Tuesday, August 26, 2014

सतर्कता भरी निराशा बेहतर है उद्दाम आशा से



ये मस्लोहत है, तवज्जो है कि साजिश|
कि मेरे दुश्मन ने मेरे हक़ में दुआ माँगी है।|


पता नहीं क्यों बहुत ज्यादा भ्रम बढ़ गया है और कुछ समझ नहीं आ रहा है, ये भ्रम सारे उजालों और अंधेरों को लेकर है , सारी अस्मिता और पहचान को लेकर है और जीवन के शाश्वत स्वरुप को लेकर भी है। असल में गफलत शुरू होती है जब हम अपने पर, कर्म और ध्येय पर सोचना शुरू करते है। द्वन्द, मूल्य और अपने होने करने के बीच अपने को बचाने की जद्दोजहद और फिर एक हद तक समझौते और सब कुछ बार बार समेट कर बिखरने का दर्द... मायूसी और हताशा बस .....

एक अंजाम तक पहुँचना अब बेहद ज़रूरी है। कोई जवाब सच में है क्या आदि ?


आधी रात को जब हम अपने भीतर खटखटाते है तो जवाब नहीं आते और लगता है सारी उम्र यही करते रहने के बाद भी कोई सुगबुगाहट नहीं होती फिर सोचते है कि ये सन्नाटा क्यों???

सतर्कता भरी निराशा बेहतर है उद्दाम आशा से

Monday, August 18, 2014

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा - गुलजार साहब को जन्मदिन मुबारक..






"शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते"

भोपाल की उस सर्द सुबह को भारत भवन के ओसारे में मैंने जब गुलजार साहब से जब गर्मजोशी से हाथ मिलाया था तो बहुत कोमल हाथ था उनका, मानो स्याही उन हाथों से कागज़ पर उतर आती हो और वे लिख देते है एक जिन्दगी, मैंने सिर्फ पूछा था कि आपको अभी भी तकमील की तलाश है.........और वे हंस पड़े कुछ नहीं बोले और कहा.......कभी जिन्दगी रही तो लिखूंगा तुम्हारा सवाल बड़ा जायज और मानीखेज है.

बहुत देर तक मेरी बांह पकड़कर बातें करते रहे थे जिन्दगी की और फिर बोले यह तलाश कभी पुरी नहीं होती बरखुरदार, जीवन तो चलता रहता है और हम सब यूँही गुजर जाते है चुपके से यकायक, और हमें ही मालूम पड़ता है कि अब वो घड़ी आने वाली है, बस अपना काम करते रहो एक रंगरेज बैठा है ऊपर और एक कुम्हार है नीचे जो घड रहा है हमें, हर पल को, हर सांस को और हम है कि लगे है इसमे........पेच लगाने में.....

गुलजार साहब को जन्मदिन मुबारक..............


 — with Aditya Shukla.


जो पहाड़ उठाकर लाया था...............



एक   पहाड़ जैसे उग रहा है अन्दर ही अन्दर और मै छुपता जा रहा हूँ इसके भीतर ही भीतर.पता नहीं कैसा लगा पर फिर लगा कि ठीक है- अपने अन्दर ही रहने दो यह सब, मै छुपा लेता हूँ खुद को तो तुम भी मेरे भीतर ही विलोपित हो जाओगे, इस तरह से हम एकाकार हो जायेंगे ठीक वैसे जैसे चट्टाने हो जाती है, जैसे बहता पानी बन जाता है झरना, जैसे पेड़ों के पत्ते बन जाते है चांदी की चमक, जैसे धुंध बन जाती है उसकी सांस, जैसे बादल बन जाते है उसका आईना, जैसे पक्षी बन जाते है रुई के फोहे, जैसे चांदनी गुम जाती है, अन्दर ही अन्दर चाँद छुप जाता है, धुप के सुनहरे गोशे बिखर जाते है ऊपर ही ऊपर, हवाएं यूँ गुजर जाती है मानो कही से आवारा मन बनाकर निकली हो.............

मै    तुम्हे इसलिए छुपा लेना चाहता हूँ कि कही किसी दरवाजे की आहट से सरसराती हुई साँसों की मंद रफ़्तार में वो अनहद कही बाहर ना बिखर जाए जो हम यहाँ किसी पत्थर में पैदा कर रहे है, जो बांस की बिन गांठों की सीधी डंडी से निकलती है और जो फूंकने पर बज उठती है मानो झंकृत कर देगी समूचे वातावरण को एक स्वर में, मै इसलिए तुम्हे अपने भीतर रखना चाहता हूँ कि ये झींगुरों का शोर मेरे रुदन को दबा ना दें,  फिर मै ना तुम्हे सुन पाउँगा और ना भज पाउँगा तुम्हे किसी कबीर की तरह, मै सिर्फ सुर बनकर तुम्हे गुनना चाहता हूँ, देखना चाहता हूँ तुम्हारी शरारतें और अठखेलिया, उन सुन्दर पांवों को जमीन पर देखना चाहता हूँ जो बहुत नाजों से कदम रखते है और जिसके लिए किसी ने कहा था कि ये सबसे सुन्दर पैर है जो एक दिन मकाम चूम लेंगे, सिर्फ महसूसना चाहता हूँ कि मेरी आत्मा को भी इस बात का एहसास ना हो कि पाप , पुण्य और सुकून से भरी दुनिया के परे एक दुनिया बिना किसी नाम और रिश्तों के बसाई जा सकती है, किसी अनजान से मुसाफिर के हौंसलों से एक मुर्दा कलुषित जीवन फिर से उद्दाम वेग से तरंगे मारता है और उमंगों से भर उठता है, सिर्फ एक सांस की दूरी से फिर अनंतिम साँसों का सफ़र पुनः शुरू हो सकता है, एक आदि से अनंत तक का वागर्थ प्रयोजन सिद्ध हो सकता है...यह पहाड़ ही था जो सब कुछ दे सकता था. 

मै   एक पहाड़ अपने अन्दर देखता हूँ जो किसी बारीक से स्पर्श से टूट जाए, बिखर जाए और हर कण से, हर संगत से, हर नाद से, और हर सुरीली तान से सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा नाम निकाले और मुझे यह लगे कि ये पहाड़ यकायक इतना बड़ा हो गया है कि इसने हम दोनों को छुपा लिया है ठीक विरह की तरह जिसे देख तो सब सकते है, सिर्फ इसे महसूस करने के लिए एक नदी होना पड़ता है.........एक पहाड़ इतना छोटा हो जाए कि मै उसमे इतना समा जाऊं कि मेरा दर्प क्षीण हो जाए और तुम्हारी महत्ता के आगे मै बौना साबित हो जाऊं, यह पहाड़  भीतर ही भीतर इतना विशाल हो जाए कि हम दोनों उसमे घुल-मिलकर तिरोहित हो जाए.........

ये   पहाड़ मै अपने अन्दर देखना चाहता हूँ, और जब मै कही से गुजरूँ तो सिर्फ और सिर्फ अपने साथ तुम्हे एक छोटी सी हरी पत्ती के रूप में देखूं किसी देवदार या चिनार के वृक्ष पर झूमते हुए और मै ऐसे रुका रहूँ मानो सदियों से इस नाजुक कोपल को संवारने के लिए ही पैदा हुआ था... बोलो मेरी धुंध में मेरे साथ हो ना तुम................???

राम भजन में चौकस रहना - मल्हार धूनी संस्थान में कबीर के भजन





















राम भजन में चौकस रहना 
हरी भजन में चौकस रहना
इक दिन चोर आयेगा....

देवास के ऐतिहासिक श्री मल्हार धूनी संस्थान में आज की शाम (17 अगस्त 2014) कबीर के भजन आयोजित किये गए। इस अवसर पर स्टेनफोर्ड विवि अमेरिका की प्रो. लिंडा हैज़, बंगलोर की शबनम वीरमणि विशेष रूप से उपस्थित थी। इस अवसर पर धूनी संस्थान की भजन मंडली और शबनम ,लिंडा ने भी मालवा के कबीर भजन प्रस्तुत किये।

कार्यक्रम में अतिथियों का परिचय संदीप नाईक ने दिया। कार्यक्रम में डा प्रकाश कान्त , जीवन सिंह ठाकुर ,रोहित भौरास्कर , कैलाश सोनी , वैदेही, अमेय कान्त , अम्बुज सोनी, बहादुर पटेल , सर्वेश राठौर ,अमर येवले , राजकुमार दिघे , सुभाष शर्मा शशिकांत यादव, नारायण देल्मिया, दिनेश पटेल , विक्रम सिंह , अजय कानूनगो , प्रवीण जोशी श्रीकांत उपाध्याय, संजीवनी कान्त , मधु ठाकुर, पारुल रोड़े, अनूप सक्सेना , दयाराम सारोलिया , महेश पटेल,  अरविन्द सरदाना, स्वराली आदि गणमान्य लोग उपस्थित थे।

इस कार्यक्रम में एक ख़ास बात थी कि इसी बहाने से शीलनाथ महाराज के कामों और उनके आध्यात्मिक स्वरुप पर काफी जानकारी मिली। लिंडा ने अपनी किताबों में और शबनम ने अपनी फिल्मों में इस संस्थान का बार बार जिक्र किया है।



Bahadur Patel Amey Kant Parul Rode Ambuj Soni Vaidehi Singh Dinesh Patel Prakash Kant Rohit Bhoraskar Mahesh Patel Swarali Bs Purushottam Agrawal




































Friday, August 8, 2014

औचित्यहीन होती संस्थाएं और साक्षरता



देश  में साक्षरता के नाम पर खोले गए राज्य संसाधन केन्द्रों का अब क्या ओचित्य बचा है। बेहतर होगा कि यहाँ तबले बजा रहे लोगों और मोटी तनख्वाह पा रहे लोगों को स्कूलों और दीगर काम करनेवाली जगहों पर लगा दिया जाए। फ़ालतू के कामों, अनुपयोगी सामग्री और साक्षरता के नाम पर कार्यशालाएं और देश भ्रमण पर अब रोक लगानी चाहिए। 

जिला  कलेक्टर कार्यालयों में इन कर्मचारियों की ज्यादा जरुरत है जो दक्ष, कुशल और परिपक्व है। ये बहुत देशी किस्म के खांटी लोग है जो जिला पंचायत मे बैठकर काफी काम अच्छे से कर सकते है।

राज्य  संसाधनों केन्द्रों के भवन जो सुसज्जित और सुविधायुक्त है उनका उपयोग और बेहतर ढंग से किया जा सकता है अभी तो ये एनजीओ के मठ बने हुए है। नई सरकार फिर से इनका मूल्यांकन करें और सही काम लें या बंद कर दें

यह  देश का दुर्भाग्य ही है कि सन 1990 से साक्षरता के नाम पर पुरे देश को बेवक़ूफ़ बनाया गया। सिर्फ ढाँचे खड़े किये गए, अरबों रूपया बर्बाद हुआ और राज्य संसाधन केंद्र जैसे मठ खड़े किये गए जहां बेहद संभावनाशील लोग भर्ती किये गए थे कि वे पुरे आन्दोलन को एक दिशा देंगे। एनजीओ को इनकी जिम्मेदारी गयी थी पर कितना पतनशील समाज है हमारा कि आज ये लोग केंद्र सरकार की Liabelity बन गए है और सिवाय समय, धन और संसाधनों कीबर्बादी के कुछ नहीं कर रहे। 

लोग
 कहेंगे कि और विभाग भी काम नहीं करते , फिर दोष सिर्फ हमें क्यों तो भैया आप देश को साक्षर करने का ठेका लेकर आए थे आपको बीस सालों से तनख्वाह इसीलिए दी जा रही है आज आप खुद से पूछे कि क्या किया आपने , सिवाय अपने खुद के नाम , संस्था का नाम और बैलेंस बढाने के?? 

सिर्फ
 कार्यशालाओं, देश भ्रमण और सामग्री के नाम पर कूड़ा छापने के सिवायक्या काम किया आपकी टीम ने। हर माह देश के हर प्रांत के हर केंद्र में चार चार दिन तक सेमीनार होते है, क्या फायदा है इनका सिवाय आपके तीर्थाटन के ? मानव संसाधन मंत्रालय में नाते रिश्तेदार सलाहकार के नाम पर निकम्मों की तरह बिठा रखे है जो हवाई यात्राएं करते है और काम के नाम पर कुछ नहीं। इन केन्द्रों में कुछ काम नहीं और बीस से तीस कर्मचारी या तो टेबल पर तबला बजाते है, लड़ते-भिड़ते है या अपनी दुकानदारी में लगे रहते है। भवनों में एसी लगे है गाड़ियां दौड़ रही है डीजल फूँका जा रहा है और नतीजा शून्य है। 

इस  
देश को अब ना साक्षरता की जरूरत है ना किसी तरह की जागरूकता की, और जहां जरुरत है वहाँ तो ये वीर सिपाही सात जन्मों में जा नहीं सकते। समय है कि संसाधनों की बर्बादी रोकी जाये, यहाँ के कर्मचारियों को जिनमे अधिकांश में जंग लग चुका है, और भयानक रूप से मानसिक बीमारी के शिकार होकर डिप्रेशन में चले गए है, को जिले के ब्लाक मे स्थित जनपद कार्यालयों में मे भेज देना चाहिए ताकि थोड़ा काम करें और इस बहाने से वे स्वस्थ रह सकें,जो मोटी चमड़ी काया पर चढ़ गयी है वह थोड़ी उतर सकें और जनपदों को इनकी योग्यता का फायदा मिल सकें। 

तीसरा
 इन संसाधन भवनों का शासन अधिग्रहण कर लें मुझे आशंका है कि एनजीओ इन्हें अपने कब्जे में लेकर निजी संपत्ति बना लेंगे। वैसे भी ये भवन देशी विदेशी ग्रांट से बने है और इस नाते यह सरकारी और सामाजिक संपत्ति है जिस पर समुदाय या सरकार का हक़ है। इन भवनों में आश्रम शाला या आदिवासी लड़कियों के लिए होस्टल खोले जा सकते है जहां दूर दराज से आई लड़कियां रहकर पढ़ सकती है। 

तुरंत  
प्रभाव से सेमीनार, यात्राओं और प्रकाशन पर रोक लगाई जाए और कर्मचारियों का मूल्यांकन किया जाकर युक्तियुक्तकरण से इनकी उपयुक्त जगहों पर नियुक्ति की जाए। नई मानव संसाधन मंत्री इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देंगी यह मेरा विश्वास है और यह मै देश हित में लिख रहा हूँ किसी दुर्भावना वश नहीं , ना ही पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर।

Sunday, August 3, 2014

बड़े स्टेशन पर प्राथमिक सुविधा बनाम 108 की सुविधा



भोपाल रेलवे स्टेशन पर बैठा हूँ सुबह बेंगलोर जाना है। यह एसी का वेटिंग रूम है। जहां बैठे है वहां पास में एक बुजुर्ग सज्जन जिनके साथ दो और लोग है, को अचानक सीने में दर्द उठता है और पसीना आता है। मै समझ रहा हूँ कि यह हार्ट अटैक है और उनके साथ वालो को कहता हूँ कि 108 को फोन करो अपनी यात्रा स्थगित करो। थोड़ी देर में हम लोग उन बुजुर्ग सज्जन को सीधा लेटाकर आराम करने देते है तब तक एक शख्स प्लास्टिक का विचित्र सा स्ट्रेचर लेकर आता है और कहता है कि अंकल चलो । जब मै कहता हूँ कि उठाकर ले जाओ तो कहता है कोई है नहीं स्ट्रेचर उठाने वाला, आप उठवा दो, तो मै और उन सज्जन के पारिवारिक सदस्य उन्हें स्ट्रेचर पर लेटाकर बाहर ले जाते है।

जब मैंने पूछा कि डाक्टर कहाँ है , तो ड्राईवर कहता है अभी आयेंगे तब तक हम बाहर पहुंचते है वहाँ एक दुबला पतला सा लड़का खडा है। ड्राईवर को जब मैंने डांटकर पूछा तो बोला की ये ही डाक्टर है। जब मैंने उस लड़के से नाम पूछा तो हडबडा गया और बोला आपको क्या करना कि डाक्टर कौन है , मै देखभाल कर लूंगा । बहुत बार पूछने पर उसने अपना नाम राहुल बताया और बोला कि मै ही डाक्टर हूँ , जब मैंने पूछा कि क्या डोज इन्हें अभी दोगे, तो बोला पता नहीं!!! फिर मैंने ड्राईवर से पूछा कि स्ट्रेचर उठाने के लिगे कोई क्यों नही है और डाक्टर का झूठ क्यों बोला तो कहने लगा कि मेरी शिकायत मत करो मै तो समय पर आ गया हूँ । बहुत बार पूछने पर अपना नाम नहीं बता रहा था फिर जब मैंने जोर दिया और भीड़ का दबाव आया तो कहा कि रूप सिंह भदौरिया है। और तुरंत गाडी में घूस गया।

ये हालत है 108 की और स्वास्थ्य सेवाओं की। गाडी हमीदिया से आई थी और साथ ड्राईवर और शायद उसका गुटखा चबाने वाला कोई दोस्त रहा होगा। हम खूब चिल्ला लें , सर पटक ले, पर मप्र में स्वास्थ्य विभाग के निकम्मे लोगों को कोई नहीं सुधार सकता। 108 और जननी सुरक्षा वाहनों का तो भगवान् ही मालिक है। इस बात की जांच होनी चाहिए कि अभी इस गंभीर स्थिति को देखते हुए कोई डाक्टर 108 में क्यों नहीं आया था जबकि यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि गंभीर हार्ट अटैक का मामला है।

ये अगर राजधानी भोपाल और मुख्य स्थान रेलवे स्टेशन की बात है तो बाकी जगहों का क्या होता होगा। सोच सकते है ना आप ???

इतने बड़े स्टेशन पर कोई प्राथमिक सुविधा नहीं थी ना ही डाक्टर की व्यवस्था।

"मिठास"



"मिठास"
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झगड़ा   तो रामखिलावन से भी किया 
जब समय पर कपडे इस्त्री करके नहीं दिए
सारे समय इस तरह झगड़ा कि 
अपने अन्दर का जानवर बाहर कब 
निकला और क्रूर हो गया मै 
पता नहीं चला, 
सिर्फ इस बात पर 
कि समय पर चार कपडे इस्त्री करके 
नहीं दिए मानो मुझे कही अंतरिक्ष में 
जाना था उस समय.

याद   आया सड़क पर भरी दोपहरी में 
जब मै विशुद्ध फुर्सत में था तो यूँही 
लड़ पडा था बस स्टेंड पर फगनलाल मोची से भी 
कि मेरे बरसाती जूतों को ठीक से चिपकाया नहीं
जब उधड गए थे तीन जगहों से 
एक नए शहर में बस स्टेंड पर मोची से झगड़ना
कितना वीभत्स था सिर्फ बारह आने के लिए,  
मुझे लगा था सही हूँ मै उस वक्त 

फिर   यह झगड़ा मेरे साथ एकाकार हो गया 
जब कभी कही से गुजरता तो लगता कि हर नजर 
घबराहट से देख रही है कि मै शुरू ना हो जाऊ 
गली मोहल्ले और घर परिवार में भी यही 
नजरें मुझे कोसती रहती और खौफ खाती 
एक शख्स एक शब्द के साथ जुड़ गया 
और इस तरह से झगड़ालू का विशेषण चिपका 
जिन्दगी की लम्बी व्यथा कथा शुरू हुई मित्रों 

ये   समय मिलजुल कर लड़ने का था 
झींगुर से लेकर दुनिया के वैश्विक बाजार से 
लड़ने की ताकत में आँखों के पानी के साथ 
जिगर का खून भी देना पड़ता है
लड़ रहे थे लोग बाँध से लेकर सब्जी के पेटेंट तक
चावल के बीज से लेकर संबंधों के दरक जाने को लेकर 
पर दोषी मुझे ही ठहराया गया हर जगह 

समय   गुजरता गया रामखिलावन और फगनलाल से झगड़े 
अब दफ्तर और साँसों की रफ़्तार तक आ पहुंचे है 
शहर दर शहर मै और मेरे झगड़े बढ़ रहे है
दुनिया के हर कोने में झगड़ों की 
आवाजें बुलंद होती जा रही है 
न्याय से लेकर हकों की लड़ाई में लोग 
झगड़ो से समझौतों पर आ गए है 

एक   दिन तय किया कि सब छोड़ दूंगा और 
हिस्सा बन जाउंगा इसी दुनिया का जो 
मिल बांटकर खाने खिलाने में यकीन करती है
आज मै किसी भी बात के लिए नहीं बोलता 
किसी भी गलत बात के लिए सवाल नहीं उठाता 
सबसे मेरे अच्छे रिश्ते है और मै देखता हूँ कि 
दुनिया एक नए स्वरुप में बदलती जा रही है. 

(किसी अपने के लिए जो झगड़े से बचाने में मुझे हमेशा लगा रहता है)


Saturday, August 2, 2014

प्रेत से मुक्ति की जरुरत




वैदिकाश्रम, गणेश मंडल, सोनार वाड़ा, महाराष्ट्र ब्राहमण सभा, सारस्वत समाज आदि वो जगहें जिन्हें मै बचपना से जानता हूँ इंदौर में और शायद ही कोई मराठी भाषी होगा जो इन जगहों को नहीं जानता होगा. मेरे अपने परिवार में दर्जनों शादियाँ, जनेऊ और ना जाने कितने पारिवारिक कार्यक्रम यहाँ संपन्न हुए है. आज एक ऐसे ही एक कार्यक्रम में मै इंदौर के सारस्वत समाज धर्मशाला में था तो देखा कि इस जगह की हालत बहुत खराब हो गयी है. इसी तरह से बाकी सब जगहें भी धीरे धीरे ख़त्म हो गयी है और जर्जर हालत में है. एक ओर अन्य समाजों के भवन जहां फाईव स्टार बन गए, एसी लग गए और बहुत सुविधाजनक हो गए वही मराठी समाज के ये सार्वजनिक स्थल क्यों ख़त्म हो गए. जब कुछ मराठी भाषी मित्रों और बुद्धिजीवियों से बातें की, तो उन्होंने जो बताया वो बेहद चिताजनक था. मै सिर्फ मराठी भाषी होने के नाते या ब्राहमण होने के नाते से नहीं वरन एक जागरुक समाज का सदस्य होने के नाते और एक मध्यमवर्गीय इंसान होने के नाते यह टिप्पणी बहुत गंभीरता से कर रहा हूँ.

यह बात उभरी कि मराठी समाज को पेढी, समाज, और अन्य ऐसी गतिविधियों से जोड़ा गया, साल भर चलने वाले कार्यक्रम और सांस्कृतिक उत्सवों के माध्यम से मराठी भाषी लोग अपने को क्रियाशील रखते है, संगीत, नाटक, ललित कलाओं में रूचि, समय और धन देने वाले ये लोग बहुत समर्पित भाव से समाज के कामों में लग जाते है. बाबा डिके, राहुल बारपुते, विष्णु चिंचालकर आदि ऐसे लोग थे जिन्होंने मराठी भाषीयों के बीच मानक स्तर का काम किया और इस बहाने से कई लोग जुड़े और इंदौर - देवास में रचनात्मक कार्य हुए. परन्तु "सानंद" के गठन के साथ यह प्रक्रिया सिर्फ अभिजात्य मराठी भाषी लोगों के साथ जुड़ने की शुरू हुई जिसने बहुत नुकसान किया. सानंद ने गत बीस वर्षों में इस मराठी भाषी समाज का जितना नुकसान किया उतना किसी ने नहीं किया. साल दर साल नाटक दिखाने के नाम पर महाराष्ट्र से नाटक बुलाते रहे, संगीत से लेकर तमाम तरह के कीर्तन और अन्य विधाओं के लोगों को बुलाते रहे और यहाँ का रूपया महाराष्ट्र में देते रहे. सानंद की वजह से स्थानीय नाटक के कलाकार उपेक्षित रहे और संस्थाएं दम तोड़ती रही, सानंद ने जो चन्दा इकठ्ठा किया उसका हिसाब कभी अपने सदस्यों को नहीं दिया यहाँ तक कि माई मंगेशकर हाल को भी कुछ आर्थिक सह्योग नहीं किया, ऊपर वर्णित संस्थाओं की यदि सानंद खैर खबर लेता, तो शायद ये भवन और संस्थाएं आज अलग हालत में होती, आज भी सानंद देवी अहिल्या विवि के प्रेक्षागृह में कार्यक्रम करता है जबकि चंदे के नाम पर लाखों रूपये प्रतिवर्ष लिया जाता है.

इसमे कोई शक नहीं कि सानंद ने अच्छे गंभीर नाटको का स्वाद इंदौर वासियों को चखाया है पर सानंद ने इंदौर के नाटक कर्मियों की घोर उपेक्षा की और स्थानीय कला भवनों की भी भारी अनदेखी की है. अब समय है कि सानंद में नए लोग आये, नेतृत्व बदले और स्थानीय कलाकारों और संस्थाओं को प्रश्रय मिलें, महाराष्ट्र में कमाने वाले और देखने वाले प्रोत्साहन वाले बहुत है. इंदौर की गौरवशाली नाट्य परम्परा को, संगीत और संस्कृति को ज़िंदा रखना है तो सानंद को बाहर वाले प्रेत से मुक्ति की जरुरत है और स्थानीय कलाकारों को बचाने और खासकरके पुराने भवनों को जीर्णोद्धार करके संरक्षित करने की तुरंत आवश्यकता है. समझ रहे है ना सानंद के माई बापों !!!

इंदौर की सांसद सुमित्रा ताई से भी निवेदन है कि इन गौरवशाली भवनों के संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए अपने तई प्रयास करे और सांसद निधि से राशि देकर इन्हें दुरुस्त करें ताकि फिर से संस्कृति का बयार बह सकें और महंगे खर्च से बचकर और सानंद जैसे विशुद्ध व्यवसायी संस्थान से निकालकर आम लोग ललित कलाओं का रसास्वादन कर सके. ध्यान दें ताई, ये मराठी भाषी ही है जिन्होंने आपको इतने प्रेम, सम्मान और सहजता से बार बार संसद में पहुंचाया है. सानंद में कुछ लोग अच्छे है वे इस पर ध्यान दे कि अब सानंद की दिशा क्या है और वे किसलिए चले थे और कहाँ पहुँच गए है.