Saturday, January 31, 2015

जिला आपूति अधिकारी श्रीमती ज्योति जैन का सद्व्यवहार

छोटे भाई की मृत्यु पश्चात कागजो की कार्यवाही और ना जाने कौन - कौनसी प्रक्रियाओं से तंग आ गया हूँ. सरकारी देयक अभी तक तो मिले नहीं है, मुख्यमंत्री हेल्प लाइन के भी बुरे हाल है मप्र में. 6 दिसंबर को शिकायत दर्ज करवाई थी परन्तु कुछ होने से रहा, भाई की पत्नी को सामान्य प्रशासन विभाग के नियमों के तहत अनुकम्पा नियुक्ति मिलना चाहिए परन्तु मप्र के अनूठे प्रशासन और भ्रष्ट राज में किसी का कोई काम समय पर हो जाए तो क्या बात है. जिले के अधिकारियों से लेकर मप्र के मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और तमाम सचिवों, आयुक्त उज्जैन श्री रविन्द्र पस्तोर को भी आवेदन किये पर कुछ किसी का काम हो जाए तो वो प्रशासन ही क्या ? जो सरकार अपने मृत कर्मचारी के परिवार के देयको का भुगतान जो उसके परिवार का अधिकार है एक समय सीमा में नहीं कर सकती वह क्या मप्र बनाओ या कुशल प्रशासन का उदाहरण देगी. 

ऐसा ही एल पी जी गैस के कागज़ स्थानांतरित करवाने में हुआ, देवास के एक गैस एजेंसी ने कागज़ बदली के नाम पर मूल कागज़ रख लिए और भाभी को धमकाकर कर पांच सौ रूपये ऐठ लिए थे, कल जब एजेंसी पर मै गया और पूछा कि शपथ पत्र की क्या जरुरत है और पांच सौ रुपयों की रसीद दो तो उपस्थित कर्मचारी ने बहुत ही बद्तमीजी से बात की. फिर मैंने तय किया इस एजेंसी को सबक सीखाये बिना काम होगा नहीं अतः आज पुनः मिलने की बात करके आ गया. आज सुबह पुनः गया और उससे कहा कि "बॉस रसीद दे दो या रूपये वापिस करो, थोड़ी देर बाद मुझे रूपये वापिस आकर दिए गए और मैनेजर ने कहा कि माफी चाहता हूँ कि कल आपके साथ बदतमीजी हुई, मै शपथ पत्र के भी रूपये देने को तैयार हूँ, क्योकि आज मै पुरे नियम कायदों का अध्ययन करके गया था और आज अड़ गया था कि उसने जो भी किया वह गलत था. 

फिर मै आज ही तत्काल देवास की जिला आपूर्ति अधिकारी श्रीमती ज्योति जैन से मिला, जिन्होंने मेरी शिकायत ध्यान से सुनी और  बोली मै कार्यवाही करूंगी, उन्होंने कहा कि गैस एजेंसी को लेकर अगर लोग जागरुक हो जाए तो आधी शिकायतें हल हो जायेंगी, उन्होंने बताया कि असल अब जब आधार कार्ड से इस योजना को जोड़ा जा रहा है तो गैस एजंसी वालो के सारे काले धंधे और अवैध कारनामे सामने आ रहे है इससे बेचैनी बढ़ी है इन लोगो में. थोड़ी देर बाद गैस एजेंसी के मालिक का फोन आया और बोला कि माफी दे दो और अबकी बार आगे से कोई बदतमीजी नहीं होगी ना महिलाओं के साथ ना किसी पुरुष के साथ ना ही कोई अवैध शुल्क वसूला जाएगा. साथ ही एक डिस्प्ले बोर्ड लगाने का उसने वादा किया. 

मुझे आश्चर्य लगा कि दूकान पर जिला आपूर्ति अधिकारी श्रीमती ज्योति जैन अपने एक अधिकारी श्री धर्मेन्द्र वर्मा भी उपस्थित थी, उन्होने भी मुझसे मालिक के फोन से ही बात की और कार्यवाही का आश्वासन दिया. 

यह सब दिखाता है कि यदि हम सही अधिकारियों को सही समय पर बगैर डरे शिकायत करें और उन्हें जानकारी दें तो तुरंत शिकायत निराकरण हो सकता है. आभारी हूँ देवास जिले की अधिकारी श्रीमती ज्योति जैन (सिंघई) का जिन्होंने तत्परता से कार्यवाही की. ऐसे समय में जब कर्मचारी काम को लेकर रोते रहते है उसमे श्रीमती जैन का तत्काल कार्यवाही करना एक हवा का सुखद झोका है.

Thursday, January 29, 2015

“नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएं“ - पुरुषोत्तम अग्रवाल (ख्यात साहित्यकार)



इस संकलन के आरंभ में अनेक घटनाओं को एक छोटे शहर के आख्यान के कैनवास पर उकेरते कुछ गद्यांश हैं, जो अपनी समग्रता मेंजीवन, मित्रता,विवशता, निर्वासन और पलायन और आत्महत्या के बयान हैं; साथ ही, खुद उस शहर की मजबूरी के बखान भी। फिर हैं कुछ कहानियाँ जो अपनी सहज कहन के कारण अपनी बेचैनी की स्मृतियाँ पाठक के मन में छोड़ जाती हैं। संदीप नाइक की इन बेचैन कथाओं में नर्मदा नदी व्यक्तिगत और सामूहिक सुख-दु:ख, संघर्षों और स्वप्नों को धारण करती हुई बहती है, और उसकी आवाज हम संदीप के सहज गद्य में सुन सकते हैं।

तेजी से नगरीकरण की ओर बढ़ते समाज में हर तरह की ताकत केन्द्रीकृत होती जा रही है, और छोटे शहर, कस्बे और गाँव सत्ताकेंद्रों की प्रयोगशालाओं और ऐसे अजूबों में बदलते जा रहे हैं, जिनसे सत्ताकेंद्र या तो दया का रिश्ता बनाते हैं, या उपहास का। संकलन की सभी कहानियाँ इस दया और उपहास से उत्पन्न बेचैनी की ही कथाएँ हैं। संदीप की इन कहानियों में आदर्शों की विफल खोज से बेचैन नौजवान हैं, तो फिल्मस्टारों के सपने देखते अपने पागलपन में एकतान जीवन की सीमाएँ लांघ रहे नौजवान भी। इन कहानियों में ‘छोटे शहर का आदमी’ अपने ‘नारायण टाकीज’ को बदलते भी देख रहा है, और किसी अनाम गंध के ठोस आकार ले लेने जैसी घटनाओं को अपनी आँखों के सामने घटते भी। ये कहानियाँ निजी अनुभव की ही हैं, लेकिन संदीप इन्हें विन्यस्त करते हैं, व्यापक अनुभव और सामूहिक स्मृति के ताने-बाने में: इस तरह ये कहानियाँ निजी बेचैनी के साथ ही, सचमुच नदी किनारे की सामूहिक बेचैनी की कथाएँ भी बन जाती हैं।

आशा करता हूँ कि संदीप नाईक और लिखेंगे, शिल्प पर कुछ और ध्यान देते हुए लिखेंगे। 

इस नये कथा-स्वर का स्वागत होना ही चाहिए।

पुरुषोतम अग्रवाल, Purushottam Agrawal)
ख्यात साहित्यकार, नई दिल्ली

Wednesday, January 28, 2015

दिन भर मजदूरी के बाद रात में यहां होते हैं कबीर भजन, ऐसे मिली दुनिया में प्रसिद्धी - भास्कर.कॉम 28 जनवरी 2015


http://www.bhaskar.com/news/c-58-2440911-NOR.html?version=2


भोपाल। गणतंत्र दिवस से राजधानी भोपाल में शुरू हुए लोकरंग महोत्सव में  मप्र के साथ-साथ देश और विदेश के लोक नृत्यों और गायनों की पेशकश की जाएगी। बुधवार को भी लाेकराग कार्यक्रम के तहत लाेकवाद्यों की यात्रा और  लोकधुनें गाई  जाएंगी। लोकरंग इस साल मालवा की संस्कृति पर केंद्रित है। इसी मालवा में कबीर गायन बेहद प्रचलित है और इस गायन की बदौलत दुनिया भर में मालवा को ख्याती मिली  है। DAINIKBHASKAR.COM के माध्यम से संदीप नाईक आपको बता रहे है इसी कबीर गायन  के बारे में।

प्रहलाद सिहं टिपान्या प्रसिद्ध कबीर गायक हैं।


रात का समय है, ठण्ड अपने चरम पर है, चारो ओर कुहासा है, खेतों से ठंडी हवाएं आ रही है, बिजली नहीं है परन्तु गाँव के दूर एकांत में कंकड़ पर लोग बैठे है, बीडी के धुएं और अलाव के बीच लगातार भजन जारी है और सिर्फ भजन ही नहीं उन पर जमकर बातचीत भी हो रही है कि क्यों हम परलोक की बात करते है, क्यों कबीर साहब ने आत्मा की बात की या क्यों कहा कि “हिरणा समझ बूझ वन चरना”। लोगों की भीड़ में वृद्ध, युवा और महिलायें बच्चे भी शामिल है. यह है मालवा का एक गांव। यह कहानी एक गांव की नहीं कमोबेश हर गांव की है जहां एक समुदाय विशेषकर दलित लोग रोज दिन भर जी तोड़ मेहनत के बाद शाम को अपने काम निपटाकर बैठते है और सत्संग करते है, कोई आडम्बर नहीं, कोई दिखावा नहीं और कोई खर्च नहीं. ये मेहनतकश लोग कबीर को सिर्फ गाते ही नहीं वरन अपने जीवन में भी उतारते हैं। 
सैंकड़ों साल पुरानी परंपरा
पिछले सैंकड़ों बरसों से यह गाने बजाने की परम्परा मालवा में चली आ रही है. कबीर भजनों की इस परम्परा का पता जब एकलव्य संस्था के लोगो को लगा था तो सबसे पहला प्रश्न यह था कि इन लोगों में दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद ऊर्जा कहां से आती है कि रात भर बैठकर भजन गाते है और खुलकर चर्चा करते है? धीरे धीरे अध्ययन किया, मालवा की भजन मंडलियों के कामों का एक दस्तावेज बनाया गया। पहली बार प्रहलाद सिंह टिपान्या का कैसेट बना और काम की शुरुआत हुई। प्रहलाद के कैसेट बनने के बाद मालवी कबीर के भजनों को जिले, प्रदेश और देश में सराहा गया।
बिमारी में सिर्फ कबीर सुनते थे कुमार गंधर्व
साहित्य, ललित कलाओं और गीत संगीत मालवा की खासियत रही है। शास्त्रीय संगीत के मूर्धन्य गायक पंडित कुमार गन्धर्व ने इस शहर को अपने जीवन में जो स्थान दिया वह तो सभी जानते है। टीबी जैसी बीमारी होने के बाद जब उनका एक फेफड़ा निकाल दिया गया तो हवा बदलने के लिए वे इस शहर में यहां आये और फिर यही के होकर रह गए, बीमारी के दौरान जब वे अपना इलाज करवा रहे थे तो अपने आसपास कबीर मंडलियों को इकठ्ठा कर लेते थे और ध्यान से सुनते थे. कालान्तर में उन्होंने बाकी सब छोड़कर कबीर की ऐसी चदरिया बुनी कि सारी दुनिया देखती रह गयी।
ऐसे मिली विश्व प्रसिद्धी
मालवा के भजनों और कबीर की सुवास जब स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में दक्षिण एशिया के संस्कृति और भाषा विभाग की हेड प्रोफ़ेसर लिंडा हैज़ तक पहुंची तो उन्हें यह काम बड़ा आश्चर्यजनक लगा कि कैसे सैकड़ों बरसों से लोग वाचिक परम्परा को निभाते चले आ रहे है, बस फिर क्या था लिंडा पहिंच गयी मालवा और गांव-गांव में घूमकर भजन इकठ्ठे किये। भजनों का अंग्रेज़ी अनुवाद किया गया और फिर ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस से उनकी किताबें आई। लिंडा यही नहीं रुकी उन्होंने देश में और अमेरिका में भी मालवी भजनों को पहुंचाया। प्रहलाद सिंह तिपान्या और उनकी मंडली को तीन माह तक अमेरिका के दर्जनों विश्वविद्यालयों में घुमाया और उनके कार्यक्रम आयोजित किये। 
बनी हैं कई फिल्में
बेंगलुरु की शबनम वीरमनि ने जब यह सुना तो वे भी दौड़ी चली आई और चार फिल्में बना डाली। इस तरह से मालवी कबीर के भजनों की प्रसिद्धी देश-विदेश में पहुंची।
भजनों में सूफी अंदाज
प्रहलाद सिंह टिपान्या को भारत सरकार ने पदमश्री से समानित किया. उनके बेटे अजय ने बताया कि अब वे भजनों के साथ साथ सूफ़ी कव्व्वाली के अंदाज को भी परखने का कार्य कर रहे है ताकि जन मानस में प्रचलित इस विधा को इस्तेमाल करते हुए सौहार्द्र और शान्ति के लिए इस्तेमाल किया जा सके। मालवा के अंचल में पसरी यह निर्गुणी भजनों की यह वृहद और सशक्त परम्परा इस बात की इस परंपरा के जरिये समाज के निचले तबके से बदलाव की कोशिशें जारी है। 

Sunday, January 25, 2015

डा जनक पलटा को पदमश्री मिली सन 2015 में



जनक दीदी के बारे में कल ही राहुल जैन से लम्बी बात हुई और फिर उनके काम और बहाई अध्ययन केंद्र , बरली केंद्र इंदौर आदिवासी लड़कियों के कौशल उन्नयन की बातें, फिर साधना और हेर्विग के काम और कवछा में कल्याणी संस्थान के काम, समाज सेवा और तमाम बातें.

अच्छा यह है कि अब गर्व से कह सकता हूँ कि मै चार पदमश्री प्राप्त लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ और इन लोगों से बहुत कुछ सीखा है और अभी बहुत कुछ सीखना बाकी भी है. संगीत के क्षेत्र की आदरणीय वसुंधरा ताई, शिक्षा के डा जे एस राजपूत, कबीर गायक प्रहलाद सिंह टीपान्या और अब समाज सेवा की जनक दीदी.

बधाई और बहुत मुबारकबाद जनक दीदी को, आपने जो काम किये और शुरू किये है और अभी भी सक्रीय है, यह तसल्ली की बात है और इन दिनों जैविक खेती, सब्जियों और उत्पादों का आप जो अदभुत काम कर रही है वह सराहनीय है.

जनक दीदी से अभी बात की तो मैंने कहा कि अब जैविक मिठाई बनाओ तो खाने आता हूँ, बहुत सहजता से और प्यार से आमंत्रित करते हुए बोली कि "संदीप, यह सब तुम लोगों के सहयोग और लम्बे साथ की वजह से ही संभव हो पाया है, और जैविक मिठाई का आईडीया भी अच्छा है, जल्दी से आ जाओ, बस जा रहा हूँ, आईये, आप लोग भी मजा आयेगा सच में.

"अपने अवगुणों को ढकते हुए"



"अपने अवगुणों को ढकते हुए"
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फिर रख दूंगा अखबारों में तह करके
यह शाल किसी आलमारी में
अगले बरस तक याद ना आयेगी
और फिर एक दिन ढूंढून्गा किसी
कंपकपा देने वाली सर्दी में अगले बरस
सालों से जारी है सिलसिला शाल का
इस तरह से कितनी ही शालें आती रही
गुमती रही, कभी कोई ले गया और
लौटाई नहीं भलमानसहत में पूछा नहीं
कभी ट्रेन में, कभी शादी में गुम गयी
हर बार एक शाल के लिए दुनिया घूमा
कभी तिब्बती से, कभी रेडीमेड वाले से
पर हर बार झिक झिक करके नई खरीदी
कभी कोई दे गया माँ को तो
हड़प ली झपटकर कि अच्छी है
ओढ़ा तो लगा हर बार गुमने का खटका था
जतन से सम्हालता और सहेजता
कभी एक बार तो कभी दो बार
धो लिया सीजन में शाल को हलके से
कभी शाल को अपने रोज की जिन्दगी में
वह स्थान नहीं दे पाया जिसका हक़
वह रखती थी, एक अदद स्थान जीवन में
शाल के रेशे यहाँ वहाँ गड़ते रहते और
उधड़ते रहते जीवन के ख़्वाबों की तरह
शाल के रंगों की तरह बदलता रहा यार दोस्त
हर बार या तो गुम गए या ले गया कोई
मंजिलों और रास्तों के बीच मेरे सारे अवगुण
छुपाती रही शाल और बचाती रही सर्द हवाओं से
धुल और गुबार से, कोहरे और ओंस की बूंदों से
आज याद करता हूँ फीकी पड़ी हुई शालों को
एक गठरी निकल आती है संसार के कोनों-कोनों से
और शालों के बीच से आवाजें रेंगती है आहिस्ते से
यह अवगुणों की दास्तान है या सदियों की गर्द
अपने आपसे पूछता हूँ तो एक झूठ बोल लेता हूँ
शाल को एक बार फिर से समेटने का वक्त है
और मेरे सामने फिर से यह लाल शाल पड़ी है
एक प्रश्न, एक विचार और एक अवागर्द की भाँती
सवाल यह है कि अब इसे सहेजने की हिम्मत नहीं है
लगता है अब उधेड़ दूं रेशा-रेशा और आने दूं हवाओं को.
यह सही समय है शाल समेटने का क्योकि अब
चिंता नहीं है कि आगे मौसम में शाल कैसे आयेगी
शाल का एक ढेर देख रहा हूँ, देख रहा हूँ ढेर और ढेर
अफसोस यह है कि इतने शालों का इस्तेमाल नहीं होगा.

- संदीप नाईक 
25 जनवरी 2015 


Sunday, January 18, 2015

The Most Favorite Post of 2014 on Facebook











ये है श्याम लाल अमरकंटक एक्सप्रेस में एसी कोच की देखरेख करते है। कल इन्होने बताया कि लोग कम्बल नेपकिन और सफ़ेद चादरे चुरा ले जाते है फलस्वरूप इनके छह हजार वेतन से हर माह ठेकेदार पंद्रह सौ काट लेता है। इन्होने कहा कि ये दुर्ग के पास एक गाँव में रहते है बहुत गरीब परिवार है चार हजार में गुजारा भत्ता कैसे होगा। यह सोचना ही मुश्किल है। 

एक सवाल बड़ी मासूमियत से श्यामलाल यादव ने पूछा कि आप लोग जो एक-दो हजार का टिकिट खरीदते है रेलवे के कम्बल और नेपकिन क्यों उठा ले जाते है । अगर यही आपका दांत मांजने का ब्रश भी आप बेसिन पर भूल जाते है तो चोरी का इल्जाम हम जैसे गरीबों पर लग जाता है। रात को हमें रूपये देकर सिगरेट दारु माँगते है। कैसे बड़े लोग एसी में आते है और आपकी नियत कितनी खराब होती है। जितनी गन्दगी आप लोग करके जाते है उतनी तो हम भी नहीं करते भले झोपड़ियों में रहते हो। 


श्यामलाल ने कहा कि हमें आपके जैसे बड़े लोगों से नफ़रत है जो देश चलाने का काम करते है। गरीबों की हाय लेकर और रेलवे के नेपकिन चुराकर कौनसा मैदान जीत लोगे आप लोग....


श्यामलाल देर तक बड बड रहा था और मै सोच रहा था कि क्या अब इस चुनाव के बाद हम अपना "नेशनल केरेक्टर" बना पायेंगे कभी या हर गरीब गुर्गा कलपता रहेगा और कोसता रहेगा .


2,200 Likes, 3228 Shared and 300 Comments on Facebook and raised a question in favor of this poor boy Shyamlal. 

A Post of  15 April 2014.

Saturday, January 17, 2015

गिरना - नरेश सक्सेना





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चीजों के गिरने के नियम होते हैं मनुष्यों के गिरने के
कोई नियम नहीं होते
लेकिन चीजें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं
अपने गिरने के बारे में
मनुष्य कर सकते हैं
बचपन से ऐसी नसीहतें मिलती रहीं
कि गिरना हो तो घर में गिरो
बाहर मत गिरो
यानी चिट्ठी में गिरो
लिफाफे में बचे रहो, यानी
आँखों में गिरो
चश्मे में बचे रहो, यानी
शब्दों में बचे रहो
अर्थों में गिरो
यही सोच कर गिरा भीतर
कि औसत कद का मैं
साढ़े पाँच फीट से ज्यादा क्या गिरूँगा
लेकिन कितनी ऊँचाई थी वह
कि गिरना मेरा खत्म ही नहीं हो रहा
चीजों के गिरने की असलियत का पर्दाफाश हुआ
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के मध्य,
जहाँ, पीसा की टेढ़ी मीनार की आखिरी सीढ़ी
चढ़ता है गैलीलियो, और चिल्ला कर कहता है -
'इटली के लोगो,
अरस्तू का कथन है कि, भारी चीजें तेजी से गिरती हैं
और हल्की चीजें धीरे धीरे
लेकिन अभी आप अरस्तू के इस सिद्धांत को
गिरता हुआ देखेंगे
गिरते हुए देखेंगे, लोहे के भारी गोलों
और चिड़ियों के हल्के पंखों, और कागजों और
कपड़ों की कतरनों को
एक साथ, एक गति से, एक दिशा में
गिरते हुए देखेंगे
लेकिन सावधान
हमें इन्हें हवा के हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा,'
और फिर ऐसा उसने कर दिखाया
चार सौ बरस बाद
किसी को कुतुबमीनार से चिल्ला कर कहने की जरूरत नहीं है
कि कैसी है आज की हवा और कैसा इसका हस्तक्षेप
कि चीजों के गिरने के नियम
मनुष्यों के गिरने पर लागू हो गए है
और लोग
हर कद और हर वजन के लोग
खाये पिये और अघाये लोग
हम लोग और तुम लोग
एक साथ
एक गति से
एक ही दिशा में गिरते नजर आ रहे हैं
इसीलिए कहता हूँ कि गौर से देखो, अपने चारों तरफ
चीजों का गिरना
और गिरो
गिरो जैसे गिरती है बर्फ
ऊँची चोटियों पर
जहाँ से फूटती हैं मीठे पानी की नदियाँ
गिरो प्यासे हलक में एक घूँट जल की तरह
रीते पात्र में पानी की तरह गिरो
उसे भरे जाने के संगीत से भरते हुए
गिरो आँसू की एक बूँद की तरह
किसी के दुख में
गेंद की तरह गिरो
खेलते बच्चों के बीच
गिरो पतझर की पहली पत्ती की तरह
एक कोंपल के लिए जगह खाली करते हुए
गाते हुए ऋतुओं का गीत
'कि जहाँ पत्तियाँ नहीं झरतीं
वहाँ वसंत नहीं आता'
गिरो पहली ईंट की तरह नींव में
किसी का घर बनाते हुए
गिरो जलप्रपात की तरह
टरबाइन के पंखे घुमाते हुए
अँधेरे पर रोशनी की तरह गिरो
गिरो गीली हवाओं पर धूप की तरह
इंद्रधनुष रचते हुए
लेकिन रुको
आज तक सिर्फ इंद्रधनुष ही रचे गए हैं
उसका कोई तीर नहीं रचा गया
तो गिरो, उससे छूटे तीर की तरह
बंजर जमीन को
वनस्पतियों और फूलों से रंगीन बनाते हुए
बारिश की तरह गिरो, सूखी धरती पर
पके हुए फल की तरह
धरती को अपने बीज सौंपते हुए
गिरो
गिर गए बाल
दाँत गिर गए
गिर गई नजर और
स्मृतियों के खोखल से गिरते चले जा रहे हैं
नाम, तारीखें, और शहर और चेहरे...
और रक्तचाप गिर रहा है
तापमान गिर रहा है
गिर रही है खून में निकदार होमो ग्लोबीन की
खड़े क्या हो बिजूके से नरेश
इससे पहले कि गिर जाए समूचा वजूद
एकबारगी
तय करो अपना गिरना
अपने गिरने की सही वजह और वक्त
और गिरो किसी दुश्मन पर
गाज की तरह गिरो
उल्कापात की तरह गिरो
वज्रपात की तरह गिरो
मैं कहता हूँ
गिरो

डेढ़ इंच का टुकड़ा



फिर लगा कि यह रात नहीं आसमान के नीचे से गुजरने वाली एक लम्बी सुरंग है जो कभी ख़त्म नहीं होगी, ठंडी हवाएं चल रही थी और सामने थी लम्बी विशाल झील जिसका पानी एक बर्फ के मानिंद पडा हुआ था और उस पर से चलकर बत्तखें कही आ - जा रही थी, सिंगाड़े के पौधे चहक रहे थे और कमल के फूल मानो प्लास्टिक में बदल गए थे, क्रूरता अपने शबाब पर थी, और मै दूर उस आसमान में एकटक देख रहा था, घड़ी की सुईयां ऐसे सरक रही थी मानो सीढीयां हो किसी अंधे चढ़ाव की जो कही ख़त्म नहीं होती और सदियों से वही पडी है....थोड़ी  देर बाद इस सुरंग में एक चाँदनुमा सफेदी का डेढ़ इंच का टुकड़ा कही से निकल आया और फिर मुस्कुराकर मुझसे बतियाने लगा - सवाल, उफ़, ये सवाल और सवाल बस लगा कि अब ये रात, ये सुरंग और ये डेढ़ इंच का चाँद यही ठहर जाए, बर्फ की सतह वाले झील अचानक से बहने लगी और पानी के सोते में से लाल रक्त रंजित सा कुछ बहने लगा, मैंने अपनी नसों में वह दबाव महसूस किया और फिर अचानक से सब कुछ ठहर गया, पौधे एकाएक मेरे पर चढ़ आये और कमल के फूलों में उलझ गया मै और चाहकर भी सांस नहीं ले पा रहा था पता नहीं फंस गया.
सोचा था कि उसी छत पर रात गुजार दूंगा, पर तुमने आवाज दी तो लगा कि फिर से लौट आया हूँ उस धरती पर जहां सब कुछ फिर से एक लम्बी यातनादायी सुरंग में बस बदलने को था और जिस्म से लहू निचोड़कर किसी ने मुझे नीम बेहोशी में ठंडा कर दिया था, उफ़ कैसा भयानक ठहरा हुआ पल था जो कही जीवन, सपनों और हकीकतों के बीच से निकल कर पुनः पुनः लौट आता था बारम्बार और मै ठहरा सा देख रहा था आसमान, पानी झील बर्फ छत और कही नजर नहीं आ रहे थे तुम....

Thursday, January 15, 2015

किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल देश की सत्तर साला राजनीती के दंश



किरण बेदी का भाजपा में जाने से अचरज मुझे बिलकुल नहीं हुआ मुझे सिर्फ अंतोव चेखव का नाटक गिरगिट याद आया जिसमे समाज में किस तरह से लोग अपने चेहरे, व्यवहार और चरित्र बदलते है. कालान्तर में इस नाटक के कई प्रकार के पाठ हुए जिसमे ख़ास करके भारत में ब्यूरोक्रेट्स तो इस मामले में बेहद गंभीरता से इस नाटक को अपना कर अपना "वर्ग चरित्र" बनकर जीते है और पुरी सरकारी नौकरी के दौरान सिर्फ और सिर्फ गिरगिट बनकर जीते है और कांग्रेस हो, भाजपा हो, बसपा हो, वामपंथी हो या हाथी, गधे, घोड़े या उल्लूओं की सरकार हो - वे भलीभांति एडजस्ट हो ही जाते है, चाहे वो खादी पहनकर सेवा दल की भाँती दिखें या संघ की खाकी नेकर पहनकर अलसुबह उठकर संघ की शाखा में नमस्ते सदा वत्सले गाये या लाल सलाम  /जोहार साथी कहकर चरण वन्दना करें यह कोई नई बात नहीं है और इस पर आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए. 

मुझे सिर्फ आश्चर्य यह लगा कि किरण बेदी की आत्मा अब तक खुलकर क्यों नहीं यह उगल रही थी जो उनके मन में था. और यह भी भरोसा रखे कि यही किरण बेदी मन पसंद पद ना मिलने पर भाजपा को भी लात मारेगी, क्योकि यह सिर्फ और सिर्फ महत्वकांक्षी है इसने कांग्रेस को निशाना इसलिए बनाया कि  महिला होने के कारण इसे दिल्ली का पुलिस कमिश्नर नहीं बनाया, फिर अन्ना की आड़ में इसने अपनी दबी हुई इच्छाएं उभारी और इसे कुछ नजर आया, अन्ना को निपटाकर अरविंद ने शातिरी से जब पूरा तेरह दिवसीय आन्दोलन हथिया लिया और इसे बाहर किया धक्का मारकर और 49 दिनों के हनीमून में  जब अरविंद सरकार में इसे घास नहीं मिली तो इसका संताप हुआ और यह गिरगिट की भाँती रंग बदलने लगी और आखिर आज इसने अपना असली चरित्र दिखा दिया. 

यहाँ मै जान बूझकर जेंडर को लेकर सिर्फ किरण बेदी का उदाहरण देकर कह रहा हूँ कि पुरुषों की तुलना में जब कोई महिला अपनी महत्वकांक्षाएं पुरी करने उतरती है तो वह सारी हदें पार कर जाती है, वे घर, परिवार, नैतिकता, चरित्र, नौकरी, सामाजिक प्रतिष्ठा और अपने पति - बच्चों को भी त्यागकर सिर्फ और सिर्फ अपने लिए जीना सीख जाती है जबकि पुरुष भी यह सब करता है पर इस हद तक वह "नवाचार" नहीं करता. माफ़ करिए यह बात मै अपने सामाजिक क्षेत्र में भी देख रहा हूँ. अपना इगो, महत्वकांक्षा और भयानक कुंठा लेकर जो महिलायें आई है वो किसी भी हद तक जा सकती है, या गयी है और उन्होंने कई परिवार बर्बाद किये है, बड़े महत्वपूर्ण काम बर्बाद किये है और अपना जीवन एक मखौल बनाकर समाज में नसीहत देने को उदाहरण बना दिया है. इसे किसी और आलेख में स्पष्ट करूंगा. 

अब दिल्ली का चुनाव अरविंद बनाम किरण होकर रह गया है और यह सिर्फ अब दो राजनीतिज्ञों का नही वरन देश की सर्वोच्च सेवा से जुड़े और वही से अघाए दो लोगों की अहम् लड़ाई है, यह चुनाव राजनीती का ना होकर एनजीओ आन्दोलन के उस बुरे और खतरनाक परिणाम की हकीकत है जो जमीनी स्तर पर लड़ने वाले लोगों और हाशिये पर पड़े लोगों के अधिकारों के लिए लड़ा गया था, पर इन दोनों ने इस पुरे आन्दोलन और लड़ाई को आज शून्य कर दिया, यह बात मै पिछले कई बरसों से महसूस कर रहा था कि एनजीओ का स्वैच्छिक संगठनों से एनजीओ सेक्टर हो जाना बहुत घातक है और इसी दिन की परिणिती देखने के लिए हम ज़िंदा थे, यह मुझ जैसे लोगों के लिए बहुत शर्म की बात है कि तीस बरस काम करने के बाद आज यह दिन देखना पड़ रहा है. मै अभी भी पुरी गंभीरता से कह रहा हूँ कि एनजीओ अब इस देश के लोगों के लिए नहीं, सिर्फ और सिर्फ अपने लिए, सरकार के लिए सस्ते - सुलभ एजेंट और विदेशी संस्थाओं के लिए साम्राज्यवादी ताकतों के प्रचार - प्रसार के लिए माध्यम और अब मोदी सरकार के अस्तित्व में आने के बाद कार्पोरेट्स के तमाम तरह के काले और गोरख धंधों को ढकने के लिए सबसे कारगर शांत और सामाजिक हथियार है. यह एक गंभीर बात है इसे समझने और बुझने के लिए आपको कम से कम जमीनी अनुभव होना चाहिए होगा. 

किरण बेदी ने आज पत्रकार वार्ता में आज जिस तरह से ईश्वर को याद करके इस घड़ी में उस "परम पिता द्वारा यह काम करवा लेने" का हवाला दिया वह भी दर्शाता है कि धर्म को इस्तेमाल करके गंदी मानसिकता की सीढ़ी से वो उस तमाम मानसिकता को भी अंधा समर्थन दे रही है जिसमे पीके के साथ रॉंग नंबर के बहाने आम जन मानस की जगी हुई चेतना को दबाने का कुत्सित काम किया गया था, या धर्म अनुसार चार बच्चे पैदा करने का फतवा वो लोग दे रहे है जो शादी ब्याह से दूर है और जेलों से बचने के लिए संन्यास के ढोंग में ऐयाशी कर रहे है और अब संसद में देश का कल्याण(?) कर रहे है. 

किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल दोनों हमारे समय के और देश की सत्तर साला राजनीती के दंश है और अब आने वाले समय में उत्तर मोदी काण्ड में यह प्रवृत्ति बढ़ेगी क्योकि अब पढ़े - लिखे और जागृत भारत, 55 % युवाओं के देश में यही ट्रेंड बनेगा क्योकि कल्लू मामा जैसे अघोरी और साक्षी महाराज जैसे नागा साधू अधिक समय तक अपनी राजनीती नहीं चला सकेंगे. मोदी भी कल मिलाकर मन मोहन सिंह से भिन्न नहीं है यह हमने देख ही लिया है किस तरह से वे संघ की कठपुतली है. कुल मिलाकर अब मजा आयेगा. 

कमेन्ट सादर आमंत्रित है पर थोड़ा दिमाग खुला रखें और पार्टी से ऊपर उठकर सिर्फ और सिर्फ दिल्ली, अरविंद और किरण के सन्दर्भ में इस पोस्ट को  समझने का प्रयास करें, साथ ही तात्कालिक इतिहास को आधार बनाएं, गड़े मुर्दों के इतिहास में मुझे कोई रूचि नहीं है. 

Tuesday, January 13, 2015

सुरक्षित शहर - एक पहल परियोजना के तहत भोपाल में ब्रिटेन की मंत्री













सुरक्षित शहर - एक पहल परियोजना के तहत भोपाल में आज ब्रिटेन की मंत्री Lynne Featherstone (UK Minister , MP, Liberal Democrat) और Macartan Humphrey from Columbia University ने जय हिन्द नगर के बस्ती में भ्रमण किया. पूरा दिन ये दोनों लोग अपने अधिकारियों के साथ उपस्थित थे. कार्यक्रम में नगर निगम भोपाल अधिकारियों के साथ जिन्होंने पूरा मार्गदर्शन दिया, के साथ इस कार्यक्रम में प्रदेश के नगरीय प्रशासन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे, साथ ही कैम्प संस्था के कार्यकर्ताओं के जोश और सक्रीय भागीदारी से बस्ती की महिलाओं और युवाओं ने महिला हिंसा के खिलाफ किये जा रहे प्रयासों का वर्णन किया. इस अवसर पर संक्रांति के मद्देनजर युवाओं और महिलाओं ने पतंगबाजी का खूब आनंद लिया और अपनी पतंगों पर "हिंसा रोको" जैसे नारे लिखकर जनता को सन्देश दिया. 

इस अवसर पर युवा लड़को के लिए स्टीरियोटाईप मानसिकता तोड़ने के लिए रोटी बेलो प्रतियोगिता आयोजित की गयी थी जिसमे सभी दो सौ युवाओं ने उत्साह से भाग लिया और यह मिथ तोड़ा कि रोटी बनाना लड़कियों या महिलाओं का काम है वे भी घर में सहयोग कर सकते है, बराबरी से काम कर सकते है. बी एस एस महाविद्यालय, भोपाल, के समाज कार्य के विद्यार्थियों ने महिला हिंसा के खिलाफ नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किये. सभी महिलाओं और युवाओं ने महिला हिंसा के खिलाफ बनी रोचक सांप-सीढ़ी खेल खेलकर सार्थक भागीदारी की और सीख ली.

पुरे दिन चले इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में ब्रिटेन की मंत्री ने कहा कि ये प्रयास सार्थक ही नहीं जरुरी भी है, ब्रिटेन जैसे देश के साथ पुरी दुनिया में महिलायें इस समय हिंसा को झेल रही है, और जब तक उन्हें समाज में बराबरी और सम्मान से नहीं देखा जाएगा तब तक हम एक खूबसूरत दुनिया की कल्पना नहीं कर सकते. युवाओं को महिला हिंसा के लिए काम करते देख उन्हें बहुत खुशी हुई और इस तरह के मॉडल को उन्होंने फैलाने की पुरजोर वकालत भी की और सहयोग देने का भी वादा किया. 


"सेफ्टी पिन" नामक एक एप का लांच भी उन्होंने किया जो महिलाओं की सुरक्षा के लिए स्मार्ट फोन हेतु विकसित किया गया है.

Friday, January 9, 2015

देवास के बलराम तालाब और प्रशासन के लिए कमाई का साधन




देवास में पानी की समस्या हमेशा से रही है और यहाँ पर पदस्थ जिला कलेक्टरों के लिए यह एक बड़ी कमाई का साधन रहा है. देवास शहर के विधायक पिछले तीस बरसों से नर्मदा नायक बनकर चुनाव जीतते रहे है. पर जमीनी हकीकत कुछ और है, टोंक खुर्द ब्लाक में तत्कालीन कलेक्टर श्री उमाकांत उमराव ने 300 के ऊपर बलराम तालाब बनवाये थे परन्तु कालान्तर में ये तालाब महज मखौल बनकर रह गए और अधिकारियों, किसानों और पंचायत कर्मियों ने इस बलराम तालाब का ऐसा भयानक मजाक उड़ाया कि बताया नहीं जा सकता. और तो और देश भर के पत्रकारों ने भी देवास मॉडल पर बहुत लिखा और फेलोशिप जुगाडी, द्नियाभर में घूमते रहे, मैंने दो साल पहले ऐसे ही एक तथाकथित पत्रकार महोदय को इस तरह के फर्जीवाड़े के बारे में आगाह किया था तो वे भिनक गए थे और जोश में बोले कि यदि मेरे लिखे को आप इस तरह कह रहे है तो मै यूनेस्को से मिले करोड़ डालर को ठुकराकर देवास जिले के किसी गाँव में खेती करना शुरू कर दूंगा और समुदाय के लिए काम करूंगा उस राशि से और बाद में वे मुझे ही ब्लाक करके चलते बनें, सुना कि आजकल यूनेस्को में भू-जल के विशेषग्य है.
हाल ही में दिल्ली के एक एनजीओकर्मी इस तरह के काम का बखान करके अपनी दूकान चलाने की कोशिश कर रहे है और बुंदेलखंड में इस मॉडल को "रेप्लीकेट" करने की कोशिश कर रहे है, हमारे अनुज मित्र भी एक किताब लिख रहे है, काम हुआ है, जरुर हुआ है परन्तु इन मामलों को और भ्रष्टाचार को समेटे बिना कोरी किताब लिखने से दुनिया में कोई सबक नहीं जाएगा इस बात पर ध्यान देने की जरुरत है.
नईदुनिया ने आज यह खबर मुख्य पृष्ठ पर छापी है इससे प्रशासन में तो खलबली है, कुछ शूरवीर निलंबित भी हुए है और कुछ पर गाज अभी गिरना बाकी है, तेज तर्राट युवा जिला पंचायत सी ई ओ श्री अभिषेक सिंह और जिलाधीश श्री आशुतोष अवस्थी जी बधाई के पात्र है जिन्होंने एक बड़े मामले पर हाथ डाला और हिम्मत से इस मामले पर कार्यवाही की है, और आगे भी करेंगे, उम्मीद है वे देवास शहर में भी नर्मदा के लाने और पिछले दो दशको से इंदौर से पानी खरीदने की कहानी की हकीकत सामने लायेंगे, पर अब उनका क्या होगा जो बलराम तालाब को मरने तक भुनाने में लगे है और अपना परलोक भी इसी में गोता लगाकर सुधारना चाहते है और तमाम तरह के पोर्टलों पर दूकान चला रहे है?
जागो मोहन प्यारे...........!!!!
सुन रहे हो ना भाई Swatantra Mishra

Thursday, January 8, 2015

पहाडा सीख रहा हूँ इन दिनों.



सीख रहा हूँ पहाडा इन दिनों
एक धर्म एक दुनिया को
तबाह करने के लिए काफी है

दो से एक मानसिकता का गुणा कर दो
तो हजारों लोग मारे जाते है
एक मूर्ख दस हजार की भीड़ में
दो वाक्य बोलकर लाखों को
बरगला सकता है

एक आदमी
एक सौ पच्चीस करोड़
लोगों को तीन से भाग देकर
पंद्रह का जाल बन सकता है

पहाडा सीख रहा हूँ इन दिनों.
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*संदीप नाईक 

Saturday, January 3, 2015

विद्या अरुण साने का दुखद निधन



मेरी भाभी की माँ श्रीमती विद्या अरुण साने का आज दुखद निधन हो गया, देवास में नूतन बाल मंदिर से अपना काम शुरू करने वाली विद्या ताई शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शख्सियत थी और उन्होंने उस समय एक छोटा सा स्कूल खोला था जब प्राईवेट स्कूल का नामोनिशान नहीं था. समाज के निम्न और मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए न्यूनतम फीस लेकर उन्होंने गुणवत्तापुर्व शिक्षा की बुनियाद डाली और देवास के पुराने स्कूलों में शामिल नूतन बाल मंदिर ने स्कूलों में इतिहास बनाया. श्रीमती शशिकला पोतेकर ने आज अंतिम यात्रा के समय कहा कि "आमची मावली गेली हो, तिनीचं आम्हा सर्वाना उभ केलं, आणि जे पण आमच्या कड़े आहे ते सर्व इचच आहे."

सच कहा शशिकला ताई ने जो देवास की अन्य महान महिलाओं में से एक है. ये वो महिलाओं की पीढी थी जिन्होंने शिक्षा का बेहद जमीनी स्तर पर काम किया, सरकारी स्कूलों के समानांतर निजी विद्यालय खोले और उन्हें बेहद मामूली खर्च, सादगी और गुणवत्ता से संचालित किया. मुझे याद है नूतन बाल मंदिर, एवरेस्ट स्कूल, शिशु विहार (श्रीमती पटवर्धन द्वारा संचालित) ऐसे स्कूल थे जिन्होंने देवास की पीढियां सुधारी है. साथ ही "फ़क्त एकच प्याला" जैसे ख्यात मराठी नाटक के लेखक गडकरी साहब की पत्नी भी देवास के राधा बाई कन्या स्कूल की प्राचार्या थी जिन्होंने ने इंग्लैण्ड से गणित जैसे विषय में पी एच डी किया था तब जब महिलाओं को पढ़ने की भी इजाजत मिलना मुश्किल था. ऐसे समय में विद्या ताई, श्रीमती पटवर्धन और शशिकला ताई ने स्कूल खोले और इतने कम खर्च में और फीस में शिक्षा दान की कि घर खर्च चलाना मुश्किल हो जाता था, पर इनके पतियों ने उन्हें बहुत संबल दिया और स्कूल चलाने में मदद की. तब शिक्षा एक मिशन हुआ करती थी आज जैसा धंधा नहीं, ना ही शिक्षकों को कभी इन लोगों को जलील किया. अभिभावकों को भी इनपर पूरा भरोसा था और वे भी इन्हें भरपूर सहयोग करते थे, देवास में इन तीन महिलाओं ने कठिन परिस्थितियों में रहकर परिणाम मूलक काम किया और वृहद् समाज से जुडी रही और आज भी सक्रीय है.

विद्या ताई साने बहुत ही सह्रदय महिला थी, इतनी सहज और लोक परोपकारी कि कर्फ्यू के समय ढेर खाना बनाकर ऑटो लेकर ड्यूटी कर रहे पुलिस के जवानों को खाना बांटने निकल जाती थी. मुझे याद है बाबरी मस्जिद काण्ड के समय जब देवास में कर्फ्यू लगा था तो वे एक ऑटो में ड्यूटी पर तैनात जवानों को खाना बाँट रही थी कि "इन बेचारों को खाने का कौन पूछेगा". साथ ही यदि उनके घर में किसी को कोई चीज पसंद आ जाये तो सहर्ष दे देती थी चाहे वह चीज हजार की हो या दस रुपये की. उनके विद्यार्थी आज यहाँ वहाँ फैले है और ख्यात है. स्व पंडित कुमार गन्धर्व की सुयोग्य पुत्री और प्रख्यात गायिका विदुषी कलापिनी Kalapini Komkali भी उन्ही की शिष्या रही है और आज भी पिन्नी का उनके घर आना जाना बना हुआ है.

संसार में ऐसे लोगों के फ्रेम ही ख़त्म हो गए है जहां ऐसे बिरले लोग बनते थे, आज विद्या ताई के निधन के साथ देवास के शिक्षा जगत से एक सुनहरा पन्ना ख़त्म हो गया, अपनी मेहनत और काबिलियत से उन्होंने हजारों बच्चों की जिन्दगी बनाई और सादगी से जीवन जिया इतना सादगी से विश्वास करना मुश्किल होता है. सौभाग्य की बात यह है कि मेरे बड़े भाई संजय की वो सासु माँ थी. उनकी याद, कामों और शिक्षा के अवदान को नमन और अश्रुपूरित श्रद्धांजलि.