Wednesday, July 31, 2013

वस्तुएँ और चीजें जिन्होंने मुझे जीना सिखाया और मेरा साथ दिया भाग I



कुछ चीजें कालातीत नहीं होती और वे जल्दी ही छिन्न-भिन्न हो जाती है. कितने दिनों तक इसे इस्तेमाल ही नहीं किया था कि मोहित ने यह गिफ्ट दिया है जब वो भोपाल आया था. बहुत दिनों तक सम्हाल कर रखा पैक मे फ़िर जब मोहित ने फ़ोर्स किया तो उपयोग करना शुरू किया और फ़िर लगातार घिसते रहा. पर कल तो एकदम जवाब दे दिया इसने और कुछ रूपये जो बमुशिकल माह के अंत मे आम तौर पर जैसे कि पड़े रहते है, गिर गये बस फ़िर क्या था, मैंने सोचा अब इसे तिलांजलि देना ही होगी. बस आज इसे आख़िरी बार इस्तेमाल करके यहाँ श्रद्धांजलि स्वरुप तस्वीर लगा रहा हूँ. बहुत साथ दिया इस बटुवे ने बहुत हिम्मत रखी- मेरी सफर मे, दोस्तों मे और कई ऐसे मौकों पर लाज रखी- जब यह बिलकुल खाली था. मुफलिसी का एहसास नहीं होने दिया और हमेशा मैंने अपने आपको बिल गेट्स से कमतर नहीं समझा. अब समय आ गया है कि इसे अलविदा कहकर अपनी धरोहर मे सुरक्षित रख दूँ जहाँ यह एकदम सारी मेरी इस्तेमाल की हुई चीजों के साथ जगह पायेगा और विश्राम पायेगा दौड़ धूप से, सर्दी-गर्मी से और बरसात से और सबसे ज्यादा अब इसे मेरी चिंता करने की जरुरत नहीं कि वो खाली है या भरा हुआ.......... शुक्रिया कहकर इसका अपमान नहीं कर सकता पर हाँ बहुत सहा है इसने मेरे लिए...........काश कि जीवन मे कुछ लोग माँ-बाप के अलावा ऐसे हो पाते ......तो जीवन संवर जाता हर किसी का.
— with Mohit Dholi in Lucknow, Uttar Pradesh.

नया राग गाने को तत्पर है ये भीड़ इस 'सीटी ऑफ क्राउड' मे........लखनऊ मे पन्द्रह दिन




यह अवध की गर्मी भरा एक दिन है और मै मुकेश भार्गव के साथ तफरी करने निकला हूँ काम और थोड़ा सा घूमना फिरना बस मजा आ गया छोटा-बड़ा इमामबाड़ा और लखनऊ के मिजाज को देखा परखा, बस भीड़ के अलावा कुछ नजर नहीं आया. लखनऊ एक अजीब शहर है यह मुझे नवाबों के शहर से ज्यादा "सीटी ऑफ क्राउड" लगा. दरअसल मे भोपाल जैसे सुन्दर शहर को देखने और मह्सूसने के बाद भीड़ और अराजकता से घबराहट होने लगती है. पर शहर की शान ये खूबसूरत जगहें बहुत ही शांत और सुन्दर है. इतना वैभव और मुग़ल शासकों की परम्परा वाले ये दोनों बाड़े अपने समय की दास्ताँ कहते नहीं अघाते. नवाब वाजिद अली शाह की तस्वीर देखकर लगा कि समय लौट रहा है अपने वजूद के साथ ...... अच्छा लगता है अपने इतिहास को देखना संवारना और एक धरोहर के रूप मे देखना. सच मे ये मोंयुमेंट्स नहीं होते तो कहाँ से सीखते है हम वास्तुकला और वैभव का यश गान? मजा आ गया अब धीरे धीरे शहर की तासीर समझ आने लगी है......इंशा अल्लाह सब ठीक हो जाएगा इन्ही दुआओं के साथ आप भी लुत्फ़ उठाईये इन खूबसूरत नजारों का साथ ही एक सवाल भी जो कचोटता रहा बारम्बार कि दलित क्या है......विस्थापित कौम, गाँव देहात मे उपेक्षित समुदाय, जाति से मारे गये समुदाय जो सदियों से दंश झेल रहे है, या आर्थिक रूप से पिछड़े हुए वे सब लोग जो लगातार आजादी के इतने सालों बाद भी सरकारों की उपेक्षा के शिकार रहे है, या अल्प संख्यक जो गाहे-बगाहे वोट बैंक और पार्टियों के इशारों पर अपनी अस्मिता और विचारधारा बदलते रहे है. अगर यह सब कुल मिलाकर दलित है तो भी कोई हर्जा नहीं है शायद आप दोस्त या साथी लोग ज्यादा प्रकाश डाल पाए, पर दलित पहचान जिसे identity कह सकते है, जरुर आज अपने पथ से भटकी हुई है. आज लखनऊ मे जब शहर मे भव्य आलीशान डा बाबा साहब अम्डेबकर सामाजिक परिवर्तन स्थल देख रहा था जिसका बाकायदा दस रूपया शुल्क है, को देखकर मुझे कई सवाल दिमाग मे आये. क्या बाबा साहब ने कभी सोचा होगा कि इतनी बड़ी उनकी मूर्ति कभी इसी देश मे लगेगी , शायद महू मे भी ऐसा स्मारक नहीं है. मप्र शासन के इससे प्रेरणा लेनी चाहिए. एक बड़े शहर मे मसलन इस तरह के पार्क जरूरी तो है पर किस पहचान पर, यहाँ स्थानीय लोग नजर नहीं आये मुझे ज्यादा लोग बाहरी राज्यों के, वो भी दलित लोग, जरुर नजर आये जिनके पहनावे से और बाबा साहब और बाकि सभी की मूर्तियों की पूजा और भक्ति भाव देखकर समझ मे आया. मायावती ने रेकॉर्ड समय मे इतना भव्य काम किया है इसकी तारीफ़ दिल से करूँगा और जिस तरह से हाथी की महिमा चहूँओर नजर आती है चाहे इस पार्क मे हो या कांशीराम स्मारक मे वह काबिले तारीफ़ है. अक्सर सरकारें एक स्कूल की बिल्डिंग भी नहीं बना पाती अपने एक कार्यकाल मे. खैर सवाल यह है कि क्या ऐसे पार्क, स्मारक पहचान बन सकते है पर यह भी लगा कि मायावती ने जो किया वह बेगम हजरत से प्रतियोगिता मे किया होगा, वो भी अवध की बेगम थी और जबरजस्त युद्ध लड़ा था, उनकी सांगठनिक क्षमता भी अदभुत थी और मायावती की भी यह क्षमता अदभुत है कि ऐसे निर्माण कार्य सरकारी मशीनरी से करवा पाई है, बड़ा- छोटा इमामबाड़ा के बाद लखनऊ की पहचान दलित पहचान के रूप मे और इन पार्कों के रूप मे तो जरुर है......इस बात की तारीफ़ की जाना चाहिए ये दीगर बात है कि आजकल बहन जी और उनके लोग नेपथ्य मे है और यवनिका झलाते हुए अपनी बारी का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे है. और लोगों का क्या है वो सिर्फ कोसते है चाहे अखिलेश को या मायावती को या कल्याण सिंह को अब नया राग गाने को तत्पर है ये भीड़ इस 'सीटी ऑफ क्राउड' मे........

Thursday, July 25, 2013

"संसार के एक एकांत मे बैठकर बहुत डरते हुए"


आश्वस्त होता हूँ बार - बार
जब भी बाहर जाता हूँ
जेब मे हाथ डालकर देख लेता हूँ कि चाभी
रखी है ना जेब मे, और अपनी
उँगलियों मे घुमाकर छल्ला तसल्ली देता हूँ
अपने आप को कि सब कुछ सुरक्षित है.
अब डर लगता है पता नही कहाँ गिर जाये भरोसा और ईमान
कहाँ छूट जाये सुकून और शान्ति
किसके साथ चल दूँ एक भीड़ मे अनियंत्रित सा
किसके हाथों चढ जाऊं बलि मै जानता नहीं
किसके  हाथों कठपुतली बनकर
नाचने लगूं उन्मादियों की तरह.
सब कुछ तो अनिश्चित सा होने लगा है इन दिनों
यह उम्र का तकाजा है या स्वाभाविक
इस घोर कलुषित होते जा रहे समय मे
बार-बार याद आता है चलते समय कि
दरवाजा ठीक से बंद किया था या नहीं
कुंडी चढाई थी और बाहर वाला दरवाजा ठेला था कि नहीं
आते समय कोई देख तो नहीं रहा था ना मुझे
कि निगाह पलटते ही टूट पड़े सूने घर पर और
लूट के जाये ज़िंदगी भर  का चैन औ सुकून
कैसे जियूँगा इन आख़िरी दिनों मे.
वैसे ही समेटा नहीं कुछ जीवन मे
अलमस्त फ़कीर की भाँती तो जीता रहा
दवाओं के भरोसे और दुआओं पर ज्यादा
पर अब हिम्मत नहीं है कुछ खोने और पाने की.
बस हर बार निकलता हूँ तो बार-बार आश्वस्त
होना चाहता हूँ कि चाभी सुरक्षित है जेब मे
आप भले ही कुछ कहे पर ये आश्वस्ति ही
अब ज़िंदा रखती है कि जब तक
सुरक्षित है चाभियां दुनिया के सभी
तालें सुरक्षित रहेंगे............

- लखनऊ की एक तनहा शाम 25 जुलाई 2013

33 रूपये मे अमीरी का जश्न जय मौन मोहन और जय मोंटेक

इन दिनों बाहर हूँ घर से और एक बड़े शहर मे रह रहा हूँ बस आश्वस्ति यह है कि ३३ रूपये रोज के हिसाब से मेरे पास ९९०/- नगद पड़े है और बल्कि ज्यादा ही होंगे गिने नहीं है. यदि और कुछ कम- ज्यादा पड़े तो सरकार से या बैंक से लोन लेकर चला लूंगा, और रहा सवाल मजदूरी का तो वो मनरेगा मे मिल ही जायेगी और ठीक समय पर मजदूरी का भुगतान भी हो जाएगा, एक रूपये किलो गेंहूँ और दो रूपये किलो चावल ......यार सोच रहा हूँ कि इस तरह से बचत करके मै खासा अमीर हो जाउंगा, आपमे से किसी का स्विस बैंक मे अकाउंट है क्या और मेरा अकाउंट इंट्रोड्यूस करवा देंगे? क्या है कि साला, खानदान मे किसी का स्विस बैंक मे अकाउंट नहीं है. मै जिंदगी भर तो कुछ कर नहीं पाया, अब कम से कम वहाँ एक बचत खाता खुलवाकर कम से कम अपने ऊपर लगे मुफ्तखोर टाईप वाले सारे पाप तो धो ही सकता हूँ और अपने पर लगे तमाम नाकारा तरह के लांछन दूर कर सकता हूँ. और गुरु इसी तरह से रूपया बचता रहा तो अल्ला कसम एक दिन बिल गेट्स मिरांडा फाउन्डेशन जैसी बड़ी दूकान खोल लूंगा और फ़िर सरकारों को नचाऊँगा कि मै ग्रांट दे सकता हूँ,  क्या साला ये ठेका अजीम प्रेमजी या रतन टाटा ने ही ले रखा है फ़िर देखना सारे एनजीओ वाले मेरे आगे नाचेंगे, ही ही ही, ...........भाई लोग बहुत काम करना है और रूपया बचाना है अपने खाने पीने का इतना सस्ता जुगाड हो जाएगा बकौल मोंटेक दादा और प्राजी मौन मोहन सिंह के राज मे सोचा नहीं था, भगवान की कसम इत्ता फील गुड हो रहा है कि खुशी बता ही नहीं पा रहा हूँ और बस साली दिल की बात यहाँ फेस बुक पर टपक ही गई, डर लग रहा है कि यह सब पढकर सीबीआई या इनकम टैक्स वाले मेरे छप्पर पर छापा ना मार दें. भगवान, अल्लाह, जीसस, वाहे गुरु और बाकि सबके मिलाकर कुल पचपन छप्पन करोड देवी-देवताओं की कसम ऐसा सुख कभी नहीं मिला कि इतने सस्ते मे दो टाईम की रोटी और इत्ती बचत.....मन कर रहा है कि छत्तीस दूना कित्ते होते उत्ते का एक टायलेट भी बनवा ही लूं इस झटके मे.  आज फ़िर जीने की तमन्ना है और मरने का तो कोई इरादा ही नहीं है...........

Tuesday, July 23, 2013

क्या है हमारे पास सिर्फ आज.....

जीवन के सबसे निराश दिनों मे क्या किया जाये, जब सारी आस्थाएं खत्म हो जाने लगे, अपने आप पर शक होने लगे और मंथन करने से कुछ भी हासिल ना हो, लगातार मिलती निराशा और अपने लोग भी आपसे दूर होने लगे तो क्या किया जाये. दोस्त भी आपसे कन्नी काटने  लगे और वो लोग जिन्हें आपने पाल-पोसकर बड़ा किया था वो भी मुँह चिढाने लगे तो क्या सब कुछ खत्म कर लें? बड़ा मुश्किल सवाल है पर क्या निराश हुआ जाये? समझ नहीं आ रहा था फ़िर लगा कि इस सबके बावजूद एक शख्स आपके पास हमेशा रहता है जिसे सब कुछ पता है, जिसे सब कुछ सहना है और देखना भुगतना है, यही वो शख्स है जिसे खुश रखने के लिए आपको सबसे ज्यादा मेहनत करना पडती है. इस कठिनतम दौर मे अपने अंदर के उस व्यक्तित्व को ज़िंदा रखना बहुत जरूरी है जो लगातार आपके साथ है उसे लगातार खुश रखने का प्रयास करना होगा. इसका मतलब हमारे अंदर  एक और शख्स है जो हमेशा देखता गुनता और सुनता रहता है. क्या करें कि इस अपने वजूद को खुश रखा जाये. मै इसी दौर से गुजरा हूँ बस अपनी आस्था को मैंने बनाए रखा और अपने इस वजूद को ज़िंदा रखने के लिए मैंने वो सब किया जो मुझे अच्छा लगता है, अपने आपको खुश रखने का प्रयास किया, छोटी चीजों से हमें बहुत बड़ी खुशी मिल जाती है, कभी चाभी का एक छल्ला खरीद्दने से भी मन को बहुत सुकून मिलता है जिसे हम घंटों निहार सकते है. बस यह सोचकर हमें रहना होगा कि आस्था होना बहुत जरूरी है, यहाँ मै ईश्वर की बात नहीं कर रहा सिर्फ एक आस्था जो हमें हर परिस्थिति मे जिलाए रखती है और हम जीते चले जाते है.कही तो मुक्ति मिलेगी...... कभी कुछ पढ़ लिया, कुछ खरीद लिया, कही घूम आये, कही किसी से दो बात कर ली, कही किसी को थोड़ी सी मदद कर दी, कही अपने लिए ही सही अपने आप से दिल खोलकर बात कर ली, कभी एकांत मे रो लिए, कभी दिल खोलकर हंस लिया, सड़क पर चलते हुए किसी से जमकर लड़ लिए, कभी  दवाई का ओवरडोज ले लिया और कभी तीन दिनों तक कोई दवा नहीं ली कि देखें शरीर कैसे रिएक्ट करता है, कभी छत पर रातभर घूमते रहा, कभी अल्लसुबह निकल पड़ा और रास्ते मे बैठकर निहारते  रहें उगते सूरज को, कही उसे याद कर लिया, कभी बच्चों के पास चला गया और खूब जी भरकर फेंटेन्सी सुन ली और फ़िर अपने आपको यकीन दिलाया कि एक बेहतर दुनिया की कल्पना और नया करने की गूंजाईश अभी बाकि है. बिस्मिल्लाह खां साहब की शहनाई  सुन ली या राग सिंधु भैरवी मे सितार सुन लिया कभी लता दी के गाने सुन लिए और कभी रेमो का गाना सुन लिए- 'इक् हो गये हम और तुम......, या कुंदनलाल सहगल को सुन लिया, कुमारजी का 'उड़ जाएगा हंस अकेला' या कबीर को गुन लिया, पिकासो की एक पेंटिंग देखकर लगा कि मकबूल भी तो ऐसा ही कुछ करना चाहते थे, विष्णु चिंचालकर क्यों नहीं मकबूल जैसी ख्याति अर्जित कर पाए, प्रभाष जोशी के किस्से पढकर सोचे कि आज की पत्रकारिता कहाँ आ गई है, या कभी रात भर फेसबुक पर बैठ गये. पढते रहे गिरीश की तरह से और बगुले की भाँती उसमे से श्रेष्ठ को चुनकर परोस दें ताकि दूसरे भी उसका लाभ ले सके. गुड्डी सही कहती थी कि भागना किसी समस्या का हल नहीं. बस यही कुछ है जो हमें ज़िंदा रखेगा, यही से उपजेंगी  हमारी आस्थाएं  और जीवन मे सम्पूर्णता आयेगी. यही से जन्मेगा एक सुनहरा कल...............यही होगा हमारा आज और हमारा कल.........बस अपने इमोशनल एंकर, जो भी हो - चाहे किताब, एक पेड़, एक शख्स या एक मीठी याद, को अपने सीने मे बसाए रखना, अपने आपको एक मजबूत चट्टान, जिसे मोहित 'रॉक फाउन्डेशन' कहता है, से लगाए रखना, जिसे गुड्डी संघर्ष कहती है, जिसे अप्पू सुनहरा कल, जो हमारा होगा, कहता है, के बीच रखना होगा. बस बचाकर रखना होगी हमारी 'कोर वेल्यूज़' बस बाकि तो सब ठीक हो जाएगा............आईये आगाज़ करें एक ऐसे ही आशावादी जीवन का और देखें कि क्या है हमारे पास सिर्फ आज.....

Friday, July 19, 2013

अरे मर गया देश ज़िंदा रह गये तुम..........सन्दर्भ बिहार मिड डे मील कांड

अरे मर गया देश ज़िंदा रह गये तुम..........सन्दर्भ बिहार मिड डे मील कांड

बहुत दुखी हूँ आज, इसलिए नहीं कि बच्चे मर गये इसलिए कि इन सबने और मैंने भी उन बच्चो को मार डाला.
देश मे भोजन का अधिकार का एक बड़ा अभियान चल रहा है कई देशी विदेशी संस्थाओं के रूपयों से. हमारे सुप्रीम कोर्ट मे दो जज हर्ष मंदर और एन सी सक्सेना सालों से जमे बैठे है कि कैसे लोगों की गरीबी भूख को मिटाया जाये, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुधारा जाये, इन दों को सहयोग देने के लिए हर राज्य मे सलाहकार है. मेरा सीधा सवाल है कि ये सब लोग क्या कर रहे है? सिवाय अंतरिम आदेश निकलवाने के, आंकड़े बाजी करने और अपनी व्यक्तिगत छबि बनाने के और हर्ष मंदर तो सिवाय कॉलम लिखने के क्या कर रहे है ? क्यों ना इन सबके कार्य और इतने वर्षों के खर्च लेखा जोखा लिया जाकर इनके नियुक्तियां भंग की जाये? सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेते हुए इनसे पूछे कि इनका इस तरह की व्यवस्थाओं को सुधारने मे क्या योगदान है और यदि ये सिर्फ सर्वे, आंकड़ेबाजी, आलेख, शोध पत्र, टीवी पर लाईव बहस (जिसका पारिश्रमिक भी मिलता है) एनजीओ और सब वही गोलमाल कर रहे है तो इन्हें ना तो पद पर रहने का हक है ना ही कोई बहस कर ज्ञान बांटने का. मुझे याद पडता है हर्ष मंदर और एनसी सक्सेना से लेकर मिहिर शाह, अरुणा रॉय, प्रो ज्याँ दे रीज, अमर्त्य सेन से लेकर एक बड़ा गेंग भी इस तरह के बड़े काम मे शामिल है जो सिर्फ और सिर्फ ज्ञान बाँट रहा है, रूपये और नाम कमा रहा है, काम क्या कर रहा है नहीं मालूम......मै बहुत गंभीरता से यह प्रश्न उन मासूम बाईस बच्चों की चिताओं को जलता देखकर उठा रहा हूँ, शायद लोगों को जानकारी ही नहीं है कि सरकार ने या सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के बड़े प्रभावशाली लोगों को नियुक्त कर रखा है और ये लोग देश भर मे और ज्यादातर विदेशों मे देश की भूख, गरीबी, कुपोषण, मध्यान्ह भोजन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के बारे मे सिर्फ कार्यशालाएं करते फिरते है और अपने शोध पत्र अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छपवाते रहते है मोटा पारिश्रमिक वसूलते है और चांदी काट रहे है. ज़रा पूछा जाये इनसे इन बच्चों की मौत का हिसाब क्या कोई तर्क है इनके पास हाँ हवाई जहाज मे जाकर एक बढ़िया सी रपट फ़िर दे देंगे EPW मे ...........धिक्कार है तुम सब पर ........दूकान चलाना बंद करो जितने दोषी वो सब है- नेता और कर्मचारी, उनसे ज्यादा दोषी तुम सब हो हर्ष मंदर, एनसी सक्सेना और तुम्हारी पूरी टीम......
जब देश मे न्यायपालिका जनहित मे इतने फैसलें ले रही है तो क्यों नहीं सुप्रीम कोर्ट मे बैठे भोजन के अधिकार को लेकर काम करने वाले हर्ष मंदर और एन सी सक्सेना सीधे जाकर प्रधान न्यायाधीश से मिलते है और मांग करते है कि दस साल पुरानी याचिका पर कोर्ट फैसला सुनाये और मामला खत्म करें ताकि सरकार नियम - कायदे बनाकर अमल शुरू करें उसमे भी कम से काम पांच साल लगेंगे, पर सवाल यह है ना कि माले मुफ्त और बाकि सुविधाएँ खत्म हो जाने का खतरा तो इन दोनों को भी होगा और फ़िर इनके साथ दिल्ली दफ्तर मे बैठे कंसल्टेंट की फौज जो हवाई जहाज से नीचे कदम नहीं रखती, सुकुमार जो ठहरे सब और विश्व सुंदरियां है वहाँ , साथ ही हर प्रदेश मे बैठे सलाहकारों की भी हालत खराब हो जायेगी.
बिहार का मिड डे मील का कांड हम सबकी सामूहिक विफलता का प्रतीक है जबसे हमने अपनी सारी चिंताए और विश्वास सरकार रूपी तंत्र और उनसे जुड़े भ्रष्ट मक्कार कर्मचारियों पर छोड़ दिए है अब हालात इसी तरह और बिगडेंगे. हम चाहते है एक र्रोपया किलो गेंहू खाकर हम अपनी बीबी को गर्भकाल मे आंगनवाडी का भूसा खिलाएं, फ़िर मनरेगा की मजदूरी से उसे नौ माह पाले, जननी वाहन मे बिठाकर चौदह सौ रूपये लेकर बच्चा घर लाये और फ़िर उसी आंगनवाडी का कुपोषित भोजन उस बच्चे को करवाए, फ़िर निशुल्क पाठ्यपुस्तकें लेकर और सायकिल, गणवेश और मिड डे मील खाकर हमारी संताने कमजोर बने और फ़िर यह "लाईफ सायकिल" यूँही चलता रहे अब सरकार को श्राद्ध और करने की व्यवस्था करना चाहए ताकि बची-खुची स्वर्ग मे स्थान पाने की हसरतें भी पूरी हो जाये. शर्म कहाँ है??? क्या हमारी आँखों का पानी सूख गया है या इतने बेगैरत हो गये है हम कि इन नालायक नेताओं, ब्यूरोक्रेट्स, टुच्चे कर्मचारियों और घटिया एनजीओ की चालें भी नहीं समझ सकते या जान बूझकर मख्खी निगल रहे है और देश...........अरे मर गया देश ज़िंदा रह गये तुम..........
संदीप नाईक

Saturday, July 13, 2013

मिल्खा सिंह -एक जीवित किवदंती की अप्रतिम गाथा







यह एक  त्रासदी की कथा है जो सिर्फ ना मात्र विश्व के एक बड़े भू भाग ने झेली है बल्कि उसके दंश अभी भी यहाँ - वहाँ देखने सुनने को मिल जाते है. एशिया के एक बड़े शक्तिशाली मुल्क का दो हिस्सों में बंटना और फिर उस त्रासदी के होने की पीड़ा को समुदाय विशेष ने भुगतना और इस सबसे ज्यादा इस विस्थापित समुदायों की भावना और हूनर को अपने वजूद के लिए स्थापित करने की कहानी भारत पाकिस्तान जैसे दोनों मुल्कों में भरी पडी है. बिरले होते है जिन्हें यश मिलता है और उनकी कीर्ति पताकाएं दूर - दूर तक पहुँचती है. दर्द सिर्फ यह नहीं है कि विस्थापन या अपनों से बिछड़ने की पीड़ा यहाँ दर्ज है, यहाँ दर्ज है अपनों को अपनी आँखों के सामने मरता देखने की , यह देखने की सब कुछ होने के बावजूद भी कुछ ना कर पाने की बेबसी है और इस सबमे एक पिता का चीत्कार है भाग मिल्खा भाग……… 

हिन्दी फिल्मों  का परिदृश्य इन दिनों बहुत सुलझा हुआ है और अब निर्देशकों को यह अच्छे से समझ आ गया है कि प्रेम मोहब्बत, ह्त्या, सुपारी नायकों का ज़माना चला गया है अब यहाँ हकीकत से जुडी फ़िल्में ही चलेंगी चाहे वो राँझना हो, लूटेरा जैसी फ़िल्में हो या पान सिंह तोमर जैसी या भाग मिल्खा भाग. क्योकि इन सात दशकों में हमारा दर्शक बहुत मैच्योर हुआ है इस बात में कोई शक नहीं है, अब सवाल यह है कि तमाम तरह के पाईरेटेड सीडी के आरोप आदि लगाने के बाद भी महंगे पीवीआर में दर्शक की जेब ढीली करने के लिए आपको बहुत वस्तुनिष्ठ फिल्म बनानी पड़ेगी चाहे वो डर्टी जैसी फिल्म क्यों ना हो . 

मिल्खा की  यह फिल्म जहां पंजाब के परम्परागत वातावरण को बेहद खूबसूरती से उकेरती है, अल्हड प्रेम, कस्बें के प्रेम को भी संजीदगी से व्यक्त करती है जिसे राँझना, लूटेरा या तनु वेड्स मनु में व्यक्त किया गया था. यह फिल्म गाँवों में फ़ैल रही बेरोजगारी और फिर फौज जैसी संस्था के विकल्पों पर भी बात करती है खासकर पंजाब जहां अमूमन हरेक घर से एक सदस्य भारतीय फौज में है। मजेदार यह है कि देश में इतने बड़े - बड़े संस्थान आजादी के बाद से खेलों के विकास के लिए काम कर रहे है, एशियाई खेलों की हम मेजबानी कर चुके है, रेलवे से लेकर सभी बड़ी संस्थाओं में खेल कोटे से खिलाड़ी भर्ती होते है और खेलते है पर भारतीय फौज ही वो जगह है जहां असली समझ, विकास होने की गुंजाईश अभी भी बनी हुई है, चाहे वो पानसिंह की बात हो या मिल्खा की या नए सन्दर्भों में विजेन्द्र की या हमारे शूटर्स की, इस बात के मद्देनजर रखते हुए बनाई गयी यह फिल्म बेहद खूबसूरती से कोच की भूमिका मेहनत संवेदनाएं, प्रोत्साहन और अवसर देने की बात करती है जो सिर्फ भारतीय फौज में ही है, जो कि प्रशंसनीय है. यह बात स्टेट बैंक, रेलवे, या दीगर बड़े कारपोरेट कभी नहीं समझ पायेंगे और वे भी नहीं जो सचिन या धोनी जैसे खिलाड़ियों को मात्र रूपया देकर अपने ब्रांड एम्बेसेडर बना लेते है. 

यह फिल्म  इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योकि विस्थापित परिवार से आये एक सरदार जिसे अपने को स्थापित करने के लिए कोयला चोरी, डकैती, मारा पीटी से लेकर सब कुछ सहना पड़ता है वह प्रेम में असफल होकर कुछ करने की तमन्ना से बाहर निकलता है और फौज में आकर उसे अपना मकाम मिलता है. और अंत में वो दुनियाभर में अपना नाम कमाता है और देश का भी नाम कमाता है. 

मिल्खा सिंह  की तीन असफल प्रेम कहानियां, संघर्ष, पारिवारिक त्रासदी, प्रतियोगिता, सहयोगीयों का घटियापन, और अंत में अपनी मिट्टी में यादों का वह बिखरता हुआ स्वप्न जहां मौत का तांडव उन्होंने देखा है, वह सच में दुखद है निर्देशक ने जिस अंदाज से यह सब एक छोटी सी कहानी में ढाई घंटे में समेटने का प्रयास किया है वह सच में काबिले तारीफ़ है. एक लम्बे समय फलक को पकड़ना और बांधे रखना बहुत ही मुश्किल और चुनौती भरा कार्य है पर सिर्फ इतना कि निर्देशन संगीत और डायलाग डिलेवरी से यह फिल्म सिर्फ एतिहासिक नहीं बल्कि एक जीवंत सन्दर्भ भी बन गयी है. आने वाला समय इस बात का साक्षी होगा कि किसी भारतीय निर्देशक ने एक ऐसी फिल्म बनाई है और यह भी कि कि आने वाली पीढियां विश्वास नहीं करेगी

मेरी नजर  में यह फिल्म आने वाले वर्ष के सभी पुरस्कार अर्जित करेगी बल्कि आस्कर अवार्ड के लिए भी नोमिनेट होगी। जरुर देखिए

Sunday, July 7, 2013

Two Faces of Same Coin


And yes I agree with Sandip Naik, which in any case I always does, - Girish Sharma on Lootera











This is the movie which can simply be termed as a sonnet on celluloid. It wont be an exaggeration if i term it as mozarts symphony. And yes i agree with sandip naik, which in any case i always does, when he says you ought to have lots of patience while watching this movie. The directors command is palpable in each and every frame. After coming out of the spell, which does takes a lots of time.....142 mins is the running time, i am wondering .... Is she the same sonakshi sinha of dabang fame and is he the same ranveer singh of band baja baraat fame. Definitely hours must have gone into finalizing the cast for this movie. Old world charm has been created by the master with such an ease and elan, that you are simply lost in the maze of emotions. And then refuse to come out even when the lights are switched on. This film makes you realise the power of love, sacrifice, and the seamless thread which bind all the human beings. Nature is on for full visual display in this movie....every frame is colour riot, blue green brown red white.....


And your heart just goes for the main protagonists....sonakshi and ranveer equally vying for your attention and then you give them cent percent for their portrayal of the character. The boundary between the actor and the character just disappears from the reel one by the able work of the master. Movie will make you yearn for more and more, you heart will cry out to reach to the characters and you would simply like to embrace them, for they define love, passion and compassion. Also in the end you will discover that the corner of your eyes are wet. Ending although sorrowful but the painting by ranveer makes dying sonakshi smile and laugh.....brings a certain fulfillment and closure for both the characters but the audience thirst remains un-quenched. And before entering the theater just dont forget to carry your heart and also you need to have heart in the right place. For a connoisseur its an avant garde collection along with Ranjhana. Highly recommended for all those who have ever fallen in love. Hats off to the director Vikramaditya Motwane.

अनुपम मिश्र के तालाब हर समस्या का समाधान कतई नहीं है

पिछले दिनों अनुपम मिश्र जी को सुना ​उनका पानी बचाने का अभियान, राजस्थान के तालाबों पर काम समझा और "आज भी खरे है तालाब" जैसी किताब को भी पढ़ा है दर्जनों बार सन्दर्भ के रूप में इसे इस्तेमाल भी किया है.  पर एक बात मुझे समझ नहीं आती कि अनुपम जी क्यों राजस्थान के जैसलमेर के माडल को सारे देश पर लादना चाहते है? जैसलमेर की परिस्थितयां चार सौ साल पहले भी देश के बाकी हिस्सों से अलग थी और आज भी बिलकुल अलग है. तालाब बनाना पानी की समस्या का स्थाई और सामान्य  हल नहीं है यह बात हमें गाँठ लेनी चाहिये. आज पानी की जरूरतें ना मात्र बदली है बल्कि पानी बचाने के नए तरीकों पर भी खुलकर बात करनी होगी, और मेरी समझ में वरिष्ठता को और गांधीवादी समर्पण को छोड़ दे तो हमें अपने तईं पानी बचाने के नए माडल आधुनिक जरूरतों के हिसाब से तय करना होंगे, अब समय बदल गया है, खेती के लिए जमीन नहीं बची है, रहने के लिए आशियाने नहीं बन रहे, रेल और सडकों का जाल बुना जा रहा है, हर जगह फोर लेन - सिक्स लेन  का प्रचलन बढ़ा है जो कि समय की मांग भी है और जायज भी है. कहाँ है तालाबों के लिए जगह, बेहतर होगा कि हम अतीत के गुणगान छोड़कर आज के समय की सुध ले. दूसरा मैंने कई भू वैज्ञानिकों से बात की कई साथियों ने बताया कि राजस्थान के तालाब और जमीन की बात अलग है यहाँ मप्र, उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे राज्यों में वह माडल रेप्लीकेट नहीं हो सकता. खुद अनुपम जी इस बात को जानते होंगे और सिर्फ अनुपम जी क्यों पानी वाले बाबा यानी राजेन्द्र सिंह जी भी इस बात को जानते होंगे पर अब चूँकि वे एक लम्बे समय से राजस्थान के परम्परागत माडलों का बखान कर रहे है तो नया कैसे दिखाएँगे और दर्शायेंगे ? मै इन दोनों महापुरुषों के काम में पुरी श्रद्धा रखता हूँ और उनके काम का सम्मान भी करता हूँ पर मेहरबानी करके अब बंद कीजिये और नए सन्दर्भ में नई बात कीजिये, हमारे सामने बड़े बाँध, बड़ी नहरें है जो लाख विरोध के बाद बन ही गयी है, बिजली बन ही रही है राजनैतिक इच्छा शक्ति के कारण देश के अधिकतर राज्य अब सभी जिलों में चौबीसों घंटे बिजली देने को कृत संकल्पित भी है तो मुझे लगता है की राजस्थान के अतीत का गौरव गान बंद करके नया कुछ सृजित करें।  सिर्फ नर्मदा, गोदावरी या यमुना पर आधारित हमारे घर, उद्योग धंधें, और खेती के लिए  पानी बचाने के नए प्रयोग करें और इन्हें जन मानस में फ़ैलाये. सिर्फ अपने भव्य आभा मंडल में बैठकर पुराने अतीत का राग गाने से काम नहीं चलेगा.  दूसरा हमें यह भी देखना होगा की जमीन,  चट्टानें कैसी  है,  क्या ये पानी को धंसने, रोकने और नई आव आने देने के लिए उपयुक्त है? अगर हाँ तो हम सामान्यीकरण करें अन्यथा हर जगह के लिए वहाँ की परिस्थिति को समझ कर हमें वैलाक्ल्पिक मार्ग खोजना होंगे . देवास जिले में सात आठ बरस पहले तत्कालीन जिलाधीश उमाकांत उमराव ने रेवा परियोजना में सभी किसानों को प्रोत्साहित किया था कि  वे अपने तालाब में एक छोटा तालाब बनाए और बरसात का पानी संगृहीत करें, पुरे जिले में किसानों ने अपने पसीने की कमाई से  लगभग चालीस हजार तालाब  जोश में आकर बनाए थे परन्तु कालान्तर में अधिकाँश तालाब ढह  गए क्योकि पुरे जिले में जमीन, चट्टान और पानी सोखने  की क्षमता अलग अलग थी, आज बमुश्किल चार-पांच हजार तालाब बचे  होंगे पुरे जिले मे. अगर एक जिले की जमीनी हकीकतें इतनी अलहदा है तो हम कोई  माडल, वो भी राजस्थान का, कैसे पुरे देश पर लागू करने की बात कर सकते है? भावुक होकर समर्पण भाव से मूल्यों को ध्यान में रखकर सुनना बोलना अच्छा लगता है पर तालाब हर समस्या का समाधान कतई नहीं है यह हमें जल्दी समझ लेना चाहिये. 

Saturday, July 6, 2013

"​लूटेरा" एक नायाब फिल्म है जिसे बाबा नागार्जुन की कविता और ओ'हेनरी की कहानी ने अप्रतिम बना दिया है.

​"​लूटेरा" एक नायाब फिल्म है जिसे बाबा नागार्जुन की कविता और ओ'हेनरी की कहानी ने अप्रतिम बना दिया है. 

कई दिनोँ तक चूल्हा रोया,
चक्की रही उदास,
कई दिनोँ तक कानी कुतिया ​सो​ई उसके पास,
कई दिनोँ तक लगी भीत पर छिपकलियोँ की गश्त,
कई दिनोँ तक चूहोँ की भी हालत रही शिकस्त ।
दाने आए घर के अंदर कई दिनोँ के बाद,
धुंआ उठा आंगन से ऊपर कई दिनोँ के बाद,
चमक उठी घर भर की आंखेँ कई दिनोँ के बाद,
कौए ने खुजलाई पांखेँ कई दिनोँ के बाद ।

-बाबा नागार्जुन

बस थोड़ा धीरज चाहिए क्योकि स्पीड काफी धीमी और बहुत कम कलाकार है . पर सोनाक्षी और रणधीर के अभिनय ने इस फिल्म को एक ऐसा विस्तार दिया है कि यह फिल्म ना चाहते हुए भी आपके मस्तिष्क में लम्बे समय तक बनी रहेगी . डलहौजी की खूबसूरत वादियाँ और  जमींदारी प्रथा, बंगाली संस्कृति और परम्पराएं, अपराध और छोटे कस्बों में पुलिस का रोल, ​प्रेम में समर्पण,  और फिर सबसे ज्यादा एक गति जो पूरी  फिल्म में इतनी धीमी है मानो हम कही किसी कोने में अपनी छाती पकडे धैर्य और कौतुक से आगे के घटनाक्रम को महसूस करना चाहते है और जिसे अंग्रेजी में एंटी सिपेशन कहते है, करते हुए निदेशक हमें ठीक उसी और ले जाता है जहां हम जाना चाहते है. विवेक मोटवानी का निर्देशन कही भी ढीला नहीं होता, बस शायद कुछ लोगों को लग सकता है कि यह एक कसी हुई फिल्म नहीं है पर जिस कोमलता से बाबा की कविता से यह फिल्म शुरू होती है वह ओ'हेनरी की कहानी पर जिस अंदाज में ख़त्म होती है वह बेहद दुखी करने वाला है. फिल्म  में गीत ठीक ठाक ही है, दृश्य बहुत सुहाने है और दिल करता है मानो एक बार तो कम से कम जीवन में डलहौजी के उस हसीन दिलकश नजारों में  डूब के आया जाए और फिर कही से खोजा जाए एक ऐसा पेड़ जिसकी पत्ती से जीवन सांस लेता है. लूटेरा एक शब्द है जो आख़िरी में आपका दिल लूट लेता है और जब तक आप सम्हालते है वो आपको अमन चैन भी ले जाता है. रणधीर का अभिनय सोनाक्षी से ज्यादा संजीदा है और जिस मासूमियत से वो अंत में सोनाक्षी के साथ रहकर उसकी सेवा करके उसे एक नया जीवन देता है, अपने जीवन की सबसे खूबसूरत पेंटिंग बनाता है वह उसे अमर बना देता है.  लूटेरा एक फिल्म ही नहीं, अपने समय के विक्षप्त समय में खोते जा रहे प्रेम, समर्पण और मजबूरी की दास्तान है. एक ऐसी दास्ताँ जिससे हम आप रोज़ दो चार होते है और जीवन ढोने के क्रम में बदस्तूर ढोते  जाते है.  अगर थोड़ी बहुत भी संवेदनाएं है तो यह फिल्म देखी जानी चाहिए क्योकि राँझना प्रेम की अलग भूमि पर निहायत ही अप्रतिम फिल्म है जो तेजी से हेपनिंग वाली फिल्म है वही लूटेरा एक मद्धम ताल पर धीमें  धीमे चलते हुए ठीक भैरवी की तरह ख़त्म होती है जहां मंच पर बैठे कलाकारों की आपसी जुगल बंदी एक स्थायी प्रभाव छोड़ती है. और उठाते समय हर दर्शक इतना सन्न रह जाता है कि उसे समझ नहीं आता की क्या हो गया और क्या किया जाना है. मेरी राय में एक बार जरुर देखिये बस थोडा धैर्य कही से खरीदकर ले जाईयेगा. 

Wednesday, July 3, 2013

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ - मज़ाज

रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 



दिल मे एक शोला भड़क उठा है आख़िर क्या करूँ
मेरा पैमाना छलक उठा है आख़िर क्या करूँ
ज़ख़्म सीने का महक उठा है आख़िर क्या करूँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

मुफ़्लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
सैकड़ों चन्गेज़-ओ-नादिर हैं नज़र के सामने
सैकड़ों सुल्तान जाबर हैं नज़र के सामने

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

ले के इक चन्गेज़ के हाथों से ख़न्जर तोड़ दूँ
ताज पर उस के दमकता है जो पत्थर तोड़ दूँ
कोई तोड़े या न तोड़े मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

बढ़ के इस इन्दर-सभा का साज़-ओ-सामाँ फूँक दूँ
इस का गुलशन फूँक दूँ उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ
तख़्त-ए-सुल्ताँ क्या मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

जी में आता है ये मुर्दा चाँद-तारे नोच लूँ
इस किनारे नोच लूँ और उस किनारे नोच लूँ
एक दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूँ


मुन्तज़िर है एक तूफ़ान-ए-बला मेरे लिये
अब भी जाने कितने दरवाज़े हैं वा मेरे लिये
पर मुसिबत है मेरा अहद-ए-वफ़ा मेरे लिये

ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ

Tuesday, July 2, 2013

समर्थ चौधरी - सच में उसमे बहुत हिम्मत है, उसके जज्बे को सलाम.

Needs urgent support from various Associations, Clubs, Individuals, Media and Trusts for the young enthusiastic youth of Dewas who lost his both the legs in an accident held on 20 June 2013. He is admitted in Bombay Hospital Indore and going through surgeries, his condition is very critical. Friends, I and his family members are collecting donation from all possible ways,. It will be a great help if any one of you could also contribute and support this young boy of 19 yrs old and his family. 

कल बाम्बे हास्पिटल इंदौर में समर्थ चौधरी को देखने गया था समर्थ इंदौर में पढ़ रहा है २० जून को इंदौर से देवास आते समय ट्रेन में उतरने की हडबडी में उसके दोनों पाँव कट गए और अभी हालत बहुत खराब है. पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं है उसके दोस्त मदद कर रहे है चन्दा जमा कर रहे है अस्पताल प्रबंधन ने कुल खर्च अभी चार लाख का बताया है जो बढकर सात लाख तक भी पहुँच सकता है. युवा समर्थ अब अपाहिज हो गया है जो बेहद दुखद है हालांकि जयपुर फुट और आदि विकल्प मौजूद है पर तब तक समय लगेगा अभी तो उसे इलाज दवाईयां और कई प्रकार की मदद की जरुरत है जो उसके परिवार की आर्थिक स्थिति में नहीं हो सकतॆ. यदि आप में से कोइ मदद कर सके या किसी संस्था, या व्यक्ति को जानते हो तो कृपया मुझसे संपर्क करें या दिए गए मोबाईल पर संपर्क किया जा सकता है, आपकी एक छोटी सी मदद भी समर्थ को समर्थवान बनायेगी आपकी और यह युवा देख रहा है. कृपया जरुर कर सके तो करें

नवीन उपाध्याय : +91-898989-7929
राहुल वागड़े : +91-89894 -20947
+91- 94259-19221


AMIT CHOUDHARY
DENA BANK
Saving A/C No - 118510026571
IFSC Code - BKDN0811185


or you can deposit in my Saving A/C of
SANDIP NAIK
ICICI Bank Ac No 629401518977
Nehru Place branch New Delhi.

समर्थ को इंदौर के बाम्बे अस्पताल में देखकर आ रहा हूँ अभी उसकी हालत वैसे तो ठीक है परन्तु अभी दो तीन आपरेशन होना बाकी है. उससे बात करने जब पहुंचा तो उसका ड्रेसिंग चल रहा था और उसकी चीखें पुरे वार्ड में गूँज रही थी, पाँव जितने दुर्घटना में कटे थे अस्पताल ने इन्फेक्शन को देखते हुए और छोटे कर दिए है और दाए पाँव में अभी घाव बढ़ रहा है इसलिए शायद डाक्टर और छोटा कर दे इस पाँव को फिर से. समर्थ से बात करते हुए मैंने कहा कि बाहर बहुत सारे लोग तुम्हारे लिए प्रार्थनाएं कर रहे है मदद कर रहे है और दूर दूर से साथी लोग तुम्हे वापिस देवास में अपने घर पर देखना चाहते है. मैंने कहा कि जिस हिम्मत से तुमने सारा सम्हाला है और आई सी यु से बाहर आकर स्वस्थ हो रहे हो यह काबिले तारीफ़ है चूँकि समर्थ को फिल्मों का शौक है इसलिए मैंने उसे कहा "जल्दी आ जाओ देवास ताकि हम सब मिलकर राँझना फिल्म देखने चले. वो बहुत धीमे से मुस्कुरा दिया. दोस्तों आपकी मदद भी चाहिए और मदद से ज्यादा दुआएं, हम सब लोग उसके घर वापिस आने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे है. कई डाक्टरों से मैंने बात की है, सच में उसमे बहुत हिम्मत है, उसके जज्बे को सलाम.