Saturday, April 27, 2013

फारबिसगंज की पुलिस क्रूरता और जनसंघर्ष के बीच नीतीश का छ्द्म सेकुलरवाद


सरोज कुमार
बिहार का राजनैतिक खेल देश की राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है। भाजपा के साथ जदयू गठबंधन की गहरी दोस्ती में चल रही उठापटक ने माहौल गरमा दिया। मोदी के रथ पर सवार होने की कोशिश कर रही भाजपा को अपने सहयोगियों के ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इसी में शामिल है सुशासन बाबू की जदयू। कहा तो ये भी जा रहा है कि नीतीश को आगे करने में भाजपा का ही एक धड़ा सक्रिय है। लेकिन फिलहाल इस ओर ना भी जाएं और पूरे घटनाक्रम को सामान्य तरीके से देखें तो भी नीतीश के सेकुलर तिकड़म और सुशासन का खेल साफ नजर आ जाएगा। नीतीश कुमार जिस सेकुलर छवि व मुसलमानों के प्रति प्रेम को जाहिर कर रहे हैं वह फारबिसगंज जैसे मामले में हवा हो जाती है। पिछले दो सालों से अररिया जिले के फारबिसगंज गोलीकांड के पीड़ित इंसाफ व अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन सुशासन बाबू की पुलिस-प्रशासन ने दोषियों की बजाय पीडि़तों के दमन में ही लगातार जुटी हुई है। अब पुलिस ने गोलीकांड में पुलिस की गोली से मारे गए 3 लोगों और मर चुके 3 अन्य लोगों समेत 50 ग्रामीणों पर ही वारंट जारी कर दिया है। हाल ये है कि फारबिसगंज के भजनपुरा गांव के सारे पुरुष भागे फिर रहे हैं। और ये सारे गरीब मुसलमान ग्रामीण हैं। मुसलमानों की बड़ी आबादी वाला जिला अररिया  बिहार के सबसे पिछड़े जिलों में है जहां गरीबी बहुत ही ज्यादा है। लोगों को मूलभूत सुविधाएं भी नहीं मिल पाती।

कैसे भूला जा सकता है मर रहे नौजवान पर कूदती सुशासन की पुलिस को...
अररिया जिले के फारबिसगंज के भजनपुरा गांव में 3 जून 2011 को लोकतंत्र के उस क्रूर प्रदर्शन को कैसे भूला सकता है। कैसे भूल सकते हैं हम कि पुलिस की गोलियों का शिकार हो घायल मुसलिम नौजवान पर नीतीश कुमार की पुलिस का जवान कूद-कूद कर उसे पैरों से रौंद रहा था? आखिर जिसपर जनता की सुरक्षा की जिम्मा हो वह कैसे इतना क्रूर अट्टाहस कर सकता है। इस दर्दनाक वीडियो देख साफ जाहिर होता है कि बिहार पुलिस का वह जवान किस तरह घृणा के वशीभूत अट्टाहस करते हुए गालियां बक रहा था और युवक को रौंद रहा था। यह उसी सामंती , सांप्रदायिक घृणा व हिंसा का ही नमूना था।
हम कैसे भूल सकते हैं कि अपने पति के लिए खाना  लेकर जा रही यासमीन को भी पुलिस की छह गोलियां      लगी थीं। वह सात महीने की गर्भवती थी। और उस आठ महीने के मासूम नौशाद का भी क्या कसूर था जिसे पुलिस ने गोलियों से भून दिया था। इनके अलावा एक और युवक यानि की कुल चार मुसलमान ग्रामीणों को पुलिस ने मार डाला था। मरने वाले दो यवुकों में एक 18 साल का मुख्तार अंसारी व 20 साल का मुश्ताक अंसारी थे।
और पुलिस ने ये घोर दमनकारी कार्रवाई केवल इसलिए की क्योंकि भजनपुरा गांव के ग्रामीण अपने आम रास्ता को बंद किए जाने का विरोध कर रहे थे जिसका प्रयोग वे शहर जाने के लिए करते थे। उस सड़क की जमीन को ऑरो सुंदरम इंटरनेशनल कंपनी को दे दिया गया था जिसके शेयर हॉल्डरों में सत्तासीन भाजपा के नेता भी हैं। साफ है कि सत्ता व शासन के इशारे पर यह लोमहर्षक कार्रवाई की गई थी। यह पूरी कार्रवाई एसपी गरिमा मल्लिक व अन्य उच्चाधिकारियों की मौजूदगी में हुई। पर किसी ने इसे नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की। वह तो किसी ने इस घटना के वीडियो को इंटरनेट पर डाल दिया जिससे की पूरी दुनिया में यह कार्रवाई पता चल गई।

http://www.youtube.com/watch?v=C26i6S6-S6A&oref=http

अब पीड़ितों समेत शिकायत करने वाले 50 ग्रामीणों पर ही जारी कर दिया गया वारंट...
इस पूरे वाकये को याद करना इसलिए जरुरी है कि इसके बावजूद नीतीश की पुलिस ने ग्रामीण गरीब मुसलमानों का दमन जारी रखा है। पिछले करीब दो हफ्ते पहले पुलिस ने दो साल पहले हुई इस घटना में मारे गए 3 लोगों, मर चुके 3 अन्य लोगों, पीड़ित परिवार के 14 लोगों और जांच आयोग में गवाही व कोर्ट में हुई शिकायत में हस्ताक्षर करने वाले 23 प्रत्यक्षदर्शियों को मिला कर कुल 50 ग्रामीणओं पर ही वारंट जारी कर दिया है। हाल ये है कि भजनपुरा गांव के सारे पुरुष घर छोड़ कर भागे फिर रहे हैं। पुलिस लगातार गांव में जाकर घर की महिलाओं व बच्चों को परेशान कर रही है। वह रात को भी गांव में छापेमारी करने आ जाती है। साफ है कि सुशासन की पुलिस का रवैया वैसा ही बना हुआ है।
दो साल पहल घटना के बाद पुलिस ने ग्रामीणों पर ही तीन एफआईआर दर्ज कर दिया था कि उन्होंने पुलिस पर हथियारों से लैस होकर हमला बोल दिया था और इसी कारण गोली चलानी पड़ी। पुलिस ने 4000 लोगों पर एफआईआर दर्ज किया था। पुलिस ने 28 पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात कही थी। अब यह समझा जा सकता है कि मारा गया 8 माह का नौशाद या 7 महीने पेट से यासमीन कैसे हथियारो से पुलिस पर हमला बोल सकती थी? फारिबसगंज थाना में कांड संख्या 268/11, 273/11 और 273/11 में ग्रामीणों पर 307, 120, 427, 452, 436,379,149,148 व 147 जैसी धाराएं लगाई गई हैं। साफ है कि पुलिस कानून का उपयोग पीड़ितों के दमन में ही कैसे करती है।
जिनसे दूरी है मज़बूरी
वहीं दूसरी ओर देश-दुनिया में इसकी खबर फैल जाने से विरोध सामने आए थे। नीतीश कुमार पर बहुत दबाव बनाने की कोशिश हुई फिर भी केवल मर रहे ग्रामीण युवक पर कूदने वाले पुलिस के जवान सुनील कुमार यादव को छोड़ किसी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। केवल सुनील कुमार को गिरफ्तार किया गया था जिसे फिलहाल बेल मिल जाने की खबर है। वहीं घटना में शामिल एसपी व अन्य अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। बाद में एसपी का प्रोमोशन भी कर दिया गया।
इसके अलावा ग्रामीणों की ओर से कोई एफआईआर दर्ज करने से पुलिस ने इंकार कर दिया। इसके बाद वे अररिया कोर्ट में चार शिकायत दर्ज कराई पर उसका कोई संज्ञान नहीं लिया गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट में इसकी सीबीआई जांच के लिए जनहित याचिका डाली गई जिसपर अभी सुनवाई ही चल रही है। जिसपर पिछले 4 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से 4 हफ्ते में पुलिस इंक्वायरी रिपोर्ट पेश करने कहा है।

जांच आयोग का बढ़ता कार्यकाल, न्याय की वही देरी और पीड़ितों-गवाहों को मिल रही धमकियां...
ग्रामीणों पर पुलिसिया वारंट तब जारी कर दिया गया है जबकि अभी इस गोलीकांड की न्यायिक जांच को बने आयोग ने रिपोर्ट सौंपी भी नहीं है। भारी दबाव के बीच नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने अपना दमनकारी चेहरा छिपाने के लिए एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग का गठन  कर दिया था। इसका गठन 22 जून 2011 को 6 माह के कार्यकाल के लिए किया गया था। इसकी सुनवाई भी अभी चल ही रही है। देखने वाली बात है कि इसने 6 महीने में कोई रिपोर्ट नहीं दिया फिर 22 दिसंबर 2011 को 6 माह की अवधि खत्म होने पर एक साल के लिए इसका कार्यकाल और बढ़ा दिया गया। उसके बाद फिर 22 दिसंबर 2012 को एक साल पूरा होने के कुछ ही दिन पहले इसका कार्यकाल तीसरी बार एक साल के लिए और बढा दिया गया। जाहिर है कि न्याय के लिए पड़ितों को पता नहीं कितना लंबा इंतजार करना पड़ेगा और उन्हें क्या न्याय हासिल होगा ये भी समझ नहीं आ रहा। फिलहाल जांच आयोग अररिया में इसकी सुनवाई कर रही है, जिसमें ग्रामीण व पीड़ित अपना बयान दर्ज करा रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर स्थानीय पुलिस-प्रशासन, सत्तासीन सरकार के नुमाइंदों-नेताओं और कंपनी की ओर से लगातार ग्रामीणों को डराया धमकाया जा रहा है। ऐसा ही एक मामला बताते हुए सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र ने बताया कि एक गवाह युवती तालमुन खातून को स्थानीय जदयू नेता व प्रशासन ने इतना डराया कि वह सुनवाई नहीं दे सकी। बाद में ग्रामीणों की शिकायत व विरोध के बाद दुबारा उसकी गवाही हुई। इसी तरह की धमिकयों का सिलिसला जारी है।
वहीं जांच आयोग को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र एक बात और बताते है कि आयोग में कंपनी की ओर से ही ज्यादा शपथपत्र दाखिल किए गए हैं यानि इनके पक्ष से कहीं ज्यादा गवाहियां होनी है। करीब 189 शपथपत्र दिए गए हैं जिनमें करीब 20 ही शपथपत्र पीड़ित पक्ष की ओर से हैं। वैसे एक थपथपत्र में कई लोगों के हस्ताक्षर हैं। वे ये भी बताते हैं कि सारे शपथपत्र एक ही फॉर्मेट में हैं।

पुलिस की झूठ पे झूठ....सारी कवायद ग्रामीणों को समझौता के लिए मजबूर करने की है....
पुलिस की ओर से जारी किया गया वारंट हो या गवाहों को लगातार मिल रही धमकियां, ये सारी कवायद ग्रामीणों पर समझौता करने का दवाब बनाने के लिए की जा रही है। न्यायिक आयोग में चल रही सुनवाई हो या सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका पर सुनवाई सत्ता-प्रशासन व कंपनी ग्रामीणों के संघर्ष व लड़ाई को दबाना चाहते हैं। वहीं दूसरी ओर ग्रामीण लगातार इसके खिलाफ खड़े हैं। ग्रामीणों पर गवाही न देने का दबाव बनाया जाता रहा है। बिना नाम के दर्ज हुए एफआईआर में गिरफ्तार करने की धमकियां दी जाती रही हैं।
इससे पहले भी पुलिस ने लगातार झूठ पे झूठ का सहारा लिया है। तत्कालीन एसपी गरिमा मल्लिक ने ग्रामीणों को हिंसा पर उतारु व हथियारों से लैस हमलावर बताते हुए 28 पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात कही थी। लेकिन बाद में एक सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचना में यह झूठ निकल आया। गरिमा मल्लिक ने स्वयं समेत सारे घायलों का इलाज फारबिसगंज के रेफरल अस्पताल में होने की बात कही थी। लेकिन अस्पताल से बाद में मांगी गई सूचना में अस्पताल ने बताया कि वहां केवल दो लोगों (एसपी और एसडीओ) का इलाज करवाया गया था। जबकि एसपी की ओर से घायलों की दी गई सूची में एसडीओ का नाम ही नहीं था। वहीं सुप्रीम कोर्ट में मांगी गई स्टेटेस रिपोर्ट व जांच आयोग में दिए गए प्रतिवेदन में पुलिस की ओर से दी गई घायलों की सूची में घायल पुलिसकर्मियों का नाम अलग-अलग है। इतना ही नहीं बल्कि सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचना में कहा गया कि घटना के तीन दिन पहले से डीएम के कंट्रोल रुम के वायरलेस सेट से कोई बातचीत नहीं हुई। वहीं एसपी कार्यालय में वायरलेस सेट न होने की बात कही गई।

बिहार की मीडिया ने नीतीश का अफीम सूंघ लिया है....
वहीं इस पूरे घटनाक्रम में भी बिहार की मीडिया का वहीं सरकारी भोंपू  के साथ विकास के नाम पर बरगलाने वाला चेहरा ही सामने आया है। गोलीकांड के बाद भी उस दौरान बिहार के अखबारों ने इसे जरुरी खबर तो क्या ठीक-ठाक छापी जाने लायक खबर तक नहीं समझा था। इसे बिल्कुल ही नजरअंदाज कर दिया था। इसे मुद्दा बनने ही नहीं दिया। जैसे कि बिहार से सबसे बड़ा अखबार दैनिक हिन्दुस्तान  ने इस पूरी तरह ब्लैक आउट कर दिया। दैनिक जागरण व प्रभात खबर का रुख भी इसी के जैसा रहा। दिलीप मंडल ने अपने एक अध्ययन व रिपोर्ट में जो कि मोहल्ला लाइव व कथादेश में छपी थी दिखाया कि मीडिया ने बिहार में लोगों के लिए इस मुद्दे को मुद्दा नहीं बनने दिया। 5 जून से 11 जून तक की पटना संस्करण के पहले पन्ने की खबरों के अध्ययन में देखें तो दैनिक हिन्दुस्तान ने इसे पूरी तरह नहीं छापा। जबकि दिल्ली में बाबा राम देव मसले की खबरें, 'बचना है तो पेड़ लगाएं', 'संदेश बढाने फिर नीतीश पहुंचे धरहरा' या 'समंदर से निकला शुगर का रामबाण इलाज' जैसी खबरें पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपती रहीं। वहीं दैनिक जागरण ने फारबिसगंज पर इसी दौरान पहले पन्ने पर केवल दो दिन खबरें चलाई जिनका फ्लेवर सरकार के पक्ष में ही जाता था। 6 जून को एक कॉलम की खबर 'आरोपी होमगार्ड पर चलेगा हत्या का मुकदमा' और 11 जून को दो कॉलम की खबर 'मारे गए बच्चे परिजन को तीन लाख' की खबरें छपीं। वहीं प्रभात खबर का भी हाल ऐसा ही रहा। साफ था कि अगर बिहार के तीनों प्रमुख अखबारे फारबिसगंज को मुद्दा न बनने देने पर तुल गए थे तो इसका मुद्दा बन पाना आसान नहीं था। और ये सारा तिकड़म सरकार के इशारे पर ही चल रहा था। जिसमें विज्ञापन से लेकर कंपनी में सत्ताधारी नेताओं की भागीदारी व सांप्रदायिक व गरीब विरोधी रंग मिला-जुला था।
मोमबत्ती जलाकर सेक्युलर बने
 इस बार भी अखबारों का हाल बिल्कुल वैसा ही रहा। दैनिक हिन्दुस्तान ने   जहां इस 8 अप्रैल 2013 को ग्रामीणों पर वारंट की खबर को एक कॉलम, करीब 50 शब्दों में 15वें पन्ने पर छापा। तो 11अप्रैल को 15वें पन्ने पर ही दो कॉमल की खबर करीब 100 शब्दों में छापी। वहीं दैनिक ने भी 11 अप्रैल को अंदर के पन्ने पर ही करीब सौ-सवा सौ शब्दों की खबर छापी। 11 अप्रैल को ये खबर इसकारण भी छप भी गईं कि फारबिसगंज की पीड़ित परिवारों के परिजनों ने सामाजिक संगठनों क मदद से 10 अप्रैल को राजधानी पटना आकर संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया और अपनी आपबीती सुनाई। वरना यह माजरा पूरी तरह दबाया गया। संवाददाता सम्मेलन को एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट(एपीसीआर), फारबिसगंज एक्शन कमिटी, मोमिन कांफ्रेंस और नेशनल एलॉयंस फॉर पीपुल्स मूवमेंट(एनएपीएम) ने आयोजित करने में पीड़ितों की मदद की।  फिर बाद में मीडिया नीतीश व मोदी के खेल में शामिल हो गई। बिहार की मीडिया का यह रुप लगातार देखने को मिला चाहे वह मधुबनी कांड हो, छठ हादसा हो या फिर शिक्षकों का सरकार की ओर से चलाया जा रहा दमनकारी अभियान। ये अखबार स्पष्ट रुप से सरकार के प्रवक्ता की तरह सामने आते रहते हैं। खासकर हिन्दुस्तान व प्रभात खबर की खबरों पर लगातार हम नजर रखें तो। संपादकीय लेख, टिप्पणियां व राजनीतिक संपादकों, ब्यूरों की खबरें सरकार के पक्ष में ही लिखी जाती रहती हैं और विरोधी खबरों को दबाया जाता है।

गैर-सेकुलर नीतीश का सेकुलरवाद.... कहां चला गया नीतीश का मुसलमान प्रेम व सुशासन....
इस पूरे मामले में नीतीश की पुलिस-प्रशासन व सत्ताधारी नेता, कहें तो नीतीश शासन फारबिसगंज के पीड़ितों के खिलाफ खड़ा है। स्थानीय पुलिस-प्रशासन व सरकारी नेता लगातार गरीब मुसलमानों पर दबाव बनाते रह रहे हैं। ठीक इसी समय नीतीश कुमार की नजर पीएम की कुर्सी पर है। जो इनके सहयोगी भी स्वीकार कर रहे हैं। इसके लिए नीतीश कुमार सांप्रदायिकता के खिलाफ बताते हुए मोदी के विरोध का स्वांग रच रहे हैं। जबकि वे भाजपा के रथ पर ही बिहार में सत्तासुख का भोग करते आ रहे हैं। वे मुसलमानों के प्रति प्रेम प्रदर्शित कर रहे हैं। नजर इस वोटबैकं पर है। वहीं उत्तरी बिहार में आतंकवाद के नाम पर एनआईए की टीम लगातार मुस्लिम युवकों को पकड़ रही है और अभी भी उनकी छापामारी लगातार पूरे जोर-शोर से जारी है। दूसरी ओर देखें तो फारबिसगंज के गरीब मुसलमानों के दमन में इसी नीतीश सरकार के  पुलिस-प्रशासन व नेता कोई कसर नहीं छोड़ रहे। दो साल बीत जाने पर भी इन गरीब मुसलमानों को न्याय के लिए भटकना ही नहीं पड़ रहा बल्कि उल्टे पुलिस ने अब इनपर ही वारंट जारी कर धड़-पकड़ कर रही है। रात को इनकी महिलाओं व बच्चों को पूछताछ के बहाने परेशान कर रही है। अब ये सब सरकार की शह पर नहीं हो रहा कैसे मान लिया जाए? अब ऐसे हाल में नीतीश किस मुंह के असांप्रदियक होकर मुसलमानों के हितैषी होने का दावा करते फिर रहे हैं। उस मारे गए आठ माह के नौशाद, सात माह की पेट से यासिमन व उन दो मुसलिम नौजवानों का हिसाब कौन देगा। भजनपुरा गांव में 90 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है। गुजरात में मोदी की शह पर पुलिस-प्रशासन-नेता की मिलीभगत से जिन मुसलमानों को मारा गया, इसे भी हम वैसे क्यों ना देखें? इस तथाकथित सेकुलर नीतीश के पास न्याय कहां हैं? बहरहाल नीतीश के सेकुलर नारों व मोदी विरोध के बीच भजनपुरा के ग्रामीण सत्ता की शह पर दमन जारी है।

Friday, April 26, 2013

ये मौत का मंजर है जो दूर तलक जाकर मंजिल को मिला देगा.


दरवाजे पर खडा रहा था, घंटी बज रही थी लगातार और अंदर से कोई आहट नहीं........पाँव पसारने की आवाज नहीं और कोई सन्नाटे का शोर नहीं, जैसे धूप की छाया मे प्रतिकृति बन रही हो मानो.....बस यूँ ही एक युग बीत गया खड़े-खड़े और इंतज़ार करते करते.........पर दरवाजा नहीं खुला है....... शायद अब इंतज़ार भी दूसरे पाँव पर करवट लेकर कही सो रहा है और समय है कि झट से किसी सदी मे से भाप की तरह उड़ने को बेकरार है.......कही ये अपने होने की अदावत तो नहीं, कही अपनी ही दबी आवाज मे एक खराज तो नहीं, जो कही ना कही से किसी धैवत मे कोमल निषाद की तरह से तीन ताल मे निबद्ध होकर पुरे संगीत को किसी अनजान दिशा मे भटका रही है..... और ये सदियो से अटका दरवाजा खुल ही नहीं रहा और उस पार से कही आवाज गूँज रही है........लौट आओ...... ये आख़िरी पल है .......बेचैनी बढ़ रही है इस पाँव पर पूरी देह का बोझ लटक गया है और साँसों का स्पंदन भी देखते देखते बढ़ गया है ...........बस अब देखो खुला वो दरवाजा..........चरमराहट बढ़ गई है .............और वो एक धुंध जो कही थी छटने लगी है और बस ........आ जाओ साथ का सफर पूरा करते है.........आओ लौट आओ ..........

Thursday, April 25, 2013

पूछा तो मैंने भी अपने आप से कि क्या रखा है

पूछा तो मैंने भी अपने आप से कि क्या रखा है इन दरों-दीवार और चौखटों मे, पर ना जाने क्यों ठहर सा गया एक पल, सिहर गया, और ना जाने कौन कौन से लम्हें याद आ गये और लगा कि सारा जहाँ जरुर मेरा है, पर यह कोना सिर्फ और सिर्फ मेरा है जहाँ मै बेफिक्र हूँ और एकदम मुक्त.........और फ़िर तुम्हारी सारी यादें तो यहाँ कैद है मेरे साथ हर उस हिस्से मे जिसे जीवन कहते है, सारी कायनात मे सबसे प्यारा है यह कोना............और यही से तो जन्मा हूँ और अब आख़िरी साँसों का सफर भी यही खत्म कर दूंगा, देखो वो कोना भी सिमटने लगा है.............यादें मिट रही है और एक अन्धेरा छा रहा है शाम ढल रही है और शफक भी खत्म हो रही है......धीरे धीरे, आहिस्ता आहिस्ता......
 

मीटिंग के फायदे और ज्ञानवान अधिकारी, नेतागण

साहब मीटिंग मे है, मीटिंग चल रही है, कल साहब मीटिंग मे जाने वाले है, सबकी मीटिंग करके निर्णय कर लो, आभी टी एल मीटिंग चल रही है या जब भी किसी के पास जाओ तो वे मीटिंग मे जा रहे है, जा चुके है या जाने वाले है सो समय नहीं है......ये वो जुमले है जो अमूमन हर जगह बोले विचारे और झेले जाते है. मुझे लगता है कि इस देश से अगर मीटिंग खत्म हो जाये तो सारा विकास जो अवरुद्ध पड़ा है हो जाएगा. फ़िर लगा कि आखिर चक्कर क्या है सरकारी अधिकारी से लेकर एनजीओ और तमाम ना जाने कौन कौन से लोग मीटिंग ही करते रहते है.

फ़िर गहरी से सोचा और मित्रों से बातें की तो समझ मे आया कि मीटिंग सीखने सिखाने का जरिया है और इसलिए ब्यूरोक्रेट्स को ये मीटिंग भयानक पसंद है जब मन किया मीटिंग बुलवा ली. क्या आपने किसी विवि मे अकादमिक लोगों को इतनी बड़ी तादाद मे मीटिंग अक्रते देखा है या इशारों या भाभा परमाणु शक्ति केन्द्र के वैज्ञानिकों को बड़ी तादाद मे मीटिंग करते  देखा है ? जवाब है नहीं तो अब समझिए इस मीटिंग का चक्कर .ब्युरोक्रेट्स तो रट्टा मारकर आयएएस बन गये, बचे खुचे जो अति महत्वकांक्षी थे जो ब्यूरोक्रेट्स ना बन पाने के अपराधबोध मे जीते रहे, वे पुराने जमाने के मेट्रिक थे सो चापलूसी और मख्खन लगाकर आय ए एस का ओहदा पा लिया और जा बैठे जिलों मे जहाँ इनके बाप दादे ज्ञान का खजाना लेकर बैठे थे या विभिन्न विभागों मे ज्ञान वाले लोग बैठे काम कर रहे है फ़िर क्या ये जो ब्यूरोक्रेट्स है (आयएएस) और ऐसे ही बड़े अधिकारी ज्ञान तो है नहीं दिमाग मे कूड़ा कचरा भरा है और फ़िर शिक्षा से लेकर मछली पालन, खनिज से लेकर स्वास्थय की समस्याएं इन्हें देखना है, सम्हालना है और बंटाधार करना है तो ये लोग हर विभाग की मीटिंग बुला लेते है और रौब गांठकर अधिकारी को छकाकर, चमकाकर, धमकाकर या रुला कर ज्ञान ले लेते है और उसी ज्ञान की सहायता से अगली मीटिंग मे उसी अधिकारी की खटिया खड़ी कर देते है.

एक अधिकारी महोदय को शिशु मृत्यु दर का नहीं मालूम था तो उन्होंने सिविल सर्जन को पूछा मीटिंग मे, जिला शिक्षा अधिकारी को पूछा सकल पंजीयन दर के बारे मे, खनिज अधिकारी को पूछा कि क्या प्रावधान है अवैध ढूलाई के, या वन अधिकारी को पूछा कि क्या नियम है छटवी अनुसूची के, तो ढपोर शंख अधिकारी इस तरह से मीटिंग की वृहद श्रंखला मे निष्णात होकर अच्छे अधिकारी बन जाते है, ठीक इसके विपरीत जो ज्ञानवान व्यक्ति है या जिसे अपने काम करने और सही तरीका मालूम है वो कभी मीटिंग नहीं करता और सीधे अपने काम पर लक्ष्य लगाकर अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर लेता है. ये सामान्यीकरण की प्रक्रिया है या जो लोग सामान्य ज्ञान लेकर भारतीय स्तर पर परीक्षा मे रट्टा मारकर आये है वे जीवन भर सामान्य ही बने रहेंगे और बने रहते है, इसलिए भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भले ही कितना दहाडें पर वे असल मे एक सामान्य व्यक्ति से ज्यादा कुछ नहीं होते और जो भी होते है वे सिर्फ मीटिंग के भरोसे होते है इसलिए इन्हें मीटिंग बहुत प्रिय है.

अगर सरकार मीटिग पर प्रतिबन्ध लगा दे तो ये सारे तारे जमीन पर आ जायेंगे, बात सिर्फ अधिकारियों की ही नहीं है हमारे महानतम नेता भी से ही है क्या आप किसी नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री को ज्ञानवान समझते है या किसी राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री को महान ज्ञानवान समझते है, ड़ा अब्दुल कलाम या ड़ा मन मोहन सिंह की बात छोड़ दे, वे अपवाद है पर बाकि का गुना भाग करके देखे तो सारा माजरा समझ मे आ जाएगा दूसरा वे भी मीटिंग के तो दीवाने है और असली बात यह है कि हामरे देश मे ढपोल शंखी बहुत है और इनकी जिनकी जन संख्या है उससे ज्यादा मीटिंग होती है इसलिए यह देश चल भी रहा है वरना क्या बात है तू कोई सितमगर तो नहीं की तर्ज पर. खैर.....भगवान ना करें कि मीटिंग इस देश से कभी खत्म हो वरना तो सारे देश की प्रजा आफत मे आ जायेगी और फ़िर बचा खुचा ज्ञान भी जो ये निर्णायक लेते है मीटिंगों से वो खत्म हो जाएगा और जनता जनार्दन का तो कबाडा ही हो जाएगा.

Tuesday, April 23, 2013

साहित्य पर मालिकाना हक और रचनात्मकता का क्या होगा हश्र




आज एक समकालीन साहित्यकार मित्र से बातें हो रही थी. बड़ा विचित्र माहौल हो रहा है समय का प्रभाव बड़ा घातक सिद्ध होता जा रहा है अनुभवी लेखकों और साहित्यकर्मियों पर. आज हिन्दी साहित्य मे जो नए लेखक उभर रहे है वे बहुत ठोस जमीन से नहीं बल्कि एनजीओ, आंदोलन, मैदानी लड़ाईयों और बदलाव की पृष्ठभूमि से परिचित होकर आ रहे है क्या रच रहे है, इसका अभी ठीक ठीक मूल्यांकन होना बाकि है पर ठीक इसके साथ साथ साहित्य मे एक ऐसे बड़े वर्ग की घुसपैठ बन गई है जो सत्ता संपन्न और धन धान्य से भरा हुआ है. यह वर्ग एक इशारे पर रोज कहानी, कविता, उपन्यास और दसियों लेख एक साथ कई अखबारों मे छपवाने की कूबत रखता है और छपवा भी रहा है. मै कोई नई बात नहीं कह रहा इस सबसे हम वाकिफ भी है और चिंतित भी. अब सवाल यह है कि जो संपन्न है या पूंजी का सहारा लेकर या प्रकाशकों को रूपया देकर छपवा रहे है या खुद प्रकाशक बन गये है और माता-पिता से लेकर कुत्तों-बिल्लियों की स्मृति मे बड़े आयोजन कर रहे है और स्मारिका से लेकर मासिक पत्र निकाल रहे है, उनका क्या ? क्या वे नए और सच मे भाषा मे लिखने वाले और अपने नए विचारों से इस दुनिया को बदलने का ख्वाब लेकर लिखने वालों पर कुछ करेंगे क्योकि ये दलिदर लेखक ना ये संपन्न है, ना इतने अमीर कि एक किताब छपवा सके या किसी वृहद आयोजन मे शिरकत कर सके, मठाधीशों की बराबरी तो दूर पर कुछ भी ना कर सके, पर ये बेहद ईमानदार लेखक है जो भाषा मे प्रवीण और अपने विचार और सिद्धांतों मे परिपक्व है. ये इस समय नहीं जान रहे कि ये जो पूरा "नेक्सस" बन रहा है इन नव धनाड्य वर्ग का, कॉलज के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग का, एनजीओ और ऐसे ही कारपोरेट घरानों से आये लोगों का और मीडिया द्वारा प्रचारित लोगों का, वे इनसे कैसे निपटे ??? सवाल काफी बड़ा है और राज्याश्रय की बात करना भी अब बेमानी हो गया है हम जन रहे है ऐसे मे साहित्य पर मालिकाना हक और रचनात्मकता का क्या होगा यह बड़ा प्रश्न है. मुझे नहीं पता कि मै इस प्रश्न और मेरे मित्र की बात को यहाँ ठीक से रख पा रहा हूँ या नहीं पर दिमाग मे एक हलचल तो हुई है. कई लेखकों से बात करके समझ आया कि इसी दबावों के चलते वे लिखना या तो छोड़ रहे है या ऐसे किसी बुलंदी को खोज रहे है जो केवट बनकर नैया पार लगा दें पर हर राम को केवट भी नहीं मिल रहा क्योकि केवट आजकल बड़े समुद्रों मे बड़े स्टीमर चला रहे है और हर स्टीमर बेहतरीन शराब, शबाब और सुविधाओं से परिपूर्ण है, अब ऐसे मे ये जो सच्चे लेखक है, क्या करें. एक गीत है ना "जाये कहाँ, समझेगा कौन यहाँ दिल की जुबाँ........
— with Subodh Shukla.

Monday, April 22, 2013

पंचायती राज के बीस साल........ क्या खोया क्या पाया......???







पंचायती राज की कल बीसवीं वर्षगाँठ है यह समय है थोड़ा ठहर कर सोचने विचारने का समय है कि क्या वास्तव मे पंचायतें अपनी भूमिका निभा पाई, क्या सच मे सत्ता का विकेन्द्रीकरण हो पाया, क्या वास्तव मे महिलायें आरक्षण देने के बाद भी काम कर पा रही है, क्या सरपंच पति की भूमिका खत्म हो गई है, क्या पंचायती राज संस्थाओं के लिए काम करने वाले एनजीओ वास्तव मे कुछ कर रहे है या अपनी ही गाड़ी और मदमस्त होकर बुद्धिजिवीता हांक रहे है, कंसल्टेंट के नाम पर बूढ़े और लाचार सब्जबाग दिखाकर लूट तो नहीं रहे, सरकारों ने इसे अमलीजामा पहनाने के लिए कितना डीवोल्युशन किया है. ज़रा सोचे और फ़िर गंभीरता से विचारे कि क्या पंचायतें लोगो की है या सिर्फ सत्ता मे मस्त सरकारों की एजें,ट सोचे....... और इस पर ज्यादा सोचे कि पंचायतों मे पंचायतों के लिए कौन काम कर रहा है और उनकी नीयत क्या है, क्या है उनके चारित्रिक मूल्य, और क्या है उनकी मंशा....चाहे एनजीओ हो, उनमे काम करने वाले लोग या उन्हें पालने वाली संस्थाएं यानी फंडिंग एजेंसी या सरकार नाम के माईबाप...........
 
मप्र मे मैंने सिर्फ और सिर्फ पंचायतों को पिछले दशक मे हाशिए पर जाते देखा है और यह काम सबने मिल जुलकर किया है बहुत सुगठित तरीके से और लामबंद होकर. सरकार, मीडिया, एनजीओ, फंडिंग सस्थाएं, मंत्री, पंचायती राज के पैरोकार, न्याय पालिका और ब्यूरोक्रेटस्. किसी भी तंत्र को इतनी जल्दी विकसित और खत्म होते दुनिया के किसी मुल्क ने नहीं देखा होगा. नित नए नवाचार, अपढ़ लोगों के सुझावों पर प्रयोग, लाचार-बूढ़े और तंत्र से निष्कासित कर दिए गये लोगों की भीड़ जिन्हें आजकल कंसल्टेंट कहा जाता है और ये जो पेंशन के साथ मोटी फीस और गैरवाजिब सुविधाएँ भी भकोसते है, के उलजुलूल सुझाव और पंचायत के नाम पर धोखा करकेअपना नाम करने के लिए लिखी गई हजारों टन की बकवास सामग्री का प्रकाशन, अफसरों की फौज द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की लगातार उपेक्षा और इससे उपजा गुस्सा दबाया जाना, यह सब दर्शाता है कि क्या देश के हालात है आज पंचायतें सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार का और स्थानीय स्तर पर अव्यवस्थाओं का अड्डा बनाकर रह गई है. इस दौरान कुछ पंचायतों ने बहुत अच्छा काम किया पर अपने दम पर और अपने जज्बे पर, बाकि शुक्र यह था कि ये तथाकथित नवाचारी लोग पहुंचे नहीं वहाँ, वरना और कबाडा हो जाता. खैर, ग्राम सभा की हालत तो ऐसी हो गई है मानो कुत्ता फजीहत और वहाँ कोई ऐसा दम ठोककर कहने वाला बन्दा नहीं है जो कह सके कि हाँ मै पंचायत अधिनियम के तहत सारे काम ग्राम सभा की देखरेख मे करता हूँ. 
 
हालात इतने खराब है कि धारा चालीस के केस बढे है, और जन प्रतिनिधियों को अपमानित करने और प्रताडित करने के लिए ब्यूरोक्रेसी ने नए हथियार बना लिए है. बडवानी इसका ताजा उदाहरण है. जन प्रतिनिधियों की ना जिला पंचायत के मुख्य अधिकारी सुनते है, ना जनपद के, ना कलेक्टर !!! विधायक, सांसदों ने तो इन्हें अपना चार सौ बीसी का एजेंट नियुक्त कर रखा है. जिला योजना के दफ्तर मे एक बाबू जन प्रतिनिधि को हडका देता है या अपना कमीशन सेट करता रहता है सारे समय, बाकि तो छोडिये साहब कभी देखिये कि जिला योजना समिति की बैठक मे इनकी जो दुर्गति प्रशासनिक अधिकारी करते है वो तो बेहद शर्मनाक है. कुल मिलाकर मुझे लगता है कि पंचायती राज व्यवस्था मप्र मे फेल हो गई है और इसके लिए जिम्मेदार राजनीती से लेकर पंचायत प्रतिनिधि खुद भी है. अब सवाल यह है कि इस पुरे मकडजाल से कैसे निकला जाये और मूल भावना को बचाकर इस व्यवस्था को फ़िर से सक्रीय, जनोन्मुखी और लाभदायक बनाया जाये. बस यह सवाल कृपया सरकारी अधिकारियों, एनजीओ और बुद्धिजीवियों से ना पूछा जाकर सीधे उन्ही से पूछा जाये जो सीधे-सीधे इस व्यवस्था से जुड़े है. कल बीस साल पुरे होने की खुशी मे फ़िर जलसे होंगे, ग्रांट का उपभोग होगा, और नए विचार सुझाएंगे जायेंगे.... पर सावधान यह सब पंचायत राज की मूल भावना के लिए बहुत घातक है, सावधान, होशियार, खबरदार.... बचो, बचो लोकतंत्र के इन तथाकथित पहरेदारों उर्फ भेडियों से बचो.

Sunday, April 21, 2013

'जो घर जाले आपना चले हमारे साथ' - प्रहलाद सिंह टिपानिया के कबीर भजन और नया रचने की जरुरत.

मालवा के देवास का संगीत से बहुत गहरा नाता है इस देवास के मंच पर शायद ही कोई ऐसा लोकप्रिय कलाकार ना होगा जिसने प्रस्तुति ना दी हो. और जब बात आती है लोक शैली के गायन की तो कबीर का नाम जाने अनजाने मे उठ ही जाता है. यह सिर्फ कबीर का प्रताप नहीं बल्कि गाने की शैली, यहाँ की हवा, मौसम, पानी और संस्कारों की एक परम्परा है, जो सदियों से यहाँ निभाई जा रही है. गाँव गाँव मे कबीर भजन मंडलियां है इसमे वो लोग है जो दिन भर मेहनत करते है- खेतों मे, खलिहानों मे और फ़िर रात मे भोजन करके आपस मे बैठकर सत्संग करते है और एक छोटी सी ढोलकी और एक तम्बूरे पर कबीर के भजन गाये जाते है. किसी भी दूर गाँव मे निकल जाईये यह रात का दृश्य आपको अमूमन आपको हर जगह दिख ही जाएगा. इन्ही मालवी लोगों ने इस कबीर को ज़िंदा रखा है और आज तक, तमाम बाजारवाद और दबावों के बावजूद भजन गायकी की इस परम्परा को जीवित रखा है शाश्वत रखा है आम लोगों ने जिनका शास्त्रीयता के कृत्रिमपन से कोई लेना देना नहीं है. 

प्रहलाद टिपानिया ऐसे ही लोक गायकों की शैली मे आते है जब वे तम्बूरे से तार को झंकृत करते है तो आत्मा का पोर-पोर बज उठता है. वे जब कबीर को गाते है तो मंच पर उनकी सादगी और मंडली के लोगों को देखकर लगता है कि यही वो कबीर है जो मिट्टी मे, मेहनत मे, पसीने मे रच-बसकर अपने जीवन के आरोह-अवरोह को भजनों की माला मे गूंथकर सबके सामने गा रहा है. पूरी भजन मंडली एकदम सादगी से गाती-बजाती है 'तेरा मेरा मनवा कैसे एक होए रे'. प्रहलाद जी शायद हिन्दुस्तानी लोकशैली मे बिरले ही गायक होंगे जो एकदम मिट्टी से जुड़े है. कल कैलाश सोनी कह रहे थे कि उनके पास ऐसी तस्वीरें है जिसमे ये प्रहलाद जी खेत मे काम कर रहे है, पढ़ा रहे है, लोगों के हुजूम के बीच समस्याएं सुनकर सुलझाने का प्रयास कर रहे है और कुल मिलाकर यह कि बहुत ही सादगी से एक सामान्य जीवन जीते हुआ गोयाकि कबीर बनकर यह राग कबीर गा रहे है. प्रहलाद जी के यहाँ कोई शास्त्रीयता का आडम्बर नहीं है, रागों की खेंच नहीं, ना ही कोमल, मध्य या निषाद का आग्रह है. कोई सुर बेसुरा नहीं और कही विलंबित ताल नहीं, न ही वो चुटकी है जो उन्हें ओरों से अलग करती हो, ना ही वो बनावटीपन है जो उन्हें विशिष्ट की श्रेणी मे लाने का भरोसा दिलाता हो. उनके श्रोता कही से किसी बुद्धिजीवी वर्ग से नहीं आते, ना ही एक उच्च समाज का गल्प दर्शाते है, ना ही उनके यहाँ कोई लंबी फौज है अनुकरणकर्ताओं की, ना ही वो ऐसी कोई महत्व्कांक्षा भी रखते है. वे किसी अंग्रेजी  अखबार के पेज थ्री पर दिखाई देते है ना ही किसी संस्कृति भवन के गलियारों की गप्प या शिगूफों मे वे शामिल है. प्रहलाद जी सिर्फ है तो अपने लोगों मे जो सिर्फ मेहनत मजूरी करके जीवन की हकीकतों से दो चार हो रहे है, वे कबीर की उस कुल परम्परा के वाहक है जो सीधे सच्चे शब्दों मे, बगैर लाग लपेट के कहते है 'इस घट अंतर बाग बगीचे इसी मे पालनहार' या धीरे से कहते है 'जिन जोड़ी तिन तोडी'.  

 यद्यपि अब उनके गायन मे एक दुहराव जरुर है, नया ना करने की, कुछ नया ना रच पाने की बेबसी, जरुर इन दिनों उनके गायन मे झलकने लगी है. स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय, अमेरिका की प्रो. लिंडा हैस के शोध और अनुवाद या शबनम वीरमानी की फिल्मों से लेकर इधर कबीर पर हुए तमाम शोधों और देश भर के लोककला उत्सवों मे भागीदारी से उनकी सक्रीय ऊर्जा का ह्रास हुआ है, या मित्रों के दुराग्रहों पर गायन से उनके काम मे थोड़ी सुस्ती आई है, यह मानना पडेगा पर फ़िर भी वे मालवा के एकमात्र ऐसे गायक है जिहोने सभी चुनौतियों को स्वीकार करके शास्त्रीयता को एक सिरे से नकार कर वे आज भी कबीर गायन के सबसे लोकप्रिय गायक और आम लोगों मे सर्वश्रेष्ठ सहज गायक बने हुए है. यह सहजपन उनकी अपनत्व की भावना, लोगों से मिलने और जुड़ जाने की प्रक्रिया से लेकर कबीर को गाते हुए नए सन्दर्भ और मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप टीका करने से उत्पन्न हुई है. यह दर्शाता है कि एक लोक गायक जब जन से जुडता है तो वह देश काल से परे होकर गायन करता है और शास्त्रीयता का  छद्म आडम्बर छोडकर यही जनमानस भी उसे अपने गले लगाता है. 


कबीर जिन लोगों के लिए जिस भाषा मे और जिस सहजपन से दो टूक बात कहते है या टिप्पणी करते है या व्यवस्था का मखौल उड़ाकर आँखें खोलते है, वह इसी तरह से स्थापित किया जा सकता है जैसे प्रहलाद जी करते है या गाते है. अब समय है कि प्रहलाद टिपानिया नया रचे और इस समाज मे नित नई उठ रही समस्याओं को कबीर ने चौदहवी सदी मे जिस तरह से महसूस करके लिखा था; अब उसी सबको वे जनमानस के सामने रखे और बगैर किसी लाग लपेट के और सांगीतिक शास्त्रीयता की परवाह किये बिना अपने कबीर को अपने लोगों के बीच फ़िर से प्रचलित करें क्योकि अब समय कहाँ है, स्थितियां दुश्वार होती जा रही है और लोग आडम्बर मे, ढकोसलों मे और अपने 'इगो' को पुष्ट करते हुए नया रच रहे है. बेहतर है इस सबसे उबरकर कुछ ऐसा करें कि फ़िर जीवित हो कबीर और फ़िर पुरे दम से कहें 'जो घर जाले आपना चले हमारे साथ'.

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ।
जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया।
एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया।
बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई।
बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा..
कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए।
तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .."
राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?"
इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: ..
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हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

देवास मे नईम समारोह 20 अप्रैल 2013

 



















यह देवास के एक इठलाती हुई शाम थी जो आज अपने होने पर ही गर्व कर रही थी . मौका था नईम समारोह जो नईम फाउन्डेशन द्वारा आयोजित था, और अवसर था पदमश्री प्रहलाद टिपानिया का सम्मान , पूर्व जिलाधीश गौरी सिंह का सम्मान और कबीर भजन . यह बेहद आत्मीय कार्यक्रम था जहाँ सारे देवास के नए पुराने लोग खासकरके साक्षरता  अभियान से जुड़े लोग एकत्रित थे और मिलजुलकर अपने पुराने दिनों को याद कर रहे थे. इंदौर, उज्जैन, भोपाल से भी लोग यहाँ आज आये थे छिंदवाडा के रोहित रूसिया ने नईम जी के गीतों को अपने सुरों से बांधा और फ़िर यह समां एक खुशनुमा सांझ मे तब्दील हो गया. नए पुराने ढेरों साथी मिले और फ़िर जमकर गप्प पुराने दिनों की बेहतरीन यादें और शिकवे गिले....प्रहलाद जी के भजनों से मालवा के लोग परिचित ही है पर आज जो उन्होंने झूमकर गाया वो अदभुत था और अंत मे कबीर की एक उलटबांसी से अपने भजनों का समापन किया बीच बीच मे वे समझा भी रहे थे कि कबीर क्या कहते है. भाई कैलाश सोनी के दो चित्र गौरी सिंह और प्रहलाद जी को जब भेंट किये जा रहे थे तो लगा कि ये सिर्फ भेंट ही नहीं बल्कि पुरे देवास का दर्शन, अपनत्व और संगीत का थाल सजाकर इन दोनों को दिया जा रहा है. इस कार्यक्रम मे महापौर, अधिकारी, नेता, साहित्यकार,  आम लोग, संगीत प्रेमी, और ना जाने कौन कौन साथी मौजूद थे जिन्होंने इस शाम को एक अविस्मरणीय सांझ बना दिया. प्रोफ़ेसर अफजल साहब के पोतों और पोतियों द्वारा बनाई गई खूबसूरत रांगोली ने पुरे हाल मे एक ऐसी महक छोड़ी थी कि यह हमेशा याद रहेगी. लगा ही नहीं कि नईम या अफजल हमारे बीच नहीं है. जो लोग या साथी नहीं आ पायें निश्चित ही उनके लिए जीवन का यह दुखद पहलू रहेगा. गौरी को ठीक नवरात्र के दूसरे दिन पाकर देव-वास के लोग धन्य हो गये. साथ ही "ज़रा हलके गाड़ी हाँको मेरे राम गाडीवान" जैसा सुमधुर भजन हमेशा जेहन मे बना रहेगा........आज यहाँ वीरेंद्र जैन एवं राम मेश्राम की उपस्थिति मे नईम जी की याद मे एक स्मारिका का भी विमोचन किया गया. इस कार्यक्रम को सफल बनाने मे सुनील चतुर्वेदी, दिनेश पटेल, बहादुर पटेल, मनीष वैद्य, श्रीकांत उपाध्याय, संकेत सुपेकर, संजीवनी ताई, प्रकाश कान्त, अमेय कान्त, पारुल, दानिश, तनवीर नईम, मेहरबान सिंह, जीवन सिंह ठाकुर, संदीप नाईक, रईस भाई, सुदेश सांगते, केदार, भगवान, अभिषेक राठौर, सुलताना नईम, और अंत मे ड़ा समीरा नईम की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण थी इस लंबी चौड़ी टीम के अभाव मे यह कार्यक्रम अधूरा ही रह जाता. और अंत मे देवास के लोग जो हमेशा से हर तरह के अच्छे प्रयासों मे जी-जान से साथ देते है

Friday, April 19, 2013

रामनवमी की बधाई



तुलसीकृत रामचरित मानस मे एक सम्पूर्ण मनुष्य के रूप मे 'राम' की कल्पना की गई है जो अंदर से उतना ही कमजोर है जैसे मै या आप हो सकते है, महिला को लेकर समूचे रघुवंश मे वही अवधारणाएं है जो आज के समाज मे दिखाई दे रही है पर फ़िर भी राम को पुरुषोत्तम मानकर हम एक राष्ट्र नायक के रूप मे देखते है क्योकि महाभारत मे कोई एक नायक नहीं है, महाभारत कई नायकों और असफल, हताश और युद्ध मे हारे हुए लोगों की कपोल कथा है वही राम ने रावण को मारकर और एक छोटे से द्वीप के जीतकर यह दर्शाया है कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से जीतना चाहता है. वहाँ कोई द्वंद नहीं है कि जीतने मे किन तरीकों का प्रयोग हुआ है जबकि महाभारत हार, जीत, युद्ध, उन्माद और तरीकों पर बात करती है वहाँ सूर्यास्त के बाद लड़ाई बंद है जबकि रामचरितमानस मे लड़ाई हर वक्त एक अनिवार्य हिस्सा है. शायद यही कारण है कि कृष्ण सिर्फ गीता के उपदेशों और अपनी रोमांटिक अदाओं के लिए याद किये जाते है, वे राष्ट्र नायक नहीं है वे हिंदू प्रतीक उस रूप मे नहीं है जिस स्वरुप मे राम उभरकर आते है. 

रामचरित मानस मे सिर्फ एक राम ही है जिनके आसपास सारी कथाएं चलाती है जबकि महाभारत मे एक साथ कई कथाएं समानान्तर  चलती है इसलिए एक नायक का होना संभव नहीं था. मानस मे सारी लड़ाई एक हिस्से के लिए है और यह सामान्य  बात है, जबकि महाभारत मे समूची पृथ्वी पर सही और गलत की बात है न्याय- अन्याय की बात है. जाहिर है हम लोग छोटे स्वरूपों  पर और जीत को ज्यादा महत्व देते है इसलिए राम आज भी हमारे आदर्श है, राष्ट्रनायक है, और अभी भी हमारे जनमानस मे बसे है. 

रामायण का पाठ हर घर मे होना शुभ है जबकि महाभारत को घर मे रखा जाना अशुभ है, यह बात  भी जनमानस मे पैठ कर दी गई है और उसका ज्ञानस्रोत के रूप मे गीता का हर घर मे होना यह दर्शाता है कि जीवन  की मूल समस्याओं से हटकर हम दर्शन और काल से परे यानी एक मेटाफिजिकल विश्व मे जनमानस को रखना चाहते है ताकि समस्याओं से दूर रहकर परलोक सुधारने मे लगे रहे, ऐसे कर्म करते चले जिसके फल कम से कम इस दुनिया मे नहीं ही मिलेंगे....

कुल मिलाकर राम ने एक पुरुषोत्तम का रूप तो ले लिया जनमानस मे पैठ भी बिठा ली परन्तु जो  व्यवहारिकता थी वो उन्हें असली जीवन मे एक आदर्श पुरुष और अपने ही देश और काल मे ज्यादा यश - कीर्ति  नहीं दे सकी जो कि बहुत ही दुखद है. सीता पर अत्याचार और बेटों को दूर करके उनसे ही अश्वमेघ यज्ञ करना भी दर्शाता है कि एक कालजयी पुरुष बनने से अपने समय का होना ज्यादा महत्वपूर्ण है. महाभारत जीवन की वास्तविकताओं और आपसी जलन, प्रतिस्पर्धा और समय से पार जाने की कहानी का बखान करता है इसलिए यह अशुभ है और हम सब एक स्वप्न मे जीना चाहते है, जो हम अपने जीवन मे नहीं कर सकते वो इन नायकों मे ढूंढते है इसलिए आज भी राजा राम हमारे आदर्श है........... 


बहरहाल आप सबको रामनवमी की बधाई....

Thursday, April 18, 2013

पीड़ा से लदी उदास लम्बी रातें -कृष्णकांत निलोसे


मैंने
सुख
तो नहीं
दु:ख जरुर डाले हैं
उसकी झोली में

उसे दी है
पीड़ा से लदी
उदास लम्बी रातें
भरी हुई
आत्मा को दंश देते
तारों से

और....विदा के अवसर पर
दिए हैं सौगात में
कभी न भुलाए जाने वाले
दु:स्वप्न.....और
आत्मा को छार-छार करने वाले तेजाबी अवसाद

कायर मैं......

विकृत अपनी चेतना में
उसका अपराधी हूँ

स्मृतियों की आँच में
तिल-तिल
वेदना से झुलस
राख हुआ मैं
जीवित भी
हूँ कहाँ ?

-कृष्णकांत निलोसे

Wednesday, April 17, 2013

देवास मे योगेश केलकर का एकल बांसुरी वादन....



देवास की समृद्ध सांगीतिक परम्परा मे और उस्ताद रज्जब अली खां साहब जैसे महान संगीतकारों के देवास मे आज एक नाम और जुड़ गया जब देवास मे कालानी बाग मे एक प्राईवेट महफ़िल मे अनुज योगेश केलकर ने एकल बांसुरी वादन प्रस्तुत किया. योगेश देवास से ही है, और मेरा परिचय सं १९८४ का है. हम दोनों लोग कालानी बाग मे ही रहे है, अब योगेश ड़ा राजा रमन्ना प्रौद्योगिक केन्द्र, इन्दौर मे वैज्ञानिक अधिकारी है पर देवास से जुड़ाव अभी भी बना हुआ है.

आज योगेश ने बांसुरी के सुर छेडकर यह सिद्ध किया कि संगीत भक्ति के सबसे करीब है और संगीत की साधना से ही अपने इष्ट को पाया जा सकता है. राग हंस ध्वनि से शुरूवात करके मीरा के दो भजन सुनाये, साथ ही रात्री के प्रथम पहर के राग यमन मे एक जोरदार बंदिश सुनाई. योगेश ने शर्मा बंधू कृत राम दरबार का प्रसिद्द भजन "जैसे सूरज की गर्मी से तपते हुए तन को मिल जाये तरुवर की छाया" भी सुनाकर श्रोताओं का मन मोह लिया. बहुत ही अपनत्व भरे माहौल मे हुए इस कार्यक्रम मे योगेश के साथ तबले पर संगत की अनिल पवार ने जो देवास के ख्यात कलाकार है.

यह कार्यक्रम सिर्फ यह दिखाता है कि हमेशा बड़े लोग, बड़े आयोजन, बड़े बैनर, बड़े कलाकार, बड़ा नाम और बड़े श्रोता ही नहीं बल्कि बेहद अपनत्व वाले छोटे कार्यक्रम भी बहुत महत्वपूर्ण, रुचिकर और यादगार होते है. आज योगेश को देखकर बहुत खुशी हुई उनकी बिटिया ने जिस भाव से संचालन किया वह भी बहुत महत्वपूर्ण था. जियो भाई जियो..............
— with Salil Zokarkar and Yogesh Kelkar in Dewas.

http://epaper.pradeshtoday.com/Details.aspx?id=22209&boxid=35128016#.UW5oIpGDWF4.facebook

नईम फाउन्डेशन द्वारा पदमश्री प्रहलाद सिंह टिपान्या के कबीर भजनों का कार्यक्रम







देवास मे स्व नईम जी की स्मृति मे नईम फाउन्डेशन द्वारा दिनांक बीस अप्रैल, शनिवार को स्थानीय मल्हार स्मृति मंदिर मे पदमश्री प्रहलाद सिंह टिपान्या के कबीर भजनों का कार्यक्रम रखा गया है. इस अवसर पर नईम जी को याद करते हुए हम सब लोग कबीर के भजन सुनेंगे, प्रहलाद जी हमारे अपने परिवार के ही है, और प्रसिद्द लोक गायक है. गत वर्ष ही इन्हें पदमश्री की उपाधि से सम्मानित किया गया है. इस अवसर पर देवास की पूर्व जिलाधीश सुश्री गौरी सिंह जी विशेष अतिथि के रूप मे हमारे साथ रहेंगी . समय होगा शाम सात बजे. आप सभी से आग्रह है कि इस गरिमामयी कार्यक्रम मे जरुर शिरकत करें आपकी उपस्थिति से हमें संबल मिलेगा और हम सब मिलकर मालवा के कबीर भजन सुनेंगे और आख़िरी मे सवाल जवाब भी कर सकेंगे.

तो आ रहे है ना आप ?

Tuesday, April 16, 2013


कहाँ हो विहंग..............लौट आओ विहंग के बिना ताल, आसमान, धरती और सब सुना है........ लौट आओ जल्दी, हम इंतज़ार कर् रहे है............प्रवासी पक्षी इतने दिनों के लिए थोड़े ही जाते है अंदर बाहर....बेचैन है हम सब...........यहाँ और वह असख्यंक सुबहों का सूरज भी इंतज़ार कर रहा है ..तुम्हारा विहंग, प्रवास खत्म करो और लौट आओ...........लौट आओ, लौट आओ.........

(विहंग-पक्षी)

उधेड़बुन ख़्वाबों की...............


तार पर टंगे हुए कपडे रात भर से खामोशी से मुझे घूर रहे थे, टेबल पर किताबें, हवा करता पंखा, कोने में पड़े हुए जूते, मेज पर पडी ढेर सारी चीजें मुझे घूरती रही पूरी रात और मै अलमस्त सोया रहा सोचा भी नहीं कि इतनी सारी चीजें कमरें में है और मै.....इन सबसे दूर रहकर एक अनोखे दृश्य में सपनों की दुनिया बुन रहा था........जहां सिर्फ मै था और तुम थे और एक जहान था........सिर्फ स्वप्नों का जहान..........
ये सूरज की तपती हुई धूप है या किसी ने दरवाजा खोल दिया है एकदम से...... सारी रोशनी की चकाचौंध झक्क से अंदर आ गई है...मेरे भीतर, झाँकता हूँ तो दिखता नहीं मेरा स्व जो कही गुम हो गया है इस तेज उजास में...... और मै खोज रहा हूँ एक छाँह को जो तुमसे मिलकर बनती थी मेरे भीतर .......जो मेरी पुतलियों के पीछे कही खो गई है ......रोको, अरे रोको इस उजास को..... यह घुसती चली आ रही है भीतर और भीतर..... ठीक तुम्हारी स्मृतियों की तरह से मेरे भीतर ......और देखों ना इसने आत्मा के पोर तक को जला दिया है.......आज अभी इस क्षण भंगुर होने में....

Monday, April 15, 2013

रांगोली का विश्व रिकॉर्ड और राजकुमार चन्दन...... हमारा देवास एक बार फ़िर विश्व के नक़्शे पर

अपने शहर में अपने लोग कितने परिचित होते है. आज शहर में रंगोली बनाने के विश्व रिकॉर्ड कार्यक्रम में गया था, मित्रों का आग्रह था सो चला गया. लोकप्रिय सांसद सज्जन सिंह वर्मा जी के साथ साथ विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शरद पाचुनकर जी, पूर्व महापौर जय सिंह ठाकुर, भाई मनोज राजानी, प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल सिकरवार जी, सचिव मोदी जी और ढेरों दोस्त जिन्हें मिले हुए अरसा बीत गया था. दिलीप सिरवाल, ड़ा सुरेश शर्मा, भाई अजय सोलंकी, आदिल पठान, विजय श्रीवास्तव जी, अभिषेक, नवीन नाहर, चेतन उपाध्याय, मिर्जा बेग, सुदेश सांगते, और सबसे महत्वपूर्ण राजकुमार चन्दन जिन्होंने तमाम मेहनत करके देवास के तालाब जिसे हम अब मंडूक पुष्पक के नाम से जानते है पर विश्व की सबसे बड़ी रंगोली बनाई है और आज अपने खाते में पांचवा विश्व रिकॉर्ड जोड़ा है. 
राजकुमार चन्दन की टीम के युवा साथी जिन्होने भरी गर्मी में तेरह घंटे का समय होने के बाद भी मात्र पांच घंटे तीस मिनिट में यह विश्व रिकॉर्ड बना दिया. मान गये उस्ताद..........देवास में अफजल साहब से शुरू हुई रंगोली की परम्परा मनोज पवार और राजकुमार चन्दन जैसे साथियों के होते हुए दुनिया में नाम कर रही है इस बात की सराहना की जाना चाहिए. जय भाई साहब, मनोज भाई, शरद जी ने और अंत में सज्जन भैया (देवास के तो वे भैया ही है) ने कहा कि कुछ करो आओ बात करते है, बैठते है, और कुछ मिलकर ठोस करते है.... सिर्फ इस तालाब के लिए नहीं, बल्कि पुरे शहर के लिए जो भी ठीक हो बताओ. दलगत राजनीती छोड़कर इस तरह की सार्थक पहल करने वाला यह छोटा सा कस्बा जो अब बड़ा हो गया है, देश में अपनी तरह का पहला जिला होगा. बहरहाल, काम बहुत है करने को बस लगन और प्रतिबद्धता चाहिए..........आज अपने लोगों में, अपने दोस्तों के बीच एक सार्थक काम के लिए जुडना अच्छा लगा.


Saturday, April 13, 2013

How to use PDF on blog

Important link and information for all bloggers.......
 
http://www.gyandarpan.com/2013/02/how-to-embed-pdf-file-on-blog.html

चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास

शिवानी (प्रसिद्द पत्रकार सुश्री मृणाल पांडेय जी की माताजी)  ने अपने उपन्यास "शमशान चम्पा" में एक जिक्र किया है

चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास
अवगुण तुझमे एक है भ्रमर ना आवें पास. 

 
बहुत सालों तक वो परेशान होती रही कि आखिर चम्पा के पेड़ पर भंवरा क्यों नहीं आता......( वानस्पतिक रूप से चम्पा के फूलों पर भंवरा नहीं आता और इनमे नैसर्गिक परागण होता है)
मै अक्सर अपनी एक मित्र को छेड़ा करता था कमोबेश रोज.......एक दिन उज्जैन के जिला शिक्षा केन्द्र में सुबह की बात होगी मैंने अपनी मित्र को फ़िर यही कहा.चम्पा तुझमे तीन गुण..............
तो एक शिक्षक महाशय से रहा नहीं गया और बोले कि क्या आप जानते है कि ऐसा क्यों है ? मैंने और मेरी मित्र ने कहा कि नहीं तो वे बोले.........

चम्पा वरणी राधिका, भ्रमर कृष्ण का दास 
यही कारण अवगुण भया,  भ्रमर ना आवें पास. 

 
यह अदभुत उत्तर था दिमाग एकदम से सन्न रह गया मैंने आकर शिवानी जी को एक पत्र लिखा और कहा कि हमारे मालवे में इसका यह उत्तर है. शिवानी जी का पोस्ट कार्ड आया कि "'संदीप, जिस सवाल का मै सालों से उत्तर खोज रही थी वह तुमने बहुत ही सहज तरीके से लोकभाषा में जवाब दे दिया है'"

आज एक मित्र ने पुनः याद दिलाया तो कई स्मृतियाँ दिमाग में झन्ना उठी है और फ़िर याद आ रहे है वो दिन मै खोज रहा हूँ शमशान चम्पा उपन्यास अपने संग्रह में और उस सुवास को एक बार फ़िर से सूंघना चाहता हूँ जो उन दिनों चम्पा के फूलों से आया करती थी........बहुत मन है कि एक चम्पा का फूल कही से मिल जाये और मै उसे जमीन से उठाकर या किसी पेड़ की डाली से तोडकर उस मित्र को कह सकूं कि चम्पा तुझमे तीन गुण ..रूप रंग और बास..........पर अब भंवरा  आ चुका है और.......चम्पा चम्पा ना रही ......... यह भंवरा आज भी चम्पा का इंतज़ार कर रहा है.............

Thursday, April 11, 2013

एंटी रेप बिल 2013 - उपयोग और दुरुपयोग के कुछ जीवंत अनुभव..........


आज एंटी रेप बिल 2013 जो नया आया है हाल ही में, उसे पढ़ रहा था तो लगा कि इस देश में संविधान के खिलाफ जाकर क़ानून बनने लगे है अब. महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की वजह से समूचे पुरुष जगत को अपराधी मान लिया गया है और सारी महिलाए सच्ची, निर्दोष और भोली भाली है. जिस संविधान ने स्त्री पुरुष को बराबरी का मौका दिया है वहाँ आजकल हर जगह महिलाओं को प्राथमिकता दी जाने लगी है यह ठीक है पर अब महिलायें जिस तरह से सारे कानूनों का बेजा इस्तेमाल करके पुरुषों को येन-केन प्रकारेण फंसाने का काम कर रही है वह बेहद शोचनीय और निंदनीय है. अभी समय है आने वाले समय में इस तरह के भेदभाव से समाज में व्यापक हिंसा फैलेगी और ज्यादा हालात खराब होंगे यह तय है...........अफसोस इसमे सबसे ज्यादा यह है कि ये सब इस्तेमाल करने वाले पढ़ी-लिखी औरतें है जो खुद या तो दिमागी अवसाद से ग्रस्त है या एकल हो गई है अपनी महत्वकांक्षाओं के चलते, या सिर्फ अपने आपको पुरुषों से बढ़-चढ़कर दिखाने के चक्कर में हेकड़ी दिखाना चाहती है. मै कोई महिला सशक्तीकरण के खिलाफ नहीं पर जिस तरह से हालात देख रहा हूँ उससे तो यह लगने लगा है कि अगर अभी स्थिति नहीं सुधारी और ध्यान दिया तो आने वाले समय में भारत का गृह युद्ध भाषा, साम्प्रदायिकता, वर्ग भेद या जाति पर नहीं वरन पुरुष बनाम स्त्री पर लड़ा जाएगा.
युवा लडकियों एवं महिलाओं द्वारा दहेज विरोधी क़ानून का कितना भयानक दुरूपयोग किया जा सकता है इसका आज एक उदाहरण देखने को मिला मन बहुत दुखी हो गया है ........मै बता नहीं सका कि उस लडकी की क्या समझ थी और किस बेदर्दी से मेरे मित्र को फंसाया गया यहाँ तक कि पुरे परिवार को जबकि यह कुछ भी संभव नहीं था और मै खुद मेरे मित्र को जानता हूँ..........इस तरह से क़ानून का दुरूपयोग करने पर सख्त सजा का प्रावधान होना चाहिए.......भाड़ में जाये जेंडर के मुद्दें जब लडकियां इस तरह से अपनी वाली पर उतर आ रही है तो क्या हमें चुप रहना चाहिए......? इसमे क़ानून में भी कई खामियां है जिनकी पडताल आज लाजिमी है........
 पिछले तीन चार दिनों से सफर कर रहा हूँ बसों में ट्रेन में तो देखा कि जो लडकियां अप-डाउन करती है घर से तो बिलकुल सती -सावित्री नुमा निकलती है मुँह पर दुपट्टा बांधकर पर बस या ट्रेन में आकर वे विकराल रूप धारण कर लेती है और जिस तरह के अश्लील और भद्दे मजाक करती है और लडको या सभ्य पुरुषों के साथ, जो कई बार उनके पिता के समान होते है , उन्हें भी वे नहीं छोडती और अश्लील फिकरे कसती है. बसों के क्लीनरों, ड्राईवर और कंडक्टर के साथ जो ठिठोली होती है एक डेढ़ घंटे में वो बेहद शर्मनाक और शोचनीय है. मोबाईल पर घटिया फ़िल्में देखना - दिखाना इस दौरान जारी रहता है. मै कह रहा हूँ कि लडके भी कोई कम खुदा नहीं है पर अगर इस दौरान किसी गरीब का हाथ गलती से इन हूरों को छू जाये तो ये एक साथ ऐसे आती है उस पर जैसे खा जायेगी..........जबकि खुद दूसरों की सीट पर, पैर पर पाँव रखकर चलेगी, अपना सामान ऐसे सौपेंगी बैठे हुए यात्रियों पर मानो इनके बाप ने किसी को इनका सामान उठाने के लिए गुलाम मुक़र्रर कर रखा है. और ऐसे में यह एंटी रेप बिल .ज़रा एक बार बैठिये बसों में देखिये इस तरह से सशक्त होती जा रही लडकियों को जो बेहद घटिया मानसिकता और दूषित जहर लेकर हमारे आने वाले भारत की तस्वीर बुन रही है..........

मूर्ख, बेवक़ूफ़ और दिमाग से एकदम पैदल लडकियां सिर्फ अपने रूप रंग और मसखरी के बल पर नौकरियां कर रही है ना उनमे अक्ल है ना काम करने की दक्षता और ना कौशल जो अति आवश्यक होते है. ये सिर्फ सारा दिन अपने चाहते बॉस को या जिसने उन्हें इसी रूप रंग के दम पर रखा है, को फोन करके पुरे दफ्तर की चुगली करती रहती है और घटिया बातों से बॉस का दिल खुश रखती है. अपने आप को बेचकर ये सशक्तीकरण का फ़ायदा उठा रही है- काम ना धाम बस सत्यानाश.................ऐसे में बेचारे पुरुष जो काम करना भी चाहते है तो दफ्तर की घटिया राजनीती का शिकार हो रहे है और फ़िर नौकरी से बाहर..........और ऐसे में सरकार क़ानून पे क़ानून ला रही है जो पुरुषों को दोयम दर्जे का नागरिक बना रहे है इसी देश में ..........जाये तो जाये कहाँ.......

Tuesday, April 9, 2013

ये है मातिहास, फ्रांस के सुदूर कोने से हिन्दुस्तान आया है कुपोषण दूर करने

ये है मातिहास, फ्रांस के सुदूर  कोने से हिन्दुस्तान आया है और कुपोषण का डाक्टर है यहाँ के बच्चों के बारे में बहुत चिंतित है बहुत लंबा और गहरा काम है इसका. राजस्थान और मप्र के दूर दराज के क्षेत्रों में भरी गर्मी में घूम घूम कर लोगों को समझाता है और हर रोज दस से बीस डाक्टरों से मिलकर समझाईश देता है. मप्र में सरकारी अस्पतालों में बने पोषण पुनर्वास केन्द्रों में जाकर काम करने वालों की मदद करता है. "मै यहाँ काम करने आया हूँ, मै आंकड़े इकठ्ठे करके किसी अखबार में लेख नहीं लिखूंगा और अपनी रोजी रोटी कुपोषण से नहीं चलाउंगा, मेरे लिए दुनिया पडी है और एक लंबी उम्र भी...... ना ही मै कुपोषण की घटिया राजनीती में पडना चाहता हूँ, इस देश में मीडिया और एनजीओ ने बच्चों की मौत और वो भी कुपोषण से होने वाली मौतों को अपनी रोजी रोटी का धंधा बना लिया है और मीडिया में भी यही हो रहा है लोग बड़े-बड़े लेख लिखकर मालदार बन रहे है जो कि बहुत ही गंदी सोच का परिचायक है" मातिहास कहता है.
 
कितना सच कह रहा है यह बन्दा आप बताएं पर मुझे उसकी बात में कोई शक नजर नहीं आता. इसे मैंने  बुरहानपुर में पकड़ा जहां यह गरीब लोगों के साथ बात कर रहा था....और कुपोषित बच्चों को स्वस्थ रखने के तरीके वो भी विशुद्ध भारतीय  तरीके सीखला रहा था.
 
यह वही बन्दा है जो कहता है कि यूनिसेफ ने डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों के नाम पर और तैयार पदार्थों में दवाएं और कई प्रकार के रसायन मिलाकर बाजार में एक अनोखी प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी है. पूरी दुनिया को यूनिसेफ यह RUTF बेचकर अपनी दूकान चलाना चाहता है जो कि इसके दूषित मानसिकता में है, पहले भी यूनिसेफ ने टीकाकरण के नाम पर गरीब देशों को महंगे टीके बेचे और डर दिखाकर अब एच आई वी और एड्स के रूपये भी ऐसी युएन संस्थाएं हड़प जाना चाहती है. कहता है कि इतनी मोटी तनख्वाह लेकर इन लोगों की कितनी प्रतिबद्धता बचती है. दिल्ली में रहकर यह देश भर में घूमता है और अब उड़ीसा जाकर वहाँ के कुपोषण के मुद्दों को हल करने ख्वाब संजो रहा है.......आमीन......... 


हम जैसों से तो यह बन्दा जोरदार है जो सिर्फ नारे नहीं लगाता बल्कि ठोस काम कर रहा है, कुपोषण को बेचता नहीं बल्कि उसकी जड़ में जाकर मदद करने की मंशा के साथ लोगों के साथ काम कर रहा है.

पिता तुम बहुत याद आ रहे हो.........इस कड़ी होती जा रही धूप में...


माँ बताती थी कि पिताजी की पहली सरकारी नौकरी छैगांव माखन में लगी थी...........वैसे तो साठ रूपये माहवार पर सिंधिया स्टेट में गये थे मास्टर बनकर क्योकि मेट्रिक के बाद नौकरी करना जरूरी था, पर वे जल्द ही छोड़कर आ गये थे, मुरार और लश्कर में हालात ठीक नहीं थे उन दिनों. यह सरकारी नौकरी थी और नब्बे ढाई सौ के वेतनमान में वे महू से खंडवा जाते और फ़िर खंडवा से सायकल लेक छैगांव माखन तक. आज यह गाँव कितना बदल गया है एक तरह से कहूँ तो हाई वे है और सारी सुविधाओं से लैस पर क्या बदला है यहाँ ? मै खोज रहा हूँ कि कोई तो स्मृति मिल जाये मेरे पिता की, कोई तो गंध मुझे मिल जाये, मै समझना चाहता हूँ  कि कैसे घर से दूर रहकर किन अभावों में वे यहाँ रहे होंगे, कैसे जीते होंगे, क्या खाते होंगे, यह जो चकाचौंध जो आज है वो उस समय तो नहीं थी, सिर्फ पूर्वी निमाड की तेज झुलसने वाली गर्मी और पानी का अकाल, कपास और लाल मिर्च की खेती, बेहद पिछडापन और अल्प वेतन.......घर आने में वो छः माह लगा देते थे, माँ कहती थी कि सारा वेतन दादी को देकर अपने लिए चंद रूपये रख लेते थे एक समय का खाना और जी तोड़ मेहनत करके जीवन जीने का उपक्रम करते थे. इसी छैगांव माखन में मेरे पिता की स्मृतियाँ है.........मै खोज रहा हूँ यहाँ -वहाँ पर कोई गंध मुझे भाती नहीं है, कोई ऐसा शख्स नजर नहीं आता जो मुझे साठ के दशक की कोई भी बात सकें, मै पागलों की तरह से गली-गली घूम रहा हूँ, खोज रहा हूँ एक भला मानुष जो किसी किस्सागो की तरह से उस जमाने की याद दिला दें उन यादों के गलियारों से मै चुनना चाहता हूँ वो सब जो मुझे पिता के संघर्ष की एक बानगी दे दें, मै आज यहाँ से जब गुजर रहा हूँ तो सुस्ता रहा हूँ - एक झीनी- झीनी छाँह में जो मुझे कही से पिता की याद दिलाती है, मै आज पिता बनकर उस संघर्ष को जीना चाहता हूँ, मै समझना चाहता हूँ कि दुर्दैव  के दिन क्या होते है, कैसे जीवन अभावों में पलता है और किन अच्छे दिनों की आशा में हम अपना सबसे महत्वपूर्ण समय गंवा देते है और कैसे संघर्ष में घिसकर हम एक बेहतरीन इंसान होने की  ओर तिल - तिल बढ़ते है........ इस पूरी लडाए के मायने क्या है, क्या संघर्ष कभी सफल होते है..........??? यह पूर्वी निमाड का सूरज आज भी उतना ही तप रहा है, आम के पेड़ों पर कही बौर नजर नहीं आते, पानी की एक बूँद के लिए आज भी मारम्मार है और शायद दूर कही किसी कोने में बैठा आदमी मुझे एहसास दिला रहा है कि वो शायद मेरे पिता के मानिंद ही है जो कड़ी धूप में माथे पर सिलवटों का पसीना पोछता हुआ एक बार फ़िर से पूरी ताकत लगाकर खडा होता है....... चल देता है........ ठीक सूरज के सामने मुँह करके, पुरे जमाने को मानो फ़िर से आज परास्त कर देगा और बचा लेगा अपने बच्चों के लिए एक दुनिया.............मै उसका पीछा कर रहा हूँ देखना है कि यह आज क्या बचा पायेगा.....पिता तुम बहुत याद आ रहे हो.........इस कड़ी होती जा रही धूप में...
— in Khandwa, Madhya Pradesh.

Tuesday, April 2, 2013

हर्ष मंदर ने जो मुद्दे उठाए है वो काबिले तारीफ़ है

आज हर्ष मंदर ने अपने कॉलम में दैनिक भास्कर में लिखा है कि एन सी सक्सेना ने भारतीय प्रशासनिक सेवा को सुधारने के लिए कई कड़े कदम उठाने की बात की थी और फ़िर 2008 में आये प्रशासनिक सुधार समिति के सुझावों का भी जिक्र किया. हर्ष ने अपने लेख के शीर्षक में इस सेवा को "इस्पात का ढांचा" कहा है इसका मतलब क्या है? लोकतंत्र में इस्पात का ढांचे का आशय है कोई इस परदे के पीछे झाँक ना सके कहते है ना अंग्रेजी में "You cant peep behind the Iron Curtains"

सवाल बड़ा गंभीर है पिछले साठ बरसों में नेताओं और मक्कारों ने देश का कबाडा किया है ही, इससे ज्यादा कबाडा इस ब्यूरोक्रेसी ने किया है. आज भी यह ब्यूरोक्रेसी समाज और तंत्र का वह हिस्सा है जो अलोकतांत्रिक, घोर तानाशाह और गैर जवाबदेह है. जब एक चाय की दूकान चलेगी या नहीं से लेकर देश के राष्ट्रपति का चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से होता है तो यह नौकरशाही कैसे मनमर्जी से देश चला सकती है.............जिले में बैठा एक अधिकारी क्या इतना बड़ा खुदा है कि वह मछली से लेकर खनिज, प्रसव, शिक्षा और ना जाने कौन-कौन से मुद्दे सम्हाल ले. कभी जिले से पूछा नहीं जाता कि आपको कौनसा अधिकारी चाहए, यह हमेशा एक प्रमुख नौकरशाह द्वारा थोप दिया जाता है जिले पर, जो आकर सत्यानाश करता है. इअनके कार्यों के मूल्यांकन कौन करता है वही ब्यूरोक्रेसी में बैठा दूसरा चोर, क्या स्थाने निकायों और जिला पंचायत के प्रतिनिधियों से नहीं पूछा जाना चाहिए कि ये क्या कर रहे है जिले में या लोगों से कभी विचार लिए जाये कि क्या वो अपने कलेक्टर से खुश है या एसपी से नाराज?

वह व्यवस्था जो खुद तानाशाही भरी हो वह क्या लोकतंत्र को मजबूत आधार प्रदान करेगी? दूसरा सब इस गोरख धंधे में शामिल है. मप्र में ऐसे अनेक प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी है जिनपर सात आठ सौ करोड रूपयों के आरोप तय है मामले अदालतों में है, पर फ़िर वे पदों पर आसीन है और सरकार निठल्लों की तरह से बैठी देख रही है और उनसे काम ले रही है. और शर्मनाक बात यह है कि दूसरे भ्रष्ट अधिकारी जो लोकायुक्त के यहाँ चक्कर काट रहे है अब वे भी प्रमुख सचिव बनने की बेशर्मी भरी मांग करने लगे है और तर्क दे रहे है कि "अगर सुधीरंजन मोहंती पर केस है और वे प्रमुख सचिव है तो मै शशि कर्णावत क्यों नहीं सचिव का अधिकार रखती हूँ. (सन्दर्भ आज का नईदुनिया और भास्कर) कितना शर्मनाक है पर किसे पडी है.... सब एक ही खेत की मूली है, अरविंद और टीनू जोशी को अदालत में खडा करने में सरकार को पसीना आ गया है और मुख्य सचिव ने मामला इतना लटकाया है कि मानो वे पैरवी करने लगे हो इन महात्माओं की.

हर्ष मंदर ने जो मुद्दे उठाए है वो काबिले तारीफ़ है पर ज़रा हर्ष खुद बता देते कि ये नौकरशाही कितनी तानाशाह है जो लोकतंत्र को मजबूती देने की बात करती है, और खुद हर्ष भूल गये जब उन्होंने बी डी शर्मा को पिटवाया था जब वे बस्तर कलेक्टर थे.......??? आज ज्ञान की बात कर रहे है !!!!