Tuesday, February 25, 2014

नई दिल्ली पुस्तक मेला 15-23 फरवरी 2014 - कुछ फूटकर नोट्स


और वापसी अपने घर को 
जो पुस्तक मेले में मिल लिए उन सभी का शुक्रिया और जो नहीं मिल पायें .... 

खुदा खैर करें .... वल्लाह!!!


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काशीनाथ सिंह के साथ 
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और  दिल्ली पुस्तक मेले को लेकर आख़िरी वाक्य 



वहाँ  बड़े बड़े उच्च कोटि के घटिया लोग देखे जो सब करते है. ये आत्म मुग्ध लोग जो आत्मघाती है कहेंगे कि हम प्रचार प्रसार से दूर है पर इतने षडयंत्र रचते है कि साथ वाले दोस्तों को या परिजनों को पता नहीं चलता, अपनी ही प्रशंसा में मर जाते है, सब प्रायोजना का खेल है साहब, धीमे से यहाँ-वहाँ चिरोरी करके सब कुछ छपवा देते है. चाहे तरुणाई हो या बुढापा, ये अकथ कहानी का ज़माना है और जो दिखता है वही बिकता है, की तर्ज पर रोज बाहें चढ़ाकर कुर्ता, झबला, सूट और टाई टांगकर अपने घटिया विचारों और चोरी का कॉपी पेस्ट मटेरियल को किताबनुमा बनाकर बेचने का हूनर रखते है. 

अब  नए छोरे छपाटे रुदन करते रहे और आप पोतते रहे अपनी कालिमा पर दाग दाग उजाले या प्रगतिशील जेंडरिया घूमती रहे नाखूनों से होठों पर लाली लपेटकर, छुपाती रहे बुढापा, पर सच तो सच है भैया कि ये पब्लिक है सब जानती है!

ये  दिल्ली है बाबू, जब इसने किसी को नहीं बख्शा तो साहित्य वो भी हिन्दी को क्या बख्शेगी ???


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सफ़र  में समय का पता नहीं चलता और सफ़र में आये गए का भी नहीं, जिनसे मिलना था उनसे मिले नहीं और जिनसे नहीं मिलना होता है वो सर पर चढ़कर बैठ जाते है. ऐसे में जीवन के वो बहुमूल्य क्षण गुज़र जाते है जिन्हें अपने साथ ही गुजारना थे, पर हम चाहकर भी कुछ कर नहीं पाते और मन मसोजकर रह जाते है.

उम्मींद   का दूसरा अंक अच्छा बन पडा है आने वाले समय में यह पत्रिका शोध और कहानी कविता के बीच अच्छा उदाहरण स्थापित करेगी. जिस तरह से आलेखों का चयन किया जा रहा है वह प्रशंसनीय है. कम समय में यह पत्रिका जिस तरह से हिन्दी लोक में सराही जा रही है उससे ज्ञात होता है कि लोग इसे पढ़ भी रहे है और गंभीरता से भी ले रहे है . सर्वेश नलिन और अवधेश जी के आलेख पठनीय है. महेश पुनेठा का फिल्मों पर जानकारी परक लेख है. कहानियां कवितायें सधी है और श्री प्रकाश जी की कवितायें अच्छी है. 

सम्पादक के साथ पुरी टीम बधाई की पात्र है.


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धुंध, धुंआ, और धुल ........क्या हो गया है इस बेईमान मौसम को

जब रेलगाड़ी अपने गंतव्य स्थल की ओर बढ़ते जाती है तो उसकी स्पीड बहुत ही धीमे पड़ जाती है और रास्ते में आने-जाने वाली हर रेलगाड़ी उसे पटखनी देते हुए आगे बढ़ जाती है. 

ठीक, ऐसे ही ज़िंदगी जब मंजिल की ओर बढ़ती है तो गति बहुत धीमे पड़ जाती है और हर कोई ऐरा गैरा, नथ्थू खैरा ज़िंदगी को पटखनी देते आगे चलता है. बस, अपने पीछे के डिब्बों का ध्यान रखें और चलते रहे कभी तो ट्रेक क्लियर होगा.
 

हिन्दी साहित्य में एंट्री लेनी है तो कुछ स्कैंडल लिखो, फिर सेटिंग करो , प्रकाशक बनो, फिर पुस्तक मेले में प्रवेश करो, फिर सबको गलियाते हुए अपने को ब्रहमा साबित करो, और फिर यह जताओ कि आपसे बड़ा व्यस्त कोई नहीं और फिर हर मंच पर घुसपैठ करो, वहाँ भी सनसनी और हंगामा करो, दो - चार युवा बेरोजगार हिन्दी प्रेमी अधकच्चे लेखको को अपना दास बनाकर उन्हें कम्युनिज्म सीखाओ, शोषण से लड़ना सीखाओ, उनके कंधे पर बन्दूक रखकर अपना धंधा और नाम चलाओ , दोस्तों को भूल जाओ अगर कोइ मिल भी जाए तो ऐसे सटक लो कि कौन जाने किस देस से आये है ससुरे, मुफ्त में तीस रूपये की पानी की बोतल गटक जायेंगे और जहां दिखे वही पर किताबें खरीदने का तगादा करते रहो और अपनी गरीबी का रोना प्रकाशक होने के नाते रोते रहो और कहो कि रूपया लेकर छापी मोटी हार्ड बाउंड की किताबें बिकवा दो,और अंत में जाते समय खूब गले लगाकर अपने चार टसुए बहाने की पुरी कोशिश करो, फिर देखो साला कौन माई का लाल आपको महान बनने से रोकता है ??? 

अब मै भी महान बनूँगा. 

(पुस्तक मेले से लौटकर आया ज्ञान)


देश की राजधानी में गधा खोजता रहा घोड़े को कि जंगल के जानवरों के बड़े जलसे में मिल जाए तो कम से कम एक दुलत्ती मार देता, गधा दूर तक खोजता रहा उस अंतर्राष्ट्रीय भिखारी घोड़े को जो दूसरों के टुकड़ों पर पलता आ रहा था. 

आज गधा उस घोड़े को इस बाजार में सबके सामने नंगा करना चाहता था पर फिर समझा कि वो कमबख्त किसी देश के राजदूत या देशभक्त के सामने बाप दादाओं के लिखे को अपने नाम का बताकर आईडिया बेच रहा होगा और किसी ब्यूरोक्रेट के तलवे चाट रहा होगा. 

फिर एक हंसी हंसकर गधा मेले में जंगल में घास चरने लगा.

सवाल सिर्फ प्राथमिकता का है बाकी सब तो बहाने है और फिर आखिर में यह कहना और सीखना चाहिए "जैसा तेरा गाना , वैसा मेरा बजाना"

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पुस्तक मेले में पाठक कम , प्रकाशक और घोषित लेखक और आनेवाले लेखक ज्यादा.


ममता कालिया और सुनील चतुर्वेदी 
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Photo: पुस्तक मेले में दूसरा दिन

लो दूसरा दिन और दोस्तों से मिलने और एकदम छपकर आई नई किताबों की सुवास

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लेखको प्रकाशकों के लिए पुस्तक मेला "आखातीज" है इस अवसर पर बगैर मुहूर्त देखे किताब लोकार्पित कर सकते है।

और आखिर दिल्ली , कितनी बदलती है हर बार , मित्रों का सुझाव है कि अब दिल्ली को महाराजधानी बनाकर देश की राजधानी बदल दो भोपाल या कही और पर अब दिल्ली और नहीं। बात सिर्फ मजाक की नहीं एकदम गंभीर है

कल से चार दिन के लिए पुस्तक मेला नई दिल्ली.

Sunday, February 16, 2014

कुछ घोड़े और कुछ खच्चर जो बनारस की ज़िंदा मछलियाँ खाते और मरी माँ से रूपया कमाते है


गधे को याद आ रहा था कि आखिर में घोड़ा निरुत्तर हो गया था जब गधा राजकाज छोड़ रहा था. घोड़े ने आख़िरी माह में सब छोड़ दिया था और अपना ध्यान कुछ लोमड़ियों और उल्लूओं पर लगाया था पर अंत में माया मिली ना राम के तर्ज पर घोड़ा हार गया. लोमड़ी ने भी अपना ध्यान गधे पर लगाया और दिल दे बैठी और घोड़ा मन मसोजकर रह गया. 



अब  वो जंगल की राजधानी में चला गया और वही से एक गैंडे को सांप और नेवलों के बीच भेज दिया. बस एक सियार नहीं निकाल पा रहा था जंगल से क्योकि यही वह हथियार था उसका जो जंगल के सारे लूले लंगडों और मक्कारों को गांजा भांग देकर हांकता था. सुना था जंगल में कोई मूर्खाधिपति अपनी माँ की याद में जानवरों के एन जी ओ को रूपया देने की महती कोशिश कर रहा था.


इन दिनों घोड़े को उस मालविका नामक नागिन की बहुत याद आती है जो एक और खच्चर से नैन मटक्का करती थी.



खच्चर  के पास यूँ तो पहले एक और टट्टू हुआ करता था जो उसे सबके बीच लोकप्रिय बनाता था उसे महान बनाने के लिए उस बेचारे ने क्या नहीं किया असम के बांसों भरे जंगल से निकलकर आया और एक खच्चर को लगभग जंगल में सबके बीच उंचा बनाया फिर गंगा घाट से एक सांप आया जो इस असमी टट्टू को पछाड़कर खच्चर का दाया बन बैठा और उसके लिए उसने गंगा से दो तीन मछलियों की जुगत की और इन मछलियों को चारा समझकर फेंका और टट्टू को जंगल से ही भगा दिया और एक मस्त मुखौटा पहनकर गंजडी सांप एकदम से घोड़ा बन गया. 



दुलत्ती  खा-खाकर सांप घोड़ा बना बैठा है और वह पुराना टट्टू आजकल देश की राजधानी में एक अमेरिकी संस्था से प्राप्त रूपयों की हवस वाली दूकान के मालिक के यहाँ नौकरी करता है जो पुरे देश को खरीदने का दिवास्वप्न देखता है और घटिया हरकतें करता है. 



खच्चर  को मालविका याद आती है और वह उसकी याद में आजकल देश भर प्रवचन देता है ताकि कही तो दिख जाए एक झलक उसकी.

Saturday, February 8, 2014

ड्यूटी पर शराब और कार्यवाही ना होना - सरकारी उदासीनता का नमूना


एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता प्रशिक्षण कार्यक्रम में मुझे बताया गया कि मप्र के अधिकाँश सरकारी अस्पतालों में जिसमे एमवाय, मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल, सामुदायिक केंद्र, प्राथमिक केंद्र और सब सेंटर भी शामिल है, में कार्यरत कई पुरुष कर्मचारी जिसमे वार्ड बॉय से लेकर बीएमओ साहेबान और मेडिकल ऑफिसर्स तक ड्यूटी के दौरान शराब में धुत्त रहते है और इस दौरान वे गाली गलौज और महिला कर्मचारियों से छेड़छाड करते रहते है. जब महिला कर्मचारी शिकायत करती है तो बीएमओं या सीएमएचओ अक्सर इन महिला कर्मचारियों को यह कहकर समझा देते है कि आपको क्या करना है, मै उसे समझा दूंगा, और फ़ालतू की नौटंकी क्यों कर रही हो, आदि- आदि. फलसवरूप कई बार ये ही कर्मचारी महिला मरीजों, उनके साथ आई बच्चियों या महिला स्वास्थ्य कर्मचारियों के साथ दुष्कर्म करते है. 

एक महिला  डाक्टर ने बताया कि कैसे उसने एक कर्मचारी को सुधारा और अब वो उसे माताजी कहता है, वो कर्मचारी अक्सर उनके कमरे के बाहर से निकलते हुए उन्हें घूरता था, फिर अपने मोबाईल में अक्सर ऐसे गाने बजाता था जैसे उन्हें प्रपोज कर रहा हो, अक्सर उनके कपड़ों पर भद्दे कमेन्ट करता था, या हाथ के इशारों से उन्हें छेड़ता था, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और सीधे शिकायत की बाद में उनकी शिकायत पर उस कर्मचारी का स्थानान्तरण हो गया पर राजनैतिक दबाव से वो वही आ गया और इन महिला डाक्टर के पांवों में गिरकर माफी माँगी और अब इन्हें माता जी कहता है. कानवड के वार्ड बॉय द्वारा मात्र ढाई बरस की बच्ची के साथ हुआ बलात्कार हम भूले नहीं है. और इस बात से हम सब वाकिफ है कि यह सब सच है पर किसी माई के लाल में दम है कि ड्यूटी के वक्त शराब पीते पाए जाने वाले कर्मचारी के खिलाफ सख्त कदम उठाये क्योकि ये कर्मचारी अक्सर वरदहस्त प्राप्त होते है और कई बार जिलाधिकारी भी इन्हें कुछ नहीं कर पाते. सीहोर में तत्कालीन जिलाधिकारी एक बीएमोओ के खिलाफ कुछ नहीं कर पाते थे क्योकि उनके तार सीधे भोपाल से जुड़े थे और वे एक प्रभावी मंत्री के क्षेत्र में सामुदायिक केंद्र के खुदा हुआ करते थे. ये डाक्साब यहाँ बरसों से जमे हुए है और ना खुद काम करते है ना किसी को करने देते है. और शिकायत करने पर भी इनका कुछ नहीं होता.

बातचीत से  यह निकला कि क्या एक शोध किया जाए कि कितने प्रतिशत कर्मचारी ऐसे होंगे, तो इन कार्यकर्ताओं ने कहा कि शोध की क्या जरुरत है लगभग साथ से सत्तर प्रतिशत कर्मचारी ड्यूटी के दौरान दिन में भी शराब के नशे में धुत्त रहते है विशेषकर वार्ड बॉय, स्वीपर और ड्रेसर और डाक्टर चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते क्योकि हरिजन एक्ट, हड़ताल और ना जाने कितने इन्हें डर सताते है. इसमे आदिवासे इलाकों में 'आशा' भी शामिल है जो दिन में शराब के नशे में धुत्त रहती है और किशोर वय की लड़कियों को, जो जांच कराने आती है अपने गाँव के प्रभावाशाले लोगों से सम्बन्ध बनाने के लिए दबाव डालती है. 

इस पांच  दिवसीय प्रशिक्षण ने स्वास्थ्य को लेकर और जमीनी हकीकतों को लेकर मेरे सारे पुर्जे खोल दिए और समझ नहीं आता कि पुरे कुएं में भांग है कहाँ से शुरू किया जाए तो कुछ सुधरे. मप्र में प्रमुख सचिव स्वास्थ्य कभी चौपाल लगाकर कुछ जमीनी महिला कार्यकर्ताओं की बात सुनेंगे या अंतर्राष्ट्रीय स्तर के लोग जो UNFPA, UNICEF, UNDP, DFID, FHI 360, MPTAST में बैठे है कुछ करेंगे इन मुद्दों को लेकर या यूँही आंकड़े बाजी करके अपना दायित्व निभाते रहेंगे?


बात सिर्फ स्वास्थ्य की नहीं है बल्कि शिक्षा और अन्य विभागों की भी है जहां अक्सर कर्मचारी शराब के नशे में धुत्त रहते है और काम नहीं करते और सारी जगह गन्दगी फैलाते रहते है. अब हमारी विधायिका में भी कई बार ऐसे किस्से सुनने को मिल जाते है तो इन कर्मचारियों से क्या अपेक्षा रखें. 

सत्यनारायण पटेल का नया कहानी संग्रह 'काफिर बिजूका उर्फ इब्लीस'




अनुज  सत्यनारायण का नया कहानी संग्रह इस पुस्तक मेले में आ रहा है आधार प्रकाशन से. इसकी भूमिका रोहिणी जी ने लिखी है. सत्यनारायण हमारे समय के ना मात्र कहानीकार वरन एक दृष्टा भी है जो गिद्ध की भाँती आनेवाले समय की पहचान करके हमें आगाह करते है और फिर अपने आसपास होनेवाली घटनाओं को आपस में जोड़कर एक तिलिस्म रचते है, यह कहानी संग्रह ऐसी ही कुछ कहानियों का दस्तावेज है जहां वे एक बार फिर से एक नए लोक , प्रतीक और बिम्बों के साथ उपस्थित है, वास्तव में यह नई सदी के शुरू होते दुखद प्रसंगों का जीवंत दस्तावेज भी है जो हमें अंत में एक राह भी दिखाता है और अपने आप को पुरी ईमानदारी से अपने अन्दर झांकने को भी मजबूर करता है. बहरहाल आप देखिये रोहिणी अग्रवाल क्या कहती है इस नए कथा संग्रह के बारे में. 

"लोक -स्मृति में रचे-बसे किस्से आज के उत्तारआधुनिक परिदृश्य में हवा हो गए हैं, जैसे इंसान को परिभाषित करने वाले मूल्य और संवेदनाएं। अपनी ही बेख्याली में खोई नई पीढ़ी नहीं जानती कि सांस्कृतिक चेतना की संवाहक लोक-कथाएं काल की सरहदों से मुक्त कर व्यक्ति के भीतर जीवन का स्पंदन, राग और लय भरती हैं। जानते हैं सत्यनारायण पटेल। इसलिए महानगरीय सभ्यता में आत्म-विस्मृति का जीवन जीते व्यक्ति को जब वे कहानी नहीं, किस्सा सुनाने लगते हैं, तब विज्ञान और तकनीक की भूलभुलैया में हड़बड़ाए 'मानुष' को अनायास अपनी कहन-शक्ति मेे बांध लेते हैं; और फिर सूखी जमीन पर भीतर-भीतर धंसते पानी की तरह उसकी अंतश्चेतना पर सवालिया निशान बना काबिज हो जाते हैं। धर्म, राजनीति तथा प्रशासन की शह पाकर उग्रतर होती अमानवीय व्यवस्थाएं मनुष्य पर थोपी गईं अनिवार्यताएं तब तक हैं जब तक उनका प्रतिकार करने के लिए वह अपनी अंतःशक्तियों को संगठित कर रचनात्मक रूप नहीं देता। 


सत्यनारायण  पटेल 'न्याय' के आमिर की आक्रोशमयी पीड़ा या 'काफिर बिजूका उर्फ इब्लीस' के बिजूका की स्वप्नशीलता को कोई निश्चित सिरा देने का दावा नहीं करते, लेकिन हौले से उनके परिपार्श्व में बंजारा बांध और घट्टी वाली माई की पुलिया बनाने में जुटी संकल्पदृढ़ता और आशावादिता को रख देते हैं। स्याह अंधेरों को अपने हौसलों के बूते चीर देने का विश्वास इस संग्रह की कहानियों की ताकत है जो सबसे पहले अपने भीतर पसरे अंधेरों को चीन्हने की तमीज देता है। शायद इसीलिए बिजूका की तरह अपने मानवीय वजूद का उपहास सहता आम आदमी उनकी कहानियों में क्रमशः निखरता हुआ व्यवस्था की कठमुल्ला ताकतों के लिए पहले काफिर बन जाता है और फिर इब्लीस।


सचमुच  अद्भुत किस्सागो हैं सत्यनारायण पटेल। भीतरी तड़प और प्रश्नाकुलता केा रोचकता का बाना पहना कर लेखक ने कहानी दर कहानी पाठक से अपने वक्त को नई आंख से देखने और नई तरकीब के साथ गढ़ने की अपील की है। भाषा का सृजनात्मक उपयोग और आडंबरहीन ईमानदार कहन-शैली कहानी को अर्थ-व्यंजक भी बनाती है और पाठक को लेखक का राज़दार भी। साझेपन की रचनात्मक आत्मीयता का विस्तार इस संग्रह की विशेषता है और वक्त की मांग भी". 


सत्यनारायण पटेल के कहानी संग्रह का मुख पृष्ठ एवं फ्लैप ।

प्रकाशक: आधार प्रकाशन

लोकार्पण: पुस्तक मेला दिल्ली

Sunday, February 2, 2014

उम्मीद की सटीक और सार्थक समीक्षा




सटीक और सार्थक समीक्षा साधुवाद भाई Mahesh Punetha 
युवा साहित्यकार जितेंद्र श्रीवास्तव के संपादन में निकला ‘उम्मीद’ का प्रवेशांक एक नई उम्मीद लेकर आया है। सामग्री की विविधता इसे पत्रिकाओं की भीड़ में एक अलग पहचान देती है। जैसा कि अपने संपादकीय में जितेन्द्र लिखते हैं कि उनकी आकांक्षा थी एक ऐसी पत्रिका निकाली जाए जो रचना ,आलोचना और शोध का मुकम्मल त्रैमासिक हो ,निश्चित रूप से यह अंक उनकी इस आकांक्षा का प्रतिबिंब है। उनकी कोशिश है कि सतही बहस में न पड़कर हिंदी के साहित्यिक और वैचारिक परिसर को विस्तार दिया जाय , इस अंक को देखकर कहा जा सकता है कि वह इस दिशा मंे एक सही शुरूआत करने में सफल रहे हैं। पत्रिका में शताब्दी,उम्मीद विशेष, आलेख,पाठ-विश्लेषण,शोध और समीक्षा जैसे स्तम्भों के साथ-साथ कहानी ,कविता ,उपन्यास अंश आदि विधाओं का समावेश किया गया है। 


आगामी अंकों में स्त्री,दलित व आदिवासी विमर्श पर विशेष सामग्री देने की योजना है। 172 पृष्ठों वाली इस पत्रिका की एक और विशेषता है कि रचना हो या आलोचना उसमें युवा स्वरों को विशेष स्थान दिया गया है। कविता में जहाँ मनोज कुमार झा ,अशोक कुमार पाण्डेय, बहादुर पटेल जैसे सशक्त युवा कवि हैं वहीं कहानी में संदीप नाईक और आलोचना में अरूण होता ,सुबोध शुक्ल ,जितेंद्र गुप्त व रवि रंजन कुमार जैसे चर्चित व समर्थ नाम जिनसे हिंदी साहित्य को काफी उम्मीद हैं। नंददुलारे वाजपेयी की पत्रकारिता और संपादन कला पर डा.आलोक गुप्त, कृष्णमूर्ति के शिक्षा दर्शन पर रघुवंशमणि तथा भूमंडलीकरण का परिप्रेक्ष्य और हिंदी उपन्यास पर दीपक प्रकाश त्यागी के आलेख भी उल्लेखनीय हैं। दिनेश श्रीनेत ने हिंदी सिनेमा के आगामी सौ वर्षों की दिशा का अच्छा आंकलन किया है। 

इसके आलावा भी प्रस्तुत अंक में बहुत कुछ पठनीय है जैसे समीक्षा खंड में वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना,अरूण कमल व चर्चित कवि उमेश चैहान के नए कविता संग्रहों पर क्रमशः त्र्यम्बक नाथ त्रिपाठी ,अमरेन्द्र पाण्डेय ,सुशील सिद्धार्थ की समीक्षाएं, शोध खंड में निवेदिता,शंभुनाथ मिश्र और गायत्री रमाशंकर मिश्रा के शोधपरक आलेख । अनामिका और अनूप कुमार की कविताएं , तेजेन्द्र शर्मा की कहानी ,शाहबुद्दीन ,बिपिन तिवारी ,पुष्पपाल सिंह ,बृजराज सिंह और चैनसिंह मीणा की समीक्षाएं ,सुखजीत की पंजाबी कहानी और ट्रंगट्रंग डिन्ह का वियतनामी उपन्यास अंश भी अंक को समृद्ध करते हैं।साक्षात्कार, यात्रा वृतांत ,संस्मरण आदि विघाओं को पत्रिका में शामिल किया जाता तो पत्रिका में जो थोड़ी बहुत कमी रह गई है वह भी पूरी हो जाती। 

कुल मिलाकर अंक काफी मेहनत और गहरी दृष्टि से तैयार किया गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे के अंकों में और अधिक बेहतर से बेहतर सामग्री पढ़ने को मिलेगी और ‘उम्मीद’ हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में अपना स्थान बनाने में सफल रहेगी।