Sunday, March 29, 2015

"निठल्ला "


"निठल्ला "
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यकीन नहीं होता कि सब बदल जाता है 
जैसे कोई मानेगा कि अभी दस दिन पहले पानी बरसा था !
और अब ये प्रचंड वेग से आती रश्मि किरणें 
जैसे कभी मिले थे पहाड़ी पर ओंस जैसे
अब दरक रहे है पत्थर और लोहे की जालियों से बंधे 
पर नहीं रुक रहा इनका पात !
ये कैसा प्रचलन है और कैसा समय
सब कुछ बदला सा और फिर लगता ठहरा हुआ सा
सन्न हूँ , आक्षेपित और अधूरा सा
अपने अंदर महसूसता हूँ एक निर्वात और
खोज लाता हूँ तुम्हारी याद जो अब संबल नही
विक्षोभ भर देती है, कलुषित कर देती है
और मैं इसे प्रेम की संज्ञा दे इठला जाता हूँ
अपने होने और खत्म हो रहे समय के द्वन्दों में
कहता हूँ कि प्रेम में पगा आदमी रत्तीभर भी काम का नही।

Friday, March 27, 2015

सुनो ज्ञानरंजन




"सुनो ज्ञानरंजन "
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सुनो ज्ञानरंजन आतंकित है 
पूरा हिन्दी का संसार तुम्हारी आक्रामकता से 
और दबी है हिन्दी की कहानी तुम्हारी कहानियों से 

जाता हूँ किसी भी जलसे में साहित्य या कि 
आन्दोलन के कामरेडों या कार्यकर्ताओं के बीच तो 
निकल ही आता है प्रसंग तुम्हारा या पहल का

देवास के मानकुण्ड गाँव में प्रकाशकांत से सुना था 
पहली बार तुम्हारा नाम सन सत्तासी में और देखी थी पहल 
फिर इंदौर में विनीत तिवारी से बात की तुम्हारे बारे मे 
छपे हुए लोगों को भी अकड़ते देखा है कि 
हम पहल में छपे है मानो एक विभाजन रेखा हो 
ना छपने वालों और पहल में छपने वालों के बीच 

फिर सुना कि तुम्हारी दो चार पांच लिखी कहानियां ही 
अमर हो गयी हिन्दी के मुक्ताकाश में 
बांची गयी हर जगह, और अनुदित हुई कई कई भाषाओं में 
उदाहरण सुनकर मै हैरत में हूँ कि एक जबलपुर का आदमी जो 
आधारताल के किसी राम नगर में रहता है और 
दुनिया भर में जिसके किस्से सुनाई देते है,
कैसे घूमता होगा यह आदमी और फिर इस पर भी 
पहल छापने का मुकम्मल काम ?

पहल सम्मान और वो भी लेखक के शहर में जाकर 
उसके घर परिवार को बुलाकर, अपने विरोधियों के बीच 
सीना ठोंककर सौंप आता है, कैसा आदमी है ज्ञानरंजन 
कहते है एक कागज़ का पन्ना मुफ्त नहीं दिया किसी को 
आज जबकि अपनी किताबें और महाग्रंथ लोग बाँट रहे है
ज्ञानपीठ से लेकर मोहल्ले के सस्ते पुरस्कार के लिए  

नाम आता है हरनोट का या विंदा करंदीकर का तो जिक्र 
पहले पहल का और उससे पहले भी ज्ञानरंजन का आता है 
कि ज्ञान जी ने पहल में छापा था 'गांधी मला भेंटला' 
वैचारिक बहस के मुहावरे और प्रतिबद्ध लोगों को हांक कर 
एक समूचा आन्दोलन कैसे खडा कर लिया तुमने
जबलपुर से लेकर दुनियाभर में कहते है तेजेंद्र भी  

सुनो ज्ञानरंजन ये बताओ कैसे पढ़ लेते हो बहादुर पटेल की कविता 
छत पर अकेले बैठकर जोर जोर से और फिर धीरे से अपनी 
नजरें उठाकर ताक लेते हो खाली पडी छतों पर सुने मकान 
उस आधारताल के रामनगर वाले मकान में जहां से नर्मदा भी दूर है 
कैसे हिम्मत कर लिख देते हो लम्बी चिट्ठी आज भी 
जबकि शब्दों को विकृत कर दिया है एस एम एस और इंटरनेट ने 

सुनो ज्ञानरंजन कैसे जुटे रहे इतने साल जबलपुर में रहकर 
संसार से और अक्षर, वर्ण और वाक्यों से जोड़ जाड़कर एक 
पूरा लेखक वृन्द बना दिया हिन्दी में जो बहस में रहता है हर दम 
और हर बात के समाधान के लिए तुम्हारी ओर तकता है 
मै आतंकित हूँ ज्ञानरंजन कि कहानी की दुनिया में नाम है 
और मै बिलकुल प्रवेशद्वार पर खडा हूँ अभी अभी कोरा पन्ना लिए 

दिनेश कुशवाह से पूछता हूँ , कमला प्रसाद से भी पूछा था 
सबने कहा कि वो सांगठनिक आदमी है और पहल का पहरेदार 
भोपाल में कुमार अम्बुज जिक्र करते है तो सुभाष पन्त देहरादून में 
अर्नाकुलम में संतोष,  तो मेरठ में मनोज शर्मा, बडौदा में रमेश भाई 
हैरत होती है जब कोई कहता है कि अभी ज्ञानरंजन की चिठ्ठी आई थी, 
कल ही फोन पर बात हुई या कि अभी हैदराबाद में है  परसों लौटेंगे 
कैसे कर लेते हो, ये तो बताओ ज्ञानरंजन इतना सब और फिर समय 

चंद्रकांत देवताले भी किस्से सुनाते है और प्रभाकर माचवे भी कहते थे 
हिन्दी के जगत में इतना आतंक एक आदमी का, डरता हूँ मै 
अब कहाँ होंगे ऐसे ज्ञानरंजन और कैसे होंगे क्योकि समय निकलता जा रहा है 
अब गुर भी नहीं सिखा रहे अपने होने के, बस अपने में मगन हो 
और गुनगुना रहे हो, जोर से बुदबुदाकर क्या कहना चाहते हो क्या यह कि 
अभी हिन्दी को एक नहीं हजारों ज्ञानरंजन चाहिए 

(ज्ञानरंजन जी के लिए सादर यह कविता ) 

- संदीप नाईक 

जहां पेड़ है वहाँ घर है


अगर आप मेरे घर का पता पूछे 
तो मै आपको पूरा पता बताउंगा 
और यह भी कहूंगा कि घर के बाहर 
एक पेड़ है बड़ा गुलमोहर का पेड़ 

यह पेड़ नहीं मेरा सहयात्री है 
सन उनअस्सी में जब इस घर आये
तो कही से एक पौधा रोप दिया था 
और देखते देखते बड़ा हो गया बन गया पेड़ 

मैंने इसको नहीं, इसने मुझे 
बड़ा होते देखा और सराहा 
कई मौकों पर यह मेरा साथी बना 
अपनी जवानी में जब उठा मेरे जीवन से 
पिता का साया तो इसे पकड़ कर 
रोया और ढाढस बंधाया माँ को 

फिर भाई की शादी में इस पर की
रोशनी और लगाया टेंट को टेका 
इसी से हरापन बचा रहा घर में मेरे 
ठण्ड, गर्मी और बरसात में इसी के 
पत्तों से आती रही छाया और बहार 

इस बीच हर बार छांटता रहा 
डगालियाँ इसकी कि कही बेढब 
या दूसरों की जद में ना बढ़ जाए 
और बीनता रहा पत्तों के ढेर अक्सर 
कि जीवन फिर आता है पत्तों सा बार बार 

माँ को अस्पताल जाते समय विदाई दी
इसने कि जल्दी लौट आना गृह स्वामिनी 
पर जब लौटें लाश लेकर तो एक 
पंछी भी नहीं बैठा था और सारे पत्ते सन्न थे 
चुपचाप झर गया माह अगस्त में यह पूरा 

फिर इसने एक नया आसमान खोला 
सम्भावनाओं का, हरा हुआ पूरा एक बार फिर 
हम सब जीवन में लौट आये थे 
उबर रहे थे सदमे से कि एक बार फिर सचेत किया 
इसने इस तरह कि यह सूखने लगा जड़ों से 

गुलमोहर के मोटे और ऊँचे तने में 
एक बरगद  कही से उग आया था 
सुना था बरगद के नीचे कोई नहीं पनपता 
पर  यह दुनिया का अनूठा गुलमोहर है 
जो बरगद को अपनी शिराओं से पाल रहा है. 

सोचा तो कई बार कि उखाड़ फेंकू बरगद को 
माँ ने मना किया कि बरगद में ईश्वर का वास है
यह कैसा इश्वर था जो हरेपन को सूखा रहा था 
बरगद फूल रहा था और पेड़ सूख रहा था 
धीमे से परन्तु कुछ नहीं बोला गुलमोहर  

अभी जब गुजरा भाई तो यह फिर सूखा था 
शाखें भी टूट गयी थी, झर गयी थी पत्तियाँ
दीमक लगने लगी है इसके तने में 
पुराना पड़ता जा रहा है ठीक मेरी तरह 
और अब सिर्फ हरापन बाकी है ऊपर से 

गुलमोहर का यह पेड़ अब हो गया है 
सभ्यता और इतिहास में दर्ज कि 
एक परिवार को इसने बढ़ते और ख़त्म होते 
देखा है, अब नई शाखें जो बिखर रही है 
बरगद और गुल मोहर गडमड है आपस में 

सब ख़त्म हो रहा है, हरापन पत्तियाँ, शाखें 
बरगद अपने पाँव गुलमोहर में रहकर 
पसार चुका है और ख़त्म कर रहा है इसे 
फिर भी कमजोर तने और कुतरती दीमकों के 
साथ खडा है पेड़ अपनी पुरी ताकत के साथ 

फिर सामने है गर्मियां और कड़ी धुप 
फिर आयेंगे राहगीर बैठ जायेंगे इसकी छाँव में 
मांगेंगे पानी मुझसे और मै उन्हें पानी देकर 
ताकता रहूंगा इसके हरेपन को, निहारूंगा 
और आपको कहूंगा कि जहां पेड़ है वहाँ घर है. 

-संदीप नाईक 


Wednesday, March 25, 2015

महिला हिंसा से लड़ने में राह दिखाई माझी बस्ती, जबलपुर की महिलाओं ने




आपको याद है पाश की कविता "कैथरकला की औरतें" जिसमे औरतें भिड जाती है पुलिस वाले से या नसीरुद्दीन शाह की राजस्थानी पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म "मिर्च मसाला" जिसमे औरतें अंत में दरोगा पर इकठ्ठा होकर लाल मिर्च का पाउडर फेंक देती है क्योकि वह उनमे से एक पर गलत निगाह रख रहा था. हालात वास्तविक जीवन और फिल्मों कहानियों से अलग नहीं है चाहे आप एक सरसरी तौर पर निगाह अपने आसपास घूमा लें या किसी किशोरी, युवा लड़की या महिला से छेड़छाड़ की स्थिति पूछ लें. जिस समाज में महिलाओं को बराबरी का हक़ नहीं सम्मान नहीं वहाँ गैर बराबरी से उपजे व्यवहार में महिलाओं के साथ छेड़छाड़, हिंसा, बलात्कार, दहेज़ ह्त्या और जघन्य अपराध होना बहुत सामान्य है. परन्तु अब चेतना और जागरूकता से जहां ऐसे मुद्दे सामने आ रहे है, सरकार ने निर्भया काण्ड के बाद क़ानून में बदलाव किये है वही महिलाओं ने भी अपने स्तर पर खुद आगे बढ़कर हिंसा और छेड़छाड़ के खिलाफ एक मुहीम शुरू की है. 

मध्यप्रदेश का नाम लेते ही कुपोषण, महिला अत्याचार का नाम सामने आता है क्योकि इन दो मुद्दों के लिए यह प्रदेश देश भर में जाना जाता है परन्तु मप्र शासन के नगरीय प्रशासन विभाग की पहल और अंतर्राष्ट्रीय विकास विभाग ब्रिटेन के सहयोग से प्रदेश के चार बड़े शहरों - इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर और भोपाल में महिला हिंसा से निपटने के लिए एक सुरक्षित शहर एक पहल कार्यक्रम आरम्भ किया गया है जिसमे एक शोध परक ढंग से महिला हिंसा को कम करने के विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ आयोजित की जा रही है. महिलाओं के समूह बनाए जाकर उनके साथ कई प्रकार के प्रयास किये जा रहे है ताकि इन्हें सशक्त बनाकर समाज में उनकी महत्वपूर्ण भागीदारी को सुनिश्चित किया जा सकें. 



जबलपुर की एक बदनाम बस्ती माझी बस्ती है जहां गुंडागर्दी और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ इतनी  ज्यादा है कि लोग आवाज उठाने में डरते है. शराब, गांजा, स्मैक का चलन बस्ती में इतना ज्यादा है कि बड़े - बूढों से लेकर छोटे बच्चे जिनकी उम्र बारह तेरह बरस है, भी पीना शुरू कर देते है और इसके लिए मारा पीटी करना, छोटी मोटी चोरी करना, घर का सामान बेच देना या बाहर बहुत सामान्य बात है, जाहिर है जब नशा दिमाग में चढ़ता है तो मस्ती और लड़कियों और महिलाओं को तो छेड़ेंगे ही !!! इस तरह से धाक भी जमती है और बदनाम भी होते है. 

बस्ती की महिलायें और लड़कियां परेशान थी उन्हें सूझ नहीं रहा था कि क्या करें, एक दिन वो नगर निगम जबलपुर के द्वारा चलाये जा रहे सुरक्षित शहर परियोजना के संपर्क में आई, उन्हें एक महिला हिंसा के खिलाफ किये जा रहे प्रशिक्षण में हिसा लेने का मौका मिला, इसके बाद इन महिलाओं ने पंद्रह महिलाओं के साथ मिलकर बस्ती में निर्मल छाया समूह बनाया और सौ रुपया महीना इकठ्ठा करना शुरू किया जो आज बढ़कर बारह हजार हो गया है. आपस में ये लों लेती है र समय पर चुकाती भी है. सारी पंद्रह सदस्य घरों में खाना बनाने जाती है या घरों में पापड बनाती है. शिमला बाई बताती है कि हम सब बहुत परेशान हो गयी थी रोज रोज के झगड़ों और छेड़छाड़ से, तो फिर लगा कि अब बहुत होना चाहिए, जहां कोई शादी करने को तैयार नहीं, महिलाओं की इज्जत नहीं और चौबीसों घंटे तनाव रहे वहाँ क्या जीवन, प्रशिक्षण से हमें बल मिला हमने मिलकर सोचा कि अब कुछ काम महिलाओं को ही करना होगा, एक दिन हममे से ही एक बहन की लड़की को एक लडके ने बुरी तरह से छेड़ा, जब उस लड़की और महिला ने शिकायत की तो उसने और उसके दोस्तों ने अभद्रता की यह होली से पहले की बात है, हम लोग पुलिस में गए तो गढ़ा थाने वाले आये और देखकर लौट गए, कुछ किया नहीं. लडके की हिम्मत बढ़ गयी, उसने अगले दिन फिर उस लड़की को छेड़ा, अबकी बार उस महिला ने यह बात हमारे समूह के सदस्यों को बताई, बस फिर क्या था, हम सबने उस लड़की की धुनाई की और सीधे गढ़ा थाने गए और एक आवेदन लिखकर दिया कि रोज क्या होता है शराब बिकती है, और गुंडागर्दी बढ़ गयी है. आवेदन में हमने लिखा कि यह मामला "354- अ" में आता है अतः अविलम्ब कार्यवाही की जाए. लक्ष्मी केवट बताती है कि प्रशिक्षण में हमें घरेलू हिंसा से लेकर सभी प्रकार के कानूनों की जानकारी दी गयी थी और सिखाया गया था, हमें पर्चे और किताब भी मिली थी. यह आवेदन पढ़कर पुलिस हरकत में आई और हमारी महिलाओं की भीड़ देखकर तुरंत हमारे साथ बस्ती में आई और उस लडके को ले गयी. 




लक्ष्मी बताती है कि तब हमने एक रजिस्टर खरीदा, सब महिलाओं के फोटो चस्पा किये, नाम लिखे और अब हमारे निगरानी दल में 50 महिलायें है जो रोज इन असामाजिक तत्वों पर चौबीसों घंटे नजर रखती है, यहाँ तक कि वे घर में अपने पति और जवान बच्चों पर भी नजर रखने लगी है और यदि वे शराब पीते है या कोई अन्य नशा करते है तो वे सख्त रवैया अपनाती है. कौशल्या बताती है कि जैसे क़ानून सबके लिए है वैसे ही हमारे समूह का व्यवहार भी सबके लिए सामान है, चाहे वो हमारा पति ही क्यों ना हो अगर वो घर बाहर या कही भी हिंसा करेगा तो हम विरोध करेंगे. हालांकि पद्रंह बीस दिनों में बहुत फर्क पडा है हम थाने के बाद एस पी ऑफिस भी गए थे, छेड़छाड़ कम हुई है परन्तु घरों में दबाव बहुत है, काम के दबाव है और हमारी बराबरी का मुद्दा तो अभी बहुत दूर है पर हम बुंदेलखंड की तर्ज पर गुलाबी गेंग बनाना चाहते है हमने वह फिल्म टीवी पर देखी है. 





हम अब पचास महिलायें है, और अब हम आंगनवाडी, सफाई, मध्यान्ह भोजन और बस्ती के स्कूल में पढाई क्यों नहीं हो रही या राशन की दूकान से पर्याप्त और सही समय पर सामान क्यों नहीं मिल रहा इस पर भी काम करना चाहते है ताकि हम हमारी बस्ती जो बदनाम हो चुकी है, को फिर से इज्जत दिलाना चाहते है. उम्मीद की जाना चाहिए कि इन महिलाओं ने जो बीड़ा उठाया है वह सबकी मदद से पूरा हो और कम से कम महिलाओं को इज्जत के साथ जीवन बिताने का मौका मिलें , सभी लडकियां बगैर खौफ और डर के आ जा सकें, पढ़ सकें , नौकरी कर सकें, और सम्मान से समाज में अपना जीवन बिता सकें. माझी बस्ती की महिलाओं के ये छोटे प्रयास व्यर्थ नहीं जायेंगे और ये महिलायें बाकी महिलाओं के लिए प्रेरणादायी उदाहरण बनेगी. 

Tuesday, March 24, 2015

ठिगना आदमी



"ठिगना आदमी"
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इतिहास सिखाता है 
एक ठिगना आदमी 
बहुत खतरनाक होता है
नेपोलियन से लेकर तमाम तरह 
लोगों से किताबें भरी पडी है 

मैंने भी कई बार ठिगने लोगों को
ठगते हुए देखा और विचलित हुआ
मसलन वह आदमी जो मुझे 
एक पालिसी थमाकर चला गया 
मै जीवन भर प्रीमियम और वह 
कमीशन खाता रहा 

एक आदमी जो मेरे जूते चोरी कर गया 
रेल में ठीक मेरी बर्थ के नीचे से 
और उतर गया किसी स्टेशन पर 
और नंगे पाँव लेकर मै लौटा घर बाजार 
में नजरें छुपाता अपने ही लोगों में 

एक आदमी जो बरगलाता रहा उम्र भर 
और मै झांसे में जीवन को किसी 
प्रयोग की तरह चलाता रहा अंत में 
हार गया और इस तरह ख़त्म हुआ मै 
कि आईना देखने की हिम्मत नहीं रही  

एक आदमी जो जीवन भर 
मेरे वोट से देश चलाने की बात करके
अपने वजूद को पुख्ता करता रहा और 
देश को इतना खोखला कि अब इसे 
देश कहने में भी शर्म आती है 

एक ठिगना आदमी आदमी नहीं 
बौनी सोच का बौना व्यक्तित्व होता है
अपने को किसी ऊँचे आदमी के बरक्स 
वह ठिगनी दूरी से बौना बना देता है 
दुनिया को और फिर लूट लेता है

कभी बैठा था एक ठिगने आदमी के पास 
सूना था उसे कि किस तरह से उंचाईयों ने 
उसे हर दम गिराया और सर उंचा रखने में 
गर्दन झुक गयी उसकी हमेशा के लिए 
और वह इस तरह ख़त्म हुआ आहिस्ता से 

दर्द तो उसे बहुत था कि टेलर से लेकर 
दुनिया के हर आदमी ने हंसी उडाई उसकी 
सर्कस के तम्बू में भी उसे पनाह नहीं मिली 
शादी ब्याह और उसकी भावनाओं को 
मीडिया ने भी परोसा सबके सामने 

माँ बाप से लेकर पत्नी तक कोसती रही 
हर बार बच्चे हुए तो राह तकता रहा 
उनके जवान होने की कि कही ठिगने ना रह जाए 
हर नजर ने उन्हें ताका झांका और फिर 
सहानुभूति से नवाजा पूछने की हिम्मत नहीं की 

एक ठिगना आदमी हिस्सा जरुर रहा 
हर बदलाव और क्रान्ति के हर सफ़र में 
वह बराबरी से अपने मजबूत किन्तु छोटे 
कन्धों के साथ बराबर लड़ा हर लड़ाई 
पर उसे कही दर्ज नहीं किया गया 

एक ठिगना देश का राष्ट्रपति भी था 
जो नैतिकता का पाठ पढ़ा गया कि
आज तक उसके उदाहरण नसीहत देने के 
पर्याय है और सभी लोग कांपते है 
ऐसे ही ठिगने लोगों के कई किस्से है 

ठिगना आदमी सिर्फ ठिगना नहीं है 
वह एक मुकम्मल शख्सियत है 
अपने आसपास वह बेहद जरुरी है 
ठीक आपकी, उसकी और मेरी तरह 
ठिगना आदमी नहीं आपकी सोच है. 

- 24 मार्च 2015 


जीवन यूँही बीतता है


अचानक कौंध जाती है कई गलियां, सड़कें और ऊंघती अनमनी सी टेढी मेढी पगडंडियां जिनसे गुजरकर आज यहां पहुँच गया जहां से कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा..
पुकारता हूँ उन पथरीले रास्तों को और उन खम्बों पर टिक जाती है नजरें - जिन पर रात में जलने वाले लट्टू नहीं थे और सर्द हवाओं ने जिनके खोखलेपन को सर्द कर दिया था किसी लाश के मानिंद.
देखता हूँ , बिचारता हूँ , और लगता कह दूं कि तुम्हारा होना और ना होना अब बेमानी लगता है, बस इतनी हिम्मत बची नहीं कि उन गुफाओं में एक बार लौटकर सिर्फ छू भर आऊँ कि मैं और तुम ठहरे थे एक पल, साझा की थी साँसे और फिर चल दिए थे अलहदा होकर !
तुम्हारे लिए ....सुन रहे हो ना ... कहाँ हो तुम .......

उसी रात उनीदी आँखो से उन्हीं पगडंडियों पर चला तो था, पर रात का वक़्त इतनी तेज़ी से भाग रहा था, की पगडंडियाँ जैसे पीछे छूटी जा रहीं थी, उस वक़्त के साथ जो वैसे भी ठहरता कहाँ है। 

सुनो मैं वहीं हूँ, वहीं कहीं हूँ। बस वक़्त तेज़ी से भाग रहा है, और मैं पीछे छूटता जा रहा हूँ। पर देख पा रहा हूँ, तुम्हें दूर से आ रही रोशनी की तरह। थका हूँ, पर हारा नहीं। ज़िंदगी जब तक है, मैं हार नहीं सकता। 

एक तुम्हारे होने से ही सिर्फ,
मेरा वजूद खोता गया आहिस्ते आहिस्ते.
एक तुम्हारा होना ही सिर्फ मेरे, 
प्यार के कर्जदार होने की भी निशानी है।
एक तुम्हारा होना ही सिर्फ, 
सारी बेबसियों का सबब बन जाता है ।
पूरा मुकम्मल बना हूँ मैं,
सिर्फ एक तुम्हारे ना होने से ।

- तुम्हारे लिए.... सुन रहे हो ना .... कहाँ तुम ...

Friday, March 20, 2015

एक राज्य को टारगेट करके शिक्षा व्यवस्था पर सवाल मत उठाईये





सिर्फ बिहार को टार्गेट करके नक़ल हल्ला मत मचायिये, मप्र , उप्र, राजस्थान और यहाँ तक कि महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के भी कुछ हिस्सों में नक़ल बाकायदा एक सेवा की तरह से होती है. एक प्रांत विशेष को टार्गेट करके इस तरह से वहाँ की मेधा को और प्रतिभा को बदनाम करना बेहद अपमानजनक है और शर्मिन्दगी भरा कृत्य है.

जवा ब्लाक,  रीवा में मप्र विधानसभा के पूर्व स्पीकर श्रीनिवास तिवारी के कई निजी स्कूलों  में और महाविद्यालयों में नक़ल ठेके पर होती थी, और रीवा - सतना इसलिए बदनाम थे. विक्रम विवि उज्जैन के छात्रों को तो किसी प्रतियोगी परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं थी, और लिखा जाता था विज्ञापन में कि विक्रम विवि उज्जैन के छात्र आवेदन ना करें, क्योकि यह समझ थी कि यहाँ सब नक़ल से पास होते है बाद में तत्कालीन कुलपति डा शिव मंगल सिंह सुमन ने एक याचिका लगाकर इस तरह के विज्ञापनों पर रोक लगवाई. इस तरह की घटनाएँ मीडिया को मालूम नहीं है या जानबूझकर हकीकत से मुंह मोड़ना चाहते है? 

इससे बेहतर है कि आप पुरी शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न कीजिये पूछिए NCERT, CIET, NIEPA, SCERTS, SIET, PGBT Colleges में और देश के सभी शिक्षाविदों से कि क्या किया उन लोगों ने ?

लाईये कृष्ण कुमार से लेकर बी के पासी, डी एन सनसनवाल, उमराव सिंह चौधरी, शोभा वैद्य, पद्मा सारंगपानी, डा गोविंदा, डा अनिल सदगोपाल, स्व आचार्य राममूर्ति और तमाम मिशनरी, मदरसे, गुरुद्वारे और विद्याभारती चलाने वालों को कटघरे में और इसके साथ तमाम तरह की नवाचार के नाम पर शिक्षा की दूकान चलाने वाली बड़ी बड़ी संस्थाओं को भी अदालत में खींचिए, जो अरबों रूपये डकार गयी सन 1972 से अभी तक और अभी भी प्रकाशन गृह खोलकर अपनी बिक्री और दुनिया में सदियों पुरानी किताबों का अनुवाद करके बुद्धिजीविता झाड रही है.

पूछिए रतन टाटा, फोर्ड, दोराबजी टाटा, नोविब, ओक्सफेम, एक्शन एड, एड एट एक्शन, अजीम प्रेम फाउन्डेशन जैसी संस्थाओं से जो कईयों को रूपये देकर देश का उद्धार करने चले थे और अपने नाम की वाह वाही में सिमट कर रह गए. सभी एनजीओ को भी घसिटीये जो सड़क छाप अंगूठा टेक और दसवीं बारहवीं पास कार्यकर्ताओं और लोगों को रिसोर्स पर्सन बनाकर स्कूलों में गन्दगी फैला रहे है. ये लोग जो खुद शिक्षा का श ना जानते हो पर स्कूलों में डा. दौलत सिंह कोठारी के बाप बन जाते है. 

एक बिहार के केस को और एक चित्र को दुनिया को दिखाकर आप अपने होने पर सवाल उठा रहे है, सवाल यह है कि नवोदय विद्यालय और केन्द्रीय विद्यालय जैसे संगठनों ने क्या किया बहुत मार्गदर्शन और परामर्श का पाठ्यक्रम चलाते है, फोन लाइन और बच्चों किशोरों की काउन्सलिंग करते है, सी बी एस ई क्या कर रही है, राज्यों के बोर्ड और ओपन स्कूल, राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय और ना जाने क्या क्या.........कितना कचरा फैला रखा है आपने कभी सोचा है ?

ऐसे चित्र दिखाकर मेरे अच्छे दोस्त, अच्छे साथी जो मेहनत और परिश्रम करके और बिना आरक्षण के आज अच्छा काम ईमानदारी से कर रहे है उनपर आप सवाल उठा रहे है. शर्म आनी चाहिए , ज़रा एक बार अपने गिरेबाँ में झांककर देखें....

बारिश में भीगना यूँ है मानो.........



ये बारिश में भीगना यूँ है मानो एक रक्तिम घटाटोप बरसात के साये से जूझता और मिट्टी के बोझ से दबे पांवों को लपेटता घिसटता और हांफती साँसों के बीच में मीलों मील चलते चले जा रहा हूँ, पीठ पर सदियों की सताई और कुंठित आत्माओं की तड़फ और बोझ लिए। ये यूँ गुजरना ऐसा है मानो एक लंबी ठहरी नदी में मैं बह रहा हूँ - रक्त रंजीत सा और पानी ठहर गया है- झील की सतह पर जमी एक बेहद अशांत और गर्म बर्फ सा। ये कैसा समाँ है , ये कैसा जूनून है , और इसका अंत क्या एक लंबे क्रंदन में होगा - यह पूछते हुए कि कहाँ हो तुम, सुन रहे हो ना.... यह तुम्हारे लिए है !!!

ये जो हरापन है ना .........!!!




ये जो पी रहा हूँ इस समय ना चाय भी है और तुम्हे सघनता से याद करते हुए उन कोमल तंतुओं के बीच वे एहसास भी है जो भाप के साथ उड़ते उड़ते ठन्डे हो गए ....अब कोई कही भी उष्णता बाकी नहीं है , एक हरापन है जिसे तुमने लगा दिया था यहां इस मिट्टी के गमले में, जो फ़ैल रहा है और बीच बीच में पीले जर्द होकर पत्ते सूख जाते है , बिखर जाते है और फिर मुक्ति पा जाते है अपनी डार से हमेशा के लिए...


अब शायद इस पीलेपन से मुझे प्यार हो गया है , रेशा रेशा जर्द हो रहा हूँ और अपनी सूखी हुई डार भी देख रहा हूँ इन्तजार है एक तेज और उद्दाम वेग से चलने वाले झोंके का कि चले और सब कुछ बह जाए.. जैसे पाख उड़े तरुवर के, मिलना बहुत दुहेला, ना जाने फिर किधर गिरेगा....


ये एहसास है ...सुन रहे हो ....कहाँ हो तुम..... सब तुम्हारे लिए

रेलवे में सामंतवाद - सन्दर्भ जी एम इंस्पेक्शन, जबलपुर , दिनांक 19 मार्च 2015



जबलपुर स्टेशन पर हूँ प्लेटफॉर्म 6 पर एक अधिकारी स्पेशल खड़ी है जिसमे जी एम , डी आर एम और वरिष्ठ अधिकारी इटारसी जा रहे है आते समय ये हर स्टेशन का निरीक्षण करेंगे।


अदभुत ट्रेन , बाहर से सामान्य पर भीतर से किसी फाइव स्टार से कम नहीं ! हर अधिकारी के लिए एक डिब्बा, चपरासी, सोफ़ा, बिस्तर, गैस का चूल्हा और खाने पीने की तमाम व्यवस्थाएं! मतलब गजब। मैंने पहली बार इतने कम सफ़ेद हाथियों के लिए ऐसी सुविधायें और एक के लिए एक पुरा डिब्बा जैसी सुविधा वाली ट्रेन देखी। हर डिब्बे में सेवा सुरक्षा के लिए चार से पांच वर्दीधारी चपरासी और चार खाकी में तैनात जवान इन हाथियों के लिए।


कौन कहता है की हम लोकतंत्र में रह रहे है , अधिकारी लोक सेवक है और आम आदमी के लिए काम करते है। साला सब मुगालते दूर हो गए । टैक्स मेरे पसीने का और ऐयाशी ये करें - वो भी ऐसी ट्रेनों में ?


यार भाई बताओ ये माजरा क्या है। स्टेशन पर यात्रियों से ज्यादा पुलिस वाले, खोजी कुत्ते और सफाई वाले है, मने कि बोले तो हम आज भी ठिठुरते गणतंत्र के आख़िरी पायदान पर खड़े और शोषित होते दो कौड़ी के नागरिक (?) है इस महादेश के !!!!


भगवान् कसम, अभी ये ठाट बाट देखकर दिल बैठ गया। प्लेटफॉर्म पर हर कोई हैरान है और बुदबुदा रहा है , पर ना सवाल पूछने की हिम्मत ना प्रतिरोध की। ये कैसा जनतंत्र है मेरे खुदा।

Sunday, March 15, 2015

कब तक रहेगी देश में आरक्षण की बैसाखी और दलितों को पिछड़ा रखने की साजिश ?





मै सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि सदियों से जारी जाति प्रथा को ख़त्म किये बिना और समतामूलक समाज बनाए बिना अब कुछ नहीं होगा. हजार सालों में किसके साथ क्या हुआ और किसने किया इसके लिए आप आज की पीढी को दोषी नहीं मान सकते और सजा नहीं दे सकते, आज सब सामान है और जिनके साथ भेदभाव हो रहा है या किया जा रहा है चाहे वो दूर दराज के गाँवों के दलित हो या सुकमा के आदिवासी या अत्यंत पिछड़े दलित उसके लिए अधिकांशतः उनके ही नेतृत्व जिम्मेदार है, हमने ऐसे निकम्मे नालायकों को अपना नेता चुना है और संसद में भेजा है जो सिर्फ इस दुर्भाग्य को और यथास्थितिवाद के बनाए रखना चाहते है इसलिए मै इस बात का कोई अब समर्थन नहीं करता कि मैंने या मेरे पुरखों ने किसी को हजार साल सताया है इसलिए अब इन्हें सत्तर साल तक बैसाखी देने का सिलसिला पीढी दर पीढी बनाए रखा जाए और एक मनुष्य को प्राकृतिक न्याय से महरूम रखा जाए. और फिर नौकरी, प्रमोशन, प्रवेश जैसे मसलों पर आरक्षण बिलकुल नहीं होना चाहिए. एक बार जाकर देखिये अयोग्य लोगों के सत्तर साल में तंत्र में होने से (और इसमे सब शामिल है यानी सभी जाति समुदाय) दश का कितना नुकसान हो गया और क्या हालत हो गयी है. अगर शीर्ष नेत्रित्व में दम है तो अजीम प्रेम, नारायण मूर्ती, रतन टाटा या अम्बानी - अडानी को मजबूर करें कि अपने यहाँ 55 प्रतिशत नौकरियां दलित आदिवासियों को दें. और सिर्फ अब बात दलित आदिवासी की नहीं है बल्कि अब मामला आरक्षण के नाम छदम लोगों के लिए भी है. 

आरक्षण देकर और उपयोग करके आप अपना और आने वाले समाज का नुकसान कर रहे है. सत्ता को, सत्ता के चरित्र को और सत्ता की चाल को समझिये जनाब और बचाईये अगर आप सच में अपनी इंसानी कौम को बचाना चाहते है, अब हमें नए आंबेडकर और ज्योतिबा फूले की आवश्यकता है. नहीं चाहिए तर्क, विश्वास, आख्यान और अकादमिक उबाऊ व्यर्थ के उदाहरण जो हजारों सालों से फ़ालतू के जाल में लोगों को मूर्ख सांसदों को आपने गुमराह अक्रके आरक्षण जैसी व्यवस्था को बनाए रखा है. बस बहुत हो गया.

आरक्षण रहने से या हटा देने से कोई फर्क नहीं पडेगा आपको सिर्फ सुविधा , नोकरी , उच्च संस्थाओं में प्रवेश और प्रमोशन लेने से आप अपने को विकसित मान लेंगे या ब्राह्मण बनकर मंदिरों में पूजा का अधिकार बनाये रखेंगे तो यह सिर्फ घटियापन और मूर्खता के अलावा कुछ नही है। दक्षिण पंथी ताकतें जाति व्यवस्था बनाये रखना चाहती है और पहले कांग्रेस ने छला और अब मात खाते रहिये इनसे, ये कुल मिलाकर आपको ख़त्म करना चाहते है। बाजार और भू मंडलीकरण के दौर में रोते रहिये और सरकार ख़त्म कर रही है धीरे से सारी नोकरियां और फिर आप मक्कार, अयोग्य और पूर्णतः निकम्मे होकर सम्पूर्ण रूप से धकेल दिए जाएंगे बाजार और दुनिया से। समझिये इस चाल को और ठुकराईए इस बैसाखी को। अगर आरक्षण इतना ही महत्वपूर्ण है और आपमें अगर सच में योग्यताएं आ गयी है तो जाइए बड़ी निजी कंपनियों में जैसाकि मेरे बहुत से परिचित दलित बच्चे आज सिर्फ योग्यता के बल पर काम कर रहे है वे भी उन्ही गलीज माहौल से निकलकर आये है पर आरक्षण को उन्होंने ठुकराया है।

अब बंद कीजिये आरक्षण के आंकड़े और बकवास। बाजार है योग्यता, अंग्रेजी कंप्यूटर ज्ञान और वाकपटुता का ज़माना है। आप जो लोग आरक्षण जैसे बैसाखी लेकर तंत्र में बैठे है और अगर हिम्मत है तो मंडला बालाघाट डिंडोरी झाबुआ के आदिवासियों को तंत्र में आने दें। जे इन यु या जिले में मलाईदार पद पर बैठकर या विदेशों में पढ़ रहे या डी पी एस में पढ़ रहे बच्चों के लिए भीख ना मांगे वरना छोड़ दे चोंचले। बंद करो दलितो की घटिया राजनीती। 
योग्यता की नीलामी हो रही है और आरक्षण द्वारा उसे खरीदा जा रहा है करोड़ों में आमदनी वाले भी अपने आप को दलित बताकर नाजायज लाभ की आकांक्षा से योग्यता को दरकिनार करने में लगे हुए हैं आरक्षण का लाभ जरूरतमंदों को नहीं मिलता बल्कि उसका गलत फायदा लिया जा रहा है हाँ आरक्षण देकर पिछड़ों या गरीबों को कुछ करने के योग्य बनाना बेहतर है न कि अयोग्य व्यक्तियों को आरक्षण का लाभ देकर योग्यता को नकारना. 

आरक्षण हर तरह का और हर जगह से और अब तर्क कुतर्क और बहस की गूंजाईश मेरे लिए नहीं है। जे इन यु में डेढ़ लाख का वेतन लेकर और आय ए एस बनकर या वाशिंगटन में पढ़कर आपको आरक्षण चाहिए नोकरी और एडमिशन और प्रमोशन में तो बात ख़त्म। नही सुनने आख्यान और लोकसभा में जानवरों की घटिया बहसें नहीं पढ़ना इतिहास और बहस, बस अब बंद , सब इंसान है और कुछ नहीं। नोकरी के बाद प्रमोशन में भी आरक्षण वे निर्लज्ज लेते है जो रीढ़ विहीन है । इन लोगों की वजह से ही सत्यानाश हुआ जो कुछ संस्थाओं में पढ़े और आरक्षण में बैसाखी लेकर कुत्सित मानसिकता लिए आज तक बैठे है जो काम धाम नहीं करते सिवाय बोझ बढ़ाने के। ये अभिजात्य दलित है। आरक्षण हर तरह का और हर जगह से और अब तर्क कुतर्क और बहस की गूंजाईश मेरे लिए नहीं है। जे इन यु में डेढ़ लाख का वेतन लेकर और आय ए एस बनकर या वाशिंगटन में पढ़कर आपको आरक्षण चाहिए नोकरी और एडमिशन और प्रमोशन में तो बात ख़त्म। नही सुनने आख्यान और लोकसभा में जानवरों की घटिया बहसें नहीं पढ़ना इतिहास और बहस, बस अब बंद , सब इंसान है और कुछ नहीं।

ख़त्म आज से आरक्षण शब्द कम से कम मेरे शब्द कोष से तो हट गया, ना ही सहानुभूति है कोई इस विषय पर. माफ़ कीजिये पुरे होशो हवास में बगैर किसी पूर्वाग्रह के मै यह कह रहा हूँ. मैं बहुत कंविंसड हूँ अब कि आरक्षण किसी भी स्तर पर और कही भी सही नहीं है।

Thursday, March 12, 2015

अमन पन्त कृत कबीर का भजन "उड़ जाएगा हंस अकेला"........एक नए अंदाज में



बहुत ही खूबसूरत कम्पोजीशन है और अदभुत गीत है, कुमार जी ने जो गाया है और अब्र कबीर को लेकर जो प्रयोग कबीर केफे और नए युवा कर रहे है पाश्चात्य संगीत और उपकरणों के साथ वह भी स्तुत्य है.

मेरा गंभीरता से मानना है कि अब नए प्रयोग और नई शैली की गायकी भी आना चाहिए जो परपरागत से हटकर हो और कुछ नया रचना धर्म दिखाती हो वरना तो कुमार जी, भीमसेन जोशी, जसराज, और गंगू बाई हंगल की बंदिशें गा गाकर लोगों ने घराने बना दिए है. खासकरके कबीर जैसे प्रयोगधर्मी और क्रांतिकारी कवि और सिर्फ कबीर ही नहीं दादू, मीरा, जायसी, रसखान और तमाम सूफी संतों के भजनों को अब नए सन्दर्भों में परखकर, बुनकर और संजोकर लयबद्ध किया जाना चाहिए.

एक पुरी पीढी बड़े गुलाम अली खां, अमीर खां, रज्जब अली खां, गंगू बाई, कुमार जी, भीमसेन जोशी, आबिदा, जसराज जी, वसंत देशपांडे, मालिनी राजुरकर आदि को सुनते हुए बड़ी हुई और ख़त्म भी हो गयी. अब समय है कि नए युवा जो संगीत की दीवानगी में पागल होकर अपना सब कुछ छोड़कर जी जान से जुटे है, ना इन्हें नाम की चिंता है, ना यश और कीर्ति की पताकाएं फहराना चाहते है और ना ही चल अचल संपत्ति का मोह है - वे जो अनूठे संधान कर रहे है और रच रहे है शिद्दत से उसे सहज स्वीकार करके पुरे उदार मन से "रिकोगनाईज़" करना चाहिए. मै कदापि यह नहीं कह रहा कि हमारे मास्टर्स को भूला दें या बिसरा दें और खारिज करें, परन्तु अब नया रचने का ज़माना है और इसे गहराई से समझने की जरुरत है.

आपका शुक्रिया सुनाने के लिए उदय भाई Uday Prakash

Wednesday, March 11, 2015

"सुरक्षित शहर - एक पहल" महिला हिंसा से निपटने का मध्य प्रदेश में एक कारगर अचूक प्रयास

                                                                       (गोरु वास्कले) 
ये है गोरु वास्कले, जो मप्र के खरगोन जिले के ग्राम मुल्तान हीरापुर की  रहने वाली है, गोरु आदिवासी समुदाय से आती है जहां लड़कियों को उच्च शिक्षा दिलाना अपने आप में एक चुनौती है परन्तु गोरु ने बड़े साहस से अपनी बुनियादी पढाई गाँव से करके संघर्ष करके इंदौर आ गयी. एक बड़े शहर में एक बड़े सपने के साथ और समाज के लिए, लड़कियों के लिए महिलाओं के लिए कुछ सार्थक करने,  इंदौर के राष्ट्रीय कस्तूरबा ग्रामीण विकास और कल्याण संस्थान द्वारा संचालित महाविद्यालय में रही और और पढाई में ध्यान लगाया. यहाँ से गोरु ने ग्रामीण विकास में सफलता पूर्वक एम ए पूर्ण किया और फिर इंदौर शहर में एक एनजीओ के संपर्क में आई तो इन्हें लगा कि यह काम सार्थक भी है और मजेदार भी, शैक्षणिक रूप से यह काम बहुत महत्वपूर्ण था इसलिए उन्होने इस प्रोजेक्ट को ज्वाईन कर लिया. और सिर्फ गोरु ही नहीं दर्जनों से ऐसे कार्यकर्ता है और युवा लोग है जो मप्र के इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और भोपाल में जुड़कर गहराई से काम कर रहे है और इस काम में उन्हें ना मात्र मजा आ रहा है बल्कि वे इसे सर अंजाम तक पहुंचाने के लिए जी जान से जुटे है. कुछ कार्यकर्ता इसमे फुल टाईमर है और अधिकांश स्वेच्छा से अपना समय दे रहे है क्योकि मुद्दा ही ऐसा है. यह महत्वपूर्ण कार्यक्रम है "सुरक्षित शहर - एक पहल" 

मध्यप्रदेश और महिलाओं के खिलाफ अपराध 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हिसाब से देश भर में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में मप्र  राज्य का सबसे पहले नंबर है, जहां महिलाओं के साथ चैन खींचने की घटनाओं से लेकर छेड़छाड़, दहेज़ ह्त्या, बलात्कार और देह व्यापार जैसे जघन्य अपराध देश भर में सबसे ज्यादा हो रहे है. सिर्फ यही कहानी नहीं रुकती, बच्चियों के साथ कुपोषण और भ्रूण ह्त्या के मामले में भी प्रदेश आगे है, मप्र के चम्बल और ग्वालियर संभाग में भ्रूण ह्त्या के मामले इतने ज्यादा है कि अब महिला बाल विकास विभाग को बेटी बचाने के लिए विशेष अभियान चलाना पड़ रहे है. भिंड, मुरैना, श्योपुर जैसे जिले इसमे अगुआ है, यहाँ कई एनजीओस ने बहुत सार्थक काम किया है, विकास संवाद जैसे पैरवी करने वाले संस्थान ने सहरिया आदिवासियों के बीच महिलाओ के मुद्दे और कुपोषण पर बेहद संजीदगी से काम करके शासन प्रशासन में कार्य प्रणाली में बदलाव लाने के लिए दबाव बनाया है. बहरहाल मप्र के चार बड़े शहरों में सरकार ने इस मुद्दे पर गंभीरता से काम करने का प्रयास किया है और एक एक्शन रिसर्च का काम हाथ में लिया है जिसके तहत कई प्रकार की गतिविधियाँ आयोजित की जा रही है. 

सुरक्षित शहर - एक पहल 

                                           (सेफ्टी आडिट के दौरान)
इस एक्शन रिसर्च के तहत मध्य प्रदेश के चार बड़े शहरों में स्थानीय सुशासन की इकाईयों (नगर निगम) के साथ काम किया जा रहा है. आम तौर पर माना जाता है कि नगर निगम का काम शहर में सफाई, पानी बिजली सीवेज का काम ही होता है परन्तु इस स्टीरियोटाईप छबि को तोड़कर मप्र राज्य ने पहली बार देश में यह अनूठा प्रयोग आरम्भ किया है जिसके सार्थक नतीजे देखने को मिल रहे है. इस प्रयोग में इन चारों शहरों में नगर निगम के साथ एक-एक स्थानीय  एनजीओ को जोड़ा गया है जो मप्र के नगरीय प्रशासन विभाग की एक स्थानीय तीन सदस्यीय टीम के साथ शहर को सुरक्षित बनाने के लिए कई प्रकार की गतिविधियाँ लगातार कर रहे है जिसमे प्रशिक्षण, कौशल उन्नयन, और आजीविका के साथ महिला सुरक्षा एक महत्वपूर्ण गतिविधि है. हर शहर में 52 - 52 बस्तियां प्रयोग के तौर पर ली गयी है जहां महिलाओं के समूह बनाए गए है जो अपने आर्थिक सशक्तीकरण के साथ बस्तियों की मूलभूत समस्याओं पर भी ध्यान दे रही है. ये महिला समूह अपनी बस्तियों में महिलाओं और किशोर वय की लड़कियों के मद्दे नजर "सेफ्टी आडिट" करती है जिसमे वे अपनी बस्ती का नजरी नक्शा खुद बनाती है और शाम के झुरमुटे में समूह बनाकर निकलती है और नक़्शे में उन सभी स्थानों को चिन्हांकित करती है जो महिलाओं के लिए असुरक्षित हो सकते है. विभिन्न रंगों की बिंदियाँ लगाकर ये नक़्शे में सारे ऐसे स्थान दर्शाती है जो खतरे के हो सकते है, मुख्य रूप से बस्तियों में पानी भरने के स्थान, रात के समय बिजली के खम्बों पर ट्यूब लाईट ना होना या गोले ना होना, रास्तों पर रोशनी ना होने से निकलने में दिक्कत होती है, साथ ही पर्याप्त सड़के ना होना, या खुले में शौच के लिए जाने वाली जगहों पर खतरा ज्यादा रहता है छेड़छाड़ या बलात्कार होने का , जैसे स्थानों को प्रमुखता से दर्शाती है. फिर ये एक आवेदन तैयार करके  पानी बिजली और सुरक्षा के मुद्दों को लिखकर सम्बंधित वार्ड के पार्षद और अधिकारी को ज्ञापन देती है. इस ज्ञापन में समस्याओं को सुलझाने की बात होती है, रात में पुलिस की गश्त लगाने की बात होती है, स्कूल कॉलेज आते जाते समय असामाजिक तत्वों द्वारा छेड़छाड़ की बात होती है. बाद में इसका विभागों से फालो अप भी करती है. 

                                                        (पार्षद को अपनी समस्या बताते हुए)
जैसे इंदौर के गांधी ग्राम वार्ड क्रमांक 38, जो ज़ोन क्रमांक 8 में आता है , में दिनांक 18 - 19 फरवरी को गोरु वास्कले ने अपने साथियों और बस्ती की महिलाओं और युवाओं के साथ सेफ्टी आडिट किया जिसमे ढेरों समस्याएं निकल कर आई. असुरक्षित जगहों को चिन्हांकित करने के बाद वार्ड के नव निर्वाचित पार्षद श्री हाजी उस्मान पटेल को बुलाया और सभी महिलाओं ने सुरक्षा के साथ वार्ड की समस्याओं के बारे में बताया और ज्ञापन दिया.. हाजी उस्मान ने देर ना करते हुए अपने प्रतिनिधियों को लगा दिया कि रात के समय असामाजिक तत्व ना आये बस्ती में और अपराध ना हो, अपने दफ्तर के बोरिंग से सबको पानी देने लगे, और अब बिजली के सभी खम्बों पर लट्टू और ट्यूब लाईट लगाने का कार्य चल रहा है. इसके साथ जोनल अधिकारी ने महिलाओं को कचरे के प्रबंधन के लिए एक कचरे का डिब्बा रखने का आश्वासन दिया है और मच्छरों के लिए दवाई भी छिड़की जा रही है. 

                                                               (पार्षद हाजी उस्मान पटेल )
युवा लड़के भी जुड़े है इस परियोजना से 

इस परियोजना का एक अच्छा पहलू यह भी है कि इसमे लडके युवा और किशोर भी जुड़े है जिन्हें जेंडर और महिला समानता का बाकायदा तीन - तीन दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया है, इस प्रशिक्षण में इन्हें जेंडर , लिंग भेद, महिलाओं के मुद्दे, सुरक्षा आदि मुद्दों पर संवेदनशील बनाया गया है, हर बस्ती से पन्द्रह् से बीस युवाओं को एक एक दिवसीय प्रशिक्षण भी दिए गए है ताकि वे क्लब बनाकर नियमित मिलें, खेल खेले और बातचीत करें कि अपनी बस्ती में महिलाओं, लड़कियों को सामान कैसे मिले और छेड़छाड़ कैसे रुके. चारों शहरों में युवा लड़कों के साथ महिलाओं को घरेलू हिंसा क़ानून और निर्भया काण्ड के बाद कानूनों में किये गए बदलाव, दहेज़ निषेध अधिनियम , बाल विवाह निषेध अधिनियम आदि का प्रशिक्षण दिया जाकर स्थानीय विधि सलाह्कारों से भी  जोड़ा जा रहा है ताकि महिलाओं  को निशुल्क संविधान प्रदत्त सहायता मिल सके. युवाओं को आजीविका कार्यक्रम में जोड़ा जाकर उनके कौशल उन्नयन के लिए भी जोड़ा जा रहा है ताकि वे स्वरोजगार में लिप्त होकर गौरव और सम्मान के साथ जीवन जीने को उन्मुख हो सकें. महिलाओं के स्व सहायता समूह बनाकर बैंकों से लिंक किया जा रहा है ताकि उन्हें लों आदि देकर आत्म निर्भर भी बनाया जा सकें. 

                                                      (सेफ्टी आडिट के दौरान विशेषग्य)

परियोजना का अनुश्रवण और आगे की दिशा 

परियोजना के मूल्यांकन और प्रशिक्षण आदि के लिए प्रदेश के चारों शहरों में तीन - तीन सदस्यों की एक टीम है और राज्य स्तर पर चार वरिष्ठ सलाह्कार चारों शहरों में घूम घूमकर अंशकालीन काम कर गतिविधियों को संचालित करने में सहयोग दे रहे है, ये सलाहकार सामग्री बनाने से लेकर, प्रशिक्षण, दस्तावेजीकरण आदि का कार्य करते है और समय समय पर विभाग के अधिकारियों के साथ समन्वय का कार्य भी करते है. यह सम्पूर्ण कार्य नगर निगम और मप्र शासन के नगरीय प्रशासन विभाग की मदद से हो रहा है. इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में आगे स्थानीय ट्रांसपोर्ट से जुड़े बसों, टेम्पो और वाहनों के चालको और कंडक्टर्स  के साथ महिला सुरक्षा के मुद्दों पर उन्मुखीकरण के काम की योजना है. "सेफ्टी पिन" नामक एक एप को लांच किया गया है जो महिलाओं को सुरक्षा में मदद करेगा. हाल ही में ब्रिटिश सरकार की मंत्री द्वय ने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेक लोगों ने मध्य प्रदेश में हो रहे इस अनूठे प्रयोग को, संस्थाओं द्वारा किये जा रहे नवाचारों को देखा है जहां लड़कों के बीच जेंडर  के स्टिरीयोटाईप रोल तोड़ने के लिए 'रोटी बेलो' प्रतियोगिता रखी गयी थी जैसे आयोजनों को देखा और सराहा है. 








पेपर वेट - अरुण देव





|| पेपर वेट ||
उसका वजन 

कागजों को इधर उधर बिखरने से रोकता है

अपने भार से 

वह कागजों को कुचलता नहीं कभी भी


ताकत की यह भी एक नैतिकता है।


  अरुण देव

भूमि अधिग्रणण क़ानून और सामंद्वादी जमीनें........


भारत के लोगों के लिए कल का काला दिन ऐतिहासिक है, जब लोकसभा ने सभी 9 बिलों को हडबडी में बिना सोचे समझे पास कर दिया जिसमे भूमि अधिग्रहण महत्वपूर्ण बिल है. सच में विकास के मायने में यह बिल पास होना अतिआवश्यक था.
मोदी जी और इनकी देशभक्ति को सलाम करने का जी चाहता है जो किसानों और आम आदमी, दलित और आदिवासियों के हमदर्द बनकर उभरे बहुमत से सता में आये और एक झटके में ऐसा बिल बनाया पास किया कि सबकी गरीबी एक झटके में जादू से दूर हो जायेगी.
अब मेरी मांग है कि:-
1. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और केबिनेट मंत्रियों, विधायको और तमाम संवैधानिक पदों पर बैठे लगों के कार्यालय, निजी बंगले, और सरकारी क्वार्टर्स पर भी अधिग्रहण किया जाए जो बीच शहरों में पसरे पड़े है और फ़ालतू की जमीन हथियाए हुए है.
2. सभी राज्यों में प्रशासनिक अधिकारियों के बंगले, क्वार्टर्स , और ऐसे जमीनों पर अधिग्रहण किया जाए जो किसी काम की नहीं है और सिर्फ एक व्यक्ति या परिवार के काम आती है.
3. जिला कलेक्टर्स, एस पी, एस डी एम, तहसीलदारों और तमाम बाबूओं के घरों पर अधिग्रहण किया जाए जो सरकारी लम्बे चौड़े बंगलों में रहते है और पुरी सरकारी संपत्ति को बाप का माल समझकर इस्तेमाल करते है.
अम्बानी , अडानी और तमाम टाटा, बिड़लाओं से करबद्ध निवेदन है कि इन सभी जगहों पर माल बनाए, मल्टी बनाएं, उद्योग खोलें, और निजी हाथों में ले लें.
इस देश के आम लोगों को भूमि अधिग्रहण से कोई दिक्कत नहीं है, बशर्तें इन सभी लोगों द्वारा अनधिकृत रूप से घेरी गयी और अंग्रेजों की घृणित परम्परा को ढोते हुए जिसे हम इन्हें सत्तर सालों से जमींदारी प्रथा और सामंद्वादी तरीकों से कब्जा करके बर्दाश्त कर रहे है. कितने आम लोगों को खबर है कि इन जमीनों के टैक्स का क्या, इनकी सुख सुविधाओं का क्या, इनके पानी बिजली के खर्चों का क्या, और इनके उपयोग या उगाई गयी फसलों या साग सब्जियों का क्या हिसाब है?
अगर मोदी सरकार सच में भूमि अधिग्रहण करना चाहती है तो पहले अपने अन्दर देखें जैसे भोपाल में मुख्यमंत्री का श्यामला हिल्स पर बँगला, या रोशनपुरा पर बना राज्यपाल का बँगला या ग्वालियर में मेण रोड पर कलेक्टर और कमिश्नर के बंगले या सीहोर कलेक्टर का बँगला जहां हर साल खेती बाडी करके मौसमी फसलें उगाई जाती है, या चार इमली भोपाल के बंगले, इंदौर के रेसीडेंसी एरिये में बने शासकीय आवास, विश्वविद्यालयों में पसरी जमीन जहां गाय ढोर चरते रहते है, तमाम बिडला मंदिरों और महांकालों मंदिरों की जमीन, जामा और ताजुल मस्जिदों के पास पडी जमीन, जबलपुर, इंदौर या भोपाल में क्रिश्चियन मिशनरियों के पास अथाह जमीन जो शहरों के बीचो बीच है और मालिकाना कब्जे की है, ये तो सिर्फ चंद उदाहरण है जहां त्वरित कार्यवाही की जरुरत है, बाकी तो हमारे मप्र के नेताद्वय माननीय मेंदोला जी और केबिनेट मंत्री श्रद्धेय कैलाश विजयवर्गीय जी ज्यादा पक्के सबूतों के साथ बता सकते है. संपदा विभाग क्या करता है ???

Thursday, March 5, 2015

India's Daughter - A Must See Movie

 निशुल्क दिखाए इंडियाज डाटर 


"इंडियाज डाटर" एक बार देख लो फिर अपने घर की ओर देखना और उसके बाद कोई कमेन्ट करेंगे तो बेहतर होगा.


यह फिल्म नहीं, हमारे समाज और विकास की कहानी है, वकील, न्यायाधीश, पुलिस, अस्पताल, समाज के ठेकदार, दलाल और गरीबी के दुश्चक्र में फंसे लोगों का जीवंत दस्तावेज. मेरा चैलेन्ज है कि हिन्दुस्तान में किसी माई के लाल में ना वो संवेदना है ना समझ कि एक केस के माध्यम से समूचे भारतीयत्व को नंगा करके कहे कि "राजा नंगा है" और इतनी दमदार असरदायक फिल्म बना लें. भारतीयता, जनमानस और पुरुष प्रधान समाज को कितनी बारीकी से पकड़ कर व्याखित किया है. यह फिल्म समाजसेवियों महिलावादियों और एनजीओ कर्मियों की भी पड़ताल करती है और दिखाती है कि कैसे हम रिएक्ट करते है, कैसे पैरवी और कैसे मेनुपुलेट करते है.



जो साथी क्या इंटरकोर्स दिखाए जन मानस को, जैसे भोले प्रश्न करके समाज की हलचल को समझने का प्रयास नहीं कर रहे और भला बुरा कह रहे है उन्हें यह समझना होगा कि समय अब बदल रहा है और सूचना तकनीक के युग में सब कुछ उजला उजला नहीं है. हमारे बच्चे हमसे ज्यादा हमारे समय को जानते है, उनके मोबाईल में नेट के जरिये एक वृहद् संसार बसता है, जिसकी जानकारी माँ - बाप को भी प्रायः नहीं होती और ठीक इसके विपरीत ये पीढी बेहद संवेदनशील और जागरुक भी है.

एक घंटे की यह फिल्म देखी अभी डाउन लोड करके, ये दीगर बात है कि माननीय राजनाथ सिंह जी ने आज सदन को आश्वस्त किया था कि ये फिल्म कही भी नहीं देखी जायेगी परन्तु बड़ी आसानी से यह अपने कंप्यूटर सिस्टम पर ली जा सकती है, वकील सिंह साहब का कहना कि संसद में 200 बलात्कारी है - उनके लिए भी फास्ट ट्रेक कोर्ट लगाओ, सही है, वाजिब और निहायत आवश्यक प्रश्न, क्या माननीय सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेकर इस फिल्म के हवाले से संसद की अध्यक्षा परम आदरणीय सुमित्रा ताई को को एक स्पष्टीकरण भेजेगा, क्योकि इससे आपके - हमारे देश की छबि साफ़ होगी, और संसद में निहाल्चंद्र जैसे सांसदों को घर वापसी का बेहतर मौका मिलेगा.


आईये, इस फिल्म को देखें - दिखाए और समझाएं कि इसके मायने क्या है और समझ क्या बनेगी. सम्मान करें और सम्मान पायें. एक सही मौके और अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भारतीय समाज और क्षितिज पर चर्चा में आई इस फिल्म को मेरी नजर में निशुल्क दिखाना चाहिए छविग्रहों में, अगर इतना साहस हमारे समाज में नहीं, सरकार में नहीं तो घरेलू हिंसा क़ानून से महिला हिंसा निषेध 2005 जैसे क़ानून को रद्द कर दो और फिर एक जंगल राज के घोषणा कर दो संविधान सम्मत !!!!

कामरेड डा अजय कुमार खरे - अमर रहें ।







सन 1987  की बात, साक्षरता और जनान्दोलनों का दौर, भोपाल गैस त्रासदी, छोला रोड पर इकठ्ठा हम लोग एक भीड़ जिसमे ख्यात वैज्ञानिक, डाक्टर, मजदूर, शिक्षक, केरला शास्त्र साहित्य परिषद् का जन विज्ञान जत्था और विज्ञान का उपयोग कैसे लोगों के हित में हो इस पर रवीन्द्र भवन में दो दिन के लम्बे लम्बे सेशन. बाद में सन 1990 में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता वर्ष और पुरे देश में हलचल, कई दोस्त बने हम लोग बड़े हो रहे थे, विचारधारा समझ रहे थे, काम की समझ विकसित कर रहे थे, कई दोस्त साथ थे - जो अलग अलग व्यवसाय काम धंधों से आते थे, उनमे से एक अलग शख्स था - डा अजय खरे, बहुत बाद में पता चला कि ये बन्दा प्रापर डाक्टर है, और वो भी पी जी है, दोस्ती का सिलसिला बढ़ा, और फिर ये दोस्ती ऐसी चली कि कल रात 230 बजे ख़त्म करके वह बन्दा चला गया यकायक और बगैर बताये.. क्यों क्या एक बार बताओगे डा अजय खरे............???

इस बीच   इस तीन दशकों में लगभग हम लोगों ने देश भर में स्वास्थ्य, शिक्षा और साक्षरता का गहरा काम संजीदगी से किया, इस सबमे विनोद रायना, संतोष चौबे, लाखन सिंह, एस आर आजाद, अजय और पुरी मंडली थी - जिन्होंने नेतृत्व दिया था, अनेक आन्दोलनों को और अभियानों को, जब भी स्वास्थ्य की बात होती अजय से राय ली जाती, भारत ज्ञान विज्ञान समिति के देशी , प्रादेशिक सम्मेलनों में शिरकत कर हम लोग देर रात तक पोस्टर बनाते, कार्यशालाओं की तैयारी करते, बहस करते, लड़ते झगड़ते, और फिर साथ में मस्ती करते, घूमते और आम लोगों के हितों की ही बात करते. मै सात बरस भोपाल में रहा काम के लिए, शायद ही ऐसा हफ्ता गुजरता हो - जब अजय से बात नहीं होती या बी जी वी एस के दफ्तर में कोई गोष्ठी में ना मिलते हो, चाहे प्रयास के नरेद्र गुप्ता आये हो तब या दिल्ली से के के आये हो या मप्र लोक साझा एवं संघर्ष अभियान के किसी कार्यक्रम में, विकास संवाद के किसी बहस में. स्वास्थ्य या किसी भी जन अभियान में अजय की राय बहुत मायने रखती थी और वे बहुत गंभीरता से निष्पक्ष राय देते थे. बाद में संतोष चौबे वैचारिक रूप से अलग हो गए इस अभियान से परन्तु दोस्ती और प्यार मोहब्बत बनी रही आपस में.

पिछले कई   बरसों से अजय, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के साथ काम कर रहे थे, हालांकि मुझे उनके बैतूल पद स्थापना के दिन भी याद है, जब हम वहाँ मिले थे या जवाहर कैंसर अस्पताल भोपाल के दिन या 1250 अस्पताल के दिन, पर पिछले कुछ समय से वे एन आर एच एम भोपाल में जन स्वास्थ्य और सरकार की जन विरोधी नीतियों की लड़ाई तंत्र के अन्दर रहकर लड़ रहे थे. नकली दवाओं, अमानक स्तर की दवाओं, सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों पर बढ़ाते काम के दबाव और थोपे गए शासकीय तनाव पर भी काम करके सरकारी तंत्र में डाक्टरों की इज्जत और गरिमा के लिए भी काम कर रहे थे, ग्रामीण क्षेत्र में जन स्वास्थ्य सुविधाएं कैसे बढे, आशा और बहु उद्देशीय कार्यकर्ता, टेक्नीकल स्टाफ, और इन जैसे जमीनी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की क्षमता कैसे बढ़ाई जाए - इस पर भी वे एक पुरी टीम के साथ काम कर रहे थे, नीतियाँ बना रहे थे, मोड्यूल विकसित कर रहे थे, आरती पांडे, सविता, और कई ऐसे साथी उनकी इस यात्रा में जुड़े थे, ये सब और हम लोग अजय के भरोसे ही स्वास्थ्य के बारे कुछ भी कह देते थे और कर लेते थे. मैंने हाल ही में क्राय के लिए प्रदेश के चौदह जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं पर माताओं और शिशुओं की पहुँच पर एक अध्ययन किया था जिस की रिपोर्ट पर उन्होंने सार्थक सुझाव दिए थे ताकि योजना और नीती में परिवर्तन के लिए लोक स्वास्थ्यएवं परिवार कल्याण विभाग को सुझाव दिए जा सके. मेरी हाई शुगर के लिए भी वे चिंतित रहते थे और कहते थे कि यार सही से दवा ले लिया करो, सीहोर में जब मै था तो कईं बार सरकारी अस्पताल में मुलाक़ात हो जाती थी अनुश्रवण और मूल्यांकन के दौरान हम फील्ड में साथ चले जाते थे. ग्राम आरोग्य केन्द्रों को बेहतर करने में हमारे नवाचार को उन्होंने एक शेप दिया था जरुरी संसाधनों और दवाईयों की सूची बनाकर जो आवश्यक हो सकती थी.

अजय भाई   का इस पुरी लड़ाई से यूँ चले जाना बहुत ही दुखद है, कल ही उनका जन्मदिन था और मैंने उनके रचनात्मक और दीर्घायु होने की कामना की थी, अब डर लग रहा है कि यह क्या होगा, काल ने पहले हमसे विनोद भाई को छिना और फिर आज अजय को, लग रहा है कि हम हार रहे है लगातार - नियति और प्रकृति भी कैसा क्रूर मजाक कर रही है.

मित्र राहुल  का कहना है कि कल रात ढाई बजे बड़वानी से लौटते समय सीहोर के पास एक खड़े ट्रक में कार का घूस जाना, ड्राईवर का बच जाना और अजय का मौके पर ही ख़त्म हो जाना कही कोई गहरी साजिश तो नहीं है मौत की, क्योकि वे एक लम्बी लड़ाई दवा माफियाओं के खिलाफ लड़ रहे थे, उन्हें पांच बार जान से मारने की धमकी मिल चुकी थी, एक बार यह पूरा मामला ई टीवी पर भी आ चुका था जब उन्हें उनके मोबाईल पर लगातार धमकियां मिल रही थी. तंत्र में डाक्टरों का और प्रशासनिक अधिकारियों का एक धडा उनके खिलाफ था, जो भी हो अब अजय तो चले ही गए है एक पुरी लड़ाई हम सबको देकर और सौंपकर. जन स्वास्थ्य, ग्रामीण और गरीब लोगों के हकों की लड़ाई करने वाला तंत्र में बैठा एक मददगार हमने खो दिया है. जरुरत है कि अजय भाई के काम को आगे बढाने के लिए प्रदेश के सभी साथी मिल जुलकर प्रयास करें और सभी डाक्टर, स्वास्थ्यकर्मी लामबंद होकर उस लड़ाई और उन मुद्दों पर संगठित रूप से काम करें जो उन्होंने उठाये थे और अधूरे छोड़े थे.

डा अजय  खरे जो मप्र में और पुरे देश में जन स्वास्थ्य अभियान खड़े करने वाले बेहतरीन इंसान और काबिल डाक्टर थे, का इस तरह से देहावसान हो जाना दुखद है. देश और प्रदेश ने एक काबिल डाक्टर, बेहतरीन इंसान और हम सबने एक अच्छा प्यारा दोस्त खो दिया। आज सुबह से यह खबर पाकर बहुत आहत हूँ । सन् 87 से अजय से दोस्ती थी और हर समय उन्हें अपने साथ पाता था। डा विनोद रायना की मौत के बाद अजय का यूँ चले जाना पुरे जनांदोलनों की एक बड़ी क्षति है और जन स्वास्थ्य, ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और डाक्टरों की लड़ाई का पुरोधा और एक सच्चे मित्र का यूँ गुजर जाना उम्र के इस पड़ाव पर बहुत अखरेगा, यह ठीक नहीं है अजय भाई, यह एक धोखा है हम सबके साथ.

कल रात   देवास से अनिल करमेले और मनोज कुलकर्णी जा रहे थे तो मैंने दो बार कहा कि सम्हलकर जाना, मनोज को शायद अजीब लगा होगा परन्तु ना जाने क्यों अब रात के समय सफ़र करने में डर लगता है और कोई परिजन या मित्र भी जा रहे हो तो डर लगता है, खैर.

कामरेड डा अजय खरे अमर रहें ।