Thursday, July 30, 2015

Posts of 30 July 15





वसुंधरा ताई को नमन, सुबह सवेरे- भोपाल और नई दुनिया- इंदौर में आज श्र्द्धासुमन स्वरुप ताई को याद करते हुए



Wednesday, July 29, 2015

अनुनाद में शिरीष भाई और मल्हार मीडिया में ममता यादव जी का आभार 29 July 15

अनुनाद में शिरीष भाई का आभार

ख़ाली जगह दरअसल हमारे जैसे दूर के लोगों के लिए उतनी ख़ाली नहीं है, वहां वह आवाज़ उतनी ही गरिमा के साथ हमेशा निवास करेगी।

 http://www.anunad.com/2015/07/blog-post_29.html


शुक्रिया मल्हार मीडिया और ममता यादव जी....

http://www.malhaarmedia.com/gallery/the-age-will-complete-end-of-hukum-huzuri/

Pots of 29 July 15 by Prof Linda Hess

A Post by Prof Linda Hess , Head, South Asian Languages and Culture, Stanford University , Stanford, USA. aftr the sad demise of Vasundhara tai Komkali

Today with the rest of the world, I receive sad news of the passing of revered classical singer Padmashri Vasundhara Komkali, fondly known as Tai, head of a stupendous musical family in Dewas, wife of legendary Kumar Gandharva, mother and teacher of singer Kalapini Komkali, grandmother and great grandmother to singer Bhuvanesh, his wife Uttara and their son Alakh. Many others are posting pictures of her. I post this word-picture, from the book that the family helped me to produce, about Kumar Gandharva and Kabir. I asked her to speak about the nirgun voice, the voice of "no-quality" or shunyata, emptiness, that Kumarji had said was the way to sing Kabir. She replied (as translated from Hindi), "How can I say anything? I can only show you by singing. It has to do with how you throw the voice [phenkna]. That is nirgun. It's not classical. Sagun [with qualities] is also very different. In sagun there's a picture, a person. However you think about God, it appears that way in sagun. In nirgun here's no picture, no form. It's without outline, without substance. . . It's all in the way of throwing that sound." I asked how one should practice to produce that sound; she laughed, along with Kalapini and Bhuvanesh. "That is very difficult," she went on. "It is difficult not only for ordinary people but for singers like us. I try to experience that nirgun. I try. I haven't reached the high level that Kumarji reached. That phenk [way of 'throwing']. I try." Arvind SardanaSandip NaikAmbuj SoniUtkarsha Soni, Ajay, Purushottam Agrawal,Suman KeshariTara Kini, Rajiv Nema, Karla Nema

“जब होवेगी उम्र पुरी, तब टूटेगी हुकुम हुजूरी, यम के दूत बड़े मरदूद, यम से पडा झमेला” (पंडित स्व कुमार गन्धर्व की पत्नी पदमश्री वसुंधरा ताई का निधन )







“भानुकुल”  आज उदास है ऐसा उदास वह 12 जनवरी 1992 को हुआ था जब भारतीय शास्त्रीय संगीत के मूर्धन्य गायक पंडित कुमार गन्धर्व ने अंतिम सांस ली थी, दुर्भाग्य से आज फिर माताजी के रास्ते वाले सारे पेड़ ग़मगीन है और भानुकुल में एक सन्नाटा पसरा है. भानुकुल देवास की टेकडी के नीचे बसा एक बँगला है जहां भारतीय संगीत के दो महान लोग आकर बसे और इस शहर के माध्यम से देश विदेश में भारतीय संगीत और खासकरके निर्गुणी भजनों की अनूठी परम्परा को फैलाया. इसी बंगले में पंडित कुमार गन्धर्व ने संगीत रचा, नए राग रागिनियों की रचना की, उनके सुयोग्य पुत्र मुकुल शिवपुत्र ने संगीत की शिक्षा ली, पंडित की पहली पत्नी भनुमति ताई के निधन के बाद उनकी सहयात्री बनी ग्वालियर घराने की प्रसिद्द गायिका विदुषी वसुंधरा ताई जिनके साथ पंडित जी का दूसरा विवाह अप्रैल सन 1962 में हुआ. कुमार जी को यक्ष्मा की शिकायत थी और मालवे के हवा पानी ने उन्हें एक नई जिन्दगी दी, एक फेफड़ा खोने के बाद भी उनका संगीत में योगदान किसी से छुपा नहीं है.  कुमार जी के होने में और यश के शिखर पर पहुँचाने में वसुंधरा ताई के योगदान को भूलाया नहीं जा सकता, जिन्होंने कुमार जी के साथ जीवन में ही नहीं वरन हर मंच पर उनका हर आरोह अवरोह में साथ दिया और हर तान के साथ अपना जीवन लगा दिया. वसुंधरा ताई जैसी विदुषी महिला आज के समय में दुर्लभ है.


पंडित  देवधर की सुयोग्य शिष्या और बेटी वसुंधरा ताई ग्वालियर से देवास आने के बाद मालवे में ऐसी रच बस गयी कि यहाँ के लोग उनके घर के लोग हो गए, वे देवास, इंदौर और उज्जैन के हर घर में पहचानी जाने लगी, देवास के हर भाषा और मजहब के लोगों से उनका वास्ता पड़ा और उन्होंने बहुत सहज होकर सबको अपना लिया. ना मात्र अपने गायन से बल्कि उनकी सहजता, अपनत्व और वात्सल्य भरी मेजबानी के व्यवहार से हर शख्स उनका कायल था. स्व कुमार जी जब तक थे या आज भी देश-विदेश के बड़े से बड़े गायक - वादक, साहित्यकार, अधिकारी, कलाकार, पत्रकार जब भी इंदौर, देवास या उज्जैंन से गुजरे तो एक बार वे जरुर कुमार जी के भानुकुल में आये और जी भरकर कुमार जी से बाते की और ताई का आतिथ्य पाया जो उनकी यात्रा को महत्वपूर्ण बना गया.



कलागुरु  विष्णु चिंचालकर, नाट्यकर्मी बाबा डिके, प्रसिद्ध पत्रकार और सम्पादक राहुल बारपुते और स्व कुमार गन्धर्व कला क्षेत्र की ये चौकड़ी मालवा ही नहीं वरन देश विदेश में प्रसिद्द थी और जब ये मिल जाते थे तो बहुत लम्बी चर्चाएँ, और बहस होती थी. अशोक वाजपेयी तब मप्र शासन में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी थे और भारत भवन बनाने की तैयारी में थे. अक्सर देवास उनका आना होता था और ताई के स्नेह और आतिथ्य के लिए वे लालायित रहते थे क्योकि उन्हें ताई से कई रचनात्मक सुझाव मिलते थे. चारों मित्रों की यह अमर जोड़ी बनाने में वसुंधरा ताई का बहुत बड़ा हाथ था. ताई की समझ सिर्फ संगीत ही नहीं बल्कि व्यापक मुद्दों और रंजकता, कला के विविध पक्ष और साहित्य पर भी बराबर थी. कुमार जी के घर लगभग सारे अखबार और पत्रिकाएं आती थी जिनका अध्ययन और मनन वे लगातार करती रहती थी. मुझे याद है एक बार जब जब्बार पटेल ने अपने नवनिर्मित फिल्म “उड़ जाएगा हंस अकेला” का प्रीमियर देवास में रखा था और मै जब्बार पटेल का इंटरव्यू कर रहा था तो ताई ने कई मुद्दों और फिल्म के तकनीकी पहलुओं पर विस्तृत बात रखकर जब्बार पटेल को भी आश्चर्य में डाल दिया था. फिल्म के शो के बाद लोगों के प्रश्नों का भी ताई ने बखूबी जवाब दिया था जो उनके गहन वाचन और याद रखने का अनूठा उदाहरण था.


संगीत  के कार्यक्रमों में देवास में लगभग हर कलाकार यहाँ आता है और भानुकुल जाकर स्व कुमार जी श्रद्धा सुमन अर्पित करता है और ताई से आशीर्वाद लेता था. हम बड़े कौतुक से हर शख्स को ताई से बात करते हुए देखते थे और पाते थे कि वे हर कलाकार की उनके गुणों के कारण तारीफ़ करती और रचनात्मक सुझाव भी देती थी और हर कलाकार इसे सहजता से स्वीकार करता था. शायद हम कभी महसूस ही नहीं कर पाए कि कुमार जी और ताई जैसे बड़े महान लोगों के सानिध्य में हमारा बचपन कब गुजर गया और हम संगीत में संस्कारित हुए. कुमार जी और ताई ने देवास की अनेक पीढ़ियों को शास्त्रीय संगीत का ककहरा सिखाने का महत्वपूर्ण किया.


ताई  सिर्फ कुमारजी की सहचरणी नहीं थी बल्कि शास्त्रीय संगीत के जो संस्कार ग्वालियर घराने और अपने पिता से मिले थे उन्होंने संगीत में बहुत प्रयोग किये, निर्गुणी भजनों की परम्परा को जीवित रखा. देश विदेश में उनके शिष्य आज इस परम्परा को निभा रहे है. कुमार जी के निधन के बाद वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सेदारी कम करने लगी थी परन्तु अपनी पुत्री सुश्री कलापिनी और पोते भुवनेश को उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा देकर इतना पारंगत कर दिया कि ये दोनों आज देश के स्थापित कलाकार है.



इधर  ताई बीमार रहने लगी थी, जब भी मिलते तो कहती थी कि मिलने आ जाया करो, अब तबियत ठीक नहीं रहती. और आखिर कल वही हुआ जिसका डर था, कल वे अपने ही घर पर गिर गयी और कूल्हे में चोट लगी थी, कलापिनी और भुवनेश ने खूब प्रयास किये परन्तु कल दोपहर उन्होंने अंतिम सांस ली. ताई को भारत सरकार ने कई पदम् पुरस्कारों और उपाधियों से नवाजा था. भारतीय संगीत की मूर्धन्य गायिका तो वे थी ही, साथ ही एक अच्छी गुरु और बहुत स्नेहिल माँ थी. देवास के साथ साथ पुरे मालवे ने आज एक वात्सल्यमयी माँ को खो दिया.


Tuesday, July 28, 2015

Posts of 28 July 15







और आखिर आ गयी आज। डा कलाम को सच्ची श्रद्धांजलि और प्रेरणा अनुज Priyam Tiwari की। बस अपुन, सायकिल और व्यायाम ।
कुछ कर नही पा रहा था और शरीर बेढब हो चला था - बीमारियों का घर, मधुमेह और ना जाने क्या क्या. काम की व्यस्तता देर रात तक जिलाए रखती है और सुबह उठकर घूमना हो नहीं पाता अब कम से कम दस किलोमीटर सायकिल रोज चलेगी तो शायद कुछ फर्क पड़े कम से कम हड्डियां तो मजबूत हो बाकी तो खुदा जाने............

शुक्रिया प्रियम एक अच्छी सीख देने के लिए तुमसे वादा किया था ना कि जैसे ही घर पहुंचूंगा ले लूंगा सो आज ग्वालियर से आते ही खरीद लाया और चार किमी चलाकर लाया थोड़ा अजीब लगा पर फिर एकदम बेफिक्र होकर मस्त हवाओं से टकराता और भीगता घर लौट आया और एक नजर का टीका लगाया. मजा आ गया.





IBN Khabar 7 पर कलाम की यादों से सराबोर हुआ सोशल मीडिया… में अपनी भी एक छोटी सी टिप्पणी
जरुर पढ़े, बहुत मार्मिक टिप्पणियाँ है डा कलाम को लेकर.

http://khabar.ibnlive.com/blogs/publicview/dr-apj-abdul-kalam-former-president-2-394682.html


आज डा कलाम की मौत के बाद एक अजीब बहस वामपंथी और कुछ मित्रों के बीच हुई, किसी के मौत के बाद किसी को गरियाना ठीक नहीं है, मतभेद अपनी जगह परन्तु कम से कम मरने के बाद तो छोड़ देना चाहिए, कुछ मित्रों ने बताया कि वाट्स एप के समूहों में भी कुछ बुद्धिजीवी अपना ज्ञान पेलते नजर आये जिनकी ना समझ है ना कोई विचारधारा ना प्रतिबद्धता. यदि दम है तो खुलकर मप्र में व्याप्त व्यापम के मामले में सामने आये. एक दारु की बोतल और सेकण्ड क्लास के किराए पर बिक जाने वाले हिन्दी के घटिया कवि और तथाकथित बुद्धिजीवी अपने को किसी मरे आदमी को गरियाकर क्या साबित करना चाह रहे है सिवाय मूर्खता के और कुछ नहीं हो सकते ऐसे भौंडे प्रयास. 

दूसरा दुखद यह लगा कि कुछ लोगों ने कलाम साहब के बहाने से कुछ मित्रों के व्यक्तिगत जीवन में ताक झाँक  की कोशिश की और रंग भेदी नस्लीय टिप्पणी की जोकि बहुत ही खेदजनक है , यहाँ तक की लिख दिया कि काले रंग के चेचक के दाग वाले, अपनी बीबी को धता बताकर कमसिन लड़कियों के पीछे पड़े है ये कौनसी मानसिकता है?  यह सही है कि हिन्दी में कवि स्कैंडल बनाने में माहिर है और कुंठित भी और लडकियां उनकी कमजोरी भी है, जहां भी जाते है पाने अपराध बोध छुपाने के लिए वे वो सब करते है जो अश्लीलता की श्रेणी में आता है और बदचलनी का इल्जाम सही भी हो सकता है पर आज के इस दुखद मौके पर यह टिप्पणी ठीक नहीं थी. 

कुछ मित्रों की कविता को किसी ने कही लगा दिया तो वे सारा दिन परेशान होते रहे और यहाँ वहाँ मेसेज कर कोसते रहे...........


एक पूर्व राष्ट्रपति की मौत हुई, एक लोकप्रिय इंसान की मौत हुई, एक जन नेता की मौत हुई और सबसे बढ़कर एक वैज्ञानिक की मौत हुई .....क्या इतना पर्याप्त नहीं है , अब जबकि शख्स ज़िंदा नहीं है तो मूल्यांकन करने का अधिकार आपको दिया किसने?  शर्म उनको तो आती नहीं आप भी बेचकर खा गए क्या हिन्दी के कुंठित साहित्यकारों.......................???

सदी के महानतम नायक - डा ए पी जे अबुल कलाम को श्रद्धांजलि


8 अगस्त सन 2008 के दरबार हाल, राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली, मे जब वे आये और मैं उठा तो उन्होंने कंधा दबाकर बिठा दिया और बोले "sit down my dear friend, tell how women sarpanches are performing in your state ?" और मैं उनसे लगभग तीन मिनिट बतियाता रहा। आज उनकी मौत की खबर अभी रेल में पढी तो झुरझुरी आ गयी, डा कलाम आप शायद सच में विकसित भारत के लिए नींव के पत्थर थे और आज सारा राष्ट्र और पूरी वैज्ञानिक सोच वाली बिरादरी अपने को अनाथ महसूस कर रही है. आज जबकि आपके जैसे लोगों की देश को जरूरत थी तो आप चले गए, सोचिये मरते दम तक बच्चों , युवाओं में आप अपने भाषणों और प्रेरक उदबोधनों से देश के लिए अपने सपनों को पूरा करने के लिए लगे रहे. मुझे गर्व है कि मैंने आपको देखा है और सदी के महानतम नायक से बात की है. आप हमेशा मेरे दिल में रहेंगे.
सलाम कलाम साहब !!
मेरे जीवन का अनमोल चित्र जो अब धरोहर है.......

Monday, July 27, 2015

गुरदासपुर हमला एक गंभीर चेतावनी है




गुरदासपुर पर हुआ हमला दुखद है, इसके तुरंत बाद मोदी जी द्वारा की जा रही त्वरित कार्यवाही यथा केन्द्रीय सुरक्षा बालों को, एनएसजी को तुरंत गुरदासपुर रवाना करना और उच्च अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थिति का जायजा लेना आदि प्रशंसनीय है. दरअसल मुझे लगता है कि यह आतंकवादियों की ओर से एक चेतावनी थी जबकि सुप्रीम कोर्ट याकूब मेनन की अर्जी पर कोई निर्णय लेने वाला था. यह भारत जैसे बड़े देश को एक बार फिर धमकाने और कमजोर करने की बड़ी साजिश है. कंधार काण्ड याद कीजिये और वह ब्लैकमेल. मुझे लगता है कि यह सिर्फ आतंकवादी हमले की बात नहीं, बल्कि हमारे पुरे खुफिया तंत्र और मुस्तैदी का भी सवाल है कि आखिर हमारी गुप्तचर एजेंसियां क्या कर रही है, केंद्र सरकार ने हाई अलर्ट छह लोगों की मौत के बाद जारी किया जबकि 30 तारीख जैसे जैसे पास आ रही थी तो क्या सरकार को स्वतः संज्ञान लेकर देश, सुरक्षा बलों को सचेत रहने को नही कहना चाहिए था ? दूसरा, इस समय दुनिया की नजर याकूब की फांसी पर लगी है तो चाक चौबंद रहना क्या हमारी जिम्मेदारी नही थी ? वे तीन-चार आतंकवादी तो मानव बम बनकर थाने में बैठे ही है जो 112 इंच का सीना लेकर वे तो मरे ही सेना के हाथों पर हमारी सुरक्षा व्यवस्था का क्या ? 

थोड़ा समझे कि आखिर क्या कारण है कि ऐसी स्थितियां निर्मित होती है, राजनाथ सिंह का बयान आता है लगभग ग्यारह बजे कि कोई मामला गंभीर नहीं है और स्थिति पूर्ण रूप से नियंत्रण में है, और एक घंटे बाद खबर आती है कि एसपी बलदेव शहीद हो जाते है. यानि हम मामले की गंभीरता को समझ नहीं रहे है, हमें अंदाज ही नहीं है कि वे तीन-चार आतंकवादी कितना बारूद असला लेकर अन्दर बैठे है? हम पुराने बाबा आदम के जमाने के हथियारों से उनका मुकाबला कर रहे है फलस्वरूप हमें अपने निर्दोष नागरिक, पुलिस के जवान और वरिष्ठ अधिकारी खोना पड़ रहे है.

दूसरा महत्वपूर्ण सारा देश केंद्र और राज्य की आपसी खींचतान के नाटक को सरेआम देख रहा है, कल मुख्यमंत्री बादल ने भी इस सारी गलती और सुरक्षा में लापरवाही का ठीकरा केंद्र पर फोड़ा, जोकि बहुत ही गंभीर मसला है. अरविन्द, नजीब जंग और मोदी की लड़ाई मीडिया के विज्ञापनों से होते हुए अब सडकों पर दिखाई देने लगी है और इस वजह से कही कोई निर्णय लेने वाला नहीं है. देश की पुरी व्यवस्था एक व्यक्ति के हाथों में आ गयी है. सोशल मीडिया पर चले वाक्युद्ध में भी 56 इंच के सीने के बहाने लोगों ने सरकार को जी भरकर कोसा. आखिर हम किस समाज और व्यवस्था में जा रहे है. सरकार के सारे दांव उलटे पड़ रहे है. केंद्र-राज्य के रिश्ते सुधरने के बजाय बिगड़ते जा रहे है और केंद्र एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर तरह के फैसले अपने हाथ में केन्द्रित रखना चाहता है

इस समय यह घटित होना दर्शाता है कि देश को कमजोर करने वाली ताकतों को इस बात का पुख्ता भरोसा है कि वे चाहे जो करें पूरा देश सो रहा है, बॉर्डर पर आये दिन घुसपैठ, हमारे जवानों और अधिकारियों की ह्त्या होना स्वाभाविक हो गया है, महिलाओं के साथ अत्याचार बढे ही है, आम आदमी की सुरक्षा के लिए कही कोई संगठित प्रयास नहीं दिखते, प्रशासन पुरी तरह से बेखौफ होकर हर जगह काम कर रहा है, वरिष्ठ अधिकारी ना केंद्र में काम करना  चाहते है, ना दिल्ली में - तो आखिर ये सब क्यों हो रहा है और कब तक होता रहेगा?

गुरदासपुर की एक घटना ने हमारी पोल खोल कर रख दी है जोकि हमारी पतनशील होती राजनीती का एक बड़ा उदाहरण है. राजनीति करना, मतभेद होना, विचारों में असहमति होना, कार्य शैली में भिन्नता होना और स्वस्थ बहस होना एक परिपक्व लोकतंत्र का परिचायक है परन्तु इस सबके बदले हम देश के निरपराध नागरिकों और सुरक्षा जवानों से लेकर अधिकारियों की जान जाना क्या हमारे प्रगतिशील होने का परिचायक है?


देश दिल्ली और मन की बात से बहुत दूर होता है प्रधानमंत्री जी, हम यह कब समझेंगे ???

Wednesday, July 22, 2015

Posts of 20 -22 July 15

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सन 1965 में अमेरिका ने भारत को सड़े हुए लाल गेहूं देना शुरू किये तो लाल बहादुर शास्त्री ने ललकार कहा था कि नहीं चाहिए हमें सड़े हुए लाल गेहूं , मेरे देश के लोग एक समय खाना नहीं खायेंगे तो मै इतना अन्न बचा लूंगा कि देश के सभी लोगों को पर्याप्त भोजन दे सकूं. और उन्होंने अपील की तो लोगों से शास्त्री सोमवार चालू किया मेरे घर में मेरे पिता, दादा, दादी, चाचा और तमाम लोग ये शास्त्री सोमवार किया करते थे, बहुत लोगों को याद होगा कि कई गरीब लोगों ने भी ये शास्त्री सोमवार करना आरम्भ किये थे और इस तरह से हमने देश को अकाल और भूख से बचाया और सबको समान और भ्रातृत्व भाव से खाना उपलब्ध करवाया- क्योकि अपील करने वाले लाल बहादुर शास्त्री जैसे आदर्श राजनेता थे और टाटा बिड़ला और तमाम बड़े लोग उनके मातहत थे, उन्हें सम्मान देते थे, प्रधानमंत्री की पीठ पर हाथ रखने की हिम्मत इन उद्योगपतियों की कभी नहीं हुई.

सबसीडी का मामला बहुत विवादास्पद रहा है, सरकारों के लिए यह एक मुश्किल रही है क्योकि देश का एक बड़ा हिस्सा गरीबी में जीता भी है और संघर्ष भी करता है परन्तु ठीक इसके विपरीत एक बड़ा हिस्सा गरीबी से परे जाकर एयाशियों में रहता है और फिर भी सबसीडी  का फ़ायदा लेना चाहता है. बीपीएल के कार्ड एक सशक्त उदाहरण है जहां असली गरीब इन कार्डों से दूर है और जिनके घरों में ट्रेक्टर है वे बीपीएल कार्ड का जुगाड़ करके फ़ायदा उठा रहे है. निसंदेह अमीर या माध्यम वर्गीय लोगों को सबसीडी का फ़ायदा नहीं लेना चाहिए या कम से कम वे लोग जिनके घरों में कोई सदस्य सरकारी सेवा में हो या दो से ज्यादा सदस्य सेवा में हो उन्हें स्वतः आगे आकर सबसीडी त्याग देना चाहिए परन्तु इस समय हमारे देश में दुर्भाग्य से ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है कि हमें इसके बारे में ठीक ठीक जानकारी हो, आधार कार्ड नामक व्यवस्था से कुछ जानकारी के नियमतिकरण की प्रक्रिया शुरू की थी, अस्सी करोड़ लोगों के बारे एकत्रित की गयी जानकारी का सरकार क्या कर रही है इसके बारे में अभी कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है, बल्कि इन्ही आधार कार्डों को हथियार बनाकर सबसीडी का खेल जारी है.


सबसीडी के माध्यम से देश इस समय उन तमाम आर्थिक प्रयासों पर सवाल कर रहा है जो आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण के नाम पर पूर्व प्रधानमंत्री या कांग्रेस सरकार ने आरम्भ किये थे. सबसीडी इस समय विश्व का भी एक बड़ा मामला है हाल ही में हमने दुनिया के कई देशों में आई एम एफ या विश्व व्यापार संगठन के दबावों को झेलते और संघर्ष करते देखा है, व्यापक स्तर पर जन समुदायों से राय माँगी गयी और सरकारें फेल हुई है. आखिर एक समय के बाद तो हमें यह तय करना ही पडेगा कि इस सबसीडी नामक भूत से कैसे निपटे, बहरहाल भारत जैसे बड़े देश में आज एक प्रधानमंत्री गैस की सबसीडी छोड़ने की बात करता है तो देश भर से विरोध की आवाजें आती है, शर्मनाक है कि जिस प्रधानमंत्री को जनता ने लाड़ प्यार से चुना और बहुमत दिया आज उसकी हर बात का मजाक उड़ाया जाता है और सबसीडी की बात का मखौल उड़ाया जा रहा है हर ओर से पुरजोर विरोध हो रहा है. भावुक विज्ञापनों के जाल में सरकार जनता का विश्वास अर्जित करने की कोशिश कर रही है परन्तु परिपक्व होते जन तंत्र में अब इतना आसान भी नहीं है सब कुछ !!! बताईये कमी किसमे है हममे या प्रधानमंत्री में या सरकार में या दो सौ करोड़ के विज्ञापनों में ?


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जो मोदी जी अपने फेंकू भाषण पेलने के लिए नौ करोड़ का टेंट लगा सकते है और उसमे भी मजदूर की जान जाती है। जो अरबों रूपये लगाकर विदेश घूम रहे है , जिनकी पार्टी के शिवराज ,रमन सिंह और वसुंधरा और सुषमा तमाम तरह के लेन देन में फंसे हो उन्हें देश के उन लोगों से सब्सिड़ी की भीख मांगते शर्म नही आती जो हफ्ते में बमुश्किल दो बार सब्जी, दो बार दाल और अपने बच्चों को एक बार भी दूध देने में एड़ी चोटी का जोर लगा रहे है। कितनी बेशर्म सरकार है अम्बानी अडानी को राहत और हमारे दो सौ रुपयों पर नियत खराब !!!

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स्मार्ट सीटी के नाम पर कितना झमेला हो रहा है, जो नरक निगम अपनी मुख्य जिम्मेदारियां नहीं निभा पा रहे है उनसे हम ना जाने क्या क्या उम्मीदें पाल रहे है, एक प्रयोग महिला सुरक्षा को लेकर चल ही रहा है पर मेरा निजी अनुभव बताता है कि जब तक प्रशासनिक लापरवाही, अयोग्य लोग, रुपयों का लेन देन, कार्यकुशलता और चुस्त प्रक्रियाएं नहीं होंगी तब तक ये स्मार्ट सीटी सिर्फ झुनझुना साबित होंगी. मप्र के हालात तो मै कह सकता हूँ यहाँ आधी लड़ाई तो विभाग के सचिव और आयुक्त में होती रहती है और बची खुची कसर नगर निगम के प्रमोटी या आय ए एस अफसर बनाम कमिश्नरों में ख़त्म हो जाती है. दूसरा स्मार्ट सीटी की मूर्खताओं के नाम पर कब तक आप प्रदेश के दीगर शहरों का दोहन करके उन्हें उपेक्षित करते रहेंगे........?
प्रदेश के सारे शाह्रों में भाजपा शासित निकाय है फिर यह बन्दर बाँट क्यों?
स्मार्ट सीटी कुछ नहीं बस नए रैपर में नया रिन और लक्स है विज्ञापन में हेमा मालिनी की जगह सिर्फ सन्नी लियोन आ गयी है ........बाकी जस का तस है......

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एक तीस्ता सीतलवाड़ और प्रिया पिल्लई ने नाक में दम कर दिया, सोच लो ठाकुर अगर देश भर के एनजीओ वाले अपनी वाली पर आ गए और काले कारनामे खोलने लगे आपकी राजनीती के तो तोते उड़ जायेंगे........

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डा मन मोहन इतने तो चुप ना थे, क्या करें उनकी तो एक माताराम थी और यहाँ कई माताराम, पिताराम, आयाराम और गयाराम और साधू सन्यासी और उद्योगपति है, बेचारे खुद पति का धर्म नहीं निभा पा रहे परन्तु ज़माने भर के पतित से सम्बन्ध बनाने को सब झेलना पड़ रहा है...

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कांग्रेस लोकसभा में सदन चलने नहीं दे रही है और भाजपा की फजीहत हो रही है सरे आम थू थू हो रही है रही सही कसर शांता कुमार ने शान्ति का बम फोड़कर पुरी कर दी है. अब बेचारे मोदी जी को भूमि अधिग्रहण बिल पास करवा कर अपने माई बाप को खुश करना है, जी एस टी भी उनकी प्राथमिकता है. मेरी नजर में तो अब एक ही तरीका है कांग्रेस को खुश करने का............शिवराज का इस्तीफा ले लें, दिग्विजय से लेकर सब खुश हो जायेंगे, सदन भी चलने लगेगा, और मप्र की जनता की नाराजी भी दूर हो जायेगी और देश भर में एक खुशी भी फ़ैल जायेगी कि बेचारे भाजपा वाले नैतिकता का आज के समय में भी ध्यान रखते है. मोदी जी अपने वजीरे आलम अमित शाह को बोलो कि मामाजी का बोरिया बिस्तरा बंधवाये, मामा-मामी की श्यामला हिल्स से अब विदाई करवाओ बहुत हो गया कुशासन और भ्रष्टाचार और नए पुजारी की नियुक्ति का बंदोबस्त करें......देखा एक तीर से कितनी चिड़ियाएँ मरेंगी..............शिवराज निपटे, वसुंधरा और रमण सिंह सतर्क, आतंरिक गुटबाजी और कलह पर नियंत्रण, अडानी अम्बानी खुश, देश भर में मोदी जी की गुड गवर्नेंस वाली छबि बरकरार, सुषमा और बाकी सब सुरक्षित, ललित गेट का खात्मा और फिर से विदेशों में घूमने को देश का प्रधानमंत्री छः माह तक के लिए छुट्टा हो जाएगा....

धार के गरीब आदिवासी आपकी राह तक रहे है डा आनंद राय



खबर है कि डा आनंद राय जो डाक्टर कम विह्सिल ब्लोअर के नाम पर ज्यादा जाने जाते है, का राज्य शासन ने पिछले हफ्ते अटैचमेंट ख़त्म कर इंदौर के क्षेत्रीय स्वास्थ्य प्रशिक्षण संस्थान से उनके मूल विभाग जिला अस्पताल, धार कर दिया है, और उन्हें प्राचार्य, क्षेत्रीय स्वास्थ्य प्रशिक्षण संस्थान ने कार्य मुक्त भी कर दिया है. अब डा आननद राय अखबारों की दो सौ से ज्यादा कटिंग काटकर हाई कोर्ट में जाने की तैयारी कर रहे है कि उन्हें इंदौर में रहने दिया जाए क्योकि इंदौर के ही किसी और अस्पताल में दस-बारह स्वास्थ्यकर्मी अटैचमेंट पर काम कर रहे है. ये डा राय अच्छे से जानते है कि अटैचमेंट ही था, उनका पोस्टिंग स्थाई नहीं हुआ था, और वैसे भी एक अच्छे डाक्टर को इंदौर के मरियल और बाबू राज से ग्रस्त क्षेत्रीय प्रशिक्षण संस्थान, जहां काम के नाम पर कुछ नहीं होता है, और घटिया राजनीति, बाबूओं में आपस में मारा पीटी और गाली गलौज अक्सर होता रहता है, के बजाय अस्पताल में होना चाहिए. नैतिकता और समय का तकाजा तो यह है कि वे जिला अस्पताल, धार में जाए और अपना काम पुनः आरम्भ करें ना कि अब व्ह्सिल बजाये क्योकि अब तो नगाड़े बज चुके है, सरकार खतरे में है, देश की चुनी हुई सरकार लोकसभा में सदन नहीं चला पा रही जबकि उसके पास बहुमत है. गगन को चूमती और दुनिया को बताती रणभेदी तोपें चल रही है और सारे कंस, शकुनी, अभिमन्यु, कौरव, पांडव द्रोणाचार्य और श्रीकृष्ण भी मैदान में है, सूर्यास्त होने को है, और शीघ्र ही परिणाम सामने आयेंगे, सीबीआई ने कई एफआईआर करके कम से कम व्यवस्था में भरोसा तो दिलवाया है. मुझे लगता है कि डा आननद राय को अब राजनीति छोड़कर अपनी कर्म स्थली पर जाना चाहिए और एक चिकित्सक का काम करना चाहिए, डा आनंद राय, आपकी प्रतिष्ठा और उपलब्धि अब इसी में है कि आप इंदौर और मीडिया का मोह छोड़कर काम करें.
मै यहाँ बताना उल्लेखनीय समझता हूँ कि श्रीश पांडे, जो सतना में रहते है, अपेक्षाकृत छोटे अखबार में काम करते है, और जिन्होंने इस पुरे घोटाले का पर्दाफ़ाश किया था पहली बार, आज इस मामले से बिलकुल दूर है. श्रीश जी कहते है कि सन 2013 में पहली बार उनके पास यह मामला आया था और उन्होंने इसे उठाया था मीडिया में, “आज यह एक विश्वव्यापी मुद्दा बन चुका है तो मेरा काम ख़त्म हो गया, अब मैदान में लड़ने को कई लोग है - तंत्र, व्यवस्था, पुलिस, न्यायपालिका, मीडिया और व्यक्तिगत रूप से कई लोग, बस मेरा काम हो गया अब मुझे अगले किसी मुद्दे पर जनता की लड़ाई लड़ना है सारी उम्र मै इसी पर काम नहीं करना चाहता”. श्रीश पांडे चाहते तो वे खुद सारा श्रेय लेकर भोपाल के किसी बड़े मीडिया हाउस में जम सकते थे, दिल्ली के बड़े चैनल में रोज लाईव कार्यक्रमों में ज्ञान बाँट सकते थे, परन्तु वे अब व्यापम मामले से दूर है और बेहद सादगी से सतना में दीगर और जन मुद्दों पर मीडिया में रहकर ही लगातार काम कर रहे है.
तो डा आनंद राय साहब आपके मरीजों को आपकी जरुरत है, जाईये, अस्पताल जाईये, धार जाईये जो आदिवासी बहुल जिला है और वहाँ वैसे ही डाक्टर नहीं है, बजाय हाई कोर्ट में लड़ने और अखबारों की कटिंग को काटकर सजाकर अपना केस पुख्ता बनाने की लड़ाई में अपनी ऊर्जा ख़त्म करने के लोगों के लिए गरीब आदिवासी लोगों के लिए काम करिए, वहाँ आपकी ज्यादा जरुरत है और फिर इंदौर धार है ही कितना दूर मात्र साठ किलोमीटर ! बंद कीजिये, अब व्हिसिल बजाना सब जाग गए है आपको तो अमर होना था, हो गए और अब कोई विधायकी लड़ना हो तो बात अलग है, क्योकि आपके घुटने भी तो पेट की तरफ ही मुड़े हुए है.........


संदीप नाईक. 

Thursday, July 16, 2015

Post of 16 July 15

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सिर्फ वित्त आयोग ही नहीं बल्कि राज्य योजना आयोग में एक आय एफ एस अधिकारी के कार्यकाल की भी जांच होनी चाहिए शिवराज जी के कार्यकाल में जो तीन चार बार चुनाव होने पर भी जमे रहे और अरबों के बजट से खेलते रहे. बार बार लिखने और अनुरोध करने पर भी तीन तत्कालीन मुख्य सचिव, प्रदेश शासन की हिम्मत नहीं थी कि उन्हें अपने पद से हटा सकें. इस अधिकारी ने प्रदेश में विकेंद्रिकरण के नाम पर कई विदेश यात्राएं की, अपनों को उपकृत किया और पुरे स्टाफ में भी टेक्नीकल सपोर्ट यूनिट के नाम पर अंधाधुंध भर्तियाँ की जो कि बिलकुल ही स्तरहीन लोगों की भर्तियाँ थी. यूनिसेफ से लेकर तमाम एजेंसियों के साथ इनके संबंधों की भी जांच होनी चाहिए. प्रदेश में विकेंद्रीकरण के नाम पर मामाजी की शह पर इस अधिकारी ने मोटोरोला के जीपीएस से मेपिंग के महंगे सेट खरीदे और जिलों में बाँट दिए जो आजकल धुल खा रहे है,  दो तीन जिलों में पाईलेट प्रोजेक्ट के तहत संसाधनों की मेपिंग के लिए नागपुर की एक फर्म को ठेका दिया जिसमें से एक जिले होशंगाबाद के मूल कागज़ जिला सान्खियिकी अधिकारी कार्यालय से गायब हो गए, तत्कालीन जिला कलेक्टर को भी चुप रहने के निर्देश मिले थे, और कम्पनी को भुगतान भी कर दिया गया.........ऐसे भोले भंडारी अधिकारी जो कि शिवराज जी के खासमखास थे, और ये बिना शिवराज जी की शह के कुछ नहीं कर सकते थे, कुल मिलाकर ये आठ साल योजना आयोग में जमे रहे और सुविधाएं भकोसते रहे. इसकी भी जांच होना चाहिए . मैंने स्वयं में कई बार फेस बुक पर खुलकर लिखा चुनावों के दौरान तत्कालीन मुख्य सचिवों और मुख्य निर्वाचन अधिकारी, मप्र शासन और भारत सरकार को लिखा था परन्तु कोई कार्यवाही नही की गयी, जाहिर है इन पर प्रदेश के मुखिया का हाथ था. राज्य योजना आयोग में मुख्य सलाहकार एक आयएएस ना होकर एक भारतीय वन सेवा का अधिकारी कैसे इतने साल बना रहा जिस विभाग में अरबों का बजट हो, वहाँ बिना प्रशासनिक अधिकारी के होना और चलना,  यह निश्चित ही चिंता और सोचने का विषय है जहां 51 जिलों के वार्षिक बजट में अरबों रुपयों का सवाल होता है. अब चूँकि बात निकली है तो दूर तलक जाना स्वाभाविक ही है. 

Wednesday, July 15, 2015

Post of 15 July 15



इटारसी में पिछले एक डेढ़ माह से रेलवे का आवागमन बन्द है रोज देश से लेकर रेलवे का करोडो का नुकसान हो रहा है। लाखों यात्री परेशान है बस वाले होशंगाबाद भोपाल का दो सौ रूपये तक ले रहे है पर कही कोई आवाज नही, मीडिया में सन्नाटा, और प्रदेश के लोकप्रिय व्यापम में व्याप्त मामाजी के राज में चार छह बस अतिरिक्त नही चल सकती यह इस उन्नत प्रदेश का हाल है। 3000 लोग इस इटारसी के स्टेशन को सुधारने का काम चौबीसों घण्टे कर रहे है पर अभी एक डेढ़ माह तक यह ट्रैक चालु होने की कोई उम्मीद नही है। 
और देश के प्रधानमन्त्री पूरी बेशर्मी से दुनिया के सामने "डिजिटल इंडिया" का यशगान कर रहे है। क्या ख़ाक डिजिटल इंडिया , एक रेलवे ट्रैक तीन माह में सुधरेगा तो !!!


सीधा गणित है भैया , निजीकरण कर दो इस सुविधा का भी - दे दो अम्बानी और अडानी को, इसी की तैयारी कर रही है सरकार , इससे ज्यादा और क्या कर सकती है..........
शर्म मगर उनको आती नहीं है.........

NDTV पर नमक घोटालें की खबर है अभी स्पेशल कार्यक्रम आ रहा है, पिछले साल जब मैंने एक अध्ययन किया था उसमे इस बात को बहुत तल्खी से उठाया था कि किस तरह से काला नमक और स्तरहीन नमक सार्वजनिक राशन की दुकानों से नमक बेचा जा रहा है.
जय सरकार राज और जय छग सरकार
कब तक बचाओगे मोदी जी रमण सिंह, वसुंधरा और शिवराज को?



देवास में जनवादी लेखक संघ का उम्दा आयोजन 






देवास में मप्र जन वादी लेखक संघ ने आज दिनांक 15 जुलाई को इंग्लिश ट्युटोरियल में घटते संसाधन और बढ़ती जन संख्या विषय पर एक विचार प्रसंग का उम्दा आयोजना किया. इस प्रसंग में प्रसिद्द कार्यकर्ता और गांधीवादी विचारक चिन्मय मिश्र को वक्ता के रूप में बोलने के लिए आमंत्रित किया , कार्यक्रम में आकाशवाणी इंदौर से राजीव पाठक और प्रवीण जी भी उपस्थित थे. चिन्मय ने अपनी बात की शुरवात करते हुए कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के लूट की शुरुवात क्रिस्टोफर कोलंबस ने की थी जिसने संसाधनों की लूटमार शुरू की. चिन्मय ने विभिन्न उदाहरण देते हुए कहा कि किस तरह से अब पर्यावरण के मुद्दे सिर्फ सतही तौर पर नहीं सुलझाए जा सकते अब इन्हें एक बड़े जनांदोलन में तब्दील करने की जरुरत है. कार्यक्रम में देवास शहर के कई बड़े साहित्यकार, प्रबुद्धजन, मीडिया कर्मी और छात्र उपस्थित थे. मनीष वैद्य ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया. देवास शहर में इस तरह के कार्यक्रम दर्शाते है कि जन चेतना के लिए अभी भी लोग सामूहिक रूप से जुटते है और चर्चा करते है. 

Monday, July 13, 2015

Posts of 13 July 15 In Gadhi, Balaghat MP


यकायक वह कमरे में घुस आई और मेरे हाथ में चाकू देखकर अचकचा गई , बोली ये क्या ? मैं थोड़ा सा लज्जित हुआ और दुसरे हाथ में रखा घर से लाया आम आगे करते हुए बोला कि कुछ नही आम काट रहा था और आप आ गयी, आम खायेंगी ? वो बोली नही, मैं फ़ालतू चीजें नही खाती। कप उठाकर लौट गयी। कल से इस जंगल में बने गेस्ट हाउस में हूँ पंद्रह कमरों में हम कुल जमा दो लोग है एक मैं और एक ऑस्ट्रेलियन आर्मी का केप्टन जो तीन साल की छुट्टी लेकर भारत के आदिवासियों के लिए बिजली की समस्या और सौर ऊर्जा के विकल्पों पर काम कर रहा है। दिन भर सोता है और रात को गाँवों में निकल जाता है लैम्प देखने, बड़ा विकट लौंडा है। हमारे यहां तो पक्की नोकरी मिल जाए तो जिंदगी ऐय्याशी में बीतती है. फिलिप्स मर्फी नाम है अभी म्यांमार होकर आया है। 
ये गेस्ट हाउस की देख रेख एक अधेड़ महिला करती है जो सारे दिन प्रदीप के गाने जोर से टेप चलाकर सुना करती है , ना जाने क्या दर्द है इसके भीतर, कुछ पूछो तो काटने दौड़ती है पर बड़ी तन्मयता से दोनो समय नाश्ता, खाना और बढ़िया सी चाय पिला देती है। जंगल मानो इसके भीतर से उगा और खत्म हो गया...।


एक नीलकंठ फिर दिखा आज घने जंगलों में
शायद कह गया कि गरल पान करते रहो जब तक ज़िंदा हो 

(लिखी जा रही कहानी का अंश "नीलकण्ठ का सपना")


विष्णु बहुत याद आओगे तुम.........




Vishnu Govindwad कल गढी बालाघाट में मुझसे मिलने आया, यानी लेपटोप बाबा से। आजकल ये मण्डला में FES में कार्यरत है। कहाँ बावल गाँव लातूर जिले का और कहाँ यह मण्डला, पर दुनिया गोल और छोटी है. तुम कब मिलोगे Satyajit Kale ??? विष्णु सन् 2011 में टाटा संस्थान तुलजापुर में प्रथम वर्ष का छात्र था , हम लोग वहाँ चार माह का एक आवासीय पाठ्यक्रम कर रहे थे। ये बच्चे समाजसेवा का ककहरा सीख रहे थे। विष्णु की हिंदी कविता में बहुत रूचि थी बस यही वजह थी जो हमे आजतक जोड़े रखी है दिल से। कल देर रात तक हम खूब बातें करते रहे। विष्णु ने कल रात और आज भोर में अपनी दो चार ताजा कविताएँ सुनाई। अपने गाँव का सरपंच बनने का सपना देखने वाला विष्णु बहुत कुछ करना चाहता है। बदलाव के लिए जमीनी स्तर पर नोकरी चुनने वाले 64 में से 11 छात्रों में से एक है जो महाराष्ट्र के लातूर को छोड़कर यहां मप्र के मंडला जैसे दुरूह जिले के बिछिया ब्लाक में काम कर गाँवों की राजनीति और विकास के बीच ज़िन्दगी का ताना बाना बुन रहा है। 64 में से मात्र 11 जमीनी काम कर रहे है, शेष बचे छात्र दिल्ली बम्बई की संस्थाओं में वातानुकूलित कक्षों में बैठकर प्रेजेन्टेशन बनाते है और पालिसी पर काम करते है, विष्णु का इशारा टाटा सामाजिक संस्थान के संस्कारों और प्रशिक्षण पर बहुत साफ़ था। अफ़सोस कि अब "एक्टिविज्म" सरकार भी खत्म करने पर तुली है।
बस, विदा हुआ तो गमगीन था, पता हम फिर कब मिलें और कहाँ, अभी जाते समय मैंने यही कहा - जा तेरे स्वप्न बड़े हो....

उन घरों में , उन गलियों में और उन शहरों में सिर्फ और सिर्फ लोग रहते थे बस दीवारें नही थी... फिर ईंटें आयी, रेत आई, चुना और सीमेंट जोड़ा गया कि सब कुछ पुख्ता हो सकें ... फिर दीवारें बनी ऊंची ऊंची और लोग खत्म हो गए.....
Vishnu Govindwad के साथ बालाघाट के गढी स्थित जंगल के एक गेस्ट हाउस में बातचीत टाटा सामाजिक संस्थान तुलजापुर की बेहतरीन स्मृतियों को शिद्दत से याद करते हुए.


Wednesday, July 8, 2015

Posts of 8 July 15




मप्र में आजकल आत्माएं ज्यादा है, पहले भी शराब की दुकानों के समय को लेकर आत्मा जगी थी, और अब फिर छः माह बाद फिर आत्मा की आवाज जगी है. रात भर जागना कितना मुश्किल है यह तो भुक्तभोगी ही समझ सकता है...

मप्र में अंततः हर कहानी, मुद्दे और खेल का पटापेक्ष हो गया, सब भूल जाईये और फिर से चैन की बंसी बजाईये. अगले पांच साल तक सब ख़त्म और बाकी तो सब कुशल मंगल ही है........दिल्ली जिसको जाना था वो दिल्ली चले गए, जिसको निपटाना था, उसको निपटा दिया, जिसको जो बकना था बक लिया, पार्टी से जिसको दिक्कत थी वह स्पष्ट हो गयी, अब मामला सी बी आई और फाईलों के बीच है, जांच और तथ्यों के बीच का खेल है, यात्री भत्ता और होटलों के बिलों का खेल है, सर्किट हाउस और मुर्गें कबाबों की बारी है, शराब और हलफनामों का दौर है, नए - नए शिगुफों और जानकारियों का दौर है. बस सब ठीक है, अब गद्दी भी सुरक्षित है, साम्राज्य सुरक्षित और शिकार भी सुरक्षित. 
यकीन मानिए अब कोई नहीं मरेगा. आमीन

Tuesday, July 7, 2015

सिर्फ तथागत नहीं 7 July 15





मेरे लिए ये सिर्फ तथागत नहीं है, गौतम बुद्ध नहीं, राजकुमार सिद्धार्थ नहीं, अंगुलिमाल, आनंद  या आम्रपाली के गुरु नहीं, वरन एक समूची जीवन पद्धति है, अनुशासन है, और जीवन की आशाओं - निराशाओं के बीच से निकलने वाली एक ऐसी राह है - जो चलना, गिरना, उठना, समझना, समझाना और रोना - हंसना सिखाती है. ना जाने क्यों इन मुश्किल दिनों में जब बहुत जगह से बहुत निराशा हाथ लग रही है और बहुत कुछ करने के बाद भी बहुत कुछ नहीं कर पा रहा तो अंत में अंतस में बहुत नैराश्य सा छा गया है, चहूँ ओर व्याप्त अन्धकार और त्राहि - त्राहि से भयभीत हूँ और ना जाने क्यों ऐसे में तथागत याद आते है. उनके चेहरे की शान्ति और दैदीप्त्मान आभा से सीख रहा हूँ कि कैसे मौन रहकर भाषा बोली जाए, कैसे विपश्यना को जीवन में उतारकर कलुष और संताप से दूर रहा जाएँ, कैसे अपरिग्रह और वासना से दूर रहकर सीमित संसाधनों में साँसों का स्पंदन बरकरार रखा जाए. पर अभी तो याचक की भाँती खडा हूँ पता नहीं किन दरवाजों और देहरियों पर और एक भिक्षु बनने में  बहुत देरी है - शायद जन्मों का फासला है और पता नहीं कब मुझे तथागत के चेहरे की शान्ति समझ आयेगी और कब वह दिव्य अनुभूति होगी, पर फिलवक्त अभी जब "उजास" इलाहाबाद में गया था, तो आते समय बनारस एयरपोर्ट से तथागत की ये चंद मूरतें, प्रतीकात्मक ही सही, उठा लाया बहुत श्रद्धा के साथ कि कही से तो शुरुआत हो. क्या शान्ति का दूसरा नाम जीवन का संताप, क्लेश, यातना और अपराधबोध है ? 







ये पेड़ नहीं, आने वाली पीढी को सौंपे जाने वाली विरासत है 7 July 15




ये पेड़ नहीं है - बल्कि एक पीढी को सौंपे जाने वाली धरोहर है. बहुत दिनों से लग रहा था कि मेरे कमरे में कुछ अधूरापन है फिर लगा कि शायद हरियाली सूख रही है, तो एक दिन जाकर कुछ पेड़ ले आया, और एक बरगद मिल गया इसे इस उम्मीद से लगाया है कि इसके नीचे जरुर बहुत कुछ उगाउंगा और फिर शायद कोई कहावत नई रच पाऊं. Alok Jha ये देख लो, शायद हम एक ही नाव में भटके ही सही, सवार तो है......चेत रहे है पेड़, फ़ैल रही है बैलें, और निकल रही है नई शाखें और उग रही है कोंपलें ताकि कुछ और नया सृजित हो सकें. कम से कम कुछ हरी पत्तियाँ, कुछ नई शाखें और कुछ अन्दर ही अन्दर फैलती सी जड़ें 




Monday, July 6, 2015

व्यापम की खबरें और प्रतिक्रिया Posts of 4 to 6 July 15



देश के हालात कितने खतरनाक हो चले है तीन महत्वपूर्ण राज्यों के मुख्यमंत्री विभिन्न जघन्य आरोपों में फंसे है, अर्थ तंत्र बिगड़ गया है, स्टॉक एक्सचेंज गिरा पड़ा है, शिक्षा से लेकर हर तरफ भ्रष्टाचार का भयानक बोलबाला है, प्रशासन और न्यायपालिका तक सब गडमड्ड हो गया है, मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे है, मीडिया के लोगों को मारा जा रहा है, कोई भी मुख्यमंत्री सीबीआई की जांच के दायरे में आने को तैयार नहीं, देश की सीमाएं सुरक्षित नहीं है, आपदाएं सर चढ़कर बोल रही है और ऐसे में माननीयप्रधानमंत्री श्री मोदी जी का आज से पांच देशों की यात्राओं पर जाना, साथ अपने विश्वसनीय जेटली को भी ले जाना क्या इंगित करता है ? देश में जो मंत्री बचे है वे एक डेढ़ साल में कोई निर्णायक भूमिका नहीं निभा सके है, हम सब जानते है, वे सिर्फ यस सर की भूमिका में है !!! क्या अमित जी शाह इस संकटकाल में संकटमोचन बनेनेगे ?
या प्रधानमंत्री जी सब्सिडी, सेल्फी, आदि के बाद कोई नया शिगूफा छोड़ेंगे विदेश से? या उनकी नजर में ये मुद्दे कोई मुद्दे नहीं है विदेश यात्राओं की तुलना में ???
देश के हालात सचमुच आपातकाल जैसे हो रहे है, क्या इसी आपातकाल की बात माननीय आडवानी जी कर रहे थे?
सबसे बड़े पत्रकार के स्वागत के कारण बने कारवे से एक नवजात की मौत। अब कहिये
क्या कहा था हाई और सुप्रीम कोर्ट ने पर प्रशासन के किसी गुर्गे में हिम्मत की रैली, जुलूस और बारातों को रोक सकें, "व्यापम का अंजाम देख रहे हो ठाकुर" के अंदाज में धमकी मिल जायेगी।
और देश से सबसे बड़े अखबार भास्कर की आज की खबर है। 
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हुजुर आपसे बड़ा पत्रकार सच में कोई नहीं है क्योकि जब रजत शर्मा अदालत चलाकर बिक गए, या दीपक चौरसिया भांड हो गए तो बाकी लोगों की और अक्षय कुमार जैसों की क्या बिसात.............? और फिर इंदौर के लोगों को आप और आपकी ताकत मालूम है ना.........प्रदेश के कद्दावर लोग इंदौर आने में घबराते है कि कही ये अंतिम यात्रा ना हो जाएँ..........बहुत पुराने ठोस अनुभव है ना सबके.
सही कहा आपने, और यह बात आपकी पार्टी के लोग नीचे से ऊपर तक मानते है क्योकि पन्त प्रधान भी तो इसी सिद्धांत पर काम कर रहे है और जानकारी के लिए बाल ठाकरे से लेकर पन्त प्रधान ने भी मीडिया के अदने से कर्मचारी के रूप में काम किया ही है. जाहिर आपसे बड़ा पत्रकार कौन हो सकता है, बस गलती है तो ससुरे संविधान की, जो साला अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता देता है वरना बचता कोई मैदान में ......
और माफी मांगना तो आपका पुराना शगल है........हम एक उम्र से वाकिफ है.


इतना बड़ा सच और ये पूरी दुनिया कह रही है फिर भी आप लोगों को लगता है कि मैं शिवराज जी को लेकर पूर्वाग्रह पाल रहा हूँ. माफ़ करना मेरी किसी से दुश्मनी नही है . भाई Ravish Kumar का यह खत काफी है .
बाकी अंध भक्तों का पता नही, नैतिकता और चरित्र का पाठ पढाने वाले, अटलजी और आडवाणी के वंशजों से ये उम्मीदें नही थी. रविश ने सही लिखा है कि सब गोलमाल है, इनका धर्म सिर्फ एक है किसी भी प्रकार से सत्ता बनी रहें बस. और नाटकों में तो शेक्सपियर को शर्मसार कर दे ये लोग , कितने ही कालिगुला इनके चौखट पर पानी भरते है और कालिदास सेवा में पंखे झलते है.

पत्रकार अक्षय सिंह की मौत पर शिवराज सिंह के नाम रवीश कुमार की खुली चिट्ठी
माननीय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी,
"वो जो गहरे नीले कुर्ते में है न, हां! वही जो अभी बेसुध सी पड़ी है, ये..ये जो अब उठकर दहाड़ मार रही है। संभाल नहीं पा रही है खुद को। ये जो उठकर फिर गिर गई है।"

आग की उठती लपटों के कारण उसे देख तो नहीं पाया पर कान के पास कुछ आवाज़ें पत्रकार अक्षय सिंह के बारे में बताने लगीं। मैं उसकी चिता के करीब खड़े लोगों की तरफ देख रहा था। वो कौन लड़की है जिसके बारे में आप बता रहे हैं? "सर अब क्या कहें, ये अक्षय की मंगेतर है।" सुनते ही उसके चेहरे पर ज़िंदा अक्षय को खोजने लगा, तभी उसे संभालने एक और लड़की आ गई। "सर ये अक्षय की बहन हैं। चश्में में जो हैं।"
श्मशान में सरगोशियां ही ज़ुबान होती हैं। ख़ामोशी की लाचारी समझ सकता हूं। सीढ़ी पर दो लड़कियों को बिलखते देख उस तरफ नज़र जा ही नहीं पा रही थी जहां अक्षय का पार्थिव शरीर पंचतत्वों में बदल रहा था। वो मिट्टी हवा और अग्नि से एकाकार हो रहा था। पास में उसकी मंगेतर और बहन अपनी चीख़ के सहारे उस तक पहुंचने की आख़िरी कोशिश कर रही थीं। पिताजी लक़वे से लाचार हैं इसलिए वहां दिखे नहीं या किसी ने दिखाया नहीं।
माननीय शिवराज सिंह, मैं यह सब शब्दों की बाज़ीगरी के लिए नहीं लिख रहा हूं। मुझे पता है कि ऐसे मामलों की संवेदनाएं वक़्ती होती हैं। कल किसी और घटना की आड़ में कहीं खो जाएंगी। हम सब निगम बोध घाट से लौट जाएंगे। सोचा आप आ तो नहीं सके इसलिए लिख रहा हूं ताकि आप पढ़ सकें कि ऐसी मौतों के पीछे की बेबसी कैसी होती है। चार लड़कियों ने आई.ए.एस. में टॉप किया तो आप लोग कैसे खिल खिलकर बधाई दे रहे थे। यहां सीढ़ी पर बिलखती-लुढ़कती लड़कियां ही एक दूसरे को सहारा दे रही थीं।
अपने जीवन में नेताओं को करीब से देखते-देखते समझ गया हूं। आप सभी को इन सब बातों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मैं सिर्फ आपकी बात नहीं कर रहा। आप सब में आप सब शामिल हैं। आपकी संवेदना उतनी ही खोखली हैं जितना सत्ता का मोह सच्चा है। सत्ता ख़ून भी पी सकती है और अपने लिए ख़ून बहा सकती है। सत्ता के लिए ही तो है ये सब।
"अक्षय बहुत स्मार्ट था। बहुत ही फ़िट बॉडी थी। एक अतिरिक्त चर्बी नहीं थी। जिम जाता था। सर सिगरेट पान कुछ नहीं लेता था।"
फिर किसी की आवाज़ आई। मैं अक्षय से कभी नहीं मिला। अपनी बिरादरी के लोगों के साथ कम उठा बैठा हूं। बहुत कम पत्रकारों को जानता हूं। बहुत से संपादकों को नज़दीक से भी नहीं देखा है। मुझे थोड़ा अफ़सोस है कि ऐसे पत्रकारों को ठीक से नहीं जान पाया। इसलिए माननीय शिवराज सिंह, श्मशान में अक्षय के बारे में जो सुना वो लिख रहा हूं। क्योंकि आप आ नहीं सके, लिहाज़ा जानने का मौक़ा भी नहीं मिला। मुझे आपकी क्या अपनी भी संवेदना दिखावटी लगती है। फिर भी लिख रहा हूं ताकि एक बार फिर से पता चल जाने में कोई हर्ज नहीं है।
"अक्षय बहुत सावधान रहता था। बहुत स्टिंग किए। एक से एक खोजी पत्रकारिता की। कभी अपना नाम और चेहरा नहीं दिखाता था। सर उसने शादी भी नहीं की। 36 साल का हो गया था। कहता था कि इतने मुक़दमे चल रहे हैं उस पर, शादी कर ले और पता नहीं क्या हो जाए। उससे थोड़ा परेशान रहता था। पिताजी को लकवा मार गया है। बहन की शादी भी करनी है।"
इस बीच बहुत से लोग अपनी संवेदना प्रकट करने के लिए आ जा रहे थे। सब नि:शब्द! एक पत्रकार समाज के लिए सिस्टम से कितना टकराता है। केस मुक़दमे झेलता है। उसकी निष्ठा कितनी होगी कि वो इस दौर में अपना चेहरा सामने नहीं आने देना चाहता होगा। जबकि उसके पेशे के हर नामचीन का ट्विटर हैंडल देख लीजिए। वे दिन में पचास ट्वीट यही करते हैं कि शिवराज ने मुझसे बात करते हुए ये कहा, नीतीश ने मुझसे एक्सक्लूसिव ये कहा। जो काम करे और नाम न बनाए ऐसे किसी पत्रकार की प्रतिबद्धता को ट्विटर पर लुंगी-तौलिया तक पसारने वाले पत्रकार समझ भी नहीं सकते। आप लोग तो हर मुलाक़ात की तस्वीर साझा करते ही हैं, आज कल तो खोज खोज कर जन्मदिन मनाते हैं जैसे इसी काम के लिए चुनाव होता है।
मैं अक्षय सिंह के बारे में बिल्कुल नहीं जानता था। अच्छा या बुरा कुछ भी नहीं। अच्छा बुरा किसमें नहीं होता। आप ही के मंत्री हैं बाबू लाल गौड़। उन्होंने व्यापमं में हो रही मौतों के बारे में बयान दिया था कि जो दुनिया में आएगा वो जाएगा। मुझे पता नहीं आप ऐसे मंत्री को कैबिनेट में आने कैसे देते हैं, कैसे झेलते हैं। ख़ैर, मुझे पता ही कितना है। जो भी हो व्यापमं घोटाले की तमाम मौतों पर आपकी सफाई बिल्कुल विश्वसनीय नहीं लगती है। आपका भरोसा खोखला लगता है।
"सर वो तो इतना अलर्ट रहने वाला लड़का है कि पूछिए मत। अनजान नंबर का फोन कभी नहीं उठा पाता था। घर में सख्त हिदायत दे रखी थी कि कोई भी आ जाए उसकी ग़ैर मौजूदगी में दरवाज़ा मत खोलना। हम लोगों को काफी मेहनत करनी पड़ी। पड़ोसी की मदद लेनी पड़ी। पहचान साबित करनी पड़ी कि हम उसके सहयोगी हैं तब जाकर दरवाज़ा खुला।"
फिर कोई आवाज़ कानों तक सरक आई थी। अक्षय के मां-बाप को क्या पता कि इस बार अक्षय के पीछे उनके लिए कोई ख़तरा बनकर नहीं आया है। बल्कि अक्षय के अब कभी नहीं आने की सूचना आई है। अब कोई ख़तरा उनके दरवाज़े दस्तक नहीं देगा।
माननीय शिवराज सिंह, आप चाहें तो कह सकते हैं कि मैंने तब क्यों नहीं लिखा जब वो हुआ था। आप दूसरे राज्यों और दलों की सरकारों की गिनती गिना सकते हैं। मेरी चुप्पी का हिसाब गिनाने के लिए ट्विटर पर घोड़े दौड़ा सकते हैं। आप लोगों की ये तरकीब पुरानी हो गई है। व्यापमं घोटाले का सच कभी सामने नहीं आएगा। ये आप बेहतर जानते होंगे। ये हम भी जानते हैं।
मैं ये नहीं कह रहा कि आप दोषी हैं। अक्षय सिंह की मौत के लिए कौन दोषी है ये मैं कैसे बता सकता हूं। आपकी जांच से कभी कुछ पता चलता है जो मैं इंतज़ार करूं। आपके राज्य में ज़हरीली गैस से लोग मर गए, क्या पता नहीं था लेकिन क्या पता चला। आपकी क्या, कभी किसी की जांच से पता चला है। आपकी खुशी के लिए अभी कह देता हूं कि क्या कभी कांग्रेस, जेडीयू, अकाली, आरजेडी की सरकारों में पता चला है? पता नहीं चलने का यह सिलसिला किसे नहीं पता है।

जो डाक्टर या इंजिनियर शिवराज सिंह जी का समर्थन कर रहे है यकीन मानिए वो व्यापम की पैदाइश है.
सावधान इंडिया.
यहाँ सबको सब पता है बस बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे या राजा नंगा है कौन कहें ?
हमने जांच की क्या मांग की, आपने तो सबको मारना शुरू कर दिया सरकार !!!
लोगों ने सच क्या बोला, आप तो मारना शुरू कर दिए सरकार !!!


स्टिंग ऑपरेशन और खोज खबर की तलाश में हम दोनों ने कई दौरे किये.हफ्ते-हफ्ते ..दस-दस दिन के लिए ...ज्यादातर दिल्ली से बहुत दूर. कभी बनारस तो कभी पीलीभीत. कई रातें होटलों के एक कमरे में बिताई . दोनों शाकाहारी और टी टोटलर रहे.. तो अक्सर नींद के इंतज़ार में वक्त किसी न किसी किस्से से शुरू होता था पर बातचीत एक टॉपिक पर ही खत्म होती ...और फिर हम दोनों सो जाते.
जरा गेस करिए दो खोजी पत्रकारों के बीच संवाद का सबसे आम टॉपिक क्या हो सकता है ?
शायद आज के दौर में विश्वास न हो पर हम दोनों के बीच सबसे ज्यादा बातचीत "माँ " को लेकर होती थी. दरअसल ख़बरों और सूत्रों के अलावा अक्षय के फोन पर उनकी छोटी बहन और मम्मी ही हमेशा दुसरे सिरे पर रहती थीं. और बात खत्म होने के बात अक्षय अपनी माँ का टॉपिक छेड़ देता.
मुझे काफी देर बाद मालूम हुआ की अक्षय के परिवार में सिर्फ तीन ही लोग थे. माँ, छोटी बहन और अक्षय. और वो इस परिवार का जीविका चलाने वाला एकलौता सदस्य था.
आज माँ का अस्पताल में टेस्ट है. आज माँ को चश्मा दिलाना है. आज माँ की तबियत ढीली है. आज माँ के लिए गिफ्ट लेकर जाना है . सर आपके आशीर्वाद से माँ को वैष्णोदेवी ले जा रहा हूँ. सर आज माँ ने सब्जी बनाकर दी है.प्लीज़ टेस्ट करिए. सर झूठ नही बोल रहा माँ के हाथों में जादू है. कभी उरद की दाल खिलाता हूँ आपको..
मेरी माँ नही थी इसलिए ये किस्से, ये बातें, मेरे दिल को बड़ा सुकून देती थी ...और धीरे धीरे मे खुद माँ के बारे में ही पूछने लगा. एक वजह शायद ये थी कि ये उसका पसंदीदा टॉपिक भी था.
हर मंगलवार को अक्षय को मुझे रात 8 बजे तक फारिग करना होता था.उस दिन अक्षय का व्रत होता था और उसे घर जाकर माँ के हाथों से व्रत तोडना होता था. अगर मे ख़बरों में फंसा हूँ तो वो शाम को ही हिंट दे देता ..सर आज ट्यूसडे है.
आज दोपहर जब आजतक से शम्स ताहिर खान ने अक्षय के बारे में खबर दी तो कुछ देर मे रियेक्ट ही नही कर सका. शम्स मुझसे अक्षय के घर का पता पूछना चाह रहे थे. शायद वो ये भी चाह रहे थे कि मे उनकी माँ को खबर भी दूं.
मे पीछे हट गया . मुझे लगा दुनिया में मेरे लिए इससे बड़ा पाप कोई और नही हो सकता कि मे अक्षय की मौत की खबर अक्षय की माँ को सुनाऊँ. जब लोग पहुँचने लगे तो मैंने हिम्मत की.
देर शाम मैंने अक्षय के घर की सीडियां पहली बार चढ़ी. उसे आपार्टमेंट तक छोड़ने तो मे कई बार गया था पर घर की सीढ़ियाँ कभी नही चढ़ी थीं. मे अक्षय के घर आज पहली बार पहुंचा... सीढ़ी की हर पायदान एक पहाड़ सा था. तीसरे फ्लोर के फ्लैट का जब दरवाज़ा खुला तो बहन मुझे पहचान गयी और दूसरी तरफ माँ बैठी थी. मै माँ से बिना आँख मिलाये ..माँ को बिना देखे दरवाज़े से वापस हो लिया.
ये माँ अब मेरी माँ जैसी ही है ...
फर्क सिर्फ इतना है कि मेरी माँ घर की दीवार के फोटो फ्रेम में जड़ी है ...और ये माँ जीते जी आज जड़ चुकी थी.
दीवार पर चस्पा और पलंग पर बैठी इन दोनों माओं में अब कोई फर्क नही है.
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दो बातें कहनी है
पहली कि अगर कल दिल्ली में है तो कोशिश करियेगा 1 बजे दोपहर निगमबोध घाट पहुँचने के लिए जहाँ अक्षय के अंतिम दर्शन के लिए आप आ सकते हैं.
और हाँ अक्षय के घर को अब कौन चलाएगा ? इस विषय पर कोई निर्णय लेना होगा
भाजपा से जुड़े कई वरिष्ठ मित्रो और मीडिया के साथियों को लगता है कि मप्र में व्यापम घोटाले हो रही सभी मौतों के लिए शिवराज नही कोई और भी समान रूप से जिम्मेदार है और इस बहाने आतंरिक रूप से शिवराज को बदनाम करके स्वयं मुख्यमंत्री बनना चाहता है। ताजा हुई दो - तीन मौतों - नरेंद्र तोमर , ग्वालियर में राजेन्द्र और आजतक के अक्षय कुमार की मौत की तरफ इशारा था। साथ ही राज्यपाल से लेकर केंद्र तक के नेता, ब्यूरोक्रेट्स और बहुत छोटे स्तर के कई कर्मचारी, जेल में बंद लोगों से लेकर मंत्रियों के निजी स्टाफ और परिजनों के भी इन मामलों में शामिल होने की संभावना बताई गयी।
बातचीत के आधार पर ये निष्कर्ष निकले, मुझे नही पता , पर मुद्दे में दम तो है।
प्रदेश के चार पांच बड़े शहरों और पार्टी में प्रदेश के बाहर के भी कई लोग है जो प्रदेश की बागडोर सम्हालने को बेताब है। व्यापम में हो रही सिर्फ मौतें ही नही वरन स्थान, समय और अवसर भी महत्वपूर्ण है।
भतृहरि का कथन है कि सम्पूर्ण चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ है ,सर के बाल सफ़ेद हो गए है , शरीर के अंग शिथिल हो गए है किन्तु कितना आश्चर्य है कि तृष्णा पल पल बढ़ते ही जा रही है।
-बोध मञ्जरी
श्री प्राणनाथ ज्ञानपीठ ट्रस्ट
सरसावा, जिला सहारनपुर उप्र


भाजपा से जुड़े कई वरिष्ठ मित्रो और मीडिया के साथियों को लगता है कि मप्र में व्यापम घोटाले हो रही सभी मौतों के लिए शिवराज नही कोई और भी समान रूप से जिम्मेदार है और इस बहाने आतंरिक रूप से शिवराज को बदनाम करके स्वयं मुख्यमंत्री बनना चाहता है। ताजा हुई दो - तीन मौतों - नरेंद्र तोमर , ग्वालियर में राजेन्द्र और आजतक के अक्षय कुमार की मौत की तरफ इशारा था। साथ ही राज्यपाल से लेकर केंद्र तक के नेता, ब्यूरोक्रेट्स और बहुत छोटे स्तर के कई कर्मचारी, जेल में बंद लोगों से लेकर मंत्रियों के निजी स्टाफ और परिजनों के भी इन मामलों में शामिल होने की संभावना बताई गयी।
बातचीत के आधार पर ये निष्कर्ष निकले, मुझे नही पता , पर मुद्दे में दम तो है।
प्रदेश के चार पांच बड़े शहरों और पार्टी में प्रदेश के बाहर के भी कई लोग है जो प्रदेश की बागडोर सम्हालने को बेताब है। व्यापम में हो रही सिर्फ मौतें ही नही वरन स्थान, समय और अवसर भी महत्वपूर्ण है।

व्यापम की कवरेज के लिये दिल्ली से आये आजतक के संवाददाता अक्षय सिंह का झाबुआ में दुखद निधन।
समझ नहीं आता कि SIT एक ऐसे माहौल में कैसे जांच कर सकती है जब प्रदेश का मुखिया और राज्यपाल इस काण्ड में शामिल हो......जिसकी बार बार आशंका जताई जा रही है, क्या SIT के लोग दूसरे ग्रह से आये है जो बगैर डर के काम करेंगे....अब सही समय है जब प्रदेश की मीडिया को एकजुट होकर इस काण्ड की जांच की मांग सीबीआई से करवाना चाहिए . अभी राहुल कँवल का बाईट आजतक पर देखा तो बेहद अफसोस हुआ.
यानी अब मप्र में व्यापम के सबुत ही नहीं मिटायें जायेंगे, बल्कि कोई जानकारी लेने आयेगा तो उसे भी एक शांत मौत दे दी जायेगी, कितना शर्मनाक है, जेल में मौत और जेल के बाहर भी आरोपी को भी मौत और पत्रकार को भी मौत !!!

क्या राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट स्वत संज्ञान लेकर इस पुरे प्रकरण की जांच सी बी आई को सौंपेगा? या हमारी मीडिया के साथी इंतज़ार कर रहे है. क्यों ना मप्र सरकार के सभी कार्यक्रमों का विरोध करके तब तक बहिष्कार करें जब तक जांच सीबीआई को नही दी जाती या प्रदेश के मुखिया राज्यपाल इस्तीफा नहीं देते. मुझे नहीं लगता जब तक शिवराज सिंह जी और राज्यपाल पदों पर आसीन है तब तक SIT निष्पक्ष रूप से जांच कर पायेगी.
नरेंद्र मोदी तो भ्रष्ट लोगों को और अपने मुख्यमंत्रियों को बचाने में बिजी है बेचारे, शिवराज, फिर वसुंधरा और अब रमण सिंह आ गए है छत्तीस हजार करोड़ रुपयों के गबन में !!! और वे मन मोहन से ज्यादा मजबूर है और चुप्पी तो अब उनकी भी नियति बन गयी है.
लो अब शिवराज सुषमा स्मृति निहालचंद्र पंकजा वसुंधरा के बाद रमन सिंह पर 36 हजार करोड़ के चावल घोटाले में नाम (आजतक की न्यूज़)
जय भक्तों की। अब बोलो मनमोहन चुप भले थे या ये फेकू बड़बोले !!!


"औरत का शरीर उसके लिए मंदिर होता है"
माननीय सुप्रीम कोर्ट.
लीजिये महिलावादियों अब शुचिता और अस्मिता की बात करो. सुप्रीम कोर्ट अगर इस तरह के फतवे देगा तो महिला बराबरी और समता का क्या होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कोर्ट ने भी एक विशेष किस्म की भाषा बोलना शुरू कर दी है पिछले कुछ बड़े फैसले देखें तो सुप्रीम कोर्ट कुछ ज्यादा ही धार्मिक और फ़तवाधारी हो गया है ।
बड़ा मुश्किल समय है मित्रों , अब लोग कहाँ जाए और क्या करें !!!