पहले सार गर्भित कहानी सुना दी थी जिससे संदर्भ और प्रसंग समझ आ गए थे। देवताओं के किस्से, अहम्, लड़ाईयां और कुटिल चालें वे ही जाने जो धर्म के मर्मज्ञ है, हाँ टीम के बच्चों से मिलना हुआ। प्रस्तुति साधारण थी, कोरियोग्राफी उम्दा, संगीत और विभिन्न रागों में गाई गयी कविता अच्छी थी। यह दुरूह कविता है भाषा की दृष्टि से पर देखने से ठीक लगा।
सबसे अच्छी बात यह थी कि रावतपुरा सरकार खुद दर्शको के साथ पूरे समय मौजूद थे ठेठ जमीन पर बैठकर उन्होंने पूरी नाटिका देखी। मुझे अच्छा यह लगा कि बगैर किसी ताम जहां के वे जमीन पर बैठे। एक ओर ग्लैमर और मायावी दुनिया के संत जेड प्लस में रहते है और ये बेहद साधारण ढंग से हमारे साथ आकर बैठ गए।
व्योमेश के लिये अभी दो दिन और चुनोती है हालांकि मौसम साफ़ है पर भीड़ - वो भी वांछित, जुटाना मुश्किल है और फिर यहां से वहाँ।
शुभकामनाएं पूरी टीम को और बहुत स्नेह।
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अभी कुछ करीबी मित्रों के साथ बात हो रही थी तो यह निष्कर्ष निकला कि मप्र सरकार ने समुदाय द्वारा आयोजित किये जाने वाले और पूर्णरूप से प्रबंध किये जाने वाले सिंहस्थ को भी सरकार ने नाजायज कब्जा करके करोड़ों रुपया कमा लिया और नाटक नौटंकी करके सरकार के मुखिया ने सारा श्रेय ले लिया.
बेहद शर्मनाक है, एक ओर हम जनभागीदारी की बात करते है, दूसरी ओर आम लोगों के कार्यक्रमों पर कब्जा और अतिक्रमण कर लेते है. सिंहस्थ को बाजारू और मार्केट के अनुसार बनाने के लिए और धर्म, आस्था और अध्यात्म को किसी दूकान पर बेचने को रख दिया.
कितना गिरेंगे हम और ?

Tuesday, May 10, 2016

Posts of 10 May 16 PM Insurance Scheme and Khandwa Collector's order for Principals





याद है आपको देश में जब शिक्षा पर बहस हो रही थी तो राज्यसभा में मात्र कुल 35 सांसद मौजूद थे और अगस्ता डील के समय सारा सदन मौजूद था. शिक्षा हमारे लिए क्या है यह देखना हो तो राजनीतिकों और ब्यूरोक्रेट्स के माध्यम से देखना चाहिए.
इस तस्वीर को देखें जो जिला कलेक्टर, खंडवा, मप्र ने सिंहस्थ के मद्दे नजर ओंकारेश्वर में परियोजना अधिकारी शहरी विकास के नेतृत्व में जिले के चार उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के प्राचार्यों की ड्यूटी आने वाले यात्रियों के जूता चप्पल के संधारण में लगाई है.
श्चर्य नहीं करना चाहिये कि शिक्षकों, प्राचार्यों से गैर शैक्षणिक कार्यों में गाय, भैंस, कुत्ते, बिल्ली गिनने, मुर्गा मुर्गी गिनने, नसबंदी के आपरेशन करवाने से लेकर जनगणना और चुनाव जैसे राष्ट्रीय महत्त्व के कामों में लगाया जाता है, इस कलेक्टर, खंडवा ने देश के इतिहास में पहली बार जूते चप्पल की व्यवस्था की जिम्मेदारी राजपत्रित अधिकारी यानि प्राचार्यों को दी है, पहले मुझे लगा था कि यह फर्जी आदेश होगा पर अभी यह लिखने के पहले वहाँ के जिम्मेदार अधिकारी से बात की - जिन्होंने कहा कि यह गलत छपा है, व्यवस्था में सहयोग करना कोई गुनाह नहीं है.
मेरा सवाल है कि शिक्षक और प्राचार्य की गरिमा और कितनी गिराएंगे, दूसरा सारे डिप्टी कलेक्टर क्या कर रहे है - वे भी तो फुर्सत में बैठे ही रहते है, या और विभाग के अधिकारी क्या करते रहते है.
कलेक्टर, खंडवा थोड़ा दिमाग इस्तेमाल करते तो स्काउट्स, गाईड, एनसीसी या एनएसएस के छात्रों की ड्यूटी लगा देते तो येकर्मठ बच्चे यह काम मजे से करते और उन्हें भीड़ समझने या प्रबंधन में भी सीखने को मिलता या ठेका देकर किसी बेरोजगार को काम दिलवा देते पंद्रह दिनों का, या मनरेगा के तहत ही कुछ लोगों को काम दिलवा देते पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी क्या नहीं कर सकते और उनका मानसिक दीवालियापन कितना है - यह मैंने 7 मई को ही लिखा था कि "प्रमोटी मुल्ला और नायब तहसीलदार से बना आयएएस ज्यादा बेलगाम और निरंकुश होता है".
यह बेहद शर्मनाक है और अब हमें श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी की उक्ति को भी बदलना होगा कि भारतीय शिक्षा सड़क पर पडी वो कुतिया है जिसे हर कोई लात मारकर गुजर जाता है. मै आज यह कहता हूँ कि "भारतीय शिक्षा समाज में पल रहा वह नासूर है जो किसी भारतीय प्रशासनिक सेवा के मानसिक विक्षप्त अधिकारी का समाज को दिया गया सबसे बड़ा सहयोग है"
मै गर्व से कहता हूँ कि मै एक शिक्षिका का बेटा हूँ, खुद शिक्षक और प्राचार्य लम्बे समय तक रहा हूँ, तीस साला नौकरी में मैंने दस साल सीधे शिक्षा में काम किया है, अगर मुझे कोई ऐसा आदेश देता तो नौकरी और इज्जत का मोह छोड़कर उस अधिकारी को सीधे गला पकड़कर सड़क पर जनता के बीच ले आता, और फिर बताता कि शिक्षक की गरिमा और ताकत क्या होती है, इस कलेक्टर के साथ ये चारों प्राचार्य भी लिजलिजे है और बेहद कमजोर अन्यथा मजाल कि कोई इतनी बेइज्जती कर दें. यही कारण है कि शिक्षा डिग्री और योग्यता कीऔकात इन जैसे लोगों ने दो कौड़ी बनाकर रख दी है.
एक ओर सिंहस्थ में उज्जैन में दुनिया भर के लोग आकर गुरुदीक्षा ले रहे है, प्रदेश के मुख्यमंत्री रोज गुरुओं के कैम्प में गुरुओं की चरण वन्दना कर उनके नखरे उठा रहे है, उसी सिंहस्थ के नाम पर यह कलेक्टर, खंडवा इतनी बेइज्जत करके छुट्टियों में प्राचार्यों को सरकारी ताकत का गुरुर दिखाकर और दुरुपयोग करके गरिमा को मिट्टी में मिला रहे है.
कितना और गिरोगे, अब कहिये एम पी अजब है, सबसे गजब है.
भारत माता की जय, यथा राजा - तथा अधिकारी
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ये है लुभावना विज्ञापन प्रधानमंत्री बीमा योजना का जिसमे न्यूनतम प्रीमियम देकर आपको दो दो लाख का बीमा दिया जा रहा है. पिछले वर्ष पूरे देश को बेवकूफ बनाकर किस जमाई की बीमा कंपनी को फायदा पहुंचाया यह आप मे से किसी को मालूम है क्या? बैंको ने थोक में लोगों के, बल्कि सभी ग्राहकों के फ़ार्म भरवाकर बीमे कर दिए, ना उसमे नामांकन था, ना प्राप्ति रसीद दी गयी, ना कोई बीमा की पालिसी दी गयी और ना प्रमाणपत्र.
अभी तीन चार दिन से ये फेंकू विज्ञापन फिर आ रहे है और मोबाईल पर प्रधानमंत्री के गुणगान गाते हुए मेसेज तो तीन दिन से बैंक के चक्कर लगा रहा हूँ कि पिछला हिसाब बताओ और प्रमाणपत्र और पालिसी दो, तो इस वर्ष की राशि दूंगा, बदमाशी इतनी है कि मेरे तीन बैंक में खाते है तीनों ने ये राशियाँ काट ली और अब तीनों बैंक गैर जिम्मेदार तरीके से कोई जवाब देने को तैयार नहीं है.

जब मैंने कहा कि मुझे इसमे नहीं रहना है मेरा पिछला कटा हुआ रुपया (जो भी हो, मेहनत का है) मय ब्याज के वापिस करो और इस योजना से मेरा नाम हटाओ, मुझे किसी फर्जी सरकारी योजना में नहीं रहना तो बैंक अधिकारियों ने स्पष्ट कहा कि हम खुद इसमे करवाकर फंस गए है, और हमारे पास अपने कोई रिकार्ड्स नहीं है. दूसरा कैसे आपको इस योजना से बाहर करें - हमें मालूम नहीं है. कस्टमर केयर से बात करने पर पहले तो गोलमोल जवाब दिया फिर आज जब मैंने एक बैंक की शाखा में बैठकर कडाई से बात की और बैंक के खिलाफ कोर्ट में जाने की धमकी दी और बात कही इस विज्ञापन के हवाले से और बैंक लोकपाल कार्यालय में शिकायत का कहा तो वहाँ से जवाब मिला कि आप एक सादे कागज़ पर आवेदन लिखकर दे दें और इसकी रसीद लेलें और एक निवेदन किया कि मै इस बात को ज्यादा ना फैलाऊं क्योकि हमारे काम और साख पर असर पड़ता है.
अब बताईये, रोज करोड़ों रुपयों देकर छपने वाले विज्ञापनों में कोई सम्पर्क पता नहीं दिया है, ना ही किसी अधिकारी या विभाग का नाम जहां जाकर रोना रोया जाए, और इस विज्ञापन के अंत में कहा गया है कि निकटस्थ बैंक से सम्पर्क करें और बैंक्स की हालत यह है कि वहाँ किसी को कुछ पता नहीं है. सरकारी बैंक में भी चीफ कहता है यार छोटी सी तो राशि है 12/ और 360/- दे दो ना क्या दिक्कत है !!!
सोचिये - कितना बड़ा गेम खेल गयी यह सरकार और अब फिर से 25 से 31 मई 2016 के बीच देश के करोड़ों लोगों को चुना लगाने का काम करेगी. मित्रों, एकबार जाकर अपने बैंक से प्रमाणपत्र, पालिसी और अपने आपको इन दोनों महाफर्जी योजनाओं से निकलने का रास्ता पूछिए - फिर आपको इस मोदी सरकार की नीयत और मंशा समझ आ जायेगी या पूछिए कि सरकार ने किस बीमा कम्पनी में यह रुपया लगाया है और उस जमाई ने बाजार में किन फंड्स और इन्फ्रास्ट्रक्चर बांड्स में रुपया लगाया है, इसका सार्वजनिक आय-व्यय का लेखा-जोखा चार्टेड अकाउंटेंट द्वारा अभिप्रमाणित किस अखबार में या किस वेब साईट पर उपलब्ध है, हम देखना चाहते है कि हमारे रुपयों का मूल्य आज के जेटलीकृत गिरते बाजार में क्या है ?
क्या मीडिया का कोई अर्थ शास्त्र की थोड़ी बहुत अक्ल रखने वाला (वैसे असंभव है कि इस पर कोई स्टोरी करें - गहराई में जाकर, क्योकि समझ का ही तो टोटा है) काम करेगा और विश्लेषण प्रस्तुत करेगा 20 मई के पहले ताकि करोडो देशवासियों के रूपये बचाए जा सकें.
बोलो सिंहस्थ वाले महाकाल की जय !
बोलो भारत माता की जय !!
बोलो अबकि बार चुना सरकार !!!

Sunday, May 8, 2016

संगीत का सफ़र - यादों की स्मृतियों के संग



दिन - दूसरा 

1966 में आई थी फिल्म ममता और रोशन लाल के संगीत से निबद्ध इसके गीतों ने धूम मचा दी थी, मजरूह सुल्तानपुरी के गीत मतलब मानो किसी ने दिल काटकर सामने रख दिया हो, और फिर लता जी की आवाज में यह गीत जब सुचित्रा सेन पर फिल्माया गया तो लगा कि सुचित्रा इसी गीत के फिल्मांकन के लिए ही फिल्म जगत में आई हो, एकअल्हड जवानी का प्यार, द्वंद और मासूम से चेहरे पर जो हिकारत और तंज में वो अभिनय किया कि अशोक कुमार की बेचैनी पूरे परदे पर हर उस दर्शक ने अपने अन्दर महसूस की जो इस परिस्थिति से दो चार हुआ हो.

ग़ालिब ने लिखा था- बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले क्योकि उस जन्नत में सेवफल खाकर आदम और हौव्वा को ज्ञान आया जिसे अंगरेजी के मशहूर कवि जॉन मिल्टन ने अपने महाकाव्य 'पेराडाईज लॉस्ट' की शुरुवात भी इसी सन्दर्भ से की है जॉन खुद देख नहीं सकते थे पर सूरदास की तरह उनके पास अंतर्मन में वो आँखें थी जो सब कुछ देख लेती थी, मजरूह साहब ने भी कूचा शब्द का बेहतरीन प्रयोग इस गीत की दूसरी पंक्ति में किया और बल्कि मै तो कहूंगा कि उन्होंने कूचे से बाहर आकर अपने को गुनहगार भी मान लिया. पूरा गीत सुचित्रा सेन और तीन चार कलाकारों पर फिल्माया गया है और पूरे दृश्य में अशोक कुमार की उस ना कही जा सकने वाली बेचैनी को उभारा गया है जो वो कह भी नहीं पा रहे और अंत में कुर्सी पर निढाल होकर बैठ जाते है. मजरूह साहब ने लता जी की खनकती आवाज में पूरे प्रेम की दास्ताँ को बयाँ किया है जिसे रोशन के संगीत ने तबले और हारमोनियम के सुरों में गुंथकर इसे अप्रतिम और अमर बना दिया है.
सौ रूप धरने के बाद जहर पीने के बाद भी ठोकर लगाने की उम्मीद में वह ज़िंदा है कुछ इस तरह कि इतिहास में वो एक गिरती हुई दीवार बनकर अपने आप को उसमे चुनवा देना चाहती हो मानो जैसे फिल्म कुदरत में दीवार में चुनवा देने का दृश्य था प्रिया राजवंश का या अमेरिकन नाटककार ओ'नील के नाटक "मोर्निंग बीकम्स इलेक्ट्रा" की नायिका अंत में घर के सारे दरवाजे खिड़की बंद कर अपने को खत्म कर लेती है.
मुझे पंचमढी डाईट का होस्टल, रायसेन का होस्टल, भोपाल और रायसेन के बीच बनी वो किसी दरवेश की मजार या भोपाल रीजनल कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन के पत्थरों के बीच गुजारी वो शामें शिद्दत से याद आती है जब किसी मद्धिम आवाज में यह गीत शुरू हो जाता, और फिर एक गहरी सांस लेकर थक जाती थी तुम.........
अब एक बार फिर से गाओ ना, आज मै गा रहा हूँ "दावा था जिन्हें हमदर्दी का........

https://www.youtube.com/watch?v=BMwmPaZHYiM

दिन - पहला 

ये दर्द कहाँ से आता है जब कोई माशूक डूबकर कहता है इन बहकी निगाहों, अदाओं और काजल की काली घटाओं में डूबकर मुझे भूल जाना, आरोह अवरोह में बनी हुई उस कहानी को भूलने की ताकीद दी जा रही है जो एक चमन में बनी थी और गर्म साँसों के साथ, बदरी के साथ बूंदों की रुमझुम को शिद्दत से याद करते हुए भी भूल जाने की बात है, पर दर्द और तन्हाई की इस बेला में भी वो मस्ती और आलम की बात, विदाई के मोड़ पर भी साथ की बात एक सच्चा प्रेमी ही कर सकता है - जो अलग होकर भी अपने माशूक और कभी जिसके साथ दो पल गुजारे थे उसके लिए सारा आसमान देने की दुआएं दे रहा है. चुप्पी का अपना एक फ़साना होता है यह गीत सुनकर ही समझ आता है.

पंकज दा यानि पंकज मलिक की मूल आवाज से ज्यादा मुझे लता जी का पंकज दा को दिए ट्रिब्यूट की आवाज में यह गीत ज्यादा अपील करता है. पंचमढी की भर गर्मी में एक रात को डाईट के होस्टल की छत पर खंडवा की एक बुजुर्ग शिक्षिका ने अपने महीन स्वरों में यह गीत सुनाया था, श्रीमती राउत नाम था उनका, कैसेट्स का ज़माना था और तुम्हारे कहने पर फौजदार बस के कंडक्टर से डबल भाव देकर यह श्रद्धांजली का कैसेट मंगवाया था और फिर उन पंद्रह दिनों में इसे इतना सुना कि खराब हो गया सब कुछ - कैसेट, जीवन और फिर सब भूलना भी पडा.
संगीत, प्यार और जीवन की थोड़ी बहुत समझ आने के बाद पंकज मलिक से यह पहली मुलाक़ात थी और उनकी आवाज ने जादू कर पागल कर दिया था.
"पहले मिलन की छाँव में तुमसे तुम्हारे गाँव में 
आँखे हुई थी चार क्यों, ये ना बता सकूंगा मै, 
रूप की कुछ कमी नहीं. दुनिया में एक तुम्ही नहीं
फिर भी तुम्हारी चाह में रहता हूँ बेकरार क्यों
दिल को है तुमसे प्यार क्यों, ये ना बता सकूंगा मै."

ये सिर्फ शब्द, गाना और आवाज नही थी बल्कि एक संत्रास, पीड़ा और व्यथा थी एक व्यक्ति की जो प्यार में डूबा है और कह भी नहीं पा रहा है.
Yunus Khan भाई ने एक अच्छा काम शुरू किया, Ashutosh Dubey Chandan Pandey आदि मित्रों ने पिछले सात दिनों में बेहतरीन गीत, कम्पोजीशन और शब्दों से परिचय करवाया तो याद आया यह गीत, कोशिश करूंगा कि अगले सात दिनों तक अपनी धुंधली स्मृतियों में बसे गीतों की यादों और प्रसंग से जुड़े कुछ किस्से लिख सकूं, और आपको कुछ गीत सुना पाऊं.
आज प्रस्तुत है लता जी की दिलकश आवाज में पंकज दा को श्रद्धांजली स्वरुप यह अमर गीत जो बहुत ही दर्द और उम्मीद से भरा है मानो हम सबके जीवन का गीत...... !!!!
https://www.youtube.com/watch?v=GRFSwVFBmyU

Posts of 7 May _16 वागेश्वरी पुरस्कार 2015 की घोषणा में मेरे संकलन को पुरस्कार



मित्रों, सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि सन 2015 का प्रतिष्ठित हिन्दी कहानी केलिए वागेश्वरी पुरस्कार मेरे संकलन "नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएं" को और कविता के लिए मित्र Bahadur Patel के संकलन को मिला है. यह देवास के लिए गर्व की बात है कि एक साथ कहानी और कविता के लिए पुरस्कार मिला. आभारी हूँ डा प्रकाशकांत जी का जिनके सानिध्य में मैंने अक्षर ज्ञान सीखा और लिखना भी.
यह सिर्फ खबर नहीं बल्कि एक आश्वस्ति है मेरे लिए और एक स्वीकार्यता कि मेरे लिखे को नयी भाषा, कथ्य और स्वरुप में प्रस्तुत करने के पर भी कहानी माना गया और व्यापक स्तर पर स्वीकारा गया.
यह पुरस्कार सभी मित्रों, अपने पाठकों को समर्पित है, एक का नाम लेकर मै किसी को छोटा नहीं करना चाहता, यह प्यार और संबल ही मेरी कसौटी और चुनौती भी है. दिल से आभारी हूँ और सच में शुक्रगुजार हूँ Palash Surjan जी और उनकी टीम का, निर्णायकों का जिन्होंने मुझे इस लायक समझा. अंत में इस सारी यात्रा में मेरे अपने घर के लोग, मेरे बच्चे जो मेरा जीवन और सम्पत्ति है, नहीं होते तो मै शायद कुछ भी नहीं कर सकता था.
सवाल पुरस्कार का नहीं है एक गैर हिन्दी भाषी व्यक्ति और उसकी अभिव्यक्ति को हिन्दी के विशाल संसार में स्वीकार करके मान्यता देने का है. मेरी कोशिश होगी कि अब सिर्फ और सिर्फ अच्छी कहानियां आपके लिए लेकर आऊ, एक ऊर्जा और ताकत मिली है , यह मेरे जैसे छोटे और "अअकादमिक" आदमी (Non Academic Person) केलिए बहुत बड़ा भरोसा है.
मेरी स्वर्गीय पिताजी - माँ और पिछले साल गुजर गए भाई को आज बहुत याद कर रहा हूँ और यह बेचैनी इन्ही तीन मौतों से उपजी है जिन्हें मैंने तिल तिल मरते देखा है और मै कुछ नहीं कर पाया.
पुनः शुक्रिया और आभार.

Friday, May 6, 2016

Crisis of Leadership Posts of 4 to 6 May 16


मेरे जैसे लोग आरक्षण के बारे में कुछ लिख दें तो यहाँ जनता मेरा खून करने पर उतर आती है और फोन पर बदतमीजी करने लगती है और मप्र में सिंहस्थ में 12 मई को राज्य प्रायोजित समरसता स्नान और भोज सिर्फ और सिर्फ दलितों के लिए अलग से उज्जैन में आयोजित किया जा रहा है, जिसमे अमित जी भाई शाह दलितों के साथ डूबकी भी लगायेंगे नर्मदा, क्षिप्रा और शहर के गंदे नालों से मिले हुए सीवेज के (आज की ताजा खबर है कि शहर का पूरा गंदा जल क्षिप्रा में मिल गया और प्रशासन की चाक चौबंद व्यवस्थाएं मिट्टी में मिल गयी, हाय मेला, हाय मेला और हाय- हाय मैला) मिश्रित गंगाजल में और भोजन भी करेंगे तो कोई कुछ बोल क्यों नहीं रहा और मजेदार नाम आज भास्कर में पढ़ा "शबरी स्नान" , वाह जैसे प्रभु राम ने शबरी ट्रीटमेंट किया था वैसे ही आधुनिक सरकार के उद्धारक अमित जी दलितों को ट्रीटमेंट देंगे.
वैसे धर्म के जानकार और हिन्दू धर्म के ज्ञानी - ध्यानी मुझ जैसे सवर्ण बदमाश की जिज्ञासा शांत करेंगे कि सिंहस्थ में यह परिपाटी पुरानी है या परम पूज्य सरकारानन्द हिन्दू क्षत्रप इसे आरम्भ कर रहे है ? राज्य प्रायोजित भेदभाव और छुआछूत का इससे अचूक उदाहरण कहाँ मिलेगा ?
अरे, अभी समय है महामहिमों - जाओ - हाईकोर्ट जाओ, सुप्रीमकोर्ट जाओ और सरकार को खुले रूप में भेदभाव करने और अजा, अजजा एक्ट के तहत कटघरे में खडा करो, नहीं जी, हम क्यों करें हम तो सुविधाएं लेंगे आरक्षण की, और फिर डूबकी भी लगायेंगे इससे स्वर्ग मिलेगा, उससे सुविधाएं यथा नौकरी, शिक्षा के लिए सीट, प्रमोशन और बाकि भोजन का क्या है - वह तो मिल ही रहा है, सरकारों के तलवे तो चाटते आये है हम सन 47 से, भाड़ में जाए डा आम्बेडकर जिन्होंने कभी नहीं कहा कि शिक्षित बनकर संगठित हो और आरक्षण लो, नहान करो और प्रमोशन लो !!! तभी तो आज हम अपने होने की दुहाई देते है, नाश हो इन वामपंथियों का जो हम भोले भाले सज्जन भोले दलितों को हमारी चुनी हुई प्यारी सरकार के खिलाफ भडकाते है. अब कई राज्यों खासकरके हमारे रामजी के उत्तर प्रदेश में चुनाव है तो क्या , हम वहाँ भी अजुध्या में जाकर, सरयू में जाकर सरकार के साथ शबरी स्नान करेंगे और शम्बूक भोज करेंगे ( "शम्बूक भोज" मेरा दिया नाम है, यदि सरकार इसे इस्तेमाल करें तो मुझे कॉपी राईट दें दस करोड़ का !!!)
जय हो दलित, जय हो सरकार, जय हो महाकाल और सबकी जय जय - समझ रहे है ना.?

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नितीश या लालू, ममता या मायावती और कैलाश या जेटली इस समय दुर्भाग्य से देश में कोई नेता नही है इसलिए मोदी को लोग ढो रहे है क्योकि मैदान जब खाली हो तो कोई क्या करें। असल में ऊपर जो नाम लिखें है वे भी मोहल्ले के पार्षद या एक गाँव के सरपंच से ज्यादा औकात नही रखते, मोदी को गुजरात से निकालकर देश सौंप देने के गम्भीर परिणाम संघ, भाजपा और सबसे ज्यादा लोग भुगत ही रहे है इसलिए नितिश, ममता या शिवराज के लिए अब कोई उम्मीद नही है।
इस समय 125 करोड़ लोगों का देश गम्भीर नेतृत्व के संकट से गुजर रहा है। शासकीय कर्मचारियों से लेकर आम लोग, दूरदराज के आदिवासी भी गहरे सकते और सदमे में है और मोदी और अमित शाह के कारण भाजपा में विश्वास खो चुके है यहां तक कि भक्त भी हैरान है पर बोल नही पा रहे।
क्या इस गम्भीर नेतृत्व की कमी से जूझते देश में कोई संभावना नजर आती है कही, या कुछ और ? मित्रों उजबकों की तरह जवाब देने के बजाय वहाँ से सोचें जहां से मैं बात कर रहा हूँ । विकल्प के अभाव में हम फिर एक घटिया स्व केंद्रित व्यक्ति को 2019 में ले आएंगे और घुटते रहेंगे।
देश के बारे में सोचिये जिस आदमी को फर्जीवाड़ा करके डिग्री बनवाना पड़े रोज झूठ पर झूठ बोलना पड़े और नित नए रूप बहरूपिये की रूप तरह धरना पड़े वह क्या करेगा। नितीश या बाकी सारों में भी कोई जुदा नही है इस नोटँकीबाज से।
यह मुश्किल समय है जब विपक्ष भी जोकर से ज्यादा औकात नही रखता चाहे कांग्रेस हो या वाम दल जो जमीन ही खो चुके है वे क्या देश का सोचेंगे और ये कुछ कर भी नही पाएंगे। अरविंद भी एक विकल्प हो सकते थे पर जिस तरह के वोटर उन्हें चाहिए वे देश के पास नही है। और अरविन्द भी मोहल्ले की किसी समिति के अध्यक्ष हो सकते है पर नेता तो हरगिज नहीं। मोदी का प्रयोग एक बड़ा फेल्युवर है भाजपा को और इसे आज नही तो पांच साल बाद भुगतना पडेगा।
भारत उदय जैसे कार्यक्रमों में जाकर जमीन से एक गरीब से बात करके देखिये वह बताएगा मोदी, शिवराज या भृष्टाचाट के सबब और फिर बात करिये। ये लोग अगस्टा डील की बात करके ध्यान भटका रहे है, कितने लोगो को हवाई जहाज से लेना देना है, शर्म करो नीच लोगों, मनरेगा और रोटी की बात करते तुम्हारी नानी मरती है और इस बहस में सब पूरी कमीनगी के साथ संसद में समय बीता रहे है, इन्हें शर्म आती है या नही ? जब ये घटिया जनता के पैसे इटली पर बर्बाद करेंगे तो देश की समस्या क्या इनके बाप हल करेंगे, और ये सब तय शुदा स्क्रिप्ट के तहत हो रहा है और सब इस पाप में शामिल है,कमाल है कि वामपंथी भी वहाँ बैठकर भड़ैती कर रहे है, डूब मरो नालायकों ।
नेतृत्व की , नेता और देश की बात कीजिये, और जब तक हम लोग इन्हें नही खीचेंगे ये कमीन सिंहस्थ से लेकर राम मन्दिर और इटली, अमेरिका और पाकिस्तान में घूमाते रहेंगे। देश की बात कब करोगे ?
घटिया मानसिकता की उल्टी यहां नहीं करें।
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टेगडो से परेशान हो गया हूँ।

Tuesday, May 3, 2016

Posts of 3 May 16 आलोचना और छपास का हिन्दी में योगदान......रविशकुमार का अजीम मय हो जाना





"मेरा पेशा मेरा काम" पर ‪#‎रविशकुमार‬ ने अजीम प्रेम विवि में बेंगलोर में व्याख्यान दिया, आखिर कठपुतली सामने आ ही गयी, बकैती की, हवाईयात्रा तो अजीम प्रेम टुच्चे बच्चों को करा ही देता है प्रवेश के लिए जाने वालों को, मोटा माल मिला होगा वो अलग. कोई गलत नहीं है कही जाना औरज्ञान देना, यह समाजसेवा और बदलाव का चोला फेंक दो बॉस, जाने से पहले यह तो सोचना था कि जिन कार्पोरेट्स के "प्रेम में पड़कर आप ज्ञान देते है" फिर वह सब बंद कर दीजिये और अब प्लीज़ कुतर्क मत करिएगा कि बच्चों से बात करने गया था आदि, आपने शोध कर ही लिया होगा कि ये निजीकरण करके सरकारी स्कूल्स को चौपट कर रहे है और एक अच्छा खासा वृद्धाआश्रम चला रहे है चुके हुए घोर अकर्मण्य शिक्षाविदों का आजकल. अजीम प्रेम विवि से लेकर फाउन्डेशन इस समय में शिक्षा में निजीकरण के सबसे बड़े व्यापारी है जो स्कूल कॉलेज बंद करवाकर अपने धंधे बढ़ा रहे है नवाचारियों और व्याभिचारियों को बंधुआ बनाकर और गिरवी रखकर. रविश यह काला चेहरा अपने होम वर्क में नहीं दिखा तो लानत है.
दुःख तो नहीं हुआ, बहरहाल असली चेहरा सामने आया कि कैसे रविश भी आखिर एक निजीकरण को सपोर्ट करते है, कल वे अम्बानी या अडानी के पत्रकारिता विवि में कुलपति बन जाए तो कोई बड़ी नही होगी. आप नकारात्मक कहिये या जो भी पर सुधीर चौधरी में, दीपक में आपमे कोई मूलभूत फर्क नहीं है सिवाय इसके कि उसकी कमीज मेरी कमीज से साफ़ है बस, वो कन्हैया के खिलाफ है और आप पूंजीपतियों के सभागारों में तफसील से बैठ जाते है.
एक गाना याद आ रहा है "क्या मिलिये ऐसे लोगों से जिनकी सूरत छुपी रहे....
ज्यादा ज्ञानी यहाँ ज्ञान ना पेलें ........

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हिन्दी में लेखक को अमर कैसे करें इस पर Deonath Dwivedi जी ने एक संदीपकीय टिप्पणी की मांग की, वे अग्रज है और मेरे को रोज छेड़ने वालों में से है, लखनऊ में बैठकर मजे लेते है. सो उनका सम्मान करते हुए मैंने उन्हें लिखा कि
"कुछ नहीं जी, कुछ भी लिखो अच्छा - बुरा या कचरा, आपको बस एक बड़ा प्रकाशक साधना है,- दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, पंजाब, हरियाणा का, दो चार फुरसती तथाकथित पैर पड्वाऊ रिटायर्ड मास्टर किस्म के आलोचक जो आपके लिखे को पढ़े या अपनी बीबी से सारा दिन पढवाएं, और अपनी आलोचना में आपके लिखे से हर पंक्ति पर लम्बी किसी को ना समझ आने वाली टिप्पणी करें बेहद समझदार होकर और दो चार प्रगतिशीलों की पत्रिकाएं जिनसे सेटिंग हो और वो इस दस से बारह पन्नों की घटिया उबाऊ बोरिंग आलोचना छाप दें, बस पर्याप्त है यश और कीती दिलाने को, अंत में आप बनी बनाई रेसिपी को फेसबुक पर पकाते रहे जब तक कमेन्ट और लाईक से पेट ना भरें, और कुछ छैल छबीली महिलायें उस पर उंह आह ना करें......... "
मानदेय तो ना आपको मिलना है ना उन महाशय को हाँ पत्रिका खरीद जरुर लें और मोहल्ले में बंटवा दें ताकि पोहे खाने के काम तोआ सकें.

हिन्दी में लेखन का बड़ा सही सेटिंग हुए बिना आप कुछ कर नही सकते और लेखन तो बाद में सबसे पहले जुगाड़, सेटिंग और फिर आत्ममुग्धता जैसे मूल्य ही आप को पार लगायेंगे. आप जितने ढोंगी, पाखंडी, दोगले और मतलब परस्त होंगे और जितना अपने आपको बेचने में सक्षम होंगे उतना ही बाजार में टिक पायेंगे वरना तो आप घास छीलते रहिये उम्रभर और घर के पुरखों को बेच दें, सम्पत्ति बेच दें, आपको कोडियों के भाव नहीं मिलेंगे. यही मुआमला पुरस्कार, स्वीकार्यता, आलोचना और छपने से भी जुड़ा है कुछ मरे - खपे, रिटायर्ड और बूढ़े लोगों को पालकर रखें, या सुबह शाम पार्क में घर से हकाल दिए गये लोगों से गुफ्तगू करते रहे शर्तिया बवासीर भगंदर की बीमारी में किसी नीम हकीम बंगाली डाक्टर के इलाज की तरह वे आपको लोकप्रियता के शिखर पर ला पटकेंगे और अगर इस तरह के लोगों के साथ लगे है तो आप अमर है......आपकी प्रशस्ति में लम्बे उबाऊ आख्यान लिख देंगे और हर वांगमय से कादम्बरी तक आपको ऐसा चस्पा करेंगे कि साला आने वाली पीढियां जल भुनकर जन्म से ही पहले मर जायेंगी. आहा हिन्दी साहित्य की छटा ही निराली है. अहो अहो अहो करते करते गधे चार - छह सिंहस्थ और दर्जनों कुम्भ नहा लेते है.
आईये अमर होने के प्रबंधकीय नुस्खें सीखें ...

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अभी जिज्ञासा वश कुछ मित्रों की प्रोफाईल देख रहा हूँ करीब 17 लोग ऐसे मिलें जिन्हें पिछले पांच या चार बरसों से मेसेज बॉक्स में जाकर या उनकी वाल पर जाकर जन्मदिन की शुभकामनाएं दी है, बन्दों ने एक बार भी पलटकर शुक्रिया कहने की जेहमत नही उठाई, लाहौल बिला कुब्बत. एक बार या दो बार की बात समझ आती है पर चार बार पांच बार , उफ़ इतना घमंड या तो ये गधे है जिन्हें कुछ आता नहीं, पर साहब इंजिनियर है या किसी विश्वविद्यालय में मास्टर है या किसी मीडिया हाउस में बड़े दलाल है तो ससुरों को निकालकर फेंक दिया बाहर इस गर्मी में तडफने केलिए...जाओ मरो कही, अरे हमारी शुभकामनाएं कोई फ़ोकट की नहीं और तुम जैसे Attitude वाले हजारों देखें है.
अब सबको एक बार टटोलना पडेगा बेसिक मूल्य से जो मरहूम है वो दोस्ती लायक कहाँ?