Wednesday, June 26, 2013

हरिशंकर परसाई कहिन

तमाम झूठे विश्वासों, मिथ्याचारो, कर्मकाण्डो , तर्कहीन धारणाओ , पाखंडो, को कंठ में ऊँगली डाल -डाल कर और पानी भरकर उलटी करानी पड़ती है , तब धरम की अफीम का नशा उतरता है । अगर यह न किया जाए आदमी जहर से मर भी सकता है ।


हम जब दुःख भोगते है , तब दुसरो से उस दुःख की मान्यता चाहते है । जब यह मान्यता मिलती है , तो दुःख में भी हम गर्व का अनुभव करते है । कोई भोगे, और उसका भुगतना अनदेखा चला जाए , तो उसका दुःख दुगना हो जाता है.
हरिशंकर परसाई

सावधान रहे, सचेत रहे, हम सब बहकाने और बहकने मे माहिर है.....


निकला जा रहा है दम यहाँ हर दिन हर पल और आप है कि अपनी रोटियां सेकने मे लगे है, सेकुलर और ना जाने कौन कौन से सिद्धांत याद आ रहे है आपको, समझ नही आता कि जो जवान बचा रहे है वे भी जब मरने के कगार पर है तो आपको हो क्या गया है कोई वहाँ जाये या ना जाये इससे हमें क्या, जब एक आदमी मरता है किसी तंत्र की लापरवाही से तो समूचे विकास और मानवता पर प्रश्न उठते है महामना पर आप को कोई इस बात से फर्क नहीं पड़ रहा..... कब तक विनाश का मंजर देखेंगे और हवाई खूबसूरती का जश्न मनाते रहेंगे...... "बस कीजिये आकाश मे नारे उछालना" - याद आ गये दुष्यंत कुमार........

बंद कीजिये मोदी, राहुल, बहुगुणा और तमाम तरह के आत्मप्रचार वाले, दुष्प्रचार करने वाले नारे उछालना और अपने तक ही सीमित रखिये अपनी घटिया सोच और उस आदमी के बारे मे सोचिये जो मर रहा है, उन लोगों के बारे मे सोचिये जो वही रह जायेंगे एक अभिशप्त जीवन जीने को, जिनके पुरखे वहाँ सदियो से रहते आये है. नीचे वालों को तो जैसे तैसे सेना उतार लायेगी, राज्य सरकारे अपने प्रदेश के लोगों को अपनी संकीर्ण मानसिकता के चलते और वोट बैंक का सहारा लेकर उतार लायेगी, गोदी मे बिठाकर घर भी छोड़ देगी, मुआवजे की रोटियां फेंक देगी निराश्रितों की तरह से, पर जो लोग वहाँ के है, जिनका सब कुछ बर्बाद हो गया जिनके मूक पशु बह गये, जिनके जीवन की गृहस्थी का थोड़ा सा सामान था उनकी संपत्ति के रूप मे वह भी तो बह गया पानी मे, जिनके टापरों पर पत्थर गिर पड़े उनके सामने क्या है, जिनके बच्चों, बुजुर्गों के बारे मे हमारा बिकाऊ मीडिया कुछ नहीं कह रहा, जहाँ के संसाधन नष्ट हो गये, जहाँ की सारी व्यवस्थाएं चरमरा गई है, प्रशासन ठप्प हो गया है, सारे रिकार्ड और जरूरी कागजात नष्ट हो गये, जहाँ धनलोलुप पंडे और ब्राहमण मरे हुए इंसानों की जेब से और मृत शरीरों से धन और जेवर चुरा रहे है ऐसे मे कौन से मूल्य भी शेष रह गये है, ज़िंदा इंसानों की चिता करने के बजाय जहाँ यह बहस हो रही हो कि केदारनाथ की पुजा की जाये या नहीं और उसकी मूर्ति किस दिशा मे हो, बेहद शर्मनाक है !!! घीन आती है कि हम इक्कीसवीं सदी मे रह रहे है, और हमारे पास शिक्षा के बड़े बड़े मंदिर है जो यही सिखा रहे है कि विपदा के समय हम मूर्तियों की चिंता करें बजाय लोगों की !!! यही संविधान मे वैज्ञानिक मानसिकता का प्रचार-प्रसार है जो हमने गत लगभग सात दशकों मे किया है ??? क्या ये लोग इस वैज्ञानिक और सूचना तकनीकी के युग मे भी महादेवी वर्मा के अप्रतिम निबंध मे आये चरित्रों की तरह अब वे फ़िर से "सुई दो रानी डोरा दो रानी" की हुंकार लगाएंगे हर आने-जाने वाले से ?

अगर आप कुछ नहीं कर सकते तो कृपया शांत रहे. घर मे फिल्म देखे और बरसात का मौसम है जी भर कर के भुट्टे का किस खाए, पकौड़े खाए, जाना पाँव चले जाये, अपने परिजनों के साथ बरसात के नजारें देखे, और ऐश करें- पर यहाँ -वहाँ घटिया राजनीती ना करें, आने वाले इतिहास मे आपको कोई कूछ नहीं कहेगा आपका नाम भी स्वर्णाक्षरों मे लिखा जाएगा कि आप आपदा के समय शांत थे और कोई अपराध मे आपको नहीं सजा नहीं दी जायेगी......मेहरबानी करके देश का साथ दीजिए.... किसी पप्पू, फेंकू या पार्टी का नहीं, नजर रखिये उन लोगों पर जो इन पीड़ितों के नाम पर आपके घर से रूपया कपडे और अनाज ले जा रहे है हाल ही मे इंदौर मे एक सांसद ने एक मंत्री और एक विधायक पर उत्तराखंड के नाम पर रूपया वसूल कर जेब मे रखने का खुले आम आरोप सार्वजनिक मंच से लगाया है, क्या आप कही ऐसे किसी संगठित गिरोह के शिकार तो नहीं हो रहे, क्या आप किसी फर्जी एनजीओ के नाम पर तो अपना धन या सामग्री नहीं दे रहे?

सावधान रहे, सचेत रहे, हम सब बहकाने और बहकने मे माहिर है......

Tuesday, June 25, 2013

"प्रार्थना के शिल्प में नहीं" - देवीप्रसाद मिश्र

यह सिर्फ एक कविता नहीं है बल्कि एक समूची परम्परा को ठुकराकर नया कुछ सोचने और करने को भी उद्वेलित  करती है देवीप्रसाद मिश्र की यह कविता. आप इसे जितनी बार पढेंगे यह आपको नए अर्थ और नए प्रसंग देगी … वर्तमान  सन्दर्भ में देवभूमि और नेताओं के दौरों से देखा जा सकता है . भाई  Avinash Mishra शुक्रिया 



"अस्वीकार की अनन्य"

इंद्र, आप यहां से जाएं 

तो पानी बरसे

मारूत, आप यहां से कू़च करें

तो हवा चले

बृहस्पति, आप यहां से हटें 

तो बुद्धि कुछ काम करना शुरू करे

अदिति, आप यहां से चलें

तो कुछ ढंग की संततियां जन्म लें

रूद्र, आप यहां से दफा हों

तो कुछ क्रोध आना शुरू हो

देवियो-देवताओ ! 

हम आपसे जो कुछ कह रहे हैं
प्रार्थना के शिल्प में नहीं

.- देवीप्रसाद मिश्र 

Sunday, June 23, 2013

राँझना एक अप्रतिम फिल्म है

राँझना एक अप्रतिम फिल्म है जिसमे बेहद साधारण सूरत सीरत वाले धनुष ने ना मात्र खूबसूरती का भ्रम तोड़ा है बल्कि जिस तरह से पुरी  फिल्म में बनारस उभरकर आता है बार बार, वह भी दर्शाता है कि फ़िल्में सिर्फ बड़े शहरों की बपौती नहीं विदेशों की भी नहीं बल्कि छोटे कस्बे, नए उभरते शहर और बहुत साधारण लोग जिनकी सांसों में शहर वहाँ की भाषा मुहावरें और परम्पराएं बसती है वो भी एक अच्छी फिल्म दे सकते है. ठीक इसके साथ जे एन यु की समूची शिक्षा, वामपंथ की दोहरी घटिया चालें, अवसरवाद, मौकापरस्ती, अस्तित्व का संघर्ष, और स्व का इस हद तक बढ़ जाना कि वह अहम् किसी की या किसी बहुत अपने की जान लेने का भी परहेज नहीं करता। यह जे एन यु के बहाने देश में चलने वाली तमाम तरह की गतिविधियाँ, चाय, गंगा ढाबे की चुहल, नुक्कड़ नाटक, युवा महत्वकांक्षाएं और सत्ता के करीब रहने का लगाव है. यह फिल्म हजार ख्वाहिशे की याद दिलाती है कि कैसे बदलाव अब जालंधर से नहीं दिल्ली से होकर आता है यानी गाँव कही भी हमारे परिवर्तन में शामिल नहीं है.  भट्टा परसौल की एक झलक के बहाने से एक साधारण बुद्धि वाले आदमी की समझ को दर्शाया गया है. सबसे महत्वपूर्ण जो मुझे लगा कि किस तरह से आधुनिक राजनीती में महिलायें आगे आई है और घर परिवार अपना प्यार और जीवन तक दांव पर लगाकर अपने ही लोगों की ह्त्या करने पर आमादा हो जाती है. दिल्ली की मुख्यमंत्री के बहाने और जोया (सोनम कपूर) दोनों महिलायें है जो अपने हितों की खातिर ना सिर्फ दूसरों का इस्तेमाल करती है बल्कि आख़िरी में शर्मसार भी होती है पर तब तक वे सब खो चुकी होती है, सही कहा है स्त्री चरित्रं देवो ना जानापी कुतो मनुष्य ? राँझना एक अदभुत फिल्म है जो पिछले बीस बरसों में आयी अपने तरह की अदभुत फिल्म है जिसे बार बार दखा और समझा जाना चाहिए वर्तमान सन्दर्भों में यह सिर्फ एक फिल्म नहीं वरन भारतीय समाज के बदलते हुए चरित्र का एक हिस्सा है जहां धर्म, बदलाव, वामपंथ, शिक्षा, स्त्री मुद्दें, भाषा, नदी, सभ्यता, संस्कृति, राजनीति पर भट्टा  परसौल के बहाने आज के चरित्र का बखूबी चित्रण किया गया है. मेरे लिए सिर्फ इतना ही कि इसे एक बार बहुत तसल्ली से फिर से देखने का मन है.

Thursday, June 6, 2013

उन्मुक्त भाव से अपनी हार स्वीकारें .




कभी हम सोचते है कि वो सब हमें मिल जाए जो हम चाहते है शिद्दत से, परन्तु जीवन में सब कुछ मिलता 

नहीं है महत्वपूर्ण है हार का सामना करने की हिम्मत, वो सब कुछ सह लेने का जूनून जिसे सफलता के 


दायरे में माना ही नहीं जाता… उस हार को बहुत गौर से देखो समझने का पूरा प्रयास करो और फिर देखो 


उसके पीछे उन चेहरों-मोहरों को जो कही ना कही से एक भयानक अट्टाहास कर अपनी विद्रूप हंसी से सारे 


संसार की शान्ति को तहस - नहस कर रहे है… पहचानो इन चेहरों को जो तुम्हे निकट से देखने पर ठीक 


अपने से लगेंगे और बेहद करीबी .बस यही से हार को स्वीकार करो और फिर अपनी सफलता की सीढियां 


तुम्हे नजर आयेंगी बस एक बार, सिर्फ एक बार इन सबको समूल उखाड़ फेंकों जो सिर्फ इस्तेमाल करना 


जानते है और तुम्हे पनपते नहीं देख सकते… बस शर्त यही है कि अपनी हार स्वीकार करने की कड़ी हिमत 


और उनकी वहशत, जुगुप्सा को सहने की शक्ति तुम्हारे पास होना चाहिए, तभी हम इन सबको उजास में 


ला सकेंगे और मुखौटों को निकालकर तेज प्रकाश में इनके बगैर सफलता की गर्वोन्मत्त सीढियां चढ़ सकेंगे 


.आओ हार स्वीकारें, उन्मुक्त भाव से अपनी हार स्वीकारें ...जीवन में कुछ महत्वपूर्ण हो या ना हो पर यह 


महत्वपूर्ण है की हर लड़ाई को लड़ाई के तरीके से लड़ों और यह मानकर चलना कि इस लड़ाई में सबसे 


ज्यादा पंगा अपने ख़ास, करीबी, दोस्तों और सगे सम्बन्धियों से होने वाला है ......बस लड़ते रहो और 


मानकर चलना कि ये हारी हुई लड़ाई है और इसे जब तक लड़ते रहोगे यह चलती रहेगी ठीक ठीक साँसों की 


तरह और जिस दिन हार गए समझो गया जीवन …….

Monday, June 3, 2013

ये गर्मी की एक उंघती हुई लंबी दोपहर है



गर्मी की लंबी उंघती दोपहर कही से कोई हवा का झोंका नहीं, कोई सरसराहट नहीं, कोई हलचल नहीं, कोई आवाज नहीं, एक लंबी चुप्पी, एक खामोश जिस्म, मिट्टी के ढेलो से कुछ गिनने की नाकाम कोशिश और फ़िर दूर कही आसमान में प्रचंड वेग से आती किरणों को लगातार घूरते हुई टक्कर देने की जिद्द और एक लाचारी..........यह दोपहर क्या लेकर जायेगी........? क्या छोड़ जायेगी...? क्या कुछ कह कर जायेगी या यूँही बस गुजर जायेगी...........जैसे बीत गई एक पूरी सांझ और रात कल बिना किसी कोलाहल के और छूट गया इन्ही साँसों का सफर तनहा तनहा .............

Sunday, June 2, 2013

उज्जैन में जाना हमेशा एक सुखद अनुभव होता है 02/06/2013










उज्जैन में जाना हमेशा एक सुखद अनुभव होता है आज ऐसा ही कुछ संयोग बना जब मित्र बहादुर ने बताया कि समावर्तन के कार्यकारी संपादक श्रीराम दवे की षष्ठिपूर्ति संगमनी के रूप में ड़ा प्रभात कुमार भट्टाचार्य जी मना रहे है तो जाने का लोभ संवार नहीं पाया. हम लोग जब पहुंचे तो कार्यक्रम शुरू हो गया था, इंदौर, देवास और उज्जैन से कुल पच्चीस साथी थे, प्रमोद त्रिवेदी, राजेश सक्सेना, सूर्यकान्त नागर, सदाशिव कौतुक, बाबा, ड़ा निवेदिता वर्मा, अक्षय आमेरिया, वाणी दवे, पिल्केंद्र अरोरा, दिनेश पटेल, बहादुर पटेल, मै, विक्रम सिंह, प्रतीक सोनवलकर आदि साथियों को मिलकर अच्छा लगा और सबसे अच्छा लगा कि ड़ा धनञ्जय वर्मा आशीर्वाद देने को स्वयं उपस्थित थे. बाद में अनौपचारिक रूप से सबसे मिले, बेहद आत्मीय और शालीन कार्यक्रम था. कार्यक्रम के बाद हम तीनों अपने परम मित्र मुकेश बिजौले से मिलने पहुंचे और फ़िर मुकेश के नए चित्र देखें जो उन्होंने हाल ही में बनाए थे. फ़िर लंबी बात और चित्रकला के आयामों पर बातचीत और मुकेश के नए चित्रों में गहरे काले रंग के प्रयोग और नई कला पर एक लंबा आख्यान सुना. आखिर में हम हमारे प्रिय कवि और पितृ तुल्य चंद्रकांत देवताले से मिलने उनके घर पहुंचे. दोपहर का समय था लगा कि कही सो ना गये हो पर वे खबर मिलने पर बाहर आये और आत्मीयता से हम तीनों को बिठाया और कहने लगे तीन देवदूत आये और पूछने लगे कि चक्रतीर्थ का रास्ता किधर है बूढ़े (चक्रतीर्थ उज्जैन में श्मशान भूमि को कहते है जहाँ चौबीसों घंटे शव दाह होते है) ..........जाहिर है वो हम तीनों पर तंज कर रहे थे.....खूब सारी बातचीत और अपनत्व, किस्सागोई कोई देवताले जी से सीखे, तबियत थोड़ी नासाज थी. परसों उनकी पत्नी की पुण्यतिथि है सो थोड़े उदास थे, बीपी बढ़ा हुआ था और हालत बहुत कमजोर लग रही थी. पर फ़िर भी एक डेढ़ घंटे हमारे साथ बैठे और मजाक मस्ती में बात करते रहे. कहने लगे कि पहले पता होता तो कचोरी मंगवाकर रख लेता पर अब हमने मना किया कि हम तो आपसे सिर्फ मिलने आये है. मिलकर ऊर्जा तो मिली पर चिंता हो रही है क्योकि इन दिनों काफी बीमार रहने लगे है बाहर जाना बंद कर दिया है, बड़े मुश्किल से भोपाल गये थे इस बीच एक कार्यक्रम के सिलसिले में बस यहाँ तक कि अब वे स्थानीय कार्यक्रमों में भी नहीं जाते है. मैंने पूछा कि क्या कुछ तस्वीरें ले लूं तो बोले नहीं ऐसे मत लो सब डर जायेंगे और जोर से एक ठहाका मारकर हँसने लगे और फ़िर बोले कही तुम तीनों मेरी आवाज तो टेप नहीं कर रहे, एक बार एक कवि ने मुझसे पांच कवियों की आलोचना करवा ली और फ़िर बोला कि अब मै मार्केट में सबको बता दूंगा कि......खैर उनके पास बैठो तो जानकारी के साथ हिन्दी की कविता, कवि और साहित्य की विभिन्न धाराओं पर बेहद रोचक तरीके से सीखने को मिलता है. हाँ, आज उन्होंने मजाक में बहादुर का नाम हिमांशु पटेल, दिनेश का नाम महेश पाटीदार रख दिया और मुझे कहने लगे कि पंडित तुम्हारा नाम क्या है.....मै भूल गया .........फ़िर कहने लगे तुम्हारी कवितायें पढ़ी, अच्छी लगी - लिखते रहो, फ़िर बोले वो बैतुल वाली कूली लडकी दुर्गा कैसी है जिसकी कहानी लिखी थी........फ़िर बोले ये सब लिखोगे तो मै तो पढ़ ही नहीं पाउँगा तुम्हारी थोबडा पोथी से मै वाकिफ नहीं.............बहरहाल वे दीर्घायु हो और सृजनरत रहे इन्ही कामनाओं के साथ हम लौट आये........