Wednesday, October 31, 2012

तेजिंदर के उपन्यास "काला पादरी" का हीरो- फादर प्रसाद

आपको क्या लगता है कि आंध्रा में सब ठीक है नहीं जी यह तूफ़ान से पहले की शान्ति जैसा है..........यहाँ से अस्सी किलोमीटर तक तेलंगाना है और फ़िर आन्ध्र है, यहाँ आंध्रा के लोग है सभी लोग आंध्रा के है और वे हमें यानी तेलंगाना के लोगों को थर्ड ग्रेड का नागरिक मानते है, हाँ हम लोग एडामेंट और स्टबर्ण है , है तों है, कम पढ़े लिखे है तों है............तों क्या इंसान नहीं है हमारे साथ सदियों से भेदभाव हो रहा है. जबसे आपणे एम पी को छत्तीसगढ़ में बांटा तों क्या छत्तीसगढ़ के लोग खुश नहीं है ? ये तों मीडिया के लोग है जो नक्सलवाद का डर दिखाकर छग को बदनाम कर रहे है, आज छग में सड़क है हर गाँव में सुविधा है नेता लोग अंदर गांवों में पहुँच रहे है, हमें भी तेलंगाना चाहिए हम कब तक बेवक़ूफ़ बनते रहेंगे. बल्कि मुझे तों लगता है कि महाराष्ट्र को भी अब समय आ गया है कि दो तीन हिस्सों में बाँट दिया जाये कब तक मुम्बई राज करती रहेगी, मुम्बई कभी भी विदर्भ को नहीं समझ सकती, हम आदिवासी है तों क्या ये हमारा गुनाह है............अब आपको हकीकत बताता हूँ कि मै भंडारा के एक चर्च में प्रिस्ट हूँ. पर हर जगह भेदभाव है..........मेरे प्रिस्ट होने के बाद भी नागपुर डायोसिस में मेरे साथ भेदभाव होता है, सारे डायोसिस पर मलयाली लोगों का कब्जा है बिशप, सारे फादर्स और सारी सिस्टर्स भी मलयाली है और वहाँ जो भेदभाव हमारे जैसो के साथ होता है वो मै आपको बता नहीं सकता. मेरा हमेशा बिशप से लड़ाई होता है पर क्या करें .......मै प्रिस्ट हूँ पर कोई नहीं सुनता, मेरे चर्च को रूपया नहीं मिलता, क्या मैने दारू पी है ............जी हाँ मैंने खूब दारू पी है मैने  भी थियोलोजी पढ़ी है पांच साल, भाड़ नहीं झोकी, पर क्या करूँ ............कुछ नहीं कर सकता.......आप तों सब लिख सकते है ना जाये जरुर लिखे जहां भी लिख सकते है लिखे मै एक लड़ाई लड़ रहा हूँ और इस लड़ाई में मुझे जीतना है--चाहे चर्च का भेदभाव हो या तेलंगाना का......मै लड़ रहा हूँ ..........ट्रेन आ रही थी और "फादर प्रसाद" जो मात्र उनतीस साल का युवा है एकदम काला और ठेठ आदिवासी खम्मम के किसी दूर दराज के गाँव का रहने वाला, हिन्दी तों बोलता है थोड़ी बहुत सही अंग्रेजी भी बोलता है अपनी दुर्दशा बयाँ कर रहा था. और मुझे लग रहा था कि तेजिंदर के उपन्यास "काला पादरी" का हीरो कल रात मुझे मिल गया तेलंगाना के बहाने वो धर्म परिवर्तन और सम्पूर्ण चर्च की राजनीति को बयाँ कर रहा था. भयानक दारू के नशे में वो सच और सिर्फ सच बोल रहा था और रात के तीन बजे मै और फादर प्रसाद ट्रेन के आने की बाद विदा हो गये पता नहीं पर सच तों यह है कि उसने दो बातें सच कही चर्च के भेदभाव की और तेलंगाना की....जो यहाँ के जंगलों में भी लोग कह रहे है

Wednesday, October 24, 2012

देवास के "ओटले" की महत्वकांक्षी योजनाएं


देवास के ओटले का जिक्र कई बार हुआ है और कई लोग इस पूरी प्रक्रिया को बहुत महत्वपूर्ण मानते है. कल जब Sunil Chaturvedi के घर पर हम लोग बैठकर Manish Vaidya की कहानी सुन रहे थे तों मनीष ने और सुनील ने कहा कि ओटले पर उनकी रचना प्रक्रिया मजबूत हुई है. लगातार पढाना, लिखना और बेबाकी से अपनी राय व्यक्त करना किसी भी रचना के आगाज़ और मुकम्मल स्तर पर पहुँचाने के लिए बेहद जरूरी है. राजस्थान से आये चरण सिंह पथिक ने अपनी कहानी "यात्रा' का वाचन किया और कहा कि आज से दस- पन्द्रह साल पहले जयपुर में ऐसे दोस्तों का जमावडा था जो इसी तरह से कहानी-कविता और दीगर विधाओं के लिखने- पढने वालों का जमावडा होता था और इसी प्रक्रिया में सशक्त रचनाएँ उभर कर आती थी पर अब यह मिलने-जुलने की परम्परा बंद सी हो गई है और अपने-अपने खेमों में बंद रचनाकार भी अपनी लेखनी की धार को कुंद करते जा रहे है. अगर देवास में ओटला ने यह परम्परा निभाई है और इसे जारी रख रहा है तों यह प्रशंसनीय है बस यही है कि इसे लंबे समय तक आगे बढाते रहना होगा. मित्रों देवास के आँगन में लिखने- पढने वालों का मिला-जुला प्रयास है ओटला (otladewas@gmail.com) इसमे देवास से Bahadur Patel, Sandip Naik, Manish Vaidya, Dinesh Patel, डा प्रकाश कान्त, जीवन सिंह ठाकुर, अनूप सक्सेना, श्रीकांत उपाध्याय, Mohan Verma, Om Varma, विक्रम सिंह, समीरा नईम, केदार, भगवान सिंह मालवीय, रितेश जोशी, ओम प्रभाकर, दीक्षा दुबे, मेहरबान सिंह, तों है ही साथ-साथ इंदौर से सोनल शर्मा, प्रभु जोशीBrajesh Kanungo, Satya Patel Sunil Chaturvedi, दिल्ली से जीतेंद्र श्रीवास्तव, कोलकाता से एकांत श्रीवास्तव, जबलपुर से राजेन्द्र दानी आदि साथी है जो समय -समय पर मिलकर गंभीर बातें करते है और देशभर के चुनिन्दा साहित्यकारों को बुलाते है और अनूठे आयोजन करते है. संक्षिप्त समय में देश भर में अपनी पहचान बना चुका देवास के ओटले पर सभी आने को और अपने रचनाओं को सुनाने को बेताब है. शीघ्र ही ओटला देवास के बैनर तले प्रकाशन का भी वृहद काम हाथों में लिया जा रहा है और एक किताब के साथ इस महत्वाकांक्षी योजना का आगाज़ किया जा रहा है. निकट भविष्य में नियमित पत्रिका और प्रकाशनों की एक लंबी श्रृंखला के साथ ओटला देश के साहित्यिक मानचित्र पर अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज करेगा. आपके विचारों और सुझावों की प्रतीक्षा है.........

तुम गिर चुके हो मेरी ही नहीं, इस संसार में सबकी नज़रों से भी


यह जंग थी दो लोगों की और परिणाम पता नहीं किसी और भुगतना पडेगा................कब, कहाँ, कैसे, यह तों नहीं पता पर हालात और खराब हो रहे है यह बात सोलह आना सच है..............

इस जंग का पूरा मुकम्मल प्लान था, आज भी है और हमेशा रहेगा.............पर इस जंग के मायने मेरे लिए और उसके लिए अलग हो सकते है................वो तों खैर आपस में खून का एक सम्बन्ध भी रखते थे, जमीन की हद से जद तक जुड़े थे और हम.............हम तों बस यूँही साथ-साथ चले और जुडते गये ....गाहे-बगाहे..............पर हालात ऐसे हो जायेंगे यह तों कभी सोचा नहीं था..........इस तरह से षडयंत्र और ऐसे घातक वार वो भी निहत्थे आदमी पर.....

आप विचार को मार नहीं सकते, आप एक कीड़े को कुचल सकते हो पर उसकी कुतरने की कला को नहीं मार सकते...........जीवन ऐसा होता है यह पता तों था पर हम तुम और वो इतने गिर जायेंगे वो भी ऐसे ऐसे..........यह तों असंभव था, शर्म भी नहीं आती अब..............यह जंग जीत कर ही हारी जा सकती है अब सिर्फ अपना जमीर बेचकर और सब कुछ जीत-हारकर बस........

तुम गिर चुके हो मेरी ही नहीं, इस संसार में सबकी नज़रों से भी......अब इस जंग को मुकम्मल करो पूरी तरह से जीत कर एक लंबी लड़ाई हार जाओ......जीवन से और अपने आप से बस तभी इसे हम जंग कह पायेंगे......

आखिर बात क्या है...............

Tuesday, October 23, 2012

राजस्थान के कथाकार चरण सिंह पथिक और अपनी उजबक की तरह आदत




कल रात राजस्थान के कथाकार चरण सिंह पथिक को सत्यनारायण देवास लेकर आया था, जो यहाँ तीन चार दिन रहेंगे, रात में उनसे डा प्रकाशकांत जी के यहाँ खूब गप्प की और समझा की हिन्दी कहानी में खासकरके ग्रामीण पृष्ठ भूमि की कहानियों के सामने क्या चुनौतियां है . बात ही बात में मैंने एक सवाल पूछा की यदि बूढ़ी काकी, चीफ की दावत , बूढ़े का उत्सव और पीली छतरी जैसी कहानियों को आज के सन्दर्भ में ग्रामीण चरित्र या आंचल
िक बातों के परिपेक्ष्य में आंका जाए तो क्या निकलेगा.....और क्या आज का कथाकार क्या उसी नजरिये से ग्राम जीवन को देखता है जो प्रेमचंद देखते थे .......या आज की अधिकाँश कहानियों में दलित, वंचित और उपेक्षित लोग काफी आ रहे है जैसे सत्यनारायण की कहानी में पर आज भी गाँव की आधे से ज्यादा बातें छूट रही है , तरुण भटनागर की कहानी का भी जिक्र हुआ और विनोद कुमार शुक्ल का भी जो एक नए तरह के फ्रेमवर्क लेकर आते है पर क्या इनमे भी सम्पूर्ण ग्राम जीवन है.....................सवाल तो बहुत है बस सिलसिलेवार इमानदारी से जवाब खोजने वाला चाहिए.....चर्चा में बहादुर पटेल, दिनेश पटेल, सत्यनारायण, प्रकाशकांत जी, सुनील चतुर्वेदी, मनीष वैद्य , चरण सिंह पथिक शामिल थे, और अपनी तो आदत है ही की उजबक की तरह से सवाल पूछे जाए........

तुम्हारे लिए...........सुन रहे हो.............................कहाँ हो तुम..........



क्या जीवन ऐसा हो सकता है की हम, हम ना रहे, मै, मै ना रहूँ और तू , तू ना रहे........... 


तो फिर क्या होगा यह तय करना है मुझे, तुम्हे, उसे, इसे और हम सबको............


और फिर निकल पड़ना है एक अनंत आकाश की ओर, एक अथक निर्जीव देह के साथ नितांत अकेले ........


निष्णात होकर, निसंग होकर, निस्तब्ध होकर और निस्तेज सा..........


ताकि वो सब पा सके जो निरंतरता बनाए रखता है जीवन की इस आपाधापी में .......


क्योकि जीवन एक प्यास का गहरा कुआ है जिसकी झिरें बूझ चुकी है यहाँ तक आते-आते......

इस बियाबान में.....

Sunday, October 21, 2012

भारतीय प्रशासनिक अधिकारी बनाम गधाप्रसाद

भारत में हम सब लोग लोकतंत्र में रहते है और यह सब जानते है कि सारे बड़े निर्णय और काम जनता के चुने हुए प्रतिनिधि करते है और वे ही संसद और विधानसभाओं में बैठकर सारे फैसले लेते है और कार्यपालिका उन पर अमल करती है. परन्तु भारत में अभी भी कुछ क्षेत्र ऐसे है जहां इन जन प्रतिनिधियों को दर किनार करके भारतीय प्रशासनिक सेवा के गधाप्रसाद नामक अफसरान सारे निर्णय अपनी तुनकमिजाजी और लगभग तानाशाही भरे अंदाज में करते है. जमीन अधिग्रहण और आवंटन, हथियारों के लायसेंस, खनिजों की खदानों के आवंटन और लायसेंस, मदिरा लायसेंस, जंगल जमीन से जुड़े मुद्दें, ये सब क्यों इनके एकाधिकार में है??? इनका सारा समय जो काम के लिए होता है सिर्फ और सिर्फ इन्ही मुद्दों पर खर्च करते है. अपने समय का निन्यानवे प्रतिशत समय ये समाज के उच्च वर्ग यानी उद्योगपति, रसूखदार, गाँव देहात के जमींदार, नेता, विधायक, हथियारबंद लोगों, खनिज खदानों के मालिक यानी कुल मिलाकर उन लोगों के लिए देते है जो सीधे सीधे इनका फायदा पहुंचाने वाले होते है. और गरीबों के लिए इनके पास ना तों समय है ना कोई सहानुभूति.......मेरे एक मित्र के अनुसार भारतीय संविधान में इन गधाप्रासादों को क्यों एक सुपर स्ट्रक्चर दिया गया है, यह समझ से परे है. फ़िर गरीब लोग क्या करे उनके लिए सरकार ने कुछ चुतियापे बना रखे है जैसे तमाम तरह के फ्लेगशिप कार्यक्रम, जन सुनवाई, समाधान ऑन लाइन, परख, लोकसेवा ग्यारंटी अधिनियम, लोकायुक्त, लोक कल्याण शिविर, अन्त्योदय मेले, आदि आदि. कभी इन जन सुनवाई या मेलों में जाकर देखिये कि जब दूर दराज से कोई ग्रामीण अपने समस्या लेकर आता है तों कितनी घृणा और तिरस्कार से पूरा प्रशासन उसे देखता है, या मप्र में हर सोमवार या मंगलवार को होने वाली टी एल बैठक में कैसे उस गरीब की अर्जी की धज्जियां उडाई जाती है या कभी वीडियो कांफ्रेंस या समाधान ऑन लाइन में बैठकर देखे कि कैसे समस्याओं को ये गधाप्रसाद देखते है और सुलझाते है. सबसे बड़ा सवाल तों यह है कि इन पब्लिक सर्वेंट से मिलाने का समय होता है अरे भैया क्यों काहे का समय, तुम तों इसी जनता की सेवा के लिए बैठे हो, कोई बैठक हो तों ठीक, वरना काहे का समय, और ये कलेक्टर नामक प्राणी क्या करता है कहाँ आता है कब आता कब जाता है क्यों कब किससे मिलता है इसका कोई हिसाब-किताब नहीं है, और लोर्ड वोइसराय की तर्ज पर चलाये जा रहे राज में प्रजा और सत्ता  के बीच इन मदमस्त हाथियों को हांकने वाला कोई नहीं है. बंद करो भारतीय प्रशासन सेवा के अधिकारियों को इतने पावर देना और इतनी शक्तियां देना कि वे जनता के सेवक होने के बजाय जनता पर गोलियाँ चलाने का हुक्म दे दे, और जनता को अपने मद के नशे में चूर होकर यहाँ से वहाँ विस्थापित कर दे, अपने पद के गुमान में मस्त होकर जनता को दो कोढ़ी का समझकर खुद खुदा बन जाये. भाप्रसे के अधिकारी भारतीय जनता पर ना मात्र एक लादा हुआ बोझ है बल्कि शासन से मिलने वाली सेवाओं को भी ये भकोसते है और जनता के रूपयों की गाढ़ी कमाई का जमकर दुरुपयोग करते है. भाप्रसे के अधिकारियों के खर्च बहुत विचित्र होते है ये बेशर्म लोग अपने आवास में बनाए "बँगला ऑफिस" के खर्चों के नाम पर पुरे बंगले का बिजली का बिल भरते है जिसे कायदे से इन्हें अपनी जेब से भरना चाहिए, इस ऑफिस के नाम पर आये पियर्स के साबुन तक इस्तेमाल करते है, इस ऑफिस के नाम पर आये दूध और अन्य खर्चों से अपने माहभर का राशन निकालते है, हर कलेक्टर के पास आवास के नाम पर दो से तीन एकड़ में फैला आवास होता है, जहां बाकायदा खेती होती है उन्नत किस्म के बीज से लेकर मुफ्त की खाद इस्तेमाल की जाती है और सारा उत्पादित अन्न ये अधिकारी जिम जाते है या बेच देते है, अच्छे से अच्छे किस्म के मवेशी रखे जाते है और इन मवेशियों का दूध इनके बच्चे पीते है, नियमानुसार इन्हें एक चपरासी और एक ही गाड़ी रखने की पात्रता है पर ये गधाप्रसाद अपने बंगले पर चपरासियों की फौज रखते है, सारे विभागों की बेहतरीन गाडियां घर पर अटेच कर लेते है जो इनके बूढ़े बाप-माओं को प्रजापति ब्रह्म कुमारी आश्रम ले जाती है और इनके बच्चों को, बीबी को लाने ले जाने का काम करती रहती है. मित्रों यह जानना बहुत रुचिकर हो सकता है कि कलेक्टर साहब के बँगला ऑफिस का मासिक खर्च क्या है और किन मदों में यह खर्च किया गया है यदि मप्र के पचास जिलों के कलेक्टर साहेबान के बँगला ऑफिस का खर्च निकाल लिया जाये तों मेरा यकीन है कि प्रदेश के एक जिले के वार्षिक योजना का रूपया तों आराम से निकल जाएगा. देश दोस्त यार पूछते है कि क्यों इनके पीछे पड़े हो और मै कहता हूँ कि जब तक इस देश में इन गधाप्रसादों पर लगाम नहीं कसी जायेगी इस देश के हाल सुधर नहीं सकते, अंग्रेजों की थोपी हुई ब्यूरोक्रेसी ने हमें कही का नहीं रखा है और देश के ये प्रशासनिक अधिकारी हमें का नहीं छोड़ेंगे.नेता को तो हम पांच साल बाद बदल सकते है पर इन भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को- पृथ्वी के बोझों को कब तक सहेंगे.........................मुझे बहुत गंभीरता से लगने लगा है कि यह व्यवस्था बदले बिना कुछ नहीं हो सकता.............एक जिले में एक कलेक्टर किसी राजा से कम नहीं होता एकदम अय्याश और मदमस्त हाथी की तरह से जिसकी कोई जिम्मेदारी नहीं ना जवाबदेही..........इन्हें सारी सुविधाएँ चाहिए पर जांच, ऑडिट, कोर्ट-कचहरी, मूल्यांकन, सूचना, सतर्कता समिति, पारदर्शिता, मूल्यपरक प्रशासन, आम आदमी, जन अदालत, लोकसेवा, रैली, धरना, बैठक आदि से बहुत चिढ होती है तभी तों जब इनकी नौकरी पर आती है या जब पानी सर से गुजरने लगता है तों ये धारा एक सौ चवालीस लगाकर मानसिक विक्षिप्तता का भी परिचय दे देते है. मूल रूप से कायर और अपने दायरों में काम करने वाले ये अधिकारी बहुत ही डरपोक और भीरु प्रवृति के होते है जो एक छोटे से आदमी से घबरा जाते है और उस पर हावी होने की कोशिश करते है. झूठे गर्व, दर्प और तथाकथित संभ्रांत मानसिकता के रोग से ग्रसित ये सड़ी-गली मानसिकता से देश को सिर्फ और सिर्फ बर्बाद कर रहे है, जब तक इन्हें इस देश से नहीं हटाया जाएगा देश की हालत नहीं सुधर सकती.



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Wednesday, October 17, 2012

कौन तार से जोड़ी चदरिया, झीनी झीनी चदरिया - होशंगाबाद के रेशम केन्द्र की साहसी महिलाएं
































प्राकृत यह एक रेशम केंद्र ही नहीं वरन डेढ़ सौ महिलाओं के लिए जीवन रेखा है जो रोज- रोज उनके घरों में जीवन में और साँसों में सैकड़ों बार धडकती है और यही कारण है कि वे हफ्ते में बमुश्किल एकाध छुट्टी लेती हो और साल भर में बहुत ही किसी महत्वपूर्ण त्यौहार पर. रोज सुबह नौ बजे से इन डेढ़ सौ महिलाओं की चहल-पहल शुरू होती है तों सूर्यास्त तक जारी रहती है, मशीनों की घरघराहट, बदबू जिसकी अब उन्हें आदत पड़ गई है, से जी नहीं उकताता बस सूर्योदय के साथ ही घर के जरूरी काम निपटाकर वे दौड़ी चली आती है इस प्राकृत में जहां ना मात्र सिर्फ वे काम करती है बल्कि अपने सुख-दुःख आपस में बांटकर, मदद कर, बतियाकर हलके हो लेती है. रेशम केन्द्र में लाखों कीड़े रोज मारे जाते है ताकि एक बेहतर किस्म के घागे का निर्माण किया जा सके जो ना सिर्फ सुन्दर हो, ना सिर्फ टिकाऊ और उपयोगी हो, बल्कि गुणवत्ता में जिसका कोई सानी ना हो. यह रेशम केन्द्र इन्ही डेढ़ सौ महिलाओं के जीवन में बिलकुल उस कोकून की तरह है जहां ये रोज-रोज आती है अपने जीवन के उबाल को लेकर और जब दिनभर यहाँ काम में तपती और पकती है तों हर शाम एक निखार के साथ निकलती है.......हर सूर्यास्त इन्हें अपने घर गाँव की ओर ले जाता है और फ़िर ये लौट पडती है अपने घरों में जहां परिवार इंतज़ार कर रहा होता है बच्चे अपनी माँ से मिलने को बेचैन रहते है ..... ये कहानी है होशंगाबाद में रेशम केंद्र की, जो होशंगाबाद शहर से चार किलोमीटर दूर मालाखेडी के आगे विशाल परिसर में बना है. यह केन्द्र मप्र शासन के रेशम संचालनालय द्वारा संचालित है जहां चार प्रकार के रेशम के कीड़ों को एक प्रक्रिया द्वारा पूरा कर बेहतर किस्म का रेशम का धागा तैयार किया जाता है. यह धागा फ़िर महेश्वर, राजगढ़ -सारंगपुर भेजा जाता है ताकि वहाँ के परम्परागत कारीगर अपने हूनर और कौशल से इस घागे को सुन्दर कपड़ों में बदल सके- साडियाँ, सूट, कुर्ते, और विभिन्न प्रकार के परिधान इन धागों से तैयार करके बेचे जाते है. हालांकि यह अन्य कपड़ों की तुलना में काफी महँगा है पर यदि इसे एक पूरी प्रक्रिया के रूप में समझा जाये तों समझ आएगा कि सौदा महँगा नहीं है और प्रत्यक्ष रूप से हम अपने परम्परागत कारीगरों, बुनकरों और महिलाओं को रोजगार दे रहे है जो कि आज के समय में बड़ी बात है जब समूचे विश्व से इस तरह का काम खत्म होने की कगार पर है. डेढ़ सौ महिलाओं के द्वारा की गई मेहनत और अदभुत संचालन इस केन्द्र को एक अलग ही पहचान देता है, वन क्षेत्रों में रोजगार की अभिनव पहल है यह जो वाकई जमीनी स्तर पर फलीभूत होते दिखाई पडती है. मालाखेडी, रायपुर और आसपास के गाँव की डेढ़ सौ महिलाए यहाँ काम कर रही है सबकी कहानियां गरीबी, मजदूरी और आवश्यकता से जुडी हुई है. तीन से साढ़े तीन हजार रूपये हर माह तक कमाने वाली महिलाए यहाँ पिछले बारह बरसों से भी काम कर रही है. सरोज बताती है जब वो सत्रह बरस की थी तब से यहाँ है, आज उसे बारह साल हो गये है और अपने परिवार में कमाने वाली है घर गाँव में उसे बहुत इज्जत मिलती है केन्द्र में सब औरतें उसे सम्मान देती है और उसकी बात मानी जाती है, सरोज कहती है "काम अच्छा लगता है, कभी झगड़ा नहीं होता, सीखने को बहुत मिला है यहाँ डेढ़ सौ औरतें है जो अपने परिवारों के लिए बड़ी ताकत है. शारदा बी पिछले सात बरस से यहाँ आ रही है वो कहती है कि मेरे पति छुट्टी मजदूरी करते है और मुझे बाहर मजदूरी हमेशा नहीं मिलती, जब खेतों में काम होता है तब ज्यादा मजदूरी मिलती है पर सिर्फ पन्द्रह दिन जबकि यहाँ तों बारह महीनों काम होता है सिर्फ ईद या ऐसे कोई त्योहारों पर नहीं आती वरना तों रोज आ जाती हूँ. गीता पिछले सात बरसो से यहाँ काम कर रही है, कहती है "तीन बच्चे है जब पति ने छोड़ दिया था तों बड़ी दिक्कत हो गई थी, परिवार में कोई सहारा नहीं दे रहा था, पढाई की नहीं थी, गाँव में ऐसा ही होता है फ़िर जब और गाँव की बहनों से पूछा तों यहाँ आ गई, काम सीखा, आज मै अपने बच्चों को पाल रही हूँ और पढ़ा भी रही हूँ.मै किसी पर निर्भर नहीं हूँ. मेरे जैसी यहाँ तीस महिलायें है जो अकेली है - विधवा, परित्यकता या जिनकी शादी नहीं हो रही. पर हम कमजोर नहीं है हम खुद कमाती है और अपने पैसों का खर्च और निर्णय हमी लेती है. ज्ञानवती कहती है "शहतूत, अर्जुन सान और अरंडी के पत्तों पर उगे कीड़ों को यहाँ लाकर उबाला जाता है बड़े कूकर में, फ़िर उसे सुखाया जाता है और फ़िर इस कीड़े से घागा निकाला जाता है. धागा भी चार ग्रेड का होता है और सबके रेट अलग- अलग है. मधु सराठे जो मालाखेडी से आती है वो हंस कर कहती है कि साहब यह तों आप जैसो के लिए है, इत्ता महँगा रेशम - हम तों यहाँ की एक साडी कभी नहीं खरीद सकते, यदि खरीद ली, जो अमूमन पांच हजार से शुरू होती है, तों महीना भर क्या खायेंगे, पर हाँ रेशम का धागा बनाने में जो सुख मिलता है वो बड़ा अच्छा होता है. सरिता सोलंकी यहाँ गत पांच बरसो से विक्रय प्रबंधक है वो बताती है कि यह केंद्र सन् 1993 में आरम्भ हुआ था तब से यहाँ पर हजारों महिलाये काम कर चुकी है, अधिकतर गरीब घरों की महिलाए है जिन्हें मजदूरी के लिये यहाँ- वहाँ भटकना पड़ता था पर केन्द्र के बन जाने से काफी सुविधा हो गई है. होशंगाबाद जिले में सोलह जगहों पर यह काम होता है, चार जगहों पर हमारे विक्रय केन्द्र है और काफी अच्छा रिस्पोंस है. यह केन्द्र सिर्फ यही के नहीं वरन महेश्वर और राजगढ़ के परम्परागत कारीगरों को भी काम उपलब्ध कराता है जो कि एक बड़ी बात है. रुकमनी बाई बताती है कि उन्होंने भैंस के लिए अपने गाँव में काम कर रही एक संस्था से लोन लिया है और वे लगभग आधे से ज्यादा कर्जा पटा चुकी है यह सब इसी के कारण हो पाया है कि उन्हें यहाँ बारहों महिने काम मिल रहा है. बातचीत में अधिकाँश महिलाओं ने कहा कि उन्हें रोजगार ग्यारंटी योजना की जानकारी नहीं है अपने पीले, नीले कार्ड की भी जानकारी नहीं है, हाँ गाँव की राशन की दूकान से चालीस किलो अनाज मिल जाता है और हर ग्राम सभा में वे जरुर जाने का प्रयास करती है . सरस्वती बाई कहती है कि हम मेहनत कर रहे है ताकि हमारी लडकियां और बच्चे कम से कम एक दिन इस रेशम केन्द्र के कपडे खरीदकर पहन सके. ये सपना ही उनका जीवन है और ये डेढ़ सौ महिलाए बरसों से अपने आपको एक कीड़े के मानिंद रोज उबालकर- सुखाकर उस समाज के लिए रेशम का धागा बून रही है- वो महीन से महीन कीमती धागा जो आने वाले समय में एक स्वस्थ शिक्षित और जागरूक समाज का कपड़ा बनेगा.

Tuesday, October 16, 2012

"अंतिम फैसला"- अदनान कफील

""अंतिम फैसला"
 
हमारी मेहनत हमारे गहने हैं,

हम अपना श्रम बेचते हैं,
अपनी आत्मा नहीं,
और तुम क्या लगा पाओगे हमारी कीमत?
तुम हमें अपना हक़ नहीं देते,
क्योंकि तुम डरते हो,
तुम डरते हो हम निहत्थों से,
तुम मुफ्त खाने वाले हो,

तुम हमें लाठी और,
बन्दूक की नोक पे,
रखते हो-
लेकिन याद रक्खो,
हम अगर असलहे उठायें,
तो हम दमन नहीं,
फैसला करेंगे..........
 
 -अदनान कफील

अदनान कफील 17 साल के है और दिल्ली विश्वविधालय में बी.एस. सी. कंप्यूटर साइंस के छात्र है। इनके युवा तेवर देखकर लगता है कि कविता में आग है और एक दिन अपनी परिपक्व समझ से जलजला पैदा करेंगे.....बहुत उम्मीद और अपेक्षाओं के साथ ढेरो शुभकामनाएं ...लिखते रहो अदनान कफील
साभार Yadav Shambhu

कठिन समय में जब सब तरफ से सिवाय निराशा के कुछ नजर नहीं आ रहा है

अभी कुछ दिन और रहूंगा तुम्हारे साथ, तुम्हारी खबरों के साथ
अभी कुछ दिन और बुढा और धूमिल होउंगा
और इधर के उजाले को ओट देकर देखना होगा
अभी और इंतज़ार करना होगा, नफ़रत को झेलना
और गुस्से को दबाने की कला सीखनी होगी.


अभी और धूल गिरेगी गोधुली में उतरना होगा गुम होने तक
ठण्ड से राहत का इंतज़ाम करना होगा
आग जलानी होगी
अभी और धीमे चलना होगा

एक छड़ी खरीदनी होगी

पुराने कपड़ों की गंध अभी और झेलना होगी
कुछ लोगों से कहना होगा, आपको पहचानता हूँ मै थोड़ा थोड़ा,
दुनिया से दुनिया का अर्थ पूछना ही पडेगा...........

-दूधनाथ सिंह

(साभार -अशोक वाजपेयी- जनसत्ता "कभी-कभार" रविवार 14 अक्टूबर 2012)

Monday, October 15, 2012

प्रशासन पुराण 61

साहब ने पूछा कि प्रदेश का जन्म दिन मनाना है, वो क्या कहते है स्थापना दिवस,  शासन के सख्त आदेश है कि कोई भी विभाग इससे छूट ना पाए और सभी को इसमे भाग लेना है, यह ध्यान रहे कि शहर के नागरिकों को इसमे लाना है,  सी एम ओ यह ध्यान रहे..........!!! एक बोला सर पिछले साल कुर्सियां खाली रह गई थी और तत्कालीन जिलाधीश ने जब यह तस्वीर अखबार में देखी तों भड़क गये थे, इस बार क्या करे छोटा बोला.  तों अबकी बार सारे फोटोग्राफरों को कहना कि तस्वीर ऐसी खींचे कि सभागृह भरा- भरा नजर आये, हाँ कोई खास पहल......जी सर वो सरकार का मानना है कि बेटी बचाओ को ज्यादा तवज्जो दे और हरियाली कार्यक्रम को भी .......ठीक, महिला बाल विकास ध्यान रहे एक- दो बेटी वालों को सम्मानित कर दो, झुग्गियों से पकड़ लाना और ढंग के कपडे पहनना उन्हें पहले स्टेज पर लाने के ओके......वन विभाग पेड़ लगाओ..........सर अभी इस मौसम में .........जी हाँ, शासन की मंशा का निरादर मत करो, पेड़ लगाओ और सुनो वो गर्ल्स कालेज की प्राचार्य आई है क्या .............जी सर, अचानक एक चहकती सी आवाज सुनाई दी, और सबका ध्यान उधर ही रह गया. .........देखिये आपकी सारी लडकियां वहाँ होना चाहिए कुछ नाच-गाना हो जाये, प्रदेश का स्थापना दिवस है और अगर लडकियां आने में नाटक करे तों उनके प्रेक्टीकल नंबर तों तुम्हारे हाथ में होते है ना, अरे मेडम बेटी बचाओ में ये लडकिया ही तों काम आयेगी, सुनो सारे विभागों पर लाईट लगवा देना और शाम को जश्न हो ढंग से, और बच्चो की रैली सुबह सात बजे शुरू हो जाये शिक्षा अधिकारी.....साहब अगर यह आठ हो जाता समय, तों बेहतर होता क्या है ना मेरे घर नल आते है सात से आठ तक और वाईफ ज़रा बीमार चल रही है, ठीक है ठीक है आठ कर दो यार पर बच्चे और खासकरके लडकियां ज्यादा होना चाहिए, खूब नारे लगाए जोरो से मेरे बंगले के सामने अंदर तक आवाज आनी चाहिए, ...........और कोई सीडी बनवाओ और कुछ स्ट्रीट प्ले नहीं हो सकता क्या बेटी बचाओ पर..........और शाम को कोई और बेटियाँ सांस्कृतिक प्रोग्राम नहीं कर सकती........जी हो जाएगा साब.....महिला बाल विकास ........जी सर......सब हो जाएगा.........बेटी बचाओ तों सबसे भला काम है साहबजी ..और फ़िर इस शहर में बेटियाँ ही तों बचानी है आखिर में......हेहेहेहेहेहेहेहे, और सुनो डीपीओ ये शहर के जो भी बूढ़े आयेंगे प्रोग्राम में, उन्हें गाड़ी से छुडवा देना, सबको पकड़ कर बिठाना गाड़ी में तुम खुद, बाद में कोई गिर जाता है या रह जाता है ग्राउंड में तों ये मीडिया बहुत हल्ला मचाता है, पी आर ओ अबकी मीडिया को मेनेज कर लेना कोई गडबड नहीं चाहिए मुझे. भले ही  सबको शाम को रेस्टहाउस बुला लों देख लेंगे जो भी होगा....अरे हाँ वो गाने की सीडी कौन फाइनल करेगा......मुझे वो पन्द्रह अगस्त वाले गाने नहीं चाहिए.........और फ़िर.....अरे हाँ देखना ये कार्यक्रम एक नवंबर को ही है ना पता नहीं,  यह प्रदेश साला एक नवंबर को ही क्यों गठित हुआ था, और  साला मेरी शादी की  सालगिरह भी है उसी दिन और वाईफ बहुत पंगा करेगी........भोपाल चले जाते दिन भर, डीबी माल में शापिंग कर लेते कुछ फेमिली के लिए पर यहाँ......अरे हाँ...........जिलाधीश का प्रलाप जारी था....(प्रशासन पुराण 61)

महिला शौचालय और बराबरी का स्वप्न


भाई Sidharath Jha ने एक दुखद खबर शेयर की है कि दिल्ली आकाशवाणी पर चार सौ रूपये दैनिक वेतन पर काम करने वाले एक लडकी / महिला कर्मचारी जब शौचालय में गई थी तों वहाँ सीट धंस गई और उसके प्राईवेट पार्ट्स पर गंभीर चोटें आई है उसे इसके लिए टाँके लगवाने पड़े और हद तों तब हो गई जब उसके साथ इलाज करवाने के लिए कोई साथ भी नहीं गया. यह हाल है इस देश की राजधानी का और महिलाओं के लिए सुविधाओं का.
जब दिल्ली आकाशवाणी के ये हाल है तों हमारे प्रदेश के पिछड़े छतरपुर या रीवा जैसे केन्द्रों की हालत क्या होगी, एक तरफ तों दिल्ली योजना आयोग में पैंतीस लाख के शौचालय बने है दूसरी ओर ये ज्वलंत उदाहरण है कि हम महिला मुद्दों के प्रति कितने संवेदशील है. यहाँ होशंगाबाद कलेक्टर कार्यालय में जो बाहर शौचालय बना है उसमे बारहों महीने पानी टपकता रहता है और महिलाओं के लिए, जो उसके ठीक बगल में बना है, वहाँ दरवाजा भी नहीं है. असल में महिला बराबरी की बात तों हम बहुत करते है पर महिलाओं के लिए कार्यस्थल पर एक अदद शौचालय की व्यवस्था नहीं कर सकते. मैंने अपने काम के दौरान देखा है जब ये महिलाए अपडाउन करके किसी गाँव के स्कूल में पढाने जाती है तों सारा दिन उनके लिए शौचालय नहीं होता और प्राकृतिक संकट के लिए या लघुशंका के लिए कोई जगह नहीं होती, सारा-सारा दिन मानसिक तनाव में रहती है. स्कूलों में लडकियां भी इसीलिए आठवी कक्षा के बाद नहीं आती कि वहाँ शौचालय नहीं है. यह बड़ी त्रासदी है और मजेदार यह है कि सभी बड़े दफ्तरों में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले इन मूल बातों पर कभी ध्यान नही देते. अपनी पढाई के दौरान महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिला मुख्यालय पर हम लोग बीडीओ से मिलने गये थे वहाँ एक नवनियुक्त लडकी बीडीओ के पद पर पदस्थ थी उसने बताया था कि कैसे उसे शौचालय के लिए लड़ाई लड़नी पडी थी और जब वो चालू हुआ तों कैसे कार्यालय के पुरुष उस शौचालय में अश्लील चित्र और ना जाने क्या-क्या लिखते थे, बाद में उसने जब विभागीय कार्यवाही की तों स्थितियां ठीक हुई. खैर यह घटना दुखद है और निंदनीय है. आज जब सर्व शिक्षा अभियान, समग्र स्वच्छता अभियान और ना जाने किन किन योजनाओं के तहत निर्माण कार्य बनाम घपले हो रहे है तों कम से कम कार्य स्थल पर ढंग से सुरक्षित महिला शौचालय तों सरकार बनवा दे और यह सुनिश्चित करे कि वे सुरक्षित और "फंक्शनल" हो.........यही से महिला बराबरी के बात शुरू की जा सकती है.

मालगाड़ी - हेमंत देवलेकर की एक अप्रतिम कविता

हेमंत देवलेकर की एक अप्रतिम कविता, जो कविता नहीं वरन उन सभी चीजों और बातों को रेखांकित करती है जो हमारे जीवन में चुपचाप से गुजर जाती है और कही दूर कोलाहल भी नहीं होता, ना ही कोई बेचैन- बस यही कही दूर सवेर हम अपने आपसे गुत्थम-गुत्था होते रहते है बहुत अंदर कही खामोशी में और बीतते समय के साथ जीवन भी यूँही गुजर जाता है एकदम से .............यह मालगाड़ी के प्रतीक है एक तरह की अवचेतन अवस्था है जो कही अंतर्मन में घटित होती रहती है और एक विक्षिप्त की तरह से हम बस सब देखते रहते है और इस पीड़ा को व्यक्त भी नहीं कर पाते है.
मालगाड़ी

रेल्वे स्टेशनों की समय सारिणी में
कहीं नहीं होतीं वे नामज़द।
प्लेटफार्म पर लगे स्पीकरों को
उनकी सूचना देना कतई पसंद नहीं।
स्टेशन के बाहर खड़े
सायकल रिक्शा, आटो, तांगेवालों को
कोई फ़र्क नहीं पड़ता उनके आने या जाने से।
चाय-नमकीन की पहिएदार गुमठियाँ
कहीं कोने में उदास बैठी रह जाती हैं
वज़न बताने की मशीनों के लट्टू भी
क्या उन्हें देख धड़का करते हैं?
आधी नींद और आधे उपन्यास में डूबा
बुकस्टाल वाला अचानक चौंक नहीं पड़ता
किताबों  पर जमी धूल हटाने के लिये।

मालगाड़ियों के आने जाने के वक़्त
पूरा स्टेशन और क़रीब-क़रीब पूरा शहर
पूरी तरह याददाश्त खोए आदमी सा हो जाता है
और इस सौतेले रवैये से
घायल हुई आत्मा के बावजूद
अपनी पीड़ा को अव्यक्त रखते हुए
वे तय करती रहती हैं तमाम दूरियाँ।

भारी-भरकम माल असबाब के साथ
ढोती हैं दुनिया की ज़रूरतें
और ला-लाकर भरती हैं हमारा ख़ालीपन।

पैसेंजर ट्रेनों से पहले चल देने की
गुस्ताख़ी कभी नहीं करेंगी वे
पीढ़ियों की दासता ने उन्हें
इतना सहनशील और ख़ामोश बना दिया है।

दो प्लेटफार्मों के बीच छूटी सुनसान पटरियों पर
अंधेरे में आकर जब चुपचाप गुज़र जाती हैं
तब उनकी ज़िंदगी
दुनिया के तमाम मज़दूरों की कहानी लगती है
एक-सी अनाम
एक-सी उपेक्षित
और एक सी इतिहास के पन्नों से
खारिज

Sunday, October 14, 2012

अथ: सलमान खुर्शीद कथा और मीडिया के युवा तुर्क.........


वैसे धृतराष्ट्र तों कोई और है, हम सब रोज उन्हें देखते है और झेल रहे है, और ये सलमान तो बेचारे मुझे दुर्योधन से गुस्सैल और निहायत मूर्ख लगते है........
इस सारे खेल में अरविंद और अन्ना का क्या................Ashish Maharishi ने जो पांच सवाल आज पूछे है उंके जवाब कौन देगा................और राबर्ट वाड्रा को तों ये सलमान ले डूबे कही यह तों नहीं कि सोनिया जी जान देने की बात करने वाले सलमान यहाँ इस कुए में डूब रहे है ताकि बची रहे इज्जत घर की और दामाद रहे सुरक्षित.........फ़िर बन् जायेंगे कही राज्यपाल और लुईस बन् जायेगी राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ...............????
आज मीडिया के युवा तुर्कों को देखा. जहां तक इनमे दम की बात है वो तों बहुत है पर जो धैर्य और समझ होना चाहिए वो कही कम दिखती है, सजी संवरी मीडिया की दुनिया और बार- बार अपने बालों को सहलाती युवतियां, सजे सवरे युवा, ब्रांडेड कपडे, होठों पर अंगरेजी का नशा और हाथों में कागजों का पुलिंदा हिलाते जोश और गुस्से से भरे पत्रकार वाह क्या भविष्य है इस देश के मीडिया का, मुझे प्रोढ या परिपक्व पत्रकार इस पूरी बातचीत में कही नजर नहीं आये जाहिर है एक नाकारा और भ्रष्ट मंत्री का उत्तेजित होना स्वाभाविक था. कही ऐसा तों नहीं इन युवा तुर्कों के पीछे शातिर और संगठित बड़े घरानों का हाथ है जो इन्हें मोहरा या कठपुतली बनाकर आगे कर रहा है खुद पीछे यवनिका में बैठकर मजे ले रहा है.............
 
सलमान की प्रेस वार्ता के बाद जिस तरह से मीडिया अपने अपने फोरम पर जिस तरह से आज तक को परोस रहा है और समालोचना कर रहा है वह निंदनीय है. ऐसे समय में जब देश के एक क़ानून मंत्री पर इतने गंभीर आरोप है और सलमान लगभग पागलों की तरह से रेस्टलेस होकर बार बार खड़े हो रहे थे बैठ रहे थे और दहाड़ रहे थे बिलकुल गुस्साए स्वर में पत्रकारों पर गरज रहे थे और एक बेचारे बुजुर्ग रंगी मिस्त्री को सबके सामने पेश किया और तालियाँ बजवाई वह बेहद शर्मनाक है, इस समय सारी मीडिया को एक स्वर में होकर ऐसे कुत्सित प्रयाओं का विरोध करना चाहिए ना कि आपस में छीछालेदारी............
आज की प्रेस वार्ता हिन्दुस्तान के इतिहास में सबसे घृणास्पद प्रेस वार्ता के रूप में दर्ज की जाना चाहिए/ या की जायेगी..........जहां देश का एक क़ानून मंत्री अपनी पत्नी और गुंडों के साथ कमजोर और बेबस लोगों को अपने गुंडों के बीच अपनी मर्जी की बात कहलवाता है और उस गरीब गुर्गे की क्या बिसात कि वो विरोध में कुछ भी बोल सके...........

जो कुछ भी हो रहा है उसके बाद अब सिर्फ यही लगता है कि सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री को सलमान खुर्शीद से इस्तीफा ले लेना चाहिए, सरकार की वैसे ही इज्जत नहीं बची है क्यों बची - खुची खत्म कर रहे है ये लोग, और सबसे बड़ी बात आने वाली पीढ़ी के सामने क्या आदर्श पेश कर रहे है........

तीसरा तत्काल प्रभाव से देश भर के ऐसे एनजीओ और ट्रस्ट जो FCRA 1973 Act , 80- CC 12-A, 35-AC के अंतर्गत है, के खाते सील करके कुछ समय के लिए इनके सभी कामकाजों पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए क्योकि सत्य साईबाबा ट्रस्ट से लेकर माँ आनंदमयी, वर्ल्ड विजन, सभी अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियां, संयुक्त राष्ट्र संघ समर्थित और भी दीगर संस्थाएं इस परोपकार के और पुण्य कमाने के चक्कर में सामाजिक कार्यों के बहाने से कमाने- धमाने के नेक कामों में गले- गले तक डूबी हुई है.


 

Friday, October 12, 2012

नमन और श्रद्धांजलि डा श्रीप्रसाद जी को

अभी राजेश उत्साही से बातचीत हुई और उन्हें यह दुखद समाचार दिया और अनुरोध भी किया कि वे अपने शब्दों में हमें बताए कि डा श्रीप्रसाद जी का बच्चों के साहित्य में क्या योगदान है.......क्योकि राजेश ने उनके साथ लंबे समय तक चकमक में रहते बच्चों के साहित्य पर काम किया और श्रीप्रसाद जी जैसे कवियों के साथ बच्चों के लिए नए सृजन किये...........हिन्दी ने देश के तमाम बच्चों ने अपने लिए लिखे जानेवाले साहित्य और बाल साहित्य का सच्चा पुरोधा खो दिया ............नमन और श्रद्धांजलि डा श्रीप्रसाद जी को
 
 

प्रशासन पुराण 60

आम तौर पर सरकारी विभागों में पांच हजार रूपये से ज्यादा की राशि के स्वीकृती जिला कलेक्टर करते है और हर प्रकार के चेक पर हस्ताक्षर, चाहे वो पांच हजार के हो या उससे कम के हो, सम्बंधित विभाग के प्रमुख और जिला कलेक्टर ही करते है. परन्तु ग्राम पंचायतों में लाखों के चेक सरपंच और सचिव करते है ना कोई स्वीकृती ना ना कोई नास्ति ना कोई और कागज़ी कार्यवाही बस सीधा चेक बेंक और फ़िर जेब........यह भी भ्रष्टाचार का एक सबसे बड़ा कारण है कि गाँवों का विकास नहीं हो रहा. सचिव जो अमूमन दसवी या बारहवी पास है और सरपंच जो सिर्फ नाम मात्र को पढ़े है व्यापक तौर पर...लाखो का ट्राजेक्शन करते है नरेगा आने के बाद पंचायतों में राशि की बाढ़ आई हुई है इसके अलावा विधायक, सांसद और जन भागीदारी के काम कुल मिलाकर ढेर रूपया पर कही कोई प्रक्रिया नहीं है ना मूल्यान्कन है बस आडिट नाम का चुतियापा है जिसमे सरकारी आडिटर बहुत कुछ जिम जाते है सरपंचों से .....अब कोई कैसे ये बताए कि ये बदलेगा कैसे.........चेक पर हस्ताक्षर के पावर किसे दिए जाये ताकि प्रक्रिया सुनिश्चित की जा सके और सही आहरण हो युक्तियुक्त ढंग से राशि का सदुपयोग हो और सचिव सरपंच के मनमाने व्यवहार पर लगाम कसी जा सके. यानी कि हालत यह है मित्रों की सौ रूपयों के चेक पर भी कलेक्टर के हस्ताक्षर है और लाखों के चेक पर सरपंच का अंगूठा और सचिव "बदरीपरसाद" के हस्ताक्षर .............अब ये किसके दोष है भगवान जाने पर देश का विकास हो रहा है वाया........भ्रष्टाचार.....(प्रशासन पुराण 60)

Thursday, October 11, 2012

कहाँ जाओगी ,दुर्गा - कैलाश वानखेडे...........


(संदीप नाईक की खबर फोटो को देखते हुए और उदय प्रकाश की कविता पढ़कर ,बैतूल की महिला कुली ,दुर्गा पर अपनी प्रतिक्रिया इस शक्ल में आई है .)


जल रही है  आँख अभी जबकि पढ़ नहीं पाया पूरा अखबार
कि फेसबुक के सारे अपडेट पढ़ देख नहीं पाया
बस दिखी तस्वीर दुर्गा की
संदीप की वाल से उदय प्रकाश की  कविता तक आते आते मेरी आँखों में
धुंधलका आ गया
इनकार कर रहा है कोई भीतर से
चल गोली खा और सो जा .

सो रहा हूँ ढाई हजार से ज्यादा सालों से
उनकी अफीम बेहद कारगर है
सुला देती है भुला देती है
चुपके से बेटी को देकर नाम.
पिटती है ढिंढोरा कि बलशाली है
कि नाम होने से इतनी ताकत है
कि चमकीले चमचमाते बैग को उठाते हुए
कन्धा झुकता है कि पता ही नहीं चलता कि ,इतना भारी होगा.

बोलने वाला बोलता है चार बेग के साठ रुपे...?
चल छोड़ मै ही उठता हु 
तेरको देख के लगा चार पेसे ईमानदारी के कमा लेगी
इधर उधर गुंडों के चंगुल से बच जाएगी
वरना...तुम्हारी उमर मासूमियत
भारी पड जाएगी ...देखती नहीं टीवी
कितने रेप ....
तभी तो केते हे पन्द्रह की उमर में कन्या दान कर
मौज मस्ती करो और भड़वों से डिमांड करों
पंद्रह की कमसीन काया की .

बेग वाला बुदबुदाता  है
चल ले पचास ..ठीक है

दुर्गा उठाती है बेग कि कमर पर जोर पड़ता है
पीठ इंकार करती है
लेकिन जबान के कारण  चुपचाप चलने के लिए कहता है दिमाग  .

गुटके ,बलगम से भरी हुई थूक, गन्दी लम्बी लपलपाती 
निकलती है उसे  पटरी पर पटक देता है
 सोचता है उसने गंदगी नहीं की प्लेटफार्म पर
बस मरने के लिए छोड़ दिया पटरी पर
उसकी सही जगह पर.

इतना बोझा पचास रुपे में....बेकूफ बना दिया
तमाम लोगों की तरह
हम तो ढाई हजार से ज्यादा सालों से यूँ ही बेकूफ बनाते आये है,
तुम क्या हो दुर्गा ?

वह हँसता है कि बलगम की लम्बी बदरंग चिकनी लार
पीटर इंग्लेंड की शर्ट पर गिरती है
कि भागता है पानी के लिए प्याऊ के पास
पानी नहीं है
प्याऊ में
आदमी  नहीं जानता कि पानी नहीं है उसमें भी .
बडबडाता है अब तो इसे प्राइवेट सेक्टर को दे देना चाहिए
वे लगायेंगे आधुनिक यंत्र जो लार को निकाल दे
जैसे  थ्री इडियट में निकालता है बच्चा
वैकुम क्लीनर से
 मेरा बस चले तो
निकाल दू इस देश से ...किसे ?

बेटे को मेडिकल में दाखिले के लिए देना पड़े साढ़े तीन करोड़
स्साले ..माने ही नहीं तमाम सिफारिश के बाद भी
कहते है आपके बेटे के नं .नंबर कहलाने लायक भी नहीं है
आपको तो इसलिए दिया कि देसाईं  ने कहा था ...

बेग देखता है कही  रफू चक्कर न हो जाए
सस्ते मजदूर ,मजदूर ही रहे ताउम्र 
तापीढ़ी
तो एडमिशन के लिए देना नहीं पड़ते साड़े तीन करोड़.

उससे तो गधे की शादी करवा देता ,लेता ढेर सारा दहेज़
लेकिन इस कोटे सिस्टम ने कही का नहीं रखा

आ जाते है
अब इसे ही देखा इतने बोझे के लेने चाहिए डेढ़ सौ
और खुश हो गई पचास में
इनमें अक्कल ही नहीं
जो हममे है
है हमारे भीतर योग्यता
काबिलियत तो हमारे खून में रग रग में  है
 इतनी है कि पेशाब घर में विसर्जित करनी पड़ती है
लटका कर जनेऊ

पेशाब से उसे मॉल याद आया कि बच्चों के लिए होती है जैसे ट्राली 
वैसे ही स्टेशन पर होना चाहिए ,बड़ों के लिए
तैयार है हम पैसा देने को ताकि रोजगार  मिल सके
यह तो तभी हो सकता है जब प्राइवेट सेक्टर के पास चली जाए रेल
तब कोई नहीं कहेगा कि इन्सान को मशीन बना दिया
कि बेरहम है
बताओं कोई बोलता है राजधानी में  इंसानी रिक्शे को देखकर

यहाँ बिहारी आ जाये तो ...अपने तो मजे ही मजे
वैसे इसका बाप यहाँ होता तो उसके काँधे पर बैठकर निकलता स्टेशन से बाहर
पर ..कमाने की समझ होती तो ,,होती अकल...

क्यों नही पढ़ रही दुर्गा
क्या करते है तुम्हारे पिता
क्या मज़बूरी है कि
कुली बन गई हो वहां ,जहाँ है घने जंगल
जंगल में होते है ढेर सारे फल ,औषधि ....

सवाल नहीं करता बेग पर नजर गडाए बेटे के लिए साढ़े तीन करोड़
देने वाला ,
आप करते है ?

लेने वाला कहाँ रखता होगा
कहाँ कहाँ बांटता होगा
उसका बेटा क्या करता होगा ...

कोई नहीं करता सवाल

बोलता नहीं

मै चुप हूँ कि लिख रहा हूँ ...

इतना लिख चूका हूँ कि
अम्बेडकर ही अम्बेडकर दिखते है मुझे
बता चूका हूँ कि बुखार में हु
जल रही है आँखे
पढ़ नहीं पा रहा हूँ
कि लिख रहा हूँ
कि लिख पाया हूँ बाबा साहब के बदौलत 
कि बुद्ध कबीर फुले सावित्री पेरियार है मेरे साथ

पूछना चाहता हूँ ,दुर्गा तुम्हारे साथ कौन है ?

कि बेग वाला सवार हो गया है
जो याद करता है कोई सामान भूल तो नहीं गया हूँ
वह मुस्कुराता है भूलता नहीं हु कि काबिल हू
ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाया तो क्या ?
बाप की संपति ही इतनी थी कि चाकरी करने की बजाय
रख लिए कई चाकर
इस नालायक को इतनी उमर तक अकल आ ही नहीं पाई
काम धंधा सीख नही पाया न पढ़ पाया बेटा
कभी कभी तो लगता  है इसका डीएन ए करवा लूँ....

''कहाँ चलना है साब ?'' तन्द्रा तोड़ता है रिक्शे वाला .
''बालाजी  मंदिर ,,"
'' कितना लोगे ....
''भगवान् के पास जा रहे हो ,जितनी श्रध्दा भक्ति हो दे देना .''
'' बेकूफ समझ रखा है ?सीधे बोल कितने लेगा ?''
'' दो सौ लगते है ..पेली बार आये हो शायद ..सबको मालूम है .''
'' सौ ..वरना तांगे में चला जाऊंगा ...घोड़े की सवारी ..''
''अपने पास रख ..तांगे से भी क्या जाता है  ..पैदल जाओंगे तो कुछ भी नहीं लगेगा .''
''तमीज से बोल ...." दुर्गा को देखता है .मन ही मन बोलता है ,देखो तो सही कितने भाव बढ़ गए ..
उसे भाव तभी याद आता जब अपनी कार में डलवाता है पेट्रोल ,कितने भाव  बढ़ गए  इनके ...
'' सौ बोलने से सोचना था ..तमीज हमें सिखाता है ...चल हट ..''
जी आता है दो लगाऊ ...उसके बदन को देखकर इरादा बदलता है और
पचास का गाँधी का नोट  बढ़ाता है  दुर्गा के सामने 
दुर्गा अपने सिर पर रखे गर्दन ,कमर तोड़नेवाले ''अमेरिकन टूरिस्ट  ''
को उतारना चाहती है कि
उसका हाथ इंकार करता है
धड़ाम ...
अमेरिकन टूरिस्ट  के गिरते ही ,बेग वाले को लगता उसे गिरा दिया है
धूल से सना गाँधी वाला नोट निकल चूका है हाथ से
बडबडाता है
औरतों  से कोई काम ढंग का होता ही नहीं है ....
उनकी जगह किचन में या बेडरूम में ही है ...

 दुर्गा...
आँख जल रही है मेरी
कि बुखार से तप रहा हूँ
और पढ़ नहीं पा रहा हूँ नईदुनिया 
जिसके पेज थ्री पर लिखा है शहर की सड़क ठीक नहीं है
धूल और गड्डों को देखकर ग्लोबल इन्वेस्टर  कैसे मीट करेंगे
कैसे  होगा आयोजन ? बचे है सत्रह दिन ..मंत्री जी ,अखबार अफसर सबकी
जायज चिंता के बीच तुम,  तुम्हारा फेस है फेसबुक पर

मुक्तिबोध की दुविधा में रह रहा हूँ कई दिन से 
कहाँ जाऊ ,उज्जैन  या दिल्ली....

मै संविधान में भरोसा करता हुआ
तय करता हूँ.
दुर्गा ...सच सच बताना
तुम्हारे पास क्या है भरोसे के लिए ...

दुर्गा और उदय प्रकाश की कविता...........

मेरी दुर्गा वाली कल की छोटी सी कहानी से मैंने जीवन में इतना सम्मान कभी नहीं पाया , आज उदय प्रकाश  जी ने इस पोस्ट पर एक अदभुत कविता लिखी है और कहा है कि " और आभार अफलातून भाई और संदीप के सरोकारों को, जिसकी ज़रुरत हमारी किसी भी महत्वाकांक्षा से बहु बहुत बड़ी है...." मेरे लिए यह सबसे बड़ा सम्मान है. आपके लिए यह कविता साझा कर रहा हूँ.....

(अभी-अभी प्रिय अफलातून जी के वाल पर देखा संदीप नाईक की पोस्ट 'दुर्गा', जो कुली है, बैतूल के रेलवे प्लेटफार्म पर, का चित्र. उसी की प्रतिक्रया में ये कुछ शब्द...)


एक सौ नब्बे किलो का असबाब सिर पर उठाए

प्लेटफार्म पर चल रही है इक्कीस साल की सांवली दुर्गा....

दुर्गा

क्या किसी भील या संथाल, कोल, बैगा या पनिका की बेटी है ?

क्या उसके मोटे सुन्दर होठों, चपटी मासूम नाक

और समूची सभ्यता को संदेह की नज़र से देखती भेदती आँखों की मुक्ति के लिए ही

अफ्रीका में लड़े थे नेल्सन मंडेला और बैरिस्टर मोहनदास करमचंद

क्या इसी दुर्गा के लिए गाया था जूनियर मार्टिन लूथर किंग ने :

'हम होंगे कामयाब ....होंगे कामयाब एक दिन ...'

'वेंसेरेमास......वेंसेरेमास ....' कहते हुए बोलीविया -कोलंबिया के  घने जंगलों में मारा गया था

चे गुवेरा ...


कहाँ से आये होंगे दुर्गा के पितर और पूर्वज

छोटा नागपुर, झाबुआ, पलामू, उड़ीसा, आन्ध्र

या सोवेतो, जोहेनेसबर्ग, उत्तर आस्ट्रेलिया के अछोर रेगिस्तान

या चौदह सौ बयान्नवे ईसवी सदी के पहले के अमेरिका

या फिर मुआन जोदारो, पेरू,

या कहीं से भी नहीं

या यहीं कहीं से

खूंटी या सरगुजा के उस किसी गाँव से जहां से उजाड़ दिया गया है उसका छोटा-सा घास-पात, काठ-मिट्टी से बना घर

या फिर मेरे ही गाँव के आसपास खांडा, पोंडी, छिलपा, बिजौण्डी, सोनटोला के उजाड़ दिए गए जंगलों से ?

एक सौ नब्बे किलो का असबाब सिर पर उठाए

बैतूल के रेलवे प्लेटफार्म पर चल रही है इक्कीस साल की सांवली दुर्गा....

'नज़र रखना इस पर, चम्पत न हो जाए कहीं लेकर मेरा करोड़ों का सारा माल ये चोट्टी ...''

पीछे से चीखता है मोंटेक सिंह आलूवाला !....

कोयलावाला ...!

मालामाल मालवाला......!

दुर्गा के पीछे-पीछे चलता है

बाज जैसी आँख गडाए

एक हाथ में तुपक और दूसरे में गिट्टी-पत्थर और लाल मिरिच का पाउडर रक्खे

पुलिस का कमांडो या सलवा जुडूम का फर्जी एस. पी.

जिसे दिया जाएगा गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के राजपथ पर शौर्य-सम्मान ,

बहादुरी का मेडल ...!

बस आज से चार रोज़ बाद

हर गली, हर शहर , हर गाँव में लगी होंगी दुर्गा की मूर्तियाँ,

बज रहे होंगे घंटा-घड़ियाल, नाच रहे होंगे मदमत्त नौजवान डीजे की ताल पर

'ऊह ला ला ...ऊह ला ला ...तू है मेरी फैंटेसी ....!'

हर रिक्शा, हर मोटरकार के पिछवाड़े लिखा होगा

'जै माता दी ...'

ठीक इन्हीं पलों में

हरियाणा के कैथल

या राजधानी के  धौलाकुआं या गुडगाँव में 

किसी बी एम् डब्ल्यू ,एस्कोडा या सफारी की बंद  अंधी कांच की  खिड़कियों के भीतर

चीख कर बेहोश हो चुकी होगी दुर्गा

फिलहाल एक सौ नब्बे किलो का असबाब सिर पर उठाए

प्लेटफार्म पर चल रही है इक्कीस साल की सांवली दुर्गा....

और उसके पीछे चल रहा है

बाज जैसी आँख गडाए आलूवाला ...!

Uday Prakash Sandip Naik ji ....लेकिन यह 'दुर्गा' ..जो कुली बना डाली गयी है, सत्ता-दौलतखोरों के लालच और हिंसा के राज में, उसका सम्मान है. ..और आपका भी, जिसकी आँखें उस 'दुर्गा' का दर्शन कर रही हैं ..और हम सबको करा रही हैं....! सलाम आपको और अफलातून भाई को ...और सभी दोस्तों को...(आपको शायद याद हो, देवास में 'एकलव्य' में ..कई साल पहले एक बार मैं अपना कैमरा भूल आया था...और बदहवासी में २-३ घंटे बाद लौट कर आया था और उसे सुरक्षित पाकर मेरी साँसें लौट आयी थीं...ग्रेट !!)

Wednesday, October 10, 2012

बैतुल की दुर्गा को सलाम



बैतुल से लौट ही रहा था कि स्टेशन पर एक युवा लडकी को ढेर सारा सामान ढोते हुए देखा तों हैरत में पड़ गया मैंने उसे पास बुलाया और पूछा कि क्या मै दो मिनिट बात कर सकता हूँ और तस्वीर ले सकता हूँ तों बहुत जोश और खुशी से बोली ...जी, जरुर, मेरा नाम दुर्गा है, पिताजी के किसी घटना में पाँव खराब हो गये, घर में सात भाई-बहन है और कमाने वाला कोई नहीं, सो, मैंने यह कूली काम ले लिया  और अब बैतुल स्टेशन पर काम करती हूँ. अपनी उम्र इक्कीस बरस बताते हुए थोड़ा अचकचा गई वो दुर्गा. दसवी में फेल हो गई थी साहब सो पढना छोड़ दिया, अब घर में काम करना पडता है पर दस साल बाद मै ऐसी नहीं रहूंगी, ओपन से पढ़ रही हूँ और जल्दी ही सब पढाई पूरी करके अच्छा काम करूंगी, स्टेशन पर सब मदद करते है, कोई छेडछाड नहीं करता, यात्री भी जो मांगती हूँ -दे देते है. हाँ पर आप मुझे कमजोर ना समझे- मै पैंसठ से सत्तर किलो तक का बोझ उठा लेती हूँ मै किसी मर्द कूली से कम नहीं हूँ. सुबह आठ बजे आती हूँ देर रात नौ बजे तक रहती हूँ- स्टेशन मेरा घर है साहब. आप क्या कह रहे है लाडली लक्ष्मी योजना........अरे साहब वो तों इक्कीस साल पूरा होने पर लडकी को देगी सरकार कुछ रूपया पर जब वो पढ़ लेगी तों सरकार के रूपये क्यों लेगी क्या लडकी में स्वाभिमान नहीं होता है.? पर इक्कीस साल तक वो क्या करेगी...और जब घर में ऐसी स्थिति हो तों सरकार के पास हमारे लिए कोई योजना है.....ये सवाल मेरे लिए अनुत्तरित था. पर बस सलाम करके लौट आ गया मै.. ट्रेन आ रही थी दुर्गा........और मेरा सफर शुरू हो रहा था बस तुम्हारे हौसले और जज्बे की मै कद्र करता हूँ सात भाई-बहन, माँ - बाप और तुम्हारी हिम्मत निश्चित ही काबिले तारीफ है और तुम्हारे सवाल हम सबके मुँह पर एक बड़ा तमाचा है. हम जो महिला सशक्तिकरण के लिए काम करते है और महिलाओं के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते है. पर तुम्हे हमारी जरुरत नहीं है क्योकि तुम वास्तव में दुर्गा हो ....दुर्गा.......जिसका उत्सव अब चंद दिनों में शुरू होने वाला है.

Tuesday, October 9, 2012

नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 13

आज ना जाने क्यों एक बहुत करीबी मित्र से अभी हुई बातचीत में "हर्ष' का जिक्र निकल आया...........हर्ष ने बहुत गंभीरता से प्यार किया था और अपना जीवन पूरा दे दिया, उसकी हर जिद के आगे हर उस मांग को पूरा किया जो उसने की थी - चाहे वो जायज थी या नाजायज, बौद्धिकता के स्तर पर हर्ष ने उसे सहारा दिया लंबी बहसों और चर्चाओं से उसके दिमाग में जीवन के छोटे से छोटे पहलू से लेकर फिल्मों के, दर्शन, साहित्य, विश्व, प्रकृति, समाज, अर्थ और हर वो बात समझाई जो उसने दिल्ली के उस महान महाविद्यालय में अंगरेजी साहित्य पढते  समय सीखी और पढ़ी थी. कालान्तर में उसने ये सब अपने लगातार हासिल किया अनथक मेहनत से और श्रम से .......पर आखिर में हर्ष के आगे अपनी कुर्बानी के अलावा कोई और रास्ता ही नहीं बचा...........शराब और जीवन के घालमेल के बीच ज़िंदगी के कतरे कतरे सुख कब उड़न छू हो गये हर्ष को  पता ही नहीं चला, अवसाद, तनाव और कुंठाएं उसके जीवन के स्थायी भाव बन गये थे, उम्मीद भरी निराशा का ओर-छोर भी उसे पता चल रहा था. अचानक एक दिन उस मेधावी हर्ष को उसकी जिद के आगे जान देनी पडी......पर उसने उसके इस बलिदान को भी भुना लिया- यह कहकर कि पीछे  छूटे हुए लोग पूजनीय है वन्दनीय है, जो बिछडने की पीड़ा को सहकर सम्हलकर आगे बढ़ते है और फ़िर-फ़िर जीवन में लौट आते है हर बार एक नए संघर्ष करने को और जीवन में हर मुद्दों से दो-चार होने को.....हर्ष को मौत के बाद भी शान्ति नहीं मिलती और एक निर्जन सुनसान सड़क पर उसे अपने आपको समाप्त कर लेना पडता है, मुझे यकीन है कि यह हर्ष की मौत नहीं, आत्महत्या नहीं, बल्कि एक नया रास्ता है एक नई दृष्टि है जो संसार को समझना होगी कि हर्ष का खत्म होना एक संस्कृति का खत्म होना है और एक युग का खत्म होना है ताकि बची रहे मेधा और वो सब जो हर्ष होने को पुख्ता और प्रमाणित करता है.
हर्ष मै तुम्हे बहुत सम्मान देता हूँ और अपना आदर्श मानता हूँ....वर्षा वशिष्ठ को चाहना और वर्षा वशिष्ठ को बनाने में अपना जीवन दे देना दो अलग बातें है...........अगर किसी वर्षा वशिष्ठ को सफल बनाना है तों हर्ष को निश्चित रूप से बलिदान देना ही होगा, ये दीगर बात है कि वर्षा वशिष्ठ कभी भी यह बात समझ नहीं पाएंगी कि हर वर्षा वशिष्ठ के पीछे एक मेधावी और बेहद प्रतिभाशाली हर्ष होता है और उसके बिना ये कभी वर्षा वशिष्ठ बनकर उस को शिखर नहीं छू सकती जो उसे कालजयी और विशिष्ट बना दें.

हर्ष मेरा आदर्श है और लग रहा है कि अब समय आ गया है किअपने जीवन में  हर्ष को जीवन के सर्वोच्च शिखर पर देखते हुए इस उपन्यास को यही विराम दे दिया जाये (नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 13)

(*हर्ष और वर्षा वशिष्ठ - "मुझे चाँद चाहिए" के नायक और नायिका- सुरेन्द्र वर्मा - मेरा प्रिय उपन्यास जिसे मैंने लगभग 45 बार पढ़ा है)

काँच की बरनी और दो कप चाय - एक बोध कथा


जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होतहै, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा , "काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई....फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ  संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं, छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक- अप करवाओ.. छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे... अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि "चाय के दो कप" क्या हैं ?प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये । अपने खास मित्रों और निकट के व्यक्तियों को यह विचार तत्काल बाँट दो..

Monday, October 8, 2012

सलाम इस जज्बे और लड़ाई को............

कोठियों से मुल्क की मैयार को मत आंकिये
असली हिन्दुस्तान तों फूटपाथ पर आबाद है.

"देश के हालात और नई राजनीति" विषय पर चर्चा में जयश्री

आजादी के बाद दो करोड हेक्टेयर भूमि का हस्तांतरण अभी तक बड़े लोगों को हो चुका है जिसमे उद्योग, और बड़े घराने शामिल है, दस में से सात करोड जोतों को (सीमान्त किसान जिनके पास ढाई एकड़ से कम जमीन है) को अपने जमीनों से बेदखल किया गया है, और ये सब सरकारी आंकड़े है. आदिवासी जो सिर्फ बाजार में नमक और केरोसिन लेने आते थे और एक सौ तीस प्रकार के खाद्यान्न और सब्जी एक बरस में खाते थे. आज सिर्फ बीस-पच्चीस प्रकार की चीजें ही खा पा रहे है क्योकि मार्केट उनके रसोई तक घूस गया है और उनकी जीवन शैली को तहस- नहस करके अपना सब कुछ थोप रहा है. कैसे इस नई राजनैतिक  व्यवस्था ने एक स्वालम्बी समाज को परावलम्बी और कर्जे से भरा हुआ समाज बना दिया है. आज जरुरत है कि जो आदिवासी बच्चे और युवा शालाओं में पहुँच चुके है उनके बीच इस स्वालम्बी से पराधीन हुए समाज की बात फैलाई जाये इस विचार को फैलाया जाये कि देश की हालत क्या हो गई है, उनके संसाधन और जल, जंगल, जमीन पर सरकारें, उद्योगपति और सभी पार्टियां कब्जा करके बैठ गई है और लगातार उन्हें खदेड़ रही है. एक नई लड़ाई के लिए विकास और संसाधनों की लूट चुनाव के मुद्दें नहीं बन सकते कभी भी. हमें इस विचार और लड़ाई को हर हालत में जारी रखना होगा नकारात्मकता बहुत है पर आशा से देखने की जरुरत है और यही बच्चे, यही युवा कल हमारी लड़ाई के धारदार हथियार बनेंगे और इस लंबी लड़ाई को आगे लेकर जायेंगे. राजनीति का मतलब विधान सभा में चुनाव लड़ना और मध्यम वर्गीय चरित्र के मुद्दे जैसे बिजली, उठाकर मैदान में लड़ना-शोरगुल करना नहीं है, राजनीति का मतलब आनेवाले समय की लड़ाई के बेहतरीन फ्रेम वर्क तैयार करना और लोगों को लड़ाई के लिए तैयार करना है.

"देश के हालात और नई राजनीति" विषय पर चर्चा में जयश्री, आधारशिला शिक्षण केंद्र, सेंधवा, मप्र.