Monday, November 24, 2014

सुभाष चन्द्र बोस मेडिकल कॉलेज, जबलपुर का स्वास्थ्य भयानक खराब है.







Abhishek Rawat ये मनावर (धार) के रहने वाले है और इनसे फेसबुक पर दोस्ती हुई थी अभी जबलपुर आया हूँ तो सोचा मिल लूं सो प्रदेश के प्रसिद्द सुभाष चन्द्र बोस मेडिकल कॉलेज, जबलपुर, में पहुँच गया आज शाम को. जहां से अभिषेक आर्थोपेडिक में मास्टर डिग्री कर रहे है. अभिषेक ने बहुत सम्मान से मेरे पाँव छुए और फिर अपना वार्ड दिखाने ले गए और वही पास में एक दस बाय दस के कमरे में ले गए जहां तीन पोस्ट डिग्री कर रहे डाक्टर रहते है. एक साथी कर्नाटक के है.
कमरा देखकर रोना आ गया, इतना बुरा कमरा था कि आप सोच नहीं सकते, मेरा मन रोने को हो आया कि जिस प्रदेश में डाक्टर ऐसे कमरों में रहने को मजबूर कर दिए जाते हो वे आगे जाकर कैसे सरकारी अस्पतालों को ठीक करेंगे? पुरे कमरे में इतने बड़े बड़े चूहे है कि डा सौरभ और ये दोनों डाक्टर हाथ पाँव में दस्ताने पहनकर सोते है क्योकि चूहे ना मात्र इनके बेग काट लेते है, सामान खा जाते है बल्कि इन्हें बुरी तरह से काट लेते है जिससे इनके हाथ पांवों में घाव हो जाते है. कमरे में जाले, बाबा आदम के जमाने का पंखा और बदहाल हालत में पड़े संडास बाथरूम जिनमे झांकने की हिम्मत नहीं थी मेरी. ऐसे में कैसे कोई डाक्टर स्वस्थ रहकर तन मन से सेवा करेगा या कुछ सीख सकेगा. बहुत ही शर्मनाक था वह पूरा परिदृश्य, दूसरा- पुरे वार्ड्स में जमीन पर पड़े लोग भयानक गन्दगी और बदबू का साम्राज्य.
हम किस स्वच्छता अभियान की और कहाँ की बात कर रहे है, ये जबलपुर शहर के मेडिकल कॉलेज की हालत है !!! आप सोचिये दूर दराज के अस्पताल कैसे नरक होंगे इसकी कल्पना है किसी को. मैंने जब अभिषेक को पूछा कि बेटा खाना, तो बोला दादा टिफिन आता है इतना भी समय नहीं है कि कुछ जाकर खरीद सके या ढंग का खाना खा सकें, हम क्या पोषण की बात करेंगे हम तो खुद कुपोषित हो रहे है, भयानक गन्दगी और बदबू में रहते है ताकि हम आने वाले समय में सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाओं से दो चार हो सके.
डा प्रसाद जो बेंगलोर से पी जी करने आये है मप्र की व्यवस्था पर हंस रहे थे बोले सर मै क्या कहूं ..हम तो बस चूहों से मुक्ति चाहते है ताकि हमारे हाथ पाँव सलामत रहे. तीन लोग युवा डाक्टर इस दस बाय दस के कमरे में रहते है, एक डाक्टर रात में सेमीनार हाल के एक टेबल पर सोता है.
क्या शर्मनाक नहीं है कि हम अपने काबिल डाक्टरों को जो अखिल भारतीय स्तर पर परीक्षा पास करके आये है उन्हें रहने के लिए और खाने के लिए सम्मानजनक स्थान दे सके ताकि वे सच में सीख सकें और सेवा कर सके. करोडो रूपये का बजट खा जाने वाले मेडिकल कॉलेज और अस्पताल क्या कर रहे है और प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग को सिवाय टीम हेल्थ और अपनी ब्रांडिंग करने और अधिकारियों को मंत्रियों से लड़ने से फुर्सत नहीं. कितना शर्मनाक है. सच में यदि आप एक बार यह कमरा और वार्ड देख लें तो मरना पसंद करेंगे बजाय यहाँ नरक भुगतने के. बहुत उदास मन से अभिषेक और उन दो युवा बच्चों के लिए दुआएं देते हुए भारी मन से लौटा हूँ अभी.

Sunday, November 23, 2014

पता नहीं- सोनल शर्मा का संकलन



"पता नहीं" सोनल का पहला काव्य संग्रह है. सोनल पिछले कई बरसों से समाज के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यक्रमों में लगी हुई है और कविता उनके लिए एक महत्वपूर्ण जगह है जहां वे अपने आपको सम्पूर्ण रूप से अभिव्यक्त कर पाती है.

इधर हिन्दी की सभी पत्रिकाओं में सोनल की कवितायें प्रमुखता से छपी है और वे लगातार चर्चा में रही है. सोनल की कवितायें हमें एक नए रचना संसार में ले जाती है जहां भावनाएं, द्वन्द और एक रोशनी की राह खोजती छटपटाहट है, यह राह उन सभी गलियारों में से निकलती जो मन के कही गहरे कोनों से कवि अपने आपसे एकाकार होता है और भाषा और बिम्बों से अपना रचना संसार रचती है. सोनल इन्ही सबके बीच लोगों की आवाज, अपने स्वरों में मिलकर एक वृहद् संसार रचती है जो उन्हें कविता के नए और ठोस धरातल पर ले जाता है और अपने तई वे एक ऐसी दुनिया बनाती है जो उन्हें बाकी सबसे अलग बनाता है और ये कवितायें एक सार्थकता देते हुए व्यापक फलक पर अपने होने को चरितार्थ करती है.

अच्छी बात यह है कि सोनल का पहला काव्य संग्रह अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद से आ रहा है जिसका ब्लर्ब हिन्दी के ख्यात कवि और वागर्थ के सम्पादक डा एकांत श्रीवास्तव ने लिखा है. इस संग्रह में कवितायें तीन भागों में नजर आती है - अन्तरंग, बहिर्रंग और जोरबा दी बुद्धा

स्वागत किया जाना चाहिए इस संग्रह का, उम्मीद करें कि यह संग्रह कविता के नए प्रतिमान स्थापित करके हिन्दी कविता को एक दिशा देगा.

सारा नमक वही से आता है जहां बूंदों के बीच प्यास है- बहादुर पटेल का संकलन





बहादुर पटेल हिन्दी कविता में अब एक स्थापित नाम है जिनकी कविता एक अलग पहचान बनाती है. टापरी जैसी कविता और ग्रामीण परिवेश से चुनकर वे जो बिम्ब रच रहे थे वे बिम्ब अब विश्व परिदृश्य तक जा पहुंचे है और जहां वे बढ़ती हुई ग्लोबल व्यवस्था में तानाशाही प्रवृत्ति के खिलाफ बहुत तीखा तंज कसते है. जहां वे दादी के गेंहूं बीनने की बात करते है वही वे एक आत्महंता आदमी की त्रासदी की बात भी करते है और संवेदनाओं का ऐसा जाल बुनते है कि पाठक बरबस ही कविताओं को आत्मसात करने लगता है. जीवन और आत्महत्या के बीच सिर्फ एक ही क्षण होता है और यदि वह टल गया तो जीवन बच जाता है, इसे वे बखूबी अपनी कविता में चित्रित करते है. 

लीलाधर मंडलोई से सही लिखा है कि वे एक अलग प्रकार के कवि है जिनके यहाँ लोक की  नातेदारियाँ, सपनों और संघर्षों के तर्कों की अपनी निजता है. दलालों के देश जैसी कविताओं के साथ वे अपने समाज के आत्म रक्षा के सबक में गुंथे हुए है और आगाह करते हुए बहादुर पटेल बहुत आगे तक जाते है. बहादुर की कविताओं का दूसरा काव्य संकलन "सारा नमक वही से आता है" अंतिका प्रकाशन गाजियाबाद से आ रहा है, जो उनकी कविताओं की यात्रा का अगला पड़ाव और लगातार निखरती जा रही भाषा, बिम्ब और उपाख्यानों का दस्तावेज है. यह संकलन एक ऐसे समय में आ रहा है जब देश में उथल पुथल है और तानाशाही प्रवृत्तियाँ जोर पकड़ रही है, सारी दुनिया में एक विशेष तरह की विचारधारा थोपी जा रही है और आदमी को सिर्फ एक बाजार का पुर्जा मानकर इस्तेमाल किया जा रहा है, ये कवितायें उन्ही बेबसियों और करुणा की दास्ताँ है. 

अपने पहले संकलन "बूंदों के बीच प्यास" से जनप्रिय हुए बहादुर पिछले दिनों बहुत चर्चित कवि रहे है. इधर हिन्दी की सभी पत्रिकाओं में उनकी कवितायें छपी है और तसल्ली से पढी गयी है. वाट्स एप पर काव्यार्थ जैसा समूह चला रहे है और पिछले छः माह से सुधी पाठकों को रोज एक नई कविता पढ़ा रहे है जो कि सराहनीय उपलब्धि है. 

सारा नमक वही से आता है जहां बूंदों के बीच प्यास है, उम्मीद की जाना चाहिए कि इस नमक और प्यास के बीच कविता की जमीन पर जो नवांकुर फूटा था वह अब एक पौधे के रूप में तब्दील हो चुका है और आने वाले समय में वट वृक्ष बनकर अपने होने को चरितार्थ करेगा.

Wednesday, November 19, 2014

संत कहाँ सो सीकरी



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देश की आजादी के बाद से धर्म को हमने दुर्भाग्य से लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा माना और इसका इस्तेमाल हर नेता ने गाहे-बगाहे किया और नतीजा आज सामने है. रामपाल के बहाने से देश में चली आ रही संत परम्परा को आघात लगा है और जिस तरह से हरियाणा सरकार आज एक संत के सामने मजबूर दिखाई दे रही है वह बेहद चिंतनीय है. 

कांग्रेस ने पिछले छः दशको में इस परम्परा को समृद्ध किया और आज भाजपा इसी तरीके को इस्तेमाल करके वोट जुगाड़ने की कवायद कर रही है. जिस तरह से इस रामपाल के आश्रम से पेट्रोल बम, हथियार, गैस सिलेंडर और पत्थर जैसी सामग्री मिली है वह एक आश्रम की श्रद्धा और शब्द पर ही सवाल उठाती है, साथ ही अपने भक्तों को जिनमे बच्चे और महिलायें शामिल है, जिस अंदाज में घेरकर यह तथाकथित संत इस्तेमाल कर रहा है वह भी समाज के लिए घातक है. 

यह समझना दिलचस्प होगा कि आर्य समाज का विरोधी और एक प्रगतिशील कबीरपंथी इंजिनियर कैसे इतना निर्मम हो गया कि क़ानून और प्रशासन को धता बताकर वह तानाशाह बन बैठा है. 

यह स्पष्ट है कि बगैर राजनैतिक संरक्षण के इस देश में कोई कुछ नहीं कर सकता. अब समय आ गया है कि सरकार धर्म और साधू संतों को लोकतंत्र के दायरे से बाहर रखकर बड़े और वृहत्तर समाज के लिए विकास के काम करें. यह ना सिर्फ लोकतंत्र के हित में होगा, वरन लोगों के बीच सचमुच धर्मनिरपेक्ष संविधानिक मूल्यों का सन्देश जाएगा. 

रामपाल के बहाने हमें देखने और सीखने का एक अच्छा मौका मिला है कि कैसे आश्रम, संत साधू अपने गढ़ और मठ बनाकर अपढ़ जनता को ठग रहे है. सुनील चतुर्वेदी के चर्चित उपन्यास  "महामाया" का बरबस ही जिक्र यहाँ स्वाभाविक है जहां वे पुरी आश्रम व्यवस्था की पोल अपने उपन्यास में खोलते है और बताते है कि कैसे इन संतों ने समाज को दिग्भ्रमित करके रखा है और ये समाज का नुकसान ही कर रहे है.  

Monday, November 17, 2014

जीवन की पहली किताब ....नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएं





आखिर जिन्दगी की पहली कहानी की किताब आ ही रही है. सन 1995 से 2000 और फिर सदी के पहले दशक में लिखी कहानियां कई थी, छांटने का बड़ा काम था, कई दिनों से बल्कि दो सालों से चल रहा था, लगातार आलस, घूमने की यायावर शैली, और व्यक्तिगत परेशानियों के कारण समय ही नहीं मिल पा रहा था शायद यह कहना ज्यादा मौंजू होगा कि मै जानबूझकर टाल रहा था.

नर्मदा नदी से ना जाने क्यों मुझे बहुत लगाव है, बहुत लम्बी कहानी और सन्दर्भ है और इसलिए इसका शीर्षक भी मैंने "नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथाएं" रखा है.

इस बीचा हमारे गुरु Prakash Kant, मित्रों में Sunil Chaturvedi Bahadur Patel Manish Vaidya Dinesh Patel Satya Patel Sonal Sharma की डांट पड़ रही थी, फरवरी 14 के पुस्तक मेले में अनुज Jitendra Srivastava ने भी आग्रह किया और आख़िरी में एक दिन अग्रज Aaditya Lunavat के साथ बहादुर और सुनील भाई थे तो बस अंतिम वार्निंग मिल गयी.

तुरंत श्रद्धेय Purushottam Agrawal जी से आग्रह किया तो उन्होंने सहर्ष ब्लर्ब लिखकर दे दिया और Gouri Nath जी ने इसे छापने का जिम्मा लिया. बस इस तरह यह किताब तैयार हो रही है, उम्मीद है कि दिसंबर के पहले हफ्ते में आ जायेगी.

मै शब्दों में आभार व्यक्त नहीं कर सकता इसके पीछे मेरे परिजन, मेरे दोस्त और आप सबका सहयोग और प्रेरणा नहीं मिलाती तो शायद यह असंभव था. और श्री Ajay Moghe जी जो लगातार आग्रह करते रहे कि "सर, किताब पर काम करो"

Siddharth Naik Aniruddha Naik Amey Naik Mohit Dholi Apoorva Dubey Alok Jha के बिना यह हो पाता क्या..........शायद नहीं........जो इसके साक्षी रहे है.......हर शब्द हर पृष्ठ के ....

Akshay Ameria का रेखांकन इसके मुख पृष्ठ पर है और अब यह किताब आपके पाले में है...........

Tuesday, November 4, 2014

एक बड़ी पार्टी का इस तरह से ख़त्म हो जाना



Sonia Gandhi is Rahul Gandhi's mother. Image result for rahul gandhi

देश की आजादी में शरीक होने का श्रेय कांग्रेस हमेशा से लेती रही है और जाहिर है देश की सबसे बड़ी पार्टी थी जिसने लम्बे समय तक देश पर राज किया. इंदिरा गांधी भी आपातकाल में सत्ता हारने के बाद तीन सालों में फिर से पुरी ताकत के साथ खडी हुई और फिर से सत्ता पर काबीज हुई परन्तु पिछले दस बरसों में जिस तरह से इस पार्टी के सितारे गर्दिश में गए है वह शोचनीय है. डा मन मोहन सिंह ने कठपुतली प्रधानमंत्री का रोल बखूबी निभाया यह हम सब जानते है, वे पार्टी की छबि सुधारने के लिए कुछ कर भी नहीं सकते थे. जागरुक होती देश की जनता ने धीरे धीरे कांग्रेस को हाशिये पर धकेलना शुरू किया. भ्रष्टाचार का मुद्दा और अन्ना का आन्दोलन इस दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ था और फिर जो कांग्रेस की गाड़ी बिगड़ी है वह पटरी पर नहीं आ पाई. सोनिया और राहुल की व्यक्तिगत मिल्कियत बनी पार्टी में प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, शरद पवार से लेकर चिदंबरम जैसे नेता थे और आज भी है परन्तु वंशवाद की परम्परा और लगातार लचीले होते अकुशल नेतृत्व के कारण कांग्रेस की दशा आज यह हो गयी है कि एक समय में सहोदर रहे सारे दल भी छिटक कर दूर हो गए है. कई राज्यों के चुनाव हारने के साथ देश के इतिहास में पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मात्र 44 सीटें लेकर आई हैताजा चुनावों में तीसरे नंबर के दल के रूप में उभरी है यह कितना दुखद और हास्यास्पद है कि अब कांग्रेस विपक्ष की भूमिका निभाने लायक भी नहीं बची है. दरअसल व्यक्तिगत महत्वकांक्षाएं जब हावी होती है तो किसी भी तरह से किसी का भला नहीं होतायह समय कांग्रेस के लिए दुखदायी समय है और गहरी मंत्रणा का भी, जब पार्टी के अन्दर से भी अब आवाजें तेज होने लगी है, गाहे-बगाहे पार्टी के लोग पार्टी नेतृत्व और नीयत पर सवाल करने लगे है और शायद यही सही समय भी है जब इस पार्टी के लोगों को और नेतृत्व को आने वाले दस बरसों तक खामोश रहकर अपनी  ताकत जमीनी मुद्दों को लेकर साफ़ करनी होगीएक या दो मुद्दे उठाकर अपनी रणनीति और समझ साफ़ करना होगी, और इस बात की कोशिश करना होगी कि आखिर पार्टी देश में क्या चाहती है, या शल्क देश को देना चाहती है, और भारतीय समाज जो लगातार विघटन की ओर अग्रसर है, बाजार और पूंजी के आतंक से ग्रस्त है उसके लिए क्या नीति है? भारतीय मतदाता जागरुक, चाक चौबंद और समझदार हो गया हैअब वाड्रा जैसे मुद्दे भी सोशल मीडिया के कारण सामने आने लगे है इसलिए अपनी भूमिका और देश के लिए कार्यक्रमों की पुख्ता समझ के साथ कांग्रेस को आना होगा. इस हेतु यदि कांग्रेस को लगता है कि सहयोगी दलों के साथ बिना स्वयं अपने पैरों पर वह दम भर सकती है तो बेशक ऐसे सभी प्रयास करना चाहिए जो पार्टी हित में हो, ना कि गांधी परिवार के हित में. लोगों का विश्वास गांधी परिवार से उठा है इस बात को समझ कर किसी नए आदमी को नेतृत्व देने की दरकार है तभी एक पार्टीएक विचारधारा और एक विरासत बच सकेगी.