Thursday, April 30, 2015

Posts of 30 April 15


1.

जिस अंदाज में राहुल यात्रा कर रहे है , मोदी पर आक्रमण कर रहे है , किसानो से मिल रहे है - इससे दो संभावनाएं है
1- या तो अगले चुनावों में 440 सीट कांग्रेस को मिलेगी या
2- ये 44 सीटें भी साफ़ हो जाएंगी।
 — feeling confused.

2.

Sandip Naik का कहानी संग्रह मैं तीन महीने पहले पढ़ चुका था, कुछ कहानियां बाकी थी...कल ट्रेन में 'उत्कल एक्सप्रेस' और 'अनहद गरजे' भी पढ़ी ....संदीप मज़ेदार किस्सागोह हैं....उनकी कहानियां आपको मालवा की खुशबू भी महसूस करवाएंगी और अपने साथ बहा भी ले जाएंगी... उनका लिखने का अंदाज़ भी अलहदा है, ठेट अपना अंदाज़...जो आपको बाकी समकालीन अफशानानिगार से मेल खाता हुआ नहीं लगेगा. अब पारिजात पारिजात के हिस्से ''नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएँ''.!!

  

3.

देवास शहर में सांसद ने आज ग्यारह माह बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं किया, ना विकास ना कोई और काम- यहाँ तक कि उनके दर्शन भी दुर्लभ है- जनता की सेवा का क्या करेंगे, यह तो खुदा ही जानता है.........और रहा सवाल पानी जैसी  प्रमुख समस्या का तो फिर एक बार गर्मियां सामने है और इंदौर से भीख मांगकर नगर निगम क्षिप्रा नर्मदा  लिंक पर काम कर मात्र 2016 (स्रोत नईदुनिया)  नलों में पानी देगी - यह सब नायक और महानायकों की लड़ाई का परिणाम है . सीधी बात है जब तीस सालों में विकास नहीं हुआ तो ग्यारह महीनों में आयातित सांसद से उम्मीद लगाना गलत है. जब स्थानीय नेतागण कुछ नहीं कर पा रहे - ट्राफिक के सिग्नल ,ना नाले और सीवेज की समस्या, ना टेकडी पर रोप वे पञ्च छः सालों में लगवा पा रहे तो बाकी क्या उम्मीद करें कि लोकतंत्र में किसी गरीब गुर्गे की कोई समस्या हल होगी. कहने को जिले में चार सांसद, पांच छः तगड़े विधायक है - पर जिले का जो नुकसान हुआ है उसके लिए कोई कुछ नहीं करता,  प्रशासन के टुच्चे अधिकारी जो आते जाते रहते है, जिले में अपनी मन मर्जी चलाते रहते है और इन सबको ग़च्चा देकर अपनी झोली भरकर चले जाते है, एक नगर निगम में आयुक्त थे, जिन्होंने निजी कॉलोनी में अपने घर के आगे आज तक बैरियर लगा रखा है एक कॉलोनी की सार्वजनिक  सड़क पर, जबकि अब तो वे आयुक्त , कम से कम देवास में नहीं है इस समय - बाकी क्या उदाहरण दूं दादागिरी के प्रशासनिक दादागिरी ? बस स्टेंड पर एजेन्ट की बदतमीजी से एस पी नहीं निपट पाते, या सड़क पर मैजिकों की दादागिरी या बसों में ओव्हर लोडिंग........बाकी तो सब ठीक ही है, कारखाने बंद हो रहे है, रोजगार नहीं पर अपराध बढ़ रहे है, शासकीय अस्पताल का सत्यानाश हो गया, जिला पंचायत के बुरे हाल, एक ढंग का पार्क नहीं .....
यह सब याद इसलिए आ रहा है कि पिछले साल अप्रेल हमने चुनाव में वोट देकर फिर से अपने आपको धोखा दिया था, है कोई देश में सुप्रीम कोर्ट जो इन गैर जिम्मेदार नेताओं को एक बार हिम्मत करके पूछ सकें कि कहाँ हो जनाब आप, कब तक सोते रहोगे........? और अभी सांसद निधि और विधायक निधि का हिसाब तो पूछा ही नहीं है.........सोच रहा हूँ कि सूचना के अधिकार के तहत लगा दूं आवेदन कि ज़रा बताया जाए कि इन निधियों का जिले के लिए जन कार्यों के लिए कितना उपयोग हुआ है? यानी सीधी सीधी बात कि ACCOUNTABILITY क्या होता है माननीय जन प्रतिनिधियों...........???


Wednesday, April 29, 2015

Post of 29 April 15 अम्बर की कवितायें एवं अन्य


Umber Ranjana Pandey​  

अम्बर मेरा प्रिय कवि है आज उसके कवितायें आम को लेकर है और अदभुत व्यंजना और उपमा का इस्तेमाल करते हुए उसने आम को लेकर एक विषद व्याख्या प्रस्तुत की है. ये चार छोटी कवितायें बेहद संजीदा है और कई अर्थ खोलती है जहां वे बचपन से किशोरावस्था की दहलीज पर एक युवा किस तरह से आसपास की चीजों को देखता समझता है और उसके मन मस्तिष्क में क्या रहता है- खासकरके आकार और बिम्ब को लेकर, वही वह यह भी देखता है कि हमारे समय में इन फलों या आकारों की दुनिया क्या है. आम के विभिन्न प्रकारों को एक विशेषण से समझाते हुए और व्याख्या  करते हुए मुझे पिछले बरस के लखनऊ के दिन याद आ गए जब लखनऊ से हरदोई जाते समय आमों के विशाल बगीचों से गुजरना पड़ता था और वो मादक खुशबू पागल कर देती थी जब तक कि उतर कर दो - चार गुठलियाँ चूस नहीं लेता या झोला भरके ले नही आता घर पर और सारा दिन खाता रहता था, शायद उतने आम मैंने अपनी जिन्दगी में कभी नहीं खाए थे, आज जब आम का मौसम एक बार फिर बौरा रहा है तो अम्बर की ये कवितायें मुझे उस मीठे स्वप्न में ले जाती है,  जहाँ मुग़ल काल है - किस्से है, कहावतें है, पहेलियाँ है और एक फलों के राजा सा होने का अहसास है. 

















तर्ज़-ए -बाबू महेश आम पे चन्द सतरें


जिसके किनारे किनारे बहती हो 

ऊपर ऊपर तक भरी नालियाँ 
और 
जूने मकान सिर जोड़े-
ऐसी तंग, दुश्वार कू-ए-माशूक़ में 
घाम में जब वो निकलती 
हांफती सूरत सांवली ज़र्द पड़ जाती.


ठीक उसी वक़्त अमलतास 
ऐसा फूला फूला दिखता जैसे 
आज हो इसका ब्याव.

ऐसी दुपहर जो कि 
ज़रा ज़रा ज़र्द हो और ज़रा सांवली 
जैसे वस्ल के दौरान उसकी कैफियते चश्म

तब उसी वक़्त निकलता माथे पे धरे 
आम का टोकना 
कूचा बकूचा फिरता, गर्मियों की 
शुरुआतें है तो बाजार में बस सिन्दूरी आम-

अमां महेश बाबू 
तुमने बम्बई बाजार इंदौर में कब 
बना लिया अपना स्टूडियो-

एक किसी शीशाखाने जैसी ईमारत की खिड़की 
चिक़ ज़रा ढरकी हुई-
शमशेर बहादुर सिंह का न्यूड खींच रहे हो. 
आब रंग में डूबी कूची- जान पड़ता है 
कुर्कुम जैसा कोई रंग घोल रहे है.

बाहर फ़ाख्ते कूकू करते -
पतरे के पनारे से औंधा लटका हुआ है 
विष्णु खरे का घोस्ट-
न रदीफ़ न क़ाफ़िया बस बड़बड़ाए चले जाता है.

''कोई खामीखोज है- 
उस और 
जहाँ नर्ममिज़ाज भंड लौंडे 
गाँजा फूंकने के बाद एक दूसरे के 
नर्मए गोश चूम रहे हैं 
और काट रहे है बाहर से हरा 
मगर अंदर से नर्म, रेशेदार गूदे वाला आम.

उनके चाक़ू चलाने के ढंग में 
यह इफ्रीत खामियां खोज रहा है.

गाँजे और आम का इश्क़ 
जसद और रूह की तरह है- 
आम जसद है मगर उससे अव्वल 
रूह हुई-
इसलिए जहाँगर्द पहले चिलिम में 
गाँजा ऐसे सुलगाते है 
जैसे कोई अपने जिगरी को 
जस्ता जस्ता छूकर अंदर अंदर से 
नमनाक करता हो.
ऐसे गाँजे से 
अच्छे अच्छे जिगरसोख्ताअों को 
तस्कीन होती है. 
उस पे आम की फाँक-
आह, इश्क़ के ऊपर तसव्वुफ़ 
तो ऐसे गाँजे के ऊपर आम की 
फाँक चखने पे 
'लंड लंड ' बकने वाला भंड वली 
हो जाए है.

''अजी, इसे इस भूत को 
खामीखोज नहीं खामीनवीस कहिये'' ऐसा कहकर 
ठठाकर हँसते है वो.

इतना इब्ता किया आम 
मेरी चिलिम से जली ज़बान के कुरूह पे रखने को 
तेरी फाँक 
कब से फांक रहा हूँ जहाने फानी 
की गर्द 
ऐसी कुर्बत ऐसी कुर्बत 
कि बस.

(अम्बर की फेसबुक वाल  से आज 11/05/16 को)

आम 
कालि बाबू , ग्रीष्म को ऋतु
रूप में गढ़ना आप ही को 
मुबारक। धैर्यवान कोई
सिनेमा वाला यदि दिनों तक
आम के वृक्ष का चलचित्र
बनाये फिर फ्रेमें लैप्स
कर के द्रुतगति में दिखाएँ -
पत्र, बौर, कैरी, पका आम
यूँ चरणों में मेरे भीतर
गर्मियों के दिन भरें है, कवि.
आम्र की विविध जातियों के
फलों के मंडी में आगमन
से पता पड़ता है कि पहुंचा
है निदाघ कहाँ तक और अब
कितनी शेष है गर्मियां की
छुट्टियां. स्कूल तो तुम कभी
गए नहीं कवि और हो गए
कवि!

तोतापुरी

तिथि एकादशी के स्तन हो ज्यों चिरंतन
कठोर किन्तु रस में रूचि नहीं. बाबा जब भी
मंडी से लौटते; उनके झोले में धरे
ऐसे लगते जैसे कोई चिड़ीमार के
चितकबरे पोटले में तोतों का झुण्ड. फिर
थोड़ा बड़ा हुआ तब दूसरा चित्र सूझा
द्वादशी के स्तन लगे तोतापुरी और
इसका वैष्णव के पंचांग से सम्बन्ध
नहीं था. नुकीले, गेंदे के रंग वाले
किन्तु पककर रस से झुके नहीं थे.

चौंसा 

लेट-लतीफ़. दशहरी जितना मशहूर भी 
नहीं मगर इसका मुलायन गूदा दिलाता 
है याद जाते ज्येष्ठ के अपराह्न की
निद्रा. उचटा, ऊबा मन पर प्रिय. गाढ़ा पीला 
कवि के ध्यान सा पुष्ट और बस उतना ही 
गूढ़ जितनी रति पश्चात आनंददायिनी 
शिथिलता होती है. दांत गड़ा देखो देह
पर आम्र-लताएँ फूट पड़ेंगी सहस्र. मन 
को मूर्च्छा सा जकड़ता है इसका फल.
शेर शाह सूरी ने देर तक चूसने के
बाद इसे आमों का शाह बताया था तो
क्या हुआ चौंसा को सरकारी प्रमाण की
दरकार नहीं.
लंगड़ा

किसी पुष्टिमार्गीय का अन्नकूट. उत्सव
मचा है हाट में आषाढ़ के बीच. छकड़े
के छकड़े लाते है ब्योपारी. सेर भर
पुराएँगे नहीं, डाला भर लाना राग
मल्हार के रंग वाले आम. रस समझने
वालों के लिए तो श्यामा का मन है यह
लंगड़ा आम - बाहर बाहर श्याम भीतर
भीतर अहीर के पीताम्बर वाला राग
सराबोर. पता नहीं क्यूँ इसकी गंध जब
भी नासापुटों में भर्ती है याद आते
है बहुत मियां मकबूल फ़िदा हुसेन.

II

एक कभी ना खत्म ना होने वाले रास्ते पर निरंतर चलना चाहता हूँ - ऊब गया हूँ- इन बने बनाये और फिसलन भरे रास्तों से ....वो रास्ता जिस पर चलने से थक जाऊं, चूर हो जाऊं, मदहोश हो जाऊं और फिर भी कदम सुस्त ना पड़े - बस रोज सूरज की धूप में पानी के छींटें अपने सदियों पुराने मलिन चेहरे पर डालते हुए चाँद और सितारों की ओट में से गुजरूं और फिर सुबह ऐसी जगह हो - जहां कोई ना हो , बस विस्मित करने वाला नील गगन , उद्दाम वेग से चलती हवाएँ और अपने आप को विसर्जित करने के लिए धरती का एक कोना। बस वही आ रहा हूँ ....तुम्हारे लिए कह रहा हूँ .... सुन रहे हो ना .... कहाँ हो तुम.....??

III


देख लो आज 
फिर ये सहर 

कल कभी भी 

नही लौटेगी

और हम तो 

जा ही चुके है
उस पार अब
अब तुम हो
और ये जमाना
हम यादों से 
निकल जाना
चाहते है छोडो
अब बिसरा दो
कि हम अब 
गुजर चुके है।

IV

TAM की जगह BARC नामक संस्था अब TRP देगी।

सही नाम है BARC वैसे बार्क अर्थात भौंकना भी होता है , मने कि यूँही सोचा ज्ञान बघार दूं भासा का यहां tongue emoticon


देवास में केन्द्रीय विद्यालय एक ही है जो मूल रूप से बैंक नोट प्रेस के कर्मचारियों  के बच्चों के लिए खुला था और यह है भी उसी परिसर में. सन 87 की बात है जब हम लोग देवास शहर में कुछ काम शुरू कर ही रहे थे केन्द्रीय विद्यालय में एक उत्साही प्राचार्य आये थे उमाकांत द्विवेदी जो सागर के रहने वाले थे उन्होंने हमारे हर काम में सहयोग दिया और मदद की चाहे सामग्री की बात हो या बच्चों के भीड़ की या शिक्षकों की. कई शिक्षक स्वेच्छा से जुड़े और कई शासकीय दबाव में फिर साकश्रता के काम और फिर कई ने काम. इस सबमे एक शख्स जो लगातार हमसे जुड़ा रहा वो था डा शारदा प्रसाद मिश्र हिन्दी का विलक्षण कवि और एक बेहतरीन आदमी जो एक अच्छे शिक्षक और पर्यावरण पर बहुत उम्दा काम. 

उनकी एक किताब "वन वैभव" एक अदभुत किताब है जो उन्होंने औषधीय पौधों पर लिखी थी जिसमे हर वन उपज पर और घरों में पाए जाने वाले मसालों पर आयुर्वेदिक दोहे है. मिश्र जी ने वन विभाग के आला अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया. बहुत ही सहज आदमी थे मिश्रजी. हाल ही में उनका एक लम्बी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया. उनके बड़े बेटे और अनुज विवेक मिश्र भारतीय फौज में ले. कर्नल है और इस समय लेह में है और छोटे बेटे वैभव उज्जैन के एक तकनीकी महाविद्यालय में प्राध्यापक है. 


मिश्र जी को श्रद्धांजलि और परिवार के लिए प्रार्थनाएं. 

विवेक, वैभव और ममता से मिलकर भी अच्छा लगा लगभग बारह सालों बाद मिला पर फेस बुक ने दूरियां मिटा दी है इसलिए ऐसा लगा ही नहीं कि हम इतने बरसों बाद मिल रहे है.

Tuesday, April 28, 2015

Posts of 28 April 15 घोंघल जो एक गाँव है



घोंघल जो एक गाँव है 





घोंघल एक छोटा सा गाँव है खंडवा जिले में और गत अठारह दिनों से लोग पानी में गल रहे है कि अपनी माटी अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे. ये वो लोग है जिन्होंने सरकार बनाई है देश में, प्रदेश में और इस देश के संविधान के हिसाब से सम्मानित नागरिक है और इन्हें भी वही अधिकार प्राप्त है जो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री या किसी जिला कलेक्टर को एक नागरिक के नाते होते है पर पांवों का यह रंग हमारी व्यवस्था  पर उगता हुआ नासूर नहीं है? यह दर्शाता नहीं कि कितने भोंथरे हो चुके है हम..........

बेशर्मों की बस्ती में शिवराज सिंह कहते है यह सब नाटक है और सरकार बाँध की ऊँचाई और बढायेगी बजाय कम करने के..........यह पाँव आपका, मेरा या हममे से किसी का भी हो सकता है याद रखिये शिवराज जी , यही वो पाँव है जो अभी पानी में गल रहा है मुख्यमंत्री जी समय आया तो यह चलकर आपकी गद्दी पर पहुंचेगा और फिर इन्हें पांवों तले सत्ताएं उजड़ते हुए हम सबने इतिहास में देखी है. 

थोड़ी शर्म बाकी है और कहने को ही सही कि आप जनता के नुमाईंदे हो - एक बार विचार कर लो वरना दिल्ली का हश्र देखा है ना, यही जनता कैसे पांवों तले महत्वकांक्षाओं को कुचलकर ठिकाने भी लगा देती है.........  

और  मीडिया के मित्रों एक बार जाओ कभी तो जनता के हितों की बात करो, कब तक  ओसवालों, जायसवालों और अग्रवालों के चक्कर में पड़कर चिकनी चुपड़ी किटी पार्टियों और साधू संतों से पेज तीन भरते रहोगे या ब्यूरोक्रेट्स और पुलिस वालों को ब्लेकमेल करके दारु पीते रहोगे? जाओ यार, घूमकर ही आ जाओ - नर्मदा माई के दर्शन ही कर आओ, अपनी बीबी और बच्चों को ले जाओ - दिखा लाओ गाँव के लोग कि देखो कैसे गंदे लोग है कि इतनी सी दो कौड़ी की जमीन के लिए पानी में डूब रहे है - पगले कही के, यकीन मानो आपके बच्चे बढ़िया निबंध लिखकर पुरस्कार कमा लेंगे या तस्वीर खिचकर  इनाम जीत लेंगे...जाओ यार एक बार जाओ प्लीज़ ? 


II 


आज कुछ मित्र आये थे, घर की गर्मी से बोर होकर हम शहर के कुछ शांत कहे जाने वाली जगहों पर गए ताकि कुछ हवा मिलें और बातचीत कर सकें. अव्वल तो पार्क है नहीं शहर में जो है वो बेहद घटिया और भीड़ वाले है लिहाजा दूर दराज के मंदिरों में गए कि चलो शान्ति होगी और स्वस्थ माहौल होगा, एक के बाद एक मंदिर में घूमते रहे पर कान फोडू आरती भजन और ढोल धमाकों ने बैठने ना दिया, हर जगह पागलों की तरह माईक पर बेसुरे स्वरों में आरती गाते तीन चार लोग - जो निरंतर आधे - आधे घंटों से लेकर एक घंटे तक आरती गा रहे है, फिर भजन और फिर नीचे बैठकर झांझ मंजीरे...वाहियात, एक जगह शांत से बैठे ही थे कि अजान शुरू हो गयी, बेहद कर्कश आवाज में अल्लाह को याद किया जा रहा था शुक्र यह था कि भोंपू थोड़ा उंचा था वरना मेरे जैसा कमजोर आदमी सुनकर मर ही जाए...फिर सड़क पर बारात "आमी काका बाबा नी पोरिया से लेकर काल कौव्वा काट खायेगा" जैसे वाहियात गानों पर नाचते युवा और महिलायें, वाह रे सड़क और वाह रे नाच बनाम संस्कृति. एक मंदिर तो जिला कलेक्टर के घर के पास है - बिलकुल पास, आसपास के लोगों ने बताया कि सुबह चार बजे से ये भौंडा प्रदर्शन चालू हो जाता है फिर अजान और और फिर भजन, हवन और शाम को फिर किसी के घर में पूजा पाठ और मन्दिर में अभिषेक आदि.

कहाँ है हाई कोर्ट के आदेश और क्या यह प्रशासन को नहीं मालूम कि इसे पालन करवाना है सडकों पर भौंडे बैंड बाजों और डी जे को लेकर चलने वालों पर पुलिस क्यों नहीं गिरफ्तार करती सब साजो सामान, ऊपर से प्रशासन परीक्षाओं के समय प्रतिबन्ध लगाता है बावजूद इसके कोई ध्यान नहीं देता. एक शहर में एक शांत जगह नहीं है जहां कोई बैठकर समय गुजार सकें. मैंने कई बार इसी वाल पर यह समस्या खासकरके ध्वनी प्रदूषण, की लिखी है पर कोई ध्यान नहीं देता. एस पी हो या जिला कलेक्टर इन्हें ना हाई कोर्ट की परवाह है, ना किसी और की - ये सिर्फ भक्तो और जनता के नुमाईन्दों को खुश करने में लगे रहते है. तीन साल बाद मलाई खाकर निकल जाना है और जनता जाए भाड़ में .........

इससे तो बेहतर है कि फेसबुक पर समय बीताया जाए, यहाँ आप लोगों से दुनिया जहां की गपशप की जाए और हाथों में एक बीयर हो या जाम शान्ति तो ऐसे ही मिलेगी  मितरों............मंदिर मस्जिद में शान्ति खोजना बेकार है.....

इस तरह के डिजास्टर पर कौन सा मेनेजमेंट और कौन काम करेगा ???

III
कमाल का देश है केंद्र में शिक्षा मंत्री के पास फर्जी डिग्री और दिल्ली राज्य में फर्जी कानूनी मंत्री यानी फर्जी डिग्री वाला क़ानून मंत्री..........

चेक कर लो कही स्वास्थ्य और बाकी मंत्री भी फर्जी तो नहीं वैसे भी देश की दिल्ली फर्जी लोगों से भरी पडी है.इसलिए तो कहते है दिल्ली दिल वालों को मिलती है, और हम सब मुहब्बत के मारे जानते है कि दिल कितना बड़ा फर्जी है ना सोचना ना समझना बस एक पानी के पम्प की तरह से खून के दो चार कतरें यहाँ वहाँ भेजता है..........
हे राम.........

IV 




Sunday, April 26, 2015

Posts of 26 April 15- फ़िदेल के लिए एक गीत - चे ग्वेवारा



1 - आओ चलें,
भोर के उमंग-भरे द्रष्टा,
बेतार से जुड़े उन अमानचित्रित रास्तों पर
उस हरे घड़ियाल को आज़ाद कराने
जिसे तुम इतना प्यार करते हो ।
वचन देते हैं
हम विजयी होंगे या मौत का सामना करेंगे ।
जब पहले ही धमाके की गूँज से
जाग उठेगा सारा जंगल
एक क्वाँरे, दहशत-भरे, विस्मय में
तब हम होंगे वहाँ,
सौम्य अविचलित योद्धाओ,
तुम्हारे बराबर मुस्तैदी से
जब चारों दिशाओं में फैल जाएगी
तुम्हारी आवाज़ :
कृषि-सुधार, न्याय, रोटी, स्वाधीनता,
तब वहीं होंगे हम, तुम्हारी बग़ल में,
उसी स्वर में बोलते ।
और अगर हमारी राह में बाधक हो इस्पात
तो हमें क्यूबाई आँसुओं का सिर्फ़ एक
कफ़न चाहिए
जिससे ढँक सकें हम अपनी छापामार हड्डियाँ,
अमरीकी इतिहास के इस मुक़ाम पर ।
और कुछ नहीं ।
फ़िदेल के लिए एक गीत / चे ग्वेवारा

2 - (नेपाल के भूकंप पर मीडिया की घटिया चाल कि चाँद आज टेढा है) 
संवैधानिक वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के बाद भी लोग यहाँ अजीब तरह की बातें कर रहे है तो हमें प्राचीन युग में लौट जाना चाहिए और देखना चाहिए कि हम कितने पीछे चले गए है.......हमारे यहाँ गणेश जी दूध ही पीते रहेंगे और हम यही मूर्खताएं करते  रहेंगे.....

मैंने कल ही कहा था कि हम पचास हजार साल पीछे चले जायेंगे और इसे सुधारने में एक लाख वर्ष लग जायेंगे.........


यानि हद हो गयी अब तो चाँद और सूरज आदि को भी नहीं छोड़ा.......यार फिर तीसरी चौथी कक्षा में जाओ और भूगोल पढो.......

3
भारत की इस समय भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है नेपाल के विकास में और संबल बनाए रखने में, जो हुआ वह बेहद अफसोसजनक है, जिस तरह से नरेंद्र मोदी जी ने त्वरित कार्यवाही करते हुए नेपाल और भारतीय प्रभावित राज्यों में प्रशासनिक व्यवस्थाएं और सहायता पहुंचाई है वह काबिले तारीफ़ है मैं उनकी इस बात के लिए प्रशंसा करता हूँ शुक्रिया मोदी जी. 

अब 125 भारतीयों से निवेदन है कि अपने पुरातन ज्ञान का बखान ना करते हुए वैज्ञानिक चेतना फैलाने में मदद करें, अफवाह ना फैलाएं ना चाँद टेढा है ना कोई नासा से ऐसी सूचना है. Pawan Gupta​  Falguni Patadia​  ज़रा यह भ्रम दूर कर दो यार हम सबका, हम वैसे ही गणेश जी को दूध पिला चुके है और तमाम हवाई किलों पर पुष्पक विमान उड़ा चुके है यदि मोदी जी के कहने से ये अफवाहों का बाजार ठंडा पड़ सकता है तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को उन्हें कहना चाहिए और विश्व को दृष्टि देने वाले भारतीय नेतृत्व के इकलौते प्रधान सेवक को अपने देश के लोगों को तत्काल रेडियो, दूरदर्शन और सभी संभावित मीडिया चैनलों ( इंडिया टीवी को छोड़कर) अपनी बात सबकी बात कहनी चाहिए.

रजत शर्मा से करबद्ध निवेदन है कि उन्हें पदम् श्री मिल गया है, सन 2019 के बाद भारत रत्न भी दे देंगे पर इस समय अपनी रोजी रोटी के फेर में ना पड़े...........और अपने अशिक्षित और मूर्ख संवाददाताओं को ना उकसाए कि वे उलजुलूल स्टोरी करें और लोगों को रुपया  देकर और प्रशासन को धमका कर शो ना बनाएं......


विश्व, नेपाल और देश हित में जारी 

4-नामवर सिंह ने मोदी के साथ निवाडे को पुरुस्कृत किया ज्ञानपीठ में.......

क्या दोष है नरेश सक्सेना या विनोद कुमार शुक्ल का। चलनी क्या बोले जिसमे सौ सौ छेद !!!
दोष नही इनका भी -बुढ़ापा और फिर ज्ञानपीठ, भारत रत्न, विदेश दौरें, सलाहकार की मलाई और ना जाने क्या क्या मरने तक संभावित है !!
जियो ठाकुर , सरदार खुश हुआ ..
न, ना, नी के बीच हिंदी बनी पटरानी ... चारण , भांड और अब नया शब्द पेश है "नामवर" हुजूरे आला, कैसा है ?

क्यों बे नामवर...... अबे नामवर कही का.....
कैसी है Sandeep Meel ?? एकदम नई भाषा की आधुनिक गाली है ना ???




Saturday, April 25, 2015

मुफलिसी - 1



कल जब बस में बैठा बंगाली चौराहे से गांधी हाल के लिए बैठा, तो बस वाले कंडक्टर ने दस के नोट को घूरते हुए कहा कि पांच और चाहिए.........किराया बढ़ गया है. 

बड़े बेमन से उसने उसे दस का एक नोट पकड़ा दिया, बस वाले ने कहा कि पांच देता हूँ. सारे रास्ते वो कंडक्टर को याद दिलाता रहा कि पांच वापिस कर दें और फिर सोचता रहा कि ये पांच का किराया बढना कितना भारी पडेगा उसपर और वह परेशान हो गया.  

फिर उसने तय किया घर से वो भोर में ही निकल लेगा,  पर पांच रूपये रोज के खर्च में और ज्यादा  वह बर्दाश्त नहीं कर सकता, सरकार को खूब गालियाँ दी, सह यात्रियों से झगड़ता रहा, एक बच्चे को उसने थप्पड़ लगा दिया - जो रो रहा था, किराये में बढे हुए पांच रूपये का गुस्सा उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था.. पांच रूपये का मतलब सरकार जानती है, क्या होता है वह एक दुनिया खरीद सकता है पांच रूपये में रोज !!!

अचानक उसने कंडक्टर का कंधा पकड़ कर कहा कि पांच रूपये वापिस क्यों नहीं करते,  मेरे रूपये खाकर बैठे हो, कब से लेकर बैठे हो,  मेरा स्टॉप आ गया है. 

कंडक्टर बोला साहब यही उतरना है क्या, मुझे लगा कलेक्टर ऑफिस जाना है, इसलिए मैंने पंद्रह रूपये कहा था.....यहाँ का किराया तो दस रूपये ही है और उसने दस का नोट वापिस कर दिया सहजता से .......

उसे अचानक इतनी खुशी हुई कि वह कंडक्टर का हाथ पकड़कर चूमने लगा और हुर्रे करते हुए गांधी हाल पर उतर गया लोग उसे पागलों की तरह देखते रहे.........

#मुफलिसी

Posts of 25 April - मुफलिसी



बंगाली चौराहे से आज बस में सीट मिलने से मैंने तसल्ली से अपने कागज़ बेग से निकाले और तीन चार नत्थी किये दस्तावेजों में से मैंने तीन चार आलपिन निकालकर फेंक दी और सभी दस्तावेजों को एक कर दिया. तभी मैंने देखा कि एक बन्दे ने नीचे झुककर तत्काल तीनों आलपिनें उठा ली और उन तीन आलपिनों को अपने मुंह में दबा लिया. मै देखता रहा आश्चर्य से उसे कि यह क्या करेगा इन फेंकी हुई आलपिनों का ? 

वह चुपचाप बडबडा रहा था कि ये तीन आलपिन मेरे कितने काम आयेगी मेरे घर में छोटी की फ्रॉक के बटन टूट गए है कम से कम एक उसमे लग जायेगी, दूसरी फटे हुए बी पी एल कार्ड के पन्नों को जोड़ने में काम आयेगी - ताकि राशन, पेंशन और नगर निगम से मिलने वाले सारे लाभ ले सकूं और एक मै सम्हाल कर रखूंगा  - पता नहीं किस मुसीबत में काम आ जाए और वह बिलकुल हावरा बावरा होकर खुशी से झूमता हुआ गांधी हाल पर बस से उतर गया.


#मुफलिसी


बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥
[ बड़े छोटों पर स्नेह करते ही हैं. पहाड़ अपने सिरों पर सदैव घास को धारण किये रहते हैं, अगाध सागर मस्तक पर फेन धरे रहता है और धरती अपने शीर्ष पर सदैव धूल रखे रहती है]

मप्र से प्रमुख स्वास्थ्य सचिव प्रवीर कृष्ण की विदाई अब कमान योग्य प्रशासिका गौरी सिंह के हाथ में। स्वास्थ्य विभाग निश्चित ही सुधरेगा कोई शक नही लिखकर ले लो। 
बधाई और शुभकामनाये
सौ सौ सलाम कविता करकरे को और सच में ऐसे लोगों से ही भारत है और भारत महान है वरना मायावती, मुलायम, नितीश, लालू, अमित शाहों,  मोदी, अरविन्द, आशुतोषों और राहुलों की कमी नहीं है देश में........

श्रीमती कविता करकरे का पार्थिव शरीर आज सुबह पंचतत्व में विलीन हो गया। शहीद हेमंत करकरे की पत्नी नहीं रहीं, जाते-जाते एक बार फिर उन्होंने ज़माने को संदेश दे दिया कि वो एक वीर की पत्नी ही नहीं, खुद भी एक वीरांगना हैं।

उनके पति हुए थे देश के लिए कुर्बान, उन्होंने मरने के बाद कईयों को दिया जीवनदान! ये कहानी है कविता करकरे की, शहीद हेमंत करकरे की पत्नी। वही हेमंत करकरे जो 26/11 के आतंकी हमले में शहीद हो गए थे। 6 साल पहले हेमंत करकरे डिनर के लिए पत्नी के साथ आउटिंग पर गए थे। एक फोन कॉल के बाद आधे में डिनर छोड़कर निकले और फिर कभी नहीं लौटे।

उसी वीर की पत्नी ने साबित कर दिया कि वो भी किसी से कम नहीं। सोमवार सुबह मष्तिष्क घात के बाद कविता दुनिया छोड़ गईं। लेकिन जाते-जाते तीन लोगों को जिंदगी दे गईं। कविता की एक किडनी 48 साल के एक शख्स को दी गई, जो 10 साल से डायलिसिस पर बस इस इंतज़ार में था कि कोई उसे जिंदा रहने के लिए एक किडनी दे दे।

दूसरी किडनी जसलोक अस्पताल में 59 साल के एक शख्स को दी गई, जो सात साल से किडनी ट्रांसप्लांट का इंतज़ार कर रहा था और कविता के लीवर ने कोकिलाबेन अम्बानी अस्पताल में 49 साल के एक शख्स को नई ज़िंदगी दे दी।

परेल के हाजी बचूली में दान की गईं कविता ने आंखें भी कई लोगों की रोशनी बन रही हैं। कविता करकरे के इस महादान के पीछे उनके तीन बच्चों का भी हाथ है, जिन्होंने अपनी भावनाओं पर काबू रखते हुए अपनी मां के शरीरदान की इजाज़त दे दी।

कविता करकरे ने जाते-जाते ये बता दिया कि उनका परिवार जान देना भी जानता है और जिंदगी देना भी। इसे वीरों का परिवार कहें, तो गलत नहीं होगा। इस परिवार को शत शत नमन।


अनुज Rahul Jain​ का धन्यवाद कि यह खबर साझा की.

Friday, April 24, 2015

इस तरह से ख़त्म होता हूँ मै

इस तरह से ख़त्म होता हूँ मै 
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मै आहत हूँ कि अमेजान नदी के एक किनारे, 
टेम्स नदी के दूसरे किनारे और गंगा से वोल्गा तक 
मनुष्यता नष्ट हो रही है

नष्ट हो चुकी है सिन्धु घाटी की सभ्यता 
बेबीलोन की सभ्यता और ख़त्म हो गए बिम्ब 
भाषा नष्ट हो रही है.

आहत नहीं होते सभ्यता के ठेकेदार, जीवन के रक्षक 
डपट देते है मुझे हर बार यह कहकर कि धर्म और 
मनुष्यता के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हूँ अब मै.

आकाशगंगाओं के बीच नष्ट हो गए ग्रह,
खतरा सूरज और चाँद पर भी बढ़ता जा रहा है,,
हवाओं में नष्ट हो रहा है जीवन

सभ्यता, भाषा, हवा, पानी और फूलों को नष्ट कर 
हम विकसित हो गए है और इन सबके बीच 
ख़त्म हो गया मनुष्य, धीरे धीरे.

नष्ट तो हमने कर ही दिए थे पेड़ पौधे और बेलें 
संसार के सबसे सुन्दर फूल और सबसे कोमल घास, 
अब बारी बीजों और कोंपलों की है.

मन के बीच, भावनाओं के तंतुओं में उलझा दिया,
ख़त्म कर दी नश्वरता और शाश्वतता रिश्तो की, 
इस तरह ख़त्म किया यहाँ प्रेम को हमने.

- संदीप नाईक. 

कि आ गयी है गर्मी

कि आ गयी है गर्मी 
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शाम को मोगरा, कनेर, गुड़हल और सदाबहार के बीच 
नीम, गुलमोहर और पीपल भी झूल जाते है 
पांवों के नीचे हरी घास और कुछ कंकर 
बताते है जीवन का अनहद राग और बीत जाता है दिन 

बेंच पर पसरी है सुस्ती, सूखे पत्तों के टीले गर्द के बीच  
खामोश हवाओं के झपेटे अब कुछ नहीं कहते
अनमने से बच्चे और कुछ उदास बूढ़े घूम रहे है 
कुछ औरतें चहलकदमी कर रही है खामोशी से 

चिड़ियाएँ सुस्त है, कौवे खामोश, कीड़े मस्त है 
बाज अब पेड़ों पर नहीं आते, सुनाई नहीं देता शोर 
सुबह टिटहरी उड़ नहीं जाती आसमान में सायास 
धूप देरी से झांकती है इस हरियाली के मंजर में 

सूरज सब दूर से थककर आता है रोशनी बांटते 
पसीने में नहाकर बैठ जाता है इस पार्क के कोने में 
दिन निकलता है अक्सर यहाँ कुछ मद्धम सा
दोपहर आते आते थक कर चूर हो जाती है यहाँ 

दिन देर तक ठहरा होने से थक जाता है रोज ही 
एक उबासी लेकर जाता है शाम को उमस देते हुए 
रात के अँधेरे में जुगनू नजर नहीं आते अब 
मच्छर गाते रहते है हरियाली में भिन भिन सन्नाटे में 

सूरज की गति से चंद्रमा की गति बदल गयी है 
सुबह शाम के फेरे में धरती पर बढ़ गयी है आपाधापी 
पसीने से सरोबार है समूचा संसार और जनमानस 
ऐसे में कुछ लोग लगे है निचोड़ने मनुष्य को धड़ल्ले से.

- संदीप नाईक  


Wednesday, April 22, 2015

Posts of FB 22 April 15


राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत जिला परियोजना प्रबंधकों की भर्ती की गयी थी और उसके बाद ये लोग जिलों में ऐसे जम गए है कि हलने का नाम ही नहीं ले रहे है जबकि तबादला नीति के तहत इनके भी तबादले होना थे, फलस्वरूप जिलों में ये स्थानीय अस्पताल प्रशासन के साथ सेटिंग जमाकर बैठे है कि फेविकोल को भी शर्म आ जाए. इंदौर जबलपुर खरगोन या अन्य जगहों पर डी पी एम ऐसे जमे है कि सारा तंत्र खराब कर दिए है.  अब जब राज्य शासन ने तबादले करने का हुकुम दिया है तो क्या प्रमुख सचिव इन फेविकोल के जोड़ों पर ध्यान देंगे और तबादले करके इन्हें यहाँ वहाँ करेंगे  वैसे भी डी पी एम कमाई का बहुत बड़ा साधन है और मेरे देखते देखते प्रदेश में कई डी पी एम करोडपति हो गए है. दूसरा पहलू यह है कि जिन जिलों में मिशन के क्रियान्वयन में बहुत समस्या है जैसे खंडवा, मंदसौर आदि जिलों में वहाँ पुराने अनुभवी डी पी एम् को भेजा जाना चाहिए जो नौ सालों से एक ही जगह पसरकर बैठे है. तीसरा योग्य और निकम्मे लोग अब भर्ती हो रहे है जिन्हें ना स्वास्थ्य की समझ है ना कोई सामान्य समझ उन्हें भी कुछ जिलों  में अभी नियुक्तियां दी गयी है, इसके बदले स्वास्थ्य विभाग फ्रेश MBBS डाक्टर्स को नियुक्ति दे तो बेहतर होगा बजाय समाज सेवा में फर्जी तरीके से डिग्री खरीदकर जो आये है और ज्ञानी बने फिर रहे है. प्रदेश के क्रांतिकारी स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव इन DPMs को बदले तो स्वास्थ्य की मूल समस्याएं हाल हो सकती है या डिग्रीधारी डाक्टर्स को ही नियुक्ति दें.

II 
मध्य प्रदेश में प्रशासन की हालत कमजोर और निकम्मेपन की हद 

मैंने राष्ट्रपति महोदय से अपने स्वर्गीय भाई की पत्नी की अनुकम्पा नियुक्ति के लिए शिकायत की थी,लिहाजा उन्होंने मप्र शासन को वह शिकायत 18 मार्च को प्रेषित कर दी और हमें सूचना दी गयी कि श्रीमती तबस्सुम जैदी, उप सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग से संपर्क करें. उनसे एक लम्बे समय बाद बात हो पाई तो रोज वे टालती रही अब वे कह रही है कि शिकायत निवारण नहीं हो रहा है और जिला कलेक्टर जवाब नहीं दे रहे तो मै क्या करूँ ? उनके विभाग ने जिला कलेक्टर को 6 अप्रेल को शिकायत प्रेषित कर डी थी परन्तु कलेक्टर महोदय को भी समय नहीं है कि वे कुछ करें या जनता की समस्याएं सुलझाए, बस चौबीसों घंटे जन समुदाय के कामों में लगे रहते है.......तबस्सुम जैदी कहती है अभी फोन पर कि मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं है इस तरह की शिकायतों को सुलझाने में और जब जवाब आयेगा तब हम कुछ बता पायेंगे. जब मैंने कहा कि यह रिकॉर्डिंग पुनः राष्ट्रपति महोदय को शिकायत के साथ प्रेषित कर दूं तो कहने लगी मुझे नहीं मालूम.और फोन बंद कर दिया. अब बताईये ये प्रदेश के सामान्य प्रशासन विभाग के अफसरों की हालत है और जिला कलेक्टर को मेल लिखा परन्तु कोई जवाब आज तक नहीं आया उनसे भी कई बार व्यक्तिगत रूप से मिल लिए है परन्तु हालात जस के तस है. मजेदार यह है कि कोई भी जिम्मेदारी से एक जवाब देने की स्थिति में नहीं है और मुख्यमंत्री हेल्प लाइन में तो कबाड़ा है ही.
दिल करता है सभी अधिकारियों को एक सिरे से लाइन में खडा करके..........


और मोदी जी सिविल सर्वेन्ट्स को ज्ञान दे रहे है कि हस्तक्षेप और अडंगा क्या होता है प्रदेश के मामाजी को अपने गुणगान गाने और व्यापम में कमाने से फुर्सत मिल गयी हो तो कुछ काम हो...........


III

शर्मिन्दा हूँ कि लाईव मौत के चक्कर में एक किसान एक इंसान और एक युवा यानी गजेन्द्र मर गया मुझे अब शर्म यह भी आती है कि देश में राष्ट्रपति है, और सुप्रीम कोर्ट है जो ना व्यापम घोटाले पर कुछ बोलते है ना इस मौत पर ना देश के लोगों की समस्याओं पर..........

डूब मरो नेताओं, मुख्यमंत्रियों, और देश के प्रधान सेवक, सभी पार्टियों के प्रमुखों और कलपुर्जों, .............प्रशासन, पुलिस और शासन 

मीडिया कितनी बड़ी दलाल है और कितनी वीभत्स, यह भी आज पता चला और बाकी सारा समुदाय नपुंसकों की तरह से देखता रहा .क्या हो गए है हम और क्या होंगे.....?  


डूब गया भारत आज इतना वहशी नंगा नाच देखकर भी देश के प्रधान सेवक या मुख्यमंत्री या राजस्थान की मुख्यमंत्री कुछ नहीं कहते तो शर्मनाक है इस देश में रहना. अरविन्द - मोदी के पुलिस झगड़े में अच्छे दिन आये और नपुंसकों के देश में एक किसान मर गया ........

इस देश में सुप्रीम कोर्ट को अब देश सेना के हवाले कर देना चाहिए , मेरा गंभीरता से सुझाव है.  यह आपातकाल से गंभीर समय है और शर्मनाक है कि कोई कुछ नहीं बोल रहा और देश में लोग सूट बूट या सूटकेस की बात कर रहे है. शर्म आती है मुझे देशवासी होने में. 60 साल बनाम 11 माह किसको छोड़ना चाहिए सुशासन ...........? विदेश में घूमो तो देश की हालत से क्या वाकिफ होंगे मोदी जी और अब भक्तो घटिया राजनीति मत करो कि अरविंद या ये वो.हालात आप लोगों ने आपातकाल से घटिया कर दिए है मप्र में मामा राज हो, छग में रमनसिंह, उप्र में अखिलेश या देश में मोदी राज कुल मिलाकर कबाड़ा हो गया है और मजे में सिर्फ अम्बानी और अडानी है...........सुप्रीम कोर्ट के जज साहेबान सिर्फ काला कपड़ा बांधे बैठे रहेंगे और राष्ट्रपति विदेशियों की अगवानी ही करते रहेंगे या कुछ और भी करेंगे............
मेरा मोदी जी से कोई व्यक्तगत दुराग्रह नहीं है बस आज सिर्फ अपनी पुरानी बात दोहराना चाहता हूँ कि इस प्रधान सेवक की गलतियों के कारण देश को हजारों साल पीछे जाना होगा और इस देश को यह सब ठीक करने में हजारों साल लग जायेंगे......आज इसकी शुरुआत हुई है और ऊपर से अमित शाह जैसे इसके रिद्धि सिद्धि है जो चाहते ही है कि हंगामा हो और देश में स्पष्ट रूप से बँटवारा हो जाए ये अघोषित आपातकाल है और देश के सभी नागरिक सन्न है बस हम बोल रहे है और भक्त चुप है , वे सब जानते है कि ये क्या कर रहे है .......

#निकम्मेप्रशासनऔरनपुंसकोंकाघटियादेश 

Thursday, April 16, 2015

इक न इक तो इबादत में असर आएगा - गुलज़ार

गुलजार साहब आपकी दुआओं का इन्तजार है या यूँ 

कहूं कि इन पंक्तियों को तकमील की तलाश है.........



"इक न इक दिन हमें जीने का हुनर आएगा, कामयाबी का कहीं पर तो शिखर आएगा,
आज इस शहर में पहुंचे है तो रुक जाते है, होंगे रुख्सत, तो नया एक सफ़र आएगा,
चिलचिलाहट भरी इस धूप में चलते चलते, जाने कब छांव घनी देता शजर* आएगा,
अपना सर सजदे में उस दर पे रख दे, इक न इक तो इबादत में असर आएगा."

- गुलज़ार

(*वृक्ष)

Tuesday, April 14, 2015

Naiduniya, Indore Dated 14 April 15







नई दुनिया 14 अप्रैल 15 में सोने के सदुपयोग के बहाने बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा की बात, खासकर बेटियों को स्वालम्बी बनाने की बात।


Posts of 14 April 15

उदास मौसम के खिलाफ कड़ी धूप की प्रतीक्षा।

बाबा साहब को जिस तरह से हम सबने इस्तेमाल करने लायक बना लिया है और चौराहों से लेकर संसद जैसे जगहों पर मूर्तियाँ लगा ली है, घरों में (वो भी सिर्फ दलितों के) फोटो लगा लिए है, और इसके बरक्स जो आंबेडकर का "योगदान" सिर्फ आरक्षण तक सीमित रह गया है क्या वह चिंतनीय नहीं है, जिस जाति को बदलने की बात वो कर रहे थे, खत्म करना चाहते थे, सामाजिक विषमता को ख़त्म करना चाहते थे, उसे भी तो हमने कही खो दिया और महू जैसे बड़े बड़े मठ बनाकर रख दिए, आम्बेडकर संस्थान को विवि बना देने से काश जाति या भेदभाव ख़त्म हो जाता या तमाम आंबेडकर पीठ पर बैठे बौद्धिक विलास में व्यस्त और त्रस्त लोग .खैर.........बाबा साहब को अब कम से कम बख्श कर हमें कुछ नया सोचना चाहिए क्योकि यह वह हिन्दुस्तान नहीं जो वो देखना चाहते थे, ना ये वो देश है जिसमे रहकर उन्होंने कड़े श्रम से पढाई की, बाहर गए - वजीफे पर और संविधान जैसा पवित्र ग्रन्थ रचा. मायावती और मुलायम अगर उनके वंशज बन गए तो हो गया कल्याण फिर........बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी........बहरहाल मुझे लगता है सम्पूर्ण दलित आन्दोलनकारियों, सामाजिक विषमता के बहाने करोड़ों डकार जाने वाले बुद्धिजीवियों और विश्व विद्यालयों में, संस्थाओं और शासन प्रशासन में आरक्षण की बैसाखी लेकर अपने कुत्सित विचारों को परिणिति तक पहुंचाने के लिए आसीन लोगों को बाहर किये बिना असली दलित उत्थान संभव नहीं है. बंद करिए आंबेडकर वाद और ढकोसले और आरक्षण और बाबा साहब को बाबा साहब रहने दीजिये और उन्हें सिर्फ एक प्रखर सामाजिक क्रान्ति का प्रवर्तक बना रहने दीजिये और अगर सच में कुछ उनके नाम पर करने का संकल्प लेना चाहते है तो उस समता मूलक समाज की बात कीजिये, संविधान की बात कीजिये, कर्तव्य और अधिकारों की बात कीजिये और दलितों के नाम पर दलितों की और दलितों के लिए घटिया कमीनी राजनीती करना बंद कीजिये. और ठीक इसके साथ इन पढ़े लिखे दलितों को, जो उच्च ज्ञान डिग्री और पी एच डी हासिल करने या प्रमुख सचिव स्तर पर जाकर भी दिमागी रूप से गुलामी सहते या दलित बने रहते है, को भी यह समझना चाहिए कि उनके दलितों का उद्धार सिर्फ आरक्षण नहीं करेगा क्योकि अब यह सब लम्बे समय तक नहीं चलने वाला है एक आग और बगावत जन्म ले चुकी है और जिस तरह से समाज साम्प्रदायिक रूप से बाँट दिया गया है और शहरी - ग्रामीण, अमीर - गरीब नई जातियां है, उसकी आग से कोई बच नहीं पायेगा और अब बाबा साहब, गांधी, मार्क्स या चे ग्वेरा या बुद्ध - महावीर या राम - रावण भी कुछ बिगाड़ नहीं सकेंगे किसी का, समय गुजर गया है, अब नई चिंताएं है और नए सन्दर्भ, नई लड़ाईयां है और नए प्रसंग ....



थोड़ी मेहनत लगेगी पर मजा आ जाएगा।
बहुत सस्ता है ताजा पुदीना, साफ़ कर धोकर और फिर दो तीन दिन में सुखा लें छाँव में और फिर सब्जी, दाल, छाछ ,पास्ता, नींबू चाय, ग्रीन टी, नूडल्स या कही भी इस्तेमाल कर सकते है इन पत्तियों का।
क्या स्वर्गिक सुवास और अदभुत स्वाद।
चलिए, आज ले लो और बैठ जाओ बस आधा घंटा।




मेरे भाई का निधन हुए सात माह हो गए सरकारी नियमों के अनुसार उसकी पत्नी को अनुकम्पा नियुक्ति मिलना थी परन्तु शिवराज सरकार के भ्रष्ट और निकम्मे प्रशासन शासन में अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई. मैंने 6 दिसंबर को मुख्य मंत्री हेल्प लाइन पर शिकायत दर्ज करवाई थी परन्तु आज तक बार बार फालो अप करने पर भी कुछ नहीं हुआ. मुख्य सचिव से लेकर प्रमुख सचिव तक को पत्र लिखा परन्तु ढाक के तीन पांत. आखिर 26 फरवरी को राष्ट्रपति के यहाँ शिकायत दर्ज करवाई वहा से 18 मार्च को शिकायत पर तुरंत कार्यवाही करने हेतु मप्र शासन को निर्देशित किया गया परन्तु यहाँ भी कुछ हाल कम नहीं. जब मैंने अप्रेल में भोपाल फोन करके सम्बंधित अधिकारी से पूछा तो बोले देखता हूँ जिलाधीश को भिजवा दूंगा फिर उन्होंने जिलाधीश को प्रकरण भेज दिया यानी कुल मिलाकर बात फिर वही हो गयी. मप्र के शिक्षा विभाग जैसा भ्रष्ट विभाग नहीं और मप्र शासन जैसा मक्कार प्रशासन नहीं और पुरे प्रदेश को बेवकूफ बनाने वाली मुख्यमंत्री हेल्प लाइन नहीं, जिस शिकायत को दसियों बार लेवल चार पर ले जाया गया जिसकी समीक्षा स्वयं मुख्य मंत्री करते है फिर भी नियमों के तहत नियुक्ति नहीं मिल पा रही तो काहे का सुशासन और काहे के जन प्रतिनिधि. सारे अफसरों से सिर्फ हफ्ता वसूल कर व्यापम घोटाले करने में दक्ष पुरी टीम को लोगों की मृत कर्मचारियों के परिवारों की चिंता कहाँ है? इतनी बेशर्मी है कि मैंने कम से कम पचास मेल, पंजीकृत डाक से आवेदन, और स्पीड पोस्ट से मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव स्कूल शिक्षा , प्रमुख सचिव सामान्य प्रशासन विभाग और स्वयं शिवराज सिंह चौहान को लिखा, स्कूल शिक्षा मंत्री को लिखा परन्तु  कही से  एक जवाब भी नहीं आया इतनी घोर अशिष्ट सरकार और लापरवाह प्रशासन है. 

बंद कर दो मुख्य मंत्री हेल्प लाइन का फर्जीवाड़ा और अपव्यय, राज्यपाल को लिखने से मतलब नहीं है वे स्वयं मुख्य मंत्री के जाल में फंसे है. मप्र में इतना लापरवाह प्रशासन कभी नहीं था, अब मुझे लगता है कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और आयुक्त लोक शिक्षण, जिलाधीश और जिला शिक्षा अधिकारी को पार्टी बनाकर सुप्रीम कोर्ट में ही सीधे याचिका दायर करूँ......... पत्रकार मित्रों को टेग इसलिए कर रहा हूँ कि क्या आप लोग कभी मृत कर्मचारियों की कोई स्टोरी प्लान कर सकते है मामा राज में, मेरी जानकारी में 350 प्रकरण अकेले स्कूल शिक्षा विभाग में लंबित है सन 2009 से और शिवराज जी जो बडबोले बनते है और शहीदों के घर से लेकर तमाम घरों में घूमते है मातम पुरसी करते है, को इन कर्मचारियों के परिवारों की चिंता है कि ये कैसे गुजर बसर कर रहे है मप्र में ??? 


Pankaj Shukla​ Deepak Rai​ Brajesh Rajput​ Shiv Anurag Pateriya​  Uday Aras​ Navin Rangiyal​ Pushpendra Vaidya​ Sourabh Khandelwal​ Piyush Babele​ Swatantra Mishra​ Om Thanvi​  Pallavi Vaghela​  Sneha Khare​  Rahul Chouksey​