Thursday, January 30, 2014

जनज्वार पर मेरा आलेख दिनांक 30 जनवरी 14...

जनज्वार पर मेरा आलेख आज दिनांक 30 जनवरी को....

http://www.janjwar.com/society/1-society/4751-kaise-bachega-desh-in-dhandhebajon-se-for-janjwar-by-sandeep-naik

बीमारू राज्यों का नाम लेकर धंधा करने वाले


भारत में कितने भारतवंशी लोग है जो दुनिया में अपने हूनर का डंका पीट रहे है ये बेचारे अपने जिले, गाँव और देश के बच्चों, महिलाओं और युवाओं के स्वर्णिम भविष्य के लिए काम करने वाली एनजीओ को रूपया देते है लाखों-करोड़ों में इस नेक नियति के साथ की सच में ये एनजीओ काम करेंगे और देश के लोगों को प्रगति के पथ पर ले जायेंगे. परन्तु उन्हें क्या मालूम कि ये एनजीओ उनसे मोटी रकम ऐंठकर अपनी जिन्दगी सुधार लेते है, जिन लोगों को कोई काम धाम नहीं मिलता वे करोड़ों रूपयों की एकड़ों जमीन खरीद कर अपने बुढापे का इंतजाम कर लेते है, इन भ्रष्ट और मक्कार लोगों का काम सिर्फ इन भारतवंशियों का सिर्फ भावनात्मक शोषण होता है पर जमीन पर काम ना ये कर पाते है ना कुछ करना चाहते है. 

सिर्फ रूपया लेकर ये दो कौड़ी के लोग हवाई यात्राओं और तीन स्टार होटलों में ऐयाशी करने में जुट जाते है, सिवाय बकवास और बिजिनेस के कुछ नहीं करते. सरकार को चाहिए कि इस तरह से स्रोतों से आने वाले धन पर प्रतिबन्ध लगाएं और इन तथाकथित रूप से काम करने वाले भ्रष्ट और मक्कार संगठनों पर रोक लगाए. मेरी जानकारी में ऐसे कई भारतवंशी है जो बेचारे करोड़ों रूपये गरीब बच्चों की पढाई के लिए दे रहे है किताबे और पाठ्यसामग्री छपने के लिए दे रहे है, पर इन एनजीओ ने ना कुछ छापा- ना ही सामान वितरित किया, बल्कि इनके कार्यकर्ता लाखों रूपया सिर्फ और सिर्फ गांजे भांग और शराबखोरी में उड़ाकर फ़ालतू की बकवास करने में व्यस्त रहे. 

सोच रहा हूँ भारतवंशियो को इनकी हकीकत बता ही दूं ताकि वे कम से कम इस मुगालते में ना रहे कि उनके रूपये का सही उपयोग हो रहा है. सिर्फ इस मामले में अजीम प्रेम जी का फैसला सही नजर आता है कि उन्होंने इन एनजीओ को एक चवन्नी नहीं दी और खुद खर्च कर रहे है अपने तंत्र बनाकर, इसलिए देश भर के कुछ मशहूर टुच्चे कंसल्टेंट्स और सारे भुक्कड़ एनजीओ नाराज है क्योकि इनके नवाचार और व्याभिचार वहाँ बिक नहीं रहे है.


बीमारू राज्यों का नाम लेकर धंधा करने वाले और दुनियाभर से भारतवंशियों से रूपया एंठने वाले कंसल्टेंट्स से बड़ा गद्दार कोई नहीं है मेरा बस चले तो इन्हें काले पानी की सजा देकर हमेशा के लिए देश निकाला दे दूं. ये देश के निकृष्टतम राजनेता से ज्यादा गिरे हुए लोग है जो गरीब, दलित, आदिवासियों और समाज के हाशिये पर पड़े लोगों के उत्थान के नाम पर दुनियाभर से रूपया बटोरते है और फिर हवाई यात्राओं, महंगे होटलों, सुरापान, गांजे और अपने नाम की जमीन खरीदकर समाज सेवा का धंधा चलाते है. ऐसे गद्दारों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए और इनकी नागरिकता खारिज होना चाहिए इनके अवदान को देखा जाए तो सिवाय सुविधा, कंसल्टेंसी और यश की भूख और कूड़ा कचरा है लिखने के नाम पर. सबको अफ्रीका भेज दो या सूडान या साईबेरिया- जहां पीने को पानी नसीब ना हो. कम से कम हमारा देश और यहाँ के गरीब लोग इनकी चालबाजियों तो सुरक्षित रहेंगे, इनके घटिया नवाचार और व्याभिचार से तो बचेंगे.

Thursday, January 9, 2014

ये है शशिकला और अन्य आदिवासी बहनें


जब अलीराजपुर के दूर-दराज के गाँव में गया था तो लगा था कि क्या मतलब है शिक्षा का- ना स्तर, ना गुणवत्ता और ना जाने क्यों ये पढ़ रहे है, ना नौकरी मिलेगी, ना मान सम्मान; परन्तु जब शशिकला से मिला तो सच कहूं मेरे लिए जीवन के मायने ही बदल गए. विस्तार से लिखूंगा थोडा समय मिल जाए, फिलवक्त इतना ही कि शशिकला खुद बारहवीं पास है इनकी चार बेटियाँ है पति मजदूरी करते है जो अनियमित होती है. संस्था कल्याणी सामुदायिक विकास केंद्र, कठ्थीवाडा से प्रेरित होकर ये बहनें अपनी बच्चियों का जीवन सुधार रही है. इन्हें कल्याणी संस्था ने निशुल्क होस्टल उपलब्ध करवाए है, जहां बच्चियां पढाई के साथ जीवन कौशल शिक्षा और कई प्रकार के हूनर भी सीख रही है, पर स्कूल की फीस आदि तो देना ही पड़ता है. शशिकला की एक बेटी इस होस्टल में रहकर पढ़ रही है. 

ये खुद एक प्राईवेट स्कूल में नौकरी करके दो हजार मासिक रूप से कमाती है और सबसे आश्चर्यजनक यह है कि अपनी चारों बेटियों की फीस में तेरह सौ रूपये हर माह खर्च कर देती है. जब इन्होने कहा तो मेरे पावों के नीचे से जमीन सरक गयी कैसे परिवार का गुजारा करती होंगी, दुनिया के इतने बिरले अनुभवों में मेरे लिए ये बेहद भावुक क्षण थे जब यह अपनी कहानी बयाँ कर रही थी और फिर जब इन्होने विस्तार से बताया कि इनके बच्चों के ये पढ़ा लिखाकर नौकरी करवाना चाहती है, उन्हें स्वालंबन सिखाना चाहती है, समुदाय में बदलाव का सारथी बनाना चाहती है. 

शशिकला अपने साथ अपने समुदाय की अन्य आदिवासी बहनों को भी प्रेरित करती है कि एक रोटी कम खाओ, पर बेटियों को पढाओ तो यकीन मानिए दोस्तों मै बस रोने को हो गया, और फिर अचानक मुझमे ताकत जागी कि जब ये बहन इतना परिश्रम करके, मेहनत करके चार बेटियों के लिए सोच रही है तो हम समाज की सारी उपेक्षित बेटियों की पढाई के लिए क्यों नहीं कुछ कर सकते. 






ये  
चार-पांच बहने जिनमे शशिकला भी है, को मेरा सलाम और इनकी बेटियों को असीमित दुआएं कि इस समाज में अपना स्थान हासिल करें. ये आदिवासी बहने उत्तर प्रदेश और लखनऊ के उन निकम्में और भ्रष्ट, नवाचारियों और नालायकों शिक्षाविदों से करोड़ों गुना बेहतर है जो दारु और गांजे के नशे में में गरीब बच्चों का रूपया हड़प जाते है, बल्कि इन बहनों की उनसे तुलना ही करना बेमानी है. 

बहरहाल सलाम इन सबको.

बचा लीजिये अपने देश के बच्चों को इन शिक्षा के नवाचारियों से

साथी लोग पूछ रहे है कि मै इतना अनुभवी, शिक्षित, और अंग्रेजी का जानकार होने के बाद भी और शिक्षा के काम का थोड़ा बहुत सामान्य अनुभवी होने के बार भी यूपी के लखनऊ में एक प्रोजेक्ट में "एडजस्ट" क्यों नहीं हो पाया और क्यों भला लौट आया??? जवाब बहुत साफ़ है कि मै निकम्मा और अयोग्य हूँ यह मैंने सीख लिया और फिर लगा कि व्यर्थ में अपने आपको खपाने से बेहतर है कि कही दूर चला जाए चापलूसों और मक्कारों की दुनिया से मै तो बिगड़ा था ही, कम से कम अपनी रचनात्मकता तो ख़त्म नहीं होगी उस घुटन और अँधेरे में, शिक्षा के नाम पर व्यवसाय करने वाले, गरीब बच्चों की शिक्षा के नाम पर गांजा, शराब और रूपये की हवस में अपने जमीर को डूबो देने वाले तथाकथित भ्रष्ट शिक्षाविदों और प्राथमिक शाला के मास्टर से कंपनी के मालिक बन बैठे गंवार और उज्जड लोगों से मुक्ति तो मिलेगी, लूले- लंगड़े और तोतले और अपने ही बेटों की ह्त्या करने वाले समाजसेवी , अपनी बीबी को तलाक देकर देश भर में मूल्य शिक्षा की बात करने वाले, कंसल्टेंसी के नाम पर सालों से दूकान चलाने वाले देश की प्रखर मेधा शक्ति, सिगरेट और दारु में मस्त महिलायें, छदम मीडिया के उजबक पैरोकार और अपनी शाला से महीनों दूर रहकर दूसरी संस्कृति और भाषा के क्षेत्र में पाठयक्रम विकसित करने वाले बौड़म मास्टर जो सिर्फ रूपये के लिए अपना जमीर बेच देते है, से मुक्ति की कामना थी, इसलिए लौट आया कुछ लोगों का साथ ना होता तो शायद ये यातना के छः माह भी नहीं निकल पाते, मेरे लिए उस नवाबी और अच्छे शहर लखनऊ में......अब सवाल मेरे लिए यह है कि इस गेंग के मक्कार और एकदम हरामी लोगों से कैसे बच्चों को बचाया जाए वरना उनका जीवन तो अँधेरे में है ही, माफ़ कीजिये तीखा लिखा है पर आप वाकिफ है कि मै क्या कह रहा हूँ........एनजीओ कल्चर के नाम पर सिर्फ व्यवसाय और नया बिजिनेस माडल विकसित कर रहे है लोग बाग़, हवाई यात्राएं और तीन स्टार होटलों में ठहरना रहना खाना पीना और ऐयाशी.............बस यही है शिक्षा में नवाचार बनाम व्याभिचार........