Wednesday, April 27, 2016

Bertold Brekht's Statemenet and Posts of 26 and 27 April 16


''सबसे निकृष्ट अशिक्षित व्यक्ति वह होता है जो राजनीतिक रूप से अशिक्षित होता है। वह सुनता नहीं, वह बोलता नहीं, राजनीतिक सरगर्मियों में हिस्सा नहीं लेता। वह नहीं जानता कि जि़न्दगी की कीमत , सब्जि़यों,मछली, आटा, जूते और दवाओं के दाम तथा मकान का किराया---- यह सबकुछ राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करता है। राजनीतिक अशिक्षित व्यक्ति इतना घामड़ होता है कि इस बात पर घमण्ड करता है और छाती फुलाकर कहता है कि वह राजनीति से नफरत करता है। वह कूढ़मगज़ यह नहीं जानता कि उसकी राजनीतिक अज्ञानता एक वेश्या , एक परित्यक्त बच्चे और चोरों में सबसे बड़े चोर----- एक बुरे राजनीतिज्ञ को जन्म देती है जो भ्रष्ट तथा राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का टुकड़खोर चाकर होता है। ''


- ब्रेर्टोल्ट ब्रेष्ट
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इनके बाप काँधे पे हाथ रख देते है, माँ का आँचल चेहरे पे झूल जाता है, बेटा इतना नजदीक है कि हवा भी बीच से निकल नही सकती। 
देश का गरिमामयी परिधान मंत्री एक परिवार से इतना नजदीक और पानी लाने गयी 11 बरस की मृत योगिता के माँ बाप को राहत का एक दाना भी नही, बुन्देलखण्ड या मराठवाड़ा में एक पाऊल चल कर भी नही गया। 
आई पी एल और सिंहस्थ की धूम धाम के बीच पानी और सूखे के बीच, कुपोषण और बलात्कारों के बीच इस दुबले होते लड़के से मिलना देश की प्राथमिकता है।


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मंडला से एक आदिवासी स्त्री, हाथ में भविष्य और सर पर वर्तमान का बोझ, आजीविका की तलाश में भटकता जीवन और यहां हम लोग सिंहस्थ में 5 हजार करोड़ रुपया उड़ा रहे है। दुर्भाग्य से इसका धर्म हमारे धर्म में अहमियत नही रखता और इसलिए इसकी संस्कृति को हम जानते है ना महत्व देते है क्योकि इसके ना शंकराचार्य है, ना मोरारी बापू और ना कोई अवधेशानंद !!! पानी के लिए जद्दोजहद करती चिलचिलाती धूप में रोटी के लिए भटकती यह स्त्री आपको बेचैन नही करती तो व्यर्थ है आपके धर्म, व्याख्याएं और पुण्य देने वाले सिंहस्थ । व्यर्थ है सरकार, राज्य और कल्याणकारी राज्य का संविधान, एक बार सोचिये जरा कि क्यों दण्डकारण्य क्षेत्र में या देश के आदिवासी बहुल राज्यों में नक्सलवाद फ़ैल रहा है । यह सदियों से उपेक्षित है और रहेगी, हमारे पास कोई हल नही है और ना हम चाहते है ।
क्या इस भारत माता के लिए स्त्री समानता और जेंडर के मुद्दे है किसी भद्र महिला के लिए ???
शर्म मगर उनको आती नहीं है।
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एयर मार्शल ने 225 करोड़ की रिश्वत ली, कांग्रेस के पूरे कुनबे के साथ ये देश प्रेमी त्यागी देश का पेड देशभक्त था ।
जो कहते है कि डिफेन्स में कमीने और भृष्ट नही है, कहाँ है ? मैं अपने अनुभव से आज फिर कहता हूँ Defence is the most organized corrupt sector.

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Only for my Marathi Friends who can understand Marathi Language.
कोकणस्थ लाडू रेसीपी:
लाडू करताना लाडवाला बेदाणा फक्त टोचावा आणि पुन्हा काढावा. खाणार्याला वाटते नेमका आपल्याच लाडवाचा बेदाणा पडला असावा. आणि अशा प्रकारे एकच बेदाणा सर्व लाडवांना पुरून उरतो. 
😜😜
सारस्वत लाडू रेसिपी: 
लाडू वळताना लाडवामध्ये बेदाण्याऎवजी कोलंबी भरता येईल का?..याचा विचार करत असतील
😜
देशस्थ लाङू रेसेपी
😁😁

बेदाणे (बचकभर) कसेही लाडूच्या मिश्रणात फेकावे....
जेणेकरुन काही लाडवात 5-7 बेदाणे व काही लाडु बिचारे बेदाण्याशिवाय नाराज बसावेत....

कर्हाडे लाडु रेसेपी
स्वतःलाच छान लाडु करता येतात असल्या फालतु overconfidance 😎मुळे लाडवाच्या मिश्रणात बेदाणेच टाकायला विसरतात

ckp लाडू रेसिपी
बेसन, तूप आणि बेदाणे आणावेत. पूर्वतयारी म्हणून Jack Daniels उघडावी.

दोन घोट पोटी गेल्यावर बेसनाची भजी करावीत, तूप मटणात वापरावं, आणि बेदाणे चखणा म्हणून खावेत
96k लाडू रेसिपी
बेसन, तूप, बेदाणे इ. घेऊन बसावं

मग "शिवरायाच्या कुळात जन्मलेले हे हात काय लाडू वळण्यासाठी आहेत का?" अशी गगनभेदी गर्जना करून काका हलवाईचे लाडू आणावेत
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इस बीच राहुल ने मन मोहन सिंह से पूछा कि उन हवाई जहाजों की चाभी कहाँ है जो इटली से मम्मी ने त्यागी अंकल के मार्फत मंगवाए थे !!!
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मोदी जी ने भ्र्ष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात कही है
- विजय गोयल, भाजपा नेता ।
वसुंधरा ने फोन करके शिवराज जी को कहा " मामू चीयर्स, आ रही हूँ सिंहस्थ के बहाने व्यापमं समझने"
मामा जी ने कहा, आ जाओ ....चीयर्स, खनिज का हिसाब भी सीखा दूंगा।
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किसी अंग्रेज़ी कविता का हिन्दी में अनुवाद करना सरल और कम जोखिम भरा काम है, पर जब बात कहानी, उपन्यास, नाटक और आलोचना की आती है तो बड़े - बड़े तुर्रमखां शुतुरमुर्ग बनकर अकादमिक हो जाते है और 1001 बहानों की किताब खरीद लाते है कि समय नहीं है.......
साहित्य के गुण दोष

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कितना विरोधाभास है कि जो लोग अम्बानी के, अडानी के, जिंदल के, टाटा के प्रोजेक्ट्स में काम करते है या अजीम प्रेम की दलाली चापलूसी करके रोटी खाते है वे लोग आम जन के विकास, लोकतांत्रिक मूल्यों और विकेंद्रीकरण की बात करते है और सबको शिक्षित करने की दुहाई देते है। ये वो घटिया लोग है जो सरकारी व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर इन दल्लो के लिए जगह बना रहे है। विडम्बना है कि हमारे कामरेड्स भी अब इन्ही कार्पोरेट्स के आगे हाथ पसारे भीख मांगते फटी पेंट की दुहाई देकर समाजसेवा के नाम पर इनकी दुदुंभी बजा रहे है।
तीस चालीस साल काम करके जब चूक गए तो दौड़कर इनकी गोद में बैठ गए और अब शर्म भी नही आती कि जिस निजीकरण और बाजारीकरण के झंडे लेकर जगह बनाई थी आज उसी में अपनी कब्र खोदकर बैठे है। जिस ब्यूरोक्रेसी को कोसते थे आज कार्पोरेट्स के पिट्ठू होने के कारण ब्यूरोक्रेट्स के तलवे चाटते है, ये वो लोग है जो खाना खाते खाते अपनी रोटी और प्याज बेच देंगे, जमीर आत्मा और शरीर तो बेच ही चुके है । तिस पर से आत्म श्लाघा और आत्मरति का मुगालता इतना कि अपने काले कारनामे थोबडो के साथ बेशर्मी से दिखाते है।
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मुझे चिंता शिवराज जी की है कि 31 मई के बाद सिंहस्थ उज्जैन के काले कारनामों को CAG के सामने सफ़ेद कैसे करेंगे और इसकी जांच भले ही औपचारिकता हो पर होगी तो सही फिर सी बी आई को क्या जवाब देंगे।
बस खुशी इस बात की है कि मामा को आशीर्वाद देने देश को मामू बनाने वाले ईमानदारों के सरदार, मेहबूबा मुफ्ती के भाई, अफजल के रिश्तेदार, नवाज शरीफ के हमजाद और विश्व के नेता मोदी मामा आ रहे है, धर्म सम्मेलन में सरकारी खर्च पर पन्थ निरपेक्ष संविधान के तहत।
जब व्यापमं में कोई कुछ नही उखाड़ सका तो यहां तो लाखो साधू संतों की दुआ, गांजा, भांग का असर रहेगा।
जय हो ।

Monday, April 25, 2016

स्त्री और जेंडर समानता में प्यार Gender Equality, Women Liberalization and Love 25 April 16

स्त्री और जेंडर समानता में प्यार


सारे जहां में घूमकर जब थक गयी तुम तो लगा कि एक बच्चा गोद ले लें, यह महिला आन्दोलन ही थे जहां तुमने बहुत काम किया था, माहवारी से लेकर प्रजनन जागरूकता के कामों से लेकर जन जागरूकता के काम, इस दौरान तुमने शादी जैसे उपक्रम में कभी बंधना नहीं चाहा, हालांकि यह भी सही था कि शादी कोई हल नहीं - एक सड़ते हुए समाज का आखिरी हथियार है आदमी को बाँध देने के लिए और हर बार प्यार और सीरियस रिलेशनशिप के नाम पर बचकर निकल गयी, बाप की अकूत संपत्ति थी, और बाकी तुमने यहाँ वहाँ घूमकर अपने जादुई हुस्न और हूनर से इतना इकट्ठा कर लिया था कि अब वैराग्य हो गया था वासना से , धनदौलत से और संसार के सारे पुरुषों से क्योकि इतना भोग लिया था तुमने कि अब यह बोझ बन गया था तुम्हारी आत्मा पर और दिलों दिमाग पर यह हावी हो गया था, और शादी के नाम पर भी तुमने प्रयोग किये जातीय - विजातीय छोटे बड़े उम्र के पुरुषों को दुहा और फिर उन्हें निकाल दिया किसी मख्खी की तरह जब तुम उकता गयी उसके साथ चार पांच महीनों में क्योकि स्त्री मुक्ति के बहाने तुम्हारे अन्दर पल रहे कीड़े कुलबुला रहे थे - फाईव स्टार होटलों की दुनिया, स्पा में मसाज का सुख, हवाई यात्राएं, अमेरिकन मफिन्स, कॉकटेल पार्टी, नित नए लोगों से - विदेशी सैलानियों से मिलना और उन्हें भोगना और बढ़ते बैंक बैलेंस के बीच "अलग" बनी छबि जो त्याग और कर्मठ होने का सुख देती थी, इस सबके बीच तुम रह नहीं पाई एक छोटे या बहुत उम्र दराज मर्द के साथ हालांकि डोरे डालकर तुम्ही लाई थी उसे.....पर फिर सारे प्रपंच छोड़कर तुमने फिर से गृहस्थन बनने का ख्वाब संजोया, इंदौर, महू, पूना, अमृतसर, रांची और दूरदराज के हिस्से खोजे जहां से एक बच्ची मिल सकें क्योकि दिल में तो जरुर बेटे की चाह थी पर जिन्दगी भर बेटी बचाओ की रोटी खाती रही लिहाजा बेटी गोद ली और एक शरीफ सी स्त्री बनकर अपना घर बनाया. गंभीरता से पूछने पर तुमने बताया कि बेटी विदा होने पर अपन फिर छुट्टे हो जायेंगे !!! यह है मुक्ति की कामना और समानता पर इसमे सबसे ज्यादा नुकसान जो हुआ वो समाज का नहीं उन अबोध बच्चों का हुआ जो तुम्हारी जिद में एकल स्त्री के हत्थे चढ़ गए और उनका लालन पालन प्रयोग और नवाचार के बीच हो रहा है, ये बच्चे जिनमे ज्यादातर लड़कियां है आज दुखी है अपनी माँ के रूप देखकर जो स्त्री समानता, समता के नारे बुलंद करती हुई रोज नए नए चेहरों मोहरों को देखती है, तुम्हारे छिन्नमस्ता रूप को देखकर चिंतित है अपने भविष्य को लेकर. तुम परित्यक्ता भी रही अपने घमंड में पति छोड़ आई और उस प्यार की निशानी को वाया अदालत ले आई पर क्या दे पा रही हो सच में वो सब जो एक बच्चे को चाहिए होता है?
स्त्री और जेंडर समानता में प्यार के बीच बच्चों का इस तरह से शोषित हो जाना कितना दुखद है.
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जब खबर मिली थी तुम्हारी कि दूर किसी देश में 44 वें माले पर अपने फ़्लैट में नितांत अकेले तुम्हारी मौत उस संडास के दरवाजे में दबने से हो गयी है क्योकि शराब के नशे में तुमसे ना दरवाजा लग पाया ना खुल पाया, उफ़, तो दुःख हुआ था, उससे बड़ा दुःख यह था कि आठ दिन तक लाश सड़ती रही और पड़ोसियों से जब सहा नहीं गया तो पुलिस को खबर दी, वहाँ से दूतावास से खबर तुम्हारे घर को आई और फिर प्रभावशाली और तुम्हे पूरी छुट देने वाले माँ बाप भाग कर गए वहाँ से और फिर लाश लाये या नहीं यह नहीं पता पर फिर वे लौटकर ऐसे गए कि दोबारा किसी को स्त्री मुक्ति का अर्ध्य नहीं पिला सकें. तुमने कितने प्यार किये थे और कितनों के साथ घूमती थी, नहीं, नही यह प्यार ही था हर बार कहती पर हर बार एक नया जवान या अर्ध विकसित लौंडा होता और कभी - कभी एक बुढा सा खत्म होता आदमी जो तुम्हारे भव्य ललाट पर फ़ैली बेतरतीब जुल्फों की आड़ में प्यार का नाटक कर चूम रहा होता. तुम्हे वहाँ जाकर शराब से क्या प्यार हो गया, सुना था वहाँ भी तुम नैपकिन की तरह से मर्दों को हर दिन बदलती रही प्यार के नाम पर और जब भी मुझसे बात करती यही कहती कि स्त्री मुक्ति का शंखनाद प्यार में इस्तेमाल से है चाहे मर्द करें या स्त्री औरअब हमारी बारी है. पर आख़िरी में ना घर में मरी ना बाहर - उफ़ संडास के स्वचालित दरवाजों में दबकर मरना , कार्ड भी स्वाईप नहीं कर पाई इतने नशे में थी और कोई छोड़कर गया था तुम्हे लिफ्ट में नीचे से ही, तड़फ तो रहीहोगी ना उस वक्त भी या स्त्री मुक्ति उस संडास के दरवाजों में आज भी झूल रही है और कोई कार्ड स्वाईप करने वाला नहीं है.

क्या यह सच में प्यार था साँसों के स्पंदन और जीवन के किसी निचले हिस्से से भटका हुआ प्यार ?
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पेशानी से पसीना टपकने तक और जन आन्दोलनों से बंद कमरे की बैठकों में स्त्री मुक्ति और दासता के बीच अनुदान देने वाले पुरुषों के बिस्तर गर्म करती और बेखौफ हंसती इन जवान कलियों ने बहुत कुछ देखा भोगा और सह लिया था, प्यार के नाम पर बार - बार छली गयी, यहाँ-से- वहाँ तक. भाषा में दक्ष और दुनिया जहां में उड़ने का हौंसला गजब का था पर इसी प्यार में जब वे घायल हुई हर बार तो लगा कि वे शायद प्यार के लिए बनी ही नहीं थी, जैसे मर्दों ने उन्हें भोग्या बनाया, इन्होने भी मर्दों को इस कदर निचोड़ा कि मर्दों की अपनी कोई दुनिया ही नहीं रही. अपने स्वाभिमान या तथाकथित मुक्ति के नारों में ये ना प्यार बन सकी ना प्यार का प्रारब्ध, एक एनजीओ की दुनिया थी जो खुले मैदानों से शुरू होती और अक्सर इस्तेमाल किये हुए कंडोम या सिर्फ मजे के साथ हाई रिस्क पर गाली के साथ इनकी दुनिया मर्द के साथ किसी कार्यशाला में बंद कमरे में खत्म हो जाती, ये इसे ही प्यार भी कहती और बाद में रात को अपने जैसी अभागनों के बीच शराब और सिगरेट के साथ पुरुष को कैसे इस्तेमाल किया यह बताती और फिर देर रात तक सुबकती रहती. एक नहीं, दो नहीं बल्कि हजारों स्त्रियों की दास्ताँ इस तरह के प्यार में जीते और आहिस्ते से खत्म होते देखा है.
याद है ना ग्यारहवी में घर से किसी फौजी के साथ भाग गयी, फिर उसने तुम्हे पूरी बटालियन में परोसा, वहाँ से भागी तो किसी समाजसेवक ने आसरा दिया और अज्ञात बाप से जन्मी बच्ची का जन्म करवाया, पढ़ाया पर छोड़ा तोउसने भी नहीं था तुम्हे - खूब प्यार दिया और आख़िरी में हकाल दिया, कुरुक्षेत्र में छोड़ दिया कि जाओ डूब मरो, छोड़ा किसी ने नहीं पर तुम प्यार करने के प्रपंच जान गयी थी और मर्दों को इस्तेमाल करना भी, बस वही गुण हाथ की रेखाओं में लिखवा कर सर्वगुण संपन्न बन गयी, पर तारीफ़ कभी उस पिता की नहीं की तुमने जो सबके बाद भी तुम्हे अपना कर घर ले आया बेटी बनाकर समाज को दुलत्ती मारते हुए. प्यार को हथियार तुमने बना कर इस्तेमाल किया या इस दुनिया में, एक बार तो सोच लेती जब अभी भी किसी आम्रपाली सी सज संवरकर, वैशाली की नगरवधु बनकर सत्ता के गलियारों में ग्राहक ढूंढने निकलती हो एक षोडसी की तरह जबकि तुम रूप लावण्य तुम उस तालाब में बहा आयी हो जहां मछलियाँ छोटे मोटे जीव - जंतुओं को निश्छल भाव से निगल जाती थी.
मुझे नहीं मालूम कि भोक्ता, भोग्या और मर्दों के इस्तेमाल में माहिर तुम प्यार को कभी छूकर संवेदनशीलता से समझ भी पाई?
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एक वो थी जो पति के पास आठ दिन नही रही, चालीस साला प्यार के बाद माशूक से शादी की और सातवें दिन ही छोड़कर चली आई मजबूत माशूक को और अब अपनी आलीशान दुनिया में मगन है । दूसरी यह है जो एक ऐसे बुझदिल से प्यार कर उसका जनाज़ा उठाये फिरती है जो दुनिया की मुश्किलो को हल करने के बजाय लटककर मर गया सदियों पहले, यह कहते हुए कि उसकी दुनिया, पसंद और ख्यालात इस दुनिया से जुदा है । तीसरी वह है जो पति के साथ एक साल रही, उसे छोड़ा - दुसरे, तीसरे और चौथे , पांचवें को खोजते खोजते अपनी महीन सी दुनिया को उजाड़कर भक्क् से दूधिया रोशनी में नहा गयी - इसे इस चमकीली दुनिया में सबने कौतुक से देखा, उपहास भी उड़ाया कि एक हवाई यात्रा की कीमत अपना जीवन और घर दफनाकर चुकाएगी और यह भी कि सबसे पुराने ज़िंदा वैध पति के होते हुए चार - चार बार दूसरों के पतियों के लिए विधवा विलाप करेगी और फिर अंत में एक खोखले हो चुके पेड़ की समिधा में चुपचाप अपने को खोने जा रही है । वह अभी भी प्रौढ़ होते पेड़ों को रिश्तों का वास्ता देकर अपनी क्षुधा बुझाने को रिझाती है।
प्यार को कहाँ कैसे मापें, पर एक बात तो तय है कि ये तीनों तो कम से कम प्यार नही है, कुछ और जरूर हो सकता है, कुछ कुंठा, अपराध बोध और कुछ अवसाद या कुछ अतिरेक की महत्वकांक्षाएं।

Sunday, April 24, 2016

Posts of 24 April 16


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Two roads diverged in a yellow wood
And i took the path less travelled by
And that has made all the difference
Robert Frost

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ये शाम है और अब रात फिर क्या - किसी को नही पता, जाग विभावरी का वृन्द गान अब सुनाई नही दे शायद ....
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कुछ हिन्दी के स्वयं भू लेखक घर के रहे ना घाट के, जैसे रजत शर्मा राज्यसभा के मुगालते में था वैसे ही ये मेघावी लेखक ना सम्पादक बन पाए किसी तथाकथित घराने के और ना पुरस्कार जुटा पाएं बेस्ट सेलर के, बल्कि जो यहाँ वहाँ काला-पीला करके बने - बुने थे वहाँ से भी बेआबरू होकर हकाल दिए गये. मुगालतों में ऐसा ही होता है भिया, यह दिल्ली शहर और यहां की घटिया जमात ही कमीनापन के लिए प्रसिद्ध है.....अच्छों - अच्छों को लील गया यह शहर तो तुम क्या हो भिया........ हेँ ???
मने कि पूछ रिये है ....

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ऊपर आसमां था, नीचे जमीन 
बस नही था तो एक कोना
जहां बैठकर, ठहरकर दो घड़ी
अपने आप से ही बतिया लिया जाए

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Frailty thy name is woman,
You too Brutas ...
William Shakespeare, the Father of Literature. Just reading once again today and rejuvanating 4 great tragedies, comedies, sonnets and lyrics. Unfortunately he was the only person who could write an Epilogue and Soliloquies. I dont see any then contemporary of his genious nor in today's time, except Leo Tolstoy in Russian. Although, some jokers are still trying hard to copy this Mastero even in Hindi too... how dare they are... Bredley rightly said One and Only ever been in world and literature, though he was greatest critic of W. Shakespeare.
Remembering you Man today with a deep concern, respect, meloncholy and grief.
I am lucky enough to have his complete work in hard boud compiled by Peter Alexander, Late Professor Emeritus of English Language and Literature, University of Glasgow.

Saturday, April 23, 2016

Posts of 23 April 16 बया का जन- मार्च 16 का अंक






















बया का जन - मार्च 16 अंक मिला । संपादकीय टीम का पृष्ठ देखकर थोड़ा आश्चर्य हुआ, खैर "प्यार तो होना ही था"।
संजीव बख्शी जी का उपन्यास अलग से छपा है फिर बया में देने का उद्देश्य समझ नही आया। सुरेश सेन निशांत की रचना प्रक्रिया और कविताएँ अच्छी है पर डा अरुण होता की टिप्पणी हमेशा की तरह बहुत लम्बी है और कही कही उबाऊ भी जिसे संपादित किया जा सकता था।
मण्डलोई जी कविताएँ एक मुहावरा किस्म की है जो मैं उजास इलाहाबाद से देख समझ रहा हूँ, मंडलोई जी एक अच्छे सम्पादक है अब, कविताएँ लिखकर छपवाने का मोह अब उन्हें छोड़ना देना चाहिए। अविनाश मिश्र जो आजकल फेसबुक पर नही है , कि कविताएँ आश्वस्त करती है कि तमाम विवादों और गंवईपन के बाद भी वो खरी बात कविता के बहाने कहता रहेगा।
कहानियाँ पढी नही पर स्व पंकज सिंह पर संस्मरण अच्छा है और आनंद स्वरुप वर्मा ने पुराने आंदोलनों के बहाने तत्कालीन युवा संघर्ष और मुद्दों को सही पकड़ा है।
भाई Gouri Nathi के सम्पादन में अंतिका प्रकाशन का यह अंक अच्छा है पर गौरी नाथ संपादकीय में कई बातो को छूकर निकल गए थोड़ी तसल्ली से कहते तो स्व राजेन्द्र यादव जी के तेवर दिखते अबकि बार । बहरहाल, बधाई

Friday, April 22, 2016

देवास में विष्णु नागर 22 April 2016


देवास में विष्णु  नागर 

Vishnu Nagar जी, "ईश्वर की कहानियों" वाले, वरिष्ठ मीडियाकर्मी और लेखक, कवि, कहानीकार और अग्रज देवास में आज शाम हम सबसे मिलें, विष्णु जी शाजापुर के रहने वाले है और देवास के दामाद है. उन्होंने अपनी कई कविताएँ पढी और मीडिया के सन्दर्भ में आज के राजनैतिक हालातों की चर्चा की.
उनकी एक कविता जो मुझे बहुत पसंद आई, विशेष रूप से आपके लिए .........


तोप
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माना कि आप बहुत बड़ी तोप है

बल्कि इस देश की सबसे बड़ी तोप है

लेकिन किसी ने बनाया है तभी तो आप तोप है

किसी ने बारूद भरी, तभी तो आप तोप है

किसी को चलाना आता है 

तभी तो आप तोप है

और तोप है तो भूल गए क्या

कि मशीनगनों और बमों के जमाने में तोप है

उत्तराखंड हाई कोर्ट का फैसला और मोदी सरकार Posts of 21 April 16


उत्तराखंड हाई कोर्ट का  फैसला और  मोदी सरकार 
लगता है किन्नर समाज की पेशवाई पूरे देश में ही निकल गयी आज
इस बीच उज्जैन में संतों की सिंहस्थ में बैठक हुई और यह तय हुआ कि शक्तिमान की आत्मा ने बेचारी भाजपा को सताने के लिए हाई कोर्ट जज की आत्मा में प्रवेश कर यह फैसला लिखवाया है, लिहाजा शिवराज जी राज्य मद से 5000 करोड़ अतिरिक्त खर्च कर शक्तिमान की आत्मा की शान्ति के लिए विशाल यज्ञ करेंगे और कैलाश जी को भी सदबुद्धि देने की दुआ करेंगे ।
ॐ शान्ति, ऊँ शान्ति, ऊँ शान्ति !!!

असल में गुजरात के बाहर भी देश है यह बाल नरेंद्र ने आसाम से लेकर लद्दाख और मेडिसिन स्क्वेयर से लेकर आस्ट्रेलिया में चाय बेचते समय देख लिया था, थोड़े से ये विश्वस्त लोग जैसे विस्मृति, कैलाश, अमित, नित्यानंद, नितिन, निहालचंद्र, शिवराज, वसुंधरा, रमण सिंह या योगीनाथ और साध्वी बहनें किशोरावास्था में मिल जाते तो गुजरात में दस साल बर्बाद नही करते और तीस - चालीस साल से वे इंग्लैण्ड की रानी की तरह इस जम्बू द्वीप के स्थाई प्रधानमन्त्री हो जाते और देश के राज्य ही खत्म हो जाते सिर्फ दिल्ली रहती और हम सब ।
अभी ठहरिये इनके ये लोग अच्छे दिन ला देंगे और 2019 के बाद मोदी जी को भारतीय पटल से गायब कर विश्व सम्राट बना देंगे।
भारत माता की जय !!!

तुसाद की गैलरी के लिए बना मोम का पुतला ही वास्तविक है, जिसे आज प्रचारित किया गया कि चार देशों में लगेगा। जिसे हम दो साल से झेल रहे है वो जानते है कौन है चाय वाला, बर्तन मांजने वाली का बेटा, मगरमच्छ पर नदी पार करने वाला, और बाकि तो आप सब जानते ही है ...... हे हे हे हे हे हे !!!
कैलाश विजयवर्गीय मप्र में तो शिवराज को खो नही दे पाये उत्तराखण्ड में क्या झंडे गाड़ेंगे, इन्हें घर भेजो हर जगह लठैती नही चलती दिमाग और क़ानून भी लगाना पड़ता है, आ जाओ गुरु तुम तो दशहरा मैदान पर ऋतुम्भरा के प्रवचन करवाओ बस वही ठीक है और वो गाना है ना जिस पर नाचते हो
छोटे छोटे भैया के !!
जिस अंदाज में न्यायपालिका तल्ख़ टिप्पणियाँ करके फैसले सुना रही है और कटाक्ष की भाषा में बात कर रही है, भोपाल में हुए देश के विद्वान् न्यायाधीशों की गुप्त मन्त्रणा में छटपटाहट दिख रही है वह कुल मिलाकर दिखाता है कि 16 मई 16 यानि दो साल के पहले ही घड़ा भर गया है।
कांग्रेस निश्चित ही विकल्प नही और इस समय कोई और कद्दावर नेता नजर नही आता पर मोदी की जो बेइज्जती इस समय हो रही है वह बेहद शर्मनाक है। एकाध "सेल्फ रिस्पेक्ट" वाला सच्चा देश प्रेमी होता तो इस्तीफा देकर संन्यास ले लेता।
कमाल है कि संघ के बौद्धिक टैंक इन्हें इतनी बेइज्जती , जो हर मोर्चे पर कमोबेश हो रही है साथ ही जनता भी परोक्ष रूप से विश्वास खो चुकी है, के बाद भी बर्दाश्त कर रहे है। क्या ये संघी टैंक खोखले हो चुके है या मानसिक दिवालिये या अमित शाह और मोदी की जोड़ी ने पूरे देश पर तानाशाही से कब्जा कर लिया है।
गम्भीर मुद्दा है, जनता के दरबार में लच्छेदार बोलना अलग पर अदालत में संविधानिक लड़ाई हारना किसी भी सरकार के लिए अपने आप में झांकना जरूरी हो जाता है। मोदी और शाह की जोड़ी ने संघ, जनसंघ और भाजपा के 70 साला मेहनत का कबाड़ा कर दिया, आडवाणी, अटल जी, जोशी जी और गोविंदाचार्य क्या सोचते होंगे इस पतन पर यह सोचने योग्य बात है।
अब कांग्रेस शासन के उदाहरण देकर कुतर्क ना करें और भाजपा को पुनर्जीवित करने का प्रयास करें।
मितरो, मैं बचपन से ही राष्ट्रपति शासन के खिलाफ था, माननीय अमित जी भाई शाह और कैलाश जी भाई विजयवर्गीय को भी यही कहा था पर हरीश रावत ने देश द्रोह किया और कांग्रेस ने हाई कोर्ट के जज को खरीदा और देश को भ्रम में रखा है। प्रणव मुखर्जी जी भी कांग्रेसी है मित्रों ....
यह संविधानिक संकट की घड़ी है, अभी अमेरिका जा रहा हूँ , बराक जी ओबामा से ज्ञान लेकर नवाज शरीफ जी भाई जान की बिरयानी खाकर लौटता हूँ तब तक सब जोर से बको
भारत माता की जय....
केसरिया बालमा, पधारो म्हारा देस रे ....

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ये है देश का तेजी से बढ़ता नंबर 1 का विश्वसनीय अखबार, यानि इतनी लापरवाही कि मुख पृष्ठ पर सुविचार में मात्रा भी ठीक से नही लगा सकते, क्या हिंदी का पूरा सत्यानाश करने का ठेका ले रखा है या ‪#‎दैनिकभास्कर‬ में तथाकथित पत्रकारों की फौज ऑक्सफ़ोर्ड या हॉवर्ड से पढ़कर आई है। लगता है गधों की भर्ती है और अग्रवाल बन्धुओं को अखबार को लेकर ज्यादा ही मुगालते हो गए हो।
छोड़ दो रे तुमसे ना हो पायेगा, तुम चापलूसी में रहो और नेता अधिकारियों की चरण सेवा करते रहो। 
कमाल ये है कि बहुत अच्छे साहित्य के जानकार भी वहाँ चाकरी करते है फिर भी यह सब ??

वैसे जिज्ञासा है "भष्ट्र" कौनसी भाषा का शब्द है ?

Wednesday, April 20, 2016

Posts of 20 April 16 Sid's Marriage


New Page of Siddharth's Life with Snehal 

Finally the appointed day came when our dearest & most affectionate and pride son of Naik Family Siddharth and Snehal's marriage took place in Dewas on 16 April 2016 at Srishti Club, what was the great event and wonderful program, Just a WOW........
Blessings for the newly married couple and all the very best for their up coming Future. Both works in Mumbai at senior positions in their Companies.
कुर्यात सदा मंगलम.......




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एक अखबार में तीन चार संपादक मुख पृष्ठ से लेकर आख़िरी तक छपे रोज रोज बिला नागा, स्तम्भकार एनजीओ वाले या एक्टिविस्ट्स हो और आसपास के मिलने वाले हो, ना स्तम्भ, ना आलेख बस एक भीड़ उन्ही लोगों की जिन्हें उपकृत और चमत्कृत किया जाना है, खबरें सप्ताह पुरानी हो और जानकारी भी सिर्फ कॉपी पेस्ट, और विचारधारा का टोटका और एकदम विचार शून्य, - तो वह कम से कम अखबार तो नही है मेरी नजर में, एक एनजीओ का न्यूज बुलेटिन या, किसी कारपोरेट का मासिक, अपने किसी बड़े स्वार्थ के लिए अखबार को माध्यम बनाकर प्रतिष्ठा प्राप्त करना, या किसी प्रयोजन विशेष के लिए इस तरह के कर्म में जुटे रहने की मजबूरी या फिर सत्ता के करीब होकर अपने सद्कार्यों को सफ़ेद करने की साजिश, बड़े व्यवसायिक कॉलेज चलाने में किये गोरख धंधों से बचाव की मुहीम या व्यापमं, 2 जी घोटालें या खनिज के धंधों से लगी कालिख बचाने की या बचने की सुविधाजनक तरकीब हो सकती है।
आजकल अधिकाँश अखबार, वेब पोर्टल इसी पैटर्न पर चल रहे है, बेहतर है छपने के मोह से दूर रहा जाए और पढ़ने की मेहनत बचाई जाए ताकि दिमाग में और अधिक जानकारियों के नाम पर कुछ जमा ना हो जाए, क्योकि चचा ने कहा है ना "और भी गम है जमाने में मुहब्बत के सिवाय" ।
पता नही संपादक नाम का चरित्र खो गया या मालिक की चाकरी करते करते अपनी अस्मिता, शब्दों की ताकत और जमीर भी खो बैठा है। सही है बाजार ने ज़िंदा रहने का बड़ा संघर्ष पैदा कर दिया है तो फिर नैतिकता और मूल्य की दुहाई देने से पेट नही ना भरेगा।
सम्बन्ध, दोस्ती, प्यार - मुहब्बत अपनी जगह और समझ और अभिव्यक्ति अपनी जगह !!! बुरा - भला लगे तो दो रोटी ज्यादा खा लेना, पर अपुन तो सबसे दूर रहकर लिखते समझते है, कबीरकुल के है ना अपुन - जो घर जाले आपणा, चले हमारे साथ।

Posts from 10 to 20 April 16 NGOs Request




दोमुंहापन सीखना हो तो इनसे सीखो, देश के युवाओं को पढ़ाई से निकालकर जेलों में झोंक रहे है, विवि को घटिया इरादों का अखाड़ा बना दिया है, एक बारहवी पास शिक्षा मंत्राणी IIM में ज्ञान बाँट रही है, एक अफजल गुरु के वंशजों से मिलकर सरकार बनवाता है, किसान दस से बीस हजार के कर्ज के आत्महत्या कर लेता है, एक आदिवासियों की जमीन हथियाकर महिला के गुप्तांगों में पत्थर रखवाता है और मुंह पर जहरीला रसायन फिकवाता है नक्सलवादी मर्दानगी के नाम पर, एक दारु में लिप्त रहकर रानी बनी फिरती है, बुन्देलखण्डमें पीने को पानी नही और मामा सबको मामू बनाकर 5 हजार करोड़ बर्बाद कर देता है, और ढपोल शिरोमणि चौबीसों घण्टें भाषण के मूड में रहकर कुछ भी बकर करता है। 
देश में काला धन लाने वाले अपने जमाईयों को सफ़ेद धन दिन दहाड़े ले जाने देते है, उद्योगपतियों की बीबियों की मुस्कान पर अरबों का कर्ज माफ़ कर देते है, एक घटिया कारपोरेट प्रधानमन्त्री के काँधे पर हाथ रखकर प्रशासन को ताकत दिखाता है, पद्मश्री जैसे राष्ट्रीय सम्मान गली मोहल्ले के चापलूसों को बाँट दिए जाते है और एक भांड को राष्ट्रपति बनाने के ख्वाब संजोये जाते है। अपनी सी बी आई और सुरक्षा व्यवस्था के बजाय देश को पनामा पर भरोसा जिस देश में नागरिकों को हो जाए वह देश पतन के गर्त में गया है , क्या और सबूत चाहिए ? 
जाहिल और अंधे लोग ना पढ़े और ना कमेंट करें



और वैसे भी गृह त्यागियों, संयमी और पुरुषार्थ में लिप्त व्यक्तियों को "कोहिनूर" की जरूरत नही पड़ती। 
संघ ने धैर्यवान, वीर्यवान और संयमी बनना सीखाया है। सारे प्रेरणा गीत इन्ही संदेशों के द्योतक है।


सुबह वाट्स एप्प पर किसी को कहा कि महावीर जयंती की शुभकामनाएं तो उसने कहा कि मैं हिन्दू हूँ और अल्पसंख्यक नही, मेरे आराध्य श्रीराम है महावीर नही।
दिल खट्टा हो गया, क्या घटियापन है ये ?

बहरहाल देर से ही सही अहिंसा परमोधर्म और अपरिग्रह जैसा वृहद सन्देश देने वाले भगवान महावीर जयन्ति की शुभकामनाएं आप सबको ।


मेरे खाते में 15 लाख तो नही आये पर अभी इंग्लैण्ड से एक पार्सल आया है ब्ल्यू डार्ट कुरियर से जिसमे कोहिनूर निकल आया है, एकदम असली वाला भगवान की कसम ।
मोदी जी का धन्यवाद ।

कोहिनूर आ भी जाता तो नागपुर की 45 डिग्री में पिघल जाता, इसलिए हमने और अमित जी भाई शाह ने तय किया कि उसे महारानी के पास ही रहने दिया जाए, रहा सवाल जनता का तो वो समझ चुकी है कि जब पन्द्रह लाख नही मिलें तो अरबों खरबों का कोहिनूर आने से रहा।
चलो अब सब लोग बीफ, दादरी, सिंहस्थ, व्यापमं, गौ माता, पाकिस्तान, दंगों और चुनाव में ध्यान लगाओ
चलो सब बोलो
अच्छे दिन ....... आएंगे !!!
भारत माता की ..... जय !!!!!!!

कई लोग इन दिनों मुझे कह रहे है कि
"नोकरी नही है, छूट गयी है, छोड़ना चाह रहा हूँ, काम का बहुत तनाव है, समय नही मिल पा रहा है ...."
मैं पूछता हूँ कि तो मैं क्या करूँ ?
एनजीओ में आपकी बहुत पहचान है, कोई नोकरी लगवा दो, समाज सेवा करना बचपन का शौक था, अब कर लेंगे....बस साठ सत्तर हजार तनख्वाह मिल जाए और आराम हो, भोपाल, इंदौर, बड़े शहर में हो....गाँव नही जाएंगे, सफर नही करेंगे दूर दराज के इलाकों में!!! यानि कमीनपन खून में है लगता है।
मैं कहता हूँ कि आजकल एनजीओ में काम करने के लिए बहुत दक्षताओं और कौशल की जरूरत होती है, चाहे इंदौर के ISSW से फर्जी MA Social Work किया हो जिसे इस घटिया संस्थान के गधे MSW कहते है या कही और से घर बैठे डिग्री खरीदी हो, अंग्रेजी और कम्प्यूटर में भी अच्छा ज्ञान होना चाहिए और एनजीओ में इन दिनों सबसे ज्यादा फण्ड की दिक्कतें है, इस सरकार ने फण्ड का कबाड़ा कर दिया है, लोकतन्त्र में सबसे बड़ा रोजगार देने वाला यह पांचवाँ स्तम्भ असहाय है ...
फिर कहते है चलो छोडो, आप तो एक एनजीओ खुलवा दो, फण्ड दिलवा दो, आपका जो कमीशन हो वो ले लेना, दो चार प्रतिशत .... कब आ जाए पँजीयन करवाने ....
इसी के साथ कुछ और ज्ञानी मिलते है जो कहते है " भाई अपना एनजीओ है, सात आठ साल हो गए उसे ही ले लो, बस रजिस्ट्रार के यहां रिपोर्ट बनाकर देनी है, आडिट करवाना है तुम ले लो, प्रोजेक्ट लाओ खूव कमाओ और हमे 20-25 % दे देना बस तुम भी बेरोजगार हो, खुद भी ऐश करो और हमे भी घर बैठे मिलता रहेगा" । ये वे लोग है पेटभर खा पीकर बैठे है और अघाये हुए है , सरकारी नोकरी करते है पार्ट टाइम और यहां वहाँ मुंह मारते रहते है रूपये पैसे के लिए और महिलाएं इनकी कमजोरी है, कभी दफ्तर में या शहर में नही मिलते पूरे देश में वामपंथ या किसी और जन्मजलों का चोगा ओढ़े देश के बुद्धिजीवी बने फिरते है। इन्हें लगता है कि इनके कहने से मैं इनकी चाकरी कर इनकी दूकान चालू करवा दूंगा और ये हरामखोर खाएंगे भी और यश भी कमाएंगे।
दिल करता है इन जैसे लोगों को चौराहे पर खड़ा करके चार जूते लगाऊँ और उलटा टांगकर लाल खड़ी मिर्च की धूनी दे दूँ !!!
एक ढूँढो हजार मिलते है 
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मित्रों , मैं खुद तीन साल से बेरोजगार हूँ और मैंने नोकरी नही करने का निर्णय लिया है। मैं बहुत प्रकार के काम करके गुजर बसर कर रहा हूँ, कृपया नोकरी के लिए अनुरोध ना करें, सिफारिश के लिए भी ना कहें और उधार भी ना मांगे । बहुत कड़ा जवाब मिलेगा - याद रखियेगा।

आप लोग इतने घटिया, आत्म मुग्ध, ऐयाश, मक्कार, भृष्ट, निकम्मे, आत्मकेंद्रित, कार्पोरेट्स के तलुएचाटु, विदेश प्रेमी और मानव विरोधी होंगे हमने ये भी पूर्वानुमान नही लगाया था उमा जी, वरना कांग्रेस जैसी दुनिया की सबसे घटिया पार्टी के बदले हम आकाश गंगा की सबसे लद्दड़ और अकर्मण्य पार्टी को वोट कतई नही देते ये 31 प्रतिशत लोग, सूखे के समय भगवान से प्रार्थना करना और योजना ना बना पाना कोई आप जैसे चाटुकारों से सीखें जो सिहस्थ में इंसान / जानवरों को मारकर धूर्त साधुओं के लिए काजू बादाम लूटा रहे है, आपकी गंगा साफ़ हो गयी क्या, या नोटँकी जारी है ?
याद दिला दूं आपके श्यामला हिल्स के मुख्यमंत्री आवास पर आपने गौ शाला बनवाई थी और रोज दफ्तर में घुसने से पहले पूजा करती थी आप, जब एक फर्जी और टाइम पास मुख्यमंत्री आपको पार्टी ने बनाया था।
एक बार जाकर अपने पूर्व विधानसभा क्षेत्र बड़ा मलेहरा, जिला छतरपुर, मप्र, होकर आईये जहाँ गाँव के गाँव खाली है और आपके राखी वाले भैया शिवराज जी उज्जैन में पुण्य कमा रहे है ।
कभी तो दिमाग का इस्तेमाल करो, राजनैतिक अनुभव नही तो ठीक है, पर अपनी उम्र के लायक अक्ल का तो इस्तेमाल करो या चुपचाप अज्ञातवास में चली जाओ बजाय कि उलजुलूल बयान देकर झांसी की लक्ष्मी बाई के क्षेत्र को प्रतिनिधित्व देकर अपना मानसिक दीवालियापन सार्वजनिक कर रही हो।
देख रहे है अटल जी, आडवाणी जी आपकी पार्टी का क्या हाल बना रखा है इन टुच्चे लोगों ने !!!