Friday, March 28, 2014

प्रश्न, चुनौती और यथार्थ- सन्दर्भ युवा कविता






संदीप नाईक, सी 55, कालानी बाग़, देवास, मप्र, 455001.

प्रश्न, चुनौती और यथार्थ- सन्दर्भ युवा कविता

साहित्य, कलाएं और अनुशासन संभवतः मनुष्यता के अंतिम हथियार होंगे जिससे एक सभ्य समाज में लड़ाई की गूंजाईश मूल्य और सिद्धांतों को ज़िंदा रखने के लिए रखी जा सकेगी. यह महज एक दृश्य के बिम्ब नहीं, किसी दस्तावेज का हिस्सा नहीं वरन हमारे समय के जीवंत प्रश्न है जिनसे हम रोज दो चार हो रहे है. साहित्य और कलाएं आज जब उथल-पुथल भरे समाज में एक बदलाव की भूमिका से बहुत दूर है, ऐसे में यह कल्पना एक सिर्फ गल्प के रूप में ही सामने आती है कि साहित्य के भीतर भी खेमे है और ये खेमे विधागत होकर बांटने का कार्य कर रहे है. कविता, कहानी, गद्य, निबंध, आलोचना, यात्रा वृत्तांत और ना जाने कौन -कौन से हिस्सों में बंटा, चेतना के धरातल को छूता हुआ साहित्य सिर्फ आज ही नहीं वरन हमेशा से अपने आप से जूझते हुए प्रश्न, यथार्थ और चुनौतियों से लड़ता आया है. हिन्दी कविता का विकास अपने आप में एक वृहद् विषय है जिस पर लाखों शोध हो चुके है और करोडो अक्षर कागज पर उकेरे जा चुके है परन्तु क्या ठीक ठाक ढंग से हिन्दी कविता के प्रश्न सामने आये है, खासकरके युवा कविता के. हर तरह की कविता को हमारे यहाँ देखा, पढ़ा, गुना और सुना गया है, यह सचमुच सराहनीय है परन्तु इसके साथ ही सवाल भी उठाये गए है इसके होने, संरचना, शिल्प और अंत में प्रक्रिया के साथ कविता के यथार्थ पर.

एक अच्छी कविता लिखने की चुनौती ना मात्र एक युवा कवि के सामने है बल्कि आज मुक्तिबोध, नागार्जुन या निराला भी होते तो उनके सामने भी होती. हम देखते है कि हिन्दी कविता में धाराएं बहुत है और हरेक धारा की अपनी एक दिशा, खेवनहार और अनुयायी है जो पुरे बेड़े को सर पर उठाकर या यूँ कहूं कि लादकर चलते है बावजूद इसके कि हम सब जानते है कि लम्बी दूरी तय करना है तो सर पर कम वजन उठाकर चलना चाहिए. आज के माहौल में हिन्दी कविता लिखी जा रही है बल्कि पहले की तुलना में ज्यादा लिखी जा रही है. हिन्दी पत्रिकाओं के बहुतायत में प्रकाशन से, सोशल मीडिया या फेसबुक जैसे माध्यमों ने हरेक को जहां यह अवसर उपलब्ध कराया है वही ब्लॉग जैसे माध्यमों ने थोड़े परिपक्व कवियों को अपनी पुरानी रचनाओं से भी पाठकों को रूबरू कराने का अवसर दिया है. अखबारों के वेब संस्करणों ने जहां रचनाकारों के लिए पर्याप्त स्पेस उपलब्ध कराया है वही मोबाईल पर वाट्स एप जैसे माध्यम ने भी रचानाकारों को या यूँ कहूं कि एक आम आदमी को भी साहित्य के साथ जुड़ना सिखाया है. यह एक तरह से सार्थक है पर इस सबके बीच कविता कही खो गयी है हालांकि यह कहना भी अतिश्योक्ति होगा कि यहाँ इस सबमे कविता नहीं है. जिस माध्यम पर लाखों की संख्या में रोज कवितायें, तुकबंदी और शेरो शायरी अपलोड की जाती है वहाँ मुश्किल से दो चार ढंग की रचनाएँ पठनीय बन पाती है. पर लाईक और कमेन्ट के इस माया जाल में फंसे हमारे कवि और हमारी रचनाएँ इस सबके बीच अपनी अस्मिता और स्वीकृति के लिए बेचैन होती जाती है. दिक्कत यह भी है कि मै भी खुद भी पहले और सीधे सीधे लेपटोप पर लिखे ड्राफ्ट को दोबारा पढ़ने को तैयार नहीं हूँ, और पोस्ट करने की जल्दी है - पता नहीं कहाँ जाना है और जाकर भी क्या प्राप्त कर लूंगा, जैसे प्रश्नो से बहुत दूर हूँ, बस लालच है कि उसकी पोस्ट से पहले मेरी पोस्ट लग जाए और फिर शुरू करता हूँ चिरौरी करने का घटिया काम. ना हम दूसरी बार अपनी ही कविता को पढ़ने को तैयार है, ना उस पर बैठकर संजीदगी से काम करने को तैयार है ऐसे में कैसे प्रश्न उठाएंगे या चुनौती को देख पायेंगे. अतिआत्म मुग्ध होकर हम सब मिलकर कविता की सामूहिक ह्त्या कर रहे है यह कहना गलत नहीं होगा.

दूसरा हिन्दी कविता में हमारी आज की बहस में वाद ज्यादा हावी है अपने अपने खेमों और विचारधाराओं से लैस हम लोग बहुत सॉलिड पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हम शब्दों को पकड़-पकड़ कर एक फार्मूलाबद्ध कविता लिखने का अनुष्ठान कर रहे है इस सबके बीच युवाओं के साथ हमारी वरिष्ठ पीढी टकरा रही है जो एक सिरे से इस अतुकांत और गद्यनुमा होती जा रही कविता को सिरे से नकारती है और हर बहस का अंत छंद और अतुकांत के वर्तमान और भविष्य पर आकर ख़त्म हो जाता है. ऐसे संवाद प्रायः बहुत ही कलुषित माहौल में ख़त्म होते है जो मतभेद के बजाय मनभेद को बढ़ावा देते है जिससे युवाओं और अनुभव की कविता के बीच खाई इतनी बढ़ गयी है कि युवा कविता के तथाकथित तेजस्वी स्वर इस पुरी हिन्दी की कविता को बहुत ही गलीज दृष्टि से देखते है चाहे वो कुकुरमुत्ता हो या राम की शक्ति पूजा और यह भले ही ऊपर से उथला लगे पर हिन्दी कविता का अंततः नुकसान ही करता है. जरुरत इस बात कि भी है कि शालाओं या विश्वविद्यालयों में पढाई जा रही कविता को एक बार फिर से देखा जाए कि क्या कही किसी “बेलेंस” की भी जरुरत है, जो यह खाई बढाने के बजाय पाटने का काम करें.

तीसरी महत्वपूर्ण बात मुझे लगती है जो कि यहाँ कहना मुझे जरुरी लगता है कि सन सत्तर के बाद देश में जो भी साहित्यिक या सामाजिक बदलाव हुए है उसमे पांच व्यक्तियों का बड़ा योगदान है- कार्ल मार्क्स, चेग्वारा, डा आम्बेडकर, महात्मा गांधी और जयप्रकाश. ये वो पांच लोग थे जिनकी विचारधारा ने सामाजिक बदलाव के साथ साहित्य की भी दिशा बदली है. दिल्ली के जेएनयु से लेकर तमाम तरह की संस्थाओं से निकलकर जो लोग क्रान्ति का बीड़ा उठाए गाँवों खेत और जंगलों की ओर चले गए और जमीनी लड़ाईयां लड़ी और जिस तरह से उन्होंने ठीक-ठीक तो नहीं, पर लगभग रूस की तरह से साहित्य को या कविता को बदलाव का हथियार मानकर काम किया वो भी एक प्रश्न तो है. गोरख पाण्डेय, वरवर राव, पाश या दुष्यंत के यहाँ कविता की एक स्पष्ट दिशा दिखती है और अपने मकसद को भी वो प्राप्त करती है परन्तु बाद की कविता खासकरके सन 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद हिन्दी की कविता में एक फार्मूले का इजाद होना एक बड़ी घटना थी और दलित, साम्प्रदायिकता, महिला, शोषण, आदिवासी और ऐसे तमाम तरह के जुमलों से कविता का एक पैटर्न उभरा और एक ढांचा तैयार हुआ. इस ढाँचे में जो अपने को फिट कर गया वो नामी-गिरामी कवि हो गया और कालान्तर में स्थापित कवि जिसके खाते में पुरस्कार और दर्जनों उपलब्धियां भी दर्ज थी परन्तु कविता ना अपना असर छोड़ पाई ना इतिहास में दर्ज हो पायी और यही वह महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसे मै यहाँ रेखांकित करना चाहता हूँ कि क्यों हमारे यहाँ युवा की कविता ने मुक्तिबोध, निराला या नागार्जुन सा असर नहीं छोड़ा बल्कि बेहद क्षणिक रूप से भारत भूषण पुरस्कार मिलने के बाद या तो कवि ख़त्म हो गए या कविता दफ़न हो गयी और बच गया तो एक ढांचा या फ्रेम जिसमे आप कुछ भी भरकर डाल दें एक कविता तो निकल ही आयेगी यकीन मानिए. मुझे बहुत स्पष्ट तौर पर लगता है कि इसमे गलती हमारे युवा कवि की नहीं है क्योकि उसके सामने ना मुक्तिबोध जैसा संघर्ष है ना उसके सामने नागार्जुन जैसा यायावारी करने का माद्दा तो जाहिर है ना निराला जैसा बार-बार काम करने का जज्बा कि अपने लिखे को काटकर फिर से बार बार लिखे. एक छदम विमर्श के तहत यह सब निकलना ही था. और दुर्भाग्य से इस सबमे हमने और हमारी कविता ने बहुत अच्छे और संवेदनशील युवा कवियों को कविता से दूर कर दिया मै खुद  ऐसे दर्जनों नाम गिना सकता हूँ जिन्होंने अच्छी कविता लिखी थी सन 90  से 95 और 95-2000 के समय में पर आज उन्हें कहा जाए कि क्या लिखा है, पढ़ा है इन दिनों, तो वे कहते है छोडो ना भाई साहब कुछ और बात करते है - यह शायद दुखद स्थिति है. हम अपनी कविता को केदार नाथ सिंह और रघुवीर सहाय के पास ले जाकर सहज कविता तो लिख सकते है परन्तु मुक्तिबोध, निराला, विनोद कुमार शुक्ल या बाबा नागार्जुन के पास जाना हो तो बहुत श्रम साध्य प्रक्रिया है जिससे हमारी युवा कविता बच रही है इसलिए ना नए शब्द गढ़े जा रहे है, ना बिम्ब, ना नई भाषा रची जा रही है बची-खुची कसर इंटरनेट ने पुरी कर दी है जहां शब्दों के बेहरतरीन विकल्प बहुत कम मेहनत और निशुल्क उपलब्ध है. इस सबके बीच लाल्टू जैसे कवि भी है जिन्होंने नया मुहावरा गढ़ने की कोशिश की और नया सच में रचा पर साहित्य में उन्हें स्वीकृति लेने के लिए अभी कितना और काम करना होगा यह भी विचारणीय प्रश्न है. मै लगातार देख रहा हूँ कि एक पैटर्न बन गया है और एक तयशुदा भाषा में लगातार एक तरह का दोहराव कविता में मौजूद है. कवियों के लगातार संग्रह आ रहे है परन्तु वहाँ एक से दूसरे संग्रह में विकास के बजाय ठहराव दिखाई देता है जबकि रघुवीर सहाय का दसवा संग्रह आता है तो वह बिलकुल नौं संग्रहों से जुदा है और उसमे एक पेराडाईम शिफ्ट दिखाई देता है जो आज के हमारे युवा कवियों में गायब है. बल्कि हमारे वरिष्ठ कवियों के संग्रह भी चयनित, संकलित, प्रतिनिधि या दशक की चुनिन्दा कविताओं के नाम पर एक तरह का दोहराव लिए ही छप रहे है जिसमे कविता नहीं बल्कि एक रिपीटेशन है.

दरअसल में लड़ाईयां ख़त्म हो गयी है और कहा जा रहा है कि विचारधारा का अंत हो गया है परन्तु अभी लड़ाईयां लड़ी जानी बाकी है एक ऐसे समय में जब पूरा देश एक तरह की मानसिक गुलामी और एक छदम विकास के गहरे कूएँ में धकेला जा रहा है जहां जाना अपने आपको सिर्फ और सिर्फ ख़त्म करना होगा, यहाँ हिन्दी युवा कविता के प्रश्न और तीखे और तीक्ष्ण भी होने चाहिए क्योकि कविता ही है जो अंततः हमें बचायेगी और हमें यथार्थ और चुनौतियों से मुक्ति दिलायेगी और निश्चित ही प्रश्न  उठाना पड़ेंगे हम सबको और खोजना होंगे उत्तर भी ऐसे कि उन उत्तरों पर फिर से सदियों तक याद रखे जाने वाले प्रश्न उठाये जा सके बारम्बार. ऐसे मुश्किल समय में दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों से अपनी बात ख़त्म करूंगा कि;-

हम पराजित है मगर लज्जित नहीं
हमें अपने पर नहीं उनपर गुस्सा आता है
जिन्होंने हमें अँधेरे कूओं में धकेल कर कहा कि
लो तुम्हे आजाद करते है
आओ सब अँधेरे में सिमट आओ
आओ और करीब आओ,
हम यहाँ से रोशनी की राह खोजेंगे.

(चौधरी चरण सिंह विवि, मेरठ के हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिनांक 30 मार्च 2014 को "प्रश्न, चुनौती और यथार्थ- सन्दर्भ युवा कविता" विषय पर पढ़ा गया पर्चा) 






Wednesday, March 26, 2014

बाजार से गायब है कुंदन सेठ




आज शायद कोई जानता भी ना हो
तुम्हारी दूकान को या कि उस कोने को
जिस मीरा बावडी के किनारे
चिमनाबाई कन्या शाला के बाहर एक खोमचे में
लगती थी अदभुत चीजों की दूकान
जिसमे कभी टोटा नहीं पडा उन चीजों का
जो किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखते हम
जैसो के लिए किसी वरदान से कम नहीं थी
इमली की चटनी, खट्टे बैर, अमचूर की चटनी, करौंदे
ढेर सारे कबीट, पेमली बोर, मांडव की इमली भी दिख जाती थी
कभी कभी उस दूकान में अनेक अचारों के साथ,
उस चौराहे से गुजरते हुए खटास की महक
और खिलखिलाती हंसी अक्सर एक दूसरे के पूरक लगते थे
तीन पैसों से जेब में चार अठन्नी होना
दुनिया के किसी अम्बानी से कम ना होता था
दस पैसे के एक कबीट से लड़कियाँ पटा लेने का हूनर
हमसे भला कौन अच्छा जानता था
कब बड़े हो गए और कहाँ खो गयी खटास जीवन की
जो मिठास घोल देती थी रंगीन सपनों में भी
एक दिन दूकान बंद हो गयी खो गया कुंदन सेठ
मोहल्ले के लोगों ने बताया कि पाकिस्तान चला गया था
कभी पूछ ना पाए उससे कि कुंदन सेठ कहाँ और क्यों जा रहे हो
अब नहीं दिखते कबीट, करौंदे, चारोली, इमली, बैर, याकि मांडव की इमली
लड़की पटाने के लिए अब बाजार में साधन बहुत आ गए है
जेब भी इधर भरी रहती है रूपयों से और उंगलिया
शातिरी से घूम जाती है फटाक से मोबाईल पर
महंगे चमकदार चश्मे से हरी दिखती है सब ओर की घास
पैदल चले हुए सालों हो गए और
भाषा की बाजीगरी के भी सिद्धहस्त खिलाड़ी हो गए हम  
पर कहाँ खो गयी है खटास, वो कबीट, वो लड़कियाँ
कहाँ हो कुंदन सेठ

जीवन की मिठास गायब है तुम्हारी दूकान की तरह 

"मार्च सा जीवन "




रोज सोचता हूँ कि बस आज से 
कुछ करूंगा ऐसा कुछ कि 
जीवन जीवन सा लगे 
अपने आप को ही खुश कर पाऊं 
थोड़ा सा जी सकूं अपने लिए ही 
पर जब बैठ जाता हूँ तो याद आता है कि 
गैस का नंबर लगाना है 
टेलीफोन का इधर बिल आया पडा है
पासपोर्ट दिया था नवीनीकरण के लिए 
थाने से आगे कोई कार्यवाही हुई नहीं
बिजली का बिल भी फिर से बनवाना पडेगा 
गुम गया था उस दिन हाट-बाजार में 
तेल के भाव कम है तो दो पीपे लेकर पटक दूं 
गेंहूं आ गया है कही साफ़ सुथरे देखकर भर दूं 
नगर निगम में टैक्स भी जमा करना है 
जलकर और पानी का रूपया जमा भी करना है
ओह आरटीओ में अपने लायसेंस को भी देना था 
जब उठाता हूँ फोन तो याद आता है कि 
इसका भी सॉफ्ट वेयर अपडेट करना है स्क्रीन में दिक्कत है 
उधर फोन आता है कि फ़ार्म 16 को दिए बिना 
सीए कुछ भी नहीं कर पायेगा रिटर्न में 
गाडी में प्लग खराब है जब तक बदलूंगा नहीं 
चलेगी नहीं और कैसे ढोएगी मुझे 
अटका पडा था एटीएम का नंबर तो बैंक का तगादा 
लगता है मै गलत बैठ गया  
यह समय बैठने का नहीं खड़े होकर 
अपने बीपी को नार्मल रखकर 
घर से दो ग्लास ठंडा पानी पीकर 
और मिजाज सहज रखकर 
एक मुस्कराहट ओढ़कर बाहर निकलता हूँ
और मुल्तवी कर देता हूँ एक बार जीवन जीने को 
बन जाता हूँ हिस्सा इस मशीन का
फिर कभी जीवन की बातें आज तो 
बीत रहा है जीवन किसी मार्च सा. 

Tuesday, March 18, 2014

क्यों बुद्ध हो गए





गौतम - क्यों बुद्ध हो गए थे तुम ? यह अब सिर्फ सवाल ही नहीं मेरे लिए एक यक्ष प्रश्न है। क्या था निर्वाण, क्या था बोधिसत्व और क्या था बुद्धत्व , यह बुझने के लिए कितने जन्म लेकर तन मन की व्याधियों से जूझना होगा। नहीं जानता पर लग रहा है कि सब पीछे छुट रहा है और इस अथक यात्रा में अब कोई मकाम नजर नहीं आता भंते।

विराम  ही प्रस्थान है और एकालाप ही प्रलाप, अपने आप से नित्य, हर पल का संत्रास ! क्या यही सब भुगता था तुमने भी ??? क्यों एक मृत्यु, एक जरावस्था देखकर त्याज्य हो गए? संसार को तुमने नहीं छोड़ा, संसार ने तुम्हे रीता हुआ, अवसाद से परिपूर्ण जानकार छोड़ दिया और जंगल की वह राह पकड़ा दी जो कभी फिर शुद्धोदन, आनंद, भद्रशीला, आम्रपाली याकि अंगुलीमाल तक भी नहीं आती थी।

तथागत  मौन रहकर भाषा देने का गुण तो अप्रतिम था, पर क्या कर पायें अपने से भी संवाद कभी? क्यों विपश्यना का रास्ता स्वीकार कर हर बार मौन हो जाते थे? कितना लड़े हो अपने आपसे एक बार कह कर जाते......



Tuesday, March 11, 2014

दीवार में दिल की बात



नीचे धरती थी, ऊपर आसमान, आसपास दीवारें - आखिर जाते कहाँ हम ?

थोड़ा  और फैलता हूँ तो पाता हूँ कि दीवार से ज्यादा सट गया और फिर धीमे से एक दीवार मेरे अन्दर उग आती है और चलना शुरू करती है -उन जगहों पर, जहां अँधेरे कमरे अपनी तमाम रोशनियों के बावजूद किसी कोने में धंसी एक छोटी सी खिडकी के एक पल्ले के खुलने का इंतज़ार मानो सदियों से कर रहे हो.

पानी  की सतह जब दूर तक फैलती तो अक्सर बिम्बों में दीवारें नजर आती और हर दीवार में पानी की परछाईयाँ डूबती सी लगती मानो किसी ने ख्वाब तैरा दिए हो - एकदम साबुत और ज़िंदा ख्वाब.

खिड़की  की परत में झीना आवरण था जो सब कुछ ढक लेता तो लगता मानो सब कुछ खिड़की ओट से दीवार में धंस गया.

यह  दीवारें ही थी जिन्होंने जीना सिखाया, जिन्होंने दायरे में बांधकर जीवन में सुख-दुःख और फासलों का मतलब सीखाया, आज दीवारें अपने अन्दर तक महसूस होती है मानो किसी ने आसमान से धरती की एक बड़ी दीवार ढककर साँसों की डोरी को आहिस्ते से एक कनवास की भाँती रंग-बिरंगे रंगों में रंग दिया है, और अब इस बेदम पड़े शरीर में पोर-पोर तक दीवारें मेरे अन्दर उतरती जा रही है, एक मजबूत बंधन की तरह - ठीक ऐसा, जैसा तुमने कभी किसी सूने मंदिर में घंटियों के अनहद नाद की उपस्थिति में एक रक्षा सूत्र मेरे बाई कलाई पर बाँध दिया था और जब मैंने पूछा था तो सिर्फ यही जवाब व्योम में गूँज गया था कि दीवारें दायी ओर से हमारे भीतर सरकती है - सर्र सर्र सर्र...........

मै  चलता तो दीवार ठहर जाती और मै रुकता तो दीवार चल देती यह रुकने चलने का क्रम सदियों से मेरे, उसके और हम सबके साथ चल रहा है और इस बीच ऊँची होती गयी है दीवारें! एक दिन मै दीवार बन जाउंगा और फिर सब ठहर जाएगा और धीमे से दीवार होती जिन्दगी खोखली होती जायेगी, जब एक छोटी सी दीमक इसके उस हिस्से पर पहुंचकर हावी हो जायेगी जिसे प्यार कहते है.

इन  दीवारों के बीच और साथ चलते जीवन कब ख़त्म हो गया पता ही नहीं चला। गारे सीमेंट और रेत के बीच पानी जैसे उड़ जाता है कडा आवरण बनाकर वैसे ही खुशियाँ उड़ गयी है दीवारों के बीच बनते जीवन से.

एक  सुबह थी, एक आसमान था और दिनभर हवा बहती और यादें इसमे से गुजर जाती. रह जाता तो सपाट बियाबान सा सब कुछ, और हम कुछ नहीं कर पाते, देर तक यहाँ-वहाँ दौड़ते और फिर थक हार कर बैठ जाते कि अब हवा चलेगी तो जमके पकड़ लेंगे- इन यादों के कारवां को और बीन लेंगे अपने लोग उसमे से और सहेज लेंगे, हमेशा के लिए छाती से चिपकाकर रख लेंगे, और फिर कभी नहीं छोड़ेंगे, अबकी बार आटे की लुगदी ऐसी शिजायेंगे कि पकड़ ढीली ना पड़े, खूब खदबदायेंगे चूल्हे की आंच पर और पानी भी सारा उड़ा देंगे पतीली से, या शायद देगची ही बदल दें ताकि लुगदी पक्की और मजबूत बनें. पर हर बार की तरह आसमान और धरती के बीच से हवा सर्र से निकल जाती और हम दीवारों के सहारे ही चलते चलते ऐसी जगह पहुँच जाते जहां धरती के कोने अक्सर ख़त्म हो जाते है और आसमान की छाँह भी.

Friday, March 7, 2014

अविनाश मिश्र की कविताएं






सफदर हाशमी से निर्मल वर्मा में तब्दील होते हुए

मैं थक गया हूं यह नाटक करते-करते
रवींद्र भवन से लेकर भारत भवन तक
एक भीड़ के सम्मुख ‘आत्म सत्य’ प्रस्तुत करते-करते
मैं अब सचमुच बहुत ऊब गया हूं
इस निर्मम, निष्ठुर और अमानवीय संसार में...

मैं मुक्तिबोध या गोरख पांडेय नहीं हूं
मैं तो श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ का वह बच्चा भी नहीं हूं
जो एक अय्यास सामंत की जागीर पर
एक पत्थर फेंककर भागता है
मैं ‘हल्ला बोल’ का ‘ह’ तक नहीं हूं
मैं वह किरदार तक नहीं हूं
जो नुक्कड़ साफ करता है ताकि नाटक हो
मैं उस कोरस का सबसे मद्धिम स्वर तक नहीं हूं
जो ‘तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर...’ गाता है

मैं कुछ नहीं बस एक संतुलन भर हूं
विक्षिप्तताओं और आत्महत्याओं के बीच

मैं जो सांस ले रहा हूं वह एक औसत यथार्थ की आदी है
इस सांस का क्या करूं मैं
यह जहां होती है वहां वारदातें टल जाती हैं

मैं अपने गंतव्यों तक संगीत सुनते हुए जाता हूं
टकराहटें दरकिनार करते हुए...
मुझे कोई मतलब नहीं-
धरना...विरोध...प्रदर्शन...अनशन...बंद... वगैरह से

मैंने बहुत नजदीक से नहीं देखा कभी बर्बरता को
मैंने इसे जाना है तरंगों के माध्यम से


शहर भर में फैली बीमारियां फटक नहीं पातीं मेरे आस-पास
मेरे नौकर मेरे साथ वफादार हैं
और अब तक बचा हुआ है मेरा गला धारदार औजारों से

मैं कभी शामिल नहीं रहा सरकारी मुआवजा लेने वालों में
शराब पीकर भी मैं कभी गंदगी में नहीं गिरा
और शायद मेरी लाश का पोस्टमार्टम नहीं होगा
और न ही वह महरूम रहेगी कुछ अंतिम औपचारिकताओं से...

खराब खबरें बिगाड़ नहीं पातीं मेरे लजीज खाने का जायका
      
मैंने खिड़कियों से सटकर नरसंहार देखे हैं और पूर्ववत बना रहा हूं

...इस तरह जीवन कायरताओं से एक लंबा प्रलाप था
और मैं बच गया यथार्थ समय के ‘अंतिम अरण्य’ में
मुझे लगता है मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा
कि मैं स्वयं को एक प्रत्यक्षदर्शी की तरह अभिव्यक्त कर सकूं

लेकिन जो देखता हूं मैं आजकल नींद में--
सब कुछ एक भीड़ को दे देता हूं
अंत में केवल अवसाद बचता है मेरे शरीर पर
इस अवसाद के साथ मैं खुद को खत्म करने जा ही रहा होता हूं
कि बस तब ही... चाय आ जाती है
और साथ में आज का अखबार...

प्रतिभाएं अपनी ही आग में

कोई इलाहाबाद का था
यह उसके लिए बहुत था
कोई ‘सिंह’ था
यह उसकी सबसे बड़ी योग्यता थी
वह इसे नाम के आगे लगाए या न लगाए

सब इस तरह अपने-अपने
जनपदीय और जातीय वैभव में
बहुत और योग्य थे
        
जबकि बहुत सारे योग्य लोग
सिर्फ इस वजह मार दिए जाते थे
क्योंकि वे इनकार करते थे.

शादी के कार्ड

इस संसार में कई व्यक्तियों के जीवन में
केवल शादी के कार्ड ही अच्छे होते हैं
लेकिन वे भी वक्त की चोट से धीरे-धीरे
एक जर्जर और मटमैली सी चीज होते जाते हैं 

वे कहीं से भी आए हों
घर की एक उपेक्षित अलमारी में रख दिए जाते हैं
पूर्वजों के चित्रों, एलुमिनियम के बर्तनों, तुलसी के बीजों,
दीपकों, पंचांगों, पुस्तकों, पतंगों और लट्टुओं के साथ
उन्हें नष्ट करना अपशगुन समझा जाता है
जबकि इस कृत्य से बहुत बड़े-बड़े उजड़ने और उजाड़ने के खेल
शगुन बनकर चलन में उपस्थित रहते हैं
समय व समाज के अंतवंचित शुभाशुभ कार्यक्रमों में

समय समर में असंख्य शीर्षक एक संग परिणय में गुंथे हुए
श्री गणेशाय नम: और वक्रतुंड महाकाय... की अनिवार्यता में
बुजुर्ग दर्शनाभिलाषी और स्वागतोत्सुक बच्चे
प्रीतिभोज के स्वाद से जुड़ी हुईं वे मधुर और कड़वी स्मृतियां
और वह संगीत ‘तू हो तो बढ़ जाती है कीमत मौसम की...’
और इसका विस्तार ‘अरमां किसको जन्नत की रंगीं गलियों का...’

लेकिन यह रोमांटिसिज्म सब संसर्गों में संभव नहीं होता
जो अभी और भद्दी होंगी वे भद्दी लडकियां भी बड़ी आकर्षक लगती हैं
काली करतूतों वाले व्यसनी पुरुष चेहरे भी
मर्यादा पुरुषोत्तम से जान पड़ते हैं प्रथम भेंटों में...

लेकिन मेरे इस अद्भुत राष्ट्र में परंपरा है कि बस ठीक है
यहां असंख्य प्रसंगों और प्रचलनों में तर्क की गुंजाइश नहीं

विवाह को मार्क्स और एंगेल्स ने ‘संस्थाबद्ध वेश्यावृत्ति’ कहा है
लेकिन जैसाकि ज्ञात है भारतीय परिवेश में ही नहीं
अपितु अखिल विश्व में अब तक
इन दोनों महानुभावों का कहा हुआ काफी कुछ गलत सिद्ध हुआ है
वैसे ही यह घृणित कथन भी...

‘प्रेम काव्य है और विवाह साधारण गद्य’
ऐसा कहीं ओशो ने कहा है
लेकिन यह कथन स्वयं वैसे ही साधारण हो गया
जैसे एक भाषा की कुछ सामयिक लघु पत्रिकाओं में प्रकाशित काव्य...

फिलहाल तलाक तलाक तलाक और दहेज प्रताड़नाएं व हत्याएं
और कन्या भ्रूण हत्याएं और कई स्थानीयताओं और जातियों में
पुरुषों की तुलना में घटता महिला अनुपात 
 और घरेलू अत्याचार और स्वयंवरों का बाजार
और लिवइनरिलेशनशिप और समलैंगिकता और स्त्री-विमर्श और महंगाई 
और और भी कई सारी बुराइयों के बावजूद
‘शादी के कार्ड’ हैं कि आते ही जाते हैं बराबर और बदस्तूर
मेरे घर नई-नई जगहों पर मुझे न्योतते हुए.

(सभी कवितायें  "  एक जिद्दी धुन" "    ब्लॉग और अनुज अविनाश  मिश्र  से  अनुमति लेकर)