Thursday, January 28, 2016

जेंडर और स्त्री स्वतन्त्रता के मुद्दे - शनिशिंगणापुर या शबरी माला तक सीमित नहीं है.

जेंडर और स्त्री स्वतन्त्रता के मुद्दे - शनिशिंगणापुर या शबरी माला तक सीमित नहीं है.

सदा सुहागन रहो, दूधो नहाओ, घर की इज्जत, पति के चरणों में स्वर्ग है, ससुराल ही स्वर्ग है, चुड़ियों से लबरेज, मातृत्व के बिना अधूरी है स्त्री, जैसे मुहावरों से मुक्ति पाओ.

आर्थिक स्वालम्बी बनो, अपने आने जाने पर पाबंदी हटवाओ, घर - परिवार से लेकर समाज के हर निर्णय में भागीदारी करो, अपनी जिंदगी अपनी मर्जी से खुलकर जियो, श्मशान में जाने की हिम्मत करो, अपने लोगों को मुखाग्नि देने का हौंसला रखो, शक्तिशाली बनो, छेड़छाड़ करने वाले को पटकनी दो, बलात्कारी को ऐसा सबक सिखाओ कि कही मुंह दिखाने लायक ना रहें, अपनी मर्जी से पसंद के आदमी से शादी करो या एकाकी जीवन बिताओ, दुनिया घूमो, राजनिती में आओ और सत्ता पर काबीज हो, आदि ऐसे मुद्दे है जिन पर लड़ाई करना है.

मस्जिद , गिरजे, गुरुद्वारे और मन्दिर में घुसकर और एक पत्थर पर तेल चढ़ा लेने से कोई क्रान्ति नही होगी, संतान को प्राप्त करने के लिए जैविक प्रबंध करो, बाबाओं के आशीर्वाद और मन्नत मनवाने बैठी पाषाणकाल से उपेक्षित और जर्जर हो चुकी पत्थर की मूर्तियों से संताने प्राप्त नहीं होती - इन्हें तो पुरातत्व विभाग भी सम्हालने को तैयार नहीं तो तुम क्यों घिस- घिसकर अपना जीवन बर्बाद कर रही हो इनके पीछे ? इसलिए इन्हें तत्काल छोड़ दो और लात मारो, ये ढकोसले है. प्यार, समर्पण और त्याग सिर्फ महिलाओं को नहीं शोभा देता, अगर ये सब मानवीय और शाश्वत मूल्य है तो पुरुषों को भी लाद दो इस तरह के प्रपंचों से तुम सब मिलकर.

सती सावित्री जैसे त्यौहार वट सावित्री, हल छट, संतान सप्तमी, संक्रांत, करवा चौथ, से लेकर हर हफ्ते भूखे रहना बंद करो तुम्हारे भूखे रहने से कुछ नहीं होने वाला है, ये मर्द बड़ा जालिम है.........
जेंडर और स्त्री स्वतन्त्रता के मुद्दे इस समय में एकदम अलग है, समाज के बनाए भरम और अपने विश्वासों पर ही सवाल खड़े करो - जो सिर्फ तुम्हारे लिए बनाए गए है, इनसे लड़ो और आगे बढ़ो, ये सब तरीके भी तुम्हे उकसाकर परम्परा और पद्धति में ही धकेल रहे है।

इनसे बचो, ये स्वतंत्रता नही - ब्राह्मणी संस्कारों से ज्यादा कड़ी बेडियाँ है तुम्हे जकड़ने को और तुम क्या सोचती हो ये वोटों का लालची और सत्ता पद प्रतिष्ठा और धन का हिमायती मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस या वो दोगला नौटंकीबाज शाणा तथाकथित श्री-श्री रविशंकर कह देगा तो सब ठीक हो जाएगा ? ये लोग समाज में पहले खुद अपने घरों और निजी जीवन में अपना कर बताएं तो जानों.

अपने आप से लडो पहले, अपने घर, समुदाय, समाज की लड़ाई है यह , इन धूर्त लोगों के कहने में मत आओ और कोई देवी कहें तो दांत तोड़ दो उस कमीने के ! जब तक तुम इंसान नही बन जाती तब तक इन सबको पछाड़ती रहो।

Monday, January 25, 2016

EM Forster - एडवर्ड मोरेगोन फास्टर – साहित्य का रंग बिरंगा चितेरा 25 Jan 16



एडवर्ड मोरेगोन फास्टर – साहित्य का रंग बिरंगा चितेरा

ई एम फास्टर अंगरेजी साहित्य के रंग बिरंगे चितेरे ऐसे कलाकार है जो आलोचना, निबंध और उपन्यास से लेकर जीवन के विविध पक्षों को अपनी कूची से उकेरते है और इस कूची से समूचे समाज की कमजोरियों और अच्छाईयों को गढ़ते है इसलिए वे मेरे पसंदीदा साहित्यकार रहे है. उनसे प्रभावित होने वाला मै ही नहीं वरन यहाँ मालवा में बसे अंगरेजी साहित्य के मुरीद अनेक लोग है, जो उनसे एक कशिश के साथ गहरा और संजीदा जुड़ाव महसूस करते है. फास्टर का इस इलाके विशेष में प्रसिद्द होना कोई संयोग नहीं बल्कि एक पूरी गाथा है जो इस मालवा की जमीन पर तत्कालीन ग्वालियर से धार स्टेट तक फैले मराठा साम्राज्य की सिंधिया, पवार, होलकर वंशों की लम्बी कहानियाँ है जिसमे किस्से है, दर्द है, पराक्रम है, पलायन है, युद्ध है, शोषण है, तिकड़मी राजनिती है, देश के दूसरे राज्यों में भागकर या भगाए जाने पर स्थापित होने की या दूर समुद्र किनारे बसे फ्रांसीसी राज्य के साथ विल्लेन हो रहे पांडीचेरी में रियासतों की खरीद फरोख्त की कहानियां है साथ ही यहाँ के लोगों की एषणायें है, अतृप्त इच्छाएं है और स्वाभाविक मानवीय गुणों में आते बदलाव और बदलते परिवेश के साथ क्रान्ति के लिए फूंके जा रहे प्रजा मंडलों जैसे आन्दोलनों की परत दर परत खोलते पृष्ठ है, मालवा के आम आदमी के   जीवन में नित प्रतिदिन बदला रहे आरोह अवरोह के प्रतिबिम्ब है.

फास्टर का जन्म 1 जनवरी 1879 को इंग्लैण्ड के लन्दन शहर में हुआ और थोड़े समय बाद ही उनके पिता की मृत्यु हो गयी उनकी माँ ने उन्हें अपने दादा दादी के साथ मिलकर पाला पोसा. नन्हे फास्टर पर उनके परिवार का गहरा असर पडा. उनके पिता एक वास्तुविद थे, जो चर्च और इसाईयत के गहरे अनुयायी थे, वे गहरे में नैतिकता और इसके अनुसरण में यकीन रखते थे, दूसरी और उनकी माँ बहुत खुले विचारों की थी, वे चर्च को मानती तो थी पर चर्च की सत्ता को बेहद हलके ढंग से स्वीकारती थी. इस प्रकार के दो द्वंदों के बीच बड़े होते फास्टर की विचारधारा पर गहरा असर पडा और इन दो तर्क और अतर्क के बीच में वे कैंट के एक स्कूल में डे स्कालर के रूप में पढ़े, जो बहुत परम्परागत विचार और शैली का विद्यालय था. पहली बार वे कैम्ब्रिज के महाविद्यालय में जब पढ़ने गए तो वहाँ के खुले माहौल में उन्होंने चैन की सांस ली और अपने आपको सम्पूर्ण रूप से व्यक्त करने में सक्षम पाया, जिसमे व्यक्ति की स्वतंत्रता, किसी भी बात, विचार पर शक या सवाल करने की योग्यता, और उत्तर यूरोपीय देशों के एशिया, अफ्रीका और यूरोप के बीच पनपी मेडीटेरियन सभ्यता को बारीकी से देखने समझने का अवसर मिला. टोनब्रिज स्कूल, कैंट से किंग्स कॉलेज की इस यात्रा में फास्टर ने अपने को एक नए विकसित स्वरुप में पाया और इस स्कूल से कॉलेज की यात्रा को वे अपने जीवन का स्वर्णिम काल कहते है.

कैम्ब्रिज छोड़ने के बाद फास्टर ने निश्चित किया कि वे अपना सम्पूर्ण जीवन लेखन में लगा देंगे और इसलिए उन्होंने लेखन में अपना ध्यान लगाया और संजीदगी से लिखते रहे - छोटी कहानियां, उपन्यास, विभिन्न विषयों पर टीकाएँ, इस बीच उन्होंने विक्टोरिया युग के सूरज को ध्वस्त होते देखा, यूरोप बदल रहा था, दुनिया में संघर्ष तेज हो रहे थे, फ्रांस की क्रान्ति का असर अंगरेजी साहित्य पर नजर आ रहा था, नीग्रो कवियों की एक पूरी पीढी एक नए शब्द संसार और ग्रामीण इलाकों के शब्दों यानी लोक भाषा के मुहावरों को गढ़ते हुए नई एंथोलोजी रच रही थी, अमेरिकन साहित्य में भी एक नए प्रकार के मेटाफोर और एन्द्रिकता का जाल बुना जा रहा था. अपने से पूर्ववर्त्ती उपन्यासकारों की लेखन शैली को छोड़कर उन्होंने खुली और एक आम भाषा में या बोलचाल की भाषा में लेखन को सामने रखा. जार्ज मेरीडीथ जैसे उपन्यासकार जो बहुत बारीकी सी क्लिष्ट संरचनात्मक भाषा, बिम्ब और एक वर्ग विशेष द्वारा समझे जाने वाली भाषा में लेखन कर रहे थे, को छोड़कर फास्टर ने इस लेखन शैली से बगावत करके आम लोगों को समझ आने वाली खुली, उन्मुक्त भाषा और शैली में लिखा जिसका उदाहरण उनके पहले उपन्यास में देखने को मिलता है जो उन्होंने मध्यमवर्गीय लोगों को लक्षित करके लिखा था. मेडीटेरियन सभ्यता में दर्ज मूर्तिपूजा को लेकर उनका झुकाव था और एक गहरा सरोकार भी इसलिए उन्होंने इस विषय पर लिखा कि यदि महिला और पुरुष को जीवन में संतुष्टि का एक स्तर प्राप्त करना है तो पृथ्वी से जुड़ाव रखना होगा और अपने स्वप्नों को, इरादों को इसी पृथ्वी पर बोना होगा. 1907 में आये उपन्यास “द लांगेस्ट जर्नी” में वे कहते है कि अलगाव से चीजें हल नहीं होंगी, सौहार्द्र से ही सब हल हो सकेगा, पशुवत व्यवहार आखिरकार धरती को नुकसान पहुंचाएगा. और अतिशयोक्तिपूर्ण तरीके से देखे गए विकास के दिवास्प्न धरती के लिए भविष्य में घातक साबित होंगे.

इसी तरह की पृष्ठभूमि पर बुना गया अन्य उपन्यास “होवार्ड्स एंड” है, जो उनकी सफलता का पहली बार पैमाना बना. फास्टर के लेखन पर प्रथम विश्व युद्ध का गहरा असर पडा, उन्होंने भारत में दो बार यात्राएं की. पहली बार वे 1912-13 में और दूसरी बार 1921 में, दोनों बार देवास में वे रहे. उन्होंने उत्तर विश्व युद्ध उपन्यासों की विषय वस्तु बदली और “ए पैसेज टू इंडिया” में बहुत बड़े फलक पर फैले कथानक में वे एकदम नकारात्मक स्वरुप में नजर आये. यह उपन्यास भारत में हो रहे आन्दोलनों, परिवर्तनों की कहानी बयान करता है जिसमे हम भारत के साथ देवास और धार के बाग़ की गुफाओं का वर्णन देख सकते है. प्रतिवर्ष जन्माष्टमी पर निकने वाली राज घराने की दिंडी यात्रा का खूबसूरत वर्णन है वही बाग की गुफाओं में एक अंग्रेज महिला के साथ हुए बलात्कार का वीभत्स और जुगुप्सापूर्व कहा गया कथ्य है. देवास में वे तत्कालीन बड़ी पाती के महाराज स्व तुकोजीराव पवार के सचिव थे जिन्हें अंग्रेज बहादुर ने नियुक्त किया था. उन्होंने राज परिवार, आपसी भाई चारे, राजनिती, लड़ाई और तुकोजीराव पवार की व्यक्तिगत जिन्दगी को लेकर “द हिल ऑफ़ देवी” जैसा उपन्यास लिखा है जिसमे उन्होंने तुकोजीराव के पांडीचेरी जाने का जिक्र और फिर वहाँ फ्रांस की सरकार के साथ मिलकर किस तरह से यहाँ की सत्ता पर नियंत्रण किया, वहाँ देवास महाराज की बनी हुई समाधि का जिक्र भी इस उपन्यास में आता है. यह शायद एक संयोग ही है कि तुकोजीराव के सौतेले भाई भोजराज पवार ने विक्रम विश्व विद्यालय, उज्जैन से अंगरेजी में एमए किया और बेंगलोर के बिशप कॉटन स्कूल में पढाई के दौरान उन्होंने फासटर को बहुत करीब से देखा परखा था, इसलिए एमए के बाद उन्होंने के पी कॉलेज, देवास में पढ़ाते हुए “द हिल ऑफ़ देवी” को लेकर एक क्रिटिक लिखा. विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में अंगरेजी विभाग के तत्कालीन विभागाध्यक्ष डा टाटके भी फास्टर के साहित्य के दीवाने थे. उनके रहते उन्होंने पाठ्यक्रम में फास्टर की रचनाओं का समावेश किया.

फास्टर ने सात उपन्यास लिखे, इसके अलावा लघु कथाएं, आलोचना और गद्य लिखा. एक उपन्यास “मौरिस” उनकी मृत्यु पश्चात प्रकाशित हुआ था, जिसमे तत्कालीन देवास रियासत में फ़ैल रही समलैंगिक के बारे में और देवास के समलैंगिक लोगों का जिक्र है. देवास में मीठा तालाब के सामने सागर महल में उन्हें रहने को स्थान दिया गया था, जहां वे रहते थे और राजकाज के साथ अपना लेखन करते थे. कई बरसों तक यह सागर महल अपने अतीत की कहानियां आने जाने वालों को सुनाता रहा परन्तु दुर्भाग्य से अभी तीन वर्ष पूर्व उसे ढहा दिया गया और इस तरह से देवास से अंगरेजी के एक महान साहित्यकार का निशाँ मिट गया. फास्टर अंगरेजी के ही नहीं वरन भारतीय साहित्य के एक महान रचनाकार है जो भारतीयता में रचकर यहाँ के समाज की साहित्य में बारीक बुनावट करते है और यहाँ के लोक, भाषा, मुहावरों, प्रतीकों, बिम्बों, संस्कृति और रीति रिवाजों पर अपनी बात कहते है उनके साहित्य पर विक्टोरिया युग से भारतीय सामंतवाद, आजादी की छटपटाहट के लिए बेचैन लोगों की पीड़ा, महिलाओं के स्वातंत्र्य का जोर स्पष्ट दिखता है. वे अपनी पीढी में एक मात्र ऐसे रचनाकार है जो सिर्फ उपन्यास - कहानी ही नहीं, वरन आलोचना के क्षेत्र में भी हस्तक्षेप करते है और आलोचना में अपनी गहरी पैठ बनाते है. अंगरेजी में वे एक आलोचक के रूप में भी मानी है और उनकी संस्तुतियां विलक्षण और दुर्लभ है रचना को तौलने के पैमाने पर वे उसकी सार्वभौमिकता और स्वीकार्यता पर बात करते है.

भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक दिवस पर आज ई एम फास्टर को याद करना जरुरी और सामयिक इसलिए भी है कि पैसेज टू इंडिया के समय की प्रवृत्तियाँ फिर अपने को दोहरा रही है, सामंतवाद अपने पैर पसार रहा है, महिला हिंसा इतनी बढ़ गयी है कि बलात्कार एक सामाजिक स्वीकृति में बदल गया है, धर्म स्थलों पर हिंसा एक अनुशासन हो गया है, त्यौहार हंसी खुशी और उल्लास की थाती ना होकर तनाव भरी दास्तानें हो गए है, तामसिक आदतें समाज में एक शिष्टाचार बनकर उभर रही है और धर्म पाखण्ड की जड़ों में धंसता समाज अपनी गिरफ्त धरती, मूल्यों और विरासत पर खोता जा रहा है, राजनिती अपने पतन के शीर्ष पर है और सामाजिक ताने बाने में बिखराव हमारा अक्स बन गया है. जाहिर है अच्छा साहित्य हमें रास्ता दिखाता है और फास्टर उनमे से एक महत्वपूर्ण पाथेय है जो बिखरते समाज को एक दिशा देने का काम करते है. 


-संदीप नाईक
मप्र पाठक मंच की एक गोष्ठी में पढ़ा गया एक पर्चा 26 जनवरी 16


Thursday, January 21, 2016

Posts of 21 Jan 16


Book on the table वाट्स एप पर क्रान्ति by Anurag Pathak



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जो देश अपने लोगों जो समझा नही सकता, अपने युवाओं को गलत रास्ते पर जाते हुए देखता है, आत्महत्या करने को मजबूर करता हो या धर्म के नाम पर जिहादी बनाता हो उस देश का भविष्य कभी भी सामाजिक, विकसित और सुरक्षित नही हो सकता।

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जैसे सबके दिन फिरे मोदी के भी फिरे ...
अब 56 इंच में ना दम है ना काम करने की तमन्ना बची है, रही सही कसर उनके ही लोगों ने पूरी कर दी है.......हर घर मोदी के बजाय अब हाय हाय मोदी हो रहा है और याद रखना यह मोहरा अब बदलेगा, ना प्यादा बन पाया - ना वजीर, बस एक हाथी बनकर रह गया कही भी इधर उधर बिना उद्देश्य और बिना किसी मकसद के चलता चला गया.
फिर कहता हूँ इससे बेहतर मनमोहन था देश के लिए जो कम से कम चुप तो रहता था और कुछ नहीं करता था. एक आम आदमी का भरोसा तोड़ना सबसे बड़ा छल है मोदी जी, लोग कमाकर मेहनत से अपने को और अपने परिवार को सुखी रखना चाहते है, नाकि दंगों की आग में अपनीऔलादों को बलि चढ़ाना चाहते है. किसी भी लोकप्रिय प्रधानमंत्री का मात्र दो साल में इतना भयानक ग्राफ गिरना किसी भी देश के इतिहास के लिए चिंताजनक है वो भी तब जब देश में 31 प्रतिशत उसके ही लोग जो अंधे थे अब ज्ञानवान चक्षु खोलकर बैठ गए है और दलित से लेकर कश्मीर और पाकिस्तान से लेकर 370 तक का हिसाब मांग रहे है. ना कोई समझ - ना अकादमिक ज्ञान, ना पहल - ना इच्छा शक्ति, तो देश कैसे चलेगा गुरु.?
भाजपा अगर 19 में आकर फिर से राम मंदिर बनाने के सपने भीरु और कायर लोगों को दिखाना चाहती है तो बेहतर है अभी से बदल दें और किसी को फर्क नहीं पडेगा ना कोई स्यापा करेगा ना रुदन, सब ठीक हो जाएगा........
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हिन्दुस्तान में इंसानों को रहने दें ब्राह्मण वैश्य ठाकुर और दलितों को अब बाहर कर दें, ये सब मानवता के दुश्मन और व्यापारी है। कम्बख्तों ने जीना हराम कर दिया है, चार जूते मारो और चलता करो सारे अवसरवादियों को।

पढ़ लिखकर भी नही सुधरे और वही जाति धर्म का मुलम्मा चढ़ाकर बेशर्मी से आरक्षण या मन्दिरों में पूजा करने का ठेका लिए बैठे है।

सबसे बड़ी जड़ आरक्षण है जब तक इसे नही हटाएंगे तब तक कोई बदलाव नही होगा और अब समय है कि योग्यता को महत्व दिया जाए।
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इसे मैं दादरी, मालदा और रोहित के संदर्भ में समझूँ तो मेरी कम बुद्धि पर शक ना करना।Ashutosh Dubey की कविता जो कई पाठ मांगती है।

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हैदराबाद वाला मामले में पता चला। रोहित पर जांच करने वाले सब दलित थे। दलितों ने ही उसे रूम से बाहर निकाला। वहां पहले भी आत्महत्या की गई है। सच कहूँ तो जो 12 वी पास हैं वे छात्र राजनीती पर बोल रहे हैं और जो कभी हैदराबाद गए नहीं वे दक्षिण की राजनीति पर पेल रहे हैं। इससे बड़ा झूठा समय पूरी सभ्यता के काल में नहीं.

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मुझे लगता है कि मालदा काण्ड पर यदि गंभीरता से चर्चा हुए होती या कार्यवाही की गयी होती तो शायद देश में आज हालात दूसरे होते, यह एक बड़ी चूक थी और इस पर प बंगाल सरकार को घेरकर कार्यवाही की जाना थी. अब समय है कि छात्रों के मुद्दों को छात्रों के परिपेक्ष्य में ही देखा समझा जाए, और विश्व विद्यालयों को राम पूजा और आरक्षण जैसे ढकोसलों से दूर रखा जाए वरना हमें रोज एक रोहित की मौत के लिए तैयार रहना होगा.
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रोहित क्या मरा सबने अपनी औकात दिखा दी, दिलीप मंडल से लेकर कुछ लोगों ने पूरा दलित आख्यान नए सिरे से रच डाला है, और समूचे समाज को खांचों में बांटना शुरू कर दिया, अगर तुम्हारे लेखों से जो निहायत ही संकीर्ण और घटिया मानसिकता से लिखे गए है, और तुम कितने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हो यह भी ज़माना जानता है, से काश बदलाव आ पाता तो बात भी बनती परन्तु तुम तो मुंह में सुविधा का चम्मच, आरक्षण की बैसाखी और दलित तमगा लगाकर इसी समाज में सबको गरिया रहे हो और भूल गए कि कुछ इन्ही लोगों और समाज ने तुम्हे पुचकार कर आज जहां हो वहाँ पहुंचाया था.....
शर्म करो सबको एक डंडे से मत हांको, और कुछ ओछे पत्रकार किस्म के फर्जी लोग जो नकली और घटिया पत्रकार बने फिरते है और आजकल सिर्फ और सिर्फ वामपंथियों से लेकर कांग्रेस को गरियाने का ठेका लेकर बैठे है क्योकि तुम्हारे जैसे गधों को कुछ लोग कठपुतली की तरह से इस्तेमाल कर रहे है यहाँ आग उगल रहे है, अरे तुम जानते क्या हो आन्दोलन, विचारधारा और क्या अकादमिक समझ है तुम्हारी ? मूर्ख शिरोमणि पहले अपने पूरे नाम को लिखने की हिम्मत करो जो जाति बताता है, कुमार या अन्य उपनाम लगाकर तुम क्या और यो सिद्ध करना चाहते हो.........
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दादरी भी गलत था, मालदा भी और रोहित की आत्महत्या भी और देवास में मुस्लिम समाज द्वारा किया गया निर्दोष नरेंद्र का खून भी पर अब राजनिती बंद करो और अपने घटिया तर्कों और तरकशों को रख दो कही और काम करो देश की एकता के लिए और सौहाद्र के लिए यदि ये सब नहीं कर सकते तो छोड़ दो सब कुछ और मानवता का राग अलापना बंद करो और डूब मरो....
चैनल वालों, नेताओं, बुद्धिजीवियों, भ्रष्ट प्रशासकों, छदम दलितों, सुविधाभोगी दलितों और छात्रनेताओं...... बंद करो इन सबकी मौत पर राग अलापना और यदि थोड़ी भी खुद्दारी और जमीर बाकि है तो सबसे पहले अपने दिल दिमाग के जाले साफ़ करो...

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एक पढ़े लिखे युवा ने आत्म हत्या की है और तमाम जमात उसे ही गलत साबित करने पर तुली है। संस्कार कहाँ जाएंगे सदियों से दलितों को कुचलने में मगन रहे और अब बर्दाश्त नही हो रहा , एक घटिया आदमी लेंडी पीपल की बात करता है और अपने ब्राह्मणी संस्कार और संघी विरासत का भौंडा प्रदर्शन कर रहा है।बाकि की सारी भाजपाई संस्कृति उसे याकूब मेनन का सहयोगी बनाने पर आमादा है, दिमागी मवाद और कहा बहेगा ? नपुंसक और कायर लोग यही कर सकते है। जबकि एक जानकारी के अनुसार दत्तात्रेय खुद ओ बी सी से आते है पर अभी रामनामी चादर ओढ़े गन्दा धंधा कर रहे है ना तो क्या करें ?

Wednesday, January 20, 2016

Posts of 18,19 and 20 Jan 16


भोपाल में सोमेश मेनन, विमल जाट, अनुपा और अंशुल प्रताप सिंह के साथ यादगार मुलाक़ात.......








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एक पढ़े लिखे युवा ने आत्म हत्या की है और तमाम जमात उसे ही गलत साबित करने पर तुली है। संस्कार कहाँ जाएंगे सदियों से दलितों को कुचलने में मगन रहे और अब बर्दाश्त नही हो रहा , एक घटिया आदमी लेंडी पीपल की बात करता है और अपने ब्राह्मणी संस्कार और संघी विरासत का भौंडा प्रदर्शन कर रहा है।बाकि की सारी भाजपाई संस्कृति उसे याकूब मेनन का सहयोगी बनाने पर आमादा है, दिमागी मवाद और कहा बहेगा ? नपुंसक और कायर लोग यही कर सकते है। जबकि एक जानकारी के अनुसार दत्तात्रेय खुद ओ बी सी से आते है पर अभी रामनामी चादर ओढ़े गन्दा धंधा कर रहे है ना तो क्या करें ?

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अब डर लगता है तुम्हारी मुस्कुराहट से
ख़ौफ़ होता है तुम्हारी चहलकदमी से
हवाएँ भी बौरा जाती है तुम्हारे आने से
समाज चौक उठता है तुम्हारी चुप्पी से

एक मुस्कुराहट भी प्रलय ला सकती है
एक सौजन्य भेंट युद्ध का आव्हान है
क्यों घूमती है उंगली, क्या इशारा है
दाढी का बाल गिरता है भूकम्प आता है

सदियों में ये सुअवसर आया जब एक हुए
जो आँख के बदले आँख का न्याय मानते है
सारी भेड़े खामोशी से चर रही है अंधानुकरण में
देश को जगसिरमौर बनाने को संकल्पित है

एक तानाशाह की झपकी बाँट देती है हमें
बच्चे, युवा और स्त्रियाँ वेदना में त्रस्त है
तुम्हारे वजीर और प्यादों ने गिरवी रखे घंटे
मुनादी करने वाले झूल गए सलीब पर कल

तानाशाह कितना समय और लोगे अभी मुक्ति में
कब तक सारे बद दिमाग लोगों को ठीक कर लोगे
जो अपनी जुबान कैंची की तरह इस्तेमाल करते है
इस दुनिया को तुम्हारी जरूरत ज्यादा है तानाशाह

चिट्ठी और भावनाओं का व्यापार कुचलना होगा
हर आवाज को दबाना होगा जो कुर्सी को निहारेगी
विश्व विजयी बनने में जो आड़े आये उसे मरना होगा
धर्म पताकाओं को फहराने में कुर्बानी इतिहास है

(रोहित और नरेंद्र के लिए जो एक समाज का हिस्सा बनते बनते इस देश के लिए बलि चढ़ गए)
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रोहित तुम दुर्भाग्य से इस देश में गलत नेतृत्व और धर्मांध लोगों के सामने आवाज़ उठा रहे थे और दुर्भाग्य से वे दलित आज चुप है और कुछ बोल नही रहे जो शेर की खाल ओढ़कर सवर्ण बन बैठे है, अगर वे आज बोले तो उनकी दलित पहचान सामने आ जायेगी।
एक निकम्मी व्यवस्था, भृष्ट शिक्षाविदों, अनपढ़ मानव संसाधन मंत्री और लचर और कार्पोरेटी कठपुतली प्रधानमन्त्री के नेतृत्व को स्वीकारने से मर जाना श्रेष्ठ है।
बस ये Ashutosh या हमारे जैसे लोग तुम्हारी संवेदना को अन्तस तक महसूस कर सकते है, और इस तरह का एक मृत्यु लेख या एक Epitaph लिखकर अपना शोक व्यक्त कर सकते है।
देवास का नरेंद्र हो या तुम, इस देश के तानाशाह और लोगों को कोई फर्क नही पड़ता, ये लोग अंधे हो चुके है और इनसे बात करना भी बेमानी है .

रोहित तुम दुर्भाग्य से इस देश में गलत नेतृत्व और धर्मांध लोगों के सामने आवाज़ उठा रहे थे और दुर्भाग्य से वे दलित आज चुप है और कुछ बोल नही रहे जो शेर की खाल ओढ़कर सवर्ण बन बैठे है, अगर वे आज बोले तो उनकी दलित पहचान सामने आ जायेगी।
एक निकम्मी व्यवस्था, भृष्ट शिक्षाविदों, अनपढ़ मानव संसाधन मंत्री और लचर और कार्पोरेटी कठपुतली प्रधानमन्त्री के नेतृत्व को स्वीकारने से मर जाना श्रेष्ठ है।
बस ये Ashutosh या हमारे जैसे लोग तुम्हारी संवेदना को अन्तस तक महसूस कर सकते है, और इस तरह का एक मृत्यु लेख या एक Epitaph लिखकर अपना शोक व्यक्त कर सकते है।
देवास का नरेंद्र हो या तुम, इस देश के तानाशाह और लोगों को कोई फर्क नही पड़ता, ये लोग अंधे हो चुके है और इनसे बात करना भी बेमानी है।
रोहित तुम दुर्भाग्य से इस देश में गलत नेतृत्व और धर्मांध लोगों के सामने आवाज़ उठा रहे थे और दुर्भाग्य से वे दलित आज चुप है और कुछ बोल नही रहे जो शेर की खाल ओढ़कर सवर्ण बन बैठे है, अगर वे आज बोले तो उनकी दलित पहचान सामने आ जायेगी।
एक निकम्मी व्यवस्था, भृष्ट शिक्षाविदों, अनपढ़ मानव संसाधन मंत्री और लचर और कार्पोरेटी कठपुतली प्रधानमन्त्री के नेतृत्व को स्वीकारने से मर जाना श्रेष्ठ है।
बस ये Ashutosh या हमारे जैसे लोग तुम्हारी संवेदना को अन्तस तक महसूस कर सकते है, और इस तरह का एक मृत्यु लेख या एक Epitaph लिखकर अपना शोक व्यक्त कर सकते है।
देवास का नरेंद्र हो या तुम, इस देश के तानाशाह और लोगों को कोई फर्क नही पड़ता, ये लोग अंधे हो चुके है और इनसे बात करना भी बेमानी है।

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जब केंद्रीय मंत्री स्मृति, निहालचंद्र, दत्तात्रेय, अरुण जेटली, राजनाथ, पर्रिकर, गडकरी, साधू और महान साध्वियां हो तो क्या आप मेक इन इंडिया की बात कर रहे है मोदी जी। आपके ही देश में आपके मुंह लगे भृष्ट और किसी भी हद तक जाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज, वसुंधरा, रमणसिंह जैसे लोग हो, आपके संगठन में अमित शाह और कैलाश विजयर्गीय जैसे बड़बोले लोग हो तो आपका भविष्य सुरक्षित नही है। 
बहुत दिल से आपके द्वारा किये जा रहे प्रयासों की सराहना करता हूँ और आपकी कार्पोरेटी बुद्धि का भी मैं प्रशंसक हूँ पर ध्यान रखिये ये सारी गैंग आपको पूरी तरह डुबोने में लगी है। आप भले ही संघ और देश के अजेंडे पर हो पर आपको अब साइड लाईन करने के पूरे इंतज़ाम हो गए है।

मोदी जी सम्हलकर फिर मत कहना कि आपके धूर विरोधी और निंदक ने चेताया नही।इस सारे दंगल में ये अपना मंगल चाहते है बाकि सब तो बहाने है बॉस ।
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जिस देश में 55 प्रतिशत युवा हो और सरकार को मेक इन इंडिया बनाना और चलाना है उन्हें हैदराबाद में रोहित मरे या देवास में नरेंद्र मरे कोई फर्क नही पड़ता, आखिर हिन्दू राष्ट्र के निर्माण में युवाओं की कमी नही आने देंगे।
चिंता मत करो मठाधीशों - ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का !!! सड़क पे बारात में नाचते युवाओं को नही देखा ???
लगाओ नारा - एक मांगोगे हजार देंगे , जहां 55 प्रतिशत हो - वहाँ साले इन दो चार रोहितों और नरेन्द्रों के मरने से क्या होगा, हम देंगे ना एक - एक लाख मुआवजा इनके भिखमंगे माँ बापों को।
क्यों भाई सही है ना, तुम नाहक ही मुद्दा बना रहे हो साले इन बेरोजगार नोजवानो का ।
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Sunday, January 17, 2016

Posts of 16 and 17 Jan 16




कल देवास में कुछ निहायत ही घटिया लोगों और संगठनों की टुच्ची राजनीति और प्रशासनिक लापरवाही से एक युवा की मौत हो गयी। वह नरेंन्द्र अभी एम बी ए पढ़ ही रहा था। उसके माँ बाप को प्रशासन ने एक लाख रूपये दिए है।दंगों के ठेकेदारों और मौत के सौदागरों तुम लोग डूब क्यों नही मरते या अपनी जवान औलादों को झोंक दो इस हिन्दू - मुस्लिम लड़ाई में। जाकर पूछो उन माँ बाप से जो गाँव से बच्चे को पेट काटकर पढ़ने भेजते है और तुम्हे शर्म नही आती मस्जिदों - मन्दिरों में तुम षड्यंत्र रचकर मौत का हैवानियत भरा खेल खेलते हो।
देवास का पूरा प्रशासन और मुस्लिम हिन्दू संगठन इस मौत के लिए बराबरी से जिम्मेदार है। देश का प्रधानमंत्री स्टार्टअप करता है और तुम देश के युवाओं को एन्ड अप कर रहे हो, तुम सब निकम्मे और कायर हो - जो लोगों की रोजी रोटी, संताने और देश का भविष्य छिनकर अपनी घटिया राजनीती चला रहे हो। इतिहास, तुम्हारा खुदा या ईश्वर कभी माफ़ नही करेगा।
कहाँ हो संवेदनशील मुख्यमंत्री सिंगापुर में बैठकर उद्योगपतियों से हाथ मिला रहे हो, अरे तुम्हारे प्रदेश में युवा ही मर जाएंगे तो तुम्हारा मेक इन मध्यप्रदेश या इंडिया क्या तुम इन ओछे और टुच्चे लोगों से बनवाओगे। शर्म मगर उनको आती नही, किस कुरआन या धर्म ग्रन्थ में हत्या जैसा जघन्य अपराध लिखा है, किस हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना कर रहे हो। सिर्फ एक बार सोच कर देखो कि वह अबोध नरेंद्र जो पार्ट टाइम मेहनत करके पढ़ रहा था, तुम्हारा बेटा होता तो !!!
भाड़ में जाए ऐसा धर्म, राष्ट्र और संगठन, जिसमे युवा और गरीबो की जान की कीमत नही। शर्म आती है कि ये रज्जब अली खां और कुमार गन्धर्व का शहर है जिन्होंने गंगा जमनी तहजीब सीखाई, नईम और अफजल का शहर है जो कभी जीते जी मुस्लिम ना हुए, और तुम नाकाबिल लोग .... देवास के प्रताप पवार या प्रकाशकांत हिन्दू हो जाते तो ....
शर्म करो - प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाये या फिर घर बैठे।

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"नोट का महत्व जानो पर उसके पीछे दौड़ो मत इस दौड़ का कोई अंत नही है संसार के सारे राजा, सम्राट और नेता इसके उदाहरण है, ना कफ़न में जेब होता है ना जन्म लेते समय जो झबला पहनते है उसमे। बहरहाल, जिससे खुशी मिलती है वह करो, बस जीवन में खुशी मिलना चाहिए और इसके लिए कोई समझोता नही क्योकि अगर हम खुश नही तो ना हम खुद ठीक रह पाएंगे ना अपने लोगों का ध्यान रख पाएंगे".
आज सुबह Sachin Naik, जो लाड़ला अनुज है , से वाट्स एप पर चर्चा हुई, उसने कहा कि जीवन में आनंद नोट कमाने के बाद ही आता है तो फिर क्या था अपुन ने अपना तीस साल की नोकरी और तथाकथित समझ का ज्ञान उंडेल दिया बेचारे पर, खुदा खैर करें।


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आत्मा तक पंहुचती कविताएँ
कविता कवि की आत्मा से आती है और यदि श्रोता की आत्मा तक पंहुच पाए तो सार्थक हो उठती है. कविता इतनी पारदर्शी हो जाए कि कवि और श्रोता एक ही भाव भूमि में चले जाएँ तो यह कविता की सार्थकता ही है. कुछ ऐसा ही आज शाम कविताएँ सुनते हुए लगा. कविताओं का एक - एक शब्द जैसे छू रहा था कहीं अंदर तक और कविताएँ खुल - खुल रही थी अपने अबूझ अर्थों में. वैसे तो शनिवार की सुबह देवास जैसे शांत और सोहार्द शहर के लिए धुंध भरी थी और अफवाहों की धुंध ने इसे और भी स्याह बना दिया था, लेकिन सूरज की धूप जैसे - जैसे चढती गई, वैसे -वैसे धुंध भी छंटती गई. मौसम की भी और अफवाहों की भी. दोपहर तक तो तीखी धूप के साथ प्रशासन और अमनपसंद लोगों ने शहर की फिजां को फिर रोनक कर दिया था. 
शाम तक मौसम और फिजा दोनों ही सुहाने हो चले थे. ऐसी ही सुहानी शाम लखनऊ के मित्र नलिन रंजन सिंह, भोपाल के अजीज वसंत सकरगाए और इंदौर के हमारे पुराने साथी आशुतोष दुबे को सुनना इतना सुखद और आल्हादकारी रहा कि कविताओं का दौर जब खत्म हुआ तो लगा कि हम किसी सपने से लौट रहे हों. ओटला के इस आयोजन में संचालन किया मित्र संदीप नाईक ने. सुनील चतुर्वेदी, बहादुर पटेल, ओम वर्मा, मोहन वर्मा, दिनेश पटेल, इकबाल मोदी, ज्योति देशमुख, अमित पिठवे, नरेंद्र वर्मा, मेहरबान सिंह, सोनल शर्मा, शकुंतला दुबे, नरेंद्र जोशी, मिश्रीलाल वर्मा, नरेंद्रसिंह गौड़ व अम्बाराम चावड़ा सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित थे. कुछ तस्वीरें आपके लिए भी ताकि सनद रहे.

कल की शाम एक अप्रतिम शाम थी, एक तरफ शहर के एक हिस्से में कर्फ्यू के बहाने कुछ लोगों को बन्द कर दिया गया था, आसमान से मावठे के रूप में नेह की बूंदे बरस रही थी, वही तीन दिशा से आये तीन कवियों ने अदभुत रचनाएँ पढी- तृप्त हुआ मन और बारीकी से कविता के पेंच और दांव समझे। हिंदी कविता मुकम्मल इसलिए हो जाती है कि बहुत श्रम से भाषा को साधकर, विचारों को एकाकार करके एक सम्पदा, और थाती बनाने का, जमीन बनाने का काम हमारे मित्र करते है। 
सलाम और जोहार कल की अविस्मरणीय शाम के लिए वसंत सकरगाएAshutosh Dubeyऔर Nalin Ranjan Singh


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मालवा भीतर ही भीतर सुलग रहा है और स्थितियां बिगड़ती जा रही है, प्रशासन यद्यपि मुस्तैद है फिर भी खुफिया तंत्र को मजबूत करने की जरुरत है......कही ऐसा ना हो कि कल कोई बड़ी घटना हो जाए और हम कुछ ना कर पायें........
देवास भी इसी तरह से अन्दर से सुलग रहा है ध्यान दें जिम्मेदार लोग, एक बात तो है देवास के पूर्व विधायक स्व तुकोजीराव पवार का दबदबा गजब का था उनके रहते पिछले पच्चीस सालों में फिजां नहीं बदली और उन्होंने सबको दबाकर रखा था. मजाल कि दंगा या फ़ालतू का तनाव शहर में बढ़ जाए.....आज उन्हें इस दहशत भरे माहौल में याद करना स्वाभाविक है.
जनप्रतिनिधियों को पूर्वाग्रहों से मुक्त, सशक्त और दबंग होना बेहद जरुरी है और प्रशासन पर पूरा नियंत्रण भी होना चाहिए इनका जोकि अब खत्म होता जा रहा है. मप्र के मुख्यमंत्री इस मामले में तुरंत दखल दें और यहाँ आकर सभी लोगों के साथ बैठक लेकर प्रशासन को कड़े निर्देश दें, रोज कमाकर खाने वालों के लिए ऐसा दहशतगर्द माहौल भयानक है और आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य और फेक्टरियों में उत्पादन जैसी बुनियादी सेवाएँ प्रभावित होती है.

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कुछ व्यवसायों में राजनैतिकीकरण का हो जाना बहुत दुखी है - डाक्टर इंजीनियर, वकील, चार्टेड अकाउंटेंट, पत्रकार, शिक्षा और दीगर बात यह है कि जिन लोगों से स्वस्थ चर्चा की उम्मीद की जाती है वे बेहद घटिया किस्म के निकले, इनका देश प्रेम सिर्फ और सिर्फ हिंदुत्व के अजेंडे पर, मोदी और अमित शाह या संघ के आसपास ही घूमता है और मजाल कि ये अपने दिमाग के जले कही और साफ़ कर लें.... 
अफसोस बेहतर वे निकल जाए मेरी सूची से या एक दिन निकाल बाहर फेंकना पडेगा.............


फेस बुक से लेकर अखबारों में लगभग 70 % दिव्यांग वाले पत्रकार है
खुदा खैर करें......

Wednesday, January 13, 2016

Posts of 13 Jan 16 Pratap Pawar's Dance program in Dewas














1942 में धार, मप्र में जन्मे और धार, देवास में पढ़े लिखे पद्मश्री प्रताप पवार कत्थक शैली के गुरु है और एक बड़े कलाकार जो अब लन्दन  में स्थाई रूप से बस गए है. भारत सरकार ने उन्हें त्रिनिनाद में कत्थक सिखाने के लिए भेजा था पर जब वे लन्दन  पहुंचे तो वही के होकर रह गए पर अच्छी बात यह है कि वे भारतीय संस्कार और गुरु शिष्य परम्परा के वाहक है और लगभग 73 वर्ष की उम्र में भी काम करने का जज्बा देखते ही बनता है. पिछले 35 बरसों से वे साल में दो बार भारत आते है और प्रस्तुतियां देते है. 

कल इंदौर में सफल प्रस्तुति के बाद आज देवास में उन्होंने प्रस्तुति दी अपने चार शिष्यों के साथ जिनमे से दो विदेशी थी, साथ ही एक विदेशी शिष्या ध्वनी और लाईट का प्रबंधन देखने आई थी. देवास के मल्हार स्मृति मंदिर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सन 1952 में इस स्टेज से पहली बार नृत्य की सार्वजनिक प्रस्तुति दी थी और आज वे इतने सालों बाद यहाँ लौटे है. उन्होंने कहा कि जब वे यहाँ थे तो सोचा नहीं था कि जीवन में कुछ कर पायेंगे और उनमे आत्मविश्वास की बहुत कमी थी. बाबा साहब महाडिक ने उनमे जोश और उत्साह भरा और वे आज जो कुछ भी है उन्ही की बदौलत है. पंडित बिरजू महाराज के पहले गंडा बंध शिष्य है और उसी परम्परा को निभाते हुए उन्होंने देशी विदेशी एक हजार शिष्यों  को कत्थक नृत्य की शिक्षा दी है. 

आज उन्होंने प्रस्तुति दी परन्तु अब उनके शरीर पर उम्र का असर दिखता है, जोश जरुर बना हुआ है, पर घुंघरू और पैरों के तालमेल पर अब समन्वय कम हो रहा है, लम्बे अभ्यास के बाद भी साँस फूलने का एहसास माईक पर स्पष्ट नजर आता है फिर भी प्रताप पवार उन लोगों में से है जो अभी भी इस साधना में प्रयोग भी कर रहे है, हालांकि वे अभी भी अपने घराने और प्रस्तुतियों में ही दम भरते है पर आज उन्होंने भारत में रहे अंतिम मुग़ल शासक बहादुर शाह जफ़र की नज्म "दो जमीन ना मिली कूचा ए यार में" की नाट्य प्रस्तुति दी जो बेहद कमजोर थी. 

उनके शिष्य अभी सीखने के स्थिति से गुजर रहे है फिर भी कुछ प्रस्तुतियां ठीक थी. देवास जैसे शहर में जहां संगीत नृत्य के कार्यक्रम बरसों में बिरले ही होते है, के लोगों के लिए यह कौतुक भरा कार्यक्रम था पर कत्थक ने पिछले बरसों में जो मुकाम हासिल किये है वे आज मंच पर नजर नहीं आये और कत्थक को पुराने स्वरुप में देखना थोड़ा मुश्किल लगा. हालांकि ये दीगर बात है कि स्व पंडित कुमार गन्धर्व जी जब थे तो देवास के इसी मंच से बड़े से बड़े कलाकारों ने अप्रतिम और अभूतपूर्व कार्यक्रम दिए है और देवास के श्रोता भी बेहद संजीदा और परिपक्व लोग है जो बारीकी से संगीत और नृत्य को जानते है. 

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग, जिलाधिकारी, पुलिस कप्तान, पूर्व और वर्तमान महापौर द्वय, कलापिनी, भुवनेश कोमकली और साहित्यकार उपस्थित थे. 

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समय के साथ मित्रता एक व्यवसाय और असीमित अपेक्षाओं के लबादे में तब्दील हो जाती है, हम सिर्फ इस व्यवसाय के घाटे में रहने वाले भागीदार बनकर रह जाते है जिसमे लाभांश कुछ नही रहता सिवाय शोषण के।

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Posts of 12 Jan 16 International Youth Day


12 जनवरी 16 एक सार्थक दिवस _ अगर मालवा और कुमार जी घर में बीता पूरा दिन  












मैंने अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया आज आगर मालवा जिले के लगभग एक हजार युवाओं के साथ. बत्तीस गाँवों के युवा आज इकठ्ठे हुए थे और सारा दिन इनसे खूब बात की, समझा और इनके भविष्य के लिए कुछ बातचीत की. गाँवों के इन होनहार बच्चों और युवाओं के साथ दिन बिताना बहुत ही सीखभरा रहा मेरे लिए.
बच्चे और युवा अपने गाँव, समाज और बदलाव के लेकर बेहद सचेत है और चिंतित भी. वे समाज में फैले उंच नीच, जाति और सामंतवाद की जकडन से बाहर निकलकर कुछ ठोस और सार्थक करना चाहते है. खेती में सोयाबीन के नुकसान के बाद खेतों में खड़े और खराब होते गेहूं को लेकर चिंतित है और वे कुछ ऐसा सीखना करना चाहते है जिससे गाँव में पानी रहे,इसके लिए जरुरी है एकता जिसकी कमी है परन्तु वे प्रतिबद्ध है कि वे अपने तई कोशिशें कर रहे है कि एकता बन जाए और कम से कम अपनी उम्र के समूहों में अर्थात पीयर समूहों में जाति, छुआछूत का दंश ना फैले और वे मिलकर संगठित होकर गाँव के विकास में सक्रीय भागीदारी निभा सकें. कार्यक्रम के अंत में दहेज़ ना लेने और ना देने की सबने शपथ ली जोकि सराहनीय था.
पूरे दिन इन युवा साथियों ने मुझमे जोश भर दिया और अनुभवी और सामाजिक कार्यकर्ता भाई Abhishek Sakalle की टीम ने जबरजस्त मेहनत से पूरे दिन को सार्थक बना दिया. आते समय मालवी तरीके से मित्रों ने जब साफा बांधा तो दिल भर आया. शुक्रिया दोस्तों आज आप लोगों के काम के बारे में थोड़ा सा जाना है पर जल्दी ही आउंगा और राजस्थान मप्र की सीमा पर बसे इस जिले में आप लोग जो अच्छा और महत्वपूर्ण काम कर रहे है वह देखने समझाने और सीखने आउंगा. इस सबमे सीहोर के अनुज तुषार हरणे का चार साल बाद मिलना भी कौतुक भरा एहसास था जो वहाँ स्वास्थ्य विभाग में बीपीएम है.
एक अच्छे और बेहतरीन आयोजन के लिए बधाई और शुक्रिया प्यार और सम्मान के लिए. और इस सारे फ़साने में Himanshu Shukla ना होता तो किस्सा अधूरा ही रह जाता, जो अनुपस्थित रहकर भी पूरे समय हमारे साथ था और मंच पर लग रहा था कि अभी गाने की शुरूवात हो जायेगी. हिमांशु हरदा में घर के कुछ निजी कामों में और अपने करीबी मित्र की स्मृति में आयोजित क्रिकेट स्पर्धा के आयोजन में व्यस्त है इन दिनों.



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स्व पं कुमार गन्धर्व जी चौबीसवीं पुण्यतिथि पर आयोजित संगीत समारोह में भानुकुल, देवास आज अभी अप्रतिम वादन और गायन की अभूतपूर्व प्रस्तुति के साथ सम्पन्न हुआ. पहला कार्यक्रम मुम्बई के मिलिंद रायकर के वायलिन वादन से आरम्भ हुआ और समापन औरंगाबाद की शुभदा पराड़कर के गायन से हुआ.
दोनों के साथ तबले पर बेहतरीन तबला Ramendra Singh Solanki ने बजाया जिसे सुनना बहुत सुखद था रामेन्द्र के तबले की थाप ने वायलिन को सुर और गायन को नई उंचाईयां दी. गायन में शुभदाजी की शिष्याओं के साथ हारमोनियम पर संगत की Vivek Bansod जी ने. शुभदा जी ने अपने घराने की बंदिशे सुनाई और महफ़िल लूट ली. ये दोनों प्रस्तुतियां इतनी चित्ताकर्षक थी कि उपस्थिति गुणीजनों को तृप्ति मिली.
कार्यक्रम का संचालन विदुषी Kalapini Komkali ने किया. इस अवसर पर देवास, इंदौर, उज्जैन और कई जगहों के सुधी श्रोतागण उपस्थित थे.









Sunday, January 10, 2016

Posts of 10 Jan 16 - मप्र के मालवा में दंगों की सुगबुगाहट


मप्र के मालवा में दंगों की सुगबुगाहट
मप्र में इन दिनों अपेक्षाकृत ढंग से दंगों की सुगबुगाहट सुनाई दे रही है खासकरके मालवा क्षेत्र में यह संभावनाएं बढ़ गयी है और स्थिति प्रशासन की पकड़ से दूर होती जा रही है. यदि मै कहूं पुलिस का खुफिया तन्त्र और मुखबिरी का जाल फेल हो चुका है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. इंदौर में पिछले दिनों मुस्लिम समुदाय ने जिस तरह से रीगल चौराहे पर खड़े होकर जो कार्यवाही की और डर पैदा करने का काम किया था वह अब मालवा के सुदूर इलाकों में नजर आने लगा है. मालदा, कमलेश तिवारी के बयानों से इस मालवा का कोई लेना देना नहीं है परन्तु पिछले दो - तीन दिनों से देवास में तनाव बना है और आज आखिर में जो परिणाम निकले है वह बेहद चिंताजनक है.
दो दिन पहले मोती बँगला स्थित संघ की शाखा में बच्चों को खेलते हुए कुछ युवाओं ने मार पीट की तो थोड़ा मामला संगीन हो गया था, प्रशासन ने कार्यवाही की परन्तु कुछ लोगों को लगा कि यह पक्षपात पूर्ण कार्यवाही थी लिहाजा उन्होंने टी आई, कोतवाली को बर्खास्त करने की बात की. आज सुबह जब एक शौर्य यात्रा निकल रही थी तो एक दूकान के सामने कुछ युवा समूह में आ गये और ईंट फेंकी और भगवा झंडा निकाल कर फाड़ दिया जिससे दूसरे समुदाय के लोग भड़क गए और उन्होंने उस युवा की पिटाई कर दी, बाद में दो तीन स्थानों पर तोड़फोड़ हुई, कार के शीशे तोड़े गए, मार पीट हुई और दो चार दुकानों को नुकसान पहुंचाया गया. देखते ही देखते बाजार बंद हो गया हो - अफवाहों का बाजार गर्म हो गया. प्रशासन ने कलेक्टर, और पुलिस कप्तान के साथ मिलकर भारी पुलिस बल के साथ एक पैदल मार्च शहर में निकाला और कुछ स्थानों पर उपद्रवियों को तितर- बितर करने के लिए हल्का फुल्का लाठी चार्ज भी किया. बाद में पुलिस ने तीन चार लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया.
हम अभी कुछ साथी और पत्रकार मित्र पूरे शहर में प्रमुख स्थानों पर घूमकर आये है और पाया कि स्थिति नियन्त्रण में है. दुकाने कमोबेश बंद है और सड़कें अँधेरे में डूबी हुई है. कमाल यह है कि जो नगर निगम इतना टैक्स लेती है वह शहर के एम जी रोड पर ठीक से बिजली की व्यवस्था भी नहीं कर सकती, जोकि सुरक्षा के लिहाज से बहुत रिस्की है. सीसीटी वी अब स्थानीय व्यापारियों के सहयोग से लग जाना चाहिए - ताकि ऐसी स्थिति के समय घटनाओं की प्रामाणिक जानकारी और फुटेज मिल सकें, अभी तो पुलिस यहाँ वहाँ से फुटेज लेकर तथाकथित अपराधियों को पकड़ने की कवायद कर रही है. जिस सरदार पटेल मार्ग पर दूकान के टूटने की खबर थी वो हमारे मित्र की है वहाँ व्यापारी बैठे थे और कोई ख़ास नुकसान नहीं हुआ है. मात्र कुछ लोगों ने ईंट फेंकी थी और धमकियां दी थी. पर अफसोस धारा 144 होने के बाद भी लोग घरों से निकलकर बाहर बड़े समूहों में खड़े थे और पूरे मार्ग पर एक भी पुलिस का जवान हमें नहीं दिखा. इस तरह दुकानें बंद होने से रोज कमाकर खाने वाले और व्यापारियों का बहुत नुकसान होता है यह बताने की आवश्यकता नहीं है.
अब इंदौर के बाद देवास में यह घटना हुई है, अगले माह धार में भोजशाला के समय फिर यह होने की आशंका है जोकि प्रशासन के लिए अब एक नियमित अभ्यास बन ही गया है. क्या इंदौर और उज्जैन रेंज के आई जी और कमिश्नरम एस पी और कलेक्टर्स साहेबान को इस बात का कोई अंदेशा नहीं है कि यह घटना मात्र एक बड़ी होने वाली घटना का पूर्वाभास है, प्रशासन को समय रहते दोनों पक्ष के वरिष्ठ लोगों को बुलाकर बात करनी चाहिए और गंभीर चेतावनी देकर ऐसी घटनाएं फिर ना हो इस पर जोर देना चाहिए साथ ही दोनों समुदाय के युवाओं को रचनात्मक कामों में लगाकर रखना चाहिए, या पकडे जाने पर बगैर किसी राजनैतिक दबाव के कड़ी कार्यवाही करना चाहिए.
इस समय समाज में शान्ति की जरुरत है और इसमें जो आड़े आये उसके खिलाफ कार्यवाही होना चाहिए. स्थानीय जन प्रतिनिधियों को इस बारे में पहल करना चाहिए कि उनके विधानसभा क्षेत्र शांत रहें और कोई बेजा हरकत ना करें.


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मप्र जन सन्देश में आज 10 Jan 16 



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इंदौर स्कूल और सोशल साइंसेस के प्राचार्य रिटायर्ड होने के बाद भी पद नही छोड़ रहे बल्कि अल्प संख्यक होने का दर्जा मानकर पद पर अड़े हुए है। यह महाविद्यालय अपनी गुणवत्ता खो चुका है और समाजसेवा शिक्षा के नाम पर सिर्फ रुपया लेकर बाजार में निक्कमे और अयोग्य प्रोडक्ट निकाल रहा है जिन्हें ना तो समाजसेवा आती है ना समाज शास्त्र ना हिंदी ना अंग्रेजी और ना कम्प्यूटर। ऊपर से ईसाई मिशनरी के कब्जे के कारण अयोग्य लोगों को जिनमे ज्यादातर धर्म बदलकर आये ईसाई होते है, को बैकडोर प्रवेश दिया जाता है। हर साल देश भर से सिस्टर्स और ब्रदर भरे होते है।
मूल कारण है यहां प्राचार्य और एक महिला प्रोफ़ेसर की दो दशकों से चली आ रही बेहद ओछी और घटिया लड़ाई जिसे पिछले दस सालों से हर कोई देख रहा है फलस्वरूप यहां पढ़ाई कम गुटबाजी ज्यादा है।
अब समय आ गया है शासन से शत प्रतिशत अनुदान लेकर चलने वाले इस भृष्ट और अयोग्य संस्थान को शासन पूर्ण रूप से अधिगृहीत करें और यहां से सबको बाहर करके यु जी सी और देश स्तर पर परीक्षा पास अनुभवी प्राध्यापकों की नियुक्ति करें और इस प्राचार्य को जाति, अल्पसंख्यक दर्जे का गलत फायदा उठाकर भेदभाव करने और आर्थिक अनियमितताएं के आरोप में तुरन्त हटाकर कार्यवाही करें।
प्रदेश में किसी भी शासकीय अनुदान प्राप्त संस्थान में जाति विशेष के लोगों या प्रबन्धन का कब्जा ना हो, शिक्षा के अवसर सबको समान मिलना चाहिए।

यहां के जब तक पूरे अयोग्य स्टाफ को बदला नही जाएगा तब तक ना गुणवत्ता सुधरेगी ना यहां पर हालात बदलेंगे।

कितना शर्मनाक है कि एक व्यक्ति अप्रैल में रिटायर्ड हो जाता है और इंदौर जैसे जागृत शहर में सख्त प्रशासन, उच्च शिक्षा विभाग उसे पद से नही हटा पा रहे, वह आदमी एक बड़े संस्थान में बाप का माल समझकर कब्जा करके बैठा है। यानी भाजपा भी कांग्रेस की भाँती तुष्टीकरण में लगी है जबकि इसी महाविद्यालय के प्रोडक्ट है भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय । कमाल है यह है उच्च शिक्षा का सुशासन !!!



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विश्व पुस्तक मेला 16 


सुना कि नत्थूलाल मिठाईवाले और पहलवान सिंह (जो स्थानीय महाविद्यालय में हिन्दी और भौतिक शास्त्र के माटसाब है) की इस पुस्तक मेले में निम्न किताबें आई है 

नत्थूलाल मिठाईवाले कृत सम्पूर्ण कहानियां, चुनी हुई कहानियां, प्रतिनिधि कहानियां, विशिष्ट कहानियां, मेरी पसंद की कहानियां, नब्बे के दशक  की कहानियां, प्रेम - क्षोभ और विरक्ति की कहानियां, नकोश कुमार के सम्पादन में निकली लाल हरे भगवा की कहानियां, हारवर सिंह और प्रबंधन पाण्डेय की समालोचना पर तुलनात्मक अध्ययन का प्रागैतिहासिक अध्ययन, कहानी का इतिहास और कहानी का प्रेम पक्ष, कहानी के वैराग्य पर नथ्थुलाल का समालोचनात्मक अनुशीलन. इन सभी का केश लोचन समारोह कल से दिन में तीन बार पुस्तक मेले के हाल नंबर 12 में स्टाल नंबर XYZ पर आख़िरी दिन तक होगा. सबको 40 से 60 प्रतिशत डिस्काउंट दिया जाएगा साथ में ज्योतिष शास्त्र और होमियोपैथी की किताबें फ्री में.

पहलवान सिंह कृत कविता की भूमिका और समाज, मेरी चुनी हुई कविताएँ, तीसरे दशक की कविताएँ और आलोचना, नवां सप्तक के कवि और उनका मटेरियलिस्टिक अनुशीलन, मुक्तिबोध और कालीदास की कविता में हिंसा के तत्व - एक अनुशीलन, बिहारी- सेनापति और पहलवान सिंह की कविता में श्रृंगार के तत्व और भारतीय कविता का विकास, बुद्ध - महावीर की कविता और तरुण सागर की काव्य दृष्टि में समानता - एक विहंगम वज्रापात. 
इस सभी किताबों को एक साथ लेने पर पहलवान सिंह के हस्ताक्षर और भारतीय व्यंजनों की दस किताबें फ्री, महंगाई को देखते हुए डिस्काउंट सिर्फ अस्सी प्रतिशत मिलेगा. 

यदि आप पुस्तक मेले की तरफ आयें तो जरुर आयें, चाय फ्री, और यदि दस दोस्तों को लेकर आये तो दोनों किताबों का सेट घर पर निशुल्क भेज दिया जाएगा. 
- प्रकाशक
अगल बगल, 
अंसारी रोड, नई दिल्ली. 



Posts of 9 Jan 16 - उस्ताद रज्जब अली खां समारोह, देवास 8 एवं 9 जनवरी 16


उस्ताद रज्जब अली खां समारोह, देवास 8 एवं 9 जनवरी 16

अंशुल प्रताप सिंह 








रामेन्द्र सोलंकी 

रज्जब अली खां समारोह में आज भोपाल के अंशुल प्रताप सिंह का अप्रतिम तबला वादन हुआ। सिर्फ यही कह सकता हूँ कि इस बच्चे को मेरी उम्र लग जाए। Anshul Pratap Singh
दुखद यह था कि देवास के पूर्व सांसद स्थानीय कांग्रेसी नेताओं के साथ आये और चलते कार्यक्रम में स्व रज्जब अली खां साहब के चित्र को हार पहनाकर चले गए। बेहद अशिष्टता पूर्ण तरीके से जनता के बीच अपनी छबि चमकाने का यह बेहद भौंडा प्रयास था। जनता के प्रतिनिधि से इतनी तो उम्मीद की जाती है। कम से कम दस मिनिट बैठ जाते, मंच पर कलाकारों का अभिवादन कर देते। दिक्कत यह है कि हम ही अगर कला संस्कृति को सहेजेंगे नही तो आने वाली पीढी को कैसे हम समृद्ध विरासत सौपेंगे।

संस्कारवान भाजपा और संवेदनशील प्रशासन तो अनुपस्थित था ही।
सज्जन भिया आपसे इतनी सज्जनता की उम्मीद तो थी ही !!
Anshul Pratap Singh तुमने आज जो तबला बजाया है वह दस साल बाद मैंने सुना बस इतना कहूँगा कि खूब यश कमाओ , कीर्ति की पताकाएँ फहराओ।
मेरी उम्र तुम्हे लग जाए।
Just amazing performance

रज्जब अली खां समारोह की अंतिम प्रस्तुति तीन मेधावी युवाओं के नाम रही। कोलकाता के अरशद अली खां का अप्रतिम गायन और मेरे बेहद करीबी परिचित और बच्चों के समान उपकार गोडबोले ने हारमोनियम पर जहां सुर सँवारे वही रामेन्द्र ने तबले की थाप से समूचे सदन को गूंजायमान कर दिया।
आज के दिन अंशुल, अरशद, उपकार और रामेन्द्र की अप्रतिम प्रस्तुतियों ने इस साल की बेहतरीन शुरुवात की, शायद इससे अच्छा कुछ हो नही सकता था। सबके लिए अशेष शुभकामनाए और दुआएं ।
और नमन, तुम्हे आज फिर इस गरिमामय कार्यक्रम में बहुत मिस किया।

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सरकारी स्कूलों की व्यवस्था को तहस नहस करके अधकचरे ज्ञान से अपने साम्राज्य को बढ़ाकर बाजार में शिक्षा का धंधा चलाना इन भारतीयों से सीखना चाहिए और अजीम प्रेम ने क्या किया - सिर्फ ऊपरी जेब का रुपया टैक्स बचाने के लिए धंधा खोला और सारा रुपया नीचे की जेब में खोंसा, और देश भर के रिटायर्ड थके हारे चुके हुए और बटठर हो चुके चावलों को इकठ्ठा करके एक और मठ ही बनाया है ना !
और भारतीय मीडिया उसे देश का सबसे बड़ा दानी बता रहा है, ये शिक्षा नही कर रहे बल्कि देश के बाजार के लिए नए स्किल्ड मजदूर तैयार कर रहे है, छग, मप्र, राजस्थान जैसे तमाम पिछड़े राज्य इनकी चपेट में है और ये चालीस पचास बच्चों पर सत्तर अस्सी स्रोत व्यक्तियों के नवाचार बनाम शैक्षिक व्याभिचार थोप रहे है। किताबों के नाम पर पुरानी जुझारू काम कर चुकी संस्थाओं से चोरी माल कॉपी पेस्ट कर उंडेल रहे है।

पोर्टल से लेकर तमाम तरह के कामों की गूँज है पर असली काम शून्य है। लोग भी इसलिए कर रहे है क्योकि जब अनुदान ना मिलने से बड़ी संस्थाएं बन्द हो गई तो कहाँ जाए, दूसरा अपनी पैतृक संस्थाओं को ज़िंदा रखने के लिए बेचारे बन्धुआ बने हुए है और डुगडूगी पीट रहे है।
दानी ..... उफ़.... माय फुट
यह पूर्णतः मेरे व्यक्तिगत विचार है ज्ञानी, शिक्षाविद् यहां अपना कूड़ा कचरा और कार्पोरेटी कल्चर ना उंडेले ।

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पुस्तक मेले के लोकार्पण शुरू नही हुए क्या या मुर्गे यानी लेखक बेचारे पहुंचे नही है अभी तक , फोटु की बाढ़ नही आई है अभी अगल बगल या अनर्गल अखल .... से 
😊😊😊😊😊

मने यूँही पूछ रहे है, अभी तो सज रही होंगी दुकानें ग्राहकों के लिए 




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रविन्द्र कालिया का निधन. हिन्दी का गंभीर अध्येता चला गया, साल की शुरुवात में हिन्दी का बड़ा नुकसान . 

नमन