Monday, June 29, 2015

Posts of 29 June 15


डा बी आर आंबेडकर और मो. क. गांधी से मुक्ति पाये बिना इस देश का उद्धार नही हो सकता। गांधी ने निकम्मे और भृष्ट गांधीवादी और कांग्रेसी पैदा किये जो मठ बनाकर बैठे है और आंबेडकर ने आरक्षण के नाम पर अयोग्य और घटिया लोगों को तंत्र में बिठा दिया जो ना कुछ करना चाहते है ना सीखना!
जिन भी लोगों को जीवन में एक बार भी आरक्षण का लाभ मिल गया है चाहे शिक्षा में, किसी कोर्स के प्रवेश में, छात्रवृत्ति में, नौकरी में, प्रमोशन या सरकारी सुविधा लेने में या मकान दूकान लेने में या किसी अन्य प्रकार के सुख उठाने में अब उनसे जाति प्रमाणपत्र छीन लो और भीड़ में शामिल करो और सामान्य मानो क्योकि अब बहुत हो गया दलितों को लम्बे समय तक बरगलाते हुए दूसरे वर्ग के इंसानों को बेवकूफ बनाना . बंद करो आरक्षण का नाटक या दम हो तो मंडला, डिंडोरी, खालवा या कवर्धा के आदिवासियों को नौकरी दो उन्हें डाक्टर इंजिनियर बनाओ ये शहरी दलितों को जो इंदौर भोपाल में पढ़कर छात्रवृत्ति लेकर दिल्ली से लाकर विदेशों तक में जाकर पढ़ आते है और बेशर्मी से जाति का कार्ड खेलकर किसी भिखारी की तरह से सरेआम फ़ायदा लेते है उनको समाज से बहिष्कृत करो. धर्म शिक्षा में दलितों को सामान अवसर दो या मंदिरों में पुजारी बना दो दलितों को यह भी मांग उठाती है.....परन्तु यह आवेग में कही गयी बातें है, धर्म एक अफीम है और बाकी बातें भी वैज्ञानिक समाज में आधार हीन है, हम तो कभी से समान शिक्षा पद्धति की बात कर रहे है और पांच हजार सालों का बदला आप किसी एक जाति से नहीं ले सकते वरना अगले पांच हजार सालों में ये स्वर्ण ही फिर बदला लेंगे..... बंद करो आरक्षण अब बाकि खेल समझ आ रहे है.असली पहचान छुपाकर क्यों रखते है लोग चमार से भार्गव बनकर कलेक्टर बनने का स्वांग क्यों ?


2

एनडीटीवी पर नरसिम्हा राव की हालत देखने लायक थी बेचारा खुलकर कह भी नहीं पा रहा था कि भाजपा के लिए शिवराज सिंह एक बड़ा कलंक है और मोदी के वरद हस्त के सहारे ही जी रहे है, वरना क्या बात है कि इतने लोगों की मौत के बाद भी मोदी कोई कार्यवाही नहीं कर रहे.

सच में मोदी से बड़ी सहानुभूति है जिसमे वह ना वसुंधरा के खिलाफ कुछ कर पाते है, ना निहाल्चंद्र को बर्खास्त कर पाते है, ना सुषमा पर नियंत्रण रख पाते है, ना शिवराज के भ्रष्टाचार को कंट्रोल कर पा रहे, ना रमण सिंह की  नक्सलवादियों से दोस्ती तोड़ पा रहे है, ना कर्नाटक में कुछ कर पा रहे , ना पंकजा मुंडे का हाथ पकड़ पा रहे भ्रष्ट आचरण पर, ना स्मृति की फर्जी डिग्री पर कदम उठा पा रहे, ना गोविदाचार्य को चुप करा पा रहे, ना आडवानी की सीनाजोरी को रोक पा रहे, ना राजनाथ के फन  कुचल पा रहे, ना अमित शाह से पार्टी में ढंग के लोग पा रहे, ना मिस कॉल से सदस्य बने लोगों को लुभा पा रहे, ना मन की बात करोडो लोगों तक पहुंचा पा रहे, ना मीडिया से अब प्यार सलामत रख पा रहे, ना गंगा को साफ़ कर पा रहे ना संडास के लिए रुपया ला पा रहे ना, विदेशियों को लुभाकर फंड ला पा रहे, ना ओबामा को साध पा रहे,  ना पाकिस्तान से दो सर काटकर ला पा रहे, ना चीन से सम्बन्ध बना पा रहे, ना बांग्लादेशियों के अवैध आगमन को रोक पा रहे, ना छप्पन इंच का सीना माप पा रहे, ना अम्बानी अदानी को मनचाहा फ़ायदा दिला पा रहे, ना जमीन अधिग्रहण बिल पास करा पा रहे और सबसे बड़ी बात घर के भीतर भी संतुलन नहीं रख पा रहें. 

बेचारे डा मन मोहन सिंह से ज्यादा मजबूर प्रधानमंत्री है,  मेरी पुरी सहानुभूति है , वो बापड़ा तो सोनिया से आतंकित था और राहुल बाबा की मूर्खताओं से परेशान थे पर ये तो भाजपा और संघ के पुरे कुनबे से परेशान है........ईमानदारी से बताना भक्तो एक भाजपाई है जो इसका सगे वाला हो और इसकी बात मानता हो.............अरे नरेद्र भाई अपनी लंका - गुजरात में जाओ, आग लगाओ, लोगों को मारो और उद्योगपतियों या सलमान के साथ पतंग उडाओ वही ठीक है, भारत जैसा बड़ा देश तुम्हारे बस का नहीं है, यहाँ शिवराज जैसे तगड़े लोग और वसुंधरा जैसी नायिकाएं है ..........और ये तुम्हारे बस में आने वाले नहीं 


बड़े आये थे अच्छे दिन लाने वाले ..........

Friday, June 26, 2015

ज्ञानेंद्रपति के साथ उजास के तीन दिन



आज अफसोस होता है की सन 70-74 में अज्ञेय जी जैसे बड़े लेखक हमसे बात करते थे तो हम बेहद अशिष्ट होकर जवाब देते थे, दिल्ली के कनाट प्लेस के सेन्ट्रल होटल में एक शाम उन्होंने मिलने बुलाया था तो चाय पिलाई और दो घंटे तक बात करते रहे और पूछा कि मेरा नया नाटक पढ़ा? तो मैंने कहा कि उसमे नाटक जैसा कुछ नहीं है इससे तो बेहतर मेरा नाटक है. मजे की बात यह है कि यह नाटक अब कही जाकर चालीस साल बाद नॉट नल पर शाया हुआ है. अब अफसोस होता है कि मेरे जैसा आदमी कितना अशिष्ट था..........!!!

क्या आप यह कह रहे है कि आज के युवा साहित्यकार भी इसी अशिष्टता के शिकार है? 

नहीं, नहीं मै कतई यह नहीं कह रहा परन्तु जब अशिष्टता देखता हूँ, सुनता हूँ तो दुःख होता है कि हमने अशिष्ट होकर बहुत कुछ खो दिया, काश सही समय पर सब यह बात समझ से समझ सकें......और कम से कम एक शिष्ट व्यवहार सबके साथ कर सकें , मत भिन्न होना अलग बात है पर अशिष्टता बर्दाश्त नहीं होती, क्योकि मैंने खुद यह अशिष्टता की है, अज्ञेय जैसे व्यक्ति के साथ तो निश्चित ही आज पश्चाताप है. 

दो बार पी सी एस की परीक्षा पास की, मुझे नौकरी तो करना नहीं थी परन्तु पी सी एस निकाली और राजपत्रित अधिकारी भी बन गया, बड़ी दुविधा थी नौकरी बिहार के एक जिले में मिली थी और जेल अधीक्षक का पद था. मेरे पिताजी से बात करने की हिम्मत नहीं थी क्योकि वे नौकरी में थे और बड़े सख्त थे, आसपास के गाँवों में उनकी तूती बोलती थी, पर मेरे बाबा यानी दादा बड़े दयालू थे और मै अक्सर उनके पास जाया करता था दुविधा की स्थिति में. वे हालांकि पढ़े लिखे नहीं थे पर उनका दुनियावी ज्ञान बहुत था और उन्होंने एक मास्टर लगाकर उस उम्र में संस्कृत और उर्दू जुबान सीखकर दो भाषाओं पर मास्टरी हासिल की थी. मैंने बाबा से कहा कि मुझे नौकरी नहीं करनी तो उन्होंने कहा कि देखो ऐसा है जीवन तो यूँ भी चल जाएगा अपने पास इतनी जमीन है कि थोड़ी मेहनत करोगे तो गुजर बसर हो जाएगा परन्तु दुनियादारी में रहना है, शादी ब्याह करना है तो नौकरी करना जरुरी है क्योकि उससे सामाजिक इज्जत मिलती है. यह सत्तर का दशक था और नौकरी करने वाले को समाज में बड़ा सम्मान था. लिहाजा बाबा की बात मानकर नौकरी अक्राने का तय किया पर बाबा से कहा कि बस तीन साल करूंगा और फिर लौट आउंगा छोड़कर. इस तरह से मै बिहार के एक जिले में जेल अधीक्षक हो गया इस आशा के साथ काम शुरू किया कि बस तीन साल में छोड़कर जाना ही है. एक साल के भीतर ही दुर्भाग्य से मेरे बाबा की मृत्यु हो गयी और फिर मै पिताजी के सामने नौकरी छोड़ने का कोई वाजिब कारण नहीं बता पाया. 

लिहाजा यह नौकरी मुझे दस साल करनी पडी. मैंने इस्तीफा दस साल बाद लिखा पर विभाग में आई जी के पद पर मेरे एक मित्र आ गए तो उन्होंने इस्तीफा स्वीकार नहीं किया और फिर एक सरकारी आदेश के तहत मुझे एक वर्ष का अध्ययन अवकाश लेकर कुछ पढाई करने को कहा. दस वर्ष की नौकरी के उपरान्त यह छुट थी की आप एक वर्ष का अध्ययन अवकाश ले सकते है. सो मैंने वह बात मानकर अवकाश के लिए आवेदन दे दिया. चूँकि मेरे मित्र ही आई जी  - जेल थे बिहार में सो अवकाश स्वीकृत हो गया. मैंने जेल में कैदियों की मानसिक दशा और निदान को लेकर मनो चिकित्सकीय अध्ययन का कार्य किया और अंग्रेजों के समय से चले आ रहे जेल मैन्युअल को नए सिरे से ज्यादा मानवीय होकर लिखना शुरू किया ताकि कैदियों को जेल में एक मानवीय गरिमा के अनुरूप जीवन मिल सकें. इस बीच एक साल कब ख़त्म हो गया पता नहीं चला, मैंने दूसरे साल के लिए भी अध्ययन अवकाश के लिए आवेदन कर दिया. परन्तु मेरी नौकरी के बीस वर्ष नहीं हुए थे अस्तु यह आवेदन निरस्त हो गया और मुझे आदेशित किया गया कि मै तत्काल प्रभाव से ड्यूटी ज्वाईन करूँ पर मै नहीं गया. मेरे आई जी दोस्त का स्थानान्तरण हो गया था अतः वह अवकाश पत्र कही विभागीय फाईलों में दब गया और मुझ पर लगातार यह दबाव बनता रहा की मै नौकरी ज्वाईन करूँ. पर जब पंछी को पिंजरे के बाहर छोड़ दिया जाता है तो क्या वह पुनः उसमे जाना चाहेगा.....बिलकुल नहीं अतः मैंने पिताजी की नाराजगी मोल लेते हुए अपना इस्तीफा भेज दिया. 


इस बीच अज्ञेय जी से लेकर हिन्दी के बड़े लेखकों से संपर्क होता रहा और मै लिख भी रहा था और लगातार छप भी रहा था. बनारस मुझे खींचता था. बस नौकरी के ओर फिर मुड़कर नहीं देखा. मेरे देयकों का भुगतान आज तक नहीं किया गया, मैंने लम्बी लड़ाई लड़ी परन्तु चूँकि इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ था अतः देयकों का भुगतान भी सम्भव नहीं था. अब पलटकर नहीं देखता 

(ज्ञानेंद्रपति जी......अपने अनुभव साझा करते हुए)

Thursday, June 25, 2015

इलाहाबाद का उजास और हिन्दी का समकालीन साहित्यिक जगत

इलाहाबाद में कई लोग मिले और कई मुद्दों पर बातचीत हुई और सबसे अच्छा यह था कि सभी मुद्दे साहित्य और कविता के इर्द गिर्द घूमते रहे. असल में इक्कीसवीं सदी के प्रस्थान बिंदु में बारे में बातचीत सिमट कर रह गयी और जैसाकि होता है कुछ लोग जान बूझकर विवाद खडा करने को कुछ नाम अक्सर व्योम में उछाल देते है जिससे सारी बातचीत एक तरफा हो जाती है, शुक्र यह है कि एक बड़ा वर्ग समझदार और मैच्योर था जिससे यह प्रयास असफल हो गया परन्तु महिमा मंडन हिन्दी की एक पुरानी  परम्परा है और इस समय हिन्दी में आत्म मुग्धता  का बड़ा दौर चल रहा है जहां लेखक एक मल्टीपरपज भूमिका में है. जाहिर है इसमे लिखना एक शगल, विचारधारा थोपना आदत और अपने को श्रेष्ठ साबित करना एक साहस है जिसे कई लोग बहुत सहजता से लेते है और क्योकि अब हिन्दी में अन्य भाषाओं की तरह से विशुद्ध लेखक बचे नहीं है वे एक विधा के निष्णात नहीं वरन वे कविता, आलोचना, कहानी, ब्लोगर, सम्पादक और प्रकाशक भी बन गए है. जाहिर है यह सब जुगाड़ और सेटिंग के बिना संभव नहीं है. 
इसके ठीक विपरीत पाषाण कालीन  मूर्तियों के बीच ऐसी भी जीवंत मूर्तियाँ विराजित थी जो बहुत सहजता से सबसे मिल रही थी और खुलकर अपने मन की बात सबसे कर रही थी. दिन भर बातचीत के बाद रात के अनौपचारिक सत्रों में भी वरिष्ठ साथियों ने जिस सहजता से अपने को खोला और पुराने अनुभवों को बांटा, साहित्य के पारंगतों और पुरोधाओं के चर्चे छेड़े वह अतुलनीय था. 
दो दिन के सत्रों की लम्बी थकान और लगातार दिमाग को जगाये रखना निसंदेह एक जटिल प्रक्रिया थी परन्तु उन कमरों में जो ऊर्जा थी वह बहुत प्राणवान थी. 
सबसे अच्छी बात यह थी कि इस सदी के आरम्भ में प्रयाग में इस कुम्भ में जो समागम हुआ वह शायद इन पंद्रह वर्षों में नहीं हुआ होगा कही. इतने सारे कवियों को देश भर से इकठ्ठा करना, इटारसी स्टेशन पर आग लगने से कई ट्रेन  कैंसिल हो गयी पर फिर भी आयोजकों ने आर्थिक भार वहन  किया और अधिकाँश लोगों को हवाई सुख उपलब्ध करवाया. वहाँ पर आलीशान होटल में व्यवस्था की स्थानीय विश्व विद्यालयों से लेकर मीडिया और अन्य लोगों को, साहित्य भण्डार, हिन्दी साहित्य सम्मलेन के लोगों को, मीरा फाउंडेशन आदि जैसी संस्थाओं को एक जगह एकत्रित करके यह महत्वपूर्ण आयोजन किया उसके लिए पूरा श्रेय दो लोगों को दिया जा सकता है - श्री अनिल मिश्र एवं कर्मठ जितेन्द्र श्रीवास्तव जिनके संयोजन के बिना यह ऐतिहासिक कार्यक्रम अधूरा रह जाता. निश्चित ही ये दोनों साथी कम से कम इस तरह के आयोजन के पाथेय तो है ही. 
इस अवसर पर ज्ञानेंद्रपति जी, केदार नाथ सिंह जी का सामीप्य मिला, ज्ञानेंद्र दादा के साथ तीन दिन का अपनत्व और स्नेह मिला उसको लेकर शीघ्र ही एक संस्मरण यहाँ पोस्ट करूंगा जो कम से मेरे लिए तो धरोहर ही होगा. इलाहाबाद से बनारस आते समय ज्ञानेंद्र दा ने अज्ञेय जी  को लेकर जो अदभुत बातें और अनुभव बांटे है वे बेहद महत्वपूर्ण है. 
शुक्रिया मित्रों, आज अनिल त्रिपाठी जी का फोन आया जिसमे उन्होंने मेरी कविता "सुनो ज्ञानरंजन" का जिक्र कर लम्बी बात की तो लगा कि कम से कम अपने मन की बात तो यहाँ लिख दूं . बाकी शेष रहा.......

Wednesday, June 24, 2015

Post of 24 June 15

सांसदों के भोजन के अधिकार पर यह गरीब मुल्क जिसके बच्चे भूख से मर जाते है, पर साठ करोड़ प्रतिवर्ष खर्च करता है.
शर्मनाक है या गर्वीला वक्तव्य




माननीय लोकसभा स्पीकर महोदया,
मोदी जी तो ज्यादा विदेश में रहते है और अमित शाह ही देश चला रहे है जैसे सोनिया जी चला रही थी, ये दीगर बात है कि मन मोहन जी देश में ही रहते थे. पर अब निम्न मामलों में आपसे कार्यवाही अपेक्षित है क्योकि आप अध्यक्ष है और नियम कायदे जानती है (?) चूँकि लोकसभा देश की सबसे बड़ी संस्था है जो सर्वमान्य और सम्मानीय है अतः देश हित में आपका निर्णय प्रशंसनीय होगा. आपने लोकसभा में लंबा समय गुजारा है और देश हित में कई काम किये है शायद, इंदौर की बात अलग है जहां लोगों ने आपको अंतिम बार मोदी लहर में मौका दिया था इस बार, अगर आप अब भी इंदौर के लिए कुछ ना कर पाई तो दीगर बात है पर देश के लिए तो कुछ कर दीजिये, आपके लिए यह आख़िरी कार्यकाल है, अतः अपेक्षा है कि लोक जीवन में आपके द्वारा स्थापित आदर्श आने वाली पीढ़ियों के लिए रोल मॉडल का काम करेंगे.
कृपया निम्न पर तुर्रंत कार्यवाही करें.
निहाल्चंद्र 
सुषमा स्वराज
स्मृति ईरानी 
पंकजा मुंडे
शिवराज सिंह चौहान 
अनेक सांसद जो गाहे बगाहे साम्प्रदायिक बयान देते है

इसके अलावा कल ही बनारस से लौटा हूँ, इलाहाबाद और बनारस में गंगा की हालत देखकर बहुत दुखी हुआ हूँ आपकी केबिनेट मंत्री सुश्री उमा भारती से अनुरोध करें कि जन भावनाओं को देखते हुए गंगा की सफाई का अभियान और अन्य प्रकल्प शीघ्र आरम्भ करें ताकि जन अपेक्षाओं जो प्रधान मंत्री द्वारा बनारस हिन्दू विवि के सुकोमल युवा छात्रों के मस्तिष्क से लेकर जन समुदाय में जगाई गयी थी, उन्हें कम से पूरा नहीं तो पच्चीस प्रतिशत ही अब शेष बचे कार्यकाल में पूरा किया जा सकें बजाय विदेश घूमने और अपने व्यर्थ के फेंकू भाषण देने के !!!
मेरे इन विचारों को देश हित में माना जाकर एक स्वस्थ रूप में आप लेंगी यह आप, आपके पार्टी के लोग और देश भर में फैले अंध भक्त और मीडिया में बैठे स्वस्थ मानसिकता वाले साथी और देश हित में सोचने वाले व्यक्ति लेंगे.
सादर 
देश भक्त हिन्दुस्तानी

Thursday, June 18, 2015

Post 16 June 15




कल रात बादल छा रहे थे सारी रात छत पर घुमते हुए लगा कि कुछ है जो खो रहा है, कुछ है जो घुल रहा है, कुछ है जो बारिश की बूंदों से होता हुआ सीधे अंदर उतर रहा है । बहुत देर तक बादलों के पीछे चलता रहा और खोजता रहा चाँद को! कल रात जल्दी के कारण देख नही पाया था । आज शाम होने के ठीक पहले वह छत पर आ गया, सूरज की मन्द होती लालिमा और बूझते सूरज को देखकर हालांकि वह दुखी जरूर था , पर चाँद के निकलने को लेकर बहुत आशान्वित भी था क्योकि उसने हर रात चाँद को देखा था। अपने कमरे के एक गमले में उसने चाँद को छुपाकर रखा था, यह गमले में छुपा चाँद वह अपने सख्त जूतों में छुपा ले जाता - जब वह खरगोश और चींटियों से मिलने दूर अक्सर जंगल में जाता । घने पेड़ों के बीच चलते चलते जब चाँद छुप जाता तो वह पगडंडियों के बीचो बीच अपने नन्हें से जूते खोलकर बैठ जाता और फिर उसमे चाँद को बाहर निकाल कर जी भरकर देख लेता और बातें करते करते नदी के तैरते पानी में एक उछाल मार कर सो जाता। यह उसके और चाँद के बीच एक मौन समझोता था जो धरती तारों को रास नही आता था। आज की रात फिर अपने गमले में छुपे चाँद को जूतों में छुपा वह खुली छत पर ले आया था, छत की सीढ़ियों को नदी के पानी सा उछलता पाकर उसने एक सांस में छत को पा लिया था पर चाँद आधी रात तक नजर नही आया, बेहद दुखी होकर उसने नीचे देखा तो सर्पीली सड़क पर एक बावली सी लड़की जाती नजर आई जो सड़क किनारे लगे पेड़ो को अपनी झोली में रखते हुए उद्दाम वेग से चींटियों के रथ पर सवार होकर आसमानी रास्ते पर ऊपर की ओर बढ़ती आ रही थी, उसे लगा कि उसका चाँद उसकी झोली में पड़े किसी पेड़ के फल के बीज में पड़ा मुस्काता होगा और अचानक वह फिर भोर के तारे को लपकने दौड़ा कि उसे अपने पास रखकर सारी मुरादें पूरी कर लें और शुक्र तारे को अपने जूते में छुपाकर नीचे ले आया। रोज की तरह सुबह का सूरज उसके कमरे में दाखिल हो रहा था और उसने देखा कि उसका चाँद उसके गमले में उग आया था, और शुक्र तारा एक बोन्साई का पेड़ बनकर उसकी छत से चिपक रहा है। वह जागते जागते फिर सोने का उपक्रम करने लगा।
रायन के लिए
ग्वालियर में

Saturday, June 13, 2015

Happy Marriage Party of Kushal and Gunjan 13 June 15




और लम्बी थकान, खंडवा यात्रा और बरसते मौसम, खुशनुमा काव्य संध्या का समापन हुआ हमारे युवा मित्र साथी Kushal Shrivas की शादी की खुशनुमा पार्टी से . मैंने कहा भाई मालवे में कहते है कि जो बन्दा या बंदी अपनी शादी में काम करता है उसके ब्याह में पानी गिरता है तेजी से तो काम क्यों किया हम लोग काहे थे यहाँ बुलवा लेते, बोला अचानक सब तय हुआ और हो गयी शादी. बहरहाल, गूंजन से मिलकर भी अच्छा लगा. बहुत सारी शुभकामनाएं और दुआएं..........कुशल और गूंजन के लिए.
सुबह से फील्ड में था, दोपहर खंडवा आया, सामान पैक किया, बस में लम्बी यात्रा, थकान, फिर आते ही कुमार जी के घर काव्य गोष्ठी, फिर कुशल की पार्टी और आकर सब कुछ दर्ज करना ताकि सनद रहें............सच में लगता है कि अभी बहुत दम है और इंसान चाहे तो सब कर सकता है और सहेज सकता है बशर्ते योजना हो, और समय की प्रतिबद्धता..........बस बाकी तो सब हो जाता है.



"व्यस्त समय और ढेर सारे काम"


कल से ग्वालियर 18 तक, फिर "उजास - हमारे समय में कविता" इलाहाबाद में कविता पाठ हेतु तीन दिन, फिर 23 से 30 तक शिवपुरी.........फिर पन्ना, बालाघाट और झाबुआ फिर रायपुर, दुर्ग और ना जाने कहाँ कहाँ...........सामान सौ बरस का और पल की खबर नहीं की तर्ज पर टिकिट दो महीने के और तन की खबर नहीं..........खैर अभी तो चलेगा यह शरीर.........नौकरी ना करके अच्छा हो रहा है, रोज का दिन एक उत्सव की तरह से बीतता है दोस्तों के साथ, अपनी पसंद के काम के साथ और दुनिया को नापते हुए कि चलते चलते कुछ सीख लूं पता नहीं कल हो ना हो..............!!!! लगता है कि इस जीवन में दुनिया  को नापते और गली कूचों से गुजरते हुए एक उम्र बीत जा ही रही है बस धीरे धीरे एक अनंतिम यात्रा की तैयारी हो रही है...........

पंडित कुमार गन्धर्व अकादमी, देवास में काव्य गोष्ठी 13 जून 15









देवास संस्कृति का बड़ा केंद्र है कोई माने या ना माने. आज यहाँ मभा हिन्दी साहित्य के तत्वावधान में एक छोटी सी कवि गोष्ठी रखी गयी थी. चूँकि मै खंडवा में था पर मित्र लोग आ रहे थे इसलिए काम ख़त्म कर तुरंत भूखा प्यासा भागकर आ गया फिर भी तसल्ली थी कि बावजूद बसों की लेट लतीफी और बरसात, ट्राफिक जाम के कारण देरी से पहुंचा तो सही. असली बात यह है कि यह छोटा सा किन्तु महत्वपूर्ण आयोजन कलापिनी ने अपने घर भानुकुल में रखा था, जहां आदरणीय पदमश्री वसुंधरा ताई के सानिध्य में उपस्थित कवि मित्रों ने कवितायें पढी. कुमार गन्धर्व अकादमी ने शास्त्रीय संगीत के साथ अब चित्रकला, विचार व्याख्यान, कला और साहित्य के लिए भी एक अच्छी पहल शुरू की है. कलापिनी ने बताया कि हर दो माह में अब इस तरह के कार्यक्रम नियमित होते रहेंगे. इसी दिशा में भाई मोहन वर्मा ने यह कार्यक्रम आयोजित किया. बरसात का सुहाना मौसम और भाई राग तेलंग की कवितायें साथ ही अशोक, संजय राठौर और देवास के मनीष शर्मा की कवितायें सुनना एक सुखद अनुभूति थी. इस सुहाने मौसम में और लगभग दाखिल हो चुके मानसून में यह कविता पाठ एक ऐतिहासिक कार्यक्रम बन गया. सबका शुक्रिया और बधाई कि बरसात के बाद लोग आये और पुरे धैर्य से कवितायें सुनी. भाई राग तेलंग ने अपना कविता संकलन भी मुझे भेंट किया जिसके लिए आभार ही कह सकता हूँ. 

Posts of 10 to 13 June 15




लौटना होता तो नही फिर भी हम लौट आते है कुछ जगहों पर निशाँ देकर और रिसते घावों को समेटते से जैसे लौट आती है बूँदें गरज और छींटों के साथ !!!

ये बारिश और धूप के बीच उमस अब तुम सी लगती है चिपचिपी और लिजलिजी जो सिर्फ तकलीफदेह है और कुछ नही.

भिगोती रही रात धीरे धीरे , घुलता रहा मैं इन बूंदों के बीच ! ओ सुबह कहाँ है तुम्हारा सूरज ? आसमान काला है और दूर किसी कोने से एक फटा हुआ कोना उजागर हो गया है जहां से वो रक्तिम किरणें बिखर रही थी पानी की बूंदों के बीच पता नही चला, अँधेरे की दहशत में कब दोनों एक हो गए अचानक....देख रहा हूँ कि पेड़ों के पत्ते हरे हो गए है और मिट्टी थोड़ी सी इठलाते हुए गीली होकर धंस रही है अपनी जगह छोड़कर.

सर्पीली सी काली रात में इन उजाड़ सड़कों पर भीगते हुए कुत्तों को मिमियाते हुए देखना त्रासद ही है, याकि किसी सूखते जा रहे पेड़ को जिसपर अचानक तेज फुहारें पड़ती हो और पत्तें बोझ भी ना सह पाएं और झूलने लगे मौत के दंश से डरते किसी जीवन की तलाश में ! यह बारिश का ही उपकार है कि हमें बूंदों के बीच से भिगोते हुए अपने भीतर के एक पर्व को महसूसने का वक्त देती है।

एक लड़की भीगी भागी सी गाने वाले स्व. किशोर कुमार के शहर के किसी होटल के एक कमरे में बैठकर तेज गरज की आवाजों से भीग रहा हूँ और बारिश की तेज फुहारों को धूप की आंच से निकलकर चंद्रमा को ढाककर आसमान से नीचे गिरते देख रहा हूँ। एक मटमैली सी दुर्गन्ध फ़ैली है फिजाओं में जो अब सुवास बनकर घुल रही है आहिस्ते से मेरे भीतर और इस सबमे यह कहना ही भूल गया हूँ कि ये मौसम की बारिश का पहला दृश्य है जो अब अंदर धंस रहा है और मैं इसे भींच लेना चाहता हूँ एक आईने के मुआफिक जो अक्सर झूठ बोलकर इन्ही बूंदों की तरह मेरे दर्प को , मेरे अहं को और सब कुछ को निचोड़ कर रख देता है!


हे शूरवीरों और महामानव उस ससुरे दाऊद को ले आओ या वही जाकर निपटा दो साले को बहुत ग़दर मचा रखा है और अब अपने देश के भीतर भी यही करो नक्सलवादी हो, आतंकी, सिमी के लोग , विरोधी हो कोई मर्द बलात्कारी हो, भृष्ट मानव जो व्यापम में शामिल हो, खनिज का पुजारी हो या ससुरा कल्लू पॉकेट मार.... घर में घुसो और टपका दो... वैसे भी ससुरी सेना को काम है नही कुछ.... निठल्ले मुफ़्त की दारु पीकर मेस में रोटी तोड़ते रहते है। सुन रहे है ना 56 इन्चियां मियाँ मुंह मिठ्ठू !!!

Tuesday, June 9, 2015

Post of 9 June 15



इतनी घटिया सरकार और निम्नस्तर पर बदला लेने वाली सरकार कभी इतिहास में नही आयेगी और आप कहते है कि विकेंद्रीकरण, लोकतांत्रिक और संविधान में विश्वास रखने वाली सरकार है. निहालचन्द्र जैसे बलात्कारी और 40 % घोर अपराधी लोगों के साथ लोकसभा में बैठे सांसदों के साथ और मप्र, में भ्रष्ट और छग में नर संहारों को बढ़ावा देने वाले मुख्यमंत्रियों को आश्रय देने वाली "पार्टी विद डिफरेंस" का क्या ? सवाल "आप" का नहीं और जीतेंद्र तोमर का नहीं बल्कि साधू संतों के भड़काने वाले बयानों, उमा भारती जैसे मंत्री जो राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के मामले में दोषी है, के साथ साथ खुद नेता गुजरात के भीषण नर संहार में शामिल है जिसे पुरी दुनिया जानती है, और आप बात करते है ईमानदारी और नैतिकता की !!!

देश की शिक्षा मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी की डिग्री चेक करने के येल विवि जाने की हिम्मत है दिल्ली पुलिस में ?

कितना शर्मनाक है एक तानाशाह का इस तरह का निर्णय जो एक विरोधी विचारधारा और चुने हुई सरकार को बर्दाश्त नहीं कर सकता और तो और यह बताईये कि कितने लोग यानी विधायक, सांसद, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, प्रशासनिक अधिकारी और काबीना मंत्री सच में दूध के धुले है ?

अब मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करके देश में संविधान को और तमाम व्यवस्थाओं को भंग करके एक नई व्यवस्था बनाने में सोचें. अन्यथा ना अब इस देश से प्यार है और ना कोई देश भक्ति की भावना बची है. शर्म आती है कि इस तरह के टुच्चे लोग हमारे नेता है चाहे वो केंद्र में बैठे लोग हो या जीतेंद्र तोमर या स्मृति, उमा भारती, राघव, निहाल चन्द्र, या कोई और.............!!!

Monday, June 8, 2015

Post of 8 June 15



इंतज़ार है अब रजत शर्मा, शंकराचार्यों, राम मंदिर अयोध्या के पुजारी और तमाम ऐसे लोगों को Z+ सुरक्षा देने का ताकि हम भारत के लोग ज्यादा मेहनत करें , रुपया कमाएं, टैक्स भरें, और हमारे जवान कड़ी मेहनत करें और रामदेव और मोहन भागवतों टाइप लोगों की सुरक्षा करें. सुरक्षा यानी देश की सुरक्षा की चिंता किसी को नही देश के भीतर जवान मरते रहें , सीमा पर मरते रहें।

क्या हो गया है मोदी जी को, ये सुषमा, मुरली जोशी, आडवाणी, गडकरी, जेटली, गोविदाचार्य, उमा, और जावड़ेकर या खुद राम माधव और मोहन भागवत जी चुप क्यों है ? क्या मोदी जी यानी हिंदुत्व और भाजपा के अकेले पर्याय हो गए है ? कांग्रेस के साठ साल तो बहुत गिनाये भक्तों ने अब सारे बुद्धिजीवी चुप क्यों है?

एक लोकतांत्रिक देश में एक तानाशाह का इस तरह से फैसले लेना उसी की पार्टी के लोगों का चूं भी ना बोलना बेहद घातक ही नही खतरनाक भी है।

और सबसे ज्यादा दुःख न्यायपालिका को लेकर हो रहा है जो राज दरबार में मुजरा कर अपने आकाओं को खुश करने में व्यस्त है. क्या है मोहन भागवत या रामदेव की सांविधानिक हैसियत जो ये जनता के रूपये से अपनी सुरक्षा ले रहे है। इसी को नाजीवाद या फांसीवाद कहते है ? शर्म आती है कि सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान ना लेकर ऐसे फैसलों का साक्षी बन रहा है। बन्द कर दो सारे ढकोसले और व्यवस्थाएं । धिक्कार है ऐसे देश पर जहां बच्चे भूख से मर रहे हो, एक भृष्टतम् मुख्यमंत्री जैन साधू के वश में है और देश की मुद्रा का उपयोग मानसून ना होने के अंदेशा होने के बावजूद यहां खर्च की जा रही है।

Sunday, June 7, 2015













A really Wonderful evening in Preeti Nigam's Marriage Party at Fortune Landmark Indore. It was an august gathering and met so many friends after such a long time that all was really overwhelming. Thanx Himanshu Shukla for such wonderful and really memorable pics. Thanx Preeti for this opportunity and we all wish you a very happy & prosperous married Life and Rewarding Future ahead.

It was also an opportunity to meet JanakandJimmy McGilligan Didi after her award ceremony of Padam Shree. Had a wonderful talk with her and very soon I will visit her for two days.

Really feel proud to be with such an enthusiastic team and people.

और इस खूबसूरत शाम का समापन रात्रि तीन बजे हुआ जब मै अपने परिजनों के साथ C - 21 माल से "दिल धड़कने दो" जैसी जोया अख्तर की लाजवाब फिल्म देखकर बाहर निकला. शुरू में समझ नहीं आ रही थी फिल्म क्योकि पार्टी और दोस्तों से मिलने का खुमार जोरो पर था, पर बाद में जब फिल्म  और इसके किरदार अन्दर घुलने लगे तो अदभुत लगी. विस्तार से फिर कभी, परन्तु सिर्फ इतना सीखा कि जब हम किसी से मुहब्बत करते है तो उसे आजादी भी दे दें थोड़ी ताकि वो सांस ले सके वरना घुट जाएगा सब कुछ. और चारो ओर कितना भी बड़ा समंदर हो - अगरचे हमारे पास एक तिनका भी हो तो वह जिन्दगी में तैरने के लिए पर्याप्त है - बस धैर्य बनाए रखे.

Post of 6 June 15


Indore School of Social Work, Indore की खबर पढी जिस तरह से इस संस्थान का स्तर घटा है पिछले कुछ बरसों में वह बेहद चिंतनीय है और आज तो हद तब हो गयी जब तृतीय सेमेस्टर के अधिकाँश छात्रों को फेल कर दिया गया. प्राचार्य जे टी थुड़ीपारा और एक महिला प्राध्यापक रंजना सहगल की आपसी लड़ाई का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है. सबसे बेहतर विकल्प है शासन इसे अपने अधीन ले लें क्योकि वैसे भी यह एक मिशनरी द्वारा संचालित है और प्रवेश, परीक्षा, परिणाम और प्लेसमेंट को लेकर यह महाविद्यालय अक्सर चर्चा में रहता है जिस पर अंकुश लगाकर तत्काल इस पर कार्यवाही की जरुरत है. मध्य प्रदेश के सबसे पुराने और एक समय में अच्छा माने जाने वाला यह संस्थान अब प्रदेश का सबसे घटिया संस्थान बन गया है.
पूर्व छात्र इस बारे में कुछ मोर्चा बनाकर काम करे ताकि दूर दराज से आने वाले बच्चे समाज सेवा का सही ककहरा सीख सके बजाय घटिया राजनीती और दांव पेंच सीखने के. पूर्व छात्र संघ सिर्फ साल में एक जलसा मनाने के बजाय इसे बेहतर रुप से चलाने में मदद करें. एक वो जमाना था जब प्राचार्य स्व डा फिलिप्स ने वर्तमान सरकार के एक केबिनेट मंत्री को फेल करके निकाल दिया था और एक आज है कि एक प्राचार्य का सारा समय इस महिला प्राध्यापक के लिए षड्यंत्र बुनने में सारा समय चला जाता है. और इस सबके बीच छात्र यहाँ वहाँ "बहकते और भटकते" रहते है. शासन इसे अधिग्रहित करें सरल और सीधा सा फार्मूला बस.

Friday, June 5, 2015

Posts of 5 June 15


गुम होता संसार 
************

रसोई में पड़े है बर्तन - कडछी से लेकर तवा 
चम्मच और प्लेट्स, थाली गिलास कटोरी  
घर से निकली तो था नहीं कुछ भी - माँ कहती थी 
फिर छोटी सी नौकरी और पुरे परिवार की देख रेख.

ननद -देवरों की पढाई, छोटे भाई - बहनों की चिंता 
सबकी शादी और फिर जापे में गृहस्थी ख़त्म हो गयी 
कैसे इकठ्ठे किये थे ये भगोने और यह परात 
यह चकला, ये बेलन और ये टूटी फूटी सी सिगड़ी.

शहर दर शहर में और मकान दर मकान में गुमा नहीं 
कोई चम्मच या फूटा नहीं एक भी तिडका हुआ कप 
माँ सम्हालती रही इकठ्ठे किये बर्तन, साजो सामान 
कभी फूट जाता अचार का मर्तबान, टूट जाती प्लेट.

दुखी हो जाती थी माँ और खाना नही खाती थी 
नौकरी से आने के बाद चौकन्नी निगाह रहती थी 
घर के हर कोने में कि ये झाडू के तिनके कम कैसे हुए 
अपने सारे कामों के बावजूद बर्तनों से मोह था उसे.

माँ की रसोई में हर बर्तन उसका एक स्नेहिल प्रेमी था 
करीने से रखे और सजे संवरे बर्तनों की खनक घर में थी 
माँ के हाथों में बर्तन यूँ मुस्काते थे मानो किसी परी के 
हाथों में मुस्काते है अनजान जगत के रत्न और माणिक.

पिता की मृत्यु के बाद रसोई में जाना कम था माँ का 
जब भी जाती तो जरुर पूछती कि वो झारा दिख नहीं रहा 
जो शान्ति ने दिया था पहली गोद भराई में मेरी 
थालियाँ गंदी है जो मंदा निम्बालकर ने दी थी बच्चों की जनेऊ में 

बाटी बनाने का ओवन आने से गैस ज्यादा खर्च होगा 
मिक्सी के बाद सिलबट्टा कैसे उदास हो गया याकि 
खल बत्ता जिसमे कूटे थे दरिद्रता के दिन और छानकर 
निकाले थे उजले स्वप्न जिससे हम सब गुलजार हुए.

अब नजर नहीं आता इस भड्भड में, ख़त्म हुआ सब 
बीमारी में भी चिता रहती थी कि पड़ोसन ने दी नहीं चलनी 
जो गर्मी में गेंहूं के लिए ले गयी थी - दो दिन का बोलकर 
तकाजा करती थी कि कही रात में बर्तन बाहर ना रह जाए.

बर्तनों को गुम होता देख रही थी माँ, फूट गए थे कुछ 
फेंके जा रहे थे कुछ और थैले में बंदकर रखे जा रहे थे 
बर्तनों की दुनिया बाजार से सपनों के बीच में खडी थी 
इस सबके बीच गुत्थम गुत्था थे हम सब और हंसी.

ना अब माँ है और ना बेशकीमती बर्तनों का संसार
जो उधारी और किश्तों के बीच हमारी दुनिया संवार गए 
गुमते रहते है, कोई परवाह नहीं करता अब किसी की 
कचरे की गाड़ी में फेंक दिए जाते है चम्मच और कड़छी.

फूट जाती है प्लेट और टूट जाते है मग धडाम से 
आवाजों के घेरे में सुनाई नहीं देती चीखें और क्रंदन 
एक रंगीला संसार है जहां उपयोग करो - फेंको के बीच 
हम सब अपने होने को अभिशप्त है बर्तनों की तरह.

छोटे होते जा रहे रसोईघरों से बर्तन गायब हो रहे है 
मशीने जगह ले रही है, खाने के टेबल पर सजे है स्वप्न 
ताम्बे, पीतल और कांसे का नाम शब्दकोष में जमा है 
माँ जैसी दुनिया की स्त्रियाँ बेचैन है सहेजने को सब !!! 

- संदीप नाईक 


Thursday, June 4, 2015

संकट में है मालवा की 'अनूठी कबीर परंपरा'

Posts of 4 June 15

2
 जनसत्ता 4 जून 15 में आज घरेलू काम करने वाली महिलाओं की स्थिति पर एक नजर



1
अबकी बार बेशर्मों की सरकार आई है मप्र में . व्यापम जैसे घोटाले में डूबी सरकार के आला अधिकारियों से लेकर राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री की पत्नी और उनके चहेते अधिकारी , ठेकेदार और भी कई लोग शामिल है. दुखद यह है कि इस काण्ड में सैंकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है परन्तु बेशर्मों की पेशानी पर कोई बल नहीं . सिर्फ यही नहीं प्रदेश में खनिज घोटाले भी बहुत हो रहे है, रोज़ माफिया अधिकारियों पर हमले करते है वे यह भी नहीं देखते कि अधिकारी महिला है या पुरुष. शिवराज मामा जाते - जाते हजार पीढी का रुपया लेकर जाना चाहते है, आज नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भी अपने विभाग के सचिव विवेक अग्रवाल को मुख्यमंत्री के यहाँ विभाग की जासूसी करने के बजाय काम करने की सलाह दे डाली, कितना घृणित है विवेक अग्रवाल जैसे एक ब्यूरोक्रेट का एक मुख्यमंत्री का निजी आदमी बन जाना.....!!!! यानी कुल मिलाकर बारह सालों में मामा जी ने जितना कमाना खाना था और प्रदेश का नुकसान करना था, कर लिया अब विदाई तय है.
देश और दुनिया के सबसे बड़े ब्रांड ईमानदार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के शकुनी अमित शाह और संघ के पितृ पुरुष मोहन भागवत अब भी इस बी बी सी की रिपोर्ट का भी कोई संज्ञान नहीं लेते है तो इससे बड़ी शर्म की बात और कोई नहीं होगी और इसका सीधा अर्थ यह है कि वे खुद भी शिवराज जी के साथ और उनकी पुरी भाजपा, संघ और मंत्री मंडल के निकटतम सहयोगी है और उनकी मौन स्वीकृति है इस "सद्कार्य" में .
जिस प्रदेश के मुख्यमंत्री को प्रदेश के कुपोषित बच्चों की फ़िक्र नहीं, जो एक समुदाय विशेष के लोगों और साधू संतों के दबाव में पोषण और कुपोषण के बड़े फैसले लेता हो, जिसे अध्ययन और वैज्ञानिक सोच से परहेज हो, जो गले गले तक डूबा हो भ्रष्ट आचरण और बदनामी में, उसे पवित्र संविधानिक पद पर बने रहने का क्या अधिकार है?
बहरहाल, यह बी बी सी की प्रामाणिक रिपोर्ट अगर गलत है तो प्रदेश सरकार वाया सुषमा स्वराज के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय अदालत में बी बी सी पर मानहानि का मुकदमा दायर करके सच्चाई सामने लाये या फिर राज्यपाल और मुख्यमंत्री इस्तीफा दे या सीधे - सादे नरेंद्र मोदी जो कहते थे मै देश नहीं झुकने दूंगा या भ्रष्टाचार ख़त्म करके ही दम लूंगा कोई कडा निर्णय लें.
हद यह है कि नेता, शासन और प्रशासन मिलकर प्रदेश को चुना लगा रहे है और प्रदेश के नपुंसक लोग और जिम्मेदार लोग कुछ नहीं कर रहे , दलाल मीडिया और लचर क़ानून व्यवस्था में सब जायज है यही सिद्ध होता है शायद.........है कोई जो इन लोगों के खिलाफ सड़क पर आन्दोलन करें, कांग्रेस तो अब अपना नुक्ता घाटा कर ही चुकी है और बाकी कामरेड लोग, समाजवादी और बसपा के लोग ठेकेदारी से रुपया कमा रहे है. तो बचे कौन गरीब गुर्गे जो किसी तरह से जिन्दगी बचा कर जीने का उपक्रम कर रहे है.
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/06/150602_mp_vyapam_scam_rd


Wednesday, June 3, 2015

मालवा के कबीर भजन विचार मंच – पुनर्जीवित पर संकट में एक स्वस्थ परम्परा



मालवा के कबीर भजन विचार मंच – पुनर्जीवित पर संकट में एक स्वस्थ परम्परा

संदीप नाईक

रात का समय है, ठण्ड अपने चरम पर है, चारो ओर कुहासा है, खेतों से ठंडी हवाएं आ रही है, बिजली नहीं है परन्तु गाँव के दूर एकांत में कंकड़ पर लोग बैठे है, बीडी के धुएं और अलाव के बीच लगातार भजन जारी है और सिर्फ भजन ही नहीं उन पर जमकर बातचीत भी हो रही है कि क्यों हम परलोक की बात करते है, क्यों कबीर साहब ने आत्मा की बात की या क्यों कहा कि हिरणा समझ बूझ वन चरना। लोगों की भीड़ में वृद्ध, युवा और महिलायें बच्चे भी शामिल है. यह है मालवा का एक गांव। यह कहानी एक गांव की नहीं कमोबेश हर गांव की है जहां एक समुदाय विशेषकर दलित लोग रोज दिन भर जी तोड़ मेहनत के बाद शाम को अपने काम निपटाकर बैठते है और सत्संग करते है, कोई आडम्बर नहीं, कोई दिखावा नहीं और कोई खर्च नहीं. ये मेहनतकश लोग कबीर को सिर्फ गाते ही नहीं वरन अपने जीवन में भी उतारते हैं। 

देवास का संगीत से बहुत गहरा नाता है इस देवास के मंच पर शायद ही कोई ऐसा लोकप्रिय कलाकार ना होगा जिसने प्रस्तुति ना दी हो. और जब बात आती है लोक शैली के गायन की तो कबीर का नाम जाने अनजाने मे उठ ही जाता है. यह सिर्फ कबीर का प्रताप नहीं बल्कि गाने की शैली, यहाँ की हवा, मौसम, पानी और संस्कारों की एक परम्परा है, जो सदियों से यहाँ निभाई जा रही है. गाँव गाँव मे कबीर भजन मंडलियां है इसमे वो लोग है जो दिन भर मेहनत करते है- खेतों मे, खलिहानों मे और फ़िर रात मे भोजन करके आपस मे बैठकर सत्संग करते है और एक छोटी सी ढोलकी और एक तम्बूरे पर कबीर के भजन गाये जाते है. किसी भी दूर गाँव मे निकल जाईये यह रात का दृश्य आपको अमूमन आपको हर जगह दिख ही जाएगा. इन्ही मालवी लोगों ने इस कबीर को ज़िंदा रखा है और आज तक, तमाम बाजारवाद और दबावों के बावजूद भजन गायकी की इस परम्परा को जीवित रखा है शाश्वत रखा है आम लोगों ने जिनका शास्त्रीयता के कृत्रिमपन से कोई लेना देना नहीं है. 

बात बहुत पुरानी तो नहीं पर पिछली सदी का अंतिम दशक था जब हम लोग एकलव्य संस्था के माध्यम से देवास जिले कुछ जन विज्ञान के काम कर रहे थे शिक्षा, साक्षरता, विज्ञान शिक्षण के नए नवाचारी प्रयोग, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में भी कुछ नया गढ़ने की कोशिशें जारी थी. एक दो बार हमने घूमते हुए पाया कि मालवा में गाँवों में कुछ लोग खासकरके दलित समुदाय के लोग कबीर को बहुत तल्लीनता से गाते है और रात भर बैठकर गाते ही नहीं बल्कि सुनते और गाये हुए भजनों पर चर्चा जिसे वे सत्संग कहते थे, करते है. यह थोड़ा मुश्किल और जटिल कार्य था हम जैसे युवा लोगों के लिए कि दिन भर की मेहनत और फिर इस तरह से गाना बगैर किसी आयोजन के और खर्चे के और वो भी बगैर चाय पानी के. थोड़ा थोड़ा जुड़ना शुरु किया, समझना शुरू किया, पता चला कि कमोबेश हर जगह हर गाँव में अपनी एक कबीर भजन मंडली होती है. बस फिर क्या था दोस्ती हुई और जल्दी ही यह समझ आ गया कि भजन गाने की यह परम्परा सिर्फ वाचिक परम्परा है. 
पिछले सैंकड़ों बरसों से यह गाने बजाने की परम्परा मालवा में चली आ रही है. कबीर भजनों की इस परम्परा का पता जब एकलव्य संस्था के लोगो को लगा था तो सबसे पहला प्रश्न यह था कि इन लोगों में दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद ऊर्जा कहां से आती है कि रात भर बैठकर भजन गाते है और खुलकर चर्चा करते है.

स्व नईम जी और दीगर लोगों से सीखा कि कबीर की वाचिक परम्परा मालवा और देश के कई राज्यों में बरसों से जारी है और स्व पंडित कुमार गन्धर्व ने भी इसी मालवे की कबीर की वाचिक परम्परा से प्रभावित होकर बहुत कुछ नया गुना, सुना और बुना था. बस फिर दोस्ती हुई नारायण देल्म्या जी से जो तराने के पास के गाँव बरन्डवा के रहने वाले थे वे हमारे गुरु बने, फिर प्रहलाद सिंह टिपान्या जी से दोस्ती हुई धीरे धीरे हमने देवास में एकलव्य संस्था में एक अनौपचारिक "कबीर भजन एवं विचार मंच" की स्थापना की. हमारे साथी स्व दिनेश शर्मा इस काम में जी जान से जुट गए और हम लोग भी साथ में थे. हमारे साथ डा राम नारायण स्याग थे, मार्ग दर्शन के लिए.
हर माह की दो तारीख को आसपास की मंडलियाँ आती भजन गाती और सत्संग होता. बहुत वैज्ञानिक धरातल पर बातचीत होती थोड़ा शुरू में विवाद हुआ क्योकि जिन पाखंडों और दिखावों का कबर विरोध करते थे ये मंडलियाँ उन्ही बातों को करती थी फिर लम्बी चर्चा होती और धीरे से हम सीखते कि इस वर्ग में चेतना बहुत जरुरी है और यह कबीर के माध्यम से निश्चित ही आ सकती है. भारतीय इतिहास और अनुसंधान परिषद् के सहयोग से हमने एक छोटा सा दस्तावेजीकरण करने का कार्य अपने हाथों में लिया जिसमेहम इस वाचिक परम्परा को लखित रूप में दर्ज कर रहे थे. होता यह था कि दिनेश मै या अन्य साथी कबीर मंडलियों के साथ बैठते और जो वो गाते या बोलते थे या उनके पास कोई डायरी होती हम उसमे से लिख लेते उसे टाईप करा लेते और फिर कबीर के मानकीकृत बीजक में से मिलान करते और फिर मंडलियों से चर्चा करते कि यह शब्द क्यों बदला गया या अर्थ क्या है आदि आदि. प्रहलाद जी की पहली भजन के कैसेट डा सुरेश पटेल के साथ हम लोगों ने सतप्रकाशन इंदौर से बनवाई थी और फिर यह लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि इसका जिक्र करना ही मुश्किल है. गत वर्ष प्रहलाद जी को पदम् श्री से विभूषित किया गया है. इस बीच कबीर भजन विचार मंच का काम बहुत आगे बढ़ा तथाकथित कबीर पंथियों को इस कार्यक्रम से दिक्कतें भी हुई. 



साहित्य, ललित कलाओं और गीत संगीत मालवा की खासियत रही है। शास्त्रीय संगीत के मूर्धन्य गायक पंडित कुमार गन्धर्व ने इस शहर को अपने जीवन में जो स्थान दिया वह तो सभी जानते है। टीबी जैसी बीमारी होने के बाद जब उनका एक फेफड़ा निकाल दिया गया तो हवा बदलने के लिए वे इस शहर में यहां आये और फिर यही के होकर रह गए, बीमारी के दौरान जब वे अपना इलाज करवा रहे थे तो अपने आसपास कबीर मंडलियों को इकठ्ठा कर लेते थे और ध्यान से सुनते थे. कालान्तर में उन्होंने बाकी सब छोड़कर कबीर की ऐसी चदरिया बुनी कि सारी दुनिया देखती रह गयी। इस बीच स्टेनफोर्ड विवि अमेरिका से प्रोफ़ेसर लिंडा हैज़ हमसे एक बार आकर मिली तो उन्हें यह बहुत अच्छा लगा और फिर उन्होंने ऐसा काम हाथ में लिया कि पिछले दस वर्षों से वो यही काम कर रही है. इस बीच वे प्रहलाद जी को अमेरिका ले गयी. वहाँ उनके कार्यक्रम कई विश्व विद्यालयों में करवाए है. प्रो. लिंडा ने खुद हिन्दी सीखी और गहरा काम किया आज वे देश-विदेश में कबीर की वाचिक परम्परा की विशेषग्य है. मालवा के भजनों और कबीर की सुवास लिंडा के लिए यह काम बड़ा आश्चर्यजनक था कि कैसे सैकड़ों बरसों से लोग वाचिक परम्परा को निभाते चले आ रहे है, बस फिर क्या था लिंडा पहुँच गयी मालवा और गांव-गांव में घूमकर भजन इकठ्ठे किये। भजनों का अंग्रेज़ी अनुवाद किया गया और फिर ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस से उनकी किताबें आई। लिंडा यही नहीं रुकी उन्होंने देश में और अमेरिका में भी मालवी भजनों को पहुंचाया। प्रहलाद सिंह तिपान्या और उनकी मंडली को तीन माह तक अमेरिका के दर्जनों विश्वविद्यालयों में घुमाया और उनके कार्यक्रम आयोजित किये। बेंगलुरु की शबनम वीरमनि ने जब यह सुना तो वे भी दौड़ी चली आई और चार फिल्में फोर्ड फ़ौंडेशन के साथ मिलकर बना डाली। इस तरह से मालवी कबीर के भजनों की प्रसिद्धी देश-विदेश में पहुंची. प्रहलाद सिंह टिपान्या को भारत सरकार ने पदमश्री से समानित किया. मालवा के अंचल में पसरी यह निर्गुणी भजनों की यह वृहद और सशक्त परम्परा इस बात की इस परंपरा के जरिये समाज के निचले तबके से बदलाव की कोशिशें जारी है। 

पिछले कई बरसों में यह कबीर भजन एवं विचार मंच का काम छुट गया था परन्तु आस पास के लोगों में एक बेचैनी थी कि कैसे इस काम को शुरू किया जाए क्योकि इस कार्य के पहले हिस्से में एकलव्य संस्था ने आर्थिक सहयोग जुटाया था और भारतीय इतिहास अनुसन्धान एवं शोध परिषद् से अनुदान भी लिया था परन्तु अब यह मामला थोड़ा टेढा था. नारायण जी को सबसे ज्यादा दुःख था कि एक अच्छा कम बंद हो गया था. नारायण जी बताते है कि पहले इस तरह के कार्यक्रमों से हमारे दलित समुदाय में चौका आरती करके कबीर गाने वालों की संख्या ज्यादा थी और यह सब ब्राह्मण समाज की नक़ल था जिसमे समाज के गरीब लोग फंसते थे, और उनका आर्थिक शोषण भी कबीर पंथी करते थे, भजन विचार मंच शुरू होने से इस बुरी प्रथा पर गहरी चोट पडी थी, और यह काम नौ दस बरस चलने के बाद बंद हो जाना दुर्भाग्य पूर्ण था. अतः हमने तय किया कि हम इसे फिर से शुरू करेंगे सबसे बड़ा संकट वित्त का था क्योकि मंडलियों को आने जाने का किराया देना, उनके खाने और एक रात रहने की व्यवस्था करना मुश्किल था. सो हमने दोस्तों के साथ यह कम हाथ में लिए और शबनम वीरमणि, रवि गुलाटी, राम नारायण स्याग, अरविन्द सरदाना, आसिफ शेख, राजेश खिन्दरी, सुरेश मिश्र प्रोफ़ेसर लिंडा हैज़, आदि जैसे दोस्तों ने शुरुआती दौर में मदद की और हमने 2 जून 2014 को फिर से कबीर भजन विचार मंच की शुरुआत की. इस साल में हमने महिला मंडलियों को ज्यादा आमंत्रित किया और उनसे बात की क्योकि सबसे ज्यादा वे ही आध्यात्मिक शोषण की शिकार होती है. अस्तु ज्यादा मंडलियाँ महिलाओं की आई और उनसे हमने भजन भी सुनें और चर्चा भी की. कबीर के साथ मीरा, रविदास, गोरखनाथ, आदि जैसे संतों की बातों का सत्संग किया. अब आगे यह है कि हम इस काम को जारी रखना चाहते है पर वित्त और जगह की बड़ी समस्या है, यदि देवास नगर निगम हमें कोई जगह माह की हर 2 तारीख को निशुल्क मुहैया करवा दे तो हमें दिक्कत नहीं होगी. हमारा मानना है कि इस समय कबीरदास का लिखा दर्शन और जीवन पद्धति बहुत मौंजू है क्योकि समाज में स्थितियां विकट होती जा रही है. सत्तर साल के नारायण जी गत 55 बरसों से कबीर के साधक है और भजन गा रहे है उन्होंने कबीर को जिया है और लोगों को जीना सिखाया भी है.

यह जरुरी है कि मालवा की इस जागृत लोक परम्परा को संरक्षित रखा जाए और जो बेहतरीन काम हुआ है उससे सीख लेकर आगे बढ़ा जाए. स्थानीय प्रशासन और सुशासन के प्रतिनिधि इस काम को आगे बढ़ाकर इसमे एक नई  भूमिका अदा कर सकते है साथ ही पंडित कुमार गन्धर्व संगीत कला अकादमी, देवास इसमें महत्वपूर्ण रोल अदा कर सकती है.

http://khabar.ibnlive.com/blogs/sandip/kabir-das-malawa-378275.html


Posts of 3 June 15


Common Wealth Local Development Team in Indore 


Visit to Indore under Commonwealth Local Economic Development Programs for Indore and Jabalpur. Two friends, who are experts in the said field are in Indore for a week. Ms Dawn French from UK and Ms Letticia Naid from South Africa. Good to learn how small town's people and women from poor families developed their own empire, enhanced family income and involved them selves in economic growth, which ultimately turned into quality life, better nutrition for all and best health and education for their wards. 


Interstingly entire activities were supported by Local Governance thats Municipal Corporations. Now here in MP we are exploring how our local governance can or should support for such things apart from their day day to steriotyped jobs - cleanliness, light, sanitation and roads. After this in July few of our MP representatives from indore, jabalpur and Bhopal will visit UK and South Africa as well to see the works being done by these people.



Best part is that in MP state  4 Municipal Corporations ie Indore, Bhopal, Jabalpur and Gwalior are deeply involved in a project called "Safe City Initiatives", supported by DFID and Deptt of Urban Development and Environment, Govt of MP for women safety - which has become an ideal and inspirational work for other states and the project has set up a PACE in the vicinity. Lots of women, youths and individuals are coming up to say a Big No to Violence against Women.


2
शाम ने धुप के आँचल को समेटते हुए देखा और फिर सोचा कि छोडो इसे, आठ दस घंटे जलकर जो अपना खुद का ही सर्वस्व मिटा दें उससे क्या बात करना और ऊपर से सूरज के भरोसे जो सुबह शुरू करें और शफक के साथ डूब जाये उससे क्या इश्क या नफरत करना !!!

3
भिया मैं तो खुद अपनी कमाई से अपना मंदिर बनवा रिया हूँ और साला उसमे जाने कूँ मेरे से इच परमिसन लेना पड़ेगा साला तुम सब लोग आजादी के इत्ते सालों बाद भी जाती प्रमाण पत्र नई लाया तो परिधान मंत्री को मेरे मन्दिर की व्यवस्था समिति में रख लूंगा! समझे की नई तुम ब्लडी इन्डियन लोग !!!!

Tuesday, June 2, 2015

Posts of 1 June 15


3
आंगनवाड़ी में अंडा देने के लिए जो सरकार पत्रकार और जैन मुनियों की सलाह लें बजाय पोषण विशेषज्ञों और NIN जैसे संस्थानों के विश्वसनीय लोगों और अध्ययनों के, वह दर्शाता है कि सरकार किस तरह के भ्रामक, ठस और जाहिल लोगों के झुण्ड से घिरी है। प्रोटीन के सरल, सस्ते और सुपाच्य स्रोत को आखिर पोषण का हिस्सा बनाने में क्या दिक्कत है । असल में शिवराज जी की रूचि कुपोषण में नही सुपोषण में है जोकि जग जाहिर है। ऐसे में साथी सचिन जैन को धमकी भरे फोन आना कितना दुर्भाग्य पूर्ण है ।
सच है यह मप्र है जहां सब गजब है। बेहद शर्मनाक है इस तरह से जमीनी काम करने वालों को धमकाना, घर से तुम्हे उठवा लूंगा जैसी आश्लील भाषा में धमकाना।


2
इंडिया टी वी को कैसे मालूम पड़ा कि नए CVC के वी चौधरी होंगे. सिर्फ इसी चैनल को कैसे यह खबर गयी ?
यह तो राष्ट्रपति के पास फाइल गयी है और तो और सूचना आयुक्त का नाम भी विजय शर्मा का नाम भी श्रद्धेय पद्म विभूषण रजत शर्मा ने घोषित किया
और आप कहते है कि वे पत्रकार है सरकारी भोंपू नही !!!!


1
अपने को मानना अपने को ही खारिज करने समान है और इन दोनों के बीच जो है, किंचित सा मोह और जीने का भरम - वह साँसों के उतार - चढ़ाव का सर्ग और पतन ही आस्थामयी जीवन है , जो अंततः हमे कही का नही छोड़ता और हम एक उहापोह में पाषाण से होकर निर्लिप्त से होते हुए मिट्टी में मिल जाने को अभिशप्त होते जाते है। कालांतर में वाचाल और मूक के बीच भाषा के अनुष्ठान में अपने को झोंक देने के बावजूद भी हम धैर्य से जीने की निषणात कला में पारंगत होकर भी सब कुछ खो ही देते है- जैसे सूख जाती है नदियां और खारे हो जाते है समन्दर, जैसे खिर जाते है पत्ते और खोखली हो जाती है जड़े और एक दिन दीर्घ काया का प्रतिमान समूची क्षण भंगुरता को बूझने के बाद भी आरोह अवरोह कर अग्नि की दैदीप्तमान ललनाओं के बीच धूं धूं कर भस्म हो जाता है , बस बच जाती है तो वे मजबूत हड्डियां जो किसी संकल्प और दैत्यों के सामने भी डिग नही पाई और देती रही ढाढ़स कि जियो और चलते रहो !