Wednesday, June 25, 2014

एक स्त्री का दूसरा मर्द



रूपया बहुत कुछ हो ना हो , पर एक स्त्री के जीवन का दूसरा मर्द होता है...

बहुत गंभीर बात जब उसने कही, तो मैंने देखा रो रही थी वो , बावजूद इसके कि हाल ही में उसने पैतालीस लाख का फ़्लैट खरीदा था। उसकी मासिक आय करीब दो लाख थी और इस बड़े से पॉश फ्लैट में वो अकेली रहती थी क्योकि सेपरेशन के बाद वो नितांत अकेली रह गयी थी। भाई भी कभी कभी कह देते कि अपने घर जाओ, पर यह घर उसने खुद अपने लिए बनाया है और "अब मै अपने घर में बहुत सुरक्षित महसूस करती हूँ - अपने आप को चाहे मै यहाँ एकदम अकेली हूँ" उस सडियल सी शादी शुदा जिन्दगी से एक बच्चा भी निकल आता तो आज मै शायद खुश रह लेती , पर अब तो नियति का खेल है और मै इसकी कठपुतली। तुम भी तो अकेले हो, उसने पूछा तो मैंने कहा हाँ, तो ? तुम्हारा घर क्यों नहीं , बना लेते एकाध कमरा ही सही, लोन ले लो, पर एकल स्त्री या पुरुष का अपना खुद का घर होना बेहद जरुरी है, चाहे अखबार बिछा कर सोना पड़े और पानी पीकर पेट भर लो, पर अपना होना चाहिए सब कुछ। सन्न रह गया था मै उसकी बात सुनकर!!!

मेरी हिम्मत नहीं थी कि उसके कंधों पर हाथ रखकर उसे कह दूं कि मै हूँ ना रो मत, या ये कह दूं कि जो शब्दों के घर बनाते है वे और सब घरों से निष्कासित कर दिए जाते है। मै भी तो बहुत रोया पर आंसू कही अन्दर ही अन्दर विलोपित हो गए मानो तय करके बैठे हो कि आज तुम्हे एक स्त्री के सामने जीतने नहीं देंगे, बस कार में मुझे छोड़कर वो चली गयी और मै शहर में गुजरती अट्टालिकाओं को गिनता लौट रहा था, कहाँ यह नहीं पता पर जीवन अब एक मकान पर ख़त्म होता है बॉस और अब अपनी लाश अपने घर की देहरी से निकलेगी- यह सोचकर मै मुस्कुरा दिया और कमबख्त आंसू टपक पड़े भद्दे से मोटे मोटे और लोग देख रहे थे की इस समय में भी कोइ रो सकता है जबकि रोने के और कई सॉलिड बहाने थे बाजार में।

एक अकेली स्त्री का विलाप, केवल विलाप नहीं - जीवन का क्रूर सत्य भी है।

(एक स्त्री का दूसरा मर्द- लिखी जा रही कहानी का अंश)

"tu me manques"


In French we don't say I miss you, they say "tu me manques" 

Means you are missing from me, and I love this you are missing from me. You are a part of me , you are essential to my being, you are like a limb, or an organ or blood. I can not function without you.

Thanks Apoorva Dubey for this best quote and I mean it too. Thanks

सही है साईबाबा भगवान् नहीं है


सही है साईबाबा भगवान् नहीं है और आप भी तो नहीं है शंकराचार्य 

असली दिक्कत आपको यह है कि वहाँ शिरडी में अभी किसी ने 350 किलो सोने का रथ चढ़ाया और हर साल वहाँ की आय 5000 करोड़ के ऊपर जाती है। 

आप लोगों ने घटिया राजनीती करके और अपने मठों में काले कारनामे करके जो रूपया उड़ाया है उससे तो अब श्रद्धा ही ख़त्म हो गयी अपनी दुकानदारी बंद होते देख कैसे आप बिलबिला गए है। आपमे तो रामदेव वाला "हूनर" भी नहीं है कि धर्म की आड़ में दवा बेच दें या काले पीले धन की दलाली करें

सही साईबाबा भगवान् नहीं है पर आप एक बार उनके जैसा फकीरी जीवन जीकर तो दिखाओ कसम से हम सारे देश के लोग आपका भी मंदिर बना देंगे

और आप ही क्यों ये जलन तो दूसरे मुल्ला और तमाम पिताओं और माताओं (Fathers/ Mothers/Brothers of Churches) को भी होती है जो मस्जिदों, चर्च में बैठकर अपने अपने राम गुनते रहते है।

सही है अब आप लोग चूक गए हो गुरु तो बुढापे में धन और सोने की चिंता सता रही है। धन्य हो हिन्दू धर्म के सबसे बड़े गुरुवर !!!


आईये थोड़ा और गहराई में जाए, जैसे सत्य साईं बाबा से लेकर इंदौर के नाना महाराज तरानेकर, गोंदवलेकर महाराज तक इंसान थे और अब देवता बन गए है, क्योकि उनके पुन्य कर्म ऐसे थे कि वे आम लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय रहे, महाराष्ट्र से लेकर अन्य राज्यों में सूफी परम्परा और भक्तिकालीन कवियों को यथा तुकाराम, ज्ञानदेव. रुकमाबाई, तिरुवल्लूर, आदि संतों को लोगों ने संत का दर्जा दिया, मदर टेरेसा को तो बाकायदा पॉप जान पाल ने संत घोषित किया जो हमने सामने देखा है . इनके सार्थक काम ही थे जो आम और दबे-कुचले लोगों को इन महान लोगों ने समाज में इज्जत दी और इन्हें कुछ करने के लिए मानवीय गरिमा देकर प्रेरित किया. आने वाले समय में श्री श्री रविशंकर से लेकर हमारे मालवे के पंडित कमल किशोर नागर जी भी भगवान् होने वाले है क्योकि मंदिर तैयार है और बाकी सब व्यवास्था भी है तो आप क्या कहेंगे शंकराचार्य ?

एक बार पुरी ईमानदारी से आप चारों शंकराचार्य मिलकर बैठे और और विचारे कि आपके मठों में क्या हुआ, आपने क्या जन कल्याण किया, कितने स्कूल खोले या कितने आदिवासी बच्चों का सेबड़ा पोछा या किसी गरीब को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध करवाई फिर आप हमें सिखाएं कि कौन भगवान है और कौन नहीं. पर सबसे बड़ा सवाल है कि आप सब शंकराचार्य एक साथ बैठ पायेंगे............और अभी सिंहस्थ आ रहा है देखते है कि आप लोग कितना जन कल्याण करते है या सिर्फ अपने अखाड़ों में दंड पलते रहेंगे और प्रशासन के लिए रोज़ नया सर दर्द पैदा करेंगे ?

यही हालत चर्च की भी है और यही मस्जिदों की भी, ये सब धर्म गुरु कभी एक नहीं होते और हमेशा रूपये के मक्कड़ जाल में फंसे रहते है और नित नए फतवे जारी किया करते है जिससे आम लोगों को सिवाय तकलीफ के कुछ नहीं होता, क्योकि आम आदमी ना हिन्दू है ना मुस्लिम या कैथोलिक वो तो जैसे तैसे इस महंगाई के जमाने में अपने जीवन की गाडी हाँक रहा है बस !!! हाल ही में स्वर्ण मंदिर में अकालियों के दो गुटों में दिन दहाड़े शस्त्रों से होती लड़ाई का आँखों देखा हाल टीवी पर देखा ही था, जैनियों में श्वेताम्बर और दिगम्बरों की खूनी होली मैंने मक्सी में देखी है, कहाँ तक बात करूँ बस आप अपने दिन निकालिए और प्रभु से प्रार्थना करिए कि आपको शांति मिले और सबका कल्याण हो.

Monday, June 9, 2014

शौचालय सिर्फ शौचालय नहीं है.




भारत  में आजकल साठ प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती है, तेजी से होते शहरीकरण ने काफी तादाद में लोगों को शहरों की  ओर पलायन करने को मजबूर कर दिया है. इसलिए यह आंकड़ा साठ प्रतिशत हो गया है. गाँव में शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी और बिजली के साथ शौचालय की समस्या अब नई समस्याओं में शुमार हो गयी है, कारण स्पष्ट है कि अब तेजी से सिमटते जा रहे गाँवों में खुली जगह बची नहीं है. हालांकि यह बहस भी नई है कि बलात्कार और छेड़छाड़ का मूल कारण शौचालयों का ना होना है परन्तु शौचालयों का ना होना और जागृति ना होना इस  मुद्दे को इस तरह से राजनैतिक रूप देकर संकुचित कर देना शौचालयों की आवश्यकता को गौण कर देगा. 

घरों  में शौचालय होना वास्तव में एक स्वच्छता का प्रतीक ही नहीं वरन मानवीय आदतों में गरिमा के साथ शुमार एक महती आवश्यकता भी है. हाल ही में सरकार ने समग्र स्वच्छता अभियान में शौचालय निर्माण हेतु दी जाने वाली राशि में भरी बढ़ौत्री की है, इसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार क़ानून के साथ जोड़ते हुए अनुदान की राशि साढ़े नौ हजार कर दी है जिसमे हितग्राही को मात्र पांच  सौ रूपये नगद या मानव श्रम के रूप में देने होते है, गाँवों में शत प्रतिशत शौचालय बनाने और इस्तेमाल होने पर प्रतिवर्ष महामहिम राष्ट्रपति द्वारा उस ग्राम पचायत को निर्मल ग्राम पंचायत से पुरुस्कृत भी किया जाता है. 

अब  समय आ गया है कि शौचालयों को छोटी और अर्थहीन बहसों से निकलकर एक जन जागृति और निर्माण के लिए अभियान के रूप में फैलाया जाए और हर घर में - शहर या गाँव में, बस्ती में या शहरी झुग्गी में शौचालय के निर्माण और उपयोग पर जोर दिया जाए. यह सिर्फ एक सस्त्राब्दी गोल बनकर ना रह जाए, इस हेतु ठोस और सार्थक पहल की जाना चाहिए, भारत में बिदेश्वरी पाठक ने सुलभ शौचालयों की श्रृंखला बनाकर यह साबित किया है कि मुश्किल कुछ नहीं है बशर्ते लगन, प्रतिबद्धता और समयबद्ध नियोजन हो.