Saturday, November 30, 2013

सत्ता - उदय प्रकाश

सत्ता............ 

-उदय प्रकाश 


जो करेगा लगातार अपराध का विरोध
अपराधी सिद्ध कर दिया जायेगा

जो सोना चाहेगा वर्षों के बाद सिर्फ़ एक बार थक कर
उसे जगाये रखा जायेगा भविष्य भर

जो अपने रोग के लिए खोज़ने निकलेगा दवाई की दूकान
उसे लगा दी जायेगी किसी और रोग की सुई 

जो चाहेगा हंसना बहुत सारे दुखों के बीच
उसके जीवन में भर दिये जायेंगे आंसू और आह

जो मांगेगा दुआ, 
दिया जायेगा उसे शाप
सबसे सभ्य शब्दों को मिलेगी
सबसे असभ्य गालियां

जो करना चाहेगा प्यार
दी जायेंगी उसे नींद की गोलियां

जो बोलेगा सच
अफ़वाहों से घेर दिया जायेगा 
जो होगा सबसे कमज़ोर और वध्य
बना दिया जायेगा संदिग्ध और डरावना

जो देखना चाहेगा काल का सारा प्रपंच
उसकी आंखें छीन ली जायेंगी
हुनरमंदों के हाथ
काट देंगी मशीनें


जो चाहेगा स्वतंत्रता
दिया जायेगा उसे आजीवन कारावास !
एक दिन लगेगा हर किसी को
नहीं है कोई अपना, कहीं आसपास !!

यातना - अरुण कमल

समय के साथ-साथ बदलता है
यातना देने का तरीका
बदलता है आदमी को नष्ट कर देने का रस्मो-रिवाज

बिना बेड़ियों के
बिना गैस चैम्बर में डाले हुए
बिना इलेक्ट्रिक शाक के
बर्फ पर सुलाए बिना

बहुत ही शालीन ढंग से
किसी को यातना देनी हो
तो उसे खाने को सब कुछ दो
कपड़ा दो तेल दो साबुन दो
एक-एक चीज दो
और काट दो दुनिया से
अकेला बंद कर दो बहुत बड़े मकान में
बंद कर दो अकेला
और धीरे-धीरे वह नष्ट हो जायेगा
भीतर ही भीतर पानी की तेज धार
काट देगी सारी मिट्टी
और एक दिन वह तट
जहाँ कभी लगता था मेला
गिलहरी के बैठने-भर से
ढह जायेगा ।

-अरुण कमल

Friday, November 22, 2013

होने और मेरे बनने में तीन देवियाँ -चंदू दीदी, शोभना मैडम, और लीला दीदी

शायद कुछ पल ऐसे होते है जब हम गहरी निराशा में होते है और अचानक कही से अपने आ मिलते है, तो सारी उदासी दूर हो जाती है और हम चहक उठते है बच्चों से. लखनऊ में ऐसे ही कुछ विचित्र समय से गुजर रहा हूँ मै इन दिनों. 






                                             (बाए से चंदू दीदी, शोभना मैडम, और लीला दीदी)

अचानक से देवास के बीस बाईस लोग एक साथ आ मिलें वरिष्ठजनों के राष्ट्रीय सम्मलेन में. इनमे मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण थे तीन देवियाँ जिन्होंने मेरे होने में बहुत बड़ा योगदान दिया है. माँ तो पहली गुरु थी, बाद में दादी को अपना आदर्श भी मानता रहा. पर शाला की पहली गुरु शोभना शाह जो गुजराती होने के बाद भी मराठी प्राथमिक विद्यालय में मेरी पहली शिक्षिका बनी और पांचवी तब बोर्ड हुआ करता था, गणित में इन्ही की बदौलत ग्रेस से पास हुआ. आज जब मै इनसे कह रहा था तो बोली भले ही तू गणित में कच्चा था पर आज दुनिया के गणित में तो बड़ा सुलझा हुआ है. इनके तीनों बच्चे मेरे हम उम्र ही थे. दूसरी दो महिलायें है सुश्री लीला राठोड और श्रीमती चन्द्रकला तिवारी यानी चंदू दीदी ये दोनों दीदियों की वजह से मैंने स्काउट में हिस्सेदारी की, रोवर्स में हिस्सेदारी की. जिन्दगी के कम से कम सौ कैम्प इनके साथ किये और जीवन का अनुशासन सीखा.  

ये ना होती तो मै जीवन में कभी राष्ट्रपति पुरस्कार सन १९८२ में ले नहीं पाता और राष्ट्रपति थे स्व. नीलम संजीव रेड्डी से मद्रास में. आज शोभना शाह मैडम से मै करीब पच्चीस बरसों बाद  मिला पर लगा ही नहीं कि हमारे बीच इतना लंबा समय का फासला रह गया था और गंगा में इतना पानी बह गया था. लीला दीदी और चंदू दीदी ने जो स्नेह दिया और देवास से लाई हुई मिठाई खिलाई उसकी मिठास शायद ताउम्र बनी रहेगी. 

आप सब स्वस्थ रहे और खूब खुश रहे यही दुआ मै कर सकता हूँ, आप तीन मेधावी और मेरे जीवन को आकार देने वाली महिलाओं को नमन. एक बात तीनों ने एक स्वर से कही कि "संदीप अब बहुत हो गया घर आ जा बेटा, अपना इलाका और अपने लोग अपने ही होते है और फिर हम है ना मदद करने के लिए, जो तू कहेगा वो हम करेंगे........." इतना विश्वास और कौन कर सकता है आंसू आ गए मेरी आँखों में, आते समय ........

यह सिर्फ निश्चल और मातृत्व भरा स्नेह है, और विश्वास रखिये मै जल्दी ही वापिस आ रहा हूँ.........अपने घर .........मित्रों दुआ करिए कि मै लौट जाऊं वहाँ सब अपने है पराया कोई नहीं......!!!

Wednesday, November 20, 2013

इन्सुलिन के जनक डॉ. फ़्रेडरिक सेंगर

Photo: डॉ. फ़्रेडरिक सेंगर का कल निधन हो गया। 

डॉ. सेंगर ने इंसुलिन नामक प्रोटीन को सीक्वेंस (सूचीबद्ध) किया था और इसी के कारण डायबिटीज़ के मरीज़ों को इंसुलिन उपलब्ध हो पाया। इस खोज के लिए 1958 में डॉ. सेंगर को रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया।

1980 में उन्हें एक बार फिर से रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया! इस बार उन्हें यह सम्मान न्यूक्लिक एसिड को सीक्वेंस करने के लिए दिया गया था। इससे विभिन्न जीवों के डी.एन.ए. को समझने में मदद मिली और बहुत-सी बीमारियों के बेहतर इलाज की खोज आसान हुई।

डॉ. सेंगर जैसे वैज्ञानिक मानवता के रत्न हैं। इंसुलिन की उपलब्धता ने करोड़ों जाने बचाई हैं और करोड़ों लोगों को बेहतर जीवन का वरदान दिया है। डॉ. सेंगर मेडिकल रिसर्च काउंसिल से जुड़े थे -मुझे गर्व और खुशी है कि इसी संस्थान के लिए मैंने भी थोड़ा-सा कार्य किया। डॉ. सेंगर को हार्दिक श्रद्धांजली।



दुखद खबर परन्तु घटिया राजनैतिक खबरों के बीच एक अच्छी जानकारी देने वाला मित्र ललित कुमार का स्टेट्स. आज इसको पढ़कर इस महान व्यक्ति के बारे जान पाया, जिस इन्सुलिन को सन 1975 से अपने परिजनों के लिए उपयोग कर रहा था और शायद अब अपने लिए भी करना पड़े, के जनक को नमन. ऐसी खबरों का स्रोत फेसबुक से बेहतर कोई और नहीं हो सकता. धन्यवाद भाई ललित

डॉ. फ़्रेडरिक सेंगर का कल निधन हो गया। 


डॉ. सेंगर ने इंसुलिन नामक प्रोटीन को सीक्वेंस (सूचीबद्ध) किया था और इसी के कारण डायबिटीज़ के मरीज़ों को इंसुलिन उपलब्ध हो पाया। इस खोज के लिए 1958 में डॉ. सेंगर को रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया।



1980 में उन्हें एक बार फिर से रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया! इस बार उन्हें यह सम्मान न्यूक्लिक एसिड को सीक्वेंस करने के लिए दिया गया था। इससे विभिन्न जीवों के डी.एन.ए. को समझने में मदद मिली और बहुत-सी बीमारियों के बेहतर इलाज की खोज आसान हुई।



डॉ. सेंगर जैसे वैज्ञानिक मानवता के रत्न हैं। इंसुलिन की उपलब्धता ने करोड़ों जाने बचाई हैं और करोड़ों लोगों को बेहतर जीवन का वरदान दिया है। डॉ. सेंगर मेडिकल रिसर्च काउंसिल से जुड़े थे -

Monday, November 11, 2013

राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर मौलाना आजाद को याद करते हुए सभी शिक्षाविदों को बधाई


राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर मौलाना आजाद को याद करते हुए सभी शिक्षाविदों को बधाई, सभी शिक्षकों को  मुबारक शुभकामनाएं. आज के दिन स्व. विनोद रायना और अनिल सदगोपाल जैसे जमीन से जुड़े शिक्षाविदों को याद करना स्वाभाविक है. भोपाल में अनिल हर साल एक बड़ा और अच्छा आयोजन करते है.  

और एक अनुरोध कि शिक्षा को शिक्षा ही रहने दें, अपने ख्याली, हवाई, घोर नवाचारी और निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ ना करें. 

सभी एनजीओकर्मी जो भले ही शिक्षा का 'श' ना जानते हो, भले ही ट्रेक्टर बेचते जीवन बीत गया या खेती किसानी करते, या गैरेज पर टेम्पो और पुरानी सुवेगा या बजाज का स्कूटर सुधारते पर आप मेहरबानी करके अपने दिमागी तनाव और व्यक्तिगत फ्रस्ट्रेशन को बेचारे बच्चों और ट्रेंड शिक्षकों पर ना लादे. अपने अनपढ़, दसवीं या बारहवीं पास कार्यकर्ताओं को कम से कम स्कूल से दूर रखें जो स्कूल में जाकर बच्चों को गतिविधि शिक्षण के नाम पर कूड़ा परोसकर आते है और सारा समय अपने साथ जानकारियों का पुलिंदा भरते रहते है कि देश में इतना प्रतिशत बढ़ गया. 

सभी फंडिंग और युएन एजेंसी में काम करने वाले तमाम नोबल पुरस्कार प्राप्त करने लायक महान विकास कर्मियों से भी अनुरोध है कि अपने कुत्सित विचार और बेफालतू के मुगालते ना पालें कि आपके दिए चन्द रूपयों, बेहद घटिया और अनुपयोगी परन्तु चिकने चुपड़े कागजों पर चार गुना भाव पर छपी सामग्री से देश के हर बच्चे को शिक्षा मिल जायेगी और सब शिक्षा के अधिकार क़ानून का फ़ायदा उठा लेंगे. आप सिर्फ अपनी मोटी टेक्स फ्री कंसल्टेंसी, हवाई यात्रा, गाडी के एसी, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों से मधुर समबन्ध, उनकी बीबियों की जायज-नाजायज मांगों  और पीपीटी तक ही सीमित रहकर देश की बड़ी मदद कर सकते है, आपके द्वारा अपने चापलूस और भाई-भतीजे  और काम के बदले एसी कमरों में सिर्फ अंगरेजी में गिटिर पिटिर करने वाली छदम जेंडरियां और ऐसे तमाम पाले हुए बेहद अप्रतिबद्ध टुच्चे, एक रूपये ज्यादा पाने पर नौकरी बदल देने वाले समाज सेवा की डिग्रियां खरीदकर लाने वाले महान शूरवीर लोग भी शिक्षा से दूर रहे तो देश पर बड़ा कर्ज होगा. 

मीडिया में एनजीओ को दूह कर फेलोशिप जुगाड़ने वाले और बगैर अपनी दिमागी समझ के शिक्षा से लेकर हनोई वार्ता पर ज्ञान बघारने वाले, यहाँ वहाँ संपादकों के पाँव पड़ने वाले लेखक पत्रकार भी शिक्षा को छोड़कर लिखें अभी बहुत मुद्दे है देश में जिस पर आपंके एक्पर्ट ओपिनियन की जरुरत है- जैसे प्याज के भाव, मन मोहन सिंह और आडवानी के बीच सत्ता के सह सम्बन्ध, मोदी और मुलायम का आर्थिक गणित, अमित शाह और अशोक गेहलोत का चुनावी पैक्ट आदि. 

हमारा शिक्षक जो अभाव में, घोर अव्यवस्थाओं के बीच, भले ही अप डाउन करके बच्चों को पढ़ा रहा है उसे पढ़ा लेने दीजिये, आप तो चले जायेंगे अपना प्रोजेक्ट ख़त्म करके मेहरबानी करके किसी को दिवास्वप्न ना दिखाएँ. 

कुल मिलाकर प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो.  

Sunday, November 10, 2013

बिज्जी के साथ लोक कथाओं के संसार का खात्मा पर वृहद् समाज का सपना ज़िंदा



अनिल बोर्दिया, अरुणा राय, विजयदान देथा ये तीन वो लोग थे जिन्होंने मिल-जुलकर कई ख्वाब बुने थे और मजेदार यह था कि तीनों अलग अलग काम करते थे और अलग क्षेत्रों के थे. जब भी लोक जुम्बिश और कालान्तर में दूसरा दशक की कार्यशालाओं में जाता तो अनिल बोर्दिया के साथ बिज्जी अटैचमेंट के रूप में हमेशा जरुर रहते और कथाओं और प्रसंगों से सामाजिक बदलाव की बातों को इंगित करते, अरुणा, अनिल और बिज्जी ये तिकड़ी घंटों लम्बी बहस करती. बन्कर, शंकर और किसान मजदूर संगठन के साथी और हम भी भी लगे रहते पर कई बार बहस तीखी होने पर बिज्जी ही थे, जो सबको समेट कर रखते. 


Photo: अनिल बोर्दिया, अरुणा राय, विजयदान देथा ये तीन वो लोग थे जिन्होंने मिल-जुलकर कई ख्वाब बुने थे और मजेदार यह था कि तीनों अलग अलग काम करते थे और अलग क्षेत्रों के थे. जब भी लोक जुम्बिश और कालान्तर में दूसरा दशक की कार्यशालाओं में जाता तो अनिल बोर्दिया के साथ बिज्जी अटैचमेंट के रूप में हमेशा जरुर रहते और कथाओं और प्रसंगों से सामाजिक बदलाव की बातों को इंगित करते, अरुणा, अनिल और बिज्जी ये तिकड़ी घंटों लम्बी बहस करती.  बन्कर, शंकर और किसान मजदूर संगठन के साथी और हम भी भी लगे रहते पर कई बार बहस तीखी होने पर बिज्जी ही थे, जो सबको समेट कर रखते. 

लोक कथाओं को माध्यम बनाकर उन्होंने ना मात्र एक बड़े वृहद् समाज, जो समता मूलक था, की रचना बल्कि आख़िरी दम तक उसी बहुत अभाव और शोर शराबे से दूर वाले संस्थान में ज़िंदा रहे. मैंने  साहित्य में लोक, लोक चरित्रों और मिथकों का जो प्रयोग "बदलाव" के लिए करते बिज्जी को देखा है वह दुनिया के किसी भी भाषा में शायद ही मिलेगा. 

आज अनिल बोर्दिया नहीं है और अब बिज्जी का जाना, इस बीच परमानंद श्रीवास्तव, राजेन्द्र यादव का जाना हिन्दी का बड़ा नूकसान है. समझ नहीं आता कैसा विचित्र समय है. 

बिज्जी के कथा संसार और खासकरके उनके लोककथाओं में फैले बिम्बों और उपमाओं के बहाने एक नए समाज का स्वप्न, निर्माण और उसे पूरा करने के लिए अंतिम सांस तक लगे रहने वाले बिज्जी को आख़िरी नमन. 

आज बहुत पुरानी स्मृतियाँ एकाएक ताजा हो गयी- बीकानेर से लेकर लुनकरणसर, गढ़ी, सागवाडा, तिलोनिया,  जयपुर, भीलूडा, डूंगरपुर  और ना जाने कहाँ कहाँ के स्थान याद आ गए जब हम घंटों बैठकर पाठ्यक्रम भाषा और बदलाव की बातें करते थे, और फिर देर रात तक उन्ही के मुंह से लोककथाएँ सुनते थे.

पता नहीं इस साल के अंत तक और का क्या सुनना और देखना बाकी है अभी........

बिज्जी आप कही नहीं गए है बस उठकर यूँही टहल रहे है शायद और आकर फिर कहेंगे कि अच्छा सुनो राजस्थान में एक कथा है.............बंद करो अपनी फ़ालतू बातें !!!!

लोक कथाओं को माध्यम बनाकर उन्होंने ना मात्र एक बड़े वृहद् समाज, जो समता मूलक था, की रचना की, बल्कि आख़िरी दम तक उसी बहुत अभाव और शोर शराबे से दूर वाले संस्थान में ज़िंदा रहे. मैंने साहित्य में लोक, लोक चरित्रों और मिथकों का जो प्रयोग "बदलाव" के लिए करते बिज्जी को देखा है वह दुनिया के किसी भी भाषा में शायद ही मिलेगा. 

आज अनिल बोर्दिया नहीं है और अब बिज्जी का जाना, इस बीच परमानंद श्रीवास्तव, राजेन्द्र यादव का जाना हिन्दी का बड़ा नूकसान है. समझ नहीं आता कैसा विचित्र समय है. 

बिज्जी के कथा संसार और खासकरके उनके लोककथाओं में फैले बिम्बों और उपमाओं के बहाने एक नए समाज का स्वप्न, निर्माण और उसे पूरा करने के लिए अंतिम सांस तक लगे रहने वाले बिज्जी को आख़िरी नमन. 

आज बहुत पुरानी स्मृतियाँ एकाएक ताजा हो गयी- बीकानेर से लेकर लुनकरणसर, गढ़ी, सागवाडा, तिलोनिया, जयपुर, भीलूडा, डूंगरपुर और ना जाने कहाँ कहाँ के स्थान याद आ गए जब हम घंटों बैठकर पाठ्यक्रम भाषा और बदलाव की बातें करते थे, और फिर देर रात तक उन्ही के मुंह से लोककथाएँ सुनते थे.

पता नहीं इस साल के अंत तक और का क्या सुनना और देखना बाकी है अभी........

बिज्जी आप कही नहीं गए है बस उठकर यूँही टहल रहे है शायद और आकर फिर कहेंगे कि अच्छा सुनो राजस्थान में एक कथा है.............बंद करो अपनी फ़ालतू बातें !!!!

Saturday, November 9, 2013

कामरेड गामा बोले "आधी बीमारी ठीक हो गई-मगर आप काम छोड़ कर क्यों आये कामरेड " कामरेड बादल सरोज फेसबुक पर 9 नवम्बर 2013 अपने नोट्स में

कामरेड गामा बोले "आधी बीमारी ठीक हो गई-मगर आप काम छोड़ कर क्यों आये कामरेड " कामरेड बादल सरोज फेसबुक पर 9 नवम्बर 2013 अपने नोट्स में 

9 November 2013 at 15:39
महू विधानसभा क्षेत्र में पार्टी  उम्मीदवार का नामांकन भरवाने और अभियान की सभाओं में हिस्सा लेने मै छह को ही इलाके में पहुँच गया था. सिमरोल या दतौदा में कहीं था जब संदीप नाइक का स्टेटस-लिंक कामरेड गामा के बहाने सच्चाई की खोज पढ़ा. चिंता बढ़ी.  सात नवम्बर की सुबह तड़के कामरेड गामा से मिलने उनके घर पहुंचे. सांस लेने में बेइंतहा तकलीफ के बावजूद गामा जी के चेहरे पर चमक आ गयी थी. वे काफी देर तक मुझे अपने गले से लगाए रहे-और भावुक होकर बोले कि "आपके आने से मेरी आधी बीमारी ठीक हो गई है " मगर इसी के साथ उन्होंने सवाल भी किया कि  "आप चुनाव और पार्टी  के काम को बीच में छोड़कर आये क्यों कामरेड?" मेरे साथ पार्टी नेता कैलाश लिम्बोदिया भी गए थे. गामाजी के साथ चाय पीते हुए हम दोनों ने  इलाज की माहिती ली-सारी रिपोर्टें देखीं. उनके बेटे इलियास, नातिन निस्बा से दीगर जानकारियां जुटाईं. गामा जी की तीसरी पीढ़ी के  छोटे से अरमान के साथ अपने अरमान साझे किये. कुछ जरूरी इंतजामात तुरंत किये गए. बाकी के बारे में ठोस मंसूबे बनाये गए.
गामा जी को ले जाकर ई एस आई के इंदौर के नंदा नगर अस्पताल की आई सी यू में दाखिल करा दिया गया है. उनकी साँसे काबू में हैं. उनकी देखभाल जारी है. उम्मीद है बहुत जल्द ही वे देवास की सडकों पर फिर एक बार लालझंडा थामे जलूसों की अगुआई करते दिखाई देंगे.
अपनी साँसों के आरोह-अवरोह को काबू में रखने की हर सम्भव कोशिश करते हुए भी गामा जी अपनी तस्वीरों के अल्बम दिखाते हुए कभी कामरेड शैली तो कभी धाकड़ साब की याद दिलाते रहे. एक तस्वीर में मौजूदा राज्य सचिव का  लगभग पूरी काली दाढ़ी वाला फ़ोटो देखकर उनके चहरे पर भी शरारती मुस्कान आ गयी. . घरवालों ने बताया कि आज काफी अर्से के बाद मुस्कुराये हैं गामा जी.
मुस्कराहट के लिए ही तो लड़ाई है गामाजी और उनके जैसे बाकियो की.
मुस्कराहट की सल्तनत और ख़ुशी का साम्राज्य ही तो कायम करना है पार्टनर !!!  ये आर्थिक बराबरी, सामाजिक समानता, लूट की जगह इंसानियत की बहाली..वगैरा वगैरा तो पतवारें हैं-नांवे हैं..नखलिस्तान की जमीन जो इन भंवरो-तूफ़ानो-मंझधारों को पार करने के बाद आएगी वह मुस्कुराहटों की चमक से ही तो रोशन होगी. 
(कितने सारे मित्रो ने - उन सब के नाम लिखने में काफी समय लगेगा.- उस पोस्ट को/शेयर की गई पोस्ट को लाइक करके-अनेक सुझाव देकर-यहाँ तक कि तत्काल मदद की पेशकश करके मित्र  संदीप नाइक की चिंता के साथ साझा किया है. एक नयी सी बहस भी शुरू  की है. ऐसी अभिव्यक्तियाँ हौंसला बढ़ाती है. धन्यवाद लिखने में हिचक हो रही है-गामा जी और उनके जैसे लोग किसी व्यक्ति-तंजीम भर की संपत्ति नहीं है. वे समूचे समाज के हैं इसलिए सभी की ओर से सभी का आभार.)   

My Blog in Amar Ujala 8 Nov 2013

Tuesday, November 5, 2013

कामरेड गामा के बहाने सच्चाई की खोज

बीस फीट के बंद अँधेरे गलियारे को पार करते हुए जब हम उस बंद घर के बीच में पहुंचे तो कुछ बर्तन और बिखरा सामान पडा था. जब आवाज दी तो उन्होंने कहा थोड़ा ठहरो फारिग हो लूं.........हम इंतज़ार  करते रहे और उस अँधेरे गलियारे में आती सूरज की मद्धम किरणों को देख रहे थे कि वो कहाँ से दुस्साहस करती होंगी कि घूस जाए और अपने उजियारे से किसी का जीवन उजास से भर दें,  कहाँ से हवाएं आती होंगी ऐसे उद्दाम वेग से कि साँसें अपने आप चलने लगे और जीवन का पहिया अपनी गति से चले और ऐसी तान छेड़े कि सब कुछ सहज हो जाए. 

थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद जब हम उस कमरे में घुसे तो पाया कि एक टाण्ड था जिस पर लोहे की पेटियां थी, कुछ अखबार पड़े थे बेतरतीब से, एक टेबल जिस पर मार्क्स का पूंजीवाद, कामरेड पी सुन्दररैया की जीवनी, विधान सभा में वोट देने की अपील और भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों को हराने की गुजारिश करते आलेख, खिड़की में रखा भड-भड करता बहुत पुराना सा टेबल फेन, लंबा चौड़ा पलंग जिस पर अपनी कृशकाय काया के साथ कामरेड इशहाक मोहम्मद गामा पड़े थे. ये वो शख्स है जिसने अपनी पुरी जिन्दगी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए लगा दी - मजदूरों के बीच, किसानों के बीच, शहरी गरीबों के बीच, चौराहों पर मजदूरों के साथ लड़ते- खपते जीवन बीत गया. अब इन दिनों बेहद अकेले पड़े है, अपनी  एक बहू और एक बेटी के भरोसे - कहते है कि अपना काम करवाते हुए शर्म आती है पर शरीर से मजबूर हूँ, कुछ कर नहीं सकता.

पुराने दिनों को याद करते है तो चलते पंखे के शोर में आवाज दब जाती है और साँसों की आवाजाही इतनी तेज है कि ठीक से बोल भी नहीं पाते. बहादुर पंखा बंद करता है और एकाएक मच्छर पुरी ताकत से उस सीलन भरे कमरे में हम सब पर हमला कर देते है. अस्थमा के शिकार हो चुके कामरेड गामा आज बेहद मजबूर है. सामाजिक-आर्थिक परेशानियाँ मुंह बाए खडी है, कहते कुछ नहीं पर बात बोलती है, कमरे का हर जर्रा कहता है कि हालात ठीक नहीं है. एक अकेला आदमी एक छोटे से सामंती शहर में जहां कांग्रेस और भाजपा का हमेशा से वर्चस्व रहा, कम्युनिस्ट तो कभी हो ही नहीं सकता था और लोग आज भी कम्युनिस्ट का अर्थ भली भाँती ना जानते हो वहाँ और ऐसे सामंती शहर में जहां लोग आज भी पूर्व राजा और विधायक के पाँव सत्तर साल के उम्र दराज लोग पडा करते थे, वहाँ इस कामरेड गामा ने प्रतिरोध किया और शहर में एक पीढी को कम्युनिस्ट क्या होता है - सिखाया, पर्चे लिखे, रूसी साहित्य बांटा, हर प्रगतिशील गोष्ठी में शामिल रहे और शिरकत की वो भी पुरी शिद्दत से और दुनिया जहां में हो रहे परिवर्तनों के बारे में बताते रहे.

आज जब बहुत दर्द के साथ कह रहे थे तो कहना शुरू किया कि यहाँ के डाक्टर ने इंदौर ले जाने और दिखाने को कहा है फिर कहने लगे कैसे जाऊं, मेरे पास तो सायकिल भी नहीं है रूपया तो दूर की बात है. जिदंगी में बहुत लड़ाईयां बहुत लोगों के लिए लड़ी, आज मेरे इस कठिन समय में साथ देने वाला कोई है नहीं, हाँ कुछ दोस्त है जिनकी मदद से ये अस्थमा के इलाज के लिए थोड़ी दवाई, सांस लेने का पम्प, नेबुलाईजर और सामान आ गया है, पर एक आदमी कितनी मदद करेगा, उसका भी तो घर परिवार है. मै सोच रहा था कि तमाम जगहों पर वृद्ध लोगों के लिए सुविधाएं होती है, कल सुनील भाई कह रहे थे कि संघ में और कम्युनिस्टों में बुढापा बड़ा खतरनाक होता है, ख़ासा करके उनका जो फुल टाईमर होते है पार्टी के या काडर के,  बल्कि यूँ कहें कि हर काडर बेस में काम करने वालों के लिए कोई ऐसी जगह नहीं जहां वे चैन से मर सकें. मैंने कईं ईसाई संस्थान देखें है जहां बूढ़ी नन और बूढ़े फ़ादर आराम से कान्वेंट में अपना जीवन प्रभु भक्ति करते हुए हंसी खुशी बिताते है, पर काडर आधारित काम करने वालों के लिए क्या कोई जगह कोई भी पार्टी बना पाई है आज तक यहाँ तक कि वामपंथी भी नहीं. 

हाँ निराश नहीं थे कामरेड गामा, कहने लगे आप लोग जो कर रहे हो करते रहो, नौकरियों में हो तो खुलकर सामने आ भी नहीं पाओगे, परन्तु लड़ते रहो, जहां हो वहाँ से लड़ते रहो.......अंग्रेजो से लड़ने में हमें नब्बे साल लगे थे और फिर ये भाजपा और कांग्रेस तो अपने ही लोग है, समझ लेंगे देर-सबेर, थोड़ा समय ही लगेगा, काम करते रहो. मेरा तो बस ये सांस की बीमारी का चक्कर है यह ठीक हो जाए, जो शाम के धुंधलके में घबराहट होती है वह कम हो जाए तो काम बन जाए....... बाकी भले ही शरीर में कैसी भी तकलीफ हो, सब सह लूंगा........कामरेड बडबड़ा रहे थे. हम दोनों दोस्त सोच रहे थे कि क्या किया जा सकता है, कैसे इंसान को तकलीफ से मुक्ति दिलाएं, फिर मैंने धीरे से हिम्मत करके कहा कामरेड मच्छरों से बचो वरना मलेरिया हो गया तो और दिक्कत हो जायेगी तो बोले अरे वो उस आले में आलआउट है ना, लगा दो.............बस हम और नहीं बैठ पाए, बहुत संकोच से विदा ली,  सोचते हुए बाहर आ गए कि कैसे इनके इलाज का प्लान किया जाए. 

फिर शाम को कुमार अम्बुज जी की कहानी "एक दिन मन्ना डे के साथ"  युनुस खान भाई की आवाज में सुन ली तो दिल दहशत से भर गया है, नींद आ नहीं रही और डर लग रहा है..............

मै भी अकेला हूँ और आधे से ज्यादा जीवन बीत गया है और शेष सामने है. सृंजय की कहानी "कामरेड का कोट" भी याद आती है, कामरेड इशहाक मोहम्मद गामा की खुली किताब कुछ कहती है............आवाजें गूंजती है और एक साया अपने आस पास लगातार महसूस करता हूँ यह डर है या हकीकत पता नहीं पर कामरेड गामा के जीवन की आती-जाती साँसें जो अब बहुत मुश्किल हो चली है, सच में हकीकत है. 

Monday, November 4, 2013

जिन्दगी के सफ़र में गुजर जाते है जो मकाम

दृश्य एक:-

लखनऊ का हजरतगंज और फूटपाथ पर टी शर्ट की दुकानें, मै पास बैठा कुछ खा रहा हूँ, किसी साथी का इंतज़ार कर रहा हूँ कि देखता हूँ एक युवा जो लखनऊ विवि से पीएचडी कर रहा है (उसने बाद में बताया था) कार्ल मार्क्स की तस्वीर वाला टी शर्ट खरीदता है जिस पर बाकायदा कार्ल मार्क्स का फोटो है दाढी वाला और लिखा है "Doubt Everything", मैंने सहज ही पूछा कि भाई मार्क्स से ज्यादा प्रभावित हो क्या, तो बोला "जी अंकल, एमए में तो अच्छे मार्क्स थे, अब तो शोध है ना, तो मार्क्स का सवाल ही नहीं है", मैंने फिर टटोला और कहा ये तस्वीर वाले मार्क्स बाबा, इशारा भी किया शर्ट की तरफ तो बोला "ओह ये, पता नहीं, क्या है ना मेरी साली गर्ल फ्रेंड मुझ पर बहुत डाउट करती है हमेशा, उसे रिझाने के लिए ये खरीदा है क्योकि इस पर लिखा है Doubt Everything ..........." हे कार्ल मार्क्स.........कहाँ थे तुम, जब ये टी शर्ट पर तुम्हारा चित्र स्क्रीन प्रिंट किया जा रहा था...........


दृश्य दो:-

देवास में मित्र बहादुर के साथ ए बी रोड से घर आ रहे थे तो देखा एक युवा मस्त वाली 'चे ग्वारा' के चित्र वाली टी शर्ट पहनकर तेज़ बाईक चलाते हुए बड़ी रफ़्तार से जा रहा था, मैंने बहादुर से कहा कि यार ज़रा तेज चलाओ देखें ये देवास में 'चे ग्वारा की टी शर्ट' पहनने वाला क्रांतिकारी कौन है, इसे अपने ओटला मंच से जोड़ो भाई. बहादुर ने कार तेज भगाई और उस युवा के समानांतर हम चलने लगे , मैंने जोर से आवाज देकर उससे पूछा कि ये 'चे ग्वारा' को जानते हो तो बोला कौन चे? मैंने कहा तुम्हारी टी शर्ट पर जिसके चित्र बने है और सारे टी शर्ट पर क्रान्ति के नारे लिखे है, तो बोला पता नहीं मैंने क्रान्ति फिल्म नहीं देखी. हे चे ग्वारा कहाँ थे तुम, जब ये टी शर्ट पर तुम्हारा चित्र स्क्रीन प्रिंट किया जा रहा था...........

फिर समझ में आया कि या तो हम अनजाने में टी शर्ट खरीद लेते है या फिर हम कुछ जानते नहीं या उस लिखे को आत्मसात नहीं कर पातें है और बस अपनी ही धुन में कुछ भी पहनना और कुछ भी ओढ़कर चल देना यही केजुअली करते रहते है. खैर.........इसके बाद मैंने अपनी तमाम ऐसी टी शर्ट्स देखी जिन पर कुछ ना कुछ लिखा था..मेहरबानी करके आप भी एक बार टटोल लीजिये...........कही मेरे जैसा खूसट आदमी आपको रास्ते में मिल जाए और पूछ बैठे तो..............  
 

हमारे साथ हमारे भीतर- घर





और फिर याद आया कि इसी घर में सब कुछ शुरू हुआ, माँ-बाप ने मेहनत से हमें पालते हुए घर सन 1982 में बनाया, इसे संजोया और संवारा, हर कोने में हम अपना बचपन जवानी और अब ढलता हुआ जीवन देख रहे है, सबसे जुड़े- एक बड़ी वृहद् दुनिया से, भाषा और तमीज सीखी. जब परेशान हुए तो घर ही वह शरण स्थली बना जहां हमने अपने आपको हर बार फिर से ढाल लिया कि एक नई लड़ाई लड़ेंगे और जीतकर लौटेंगे. इस दौरान माँ, पिता को खोया, बहुत सारे दोस्तों रिश्तेदारों को खोया जो इसमे से गुजर कर गए थे........ कितनी यादें जुडी है.

इतनी सारी मौतों को देखने और बहुत कुछ खोने के बाद किसी ने कहा मकान बेच दो अपशकुनी है, पर ऐसा होता है क्या? समय का पहिया तो घूमता है और चीजें और हम क्षणे क्षणे ख़त्म होते रहते है, और एक बार फिर सब कुछ धीरे धीरे ख़त्म हो रहा है.............पर घर घर ही होता है............घर दीवार, फर्श या खिड़की दरवाजें नहीं होता वो हमारे भीतर बसता है साँसों की तरह से धड़कता और जीता जगता एक सम्पूर्ण घर.

हर उस बालू के कण पर, उस ईंट पर, हर उस हिस्से पर लिखा है कि यह सब तो तय था, होना ही था, पर घर अभी भी अपने पुरे स्वरुप में मुकम्मल रूप से हमारे साथ हमारे भीतर भी मौजूद है, कुछ हिस्से है जो कह रहे है कहाँ गए वो लोग पर अब जवाब मेरे पास नहीं है. अंधेरों में जूझते घर को हम सिर्फ रोशन कर सकते है सिर्फ अपने प्रयासों से और कुछ नहीं.........







Sunday, November 3, 2013

हिन्दी कविता में नई दस्तक और सम्भावनाशील कवि - अमेय कान्त




अमेय कान्त  सिर्फ एक युवा कवि नहीं बल्कि बेहद भावुक संवेदनशील इंसान और संस्कारवान व्यक्तित्व भी है इसलिए जब वो एक कविता लिखते है तो एक समूचा संसार ऐसा रचते है कि अपने साथ उस सारी जमीन का भी जिक्र करते है जिसकी नुमाईंदगी वो करते है. अपने साथ बहुत बारीक विवरण, याददाश्त का पिटारा, मूल्य, संस्कार, और वो सब कविता में उकेरते है जो शायद एक चित्रकार अपनी तूली से एक खाली कैनवास पर उकेरना चाहता है और रंग- बिरंगी संसार रचता है और इस दौरान वो प्रयोगधर्मी भी होते है बार-बार नया रचते है और पुरी शिद्दत और ईमानदारी से उस संसार को हमारे सामने लाते है जो या तो विलुप्त हो गया है या बाजारवाद की चपेट में क्षणें - क्षणे ख़त्म हो रहा है. पर इस पुरी प्रक्रिया में कही हडबडाहट नहीं है, बाजार आपको उनकी कविताओं में झांकता नजर नहीं आता, ना ही वो कविता को बहुत लाउड करने के लिए कोइ "जार्गन" का इस्तेमाल करते है. इसलिए बहुत धीमे से वो कविता की दुनिया में प्रवेश कर रहे है. नया ज्ञानोदय, साक्षात्कार, वागर्थ और पिछले महीने में ही हंस में छप चुके अमेय कान्त पेशे से इंजिनियर है और उज्जैन के एक तकनीकी महाविद्यालय में प्राध्यापक है. 

हिन्दी साहित्य  के संस्कार उन्हें बचपन में पिता और हिन्दी साहित्य के महान उपन्यासकार और कथाकार डा प्रकाशकांत से मिलें, अपनी विदुषी माँ से शास्त्रीय संगीत की समझ मिली और किताबों की दुनिया में पले-बढ़ें और हिन्दी साहित्य की पत्रिकाओं से दो-चार होते आज अमेय कान्त हिन्दी के यशस्वी युवा कवि है तो कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा. उनकी कवितायें एक नईं जमीन की कवितायें है जहां तारे-सितारें है, धानी है, माँ है, संगीत है वो बहुत बारीकी से एक नन्हीं बच्ची के हाथों को हारमोनियम सुनते देख चिड़िया का फुदकना नहीं भूलते इसलिए प्रकृति और बिम्ब उनकी भाषा में बहुत सहज रूप से आते है वे आग्रह नहीं करते परन्तु उनकी कविता दोबारा पढ़ने और समझाने की मांग जरुर करती है, पाठक को एक ऐसे धरातल पर ले जाती है जहां पाठक अपनी दृष्टि को साफ़ करके फिर निस्संग भाव से उस कविता से एकाकार होना चाहता है और यह महसूसता है कि हर कविता का समीकरण हर बार एक नई समझ और परिपक्व "विजन" दर्शा रहा है जो अमेय की सफलता है. 

कल जब  हम लोग देवास में अमेय की कविताओं का एकल पाठ सुन रहे थे तो एक बारगी अमेय शुरू में थोड़ा झिझके क्योकि उनके पिता और वरिष्ठ सर्जक डा प्रकाशकांत, ब्रजेश कानूनगो, बहादुर पटेल, सत्यनारायण पटेल, डा सुरेश पटेल, डा सुनील चतुर्वेदी, संजीवनी ताई, जीवन सिंह ठाकुर, अमिताभ मिश्र, मधु भाभी, पारुल, मनीष वैद्य, श्रीकांत, तितिक्षा और भी पारिवारिक मित्र और साहित्य से जुड़े लोग बैठे थे, परन्तु बाद में वे दो तीन कविताओं के बाद सहज हो गए और फिर एक ताल में कविता को यूँ सुनाने लगे मानो एक सिद्ध हस्त गायक राग यमन से शुरू करके तीन ताल, विलंबित ख्याल से होकर शास्त्रीय संगीत से सारे राग, तोड़ी, ध्रुपद, दादरा और सब सुनाता है और जब  मंच पर भैरवी गाता है तो श्रोता सुनने के क्रम में इतने मशगुल रहते है कि वे भूल जाते है कि महफ़िल लूटकर कोई ले जा चुका है. मन्त्र मुग्ध से उठते हुए यह दर्द सताता है कि संगीत का यह अनहद नाद क्यों अपने पूर्णता पर आ गया. 

अमेय एक  होनहार कवि है और जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि वे बगैर शोर किये हिन्दी में प्रवेश कर चुके है और यही शांति और चुपचाप की आगत उन्हें हिन्दी कविता में एक लंबा सफ़र तय करने में मददगार साबित होगी. कुछ कवितायें अभी ऐसी है जो उनके लिए भी एक चुनौतीनुमा है जिससे वे बार बार लड़ रहे है परन्तु यही उन्हें एक गंभीर और संभावनाशील बनाएगा. 

अमेय के  लिए शुभकामनाएं और बहुत उम्मींदे कि वे अपने संस्कारों को एक नई दिशा देकर हिन्दी की कविता को सार्थक, सामर्थ्यवान, सशक्त और शाश्वत बनायेंगे.



Saturday, November 2, 2013

लखनऊ का चौक और "मलाई मख्खन"

ये है लखनऊ का चौक जो चिकन के कपडे के लिए बड़ा मशहूर है, उस दिन मैंने एक अनूठी खाने वाली चीज देखी "मलाई मख्खन" जो सिर्फ सर्दियों के मौसम में ही मिलता है. अगर आप चौक जाए तो आपको ढेरों रिंकू, पिंकू, और रोशन भाई मिल जायेंगे मलाई मख्खन बेचते हुए. ससुरा मलाई भी और मख्खन भी, दोनों एक साथ पर जो भी हो बड़ा स्वादिष्ट था बस फिर क्या मेरे जैसे मालवे के चटोरे आदमी को कुछ नया मिल जाए खा ही लेता हूँ बगैर परवाह किये कि अपुन तो शक्कर के भण्डार है...........


खैर, बड़ा मजेद्रार था. इसे फ्रीज में नहीं रखना पड़ता है. ये रिंकू मियाँ दिन में तीन से चार हजार रूपया कमा लेते है इसे बेचकर.............आप भी चखिए और जब तक ना जा पायें- लखनऊ, हाय दिल मसोजाकर और मुझे गरियाते हुए इसी चित्र को देखकर जी ललचाईए.............मलाई मख्खन.......और लखनवी चौक.




देवास की खुश्कगवार सुबह










देवा की इस खुश्कगवार सुबह को सुबह बनाया अनुज चेतन पंडित ने जो आज फ़िल्मी दुनिया के स्थापित कलाकार है. प्रकाश झा के बैनर में बनने वाली लगभग सभी फिल्मों में वे एक दशक से ज्यादा समय से काम कर रहे है, द वेडनस डे, जयप्रकाश जैसी नायाब फिल्मों में काम करने वाले चेतन देवास के ही है और स्व नरेन्द्र पंडित के सुयोग्य एवं होनहार सुपुत्र है. आज सुबह उन्होंने परिणय वाटिका में देवास के लिखने-पढ़ने वालों और ललित कलाओं से जुड़े लोगों को आमंत्रित किया और सबसे चर्चा की, जब मैंने पूछा कि ये क्यों तो चेतन ने कहा कि वे मुम्बई में जब भी समय होता है सत्येन्द्र त्रिपाठी के घर जरुर जाते है जहां हर रविवार को बतरस होता है और सुधीजन एक विषय पर बात करते है. 

बेहद आत्मीय कार्यक्रम था यह दो तीन घंटे चलने वाला- जहां चित्रकार से लेकर संगीत गीत, कहानी कविता आलोचना के सभी लोग इकठ्ठे थे. नाटकों से जुडी युवा पीढी थी जो अपना जीवन नाटक संगीत में देने की लालसा रखती है. आशा यह है कि देवास की अभिव्यक्ति संस्था इस प्रयास को ज़िंदा रखेगी और आगे बढायेगी. मप्र रोडवेज से सेवानिवृत्त गनी भाई के दो किस्से सुनकर पुरी महफ़िल में जान आ गयी कि किस्सा गोई किसे कहते है. जो भी हो बहरहाल मजा आ गया सुबह सुबह सबसे मिलकर. बहादुर पटेल, ब्रजेश कानूनगो, डा प्रकाश कान्त, संजीवनी ताई, प्रभात माचवे, हेमंत बक्शी, जीवन सिंह ठाकुर, मुश्ताक, इकबाल, अभिषेक राठोर, गोपाल पवार, प्रकाश पवार, सोनाली, जयप्रकाश चौहान, सुधीर एवं असीम पंडित, नवरतन सिंह, झोकरकर जी, आदि ऐसे ढेर साथी थे जो अपने अनुभव बाँट रहे थे और महसूस कर रहे थे कि ऐसा होना चाहिए. शायद एकलव्य में हम लोगों ने जो पाठक मंच शुरू किया था उसे फिर से ज़िंदा करने की आवश्यकता है परन्तु वही बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? 

चेतन से लम्बी बात हुई बड़े दिनों बाद.............एक कला अकादमी खोलने का मैंने कहा क्योकि भोपाल का नाटक स्कूल कुछ ठोस कर नहीं पा रहा और मालवे में जो कलाओं का संगम है वह शायद मप्र के दूसरे हिस्सों में ना हो. खैर............इसी बहाने अपुन ने भी सबको दीपावली मुबारक कह दिया लगे हाथ, आपको भी मुबारक............अपने शहर के लोगों के साथ रहिये, जो जहां है वही से कुछ करिए..........देश को रचनात्मक कामों की बहुत आवश्यकता है, हम सबकी आवश्यता है, और एक ऐसे सहज माहौल की जहां से युवा पीढी कुछ सीख सकें, हम बुरा देश उन्हें सौंपकर जाने वाले है यकीन करिए और अभी समय नहीं गुजरा है, कुछ करिए, कुछ करिए........ दोस्तों प्लीज़....................