Wednesday, February 29, 2012

प्रशासन पुराण 39

मार्च आ गया है सखी सारे एनजीओ और सरकारी लोग चिंता मै है कि इस वर्ष का रूपया कैसे खर्च होगा, बड़े नामी गिरामी लोग जो कुशल बहुतेरे है व्यस्त है और सारे कंसल्टेंट्स भी जुगाड में व्यस्त है किसी के पास समय नहीं है, हाल, धर्मशालाएं और सभागार भी खाली नहीं है ससुरे कहा जाए और कहा से खर्च करे लोग बाग भी व्यस्त है यहाँ वहा अब श्रोता कहा से लाये, श्रोता है कि मानते नहीं जो ज्यादा सुविधा वाला संस्थान होगा और आने -जाने का पूरा टी ए / डी ए देगा उसकी दूकान पर जायेंगे और खूब लूटकर आयेंगे........इधर बेंक वाले भी अपनी लक्ष्य पूर्ति के लिए सरकारी विभागों के चक्कर लगा रहे है कि पिछले साल का पचास साथ लाख तो जस का तस पड़ा है अब इस साल भी दो तीन करोड डाल दो प्रभु तो हमारी नौकरी बच जाए ब्रांच का लक्ष्य पुरा हो जाए और गधे घोड़े गंगा नहा ले.......मार्च की माया  बड़ी महान है और जिलो में तो अधिकारियों ने दो तीन करोड डाल रखे है इस साल भी मार्च के अंत तक वे चार पांच डाल देंगे फ़िर आप क्यों नहीं जुगाड करते आपकी सुविधा के लिए हम है ना बेंक आपका साथी............
इधर एनजीओ वाले भी त्रस्त है हे प्रभु कोई भी पचास साथ लोग दिला दे ताकि यह बजट खर्च हो जाए ससुरे मीडिया वालो को दाना पानी डाल आकर छपवा लेंगे ताकि रिपोर्ट झकास बन् जाए.............बस मार्च के पहले सब हो जाए.........................हे प्रभु इज्जत रख लेना...........ये मार्च इतनी जल्दी क्यों आ जाता है...................................(प्रशासन पुराण 39)

Tuesday, February 28, 2012

लों फागुन आ गया है................................

हवा में चुभन है, धूल से आसमान सरोबार है, पानी का ठंडापन अब ठंडा नहीं लगता, एक मदहोशी पुरे समां में छाई सी है, टेसू के फूल महक रहे है, चटख लाल रंग की लालिमा चहुंओर दिख रही है, जंगल में पक्षी बौराये से उड़ते है और दोपहरी में सडके वीरान होना शुरू हो गयी है, रात भी लंबी हो चली है और शफक एकदम सूर्ख बस आम के पेड़ भी बोरो से लदे हुए है और झुक झुक कर हवा के हिलोरों से झुलने लगे है सखीयाँ बेचैन है अपने पीया से मिलने को.................मन झूमने को बेताब है और लगता है कि लों फागुन आ गया है................................

Friday, February 17, 2012

रामप्रकाश कटारे एक जीवंत अध्यापक और गौंड बच्चे


यदि आपको किसी दूरस्थ गाँव में कोई आदिवासी गौंड और कोरकू बच्चा ड़ा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर , या विवेकानंद की तस्वीर देखकर पूरा नाम और जीवनी बता दे, या सत्रह का पहाडा बोल दे या हिन्दी अंगरेजी कविता का सस्वर पाठ सुना दे या मध्य प्रदेश गान सुना दे जो वरिश्ठ प्रशासनिक अधिकारी श्री मनोज श्रीवास्तव ने लिखा है तो अचरज होगा ना, खासकरके तब, जब ये बच्चे सरकारी स्कूल के हो और एक टपरिया में पढ़ रहे हो तो यह मुझे तो कम से कम विश्व का आठवां आश्चर्य लगता है. इन बच्चो ने कॉम्प्लान या बोर्नविटा का विज्ञापन भी देखा नहीं होगा कि याददाश्त बढाने के लिए यह पीना चाहिए.  यह कहानी है सीहोर जिले के नसरुल्लागंज ब्लाक के ग्राम लाचोर टप्पा की है. इस ग्राम में शिक्षा ग्यारंटी के तहत एक शाला खुली जिसे सेटेलाईट शाला का दर्जा मिला, थोड़े समय बाद यहाँ भवन के लिए दो लाख रूपये स्वीकृत हुए परन्तु पंचायत के सचिव लाह खां ने वो राशि हड़प ली ना मात्र यहाँ की बल्कि इसी गाँव के माध्यमिक शाला के लिए आये  हुए  लगभग तीन लाख  रूपये भी हड़प लिए, जब एस डी एम् साहब के पास जांच के लिए मामला गया तो उन्होने उस सचिव को निलंबित कर दिया इधर बच्चे परेशान और माटसाब भी, फ़िर एक नए गुरूजी की नियुक्ति हुई जिनका नाम रामप्रकाश कटारे था एम ए राजनीती तक पढ़े ये युवा जोशीले अध्यापक नसरुल्लागंज में दो निजी विद्यालयों में पढाकर आये थे और प्रतियोगिता और समय के मुताबिक़ शिक्षा से वाकिफ थे सो आते ही उन्होने गौंड समुदाय के साथ लंबी लंबी बातचीत की और उन्हें तैयार किया कि एक झोपड़े लायक जगह वही दे दी जाए जहां लाह खां ने सिर्फ नीव बनाकर छोड़ दिया और रूपया डकार लिया था. 
बस जगह मिलने पर उसे ना मात्र सजाया वरन बच्चो को शिक्षा से ऐसा जोड़ा कि आज बच्चे छुट्टी के दिन भी आकर पढते है . रामप्रकाश बताते है कि गत १९ अक्टूबर २०१० से उन्होंने आजतक एक भी छुट्टी नहीं ली है बल्कि वे छुट्टी के दिन भी आकर बच्चो को पढ़ा देते है शाला प्रबंध समिति के अध्यक्ष रामसिंह उईके बताते है कि माट्साब ने तो गाँव ही बदल दिया है संकुल के प्रधानाध्यापक राम सिंह मीणा का मार्गदर्शन और स्नेह इतना है कि वे मध्यान्ह भोजन के लिए अपनी शाला के बच्चो के साथ ही इन बच्चो को भी गेंहू उपलब्ध करवाते है, क्योकि रामप्रकाश के बच्चो को पर्याप्त आवंटन नहीं मिल पा रहा अभी तक २५००/- की तनख्वाह कमाते हुए स्कूल के लिए ९००/- से ज्यादा के गेंहू, ३८००/- का किराना और २६ जनवरी मनाने के लिए ३०००/- जेब से खर्च किये है. बच्चो का शैक्षिक स्तर किसी निजी सी बी एस ई संस्था से कम नहीं है और बच्चो का आत्मविश्वास अप्रतिम है. ये बच्चे सच में कल की तस्वीर है पर अफसोस कि चार साल से उस लाह खां पर केस चल रहा है सरकार ने सिर्फ उससे आहरण के अधिकार छीने है और कुछ नहीं किया अब सवाल यह है कि इन प्यारे मेधावी बच्चो को अपनी छत  कब नसीब होगी, आज मै समझाने को तो कह आया कि आदर्श स्कूल ऐसा ही होना चाहिए दीवारें स्कूल नहीं होती पर व्यवस्था को लगी दीमक में यदि रामप्रकाश कुछ आकर कर रहे है तो उन्हें जिला प्रशासन को नया भवन देना चाहिए और सम्मानित कर सार्वजनिक मान्यता देना चाहिए. धन्य है ऐसे लोग जो सरकारी व्यवस्था में ऐसी जीवटता के साथ लगे हुए है.

अभी कमबख्त दिल धड़कता है- शहरयार


अभी नहीं, अभी जंजीरे ख्वाब बरहम है 
अभी नहीं, अभी दरवाज़ है उम्मीदों का 
अभी नहीं, अभी सीने का दाग जलता है 
अभी नहीं, अभी पलकों में खूं मचलता है
अभी नहीं, अभी कमबख्त दिल धड़कता है .

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शहरयार (1936-2012)