Sunday, December 29, 2013

महंगाई के समय में सस्ते इलाज के लिए इंजिनियर की दरकार





एक  बहुत पुराना और प्यारा सा दोस्त है देश के जाने माने शिशु रोग विशेषज्ञों में उसकी गिनती है जब हम लोग छोटे थे तकरीबन नवमी, दसवी में तब से वो डाक्टर बनने के सपने देखता. खूब जी तोड पढाई करके वो डाक्टर बना और पिछले बीस  बरसों से वो अपोलो, एस्कार्ट, फोर्टीज और मियो जैसे बड़े संस्थानों में काम कर रहा है. पिछले कई दिनों से वो कह रहा है कि यार संदीप मै जो कर रहा हूँ उसमे मजा नहीं है रूपया बहुत है पर जिन बच्चों का मै इलाज करता हूँ  वो सब विदेशी है और मुझे अपने इलाके के बच्चों का दर्द महसूस होता है. धार- झाबुआ-बड़वानी जैसे इलाके में बच्चे कुपोषण से मर जाते है शर्म आती है मुझे अपने पढाई और ज्ञान पर, कुल मिलाकर लब्बो लुबाब यह निकला कि हम दोनों मियाँ बीबी मिलकर एक ऐसे बच्चों का अस्पताल  खोलना चाहते है जहां विश्व स्तर की सुविधाएं हो, निशुक या  न्यूनतम शुल्क पर हो और पिछड़े इलाकों में लोग इसका इस्तेमाल करें- कोई बच्चा इलाज के अभाव में दम  ना तोड़े. 

अब  सवाल कई है यह दोस्त कहता है कि आई सी यु की भीतर की मशीने महंगी है और जो कंपनिया इन्हें बेचने का धंधा करती है वो लागत मूल्य से कई गूना ज्यादा वसूलती है, क्या हिन्दुस्तान में आई आई टी या कोई ऐसे इंजिनियर है जो उसकी मदद करें सस्ती मशीने बनाकर दें जैसे कंप्रेस्ड एयर के लिए छोटी मशीन की जरुरत है जिससे डिस्पोजेबल वेंटीलेटर बनाए जा सके जिससे जिन्दगी के चांसेस ज्यादा हो जाते है और ये सस्ते होने चाहिए. डाक्टर  दोस्त बहुत ईमानदारी से अच्छे इंजिनियर तलाश रहा है जो कुछ मशीने बनाने में मदद कर सके. वो कहता है या तो मै मेडिकल छोड़कर फिजिक्स में चला जाऊं और काम करूँ या मै ऐसे कुछ सरफिरे इंजीनियर्स को बताता रहूँ और मशीने बन जाए ताकि इलाज बिलकुल सस्ता हो जाए जैसे मात्र दस रूपये या सौ रूपये. 

ध्यान  रहें कि यह डाक्टर दोस्त नवजात शिशुओं के ह्रदय रोगों का फिजिशियन ही नहीं देश के छः सात सर्जनों में से एक है और सालाना तनख्वाह करोड़ होगी, पर उसे लगता है कि वो अपने इलाके के बच्चों को कुछ दे नहीं पा रहा. पति पत्नी दोनों इस पेशे में जितने काबिल है उनका समर्पण और ईमानदारी काबिले तारीफ़ है. आपकी नजर में कोई ऐसा सिरफिरा इंजिनियर है?  एक प्रतिष्ठित और रचनात्मक इंजिनियर अरविंद गुप्ता का नाम मैंने सुझाया है जो विज्ञान में खिलौने बनाते है मशीने भी पर इस बारे में अरविंद के अतिरिक्त........कोई और आपकी निगाह में हो जों इस काम में मदद करें, जूनून की तरह लगकर तो हम सब साथ है. रूपयों की कमी नहीं है और हाँ इज्जत और बाकी सब भी मिलेगा नाम, यश और पेटेंट भी........ सवाल मदद का है. 

जितनी  जल्दी हो सके बताईये चाहे वो दुनिया के किसी कोने में हो अगर जज्बा और जूनून है तो दूरी मायने नहीं रखती और गर्व है अपने प्यार दोस्त पर,और हाँ यदि किसी को कोई बच्चा  शिशु रोग से पीड़ित खासकरके ह्रदय रोग वाला तो मुझसे बिंदास संपर्क करें. धन्यवाद मित्रों.

संदीप नाईक 

Saturday, December 28, 2013

सत्ताईस बरसों के काम के कुछ अनुभवों का निचोड़


भगवान  के लिए एक बार अपने जीवन में झांककर देखिये कभी तो आपको कोई बेहतरीन रचनात्मक सुझाव या विचार दिमाग में आया होगा.......बस उठाईये कलम और घिस डालिए चार-छः पन्ने और फिर इन्ही पन्नों को जीवन भर चलाते हुए अपने को इतना महान बना दीजिये कि बेचारे गरीब लोग आपको उत्कृष्ट बना दें, आपको महान व्यक्ति का दर्जा दे दें और फिर दुनिया भर के लोग आपको रूपया पैसा देने को तैयार हो जाए (भले ना दें पर आप कम से कम यह तो हर बार कह ही सकते है कि इस बार मेरे पीछे कई लोग पड़े है कि फंड ले लो, फंड) और फिर उन्ही चन्द पन्नों को जोड़ जाडकर पोथे बनाते रहे और इस तरह ताजिंदगी आप बेहतरीन, नए विचारों वाले, खुले स्वतंत्र और बढ़िया व्याभिचारी-कम-नवाचारी शख्स तो इस भारत जैसे देश में बन ही सकते है क्योकि यहाँ सब चलता है धंधा है, गंदा है, और फिर आप तो आप है गधे के.............!!!


दस्तावेज, रपट और लिखने पढ़ने के नाम पर आप बहुत सालों तक दुनिया को विशुद्ध रूप से बेवक़ूफ़ बना सकते है. मैंने अपने जीवन में कईयों को सारी उम्र एक ही तरीके से, एक ही विचार पर लिखते-पढ़ते और चुतिया बनाते हुए देखा है, इनकी झोली में दुनिया भर की सामग्री के नोट्स, फोटोकॉपी और चन्द पन्नें होते है जिनके सहारे इनकी उम्र बीत जाती है. ये ना एक लाइन लिख पाते है ना कुछ सार्थक गढ़ पाते है. बस बकलोल किस्म के चन्द मार्केटिंग वाले लोग इन्हें महान बनाकर इनके साथ अपनी भी रोजी रोटी चलाते रहते है. दूसरा रपट, दस्तावेजीकरण का धंधा जोरो से देश में पनपा है जिसका कुछ सर पैर नहीं होता. लोग एक बात को इतनी बार लिखते है कि मूल कृति की ह्त्या हो जाती है और ड्राफ्ट पर ड्राफ्ट बनते रहते है जिसको ठीक करने में बेचारे कुछ लोग ठीक उस मुसहर की तरह हो जाते है जो गाय के गोबर के बड़े भारी पोटे में से गेहूं के कुछ अधकच्चे दाने चुनता है और अपना करम बार बार ठोकता है कि हे भगवान क्यों मेरे जिन्दगी में यह काम मेरे मत्थे मढ दिया और कुछ लोग तंग आकर कह देते है कि बस बहुत हुआ अब नहीं, और कभी नहीं 

सन्दर्भ: काम चालू आहे, अब नई संस्कृति दिल्ली से आने वाली है बहुत जल्दी आपके द्वारे, इस सबमे माहिर लोग एक बार फिर अपने भोथरें हथियार पैने करने में लग गए है, सावधान इंडिया.



नौकरी में अनुभव का मतलब संस्था या तंत्र द्वारा अभी तक की गयी सभी मूर्खताएं, गलतियां और चुतियापों को खूबसूरती से ढक देनेवाला और सारी उलटबांसियों को व्यवस्थित तरीके से "प्रेजेंटेबल फ़ार्म" में लाने वाला एक अदद मूर्ख और चाहिए होता है इसलिए अक्सर कहा और पूछा जाता है आपको कितना अनुभव है इससे पहले का...?

Sunday, December 22, 2013

देवास में 22/12/13 को संपन्न कबीर मिलन समारोह

















बात बहुत पुरानी तो नहीं पर पिछली सदी का अंतिम दशक था जब हम लोग एकलव्य संस्था के माध्यम से देवास जिले कुछ जन विज्ञान के काम कर रहे थे शिक्षा, साक्षरता, विज्ञान शिक्षण के नए नवाचारी प्रयोग, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में भी कुछ नया गढ़ने की कोशिशें जारी थी. एक दो बार हमने घूमते हुए पाया कि मालवा में गाँवों में कुछ लोग खासकरके दलित समुदाय के लोग कबीर को बहुत तल्लीनता से गाते है और रात भर बैठकर गाते ही नहीं बल्कि सुनते और गाये हुए भजनों पर चर्चा जिसे वे सत्संग कहते थे, करते है. यह थोड़ा मुश्किल और जटिल कार्य था हम जैसे युवा लोगों के लिए कि दिन भर की मेहनत और फिर इस तरह से गाना बगैर किसी आयोजन के और खर्चे के और वो भी बगैर चाय पानी के. थोड़ा थोड़ा जुड़ना शुरु किया, समझना शुरू किया, पता चला कि कमोबेश हर जगह हर गाँव में अपनी एक कबीर भजन मंडली होती है. बस फिर क्या था दोस्ती हुई और जल्दी ही यह समझ आ गया कि भजन गाने की यह परम्परा सिर्फ वाचिक परम्परा है. 

स्व नईम जी और दीगर लोगों से सीखा कि कबीर की वाचिक परम्परा मालवा और देश के कई राज्यों में बरसों से जारी है और स्व पंडित कुमार गन्धर्व ने भी इसी मालवे की कबीर की वाचिक परम्परा से प्रभावित होकर बहुत कुछ नया गुना, सूना और बुना था. बस फिर दोस्ती हुई नारायण देल्म्या जी से जो तराने के पास के गाँव बरन्डवा के रहने वाले थे वे हमारे गुरु बने, फिर प्रहलाद सिंह टिपान्या जी से दोस्ती हुई धीरे धीरे हमने देवास में एकलव्य संस्था में एक अनौपचारिक "कबीर भजन एवं विचार मंच" की स्थापना की. हमारे साथी स्व दिनेश शर्मा इस काम में जी जान से जुट गए और हम लोग भी साथ में थे. हमारे साथ डा राम नारायण स्याग थे, मार्ग दर्शन के लिए.

हर माह की दो तारीख को आसपास की मंडलियाँ आती भजन गाती और सत्संग होता. बहुत वैज्ञानिक धरातल पर बातचीत होती थोड़ा शुरू में विवाद हुआ क्योकि जिन पाखंडों और दिखावों का कबर विरोध करते थे ये मंडलियाँ उन्ही बातों को करती थी फिर लम्बी चर्चा होती और धीरे से हम सीखते कि इस वर्ग में चेतना बहुत जरुरी है और यह कबीर के माध्यम से निश्चित ही आ सकती है. भारतीय इतिहास और अनुसंधान परिषद् के सहयोग से हमने एक छोटा सा दस्तावेजीकरण करने का कार्य अपने हाथों में लिया जिसमेहम इस वाचिक परम्परा को लखित रूप में दर्ज कर रहे थे. होता यह था कि दिनेश मै या अन्य साथी कबीर मंडलियों के साथ बैठते और जो वो गाते या बोलते थे या उनके पास कोई डायरी होती हम उसमे से लिख लेते उसे टाईप करा लेते और फिर कबीर के मानकीकृत बीजक में से मिलान करते और फिर मंडलियों से चर्चा करते कि यह शब्द क्यों बदला गया या अर्थ क्या है आदि आदि. 

प्रहलाद जी की पहली भजन के कैसेट डा सुरेश पटेल के साथ हम लोगों ने सतप्रकाशन इंदौर से बनवाई थी और फिर यह लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि इसका जिक्र करना ही मुश्किल है. गत वर्ष प्रहलाद जी को पदम् श्री से विभूषित किया गया है. इस बीच कबीर भजन विचार मंच का काम बहुत आगे बढ़ा तथाकथित कबीर पंथियों को इस कार्यक्रम से दिक्कतें भी हुई. 


 बीच स्टेनफोर्ड विवि अमेरिका से प्रोफ़ेसर लिंडा हैज़ हमसे एक बार आकर मिली तो उन्हें यह बहुत अच्छा लगा और फिर उन्होंने ऐसा काम हाथ में लिया कि पिछले दस वर्षों से वो यही काम आकर रही है. उन्होंने कबीर की वाचिक परम्परा का गहरा अध्ययन किया, उन्होंने कबीर भजनों का अंग्रेजी में अनुवाद किया ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस से उनकी किताबें आई है. इस बीच वे प्रहलाद जी को अमेरिका ले गयी. वहाँ उनके कार्यक्रम कई विश्व विद्यालयों में करवाए है. प्रो. लिंडा ने खुद हिन्दी सीखी और गहरा काम किया आज वे देश विदेश में कबीर की वाचिक परम्परा की विशेषग्य है.


आज अपने शोध के दस वर्ष पुरे होने और काम ख़त्म होने का उन्होंने एक अनूठा काम किया. आज देवास में ढेरों कबीर मंडलियों को स्थानीय मल्हार स्मृति मंदिर में बुलाकर सुना, उन्हें कुछ नगद राशि दी और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित भी किया. उनकी नई किताब भी आ रही है. यह कठिन काम करके वे अपने देश में एक नया उदाहरण बन गयी है. एक ओर जहां हमारे विवि में लोग कुछ भी शोध करते रहते है जिसका कोई ओर छोर नहीं होता वही लिंडा ने एक अनजान देश में नई भाषा सीखकर एक लुप्त प्रायः होती परम्परा को पुनर्जीवित किया और उसका दस्तावेजीकरण करके दुनिया के सामने कबीर की नए तरह से व्याख्या सामने रखी. साथ ही मालवा के उन लोगों में कबीर को लेकर एक नया अलख जगाया जो संभव नहीं था. शबनम वीरमानी ने भी इसी तर्ज पर चार फ़िल्में बनाई है जिनका जिक्र फिर कभी बहरहाल आज के इस कबीर मिलन समारोह की तस्वीरें आपके लिए. एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस कार्यक्रम में शिरकत करने विदुषी कलापिनी कोमकली विशेष रूप से उपस्थित थी और उन्होंने निर्गुण शब्द और निर्गुणी भजनों की बात में शब्द और विचार को महत्त्व देते हुए दो भजन सुनाये. 

देवास में बगैर शोर शराबे के संपन्न हुए इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में जो सादगी और भव्यता थी वो मेरे लिए अकल्पनीय थी. प्रो लिंडा हैज़, राजीव नेमा, प्रहलाद जी, कलापिनी, कैलाश सोनी, अरविंद सरदाना, मित्र बहादुर, दिनेश पटेल और डा प्रकाश कान्त, संजीवनी ताई, जीवन सिंह ठाकुर, अविनाश गोडबोले, उपकार, विवेक, नमन जोशी, आदि गणमान्य लोगों की वजह से यह आयोजन ऐतिहासिक बन गया.

Monday, December 16, 2013

"औरतें"- उदय प्रकाश की कविता

वह औरत पर्स से खुदरा नोट निकाल कर कंडक्टर से अपने घर
जाने का टिकट ले रही है
उसके साथ अभी ज़रा देर पहले बलात्कार हुआ है

उसी बस में एक दूसरी औरत अपनी जैसी ही लाचार उम्र की दो-तीन औरतों के साथ
प्रोमोशन और महंगाई भत्ते के बारे में
बातें कर रही है
उसके दफ़्तर में आज उसके अधिकारी ने फिर मीमो भेजा है

वह औरत जो सुहागन बने रहने के लिए रखे हुए है करवा चौथ का निर्जल व्रत
वह पति या सास के हाथों मार दिये जाने से डरी हुई
सोती सोती अचानक चिल्लाती है
एक और औरत बालकनी में आधीरात खड़ी हुई इंतज़ार करती है
अपनी जैसी ही असुरक्षित और बेबस किसी दूसरी औरत के घर से लौटने वाले
अपने शराबी पति का

संदेह, असुरक्षा और डर से घिरी एक औरत अपने पिटने से पहले
बहुत महीन आवाज़ में पूछती है पति से -
कहां खर्च हो गये आपके पर्स में से तनख्वाह के आधे से
ज़्यादा रुपये ?

एक औरत अपने बच्चे को नहलाते हुए यों ही रोने लगती है फूट-फूट कर
और चूमती है उसे पागल जैसी बार-बार
उसके भविष्य में अपने लिए कोई गुफ़ा या शरण खोज़ती हुई

एक औरत के हाथ जल गये हैं तवे में
एक के ऊपर तेल गिर गया है कड़ाही में खौलता हुआ

अस्पताल में हज़ार प्रतिशत जली हुई औरत का कोयला दर्ज कराता है
अपना मृत्यु-पूर्व बयान कि उसे नहीं जलाया किसी ने
उसके अलावा बाक़ी हर कोई है निर्दोष
ग़लती से उसके ही हाथों फूट गयी थी किस्मत
और फट गया था स्टोव

एक औरत नाक से बहता ख़ून पोंछती हुई बोलती है
कसम खाती हूं, मेरे अतीत में कहीं नहीं था कोई प्यार
वहां था एक पवित्र, शताब्दियों लंबा, आग जैसा धधकता सन्नाटा
जिसमें सिंक-पक रही थी सिर्फ़ आपकी खातिर मेरी देह

एक औरत का चेहरा संगमरमर जैसा सफ़े़द है
उसने किसी से कह डाला है अपना दुख या उससे खो गया है कोई ज़ेवर
एक सीलिंग की कड़ी में बांध रही है अपना दुपट्टा
उसके प्रेमी ने सार्वजनिक कर दिये हैं उसके फोटो और प्रेमपत्र

एक औरत फोन पकड़ कर रोती है
एक अपने आप से बोलती है और किसी हिस्टीरिया में बाहर सड़क पर निकल जाती है
कुछ औरतें बिना बाल काढ़े, बिना किन्हीं कपड़ों के
बस अड्डे या रेल्वे प्लेटफ़ार्म पर खड़ी हैं यह पूछती हुई कि
उन्हें किस गाड़ी में बैठना है और जाना कहां है इस संसार में

एक औरत हार कर कहती है -तुम जो जी आये, कर लो मेरे साथ
बस मुझे किसी तरह जी लेने दो

एक पायी गयी है मरी हुई बिल्कुल तड़के शहर के किसी पार्क में
और उसके शव के पास रो रहा है उसका डेढ़ साल का बेटा
उसके झोले में मिलती है दूध की एक खाली बोतल, प्लास्टिक का छोटा-सा गिलास
और एक लाल-हरी गेंद, जिसे हिलाने से आज भी आती है
घुनघुने जैसी आवाज़

एक औरत तेज़ाब से जल गयी है
खुश है कि बच गयी है उसकी दायीं आंख
एक औरत तंदूर में जलती हुई अपनी उंगलियां धीरे से हिलाती है
जानने के लिए कि बाहर कितना अंधेरा है

एक पोंछा लगा रही है
एक बर्तन मांज रही है
एक कपड़े पछींट रही है
एक बच्चे को बोरे में सुला कर सड़क पर रोड़े बिछा रही है

एक फ़र्श धो रही है और देख रही है राष्ट्रीय चैनल पर फ़ैशन परेड
एक पढ़ रही है न्यूज़ कि संसद में बढ़ाई जायेगी उनकी भी तादाद

एक औरत का कलेजा जो छिटक कर बोरे से बाहर गिर गया है
कहता है - 'मुझे फेंक कर किसी नाले में जल्दी घर लौट आना,
बच्चों को स्कूल जाने के लिए जगाना है
नाश्ता उन्हें ज़रूर दे देना,
आटा तो मैं गूंथ आई थी

राजधानी के पुलिस थाने के गेट पर एक-दूसरे को छूती हुईं
ज़मीन पर बैठी हैं दो औरतें बिल्कुल चुपचाप
लेकिन समूचे ब्रह्मांड में गूंजता है उनका हाहाकार

हज़ारों-लाखों छुपती हैं गर्भ के अंधेरे में
इस दुनिया में जन्म लेने से इनकार करती हुईं
लेकिन वहां भी खोज़ लेती हैं उन्हें भेदिया ध्वनि-तरंगें
वहां भी,
भ्रूण में उतरती है
हत्यारी तलवार ।

------ उदय प्रकाश
December 16, 2013 at 12:15pm

('रात में हारमोनियम', वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली: 1998)

जनसत्ता 16/12/13 में अग्रिम की कहानी


Sunday, December 15, 2013

बकलोल शेर,और गंजडी घोड़ा


फिर घोड़े ने गांजे का एक लंबा बेहतरीन कश लिया उसके स्वर में थोड़ी खरखराहट थी आँखों में हल्का सा गुबार था, उसने अपनी थूथन को पटका और फिर घटिया सी दिखने वाली भौंहें उठाई और गधों को लगभग चुनौती देते हुए कहा कि मुझसे अच्छा रेंकने वाला कोई नहीं है मै ना मात्र रेंक सकता हूँ वरन, चिंघाड़ भी सकता हूँ, टर्र-टर्र भी कर सकता हूँ, भौंक भी सकता हूँ, चहचहा भी सकता हूँ, मीठी कूक भी निकाल सकता हूँ इस जंगल के सारे मूर्ख शेर मेरे कब्जे में है और फिर मै एक घोड़ा हूँ यह तुम गधों को याद रखना चाहिए ऐसा कहकर वह बहुत ही कातर स्वर में मिमियाने लगा, उसके हाथ-पाँव कांपने लगे, चेहरा मुरझा गया. आखिर घोड़े को भी अपराध बोध तो सालता था क्योकि वह भी एक सरीसृप से निकल कर इस भीषण युग में विकास की सीढियां चढ़ता हुआ आया था इस सितारा संस्कृति में, अपने विकृत अतीत को याद करते हुए रोने लगा, उसे याद आया अपना दोहरा-तिहरा चाल चरित्र और अपना अपमान जो लगातार होता रहा- कभी नदी के मुहाने पर, कभी गेंडे के छज्जे पर, कभी वो पेन्ग्युईन बना, कभी शुतुरमुर्ग बनकर जमाने से अपने आपको छुपाता रहा, इस जंगल में रोज नया घटता देख उसकी आत्मा चीत्कार उठती, अचानक उसका गांजा ख़त्म होने लगा तो गधों को लगा कि यही सही समय है जब दुलत्ती मार दी जाए इस घोड़े को और फिर शेर सहित इस घोड़े को इसी नरक में पटक कर कही ऐसे जंगल में जाया जाए जहां कम से घोड़े, घोड़े तो बनकर रहें- उल्लू, मगरमच्छ, सियार, लोमड़ी, उदबिलाव, सांप और घडियाली आंसू बहाने वाले बाकी नपुंसक मच्छरों से हम निपटने में माहिर है. गांजे की चिलम को घोड़े के हाथों में थमाकर गधों ने जंगल राज का संविधान और शिक्षा की पवित्र किताब उसके हवाले कर दी और कहा कि अपने बकलोल शेर (?) से कहना कि गधों ने जंगल देखे है, ज़माना देखा है और जानवर देखे है पर टट्टू के भेष में ना घोड़े देखे, ना बकलोल शेर, हमने युग देखे है, हम इतिहास बनाते है, और हर जंगल के और दुनिया के अपने तरीके और उसूल होते है जो एक न्यूनतम और वाजिब मूल्यों और मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित होते है, उनका पालन किया जाना चाहिए, अगर तुम्हारे उसूलों से दुनिया चलती तो अब तक सारा जहां बदल गया होता.

और फिर एक दिन घोड़े को जब असलियत का मालूम पडा तो उसने दूर देश में जा चुके गधे को लिखा कि जंगलराज में सब कुछ ख़त्म हो चुका है उस खच्चर के कारण और दोगले साँपों के कारण जंगल का क़ानून भयानक बिगड़ चुका है, घोड़े की खिसियानी जिन्दगी अब इन टट्टूओं, सांप, नेवलों, मगरमच्छों, खच्चर और उल्लूओं पर ही निर्भर रह गयी है और इस वजह से उसका धंधा बुरी तरह प्रभावित हो रहा है, घोड़े का सन्देश लाने वाले दूत को गधे ने एक दुलत्ती मारकर विदा किया और कहा जाकर कहना अपने घोड़े से कि अब वो दिन लद गए जब गधे की कोई बिसात नहीं थी, यह उसके पूर्व जन्मों का फल है वरना गधे चाहते तो सब कुछ पारदर्शी करके लौटते और फिर घोड़े की पीढियां कभी जंगल में अपना अस्तित्व बचा नहीं पाती ख़त्म हो जाती पुरी पहचान और फिर .खैर........गधे तो गधे और घोड़े तो घोड़े ही होते है- एक कामकाजी और दूसरा घोर निकम्मा..

फिर जंगल में घोड़े ने एक बड़े और मोटे ताजे गधे को नियुक्त करते हुए कहा कि अब से यह राज तुम्हारा है, यहाँ के सब जानवर तुम हांकना, सारे उदबिलाव, उल्लू, मगरमच्छ, सियार, सांप और नेवलों के बीच रहकर इस जंगल को चमन बना देना. बेचारा गधा नया था उसे रेंगना भी नहीं आता था इस जंगल में भाषा भी नई थी, उसे ना पानी दिया, न घास दिखाई, न सूरज की उजली किरणें दिखाई कि वो जंगल में जीवन जीने का किंचित यत्न भी करता, एक पौर्णिमा बीती और फिर कृष्ण पक्ष की काली रात शुरू हुई जब सियारों ने रेंकना शुरू किया और उल्लूओं ने चहकना, गंदले पानी में दूर देश के पक्षी उड़कर आये तो अपने साथ अपनी गंदी मिट्टी से गंदे बीज लाकर फिर बोने लगे जहर, तो गधे को कुछ समझ आया उसने तुरंत निर्णय लिया और एक दिन जब ठंड से सारा जंगलराज सरोबार हो रहा था, सूरज की किरणे कही नजर नहीं आ रही थी वो घोड़े के जंगलराज को मात्र एक शुक्ल और एक कृष्ण पक्ष से कम समय में दुलत्ती मारकर भाग गया और जाकर बोला सालों घोड़ों तुम सूअरों से भी ज्यादा बदजात हो, तुम तो जानवर तो क्या इंसानों से भी गए गुजरे हो और तुम्हे नरक नहीं स्वर्ग नहीं त्रिशंकु भी नसीब ना होगा.
अब घोड़े किसी नए उल्लू की तलाश कर रहे है जो जंगल राज को नया राजस्व उगाकर दे सकें.

Wednesday, December 11, 2013

"सिर्फ युवराज ही नहीं, अग्रिम भी जीत रहा है एक लम्बी लड़ाई कैंसर के खिलाफ"





देश  में कैंसर के खिलाफ और तमाम ऐसी असाध्य बीमारियों से लड़ने के जीवंत किस्से हम अक्सर सुनते रहते है और जब हम पढ़ते है तो एक मामूली खबर सोचकर टाल जाते है या दहशत से काँप भी उठते है. बात जुलाई की है जब मै हरदोई गया था, अपने एक साथी के घर खाना खा रहा था- बाहर दोपहर के समय तीन बच्चे खेल रहे थे, ध्यान नहीं गया. 

थोड़े  दिनों बाद इसी साथी ने बताया कि उनमे से एक बेटा मेरे छोटे भाई का है जिसे हरदोई से डाक्टरों ने लखनऊ रेफर किया है क्योकि उसका हीमोग्लोबिन स्थिर नहीं रह पा रहा और बार-बार खून देने के बाद भी रक्त की अल्पता से डाक्टर भी परेशान है. मेरा मन किसी अनिश्चित कुशंका से काँप गया सिर्फ सात साल का था यह बच्चा. फिर जो होना था वही सच हुआ उसे लखनऊ लाया गया ताबड़ तोब और रातम- रात किसी तरह से जुगाड़ करके संजय गांधी पी जी आई, लखनऊ, में भर्ती कराया गया. उसके पिता शीतेंद्र इंदौर में मूक बधिर बच्चों के लिए स्पेशल टीचर का कोर्स कर रहे थे और माँ उन्नाव जिले के किसी स्कूल में सरकारी अध्यापिका है. बस फिर क्या था शीतेंद्र को अपना कोर्स छोड़कर आना पडा और माँ ने छः माह की छुट्टी के लिए आवेदन किया पर सरकारी अधिकारियों को कहाँ यह पचता है स्थानीय बी एस ए ने अडंगा लगा रखा है. अग्रिम को रक्त कैंसर की बीमारी से ग्रस्त घोषित किया गया. 

खैर, अग्रिम का महँगा इलाज शुरू हुआ- रोज जांच और कड़ी परीक्षा डाक्टरों ने कह दिया कि अब इसे हरदोई ना ले जाया जाए क्योकि कमोबेश रोज ही पी जी आई आना पडेगा, सो माँ बाप ने सामने ही एक रेस्ट हाउस में एक कमरा ले लिया और रहने लगे अपने लाडले का इलाज करवाने के लिए. हर तीसरे दिन खून की दो- तीन यूनिट और महंगी दवाएं, मोटी सुईयां और कीमोथेरेपी, बस इस सबमे लगभग छः माह बीत गए. हालत कभी नर्म कभी गरम और चिंताजनक हो जाते हम सब बहुत तनाव में थे मेरे सहकर्मी साथी भी अक्सर परेशान रहते. 

अभी  तीन दिसम्बर को मेरे साथी ने कहा कि सर आप हरदोई अकेले आ रहे है ना गाडी से, मैंने कहा हाँ क्यों, तो बोला कि भैया को घर लाना था डाक्टरों ने उसे घर जाने की इजाजत दे दी है, बस फिर क्या था मै बहुत खुश हुआ. शाम को भीड़ भरे इलाके से और गंदे ट्राफिक से बचते हुए पी जी आई पहुंचे तो अग्रिम बाहर खेल रहा था. चहक उठा उसे याद था कि मैंने उसके लिए एक बड़ी वाली कैडबरी लाई थी जो वो खा नहीं पाया था, और फिर तो गाडी में बैठकर जो बोलना शुरू किया कि बस. आज वो कैद से बाहर था और अपने दादा-दादी और भाई बहनों से मिलने अपने घर हरदोई जा रहा था. कडाके की सर्दी पर उसे कहाँ फ़िक्र, अपने घर की याद में छः माह से वो बेचैन था. मैंने पूछा कि क्या खाओगे तो बोला खाना तो बहुत कुछ है खट्टा भी पर अभी साले डाक्टरों ने मना किया है, पर दादी और माँ ने वादा किया है कि वो टमाटर की चटनी बनायेंगे जब मै घर जाउंगा. स्कूल छुट रहा है, अंकल पर थोड़े दिनों में मै सब कव्हर कर लूंगा फिर अपनी कक्षा में पहला नंबर लाकर दिखाउंगा. पी जी आई में डाक्टर बहुत अच्छे है पर मै कभी डाक्टर नहीं बनूंगा क्योकि जो दूसरों को तकलीफ दें वो भी कोई पढाई है. मेरी कीमो में मेरे सर के सब बाल उड़ गए, पर ठीक है आ जायेंगे. 

सात  साल का बच्चा छः माह में इतना परिपक्व हो गया कि बस, फिर बोला अंकल आपको मालूम है कि क्रिकेट के युवराज सिंह को भी ऐसी ही बीमारी थी जब वो ठीक होकर खेल रहा है तो मेरा भी तो आज बोनमेरो टेस्ट हुआ है और फिर जल्दी ही पापा मम्मी ४५ बोतल खून का इंतजाम करेंगे और मेरा भी बोनमेरो लग जाएगा तो मेरे भी खून बनने लगेगा ना ? उसने बताया कि कैसे मोटी रॉड उसकी रीढ़ की हड्डी में डाली गयी बोनमेरो निकालने के लिए कितना रोया था वो .........मेरी आँख में आंसू थे मैंने कहा जरुर बेटा तुम्हारे लिए हम ४५ क्या ४५००० बोतल खून की व्यवस्था कर लेंगे........शीतेंद्र और विनीता सुन रहे थे...........बहुत सारा रूपया खर्च हो गया है और अब यह छः माह में घर जा रहा है तो हमें जो खुशी मिल रही है वह आपको बता नहीं सकते. आठ दिन घर रहकर अग्रिम पुनः एक बार इलाज के लिए पीजीआई आ गया है. फिर से जांच के दुश्चक्र में और लम्बी प्रक्रिया में पड़ गया है पर अब खुशी की बात यह है कि उसके शरीर ने सकारात्मक परिणाम देने शुरू कर दिए है और उम्मीद है कि वह जल्दी ही ठीक होकर अपने घर जा सकेगा और फिर से घर की मस्ती में अपनी कक्षा में और स्कूल, मोहल्ले में शामिल हो सकेगा.

आज का दिन मेरे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि मैंने अग्रिम से और उसके माता-पिता से पूछकर उसकी तस्वीरें ली थी और यहाँ लिखने की अनुमति ली थी आज की तारीख इतिहास में बहुत ही अनूठी है सो सोचा कि इसे और श्रेष्ठ बनाने के लिए इस नन्हें फ़रिश्ते की वो कहानी आपके साथ बांटू जिससे जाम्बाजी का नया हौंसला मिलता है. आप सबसे यही इल्तिजा है कि इस नन्हें जाम्बाज के लिए दुआएं करें, अपने शुभार्शिवाद दें और अपने आसपास नजर रखे कि कही कोई घातक बीमारी किसी को अपने पंजे में ना लपेट लें. अग्रिम के लिए खूब सारा प्यार, दुआएं और शुभकामनाएं. और उसके परिवार के हौंसलें और हिम्मत के लिए सलाम कि कितने धैर्य से उन्होंने सब सहकर अपने इस नन्हें बच्चे की जान बचाई है. सच में बड़ा कठिन है यह सब सह पाना और फिर लड़कर निकल पाना. मै खुद कई लड़ाईयां लड़ चुका हूँ और अभी भी एक मोर्चे पर लड़ रहा हूँ तो समझ सकता हूँ कि क्या हालत होती है जब घर का एक सदस्य बीमार होता है ..........




Monday, December 9, 2013

भारत के लोग आज दिनांक 9 दिसंबर को आपको दिल्ली की गद्दी हवाले करते है

चलो अब ढंग से काम धाम पर लगो............लोकतंत्र है हार-जीत सब चलता है और सबको सब मान लेना चाहिए, मै लोगों के मतों की इज्जत करता हूँ और देश के चार राज्यों को हार्दिक बधाई देता हूँ कि कांग्रेस से और गांधी परिवार से पहली बार गत सात दशकों में छुटकारा मिला है. 


अब बारी केंद्र में बदलाव की है और देश के अन्य दीगर राज्यों में भी जैसे उप्र में सपा और बसपा से मुक्ति की कामना, बिहार में नितीश और लालू से मुक्ति की कामना, बंगाल में ममता और दक्षिण में क्षेत्रीय पार्टियों से मुक्ति की कामना में लोग कुलबुला रहे है........


बस हम सबको राहत मिलनी चाहिए, बिजली, सड़क, पानी के अलावा गैस प्याज से लेकर सीमा पर नित रोज मर रहे हमारे सिपाहयों की मौत से, शिक्षा स्वास्थ्य, महिलाओं के अधिकार और समतामूलक समाज, हिंसा और अलगाववाद की हर उस कोशिश से जो देश को देश नहीं रहने देती. हमें अपने किसानों की चिन्ता है जो सरकारी नीतियों की वजह से आत्महत्या कर रहे है , अब समय है कि इन मुद्दों पर तसल्ली से काम करो बजाय चुनाव परिणामों का विश्लेषण और पोस्टमार्टम करने से.


देश के जिन युवाओं ने आपको साथ दिया चाहे कमल या झाडू को उनके लिए कुछ करो कब तक इन्हें अपने मकडजाल में आप फंसाते रहेंगे, कब तक इस्तेमाल करते रहेंगे, खाकी निक्कर पहनाकर बेरोजगार रखेंगे या धरना प्रदर्शन और भूख हड़ताल में शामिल कर अपनी भीड़ बढाते रहेंगे? इनकी भी अपनी जिन्दगी है ख्वाब है परिवार बसाना है अपने माँ-बाप की सेवा करनी है और भले ही एक आम आदमी की तरह पर जिन्दगी जीना है, दुनिया के सबसे बड़े युवा मुल्क की चिन्ता करिए रोजगारों का सृजन करिए और हर हाथ को झाड़ू नहीं काम दीजिये नरेगा के भ्रमजाल से निकलिए.


देश के सारे फ्लेगशिप कार्यक्रमों को बंद कीजिये-जैसे सर्व शिक्षा अभियान, कुपोषण बनाम पोषण आहार, शौचालय निर्माण, नरेगा, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, आदि जैसे कई ढकोसले है, चूँकि ये राज्य के मामले है अतः इन्हें राज्यों को विकेन्द्रित ढंग से हल करने दीजिये और देशी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों को भी कहिये कि बॉस काम करो वरना फूट लो यहाँ से, यूनिसेफ जैसे निकम्मे और मगरूर संस्थाओं का लायसेंस कैंसिल करिए- देश की समस्याएं हमारी है हम निपट लेंगे इन्हें बाहर करिए पहले और तमाम ऐसी जगहों पर जो काले लोग बैठे है उन्हें भी देश के प्रति जिम्मेदार बनाईये मुफ्तखोरों के मारे देश परेशान है. योजना आयोग के लोगों को बदलिए और सिर्फ कागजी शेरो को दहाड़ मारने के बजाय फील्ड में भेजिए.


एनजीओ कल्चर और कार्यशैली पर प्रतिबन्ध लगाईये और जो बहुत ही घटिया किस्म के लोग बगैर सोच समझ और विचारधारा के इस एनजीओ में घूस गए है उन्हें काले पानी की सजा दे दीजिये और कहिये कि फील्ड में जाओ काम करो वरना दूकान बंद.......!!!


मीडिया को बेलगाम होने से रोकिये और इस मीडिया को भी सबक सीखाईये क्योकि देश का नब्बे प्रतिशत नुकसान आपने नहीं, इस मीडिया ने किया है और इस बात को गंभीरता से लें वरना दो हजार चौदह में ये फिर कोई नंगा नाच करके सारा खेल बिगाड़ देगा.........सतर्क रहिये........सावधान रहिये, जानते है ना आप एक प्रचलित नारा कि"सावधानी हटी और दुर्घटना घटी" 


केंद्र
में भी सत्ता सम्हाल लो हम भारत के लोग आज दिनांक 9 दिसंबर को आपको दिल्ली की गद्दी हवाले करते है डा मनमोहन सिंह ने इस्तीफा दे ही दिया है यह मान लो..............बस हमारे मुद्दों पर काम करो प्लीज़...........

Monday, December 2, 2013

हत्याहरण ( हरदोई) और पाप मुक्ति का स्वप्न













कहते है प्रभु श्रीराम को रावण जैसे महाविदवान को मारने के बाद बेहद गंभीर पश्चाताप हुआ तो उन्होंने हिरन्यकश्यप की राजधानी के समीप एक जगह पर अपने जादूई प्रताप से एक कुण्ड की रचना की और उसमे अपने आप  को नहलाकर अपने ह्त्या के पाप से मुक्त किया.  कहते है कि जिसने भी ऐसे या कोई और भी पाप किये हो तो वो यहाँ आकर अपने आपको मुक्त कर सकता है. 

इस जगह का नाम है "हत्याहरण" पहले तो मुझे आश्चर्य हुआ कि ऐसी कोइ जगह होगी या Proper Noun के रूप में किसी गाँव या कसबे का नाम ऐसा कैसे हो सकता है परन्तु जब आज कुछ दफ्तरी काम से गया तो आज देखा कि सब सच है, आज सौभाग्य (?) से अमावस्या थी ऐसा वहाँ दान दक्षिणा की अपेक्षा करने वाले पंडित जी ने बताया कि जजमान आज बड़े मुहूर्त से आये हो तो सारे पापों से मुक्त हो जाओगे बस फिर क्या कुण्ड में सैंडिल पहनाकर ही पाप मुक्त हो गए.....

इस कुण्ड के मुहाने पर एक इंटर कॉलेज बना है जहां पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य गहरे अन्धकार में तो है ही साथ ही सुना कि यहाँ रूपये लेकर परीक्षा पास करवाने का भी धंधा होता है. खैर...आप चित्र देखकर पाप मुक्त होईये..

तुम्हें कोई खत्म नहीं कर सकेगा - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना


तुम धूल हो 
ज़िन्दगी की सीलन से 
दीमक बनो 
रातोंरात। 

सदियों से बन्द इन 
दीवारों की खिड़कियां , दरवाज़े 
और रौशनदान चाल दो। 

तुम धूल हो 
ज़िन्दगी की सीलन से जनम लो
दीमक बनो , आगे बढ़ो।

एक बार रास्ता पहचान लेने पर
तुम्हें कोई खत्म नहीं कर सकेगा।

- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

Saturday, November 30, 2013

सत्ता - उदय प्रकाश

सत्ता............ 

-उदय प्रकाश 


जो करेगा लगातार अपराध का विरोध
अपराधी सिद्ध कर दिया जायेगा

जो सोना चाहेगा वर्षों के बाद सिर्फ़ एक बार थक कर
उसे जगाये रखा जायेगा भविष्य भर

जो अपने रोग के लिए खोज़ने निकलेगा दवाई की दूकान
उसे लगा दी जायेगी किसी और रोग की सुई 

जो चाहेगा हंसना बहुत सारे दुखों के बीच
उसके जीवन में भर दिये जायेंगे आंसू और आह

जो मांगेगा दुआ, 
दिया जायेगा उसे शाप
सबसे सभ्य शब्दों को मिलेगी
सबसे असभ्य गालियां

जो करना चाहेगा प्यार
दी जायेंगी उसे नींद की गोलियां

जो बोलेगा सच
अफ़वाहों से घेर दिया जायेगा 
जो होगा सबसे कमज़ोर और वध्य
बना दिया जायेगा संदिग्ध और डरावना

जो देखना चाहेगा काल का सारा प्रपंच
उसकी आंखें छीन ली जायेंगी
हुनरमंदों के हाथ
काट देंगी मशीनें


जो चाहेगा स्वतंत्रता
दिया जायेगा उसे आजीवन कारावास !
एक दिन लगेगा हर किसी को
नहीं है कोई अपना, कहीं आसपास !!

यातना - अरुण कमल

समय के साथ-साथ बदलता है
यातना देने का तरीका
बदलता है आदमी को नष्ट कर देने का रस्मो-रिवाज

बिना बेड़ियों के
बिना गैस चैम्बर में डाले हुए
बिना इलेक्ट्रिक शाक के
बर्फ पर सुलाए बिना

बहुत ही शालीन ढंग से
किसी को यातना देनी हो
तो उसे खाने को सब कुछ दो
कपड़ा दो तेल दो साबुन दो
एक-एक चीज दो
और काट दो दुनिया से
अकेला बंद कर दो बहुत बड़े मकान में
बंद कर दो अकेला
और धीरे-धीरे वह नष्ट हो जायेगा
भीतर ही भीतर पानी की तेज धार
काट देगी सारी मिट्टी
और एक दिन वह तट
जहाँ कभी लगता था मेला
गिलहरी के बैठने-भर से
ढह जायेगा ।

-अरुण कमल

Friday, November 22, 2013

होने और मेरे बनने में तीन देवियाँ -चंदू दीदी, शोभना मैडम, और लीला दीदी

शायद कुछ पल ऐसे होते है जब हम गहरी निराशा में होते है और अचानक कही से अपने आ मिलते है, तो सारी उदासी दूर हो जाती है और हम चहक उठते है बच्चों से. लखनऊ में ऐसे ही कुछ विचित्र समय से गुजर रहा हूँ मै इन दिनों. 






                                             (बाए से चंदू दीदी, शोभना मैडम, और लीला दीदी)

अचानक से देवास के बीस बाईस लोग एक साथ आ मिलें वरिष्ठजनों के राष्ट्रीय सम्मलेन में. इनमे मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण थे तीन देवियाँ जिन्होंने मेरे होने में बहुत बड़ा योगदान दिया है. माँ तो पहली गुरु थी, बाद में दादी को अपना आदर्श भी मानता रहा. पर शाला की पहली गुरु शोभना शाह जो गुजराती होने के बाद भी मराठी प्राथमिक विद्यालय में मेरी पहली शिक्षिका बनी और पांचवी तब बोर्ड हुआ करता था, गणित में इन्ही की बदौलत ग्रेस से पास हुआ. आज जब मै इनसे कह रहा था तो बोली भले ही तू गणित में कच्चा था पर आज दुनिया के गणित में तो बड़ा सुलझा हुआ है. इनके तीनों बच्चे मेरे हम उम्र ही थे. दूसरी दो महिलायें है सुश्री लीला राठोड और श्रीमती चन्द्रकला तिवारी यानी चंदू दीदी ये दोनों दीदियों की वजह से मैंने स्काउट में हिस्सेदारी की, रोवर्स में हिस्सेदारी की. जिन्दगी के कम से कम सौ कैम्प इनके साथ किये और जीवन का अनुशासन सीखा.  

ये ना होती तो मै जीवन में कभी राष्ट्रपति पुरस्कार सन १९८२ में ले नहीं पाता और राष्ट्रपति थे स्व. नीलम संजीव रेड्डी से मद्रास में. आज शोभना शाह मैडम से मै करीब पच्चीस बरसों बाद  मिला पर लगा ही नहीं कि हमारे बीच इतना लंबा समय का फासला रह गया था और गंगा में इतना पानी बह गया था. लीला दीदी और चंदू दीदी ने जो स्नेह दिया और देवास से लाई हुई मिठाई खिलाई उसकी मिठास शायद ताउम्र बनी रहेगी. 

आप सब स्वस्थ रहे और खूब खुश रहे यही दुआ मै कर सकता हूँ, आप तीन मेधावी और मेरे जीवन को आकार देने वाली महिलाओं को नमन. एक बात तीनों ने एक स्वर से कही कि "संदीप अब बहुत हो गया घर आ जा बेटा, अपना इलाका और अपने लोग अपने ही होते है और फिर हम है ना मदद करने के लिए, जो तू कहेगा वो हम करेंगे........." इतना विश्वास और कौन कर सकता है आंसू आ गए मेरी आँखों में, आते समय ........

यह सिर्फ निश्चल और मातृत्व भरा स्नेह है, और विश्वास रखिये मै जल्दी ही वापिस आ रहा हूँ.........अपने घर .........मित्रों दुआ करिए कि मै लौट जाऊं वहाँ सब अपने है पराया कोई नहीं......!!!

Wednesday, November 20, 2013

इन्सुलिन के जनक डॉ. फ़्रेडरिक सेंगर

Photo: डॉ. फ़्रेडरिक सेंगर का कल निधन हो गया। 

डॉ. सेंगर ने इंसुलिन नामक प्रोटीन को सीक्वेंस (सूचीबद्ध) किया था और इसी के कारण डायबिटीज़ के मरीज़ों को इंसुलिन उपलब्ध हो पाया। इस खोज के लिए 1958 में डॉ. सेंगर को रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया।

1980 में उन्हें एक बार फिर से रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया! इस बार उन्हें यह सम्मान न्यूक्लिक एसिड को सीक्वेंस करने के लिए दिया गया था। इससे विभिन्न जीवों के डी.एन.ए. को समझने में मदद मिली और बहुत-सी बीमारियों के बेहतर इलाज की खोज आसान हुई।

डॉ. सेंगर जैसे वैज्ञानिक मानवता के रत्न हैं। इंसुलिन की उपलब्धता ने करोड़ों जाने बचाई हैं और करोड़ों लोगों को बेहतर जीवन का वरदान दिया है। डॉ. सेंगर मेडिकल रिसर्च काउंसिल से जुड़े थे -मुझे गर्व और खुशी है कि इसी संस्थान के लिए मैंने भी थोड़ा-सा कार्य किया। डॉ. सेंगर को हार्दिक श्रद्धांजली।



दुखद खबर परन्तु घटिया राजनैतिक खबरों के बीच एक अच्छी जानकारी देने वाला मित्र ललित कुमार का स्टेट्स. आज इसको पढ़कर इस महान व्यक्ति के बारे जान पाया, जिस इन्सुलिन को सन 1975 से अपने परिजनों के लिए उपयोग कर रहा था और शायद अब अपने लिए भी करना पड़े, के जनक को नमन. ऐसी खबरों का स्रोत फेसबुक से बेहतर कोई और नहीं हो सकता. धन्यवाद भाई ललित

डॉ. फ़्रेडरिक सेंगर का कल निधन हो गया। 


डॉ. सेंगर ने इंसुलिन नामक प्रोटीन को सीक्वेंस (सूचीबद्ध) किया था और इसी के कारण डायबिटीज़ के मरीज़ों को इंसुलिन उपलब्ध हो पाया। इस खोज के लिए 1958 में डॉ. सेंगर को रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया।



1980 में उन्हें एक बार फिर से रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया! इस बार उन्हें यह सम्मान न्यूक्लिक एसिड को सीक्वेंस करने के लिए दिया गया था। इससे विभिन्न जीवों के डी.एन.ए. को समझने में मदद मिली और बहुत-सी बीमारियों के बेहतर इलाज की खोज आसान हुई।



डॉ. सेंगर जैसे वैज्ञानिक मानवता के रत्न हैं। इंसुलिन की उपलब्धता ने करोड़ों जाने बचाई हैं और करोड़ों लोगों को बेहतर जीवन का वरदान दिया है। डॉ. सेंगर मेडिकल रिसर्च काउंसिल से जुड़े थे -

Monday, November 11, 2013

राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर मौलाना आजाद को याद करते हुए सभी शिक्षाविदों को बधाई


राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर मौलाना आजाद को याद करते हुए सभी शिक्षाविदों को बधाई, सभी शिक्षकों को  मुबारक शुभकामनाएं. आज के दिन स्व. विनोद रायना और अनिल सदगोपाल जैसे जमीन से जुड़े शिक्षाविदों को याद करना स्वाभाविक है. भोपाल में अनिल हर साल एक बड़ा और अच्छा आयोजन करते है.  

और एक अनुरोध कि शिक्षा को शिक्षा ही रहने दें, अपने ख्याली, हवाई, घोर नवाचारी और निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ ना करें. 

सभी एनजीओकर्मी जो भले ही शिक्षा का 'श' ना जानते हो, भले ही ट्रेक्टर बेचते जीवन बीत गया या खेती किसानी करते, या गैरेज पर टेम्पो और पुरानी सुवेगा या बजाज का स्कूटर सुधारते पर आप मेहरबानी करके अपने दिमागी तनाव और व्यक्तिगत फ्रस्ट्रेशन को बेचारे बच्चों और ट्रेंड शिक्षकों पर ना लादे. अपने अनपढ़, दसवीं या बारहवीं पास कार्यकर्ताओं को कम से कम स्कूल से दूर रखें जो स्कूल में जाकर बच्चों को गतिविधि शिक्षण के नाम पर कूड़ा परोसकर आते है और सारा समय अपने साथ जानकारियों का पुलिंदा भरते रहते है कि देश में इतना प्रतिशत बढ़ गया. 

सभी फंडिंग और युएन एजेंसी में काम करने वाले तमाम नोबल पुरस्कार प्राप्त करने लायक महान विकास कर्मियों से भी अनुरोध है कि अपने कुत्सित विचार और बेफालतू के मुगालते ना पालें कि आपके दिए चन्द रूपयों, बेहद घटिया और अनुपयोगी परन्तु चिकने चुपड़े कागजों पर चार गुना भाव पर छपी सामग्री से देश के हर बच्चे को शिक्षा मिल जायेगी और सब शिक्षा के अधिकार क़ानून का फ़ायदा उठा लेंगे. आप सिर्फ अपनी मोटी टेक्स फ्री कंसल्टेंसी, हवाई यात्रा, गाडी के एसी, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों से मधुर समबन्ध, उनकी बीबियों की जायज-नाजायज मांगों  और पीपीटी तक ही सीमित रहकर देश की बड़ी मदद कर सकते है, आपके द्वारा अपने चापलूस और भाई-भतीजे  और काम के बदले एसी कमरों में सिर्फ अंगरेजी में गिटिर पिटिर करने वाली छदम जेंडरियां और ऐसे तमाम पाले हुए बेहद अप्रतिबद्ध टुच्चे, एक रूपये ज्यादा पाने पर नौकरी बदल देने वाले समाज सेवा की डिग्रियां खरीदकर लाने वाले महान शूरवीर लोग भी शिक्षा से दूर रहे तो देश पर बड़ा कर्ज होगा. 

मीडिया में एनजीओ को दूह कर फेलोशिप जुगाड़ने वाले और बगैर अपनी दिमागी समझ के शिक्षा से लेकर हनोई वार्ता पर ज्ञान बघारने वाले, यहाँ वहाँ संपादकों के पाँव पड़ने वाले लेखक पत्रकार भी शिक्षा को छोड़कर लिखें अभी बहुत मुद्दे है देश में जिस पर आपंके एक्पर्ट ओपिनियन की जरुरत है- जैसे प्याज के भाव, मन मोहन सिंह और आडवानी के बीच सत्ता के सह सम्बन्ध, मोदी और मुलायम का आर्थिक गणित, अमित शाह और अशोक गेहलोत का चुनावी पैक्ट आदि. 

हमारा शिक्षक जो अभाव में, घोर अव्यवस्थाओं के बीच, भले ही अप डाउन करके बच्चों को पढ़ा रहा है उसे पढ़ा लेने दीजिये, आप तो चले जायेंगे अपना प्रोजेक्ट ख़त्म करके मेहरबानी करके किसी को दिवास्वप्न ना दिखाएँ. 

कुल मिलाकर प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो.  

Sunday, November 10, 2013

बिज्जी के साथ लोक कथाओं के संसार का खात्मा पर वृहद् समाज का सपना ज़िंदा



अनिल बोर्दिया, अरुणा राय, विजयदान देथा ये तीन वो लोग थे जिन्होंने मिल-जुलकर कई ख्वाब बुने थे और मजेदार यह था कि तीनों अलग अलग काम करते थे और अलग क्षेत्रों के थे. जब भी लोक जुम्बिश और कालान्तर में दूसरा दशक की कार्यशालाओं में जाता तो अनिल बोर्दिया के साथ बिज्जी अटैचमेंट के रूप में हमेशा जरुर रहते और कथाओं और प्रसंगों से सामाजिक बदलाव की बातों को इंगित करते, अरुणा, अनिल और बिज्जी ये तिकड़ी घंटों लम्बी बहस करती. बन्कर, शंकर और किसान मजदूर संगठन के साथी और हम भी भी लगे रहते पर कई बार बहस तीखी होने पर बिज्जी ही थे, जो सबको समेट कर रखते. 


Photo: अनिल बोर्दिया, अरुणा राय, विजयदान देथा ये तीन वो लोग थे जिन्होंने मिल-जुलकर कई ख्वाब बुने थे और मजेदार यह था कि तीनों अलग अलग काम करते थे और अलग क्षेत्रों के थे. जब भी लोक जुम्बिश और कालान्तर में दूसरा दशक की कार्यशालाओं में जाता तो अनिल बोर्दिया के साथ बिज्जी अटैचमेंट के रूप में हमेशा जरुर रहते और कथाओं और प्रसंगों से सामाजिक बदलाव की बातों को इंगित करते, अरुणा, अनिल और बिज्जी ये तिकड़ी घंटों लम्बी बहस करती.  बन्कर, शंकर और किसान मजदूर संगठन के साथी और हम भी भी लगे रहते पर कई बार बहस तीखी होने पर बिज्जी ही थे, जो सबको समेट कर रखते. 

लोक कथाओं को माध्यम बनाकर उन्होंने ना मात्र एक बड़े वृहद् समाज, जो समता मूलक था, की रचना बल्कि आख़िरी दम तक उसी बहुत अभाव और शोर शराबे से दूर वाले संस्थान में ज़िंदा रहे. मैंने  साहित्य में लोक, लोक चरित्रों और मिथकों का जो प्रयोग "बदलाव" के लिए करते बिज्जी को देखा है वह दुनिया के किसी भी भाषा में शायद ही मिलेगा. 

आज अनिल बोर्दिया नहीं है और अब बिज्जी का जाना, इस बीच परमानंद श्रीवास्तव, राजेन्द्र यादव का जाना हिन्दी का बड़ा नूकसान है. समझ नहीं आता कैसा विचित्र समय है. 

बिज्जी के कथा संसार और खासकरके उनके लोककथाओं में फैले बिम्बों और उपमाओं के बहाने एक नए समाज का स्वप्न, निर्माण और उसे पूरा करने के लिए अंतिम सांस तक लगे रहने वाले बिज्जी को आख़िरी नमन. 

आज बहुत पुरानी स्मृतियाँ एकाएक ताजा हो गयी- बीकानेर से लेकर लुनकरणसर, गढ़ी, सागवाडा, तिलोनिया,  जयपुर, भीलूडा, डूंगरपुर  और ना जाने कहाँ कहाँ के स्थान याद आ गए जब हम घंटों बैठकर पाठ्यक्रम भाषा और बदलाव की बातें करते थे, और फिर देर रात तक उन्ही के मुंह से लोककथाएँ सुनते थे.

पता नहीं इस साल के अंत तक और का क्या सुनना और देखना बाकी है अभी........

बिज्जी आप कही नहीं गए है बस उठकर यूँही टहल रहे है शायद और आकर फिर कहेंगे कि अच्छा सुनो राजस्थान में एक कथा है.............बंद करो अपनी फ़ालतू बातें !!!!

लोक कथाओं को माध्यम बनाकर उन्होंने ना मात्र एक बड़े वृहद् समाज, जो समता मूलक था, की रचना की, बल्कि आख़िरी दम तक उसी बहुत अभाव और शोर शराबे से दूर वाले संस्थान में ज़िंदा रहे. मैंने साहित्य में लोक, लोक चरित्रों और मिथकों का जो प्रयोग "बदलाव" के लिए करते बिज्जी को देखा है वह दुनिया के किसी भी भाषा में शायद ही मिलेगा. 

आज अनिल बोर्दिया नहीं है और अब बिज्जी का जाना, इस बीच परमानंद श्रीवास्तव, राजेन्द्र यादव का जाना हिन्दी का बड़ा नूकसान है. समझ नहीं आता कैसा विचित्र समय है. 

बिज्जी के कथा संसार और खासकरके उनके लोककथाओं में फैले बिम्बों और उपमाओं के बहाने एक नए समाज का स्वप्न, निर्माण और उसे पूरा करने के लिए अंतिम सांस तक लगे रहने वाले बिज्जी को आख़िरी नमन. 

आज बहुत पुरानी स्मृतियाँ एकाएक ताजा हो गयी- बीकानेर से लेकर लुनकरणसर, गढ़ी, सागवाडा, तिलोनिया, जयपुर, भीलूडा, डूंगरपुर और ना जाने कहाँ कहाँ के स्थान याद आ गए जब हम घंटों बैठकर पाठ्यक्रम भाषा और बदलाव की बातें करते थे, और फिर देर रात तक उन्ही के मुंह से लोककथाएँ सुनते थे.

पता नहीं इस साल के अंत तक और का क्या सुनना और देखना बाकी है अभी........

बिज्जी आप कही नहीं गए है बस उठकर यूँही टहल रहे है शायद और आकर फिर कहेंगे कि अच्छा सुनो राजस्थान में एक कथा है.............बंद करो अपनी फ़ालतू बातें !!!!

Saturday, November 9, 2013

कामरेड गामा बोले "आधी बीमारी ठीक हो गई-मगर आप काम छोड़ कर क्यों आये कामरेड " कामरेड बादल सरोज फेसबुक पर 9 नवम्बर 2013 अपने नोट्स में

कामरेड गामा बोले "आधी बीमारी ठीक हो गई-मगर आप काम छोड़ कर क्यों आये कामरेड " कामरेड बादल सरोज फेसबुक पर 9 नवम्बर 2013 अपने नोट्स में 

9 November 2013 at 15:39
महू विधानसभा क्षेत्र में पार्टी  उम्मीदवार का नामांकन भरवाने और अभियान की सभाओं में हिस्सा लेने मै छह को ही इलाके में पहुँच गया था. सिमरोल या दतौदा में कहीं था जब संदीप नाइक का स्टेटस-लिंक कामरेड गामा के बहाने सच्चाई की खोज पढ़ा. चिंता बढ़ी.  सात नवम्बर की सुबह तड़के कामरेड गामा से मिलने उनके घर पहुंचे. सांस लेने में बेइंतहा तकलीफ के बावजूद गामा जी के चेहरे पर चमक आ गयी थी. वे काफी देर तक मुझे अपने गले से लगाए रहे-और भावुक होकर बोले कि "आपके आने से मेरी आधी बीमारी ठीक हो गई है " मगर इसी के साथ उन्होंने सवाल भी किया कि  "आप चुनाव और पार्टी  के काम को बीच में छोड़कर आये क्यों कामरेड?" मेरे साथ पार्टी नेता कैलाश लिम्बोदिया भी गए थे. गामाजी के साथ चाय पीते हुए हम दोनों ने  इलाज की माहिती ली-सारी रिपोर्टें देखीं. उनके बेटे इलियास, नातिन निस्बा से दीगर जानकारियां जुटाईं. गामा जी की तीसरी पीढ़ी के  छोटे से अरमान के साथ अपने अरमान साझे किये. कुछ जरूरी इंतजामात तुरंत किये गए. बाकी के बारे में ठोस मंसूबे बनाये गए.
गामा जी को ले जाकर ई एस आई के इंदौर के नंदा नगर अस्पताल की आई सी यू में दाखिल करा दिया गया है. उनकी साँसे काबू में हैं. उनकी देखभाल जारी है. उम्मीद है बहुत जल्द ही वे देवास की सडकों पर फिर एक बार लालझंडा थामे जलूसों की अगुआई करते दिखाई देंगे.
अपनी साँसों के आरोह-अवरोह को काबू में रखने की हर सम्भव कोशिश करते हुए भी गामा जी अपनी तस्वीरों के अल्बम दिखाते हुए कभी कामरेड शैली तो कभी धाकड़ साब की याद दिलाते रहे. एक तस्वीर में मौजूदा राज्य सचिव का  लगभग पूरी काली दाढ़ी वाला फ़ोटो देखकर उनके चहरे पर भी शरारती मुस्कान आ गयी. . घरवालों ने बताया कि आज काफी अर्से के बाद मुस्कुराये हैं गामा जी.
मुस्कराहट के लिए ही तो लड़ाई है गामाजी और उनके जैसे बाकियो की.
मुस्कराहट की सल्तनत और ख़ुशी का साम्राज्य ही तो कायम करना है पार्टनर !!!  ये आर्थिक बराबरी, सामाजिक समानता, लूट की जगह इंसानियत की बहाली..वगैरा वगैरा तो पतवारें हैं-नांवे हैं..नखलिस्तान की जमीन जो इन भंवरो-तूफ़ानो-मंझधारों को पार करने के बाद आएगी वह मुस्कुराहटों की चमक से ही तो रोशन होगी. 
(कितने सारे मित्रो ने - उन सब के नाम लिखने में काफी समय लगेगा.- उस पोस्ट को/शेयर की गई पोस्ट को लाइक करके-अनेक सुझाव देकर-यहाँ तक कि तत्काल मदद की पेशकश करके मित्र  संदीप नाइक की चिंता के साथ साझा किया है. एक नयी सी बहस भी शुरू  की है. ऐसी अभिव्यक्तियाँ हौंसला बढ़ाती है. धन्यवाद लिखने में हिचक हो रही है-गामा जी और उनके जैसे लोग किसी व्यक्ति-तंजीम भर की संपत्ति नहीं है. वे समूचे समाज के हैं इसलिए सभी की ओर से सभी का आभार.)   

My Blog in Amar Ujala 8 Nov 2013

Tuesday, November 5, 2013

कामरेड गामा के बहाने सच्चाई की खोज

बीस फीट के बंद अँधेरे गलियारे को पार करते हुए जब हम उस बंद घर के बीच में पहुंचे तो कुछ बर्तन और बिखरा सामान पडा था. जब आवाज दी तो उन्होंने कहा थोड़ा ठहरो फारिग हो लूं.........हम इंतज़ार  करते रहे और उस अँधेरे गलियारे में आती सूरज की मद्धम किरणों को देख रहे थे कि वो कहाँ से दुस्साहस करती होंगी कि घूस जाए और अपने उजियारे से किसी का जीवन उजास से भर दें,  कहाँ से हवाएं आती होंगी ऐसे उद्दाम वेग से कि साँसें अपने आप चलने लगे और जीवन का पहिया अपनी गति से चले और ऐसी तान छेड़े कि सब कुछ सहज हो जाए. 

थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद जब हम उस कमरे में घुसे तो पाया कि एक टाण्ड था जिस पर लोहे की पेटियां थी, कुछ अखबार पड़े थे बेतरतीब से, एक टेबल जिस पर मार्क्स का पूंजीवाद, कामरेड पी सुन्दररैया की जीवनी, विधान सभा में वोट देने की अपील और भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों को हराने की गुजारिश करते आलेख, खिड़की में रखा भड-भड करता बहुत पुराना सा टेबल फेन, लंबा चौड़ा पलंग जिस पर अपनी कृशकाय काया के साथ कामरेड इशहाक मोहम्मद गामा पड़े थे. ये वो शख्स है जिसने अपनी पुरी जिन्दगी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए लगा दी - मजदूरों के बीच, किसानों के बीच, शहरी गरीबों के बीच, चौराहों पर मजदूरों के साथ लड़ते- खपते जीवन बीत गया. अब इन दिनों बेहद अकेले पड़े है, अपनी  एक बहू और एक बेटी के भरोसे - कहते है कि अपना काम करवाते हुए शर्म आती है पर शरीर से मजबूर हूँ, कुछ कर नहीं सकता.

पुराने दिनों को याद करते है तो चलते पंखे के शोर में आवाज दब जाती है और साँसों की आवाजाही इतनी तेज है कि ठीक से बोल भी नहीं पाते. बहादुर पंखा बंद करता है और एकाएक मच्छर पुरी ताकत से उस सीलन भरे कमरे में हम सब पर हमला कर देते है. अस्थमा के शिकार हो चुके कामरेड गामा आज बेहद मजबूर है. सामाजिक-आर्थिक परेशानियाँ मुंह बाए खडी है, कहते कुछ नहीं पर बात बोलती है, कमरे का हर जर्रा कहता है कि हालात ठीक नहीं है. एक अकेला आदमी एक छोटे से सामंती शहर में जहां कांग्रेस और भाजपा का हमेशा से वर्चस्व रहा, कम्युनिस्ट तो कभी हो ही नहीं सकता था और लोग आज भी कम्युनिस्ट का अर्थ भली भाँती ना जानते हो वहाँ और ऐसे सामंती शहर में जहां लोग आज भी पूर्व राजा और विधायक के पाँव सत्तर साल के उम्र दराज लोग पडा करते थे, वहाँ इस कामरेड गामा ने प्रतिरोध किया और शहर में एक पीढी को कम्युनिस्ट क्या होता है - सिखाया, पर्चे लिखे, रूसी साहित्य बांटा, हर प्रगतिशील गोष्ठी में शामिल रहे और शिरकत की वो भी पुरी शिद्दत से और दुनिया जहां में हो रहे परिवर्तनों के बारे में बताते रहे.

आज जब बहुत दर्द के साथ कह रहे थे तो कहना शुरू किया कि यहाँ के डाक्टर ने इंदौर ले जाने और दिखाने को कहा है फिर कहने लगे कैसे जाऊं, मेरे पास तो सायकिल भी नहीं है रूपया तो दूर की बात है. जिदंगी में बहुत लड़ाईयां बहुत लोगों के लिए लड़ी, आज मेरे इस कठिन समय में साथ देने वाला कोई है नहीं, हाँ कुछ दोस्त है जिनकी मदद से ये अस्थमा के इलाज के लिए थोड़ी दवाई, सांस लेने का पम्प, नेबुलाईजर और सामान आ गया है, पर एक आदमी कितनी मदद करेगा, उसका भी तो घर परिवार है. मै सोच रहा था कि तमाम जगहों पर वृद्ध लोगों के लिए सुविधाएं होती है, कल सुनील भाई कह रहे थे कि संघ में और कम्युनिस्टों में बुढापा बड़ा खतरनाक होता है, ख़ासा करके उनका जो फुल टाईमर होते है पार्टी के या काडर के,  बल्कि यूँ कहें कि हर काडर बेस में काम करने वालों के लिए कोई ऐसी जगह नहीं जहां वे चैन से मर सकें. मैंने कईं ईसाई संस्थान देखें है जहां बूढ़ी नन और बूढ़े फ़ादर आराम से कान्वेंट में अपना जीवन प्रभु भक्ति करते हुए हंसी खुशी बिताते है, पर काडर आधारित काम करने वालों के लिए क्या कोई जगह कोई भी पार्टी बना पाई है आज तक यहाँ तक कि वामपंथी भी नहीं. 

हाँ निराश नहीं थे कामरेड गामा, कहने लगे आप लोग जो कर रहे हो करते रहो, नौकरियों में हो तो खुलकर सामने आ भी नहीं पाओगे, परन्तु लड़ते रहो, जहां हो वहाँ से लड़ते रहो.......अंग्रेजो से लड़ने में हमें नब्बे साल लगे थे और फिर ये भाजपा और कांग्रेस तो अपने ही लोग है, समझ लेंगे देर-सबेर, थोड़ा समय ही लगेगा, काम करते रहो. मेरा तो बस ये सांस की बीमारी का चक्कर है यह ठीक हो जाए, जो शाम के धुंधलके में घबराहट होती है वह कम हो जाए तो काम बन जाए....... बाकी भले ही शरीर में कैसी भी तकलीफ हो, सब सह लूंगा........कामरेड बडबड़ा रहे थे. हम दोनों दोस्त सोच रहे थे कि क्या किया जा सकता है, कैसे इंसान को तकलीफ से मुक्ति दिलाएं, फिर मैंने धीरे से हिम्मत करके कहा कामरेड मच्छरों से बचो वरना मलेरिया हो गया तो और दिक्कत हो जायेगी तो बोले अरे वो उस आले में आलआउट है ना, लगा दो.............बस हम और नहीं बैठ पाए, बहुत संकोच से विदा ली,  सोचते हुए बाहर आ गए कि कैसे इनके इलाज का प्लान किया जाए. 

फिर शाम को कुमार अम्बुज जी की कहानी "एक दिन मन्ना डे के साथ"  युनुस खान भाई की आवाज में सुन ली तो दिल दहशत से भर गया है, नींद आ नहीं रही और डर लग रहा है..............

मै भी अकेला हूँ और आधे से ज्यादा जीवन बीत गया है और शेष सामने है. सृंजय की कहानी "कामरेड का कोट" भी याद आती है, कामरेड इशहाक मोहम्मद गामा की खुली किताब कुछ कहती है............आवाजें गूंजती है और एक साया अपने आस पास लगातार महसूस करता हूँ यह डर है या हकीकत पता नहीं पर कामरेड गामा के जीवन की आती-जाती साँसें जो अब बहुत मुश्किल हो चली है, सच में हकीकत है. 

Monday, November 4, 2013

जिन्दगी के सफ़र में गुजर जाते है जो मकाम

दृश्य एक:-

लखनऊ का हजरतगंज और फूटपाथ पर टी शर्ट की दुकानें, मै पास बैठा कुछ खा रहा हूँ, किसी साथी का इंतज़ार कर रहा हूँ कि देखता हूँ एक युवा जो लखनऊ विवि से पीएचडी कर रहा है (उसने बाद में बताया था) कार्ल मार्क्स की तस्वीर वाला टी शर्ट खरीदता है जिस पर बाकायदा कार्ल मार्क्स का फोटो है दाढी वाला और लिखा है "Doubt Everything", मैंने सहज ही पूछा कि भाई मार्क्स से ज्यादा प्रभावित हो क्या, तो बोला "जी अंकल, एमए में तो अच्छे मार्क्स थे, अब तो शोध है ना, तो मार्क्स का सवाल ही नहीं है", मैंने फिर टटोला और कहा ये तस्वीर वाले मार्क्स बाबा, इशारा भी किया शर्ट की तरफ तो बोला "ओह ये, पता नहीं, क्या है ना मेरी साली गर्ल फ्रेंड मुझ पर बहुत डाउट करती है हमेशा, उसे रिझाने के लिए ये खरीदा है क्योकि इस पर लिखा है Doubt Everything ..........." हे कार्ल मार्क्स.........कहाँ थे तुम, जब ये टी शर्ट पर तुम्हारा चित्र स्क्रीन प्रिंट किया जा रहा था...........


दृश्य दो:-

देवास में मित्र बहादुर के साथ ए बी रोड से घर आ रहे थे तो देखा एक युवा मस्त वाली 'चे ग्वारा' के चित्र वाली टी शर्ट पहनकर तेज़ बाईक चलाते हुए बड़ी रफ़्तार से जा रहा था, मैंने बहादुर से कहा कि यार ज़रा तेज चलाओ देखें ये देवास में 'चे ग्वारा की टी शर्ट' पहनने वाला क्रांतिकारी कौन है, इसे अपने ओटला मंच से जोड़ो भाई. बहादुर ने कार तेज भगाई और उस युवा के समानांतर हम चलने लगे , मैंने जोर से आवाज देकर उससे पूछा कि ये 'चे ग्वारा' को जानते हो तो बोला कौन चे? मैंने कहा तुम्हारी टी शर्ट पर जिसके चित्र बने है और सारे टी शर्ट पर क्रान्ति के नारे लिखे है, तो बोला पता नहीं मैंने क्रान्ति फिल्म नहीं देखी. हे चे ग्वारा कहाँ थे तुम, जब ये टी शर्ट पर तुम्हारा चित्र स्क्रीन प्रिंट किया जा रहा था...........

फिर समझ में आया कि या तो हम अनजाने में टी शर्ट खरीद लेते है या फिर हम कुछ जानते नहीं या उस लिखे को आत्मसात नहीं कर पातें है और बस अपनी ही धुन में कुछ भी पहनना और कुछ भी ओढ़कर चल देना यही केजुअली करते रहते है. खैर.........इसके बाद मैंने अपनी तमाम ऐसी टी शर्ट्स देखी जिन पर कुछ ना कुछ लिखा था..मेहरबानी करके आप भी एक बार टटोल लीजिये...........कही मेरे जैसा खूसट आदमी आपको रास्ते में मिल जाए और पूछ बैठे तो..............  
 

हमारे साथ हमारे भीतर- घर





और फिर याद आया कि इसी घर में सब कुछ शुरू हुआ, माँ-बाप ने मेहनत से हमें पालते हुए घर सन 1982 में बनाया, इसे संजोया और संवारा, हर कोने में हम अपना बचपन जवानी और अब ढलता हुआ जीवन देख रहे है, सबसे जुड़े- एक बड़ी वृहद् दुनिया से, भाषा और तमीज सीखी. जब परेशान हुए तो घर ही वह शरण स्थली बना जहां हमने अपने आपको हर बार फिर से ढाल लिया कि एक नई लड़ाई लड़ेंगे और जीतकर लौटेंगे. इस दौरान माँ, पिता को खोया, बहुत सारे दोस्तों रिश्तेदारों को खोया जो इसमे से गुजर कर गए थे........ कितनी यादें जुडी है.

इतनी सारी मौतों को देखने और बहुत कुछ खोने के बाद किसी ने कहा मकान बेच दो अपशकुनी है, पर ऐसा होता है क्या? समय का पहिया तो घूमता है और चीजें और हम क्षणे क्षणे ख़त्म होते रहते है, और एक बार फिर सब कुछ धीरे धीरे ख़त्म हो रहा है.............पर घर घर ही होता है............घर दीवार, फर्श या खिड़की दरवाजें नहीं होता वो हमारे भीतर बसता है साँसों की तरह से धड़कता और जीता जगता एक सम्पूर्ण घर.

हर उस बालू के कण पर, उस ईंट पर, हर उस हिस्से पर लिखा है कि यह सब तो तय था, होना ही था, पर घर अभी भी अपने पुरे स्वरुप में मुकम्मल रूप से हमारे साथ हमारे भीतर भी मौजूद है, कुछ हिस्से है जो कह रहे है कहाँ गए वो लोग पर अब जवाब मेरे पास नहीं है. अंधेरों में जूझते घर को हम सिर्फ रोशन कर सकते है सिर्फ अपने प्रयासों से और कुछ नहीं.........