Saturday, September 29, 2012

नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा XII

निकले तों वो भी जैसे मै निकला था जल्दी और बेहद हडबडी में बस फर्क ये था कि मै एक बड़ी बस में था और वो एक छोटी सी कार में, मेरे साथ यात्रियों का एक बड़ा जत्था था और वो दोनों बिलकुल अकेले, जाहिर है कभी साथ रहने की कसमें खाई होंगी- सो साथ ही थे, मै निपट अकेला और साथ में ढेरों अनजान यात्री जों सिर्फ एक मानवीय मुस्कराहट से एक दूसरे को भरोसे से देख रहे थे, कभी बस कही रुकती तों अपने सामान को पड़ोसी के भरोसे छोडकर उतर जाते और फ़िर लौट आते और नज़रे बचाकर सामान टटोल लेते कि सब ठीक ठाक है ना...........कभी बस आगे, कभी कार आगे........सरकार नामक तंत्र में फंसे हम सब लोग सडकों को कोसते और रोते- धोते अपने निर्धारित गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे. सडकों के गड्ढों और ट्राफिक के दर्द में समझ नहीं आ रहा था कि किसको, कहाँ जाने की ऐसी क्या जल्दी थी कि बस- सब हरेक से आगे निकल जाना चाहते थे और फ़िर कई बार ऐसे क्षण आये पूरी दुर्गम यात्रा में कि  अब गये कि तब गये, पर कुशलता भी कोई चीज होती है यार, सबके भरोसे पर वो बस का चालक फिट ही था और हर बार हर बड़े दचके से उबार लेता था आगे- पीछे या साईड से बस निकालकर, वो यात्रा के उद्देश्य -जिसका मतलब निरंतर आगे बढ़ना होता है, को पूरी पारंगता से निभा रहा था............घाट निकल ही चुका था, राजधानी से बस थोड़ी ही दूर भीमकाय मशीनों और मानव श्रम से बना मंडीदीप आ गया था और सडकों पर बेतरतीब से खड़े वाहन और गप्प-शप्प में लगे लगे लोग दिन की थकान से सुस्ता रहे थे रात गहरा रही थी रात के बारह बज चुके थे और बीडी-सिगरेट, ढाबों के तंदूरों से उठती महक पूरी फिजां में घुली हुई थी. वो रोटी -जिसके लिए सारी लड़ाई हो रही है, सिक-सिक कर तंदुर से उतर कर पेट में जा रही होंगी..........ठीक उसी समय यह छोटी सी मारुती एक बार फ़िर बस से आगे निकली और रोशनी के साये में दूर से आ रहे एक हार्वेस्टर में जा घुसी. हार्वेस्टर- जों हमारी खेती-बाडी का सबसे समृद्ध पैमाना है अब, बस रुक गई ठीक कार से चिपककर.......ब्रेक की चूं की आवाज से सारा वातावरण गूँज उठा और जब तक बस रुकती और हम सब उतर कर उन दोनों अनगिनत जन्मों के साथियों को देखते या खींचकर बाहर करते कार से, तब तक दोनों के प्राण पखेरू उड़ चुके थे, खून का सोता फूट पड़ा था आँखों में भय और जुगुप्सा छा रही थी दोनों के, तन सर्द था और अकड गया था दोनों का, बस स्त्री की आँखे हैरान थी कि जों भरोसा किया था उसने इस नर की कुशलता पर वो कही से दरक गया था, और नर की आँखे तों कही नजर ही नहीं आ रही थी- खून और मांस के लोथड़ों में खो गई थी शायद वो अपने आप से भी शर्मिन्दा रहा होगा- आख़िरी समय में कि आज ये कैसे हो गया. .......वो दो लोग  जो एक बड़े मनुष्य  समाज का हिस्सा थे, जों उन घनी राहों पर अँधेरे में उबड-खाबड रास्तों पर बचकर आ गये, जों कार को लगभग दन्नाते हुए भोपाल पहुँचने की जल्दी में कई बार हमसे आगे रहे, जों जीवन भर साथ रहेने  के लिए बने थे, जों मुश्किल से जीवन के उन्नतीस या तीस बसंत ही देख पाए थे, अभी अभी गुजर गये .........पता नहीं किस-किसको अकेला छोडकर, पता नहीं कहाँ जा रहे थे , किस जल्दी में -इतनी कि वहाँ पहुँचने के पहले ही पहुँच गये अपनी मंजिल और पता नहीं वहाँ पहुंचकर क्या कर लिया होगा.........बस एक झटके से रुकी थी, थोड़ी देर बातें हुई, पुलिस की गाड़ी के सायरन सुनाई दे रहे थे हम सबको भी जल्दी थी, हम सब भी आखिर यात्री ही थे और यात्रा का मतलब है आगे बढ़ते  जाना .......बस बढ़ गये छोड़ आये उन दो जिस्मों को अकेला ..........नहीं- नहीं, साथ- साथ छोड़कर, हम बढ़ गये आगे  ताकि सनद रहे कि मरते वक्त भी वो दोनों साथ थे..........कल रात हुए एक्सीडेंट की एक छोटी सी ना खत्म होने वाली कहानी है यह.....(नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा XII)

नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा XI

यह एक पतली गली का आख़िरी कोना है और गली यहाँ  से मुडकर खत्म भी हो जाती है और नहीं भी.......पता नहीं ये आगे कहाँ जाती है पर यहाँ आकर एक एहसास होता है सब कुछ खत्म हो गया है दुनिया का लगभग आख़िरी कोना आ गया है और ठीक इसी मुहाने पर एक खम्बे पर एक टिमटिमाती सी ट्यूब लाईट जल रही है इस भयावह अँधेरे में, लगता है दुनिया का सारा उजाला यहाँ तक आते आते खत्म हो गया और अपने एकमात्र खम्बे पर यह जलने को अभिशप्त पता नहीं कब तक दम मारेगी, जीवन के बियाबान में और लगभग खत्म हो चुकी दुनिया में एक मात्र  ट्यूब लाईट पर इस समय सैकड़ों हवाई पतंगे झूम रहे है. यह जानते हुए भी कि बस सिर्फ कुछ क्षण की ज़िंदगी है यहाँ और इसी दीपदिपाते प्रकाशोत्सव में अपनी इहलीला समाप्त कर बैठेंगे पर यह जों झींगुरों की आवाज में मंद मंद प्रकाश में सैकड़ों पतंगे झूम रहे है इनसे क्या कहा जा सकता है, एक छोटे से जीवन में अपनी तमाम इच्छाएं पूरी करके यहाँ आ गये है और बस अब कि तब... मौत से जूझ रहे है, गली के आख़िरी कोने पर दुनिया के सबसे अंतिम छोर पर यह मौत का तांडव और यह तमाशा देखने को मेरे अलावा यहाँ कोई नही है. निर्जन रात्री है आसमान में चाँद पूरा है और वो भी कृष्ण पक्ष का इंतज़ार कर रहा है कि ढले तों जीवन की सम्पूर्णता का एहसास भुगत सके, ऐसा तांडव, ऐसा नाच देखना शायद जीवन का ऐसा सच है जब आपके देखते देखते ही सैकड़ों जीवन एक साथ मौत की भट्टी में झोंक दिए गये और आप बेबस सिर्फ चुपचाप देख ही सकते है. कुछ ना कर पाने की बेबसी और लाचारी ......मनुष्य्तर गुणों के बावजूद और लगातार एक बनने - बिगडने की प्रक्रिया में कैसा हो गया मै......बस सिर्फ टुकुर टुकुर देख ही पाया उस तांडव को और फ़िर लौट आया दुनिया के इस सिरे पर, उस गली के अलभ्य कोने को छोडकर- इस कोने पर जों वृहद है, विशाल है और सारे जगत की सारी गलियों को आपस में जोडकर उलझा देता है ताकि भटकते रहे हम यहाँ से वहाँ, ताकि मौत के उस बियाबान से दूर जोडते-घटाने के क्रम में भूल जाये उस सच को जों अन्तोगत्वा स्वीकार करना ही होगा-जब कोई नहीं होगा, कही नहीं होगा, और हम सिर्फ अकेले लिपट जायेंगे उस खम्बे से जों बगैर किसी प्रकाश के खडा होगा- ना किसी जमीन पर ना किसी सहारे के, और उसका छोर जुडा होगा उस लोक में जहाँ कोई गलियाँ नहीं है, ना अंत ना शुरुआत, ना पुकारने वाला ना कोसने वाला, ना कहने वाला ना सुनने वाला, ना ओर- ना छोर, बस एक यात्रा, एक पतंगे की एकल यात्रा, एक अनंतिम की ओर, और एक अनिष्ट की ओर..(नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा XI)

Wednesday, September 26, 2012

यह जीवन की अमरबेल...........

यह एक लंबी उलझी सी और ना जाने कहाँ कहाँ गुंथी हुई सी श्रापित बेल है पीली सी जर्द और लगातार बेताबी से पेड़ के तने से लिपटती हुई और ना जाने किस आसमान को छूने को उत्सुक और तत्पर, सदियों से ज़माना कहता आया कि ये मुई परजीवी है और ना अपनी पहचान, ना अस्मिता- बस दूसरों के आश्रय पर युगों से श्रापित जीवन लिए जिए जा रही है, अपने आप से दूर और बगैर जीवन की कोई अभिलाषा लिए कैसे कोई एक लंबा हिस्सा जी लेता है और वो भी सिर्फ परजीवी होकर, कितना सरल और सहज रास्ता है यह भी.... ना किसी की परवाह, न डर, न भय, न संताप, न तनाव , न अवसाद और न कुंठा. बस उन्मुक्त और सबकी छोड़कर अपनी ही मन की करते जाना और बेफिक्री से जीवन जीना और बढ़ते जाना.........मोहल्लों के अवागर्द  पेड़-पौधों से लेकर जंगल की लंबी कतारों में उगे पेड़ों पर अपना परजीवी जीवन जीने को अभिशप्त यह बेल बढ़ रही है इन दिनों यहाँ-वहाँ .......मै देख रहा हूँ कि ये बेल उग आयी है एकदम से इस सुनसान में और अपने पीलेपन के उजास में सर्वत्र पीला- पीला सा आच्छादित कर रही है सम्पूर्ण हरेपन को ढांककर ये पीलापन घुसता चला जा रहा है- जीवन के इस निविड़ में घटाटोप अँधेरे में ये चमकता पीलापन झाँक रहा है पूरी बेशर्मी  से, हंसती हुई ओंस की बूंदों में भी और एक भयावह संकेत कर रहा है यह पीलापन कि अब ओंस की बूँदें भी शायद ना बचे इस जर्द पीलेपन से और घूस आये ये श्राप वहाँ भी और फ़िर धीमे- धीमे फ़ैल जाये सब ओर....... हर कही और ढांक ले अपनी  परजीविता से  सम्पूर्ण सृष्टि को और बस फ़िर सब ओर सिर्फ और सिर्फ हो यह जीवन की अमरबेल...........

तुम हमारे वसंतों के हृदय में संध्‍यावेला की भांति ठहर गए हो

हर पुष्‍प विगलित होता है। पतझड़ के पते पर वसंत की पाती। हर मणि को अनंत काया का शाप मिला होता है। किंतु श्रेष्‍ठतम मणियां भी अपने स्‍वप्‍न में पद्म हो जाना चाहती हैं।

राग-रुधिर की एक पताका।

तुम भी तो पद्म थे, सुमुख। विहंसता रूप, अपूर्व कांति। (सब कुछ झरता है!) किंतु तुम दीप-धूम की भांति अपने रूप के भीतर बसे उस निवीड़ तम को एकटक देखते रहे। तुम्‍हारा यों एकटक देखना हमारे भीतर ठहर गया है।

तुम्‍हारे नेत्रों में जाने कितने निमिषों का दाह है। तुम हमारे वसंतों के हृदय में संध्‍यावेला की भांति ठहर गए हो, पद्मपाणि। हम रूप-बद्ध, रूप-हत, आंखें मलते हैं।

Courtesy - Sushobhit Saktawat

Wednesday, September 19, 2012

प्रशासन पुराण 58

जिले से दूर करीब डेढ़ सौ किलोमीटर एक ब्लाक  था जहां सारे जिले के अधिकारी अपने अपने वाहनों से इकट्ठा हुए थे, क्योकि इसी ससुरे पिछड़े ब्लाक में जिले का एक मेला होना था जिससे समाज के अंतिम आदमी का उत्थान हो सकता था. साले, गरीबों, नंगों, भूखों  को सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाना था. एक तों सुबह सुबह घर से निकलना और इन घटिया सडकों पर सरकारी गाड़ी से यात्रा करना बड़ा मुश्किल है साहब इन दिनों........ये कलेक्टर को क्या सूझी कि यहाँ मीटिंग रख दी, साला यहाँ इस मेले में सब बाँट देंगे तों अपना माल कैसे मिलेगा आदि जैसे डायलाग  हवा में उछल रहे थे, फ़िर लालबत्ती आ गई. बैठक शुरू सबकी बोलती बंद........हाँ तों पार्किंग की क्या व्यवस्था है अफसर ने पूछा ......जी सर वो स्कूल में बोल दिया है, और मेले में टेबल की क्या व्यवस्था है..........फ़िर सवाल उछला...........जी वो सब पटवारी मिलकर टेंट वाले से लगवा देंगे और पानी का टैंकर भी खडा रहेगा छोटा अफसर बोला..........जितना पूछा जाये उतना बोलो,  ज्यादा मत  बोलो समझे, औकात में रहो अपनी.....जी साब!!! फ़िर बड़ा साब बोला सूबे का सबसे बड़ा नेता आ रहा है, कितने विकलांगों को सायकिल बटेगी.........जी १२६, देखना कोई पहिया स्टेज पर निकल ना जाये पिछली बार का याद है ना डी डी पंचायत.......जी साब मै खुद कास दूंगा सारे पहिये.......गुड- बड़ा साब बोला, और क्रेडिट कार्ड कितने बटेंगे .........जी ४५२, विधवा पेंशन........जी २३४.......हाँ, देखना कोई महिला जब स्टेज पर चढ़े तों कोई दरख्वास्त ना हो उसके हाथों में वरना जिस विभाग की शिकायत होगी उसे मै छोडूंगा नहीं समझे सब.........जी. और सारी महिलाए ठीक से पांव पड़े, सर पर प्रापर घूंघट रहे सबके और सादिया एक समान  रहे सभी विधवाओं की....महिला बाल विकास ध्यान रहे इस बात का. और  हाँ, सी ई ओ जनपद,  भोजन का मेनू बताईये.......और किसी गरीब के घर बनवा सकते है, वही खा लेंगे सब इकट्ठा पर सफाई का ध्यान रहे.......... पी आर ओ, इसका प्रचार-प्रसार ठीक से समझे "ठीक से" चबाकर कहा था बड़े साब ने........जी, एक मिमियाती से आवाज आई.
अरे हाँ इस मेले में लोग आयेंगे कैसे...............भीड़ होना चाहिए कम से कम पचास हजार लोग, राजधानी से भी मीडिया आरहा है और एकाध नॅशनल चेनल भी शायद कव्हर कर ले.......साब आ जायेंगे......एस डी ओ पुलिस यहाँ है इन्हें कह दिया है और फ़िर सारे सचिवों को भी चमका दिया है कि गाँव में जिसके पास ट्रेक्टर है उन्हें जब्त कर लों और उस दिन सुबह से भर लाना और साहब खाना भी वे खुद लायेंगे अपना.......बड़े साहब ने परिवीक्षा आय ए एस को देखा जों एस डी एम के चार्ज में था. फ़िर दोनों ने कुछ कानाफूसी की और मीटिंग खत्म हो गई. बड़ा अफसर चला गया फ़िर छोटे ने पेलना शुरू किया कि कहाँ, क्या, कैसे होगा.....सारे बाकी अधिकारी चिंता में थे कि चार बज गये है, अभी दो घंटो सफर करना है, घर पहुँचना है और फ़िर रात को साली आज दारु भी खत्म हो गई है क्यों....भैया आबकारी वाले साब, घर भिजवा दोगे क्या.........ये साला लोगबाग गरीब क्यों होते है, ये आदिवासी इतनी दूर क्यों रहते है जिला मुख्यालय से, और इनको सालों को सब सुविधा शासन क्यों दे रहा है, हमारी तों फट जाती है ना यहाँ तक आने में......चालीस पचास गाडियां धूल उड़ाते हुए चली जा रही है.......गाँव के स्कूल में घंटी बज चुकी है, बच्चे भाग रहे है, डर रहे है- काफिले को देखकर, ताली बजा रहे है- फटे कपड़ों में अर्ध नग्न भारत का भविष्य अपने भाग्य विधाताओं को मस्ती से निहार रहा है. आज उनके ब्लाक में पहली बार पचास गाडियां धूल उड़ाकर गई है शायद आजादी के बाद यह सड़क सूबे के सरदार के आने के कारण कुछ हद तक ही सुधर जाये ताकि किसी रमुआ की बीबी की जचकी के लिए ले जाते वक्त बैलगाड़ी में मृत्यु ना हो (प्रशासन पुराण 58)

Sunday, September 16, 2012

ज्योति दीवान छोटी का यूँ गुजर जाना ........





ये एक ढलती शाम है, नर्मदा का जल शांत परन्तु बहुत उद्धिग्न है. आज होशंगाबाद में यह नर्मदा अपने उद्दाम वेग से नहीं बह रही है, लगता है शांत होकर अपने आप से पूछ रही है कि आखिर नियति क्या है, संसार क्या है नश्वरता क्या है और क्यों कोई कैसे अपने जीवन की यात्रा को इतनी जल्दी समेट लेता है ? दोपहर को मनोज भाई ने जब सूचना दी कि ज्योति का देहावसान हो गया है तों सन्न रह गया था एकदम से, अभी पिछले हफ्ते ही मै और गोपाल घर गये थे बहुत देर तक बैठे थे और वो लगातार ठीक हो रही थी, केरल से चलने वाले ईलाज से बेहद खुश थी आशान्वित थी कि अब वो फ़िर से ठीक होकर अपनी बेटी जों सिर्फ छः माह की है, से खेलने लगेगी. ज्योति जैसा नाम वैसा काम अपने में मस्त और बच्चों से बेहद लगाव, एक लंबे समय तक वो एकलव्य में काम करती रही बच्चों के लिए पत्रिका "उड़ान" निकालना और इस पत्रिका के लिए ढेर सारा काम करना, रचनाएँ छांटना, बच्चों को चिठ्ठी लिखना, फ़िर पत्रिका को संवारना और प्रकाशित कर वितरण करना साथ ही समाज के दीगर विषयों पर काम, जानकारी, प्रशिक्षण और महिला मुद्दों पर काम करने वाले समूह से लगातार सम्पर्क बनाकर काम करना. कुछ समय बाद ज्योति राजस्थान में 'दूसरा दशक' जयपुर  में काम करने चली गई, वहाँ वो पुस्तकालय को कैसे चलाये ताकि वो बाल गतिविधियों का सक्रीय केन्द्र बन सके जैसी महत्वपूर्ण योजना पर लंबे समय तक काम करती रही. दो साल बाद यहाँ लौट आई और फ़िर सक्रीय हो गई. ज्योति को हम सब 'छोटी' के नाम से जानते थे, उसे छोटा से बड़ा होता देखा और फ़िर साथ काम किया खूब जमके, पिछले बरस ही उसकी शादी हुई थी जुलाई में और अचानक फरवरी में मालूम पड़ा कि उसे गले में कैंसर हो गया था, एलोपैथी का सब ईलाज करने के बाद आखिर आयुर्वेदिक ईलाज शुरू किया था और वो लगातार ठीक हो रही थी. आज अचानक से इस तरह हम सबको छोडकर ज्योति चली गई, एक प्यारी साथी और बच्चों में बेहद लोकप्रिय ज्योति दी...........आज जब होशंगाबाद के राजघाट पर नर्मदा के तीरे हम ढेर सारे साथी वहाँ खड़े थे तों सबकी आँखों में आंसू थे और विश्वास करना कठिन हो रहा था कि 'छोटी' बहुत छोटी सी जिंदगी बिताकर हम सबको छोडकर चली गई है हमेशा के लिए. नर्मदा के जल की शान्ति हम सबको चिढा रही थी, क्यों....जीवन का सच इतना कड़वा क्यों होता है, श्मशान से सिर्फ श्मशान वैराग्य उत्पन्न होता है जों बहुत अस्थायी किस्म का होता है पर जीवन के सच शाश्वत होते है, राकेश और योगेश भाई के घर हम सब लोग देर तक बैठे सोचते रहे.......आज नहीं तों कल जीवन सामान्य गति पर लौट आएगा पर जों अपूरणीय क्षति हो जाती है, जीवन के अंतिम और चिरंतन सत्य से जब हम दो-चार होते है तों सारा किया धारा व्यर्थ लगने लगता है. आज ज्योति ने साथ छोड़ दिया हम सबकी लाडली और प्यारी 'छोटी'- हमारे परिवार की ज्योति आज नहीं है-पर क्या वो सच में चली गई है ? पंडित कुमार जी का कबीरकृत जी का भजन याद आता है....... 
जब होवेगी उम्र पूरी, तब छूटेगी हुकुम् हुजूरी,
यम के दूत बड़े मरदूद यम से पड़ा झमेला
उड़ जाएगा, उड़ जाएगा, हंस अकेला
जग दर्शन का मेला.................

Saturday, September 15, 2012

कौन बनेगा करोडपति

कौन बनेगा करोडपति में शेरगढ़, धार, मप्र के एक प्रतिभागी है-सुमेरसिंह जी, जों बी एस एफ में इन्स्पेक्टर है ये कह रहे है कि उनका गाँव जिला मुख्यालय से सिर्फ पचास किलोमीटर दूर है, में कोई भी सुविधायें नहीं है गाँव सबसे कटा हुआ है इनके गाँव में बेसिक सुविधाएँ भी नहीं है. यह हाल है उस जिले का जहां BRGF का करोड़ों रूपया आता है, बारहवें वित्त आयोग के रूपयों और दीगर योजनाओं के अतिरिक्त. कल भाई Ashok Kumar Pandey ने नीमच का उदाहरण देकर कहा था बल्कि पूछा था कि अट्ठारह किलोमीटर कितने होते है भाई............अब बोलो अट्ठारह या पचास किलोमीटर कितने होते है??? यह एमपी के हाल है और प्रदेश में विकास की दर देश से ज्यादा है, जनकल्याणकारी योजनाएं लागू की जा रही है, बड़े-बड़े, लंबे-चौड़े दावे किये जा रहे है. बस बनते रहिये करोड़पति, करते रहिये तीर्थ यात्राएं, और बाँटते रहिये रूपये पैसे ताकि सनद रहे.............

देशप्रेम आखिर किस चिड़िया का नाम है..???

आज सोच रहा था ये देशप्रेम क्या होता है ? अपने पिछले अट्ठाईस बरसों का लेखा जोखा देखा और पाया कि मैंने कही देश प्रेम किया है या नहीं जब से वेतनभोगी हुआ हूँ और फ़िर उन सब लोगों के बारे में बहुत गहराई से सोचा और दो सालों से फेसबुक पर मेरे लिखे और उस लिखे पर आप सबके कमेंट्स के बारे में मंथन किया तों पाया कि मेरे साथ ढेर लोग इस लंबी यात्रा में जुड़े, भावनाओं में बहे, चाहे वो कोई आंदोलन हो, मुद्दा हो, भावुक प्रसंग हो, साहित्य का आयोजन हो या गाँव देहात में काम करने के चरण हो, या एक लंबी चरणबद्ध योजना हो...........तों पाया कि लोग सिर्फ और सिर्फ एक निश्चित समय के लिए जुडते है जों कि स्वाभाविक भी था और होना भी चाहिए पर देश प्रेम जैसा कुछ था नहीं यह सिर्फ एक शख्स से जुड़े होने के कारण और अपने खुद के नाम और कीर्ति की पताकाएं फहराने से ज्यादा कुछ नहीं था. आज बहुत गहराई से मैंने इस बात को सोचा, कई प्रकार की कसौटियों पर परखा- पूर्वाग्रह रखकर और बगैर पूर्वाग्रहों के भी, एक बार इमोशनल भी हुआ और एक बार बेहद तल्ख़ भी पर बहुत निर्दयी होकर  यह लिख रहा हूँ कि सिवाय अपने व्यक्तिगत लाभ,स्वार्थ और कुछ बड़ा पाने के लिए हम सबने एक दूसरे को बेदर्दी से इस्तेमाल किया, इस दौरान कुछ यहाँ से निकल गये, कुछ यही पर मठाधीश हो गये, कुछ ने देशप्रेम के अड्डे बना लिए कुछ भेड़ों की तरह उपयोग में आये और शेष बचे बलि के बकरे/मुर्गे बनकर भारत माँ की वेदी पर चढ गये. यह बहुत ही घातक था और यह उहापोह तब शुरू हुई जब किसी ने मुझसे पूछ लिया कि मै क्या कर रहा हूँ इस सारे संक्रमण काल में और सिवाय दिग्भ्रमित करने के किया क्या है........प्रश्न जायज था और गंभीर भी बस सारा दिन बाकी सब काम छोडकर यही सोचता रहा. कितने साथियों ने अर्थ देकर मदद करने का सोचा, किया भी एक लिजलिजी भावुकता में कि गाँव सुधर जाये, शिक्षा, स्वास्थय की बेहतर व्यवस्थाएं हो सके, कुछ नौजवान पढ़-लिख ले, महिलाए सशक्त हो जाये, दूरदराज के इलाकों के लोग जागरूक हो जाये. मै बहुत आभारी हूँ ऐसे साथियों का जिन्होंने अपने जेब से या दोस्तों, संस्थाओं की जेब उघाड़कर यह सब किया पर मुझे नहीं पता था कि यह सब छोटा कर्म करके उन्होंने बड़ा  "पुण्य" कमा लिया चाहे वो उच्च कोटि की सुविधाएँ हो, पूंजी जुगाडी, वीसा जुगाडा और स्थायी बसने का नेक इराया किया कही अंतरिक्ष में, सामाजिक छबि बनाई, प्रशासन में दखल किया, मीडिया में लंबी छलांग लगाई या किन्ही तथाकथित लोगों से सम्बन्ध/सम्पर्क बनाए.
 

मजेदार यह है कि यह सब देशप्रेम था और इसे सार्वजनिक रूप से बेचना इन सब "भोले" लोगों  को नागवार भी नहीं गुजरा, गरीब गुर्गों के साथ किये इसी देशप्रेम पर कचरा लिखकर, कार्टून बनाकर लाखों के पुरस्कार कबाड़े, देशी-विदेशी फेलोशिप बटोरी और पूछा यह जा रहा है कि देशप्रेम क्या है.........???
 

बहुत अफसोस है कि मुझे आज तक देशप्रेम का फंडा समझ नहीं आया , आज जब कोई पूछ रहा है कि यदि मै फलां बन जाऊ या फलां कर लू तों क्या करूँगा........हाँ, हाँ, हाँ, मुझे कोई समझा दे कि देशप्रेम क्या होता है पानी में खड़े रहना, गरीब बच्चों के लिए किताबे जुगाडना, किसी महिला को अस्पताल पहुंचा देना, एक गाँव में जागरूकता की नौटंकी कर देना, या क्रांतिकारी नारों से दीवारें पाट देना, या खूब कलम घिस- घिसकर कूड़ा परोसना, कार्टून बनाना, विदेश में भ्रमण करना और गरीबी- भूख बेचना, किसी सरकारी क़ानून के सहारे अपने नाम का प्रचार प्रसार करना और अवार्ड जीतना........पता नहीं आप लोग शायद बेहतर मदद कर सकते है मुझे समझाने में कि देशप्रेम आखिर किस चिड़िया का नाम है......यह कोई तनाव या फ्रस्ट्रेशन की बात नहीं, ना जलन या कोई कुंठा, पर मेरी कमजोर समझ को बढाने के लिए लिख रहा हूँ कि देशप्रेम क्या है........

Friday, September 14, 2012

प्रशासन पुराण 57

यह जिले का बड़ा दफ्तर था, साहब विहीन दफ्तर था था सो स्थानीय बड़े बाबू ही बड़े सांप थे, फ़िर बड़े साब राजधानी से आ गये सो बड़े बाबू को जमकर तकलीफ होने लगी उनकी सत्ता छीन गई थी. बस फ़िर क्या था रोज नाटक होते रोज नए हंगामे, नए साब को कुछ आता नहीं था सो वे भी यहाँ-वहाँ घूमते रहते थे और हैरान होते रहते थे. दफ्तर में एक महिला थी जों अर्धविक्षिप्त थी और उस बेबस विधवा महिला को यह नौकरी अनुकम्पा के आधार पर मिली थी. इसके तीन पुत्र थे जों शादीशुदा थे पर तीनों यकीनन पागल थे और यह अपनी तनख्वाह से सिर्फ उन तीनों का ईलाज करवाती रहती थी. आज तों हद हो गई जब अचानक वो जोर जोर से जार जार रोने लगी और कहने लगी कि उसके साथ अत्याचार हो गया और सब मुझे परेशान कर रहे है और मै अभी कलेक्टर के पास जाउंगी, बस अपने कपडे फाडने लगी यह भयावह दृश्य था. सब घबरा गये, एक विक्षिप्त महिला पुरे स्टाफ में जिसमे छः राजपत्रित अधिकारी थे, एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था का प्रतिनिधि, सांसद प्रतिनिधि, तीन चपरासी, और दो बाहरी लोग थे. इस पुरे बदहवास नाटक का आगे क्या होगा यह नहीं पता पर एक अधिकारी ने कहा कि इसी पागल महिला ने एक बार उन पर यौन उत्पीडन का आरोप भी किसी के कहने पर लगाया था. अब भला बताओ कि अट्ठावन साल की महिला जों घोषित रूप से पागल है जिसके तीन बेटे सारे शहर में पागल और प्रसिद्द है पर कौन यौन उत्पीडन करेगा.......बहरहाल जिले में आये नए साब को कुछ सूझ नहीं पड रही, पुराने बड़े बाबू मुस्कुरा रहे है, सारे राजपत्रित अधिकारी अपनी- अपनी इज्जत और समाज में नाम को लेकर चिंतित है और वो पागल महिला बड़े ही सहज ढंग से सहज होकर थोड़ी देर में घर जाती है एक ताला लाती है, अपने कमरे में ताला डालकर चल देती है पर्स उठाकर मुस्कुराते हुए और बड़े बाबू खैनी फांक रहे है नए साब कलेक्टर के दफ्तर की ओर भाग रहे है कि जाकर पहले ब्रीफ कर दूँ , वरना यह नौकरी तों गई.........जय हो जय हो.........प्रशासन की जय हो, षड्यंत्रों की जय हो, बाबूगिरी की जय हो और विक्षिप्तों की जय हो. (प्रशासन पुराण 57)

हिन्दी दिवस की फ़िर भी घिसी-पीटी बधाई...............


लों आखिर आ ही गया हिन्दी दिवस अब हफ्ते भर तक खूब श्राद्ध और तर्पण होंगे, जों भी हो अपन ने खूब इनाम बटोरे थे और नगद पुरस्कार भी लिए थे एक जमाने में देवास के बैंकों में और तमाम तरह के क्लबों में खूब जम के वाद-विवाद करते निबंध लिखते और हिन्दी-हिन्दी करते पर साला एम ए अंगरेजी साहित्य में ही किया, बाद की सारी पढाई अंगरेजी में ही की, क्योकि समझ आ गया था कि इस देश में दाल रोटी खाना है दो टाईम तों अंगरेजी के अलावा कोई और भाषा तार नहीं सकती अपने भविष्य को. पर आज अंगरेजी को अपने दायें-बाएँ करने के बाद भी दाल रोटी खाना मुश्किल हो रहा है इस देश में, तों तरस आता है अपने आप पर और दुःख होता है कि हिन्दी जानने वाले की क्या गत हो गई है और कुल मिलाकर दो कौडी का बनाकर रख दिया है.
बहरहाल, हिन्दी के बड़े मठों और गढो से डिग्रीयां बटोरकर चापलूसी से यहाँ-वहाँ नौकरी जुगाडने वाले हिन्दी के मास्टर और राजभाषा अधिकारी ही आज खुश है और अपने तथाकथित आतंक से बच्चों का जीवन बर्बाद कर रहे है, और राजभाषा अधिकारी सरकारी आदेशों को दुरूह भाषा में लिखकर हिन्दी को अबला बनाने के षड्यंत्र में  शामिल है या उन लिक्खाडों को जों उल-जुलूल लिखकर पत्रिकाओं की बाढ़ में अपना उल्लू सीधा करने के लिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हुए कागज़ बर्बाद कर बकवास पत्रिकाएं निकाल रहे है, जिसमे यही हिन्दी के मास्टर अपना चुतियापा बेदर्दी से परोस रहे है. हिन्दी की बर्बादी में जितना योगदान इन टुच्चे संपादकों और मास्टरों का है उतना आम आदमी का नहीं है, आम आदमी ने तों दक्षिण से या उत्तर-पूर्व से आकर हिन्दी सीख ली है जैसे तैसे भले ही फिल्मों से पर ये धूर्त कौम तों हिन्दी की मैय्यत में शामिल होकर नुक्ते में खीर पूड़ी उड़ा रही है............शर्म, शर्म और सिर्फ शर्म..........
खैर हिन्दी दिवस की फ़िर भी घिसी-पीटी बधाई...............

Thursday, September 13, 2012

एक हारे और थके हुए मुखिया का बयान............Dr Manmohan Singh PM India

देशवासियों -एक हारे और थके हुए मुखिया का बयान............
अब हारने वाले तों है क्या करें और क्या ना करे कम से कम २०१४ तक ही जैसे तैसे सरकार ढो लें यही बहुत है................तों जनता जनार्दन अब मेरे पास कोई और चारा नहीं है आपको डीजल और गैस में रूपया देना ही होगा और रहा सवाल आपकी जेब का तों देखो ना मेरे पास तों शरद पवार या कमलनाथ से भी कम संपत्ति है तों अब आप ही बताए कि मै पी एम हूँ जब मेरी यह हालत है तों आपको तों नंगा-भूखा रहना ही होगा ना और हाँ ज्यादा चबड चबड मत करना फेसबुक पर वरना देशद्रोह में सालों अंदर करवा दूंगा..............चलता हूँ जाकर गुरशरण कौर को समझाता हूँ कि साल में सिर्फ छः टंकी ही वापरना क्योकि सातवे पर ज्यादा देना होगा वैसे भी अब आपकी गालियाँ खा - खाकर पेट भर ही जाता है ऊपर से बाबा की उम्मीदें, जिद और मेडम जी की डाट भी जब से यहाँ आया हूँ, खा ही रहा हूँ, अब आपसे छुपा है क्या कुछ.................खैर भाईयों-बहनों मै मानता हूँ कि आज़ाद हिन्दुस्तान का मै सबसे निकम्मा निकला यह तों कम से कम इतिहास में दर्ज रहेगा.......चलो यही सही बुढापे में क्या-क्या सहना पडेगा................और हाँ एक राज़ की बात - आप लोग ज्यादा चिल्लाओगे तों एकाध रूपया कम कर दूंगा डीजल पर और गैस की टंकी छः से आठ कर दूंगा पर कीमत तों कम नहीं करूँगा.............मोंटेक भैया ने भी कहा था कि कम मत करना सालों को भुगतने दो, मरे साले अपन तों अब सत्ता में आयेंगे नहीं, सो आप मरे और जग डूबे.......वर्ल्ड बेंक का भी दबाव है................खैर चलू अब........ जय राम जी की.............सत् श्री अकाल, जों बोले सो निहाल.....

Tuesday, September 11, 2012

नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा X

तुम्हे याद करते हुए एक माह और आठ दिन कैसे बीत गये मानो युग और शताब्दियाँ बीत गई है, पता ही नहीं चला बस अब रोज पानी की बूंदों से आते तुम्हारे संदेस पढकर बिफर जाता हूँ अपने आप से गुस्सा होकर कई बार लड़ लिया हूँ इन बूंदों से और फ़िर कई बार अपने आपको झोंक दिया कि चलो इस बार इस बारिश में बाढ़ के पानी में निकल जाये कही दूर.............क्या नियति ने नदी के किनारे इसी के लिए लाकर पटकनी दी है मुझे......लड़ा तों उससे भी ज्यादा था और गुस्सा तों उससे भी ज्यादा था... तुमसे नहीं... अपने आप से, पर अच्छा यह लगा कि सब ठीक हो गया और अब विश्वास है कि इस जाते हुए अधिक मास में पानी की बूंदों और बाढ़ के साथ सब बह जाएगा हमेशा के लिए और रह जाएगा तों सिर्फ एक एहसास कि यहाँ इसी नदी के किनारे एक अलमस्त आवारा दरवेश आया था जिसका साया अब कही नहीं होगा इस नश्वर संसार में -  जों कहता था उड़ जाएगा हंस अकेला, जों कहता था ज़रा हलके गाड़ी हांको मेरे राम गाड़ी वाले.......जों कहता था हिरना समझ बूझ बन चरना, जों कहता था जिंदगी तुझको तों बस ख्वाब में देखा हमने, जों कहता था कबीरा सोई पीर है जों जाणे पर पीर, जों कहता था इस घट अंतर बाग बगीचे इसी में पालनहार, जों गाता था कि कहे कबीरा सुनो भाई साधो जिन जोड़ी तिन तोडी............जों मानने लगा था अब कि गौरी सोई सेज पर सर पर डाले केश, चल खुसरो घर आपणे रैन भई चंहु देस.............(नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा X)

प्रशासन पुराण 56

यह एक देस की कथा है जहां बड़ी नदी बहती थी जंगल में से होकर छल छल, एक बार जंगल की सरकार ने उस नदी पर बाँध बनाने का तय किया और जानवरों की पंचायत ने उस पर बाँध बनाने की इजाजत दे दी, कुछ जन-जानवरों के घर - खेत जब डूबने लगे तों इन्ही जन्-जनावारों ने हडताल कर दी. सारे जन-जनावर पानी में बैठ गये राजा को तों कोई खबर ही नहीं थी, वो घूम रहा था यहाँ- वहाँ और मजे कर रहा था, जंगल के सूबेदारों के साथ बैठक ले रहा था, पर जब बात गले से ऊपर हो गई और पूरी दुनिया के लोग चिल्लाने लगे तों राजा को होश आया तब उसने पुरे कृष्णपक्ष के पन्द्रह और दो दिन बाद अपने दरबार में जानवरों के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा कि सरकार और दरबार आपके साथ है. आप लोग पानी से निकलो, हम आपके खेतों में पानी नहीं भरेंगे. और इस अवसर पर राजा ने अपने तीन चतुर मंत्रियों समेत दो सूबेदारों को मिलाकर एक समिति बनाने की भी सिर्फ घोषणा की, तीनों चतुर मंत्री जंगल के बड़े प्रभावी मंत्री थे जों गलेगले तक सुख सुविधाओं में डूबे थे, इलाके की खरबों की जमीन के मालिक थे, और दो सुबेदारों में से एक तों बड़ा ही घाघ किस्म का था, जाति से वणिक, वो प्रदेश में निर्दयी सूबेदार के रूप में जाना जाता था, उस पर जंगल के मराठी क्षेत्र के पास वाले सूबे में १९ जानवरों को ज़िंदा मारने का इल्जाम था जब एक बार ये निरीह १९ जानवर अपनी सड़ी हुई फसल का मुआवजा माँगने उसके पास आये थे, तों इसने उन्हें गोलियों से उन सबको भून दिया था, मामला गंभीर होने पर जांच समिति की नौटंकी हुई, जब जांच समिति बैठी थी तों ये उसी मराठी बहुल जंगल में, जहां का यह निरंकुश तानाशाह था, एक अखबार के भेडिये के साथ शतरंज की बाजी लगा रहा था, वहाँ से उठकर आने के बाद यह निरंकुश सूबेदार नदी और पानी के विभाग में ही पिछले कई बरसों से जमा हुआ है, इस सूबेदार पर जों बेहद निर्दयी, कट्टर और जानवर विरोधी था, को इस समिति का सदस्य बनाए जाने पर पुरे जंगल के लोग सशंकित थे पर कहा क्या जा सकता था .......हरि  अनंत और हरि कथा अनंता, बोलो जय जय, प्रशासन की जय जय और राजा की जय जय.....(प्रशासन पुराण 56)

Thursday, September 6, 2012

नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा IX

सुबह बात की थी तुमसे, जो आवाज सात समंदर पार से आ रही थी वो बेहद साफ़ थी पर मेरी आवाज काँप रही थी और मै सोच रहा था कि कैसे कह दूँ कि सब कुछ ठीक नहीं है, अभी हाल ही में मैंने अपनी सारी जांचें करवाई है और तुम्हे किसी अँधेरे में नहीं रखना चाहता- बस सिर्फ इतना कहना है कि ये सब बहुत नकारात्मक है और जीवन के और सत्य के बीच बस सिर्फ दो और दो उँगल का ही फासला है, शेष-अशेष के बीच झूलता यह सब कुछ बस होने को है भी और नहीं भी....लगता है रूह काँप रही है यह कहने में, चाहता तो सब कुछ कह देता उसी झीनी आवाज में लरजते हुए, पर अभी तक सिर्फ गरज कर बातें की है और जीवन के इस कमजोर और भावुक क्षण में मै एक बार से कमजर्फ होकर यूँ तुम्हे सब बताना नहीं चाहता था. पर सच तो सच है आज नहीं तो कल यह सामने आएगा ही बस फर्क इतना होगा कि मेरे बाद तुम्हे कुछ और लोग बताएँगे यह दास्ताँ और कहेंगे कि तरसता रहा आख़िरी तक कि कह देता, एक बार देख लेता!!! पर अब कहना नहीं है कुछ और शायद इसलिए मै हमेशा टालता रहा कि ना बात करू, ना कहू, कुछ अपनी, आज जब तुम कह रहे थे अपने बारे में उस विशालकाय जीवन और स्वर्गातिक माहौल के बारे में तो लगा कि चलो तुम उस मकाम पर पहुँच गये हो जहां तुम्हे होना था, तुमने कहा था कि यहाँ सब बहुत श्रेष्ठ है यहाँ का जीवन एक स्वप्न के मानिंद है और इसे जीना एक शताब्दी को जीना है, अपनी फिटनेस और अपने दैनंदिन कामों का जिक्र जब तुम कर रहे थे तो मै सहेज रहा था अपने  हिस्से का दुःख और यहाँ -वहाँ बिखरे जीवन के चंद चीथड़े  और फ़िर उस सब के बारे में सोचता रहा उन बातों का स्मरण करने लगा जो हमें किसी एक उजले स्वरुप और जीवनाभुनावों के बारे में बताती थी, उन बादलों बनाते बिगडते रंगों के बारे में सोचा जों हम पर से गुजर कर पानी की दो नन्हीं बूंदे हम पर गिरा गये थे, उन फूलों के बारे में सोचा और उन ओंस की बूंदों को याद किया जों बहुत गहरी प्यास को भी सिर्फ छूने भर से बुझा गई थी, उन पेड़ों को याद किया जिनके नीचे बैठकर जीवन जीने के नए तरीकों के बारे में हम बात करते थे, तुमने जाने के पहले मुझे कुछ स्वप्न और तरीके भी बताए थे कि शायद अब जीवन में तुम वो सब ना दे पाओगे  जों अभी तक देते रहे थे और इसलिए मुझे अपना पथ चून लेना चाहिए पर ऐसा होता है क्या...........? बस ग्यारह मिनिट बत्तीस सेकण्ड कब निकल गये और मै भूल गया कि तुमने कहा था कि इतना समय नहीं कि झगडा कर ले अभी......बस अपने इस एकाकीपन और तन्हाई से आजीज आ गया हूँ और इन सारी जांचों ने, जों खून की एक-एक बूँद को जों मेरे शरीर के हर हिस्से से बहुत सघन प्रक्रिया से निकाल कर की गई थी, ने एक बार याद दिला दी है कि मै..........तुम....ये सब और आख़िरी में जीवन का सच कहू या सत्व मुझे नहीं पता ......बस अन्धेरा बहुत है और मेरा रोशनदान कोई दूर ले गया है मुझसे, सूरज अब बहुत दूर हो गये है मेरे और अपने ही अंधेरों में गुम.  मै बस यहाँ हूँ इस नदी के किनारे, इस नदी पर चीखते हुए लोगों के बीच, इस नदी पर अपने अधिकारों और जीवन के लिए जमीन के एक छोटे से टुकड़े की लड़ाई लड़ते हुए लोगों के बीच, इस नदी के द्वीप पर बेहद शांत, स्थिर और तटस्थ लगभग एक क्षण में हजार योनियों के जीवन को जीता हुआ कि बस अब मुक्ति मिली कि तब...........( नर्मदा के किनारे से बेचैनी की कथा IX)

Tuesday, September 4, 2012

भारतीय शिक्षा के आधुनिक कालजयी पुरुष श्री अनिल बोर्दिया को नमन



 देश के प्रख्यात शिक्षाविद श्री अनिल बोर्दिया का निधन हो गया अभी मैंने अपनी मित्र शबनम से जयपुर में बात की तो पता लगा. अनिल जी से एक लंबा सम्बन्ध था शिक्षा के सारे प्रयोग बांसवाडा के गढी ब्लाक से अनिल जी ने शुरू किये थे जब वे केन्द्र सरकार में शिक्षा सचिव थे तब उन्होंने राजस्थान में लोक जुम्बिश जैसी महती परियोजना शुरू की थी बाद में यह परियोजना प्राथमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण के लिए एक आदर्श बनी जिसमे समुदाय को जोडकर शिक्षा की बात की गई थी, अनिल जी बेहद गंभीरता से और खुले मन से सभी का आदर करते हुए नए विचारों को सम्मान देते थे. मेरे जैसे युवा जो कुछ करने की सोचते थे को उन्होंने  भरपूर अवसर दिए जो कालान्तर में मुझे काम आये और शिक्षा पर मेरी ठोस समझ बनी. बाद में अनिल जी ने हमेशा  राजस्थान बुलवाया और खूब घुमाया बीकानेर से डूंगरपुर और ना जाने कहाँ कहाँ. ढेर सारी यादें शिक्षक प्रशिक्षण, पाठयक्रम निर्माण, शालात्यागी बच्चों/किशोरों के साथ किये गये तीन माह के लंबे शिविर, बारां में संकल्प के साथ काम, तीन डाईट में सघन प्रयोग और काम, स्थानीय आदिवासी बोली, संस्कृति और मूल्यों के साथ काम.......बाद में राजनीति के चलते लोक जुम्बिश जैसी योजना बंद हो गई लाखों लोग जयपुर में सड़क पर उतरे और तत्कालीन मुख्य मंत्री श्री अशोक गेहलोत को सोचना पड़ा कि सरकार ने यह बंद करके ठीक नहीं किया पर निर्णय हो चुका था. यह एक बड़ा झटका था पर अनिल जी ने हिम्मत नहीं हारी और वे लगे रहे और फ़िर वे एक नई संकल्पना के साथ अपने साथियों के साथ फ़िर जोश खरोश से मैदान में उतरे "दूसरा-दशक' जैसा काम लेकर जिसमे १० से २० साल तक के किशोरों के लिए वे शिक्षा की नई परिकल्पना लेकर आये थे. आज भी यह महत्वपूर्ण कार्य राजस्थान के कई जिलों में हो रहा है. और मै फ़िर इस काम से जुडा मुझे फक्र है कि एक हिस्से के पाठ्यक्रम को मैंने उनके सान्निध्य में संपादित और तैयार किया था. बाद में अनिल जी आग्रह करते रहे कि आकर दूसरा दशक परियोजना का काम पूर्णरूप से मै सम्हाल लू पर किन्ही पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते मै जयपुर नहीं जा पाया अभी विभा से बात हो रही थी तो मैंने फ़िर इस बात का जिक्र किया था, जयपुर में जाने पर उनका आतिथ्य और मिलना एक सहज प्रक्रिया थी देर तक उनसे बातें करना हमेशा मन में उत्साह  भर देता था. वे ठीक दस बजे दफ्तर आ जाते थे और इस बुजुर्गियत के बाद भी देर शाम तक दफ्तर में काम करते थे. देश में शिक्षा का शायद ही कोई ऐसा दस्तावेज होगा जिसे अंतिम रूप देने में उनकी भूमिका ना हो, शिक्षा का क़ानून बिल उन्ही की अध्यक्षता में ड्राफ्ट किया गया था.
आज अनिल जी के निधन का दुखद समाचार सुनकर लग रहा है कि देश ने ना मात्र एक बड़ा शिक्षाविद खो दिया बल्कि गरीब और वंचित बच्चों /किशोरों की शिक्षा की चिता करने वाला व्यक्ति चला गया और वे सब अनाथ हो गये है. मेरे लिए यह अपूरणीय क्षति है मेरे बायोडेटा में आज भी उनके नाम का सन्दर्भ हमेशा जाता था और हर बार कही भी चयन होने की दशा में वे नई नौकरी में वो मेरे बारे अच्छा सन्देश देते थे और मुझे नौकरियां मिल जाती थी.
मेरे लिए पितृ तुल्य अनिल जी का जाना एक बहुत बड़ी क्षति है जिससे मै कभी उबार नहीं पाउँगा.
भारतीय शिक्षा के आधुनिक कालजयी पुरुष श्री अनिल बोर्दिया को नमन एवं भावभीनी श्रद्धांजलि

भाई Anuj Lugun की एक महत्वपूर्ण कविता.

भाई Anuj Lugun की एक महत्वपूर्ण कविता.
 

आजाद लोग 

मुकाबला जब आजाद लोगों में हो
तो हार-जीत के सवाल बेतुके होते हैं
हारे हुए आजाद आदमी के जज्बात
जीते हुए राजा के जज्बात से
ज्यादा सुंदर और मजबूत होते हैं,
आजाद लोग अपने मरने पर विचार नहीं करते

वे अपने-
देवताओं
पूर्वजों
बच्चों
बूढ़ों और औरतों के सम्मान पर बहस करते हैं
वे किसी हथियारबंद राजा से नहीं डरते
वे एक पेड़ के गिरने से डरते हैं
नदी के सूखने से डरते हैं
आँधी से गिरे
किसी पक्षी के घोंसले को देख वे चिंतित होते हैं,
आजाद लोग अपनी मौत से ज्यादा
दूसरों के जीवन पर बहस करते हैं
आजाद लोग फिर अपने बहसों पर हैं
वे धान की बालियों पर
हवा के लिए बहस कर रहे हैं
वे लोकतंत्र के राजपथ पर
जंगलों के लिए बहस कर रहे हैं।
आज फिर
हारे हुए आजाद आदमी के जज्बात
जीते हुए राजा के जज्बात से ज्यादा सुन्दर और मजबूत हैं।

Saturday, September 1, 2012

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो -वसिम बरेलवी


उसूलों पे जहाँ आंच आये  तो टकराना ज़रूरी है
जो जिंदा हों तो फिर जिंदा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों के खुदमुख्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हरे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटे
सलीकामंद शाखों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में ता’अल्लुक़ टिक नहीं पता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीका ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है खुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
की इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

-वसिम बरेलवी