Monday, July 28, 2014

" सीधी बात " पालक को लेकर ........





" सीधी बात "

साफ करता हूँ पालक तो
हाथ आ जाती है मिट्टी
कुछ छोटे मोटे कीड़े 
जंगली घास-फूस
और बहुत कुछ जो
उस पालक से चिपककर ज़िंदा है
एक झटके से गाली निकलती है
सब्जीवाले के नाम कि कितना कचरा
पालक के नाम पर दे दिया
पकड़ा दिया इतना महँगा
खेत से उखाड़ते समय क्यों
ध्यान नहीं रखते पालक का
हरी पत्तियाँ ही तो काम की होती है
खून बढ़ता है हरेपन से
क्या मालूम नहीं इन मूर्खों को
कितना लोह अयस्क होता है
कितना सस्ता स्रोत है गरीब
और कुपोषित लोगों के लिए
एक स्त्री के लिए - जो एक जीवन
को जन्म देने के लिए तत्पर है
एक बच्चे के लिए- जिसके शरीर पर
अभी मांस, मज्जा और हड्डी
बन ही रही है आहिस्ता से
इतनी सरल सी बात ध्यान नहीं रहती
फिर देखता हूँ पालक से
निकले कचरे को बारीकी से
और अचानक चौक उठता हूँ कि
हरेपन के बिना लाल का बढ़ना
मुश्किल लगता है मित्रों.
- संदीप नाईक

Friday, July 25, 2014

बरसात की रजत बूँदें


बारिश तो तन भिगो देती है पर जो सूखा रह जाता है एक मन, कुछ एहसास, कुछ आधे अधूरे से अपुष्ट सपनें और गुनगुनी होती इच्छाएं उनका क्या ? चारो ओर गिला सा होता देख और अन्दर तक धंसते जा रहे पानी को देखना अपनी शिराओं में झुरझुरी का एहसास करा देता है कि कैसे कोई सांस की तरह से कब धंसकर समा गया और फिर एक बीज कही से सारे विरोध के बावजूद पल्लवित हो गया। इंतज़ार है उस पल्लवित होते बीज का वट वृक्ष में तब्दील हो जाने का, देखे बरसात की रजत बूँदें इसे पोषित करती है या अश्रुओं की उद्दाम धाराएं !!!

खिड़की में कांच लगा है और ये रजत बूँदें सरकते आ रही है, एकदम करीब और जब छू जाती है तो सन्न सा रह जाता हूँ - पता नहीं क्यों लगता है मानो सब कुछ भिगोते हुए सब कुछ समेट कर ले जायेंगी और फिर सब कुछ रीता रीता सा रह जाएगा। उन्मुक्त उद्दाम वेग की ये जीवन रेखाएं कांच के इन्ही पारदर्शी आवरणों से सब कुछ झीना कर रही है मानो फिर कोई कबीर गा रहा है झीनी झीनी चाददिया ....या इस घट अंतर बाग़ बगीचे, इसी में पालनहार ....

सहरिया आदिवासियों में कुपोषण


Photo: श्योपुर और शिवपुरी में सहरिया आदिवासियों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है। तत्कालीन कमिश्नर महिला बाल विकास डा मनोहर अगनानी के मार्गदर्शन में ग्राम ऊँची खोरी कराहल ब्लाक जिला श्योपुर में आठ दिन तक कलेक्टर और जिले के पुरे अमले के साथ समय लगाया था  कि हालत सुधारे जा सके। एक रिपोर्ट भी बनी थी जिसे सार्वजनिक नहीं किया गया क्योकि इसमे सरकारी तंत्र के कई विफलता के आकर्षक किस्से थे। बहुत कुछ निर्णय लिए गए, डा अगनानी ने जिला कलेक्टर और विभागों को कई निर्देश दिए थे , पर ढाक के तीन पांत। इतने बड़े लवाजमे ने यह नतीजा निकाला था कि 89% आबादी भयानक कुपोषित है। संस्थागत प्रसव नहीं होता आज भी , क्योकि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में रिश्वत माँगी जाती है। गाँव की एक आंगनवाडी में 2012 से कार्यकर्ता की नियुक्ति नहीं हुई है और दूसरी मिनी आंगनवाडी कार्यकर्ता माह में मुश्किल से आठ दिन आती है। मैंने कल देखा कि टेक होम राशन भरा पडा है जो बंट नहीं रहा ठीक तरीके से , और एक तो एक्सपायर्ड भी हो गया था। कम से कम पंद्रह थैले पड़े थे। 

ध्यान रहे कि शिवपुरी और श्योपुर यूनिसेफ के उच्च ध्यान देने वाले जिले आज भी है जहां यूनिसेफ के अधिकारी  इन जिलों को राज घाट की तरह से हर माह में कम से कम दस बार दौरा करके कागजी रपट बनाते रहते है। सैकड़ों की संख्या में यूनिसेफ के निठल्ले कंसल्टेंट्स यहाँ आकर अपना भत्ता और होटलों में रहकर रूपया कमाते है पर सहरिया आदिवासी की हालत बहुत खराब है।

मप्र योजना आयोग विकेन्द्रित नियोजन और ट्राईबल सब प्लान के नाम पर अपनी पीठ ठोकता रहता है पर हालात और खराब होते गए है। इतनी खराब हालत है कि ग्राम के सभी परिवारों के लिए यानी 396 लोगों के लिए मात्र एक हेंडपंप है जो बहुत कम पानी देता है अब वे लोग पानी पीयें या नहाए धोये और वाश जैसी नौटंकी करें। मुझे नहीं लगता कि योजना आयोग में सालों से बैठे चाटुकार आय ऍफ़ एस जो सलाहकार है और सारे बजट को जेब में रखकर चलते है कभी श्योपुर गए होंगे, उन बेचारों को विदेश यात्राओं और मुख्यमंत्री की जी हुजूरी से फुर्सत  मिलें तो कुछ सोचें ! 

इस प्रदेश में अब शर्म ख़त्म हो गयी और योजना आयोग और अन्य प्रशासन और यूनिसेफ जैसी संस्थाओं को भी यश और कीर्ति का कीड़ा लग गया है। काम कुछ नहीं और रूपया और नाम चाहिए। सहरिया आदिवासी के नाम पर क्या कुछ नहीं हुआ पर बच्चे आज भी कुपोषित है और मर रहे है। जिला प्रशासन कागजो की दौड़ लगाता है ओर जो एनजीओ काम करना चाहते हई उन्हें अधिकारी रिश्वत देकर उनका मुंह बांधने की कोशिश करते है। 

सच में तीन नोटिफाईड आदिवासी- बैगा, भारिया और सहरिया का प्रदेश में भगवान् ही मालिक है। सच में व्यापम से या इन्वेस्टर्स मीट से किसी को समय मिले तो इनकी ओर ध्यान दें।


श्योपुर और शिवपुरी में सहरिया आदिवासियों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है। तत्कालीन कमिश्नर महिला बाल विकास डा मनोहर अगनानी के मार्गदर्शन में ग्राम ऊँची खोरी कराहल ब्लाक जिला श्योपुर में आठ दिन तक कलेक्टर और जिले के पुरे अमले के साथ समय लगाया था कि हालत सुधारे जा सके। एक रिपोर्ट भी बनी थी जिसे सार्वजनिक नहीं किया गया क्योकि इसमे सरकारी तंत्र के कई विफलता के आकर्षक किस्से थे। बहुत कुछ निर्णय लिए गए, डा अगनानी ने जिला कलेक्टर और विभागों को कई निर्देश दिए थे , पर ढाक के तीन पांत। इतने बड़े लवाजमे ने यह नतीजा निकाला था कि 89% आबादी भयानक कुपोषित है। संस्थागत प्रसव नहीं होता आज भी , क्योकि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में रिश्वत माँगी जाती है। गाँव की एक आंगनवाडी में 2012 से कार्यकर्ता की नियुक्ति नहीं हुई है और दूसरी मिनी आंगनवाडी कार्यकर्ता माह में मुश्किल से आठ दिन आती है। मैंने कल देखा कि टेक होम राशन भरा पडा है जो बंट नहीं रहा ठीक तरीके से , और एक तो एक्सपायर्ड भी हो गया था। कम से कम पंद्रह थैले पड़े थे।

ध्यान रहे कि शिवपुरी और श्योपुर यूनिसेफ के उच्च ध्यान देने वाले जिले आज भी है जहां यूनिसेफ के अधिकारी इन जिलों को राज घाट की तरह से हर माह में कम से कम दस बार दौरा करके कागजी रपट बनाते रहते है। सैकड़ों की संख्या में यूनिसेफ के निठल्ले कंसल्टेंट्स यहाँ आकर अपना भत्ता और होटलों में रहकर रूपया कमाते है पर सहरिया आदिवासी की हालत बहुत खराब है।

मप्र योजना आयोग विकेन्द्रित नियोजन और ट्राईबल सब प्लान के नाम पर अपनी पीठ ठोकता रहता है पर हालात और खराब होते गए है। इतनी खराब हालत है कि ग्राम के सभी परिवारों के लिए यानी 396 लोगों के लिए मात्र एक हेंडपंप है जो बहुत कम पानी देता है अब वे लोग पानी पीयें या नहाए धोये और वाश जैसी नौटंकी करें। मुझे नहीं लगता कि योजना आयोग में सालों से बैठे चाटुकार आय ऍफ़ एस जो सलाहकार है और सारे बजट को जेब में रखकर चलते है कभी श्योपुर गए होंगे, उन बेचारों को विदेश यात्राओं और मुख्यमंत्री की जी हुजूरी से फुर्सत मिलें तो कुछ सोचें !

इस प्रदेश में अब शर्म ख़त्म हो गयी और योजना आयोग और अन्य प्रशासन और यूनिसेफ जैसी संस्थाओं को भी यश और कीर्ति का कीड़ा लग गया है। काम कुछ नहीं और रूपया और नाम चाहिए। सहरिया आदिवासी के नाम पर क्या कुछ नहीं हुआ पर बच्चे आज भी कुपोषित है और मर रहे है। जिला प्रशासन कागजो की दौड़ लगाता है ओर जो एनजीओ काम करना चाहते हई उन्हें अधिकारी रिश्वत देकर उनका मुंह बांधने की कोशिश करते है।

सच में तीन नोटिफाईड आदिवासी- बैगा, भारिया और सहरिया का प्रदेश में भगवान् ही मालिक है। सच में व्यापम से या इन्वेस्टर्स मीट से किसी को समय मिले तो इनकी ओर ध्यान दें।

Sunday, July 13, 2014

अकेलेपन का आकाश की मौत के साथ अंत.....


आज पता चला कि आकाश ने आत्महत्या कर ली, मै आकाश को लगभग पिछले छब्बीस बरसों से जानता था, बहुत ही ज्ञानी और जमीन से जुड़ा बन्दा था. एनजीओ जब स्वैच्छिक संस्था के नाम से जाने जाते थे वह उसमे काम करता था, हालांकि काम तब भी कार्पोरेट्स का ही होता था बस यह था कि लोगों की भाषा और पहनावा थोड़ा सा देशज होता था. आकाश ने एक के बाद दो शादियाँ की,  अंत में उसे कही भी मुक्ति नहीं मिली, एकाकीपन से तंग आ गया. इस दौरान मैंने देखा कि इस पुरे एनजीओ क्षेत्र में अकेले लोगों की एक लम्बी भीड़ है - लडके - लडकियां और कईं लोग परिवार के होते -सोते भी बेहद अकेले है, और इसी अकेलेपन ने उन्हें निष्ठुर और कामरेड बना दिया था. अपने शरीर को मारकर ये लडके लडकियां या तो निपट अकेले थे या किसी सहकर्मी के घर में सेंध मारकर जमे बैठे थे और संसार ना बसाकर भी संसार के वो सारे सुख उड़ा रहे थे जिसे वासना, प्यार या इमोशनल बैलेंस कहते है. और इस सबमे खासकरके लड़कियों को मैंने शोषित होते देखा है जो अपनी मर्जी से अपनी उन्मुक्त देह के सहारे और विचार क्रान्ति को आधार बनाकर इस अनोखी  दुनिया की सत्ता पर कब्जा जमाये बैठी है. 

आकाश ने भी दो विवाह किये थे और फिर लिव इन का रिश्ता रखा जिसे आजकल इस नाम से परिभाषित किया जाता है, एक दिन वो उड़ गयी जिसे उन्मुक्त गगन की चाह थी और फिर आकाश ने अपना एकाकीपन अपना लिया, परन्तु थोड़े दिन बाद उसे लगा कि यह चलेगा नहीं, फिर उसे एक नई जिन्दगी मिली. गाडी चल निकली, पर थोड़े दिन बाद मन मुटाव बढ़ने लगा. एक दिन झगडा और फिर वही शाश्वत अकेलापन. 

एनजीओ में भी अकेले आदमी के लिए कोई बहुत संभावना होती नहीं और अपनी मानसिकता के लोग ना मिलने के कारण लोग टूटते जल्दी है. और फिर इस तरह के अकेले लोगो के लिए इस तरह का सहारा देने वालों की कमी भी हमारे देश समाज में है, पर इस सबमे आकाश लगातार कमजोर होता गया. मैंने देखा कि ऐसे सारे अकेले लोग एक तरह के फ्रस्ट्रेशन में जीते जी ख़त्म होते जा रहे है, गहरी वेदना में ये पुरुष कट्टर होते गए और लड़कियों को  समाज ने घर बिगाडू औरतों का दर्जा दे दिया और ये कही नक्सलवाद में गुम हो गयी या कही साहित्य में घूस गयी और फिर धीरे से शादी शुदा मर्दों के बिस्तर से दूर अपनी एक दुनिया बसाने के लिए लड़कियों को गोद लेकर पालने लगी. पर इस बीच आकाश को कही ओर - छोर नहीं मिल रहा था..............

कल रात जब मै देर तक जाग रहा था और उसके साथ बात कर रहा था तो पाया कि अकेलेपन ने उसे तोड़ दिया है और ना ही उसके पास अब उसके दोस्त बचे है ना ही संस्था के लोगों की हमदर्दी ; जिन संस्थाओं को मदद करके बड़ा किया, जिन आन्दोलनों को खडा किया, वे सब अब उससे कतराने लगे है और आखिर में अलस्सुबह तीन बजे उसने कहा कि चलो संदीप मै सोता हूँ और तुम भी सो जाओ, मुझे क्या पता था कि वो नींद की गोलियों का भयानक बड़ा डोज़ लेकर हमेशा के लिए सो रहा है.......

अभी निशांत का फ़ोन आया तो पता चला कि अकेलेपन ने उसकी जान ले ली, आकाश नहीं रहा, यह मेरे लिए कोई नई सूचना नहीं थी, वो तो उसी समय ख़त्म हो गया था जब वो बेहद अकेला रह गया था अपने आप के साथ. मैंने उससे कहा था आख़िरी बार कि खुश रहो आबाद रहो, उसकी मौत की खबर सुनकर अब कुछ कहने  की शक्ति नहीं रही. रह रहकर आकाश की आख़िरी बात याद आती है कि "यह अकेलापन मेरी जान ले लेगा या मै ही सौंप दूंगा अपने आप को किसी दिन गहरी नींद के हवाले.........."

Saturday, July 12, 2014

लजीज कटहल का अचार..........






एक डेढ़ घंटे की मेहनत में छह किलो कटहल का अचार बनाया है वाह इसकी खुशबू पुरे घर में महक रही है। हींग, कलौंजी और सभी मसालें। भारतीय रसोई वाकई अपने आप में परिपूर्ण और लाजवाब है। 


दो किलो कच्चा कटहल साफ़ करके बारीक टुकड़ों में काट लें। छुरी पर तेल लगाकर काटे वरना मेहनत ज्यादा करना पड़ेगी। फिर इसे कूकर में स्टीम कर ले । फिर आधा किलो कच्चे आम काट कर रख ले। अचार मसाले में कटे आम डाल दें और फिर ठन्डे होने पर कटहल के टुकडे मिला दें । एक कढाई में सरसों का तेल बढ़िया गर्म करें और फिर थोड़ा ठंडा होने पर इसमे हींग मिला दें। पूरा ठंडा होने पर अचार मसाले , आम और कटहल के टुकड़ों के साथ मिला दें। 



दो दिन तक इसे हिलाते रहे और लीजिये, आपका बढ़िया वाला मस्त कटहल का अचार तैयार है। अगर ज्यादा दिक्कत है तो बन्दे को बुला लें हाजिर हो जायेगा सिर्फ़ एक घंटे का काम है। आम डालना जरुरी है वरना सिर्फ कटहल गला पकड़ेगा।



इसे साफ़ और सुखी हुई कांच की बरनी या चीनी की बरनी में भरकर रखे, साल भर मजे में चलेगा, जब खाएंगे इस हलवाई की याद आयेगी।