Tuesday, October 28, 2014

सलाम जज्बे और हिम्मत को.........Clean India





सलाम जज्बे और हिम्मत को।




इस तरह से यदि हम सब मेहनत कर लें तो स्वच्छ भारत सच में नामुमकिन नहीं।

Tuesday, October 21, 2014

Wish List




भागती-हांफती और दौड़ती और लगभग अपने चरम पर पहुंचकर पूर्ण आकार लेती जिन्दगी में क्या अधूरा रह जाता है कि हम मोह से मुक्त नहीं हो पाते और बस एक आह भरकर फिर से एक "विश लिस्ट" बनाने बैठ जाते है.....

यह विश लिस्ट ही जीवन है या पूर्ण विराम के मुहाने पर खड़े हांफते हम जो लगातार मिट्टी में मिलने को तत्पर बस यूँही इंतज़ार कर रहे है???


मिट्टी, हवा, पानी और हर वो चीज जो हमें विलोपित कर देगी और एक दिन यहाँ से गुजर कर हम लोग भी काल कलवित हो जायेंगे, जैसे हो जाती है एक मासूम चिड़िया और एक बाज, जैसे ख़त्म हो जाते है सिकंदर और चंगेज, जैसे ख़त्म हो गए सपने और चंद मीठे ख्यालात ........आमीन !!!

भ्रष्टाचार से मुक्ति - अभी मंजिल दूर है.


भारत में भ्रष्टाचार को कमोबेश एक अनिवार्य प्रक्रिया के तहत संस्कार के रूप में मान लिया गया है और सभी सरकारी और गैर सरकारी कार्यों और प्रक्रियाओं में इसे एक आवश्यक सोपान की तरह देखा जाने लगा है. इसे इस तरह भी देखा जाना चाहिए कि जिन संस्थाओं की महती जिम्मेदारी इसे आजादी के बाद हटाने की थी उन्ही संस्थाओं और व्युँक्तियों ने अपने निजी स्वार्थों के तहत इसे ना मात्र फलने -फूलने दिया बल्कि इसे पोषित भी किया फलस्वरूप आज इसके विशाल वट वृक्ष के नीचे अनेक लोगों के घर और परिवार पल रहे है. मप्र में आये दिन आपको एक सनसनीखेज खबर पढ़ने को मिलाती है जिसमे वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर चपरासी तक इस प्रक्रिया में लिप्त पाए जा रहे है. ताजे मामले में तमिलनाडू की मुख्य मंत्री जयललिता का केस सामने है जिसमे उन्हें कोर्ट से जमानत मिल गयी है. चीन में भ्रष्टाचारियों को सीधे मौत की सजा मिल रही है और हम अपने यहाँ रिआयत बरतते हुए घोषित अपराधियों को खुले आम छोड़ रहे है. अब सवाल यह है कि जिन अच्छे दिनों की कल्पना में भारतवासी जी रहे है या सुनहरे कल का सपना संजो रहे है क्या वह इन्ही अंधे गलियारों से होकर गुजरेगा? हमें सोचना होगा कि हम कैसा भारत निर्माण चाहते है और कब तक भ्रष्टाचारियों को बख्शते रहेंगे? क्या हमारे सामने दण्डित करने के सारे विकल्प ख़त्म हो गए है, क्या हमने आजादी के सत्तर सालों में ही मान लिया है कि हम इस देश में ना जयललिता का कुछ कर सकते है, ना ए राजा का ना, अरविंद - टीनू जोशी का या इसी क्रम में सभी उन नकाबपोशों का जो इस तरह के कृत्यों में लिप्त पाए गए है? एक ओर तो हम चीन से बराबरी की बात कर रहे है, वहाँ के साजो सामान को चुनौती देकर देशी माल को अपने बाजारों में खपाने की बात कर रहे है, दूसरी ओर वहाँ दी जाने वाली सार्वजनिक गलती या जानबूझकर की गयी गलती में कठोर सजा की उपेक्षा कर रहे है, या चीन के सामान सार्वजनिक जीवन में सामाजिक राजनैतिक मूल्यों और दंड प्रावधानों की बात क्यों नहीं करते ? चीन से हमारी टक्कर यदि है तो इस तरह के मामलों में भी हमें बहुत कठोर होकर भ्रष्टाचार में संलग्न पाए गए सभी लोगों के खिलाड़ कड़े दंड का प्रावधान करना चाहिए,  चाहे वो फिर रतलाम, उज्जैन  में पकड़ा गया चपरासी हो या जयललिता या ए राजा. भारतीय जनमानस  इस समय बहुत आशाये लेकर आने वाले समय, खासकरके अच्छे दिनों,  के सपने संजो रहा है और इस तरह के मामले भारत के विकास की प्रक्रिया को हजार साल पीछे धकेल देते है. जरुरत है कि अब भ्रष्टाचार को एक राष्ट्रीय मुद्दा मानकर सख्ती से निपटा जाए. 

-संदीप नाईक 
स्वतंत्र टिप्पणीकार 

Tuesday, October 14, 2014

निष्कर्ष






निष्कर्ष
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याद है मुझे अच्छे से
वो जुलाई दो हजार आठ का
छब्बीसवां दिन था और 
भोपाल से सीधा पहुंचा था अस्पताल में,
माँ के आप्रेशन का बारहवां दिन था
भाई ने बताया कि आज सारे दिन बोलती रही है माँ,
बहनों को याद किया और अपने नौकरी की पहली
हेड मास्टरनी को भी, खूब बोली है सबसे आज 
और घर जाने की भी, जिद की है कि मरना घर ही है.
पुरी शाम और रात बोलती रही मुझसे
और अचानक भोर में पांच बजे मशीनो पर
थम गयी धडकनें माँ की और मै देखता रहा 
उन बेजान मशीनों को, जो एक इंसान में प्राण डाल रही थी, 
ख़त्म हो गयी थी दुनिया मेरी सत्ताईस  तारीख को माँ के बिना,
ठीक छह बरसो और दो माह बाद
भाई को भी अस्पताल में रखा था
शुरू में तो बेहोश था पर चौथे दिन बोलने लगा था 
बड़ी जांचों और इलाज के बाद,
खूब बोला, इतना कि ना जाने किस किसको याद किया 
उस दिन उसने, सारे आईसीयु में खुशी की लहर थी,
सारे रिश्तेदारों से बोला, बेटे को दी हिदायत, 
जीवन भर स्वस्थ रहने की, पत्नी को समझाया 
और मुझे देने लगा निर्देश कि थोड़ा स्वाभाव बदलूँ
नौकरी करूँ ढंग से अपने सिद्धांतों को ना त्यागूँ
आईसीयू के बाहर आकर मैंने बड़े भाई से जब कहा
तो हम दोनों को मौत दिखने लगी थी
उन दिनों जब माँ बोली थी तो भाई ने माँ को एक दिए की उपमा दी थी
कि बुझने के पहले बहुत तेजी से भभकता है दिया
आज फिर अन्दर छोटा भाई बोल रहा था
और हम दोनों बड़े होकर भी अशांत थे बेहद
फिर आखिर वो शांत हो गया बेहोश सा
तीन दिन बाद उठा वो नीम अँधेरे से 
फिर बोला वो उस डायलेसिस मशीन पर
खूब बोला, यहाँ तक कि डाक्टर को भी झिड़क दिया
कि हटा यार हाथ गले से क्या जान लेगा?
हम डरते रहे और सहम गए थे बुरी तरह से
हम दोनों बड़े सशंकित से देख रहे थे उसे बड़े सदमे से मानो
इंतज़ार कर रहे हो कि मौत कब आ जाए और ले जाए
आहट तेज हो रही थी, मौत आ रही थी दबे पाँव
भाई की आवाज जैसे जैसे तेज़ हो रही थी
हमारी बेचैनी बढ़ रही थी, मौत का रूप सामने था
और फिर अचानक थम गयी साँसे
वही हुआ जिसका डर था, माँ की तरह चुप था भाई
सदा के लिए खामोश था और आँखे खोज रही थी
व्योम में खुली आँखे और कुछ कहने से रह गया
खुला मुंह मेरे लिए कई सारे सवाल छोड़ गया था
एक दिया और बूझ गया था तेज भभक कर
एक सीख हमने माँ और भाई की मौत से ली है
ज्यादा बोलना अपनी मौत को बुलावा देना है।
"माँ और भाई को याद करते हुए"
- संदीप नाईक

Thursday, October 9, 2014

मध्यप्रदेश और ग्लोबल मीट इंदौर









मालवा के देवास, पीथमपुर से लेकर लेबड घाटा बिल्लोद या सीहोर तक देखिये उद्योगों को, सीहोर की गन्ना फेक्ट्री, क्षिप्रा के बरलाई की गन्ना फेक्ट्री, इंदौर के मिलें, उज्जैन की विनोद मिल, और आसपास के अनेक उद्योग जो बंद हो गए और हर घर में बेरोजगारों की फौज इकट्ठा हो गयी है जो आये दिन हिंसा और तनाव का निर्माण करती है, यही बेरोजगार और तनाव ग्रस्त लोग महिलाओं पर हिंसा कर रहे है, आये दिन चैन चोरी, डकैती, बलात्कार और लूट की घटनाएँ बढ़ रही है.
उद्योगों के बंद होने से घर घुट गए है, परेशान लोग और मुसीबतों में पड़ गए है, ना उजाला है ना कोई संभावना, दिक्कत ये है कि इन अँधेरे गलियारों में कोई चकाचौंध नहीं है और इन बेबस घरों में कोई झांकने नहीं जा रहा, बच्चे कुपोषित हो रहे है, और युवा टुकुर टुकुर आँखों में सपने लिए अंधे हो गए है, कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं आती, धूर्त और चालाक एनजीओ इन्ही के नाम पर कौशल उन्नयन, दक्षता और विकास के नाम पर अपनी दूकान चला रहे है, नतीजा यह है कि हर तीसरे घर में छोटी मोटी किराने की दूकान खुल गयी या कुछ और इसी तरह का काम...

प्रदेश में पिछले दस बारह वर्षों में सिवाय लफ्फाजी के कुछ नहीं हुआ, दिग्विजय सिंह जो भट्टा दो कार्यकालों में बिठाया था, उसी को आगे बढाते हुए इस सरकार ने पूरा खाता ही डुबो दिया और नौटंकी में माहिर ये सिद्ध हस्त निपुण और पारंगत लोक सेवक और किसान पुत्र भ्रष्टाचार और विदेश भ्रमण में व्यस्त रहते हुए खुद की तरक्की करते रहे, ग्लोबल मीट के बहाने अपनी छबि सुधारते रहे बस, .......इससे मुंह नही मोड़ा जा सकता विकास जरुर हुआ पर किसका यह भी सब जानते है, लोगों ने, नेताओं ने इंदौर बेच दिया, भोपाल बिक गया, पेंशन खा गए, रेत खा गए और व्यापम घोटाले में जिन्दगी खा गए......अब क्या क्या कहूं....
एक बार प्रदेश के यशस्वी और बेटियों के मामा जी यानी मुख्य मंत्री पिछले दस बरसों में अपने घर पर की गयी तमाम तरह की पंचायतों की समीक्षा कर लें कि कितने हेल्प लाइन नंबर शुरू हुए और कितने हाथ ठेला चलाने वाले,या हम्मालों को या कुलियों को कुछ काम मिला या बैंकों ने लोन दिया, कितने कारीगरों को ठोस नियमित रोजगार मिला या कुछ और भला हुआ, सिवाय घोषणा और घोषणा के क्या है उपलब्धि इस सरकार की, यहाँ कमेन्ट करने के पहले एक बार दिल से सोच लें, फिर आपके विचारों का स्वागत है, थोड़ा दलगत उठकर खुले दिमाग से सोचे और प्रदेश की हालत देखे आज भी हर मामले में सबसे आगे है कुपोषण, मात्र मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर, बलात्कार, अपराध या घोटालों में भ्रष्टाचार में या भारतीय प्रशासनिक सेवा के अरविंद टीनू जोशी जैसे नालायकों को दण्डित करने में अभी भी कोई कदम नहीं उठा रहे, चपरासी से लेकर पटवारी और कलेक्टरों के घरों में रूपया गिनने की मशीने खराब हो गयी यही है सुशासन ?? ....सभी जगह हमारी स्थिति निकृष्ट है फिर किस मुंह से बात कर रहे है हम ग्लोबल मीट की और उद्योगों को संरक्षण देने की एक खिड़की के नीचे सारी सुविधा देने की, एक बार लोक सेवा केन्द्रों को जाकर देख लीजिये फिर सब समझ आ जाएगा........
मध्यप्रदेश पर मेहरबानी करना मोदी महाराज, कम से कम ऐसे सपने मत दिखाकर जाना जिसको पूरा करना मुश्किल हो जाए वैसे ही हमारे मामाजी को सत्ता गंवाने का बड़ा डर है, इत्ता बड़ा शो मैनेज करके , अरबों रूपया बर्बाद करके आपको बुलाया ही इसलिए है कि व्यापम से उठे बुलबुलें ग्लोबल धुल में घूल जाए और मिट जाए. कल भोपाल में एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्य शासन के पास इस समय अक्टूबर माह की तनख्वाह नहीं है बांटने को, सारा धन झोंक दिया है इंदौर में रहने, आयोजन, खाने पीने और कार्पोरेट्स को खुश करने में.....पिछली ग्लोबल मीट्स का भी एक रिव्यू कर लें, इंदौर, बाबई, खजुराहो, इंदौर और अब फिर इंदौर....कित्ते भियाओं ने माल दे दिया या उद्योग लगा दिए, और आज जो वेदांता या अन्य यहाँ अस्पताल खोलने की बात कर रहे है वो क्या सामाजिक कार्य करने के लिए आ रहे है, इंदौर के या भोपाल के कौनसे अस्पताल कुल मरीजों में 40% गरीबों का इलाज कर रहे है तो ये कर लेंगे??? काश कि किसानों के लिए कोई ग्लोबल समिट होता या बेरोजगारों के लिए या शहरी झुग्गी में रहने वालों के लिए.!!!

"खैर, नो निगेटिव कमेंट्स प्लीज़, संदीप नाईक, अभी जूते खाओगे भक्तों से..."
कल मामाजी ने कहा कि छोटे उद्योग मेरे छोटे बेटों जैसे है , भगवान ना करें, जबसे आपने बेटियों को गोद लिया है प्रदेश का नाम देश में महिला उत्पीडन में सबसे आगे हो गया है , अब कम से कम उद्योगों को बख्श दीजिये.......भगवान् के लिए !!!
कांग्रेस सरकार में तो राबर्ट वाड्रा नामक जंतु ही दामाद था जो अकेला देश की जमीन हड़प रहा था परन्तु अब तो अम्बानी बंधू, अडानी, टाटा, गोदरेज, मुंजाल, वेदांता मित्तल से लेकर तमाम देशों के राजदूत भी इसी श्रेणी में खड़े है और सरकारें इन्हें दिल खोलकर सब कुछ लूटा देने पर आमादा है. खाने पीने से लेकर रहने और विशेष रियायत देने तक का काम अब एक ही खिड़की के तले होना है. ये सब किसी ना किसी मामले में फंसे है चाहे उड़ीसा में वेदांता हो, थ्री जी में अम्बानी या कोल ब्लाक आवंटन में और कोई, पर कौन बोलेगा, जो बोलेगा वो मरेगा उसे हम सब मिलकर गरियायेंगे और कहेंगे कि साला मोदी के खिलाफ बोलता है, विकास के खिलाफ है और देशद्रोही है. और अब थोड़े दिनों में मेडिसिन स्क्वेयर के भाषण झेले लोग भी जमीन माँगते नजर आयेंगे, आईये यहाँ लगाईये रूपया पैसा.
चंद्रकांत देवताले जी की एक कविता थी " भाषण दे माई बाप, हम छाती ताने बैठे है"
भारत माता की जय.