Tuesday, January 31, 2012

एक अकेली छतरी में जब
आधे आधे भीग रहे थे
आधे गीले आधे सूखे, सूखा तो मैं ले आई
गीला मन शायद बिस्तर के पास पड़ा हो..
.................. Gulzar

डायरी

डायरी
Nityanand Gayen

मैं जिस डायरी में
लिख रहा हूँ
यह कविता
यह तुम्हरी है ।
इस डायरी की तरह , कभी
मैं भी
तुम्हारा हुआ करता था ।
आज न यह डायरी तुम्हारे पास है
और
न ही मैं तुम्हारे पास हूँ ।
इस डायरी को
जब छोड़ा था तुमने मेरे पास
खाली था इसका हर पन्ना
बिलकूल मेरी तरह ।
इस डायरी का हर पन्ना तो
मैंने भर दिया है
लिख -लिख कर कवितायेँ
किंतु
मैं आज भी खाली हूँ
बिलकूल पहले की तरह .

Monday, January 30, 2012

इंदौर में 4 फरवरी2012 को स्व ओम प्रकाश रावल स्मृति कार्यक्रम में

इंदौर में 4 फरवरी2012 को स्व ओम प्रकाश रावल स्मृति कार्यक्रम में "भाषा की राजनीती और राजनीती की भाषा" पर प्रखर वक्ता राहुल देव अपनी बात रखेंगे. प्रेस क्लब इंदौर में शाम 630 पर आप सभी आमंत्रित है.
रावल जी मप सरकार में शिक्षा मंत्री थे साथ ही एक ओजस्वी वक्ता, विचारक और शिक्षाविद थे. सर्वोदय प्रेस सर्विस, स्व रावल जी के बेटे ड़ा असीम रावल, जो कई बरसो से अमेरिका में है, उनकी पत्नी कृष्णा जी और बाकी साथी मिलजुलकर इस कार्यक्रम को बरसो से सफल आयोजित करते आ रहे है........पुराने दुर्लभ साथियो से मिलने का मौका और महत्वपूर्ण चर्चा में भागीदारी के लिए अदभुत अवसर होता है यह मालवे में......कार्यक्रम में महत्वपूर्ण रोल निभाते है चिन्मय मिश्र, सिद्धार्थ जैन, ड़ा राजीव लोचन शर्मा, राकेश दीवान, और भी ढेर सारे जमीनी लोग. प्रगतिशील विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले साथियो से भेंट भी होती है....यहाँ
जरूर आईये......

Saturday, January 28, 2012

महाप्राण निराला और वसंत पंचमी 28 Jan 2012.


वर दे, वीणावादिनि वर दे !
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे !

काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे !

नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे !

वर दे, वीणावादिनि वर दे।
भारति, जय, विजयकरे
कनक-शस्य कमलधरे
लंका पदतल शतदल गर्जिर्तोर्मि सागर-जल
धोता शुचि-चरण युगल स्तव कर बहु अर्थ भरे
तरु-तृण-वण-लता वसन , अंचल में खचित सुमन
गंगा ज्योतिर्जल-कण , धवल -धार हार गले
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार, प्राण प्रणव ओंकार
ध्वनित दिशायें उदार , शतमुख-शतरव मुखरे
शमशेर की एक कविता उनके लिए--

भूलकर जब राह – जब – जब राह.. भटका मैं
तुम्हीं झलके, हे महाकवि,
सघन तम की आँख बन मेरे लिए,
अकल क्रोधित प्रकृति का विश्वास बन मेरे लिए-
जगत के उन्माद का
परिचय लिए,-
और आगत-प्राण का संचय लिए, झलके प्रमन तुम,
हे महाकवि ! सहजतम लघु एक जीवन में
अखिल का परिणय लिए-
प्राणमय संचार करते शक्ति औ छबि के मिलन का हास मंगलमय;
मधुर आठों याम
विसुध खुलते
कंठस्वर में तुम्हारे, कवि,
एक ऋतुओं के विहंसते सूर्य !
काल में (तम घोर)-
बरसाते प्रवाहित रस अथोर अथाह !
छू, किया करते
आधुनिकतम दाह मानव का
साधना स्वर से
शांत-शीतलतम.

हाँ, तुम्हीं हो, एक मेरे कवि;
जानता क्या में –
हृदय में भरकर तुम्हारी साँस
किस तरह गाता
(ओ विभूति परम्परा की !)
समझ भी पाता तुम्हें यदि मैं कि जितना चाहता हूँ,
महाकवि मेरे
भूलकर जब राह – जब – जब राह.. भटका मैं
तुम्हीं झलके, हे महाकवि,
सघन तम की आँख बन मेरे लिए,
वह आता
दो टूक कलेजे को करता
पछताता पथ पर जाता
मुट्ठी भर दाने को
भूख मिटाने को
मुँह फटी-पुरानी झोली का फैलाता
वह आता...

Friday, January 27, 2012

संसद तेली का वह घानी है जिसमें आधा तेल है आधा पानी है

मुझसे कहा गया कि सँसद देश को प्रतिम्बित करने वाला दर्पण है
जनता को जनता के विचारों का नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है
या यह सच है कि
अपने यहाँ संसद तेली का वह घानी है
जिसमें आधा तेल है आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है तो
यहाँ एक ईमानदार आदमी को अपने ईमानदारी का मलाल क्यों है
जिसने सत्य कह दिया है उसका बूरा हाल क्यों है ॥

-धूमिल

काग़ज़ की कश्तियाँ भी बड़ी काम आएँगी
जिस दिन हमारे शहर में सैलाब आयेगा
-शहरयार

ड़ा प्रकाश कान्त की पोटली से "शहर की आख़िरी चिड़िया" और "टोकनी भर दुनिया"

आज शाम को एकांत श्रीवास्तव के कार्यक्रम के बहाने से पूरी देवासी चौकड़ी मिली इसी देवास शहर में घूमते-घामते कुछ काम किये और फ़िर ड़ा प्रकाश कान्त के घर जा पहुंचे ढली शाम और कुडकुडाती हुई ठण्ड में .......ताई के हाथो की चाय पीने, ढेर सारा नमकीन खाना जैसे पुराने कई जन्मो का कर्ज हो और ड़ा कान्त यानी हमारे अन्ना से ढेर सारी गपशप.....मेरी और मनीष वैद्य की तो खिचाई हो ही जाती है, जब जाते है तब क्योकि हम दोनों नालायक लिखते पढते नहीं है और हमारे पास राजेन्द्र यादव से ज्यादा ना लिखने के कारण है..........अब क्या कहे अन्ना शब्द जैसे तारे हो गए और जमीन पे आते ही नहीं.......कोई आमीर ही हमें जमीन पे खींच ला सकता है ...खैर आज तो हिट हो गयी किसी बहाने से मैंने और बहादुर ने जबरजस्ती की और अन्ना की पोटली से दो किताबे निकलवा ली....."शहर की आख़िरी चिड़िया" और हाल ही में नयीकिताब से प्रकाशित किताब "टोकनी भर दुनिया" और आज किस्मत ही थी इस भले आदमी ने हमें अपने हस्ताक्षर करके किताबे दी और तस्वीर भी खिचवाई है अपने साथ.....अमेय शायद यहाँ डाल दे उपकृत रहूंगा. ड़ा प्रकाश कान्त हिन्दी कहानी और साहित्य में एक बड़ा नाम है और उनका घर हम जैसे लोगो के लिए एक स्वर्ग ही है जहां किताबों का संसार है. सफदर की कविता शायद ऐसे ही किसी माहौल को देखकर जन्मी होगी....हाँ अखबार किताबे और पत्रिकाएं इतने संवरे रूप में तो अपने प्रेस में भी ना रहती होंगी यहाँ आकर वो इठला जाती है करीने से सजी किताबें और ऊपर से साहित्य का सच्चा प्रकांड पुजारी....जब जाओ कभी शिकन नहीं और हर बार एक नई ऊर्जा और प्रेरणा लेकर लौटता मै ....पर अभी भी नालायक तो हूँ ही क्योकि प्रिंट मीडिया में काम नहीं है ना मेरा और अन्ना, बहादुर सब इसी से नाराज है....पर करूँगा ऐसा करूँगा कि सब देखते रह जायेंगे.............बस थोड़ी सी मोहलत और............एक जतन और अभी, एक जतन और...................................

किरदारों ने असर पैदा कर दिया! अदभुत है अग्निपथ!


27 January 2012 One Comment
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♦ संदीप नाइक

ग्निपथ करण जौहर की एक बढ़िया फिल्म है। न सिर्फ उन्होंने अपने पिता को एक बेहतरीन तोहफा दिया बल्कि कसा हुआ निर्देशन, प्रभावी डायलाग, फिल्मांकन, दृश्य और सबसे बढ़िया कलाकारों का चयन और उनसे पूरा काम लेने की अदभुत कला करण के पास ही हो सकती थी।

यह फिल्म सिर्फ फिल्म नहीं, बल्कि एक विचित्र समय में मानक, उपमाओं और बिंबों को बाइस्कोप के जरिये देखने का मौका है। जहां ऋषि कपूर अपने जीवन के श्रेष्ठ रोल में है, वहीं इस वर्ष के सारे खलनायको के पुरस्कार संजय दत्त ले जाएंगे। प्रियंका चोपडा को स्पेस नहीं मिला, इसलिए वो अपने जौहर नहीं दिखा पायी, पर ओमपुरी, हृतिक, जरीना वहाब और बाकी किरदारों ने गजब ढा दिया है।

हृतिक की बहन बनी छोटी सी लडकी ने “मिली” फिल्म की जया भादुड़ी की याद दिला दी – वही निश्चलता, भोली सी आंखें और सहजपन। सूर्या के रूप में पंकज त्रिपाठी का अभिनय बहुत प्रभावी बन पड़ा है। जहां वे कांचा के सहायक के रूप में सशक्त भूमिका अदा करते हैं, वही वे दर्शकों पर स्थायी रूप से अपने किरदार की छाप भी छोड़ते हैं। उनके हकलाने के संवाद उन्हें एक जीवंत चरित्र के रूप में हमेशा याद रखेंगे।

गीत संगीत और कैमरे के अदभुत संयोजन से यह फिल्म आज के दिन दो अजीज मित्रों के साथ देखना बहुत ही सुखद अनुभव है। करण जौहर निश्चित ही बधाई के पात्र हैं, बस विजय दीनानाथ चौहान के रूप में अमिताभ की कोई बराबरी नहीं और डैनी का रोल भी उस अग्निपथ में अप्रतिम था ही…

…पर यह आज की अग्निपथ है, जहां मेरे अपने अनुज देवास के चेतन पंडित को प्रकाश झा के फ्रेम से बाहर आते देखकर और दमदार अभिनय करते देखना वास्तव में एक अलौकिक अनुभव है। बधाई चेतन, तुम छा गये भाई।

हां, कटरीना ने अपने लटकों झटकों में जरूर नयापन लाकर दिखाया। वो वाकई चिकनी चमेली का रोल निभाने में सफल रही हैं। बहुत हॉट और पूरे शरीर का प्रदर्शन कर कटरीना ने दिखा दिया कि अभिनय के साथ उसमें आइटम गर्ल का रोल निभाना और बॉक्स ऑफिस पर तालियां बटोरना आता है। चिकनी चमेली से अन्य तीन गीत बेहतर हैं और फिर मुंबई के गणेश विसर्जन का दृश्यांकन भी करण की प्रतिभा है…

(संदीप नाइक। मानवाधिकार कार्यकर्ता। कवि। कथाकार। मालवा की मिट्टी पर पैदा हुए, पले-बढ़े। लगभग तमाम कला विधाओं में थोड़ा-थोड़ा वक्‍त गुजारा। भोपाल में रहते हैं और अक्‍सर अपने गृह नगर देवास आते-जाते रहते हैं। उनसे naiksandi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)


उस टेलर की तलाश आज भी है, जिसने कांचा के कपड़े सिले थे

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♦ रवीश कुमार

भोर होने में कुछ घंटे बाक़ी रहे होंगे। दरवाजे की सांकल को चुपचाप लगाकर निकल गया था। गांधी मैदान की तरफ पैदल ही। फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने का जुनून टीवी और मल्टीप्लेक्स के आने के पहले सिनेमा संस्कृति का हिस्सा रहा है। टिकट खिड़की पर कतार में खड़ी भीड़ के कंधे के ऊपर से चलते हुए काउंटर तक पहुंच जाने वाले भले ही लफंगे कहे जाएं, मगर उनका यह करतब मुझे सचिन तेंदुलकर के छक्के जैसा अचंभित कर देता था। पर्दे तक पहुंचने के पहले ऐसे हीरो से मुलाकात न हो, तो सिनेमा देखने का मजा नहीं मिलता।

तय हुआ कि पहले दिन और पहले ही शो में देखेंगे वर्ना अग्निपथ नहीं देखेंगे। पैसा दोस्तों का था और पसीना मेरा बहने वाला था। जल्दी पहुंचने से काउंटर के करीब तो आ गया, मगर काउंटर के उस्तादों के आते ही मुझे धकेल कर कोई अस्सी नब्बे लोगों के बाद पहुंचा दिया गया। लाइन लहरों की तरह डोल रही थी। टूट रही थी। बन रही थी। लाइन बहुत दूर आ गयी थी। लोग धक्का देते और कुछ लोग निकल जाते। नये लोग जुड़ जाते। यह क्रम चल रहा था। तभी पुलिस की पार्टी आयी और लाठी भांजने लगी। तीन-चार लाठी तबीयत से जब पैरों और चूतड़ पर तर हुई, तो दिमाग गनगना गया। तब तो गोलियां खाते हुए अग्निपथ अग्निपथ बोलते हुए प्रोमो भी नसीब नहीं था वर्ना वही याद कर बच्चन मुद्रा में खुद के इस त्याग को महिमामंडित करते हुए लाइन में बने रहते।




खैर… चप्पल ने पांव का साथ छोड़ दिया। हम नीचे से नंगे हो चुके थे। टिकट लेने के बाद होश ठीक से उड़ा कि इस हालत में घर गया, तो वहां भी लाठी तय थी। किसी ने चप्पल का इंतजाम किया और पहले शो की तैयारी से हम फिर सिनेमा हाल के करीब पहुंच गये। मोना या रिजेंट में लगी थी अग्निपथ।


यह वही साल था, जब मुझे दिल्ली शहर के बारे में भारत की राजधानी से ज्यादा कुछ पता नहीं था। अग्निपथ देख चुके थे और अब बंद हो चुकी इलेवन अप से, जिसे दिल्ली एक्सप्रेस कहा जाता था, दिल्ली के लिए रवाना हो चुके थे। इन दोनों के बीच कुछ हफ्तों या महीनों का अंतराल जरूर रहा होगा।

[लिखते वक्त स्मृतियां ऐसे ही घालमेल हो जाती हैं...]

मगर विजय दीनानाथ चौहान, बाप का नाम मास्टर दीना नाथ चौहान… ऐसे संवाद दून स्कूल से पास होकर स्टीफंस पहुंचने वाले नौजवानों को लुभाते होंगे, मगर वो इसे जी नहीं पाते होंगे। इस बात का सुकून तो था ही कि अग्निपथ देख चुके थे। उस टेलर की तलाश आज तक करता हूं, जिसने कांचा के इतने अच्छे कपड़े सिले थे। अपने बाप के हत्यारे कांचा को मारने का जुनून लिये विजय दीनानाथ चौहान भी तो हत्यारे के दर्जी को ढूंढ रहा था। खैर…

इसीलिए कहता हूं कि अग्निपथ एक ऐसी फिल्म है, जिसमें मैं भी हूं। मुकुल एस आनंद की अग्निपथ में भी मैं था और करण जौहर द्वारा निर्मित और करण मल्होत्रा द्वारा निर्देशित अग्निपथ में भी मेरा रोल बचा रहा। दो फिल्मों के बीच का यह दर्शक दो दशकों की जिंदगी जी चुका है।

गाजियाबाद के स्टार एक्स सिनेमा हाल में पहुंचने से पहले बदनाम हिंदी चैनलों की बारात का वो बाराती बन चुका था, जिसे कुछ लोग शरीफ समझते हैं। नाचना भले न आये मगर नगीनिया डांस की तड़प हमेशा रही है। अमर उजाला के एक पत्रकार से बाहर मुलाकात हुई। मैंने उनको यह कह कर रवाना कर दिया कि मैं अकेले रहना पसंद करता हूं। वो निराश हो कर चले गये कि सर कहने पर झड़प देने वाला यह मशहूर पत्रकार बदतमीज भी है। उन्हें नहीं मालूम था कि यह पत्रकार खुद अपनी प्रेरणाओं को नहीं समझ पाया इसलिए दूसरे जब इसे प्रेरणा बनाते हैं, तो चिढ़ जाता है।

बीस रुपये का पान बनवाया। तीन सौ रुपये के दस ग्राम वाले किमाम का एक छोटा सा हिस्सा पान के पत्ते पर घिसवा कर दबाया और स्टार एक्स सिनेमा के भीतर। कुछ लोग पहचान रहे थे। कुछ हैरान कि भर मुंह पान दबाये ये फटीचर है या एंकर है। हॉल में पहुंचा तो दो बजे के शो के लिए, लेकिन हाथ में टिकट था एक बजे के शो का। सिनेमा हाल का मैनेजर दिलफेंक सिनेमची समझता है, इसलिए उसने एक मेहरबानी की। सलाम किया और उसी नंबर के टिकट पर दो बजे के हाल में सीट दिला गया। अब शुरू होने वाला था अग्निपथ। इस बार प्रोमो तो बने थे पर टीवी नहीं देखने के कारण एक भी नहीं देख पाया। लाठी नहीं चली और दोस्त नहीं थे। तब दर्जन भर थे, अब अकेला। लेकिन फेसबुक और ट्वीटर के अपने मानस मित्रों की फौज को बताने की बेताबी जरूर थी। ढैन ढैन ढैन… अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

एक सुपुरुष घोती कुर्ताधारी मास्टरनुमा हंसमुख कवि। देखते ही पिता की याद आ गयी। धोती-कुर्ता में वो भी काफी जंचते थे। आंखें थोड़ी देर के लिए नम तो हुईं, मगर मास्टर दीनानाथ चौहान के चेहरे पर अभिनय की कशिश उतरते देखी, तो लगा कि मामला जंचेगा। कैमरा कमाल तरीके से काम कर रहा था। मांडवा। बच्चन की जुबान पर जब मांडवा उच्चरित होता था, तो लगता था कि भारत छोड़ो, मांडवा में ही बसो। अपने गांव के बाद मांडवा का ही नाम लेने में मजा आता था। लगता था काश मांडवा में पैदा हुए होते। करण मल्होत्रा ने मांडवा को तो रखा मगर उसे पहचान की पटरी से उतार दिया। वो सिर्फ मुंबई के नक्शे के बाहर का गांव है, जहां पुलिस मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के डर से नहीं पहुच पाती। खुद भी नहीं जाती और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी जाने के लिए नहीं कहती कि जाकर देखो मांडवा में क्या हो रहा है। खैर…

हिंदी सिनेमा को सिनेमा की तरह नहीं देखना चाहते, तो दुनिया में बहुत अच्छे विश्वविद्यालय हैं जहां आप जाकर गंभीर पढ़ाई कर सकते हैं।

जल्दी समझ में आने लगा कि संजय दत्त ने फिल्म को लूट लिया है। फिर लगा कि कुछ माल ऋषि कपूर भी लूट रहे हैं। खलनायक में जोकर लगने वाले संजय दत्त इस अग्निपथ में वाकई खलनायक लगे हैं। बीस सालों में हमारे पर्दे का खलनायक हीरो की तरह कमनीय हो चला था। अमरीश पुरी की भयावह खलनायकी के बाद संजय दत्त ने उस क्रूरता को उभारा है। वांडेट का खलनायक नहीं भूलिएगा। खैर। मास्टर के मारने का दृश्य कमाल का है। समंदर के किनारे की हत्यारी शामें शायद ऐसी ही होती होंगी। बारिश और नीली काली लाइटिंग के बीच मशाल की पीली रोशनी उस क्रूरता को खूबसूरती से रचती है, जिसे लेकर फिल्म आगे चलने वाली थी। मांडवा से मुंबई आते ही रऊफ लाला का किरदार। मक्कारी से लबरेज ऋषि कपूर ने मकबूल के पंकज कपूर के अभिनय के करीब खुद को ला खड़ा कर दिया। आज के जमाने में जब कसाई भी सूट पैंट वाले हो गये हैं और विधायकी का चुनाव लड़कर पसमांदा मुस्लिम के हकों की लड़ाई में शामिल हैं, गनीमत है कि मुस्लिम पात्र का यह चित्रण सांप्रदायिक दौर की मुंबई की पैदाइश नहीं लगता। कहानी कमजोर होती हुई अपने किरदारों से मजबूत होने लगती है। विजय दीनानाथ चौहान बड़ा हो जाता है। पंद्रह साल गुजरने का एलान होता है। माधवी बनी नर्स की जगह प्रियंका चोपड़ा ब्यूटी पार्लर वाली काली के रूप में जगह ले चुकी होती है।

पहली अग्निपथ में अमिताभ बच्चन का नायकत्व छाया रहता है। वो अपने परिचय वाले संवाद को दोहराते-दोहराते थकाते भी रहे और पकाते भी रहे। करण मल्होत्रा की अग्निपथ में विजय दीनानाथ आधी से ज्यादा फिल्म में बीजू बन कर ही रहता है। वो मौत के साथ अपीटमेंट जैसी कामचलाऊ इंग्लिश की कोशिश नहीं करता। औरतों से भरे मोहल्ले में रहता है। औरतें उसकी ढाल हैं। मुकुल आनंद की फिल्म में कृष्णन अय्यर बाडीगार्ड था। करण मल्होत्रा की फिल्म में सीढ़ियों, बालकनियों और बरामदे में नजर आने वाली असंख्य औरते बीजू की बाडीगार्ड हैं। रोहिणी हट्टंगड़ी और विजय के बीच गहरा रिश्ता बना रहता है। यहां जरीना वहाब पूरी फिल्म में टेंपोरेरी यानी अस्थायी मां लगती है। इन्हीं सब बिंदुओं पर फिल्म टूटती है। मगर शानदार बने रहने का रास्ता नहीं छो़ड़ती।

नयी अग्निपथ में हृतिक रौशन मांडवा पहुंचने से पहले तक मोहल्ले का बागी से ज्यादा नहीं लगता। उसके गुस्से की थरथराहट कंपकंपाहट पैदा करती है, लेकिन जब वो कमिश्नर के घर पहुंच कर जान बचाने की बात करता है, तो डॉन की जगह मुखबिर नजर आने लगता है। मुकुल आनंद की फिल्म में कमिश्नर और विजय दीनानाथ के बीच का रिश्ता गजब का था। इस फिल्म में पड़ोसी का लगता है। इसीलिए हृतिक नायकत्व की उस ऊंचाई को नहीं छू पाते, जिसे बच्चन ने छुआ। पहली अग्निपथ में बच्चन नायक थे, मगर इस अग्निपथ में फिल्म नायक है। उस फिल्म में वृत्तांत बच्चन तय करते हैं, इस फिल्म में वृत्तांत यानी नैरेटिव निर्देशक अपने पात्रों के जरिये तय करता है। पहली फिल्म में विजय दीनानाथ बनने से पहले अमिताभ एंग्री यंग मैन की छवि को कई दशक जी चुके होते हैं। इस फिल्म में विजय बनने से पहले तक हृतिक चौकलेटी हीरो की छवि की तलाश में मुख्य से लेकर सहयोगी किरदार में भटकते रहे हैं। मगर आखिरी सीन में मांडवा पहुंचने के बाद हृतिक का अभिनय उन्हें एक नयी ऊंचाई पर ले जाता है।

मैं कागज के फूल का रिव्यू नहीं लिख रहा, उस फिल्म का लिख रहा हूं जो चलती भी है और बनती भी है।

इस फिल्म में गाने यादगार नहीं हैं। चिकनी चमेली टपकी हुई लगती है। दोस्त होते नहीं सब हाथ मिलाने वाले… इस कव्वाली के सेट पर जब कांचा और विजय दीनानाथ मिलते हैं, तो गजब का समां बंधता है। डैनी का जोरदार अभिनय और बच्चन का स्टारडम एक किस्म की बराबरी का टक्कर पैदा करता है। वो हेलिकाप्टर से मांडवा में लैंड करता है। यहां नाव से हृतिक बाबू जाते हैं। शॉट्स काफी अच्छे हैं। क्लोज अप शानदार हैं। कांचा भयावह है। गीता का पुनर्पाठ कर रहा है। उम्मीद है कि कोई गीता के इस पुनर्पाठ को लेकर रूस की अदालत नहीं जाएगा। खैर…

कांचा जब मांडवा में बैठ कर न्यूज चैनलों के जरिये लाइव रिपोर्ट देख सकता है, तो फिल्म में सिक्के डालने वाले पब्लिक फोन रखने का क्या मतलब था, समझा नहीं।

लेकिन गानों, हांडी फोड़ने के दृश्य विहंगम तरीके से रचे गये हैं। कव्वाली को बेजो़ड़ फिल्माया गया है। रऊफ लाला के बेटे को मारने का प्लाट शानदार है। और बीजू की बहन की नीलामी का दृश्य छाती तोड़ देने वाला। यह वही सीन है, जब हृतिक पूरे तरीके से हीरो की तरह उभर कर फिल्म पर कब्जा करते हैं। ठीक इसके बाद चौपाटी पर सूर्या को मारने का सीन शानदार है। यही वो सीन है, जहां बीजू पहली बार अपना और अपने बाप के नाम वाला पूरा संवाद बोलता है। विजय दीनानाथ चौहान। बाप का नाम मास्टर दीनानाथ चौहान।

करण मल्होत्रा ने पुरानी फिल्म से यह सबक सीख लिया था। इसीलिए इस संवाद के लिए वो दर्शकों को इंतजार करवाते हैं। कुछ संवाद तो बेहतरीन लिखे गये हैं। प्रबुद्ध खिलाड़ी। हा हा। मजा आ गया। कांचा का कहना कि अब भी माया मोह बाकी है। यह संवाद मांडवा की लड़ाई को फिल्मी कुरुक्षेत्र में बदल देता है। बिना माया मोह को त्यागे कोई खलनायक नहीं बन सकता। कोई नायक भी नहीं बन सकता। जब इसी झमेले से हृतिक निकलते हैं, तो आखिरी सीन में उनका स्टंट छाप अभिनय बेजोड़ हो जाता है। संजय दत्त मोटे थुलथुल बचे खुचे खलनायक की तरह पेड़ पर लटका दिये जाते हैं। शायद यह निर्देशक की योजना होगी कि नायक को शुरू से नायक बनाकर नहीं रखना है। उसे बाद में स्थापित करना है।

इस फिल्म की रौशनी, संगीत, कविता के पाठ और पुनर्पाठ के दृश्य बेहतरीन हैं। मांडवा को उड़ाने का दृश्य हो या गणपति के विसर्जन या फिर हांडी फोड़ने का। रंगों को लेकर निर्देशक का फन नजर आता है। गाना ही इसकी कमजोरी है। किसको था खबर, किसको था पता, वी आर मेड फार इच अदर … दोस्त होते नहीं सब हाथ मिलाने वाले … चिकनी चमेली दारू के ठेके पर आबाद तो हो जाएगी, मगर अग्निपथ की आत्मा नहीं कहलाएगी।

फिल्म की समीक्षा नहीं की है मैंने। मुझे यह फिल्म शानदार लगी। एक ऐसे वक्त में जब सिनेमा हाल खाली हों और बोरियत भरी सर्दी अपना रजाई समेट रही हो, यह फिल्म कमा ले जाएगी। बस एक कमी को पूरी कर देती, तो कमाल हो जाता। जज्बातों को झकझोरने वाले संवादों और दृश्यों की कमी रह गयी। भावुकता से भरपूर सिनेमा न भी हो, तो चलेगा मगर भावुकता ही न हो, यह नहीं हो सकता। हम हिंदी सिनेमा देख रहे हैं। कुरोसावा की फिल्म नहीं, जिनकी एक भी फिल्म मैंने नहीं देखी है। प्रियंका चोपड़ा ने काफी अच्छा अभिनय किया है, मगर उसकी कोई कहानी नहीं है। कंबल फेंक कर गोली मारने के दृश्य में मारी जाती है। ऐसे दृश्य कई फिल्मों में आ चुके हैं। आप देखिएगा कि कैसे यह फिल्म अपनी ही पुरानी कथा का शानदार पुनर्पाठ करती है। बहुत चीजें बदल देती हैं। बहुत चीजें जोड़ देती है और एक अवसर बना जाती है कि एक तीसरी अग्निपथ जरूर बनेगी। उम्मीद है मेरे बिना नहीं बनेगी। अग्निपथ… अग्निपथ… अग्निपथ।

ravish kumar(रवीश कुमार। टीवी का एक सजग चेहरा। एनडीटीवी इंडिया के कार्यकारी संपादक। नामी ब्‍लॉगर। कस्‍बा नाम से मशहूर ब्‍लॉग। दैनिक हिंदुस्‍तान में ब्‍लॉगिंग पर एक साप्‍ताहिक कॉलम लिखते थे, अब नहीं लिखते हैं। इतिहास के छात्र रहे। कविताएं और कहानियां भी लिखते हैं। उनसे ravish@ndtv.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Thursday, January 26, 2012

अगर वाकई कुछ करना है, तो डिग्रियों को फेंक दीजिए!- ♦ बंकर रॉय


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बंकर रॉय

लिए आपको एक दूसरी ही दुनिया में ले चलूं। और आपको सुनाऊं एक 45 साल पुरानी प्रेम-कथा। गरीब लोगों से प्रेम की कथा, जो कि प्रतिदिन एक डॉलर से भी कम कमाते हैं। मैं एक बेहद संभ्रांत, खडूस, महंगे कॉलेज में पढ़ा, भारत में, और उसने मुझे लगभग पूरी तरह बरबाद कर ही दिया था। सब फिक्स था – मैं डिप्लोमेट, शिक्षक या डॉक्टर बनता – सब जैसे प्लेट में परोसा पड़ा था। साथ ही, मुझे देख कर ऐसा नहीं लगेगा कि मैं स्क्वैश के खेल में भारत का राष्ट्रीय चैंपियन था, तीन साल तक लगातार।

(हंसी)

सारी दुनिया के अवसर मेरे सामने थे। सब जैसे मेरे कदमों में पड़ा हो। मैं कुछ गड़बड़ कर ही नहीं सकता था। और तब, यूं ही, जिज्ञासावश मैंने सोचा कि मैं गांव जाकर रहूं और काम करूं – बस समझने के लिए कि गांव कैसा होता है।

1965 में, मैं बिहार गया। वहां अब तक का सबसे भीषण अकाल पड़ा था। मैंने भूख और मौत का नंगा नाच देखा। पहली बार ठीक मेरे सामने लोग भूख से मर रहे थे। उस अनुभव ने मेरा जीवन बदल डाला। मैं वापस आया और मैंने अपनी मां से कहा, “मैं एक गांव में रहना और काम करना चाहता हूं।” मां कोमा में चली गयी।

(हंसी)

“ये क्या कह रहा है? सारी दुनिया के अवसर तेरे सामने हैं, और भरी थाली में लात मार कर तू एक गांव में रहना और काम करना चाहता है? मुझे समझ नहीं आ रहा है कि आखिर तुझे हुआ क्या है?”

मैंने कहा, “नहीं, मुझे सर्वश्रेष्ठ शिक्षा मिली है। उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है। और मैं कुछ वापस देना चाहता हूं, अपने ही तरीके से।”

“पर तू आखिर एक गांव में करेगा क्या? न रोजगार है, न पैसा है, न सुरक्षा, न ही कोई भविष्य।”

मैंने कहा, “मै गांव में रह कर पांच साल तक कुआं खोदना चाहता हूं।”

“पांच साल तक कुआं खोदेगा? तू भारत के सबसे महंगे स्कूल और कॉलेज में पढ़ा है, और अब पांच साल तक कुआं खोदना चाहता है?” उन्होंने मुझसे बहुत लंबे समय तक बात तक नहीं की, क्योंकि उन्हें लगा कि मैंने अपने खानदान की नाक कटवा दी है।

लेकिन इसके साथ ही, मुझे सीखने को मिला दुनिया का सबसे बेहतरीन ज्ञान और कौशल, जो बहुत गरीब लोगों के पास होता है, मगर कभी भी हमारे सामने नहीं लाये जाते – जो परिचय और सम्मान तक को मोहताज रहते हैं, और जिन्हें कभी बड़े रूप में इस्तेमाल ही नहीं किया जाता। और मैंने सोचा कि मैं बेयरफुट कॉलेज की शुरुआत करुंगा। एक कॉलेज केवल गरीबों के लिए।

गरीब लोग क्या सोचते हैं, ये मुख्य मसला था। यही इस कॉलेज की नींव भी थी। इस गांव में यह मेरा पहला दिन था।

बड़े-बूढ़े मेरे पास आये और पूछा, “क्या पुलिस से भाग कर छुपे हो?”

मैंने कहा, “नहीं।”

(हंसी)

“परीक्षा में फेल हो गये हो?”

मैंने कहा, “नहीं।”

“तो सरकारी नौकरी नहीं मिल पायी होगी?”

मैंने कहा, “वो भी नहीं।”

“तब यहां क्या कर रहे हो? यहां क्यों आये हो? भारत की शिक्षा व्यवस्था तो आपको पेरिस और नयी-दिल्ली और जुरिख के ख्वाब दिखाती है; तुम इस गांव में क्या कर रहे हो? तुम कुछ तो जरूर छिपा रहे हो हमसे?”

मैंने कहा, “नहीं, मैं तो एक कॉलेज खोलने आया हूं, केवल गरीबों के लिए। गरीब लोगों को जो जरूरी लगता है, वही इस कॉलेज में होगा।”

तो बुजुर्गों ने मुझे बहुत नेक और सार्थक सलाह दी। उन्होंने कहा, “कृपा करके, किसी भी डिग्री-होल्डर या मान्यता-प्राप्त प्रशिक्षित व्यक्ति को अपने कॉलेज में मत लाना।”

लिहाजा, ये भारत का इकलौता कॉलेज है, जहां यदि आप पीएचडी या मास्टर हैं, तो आपको नाकारा माना जाएगा। आपको या तो पढ़ाई-छोड़, या भगोड़ा या निलंबित होना होगा … हमारे कॉलेज में आने के लिए। आपको अपने हाथों से काम करना होगा। आपको मेहनत की इज्जत सीखनी होगी। आपको ये दिखाना होगा कि आपके पास ऐसा हुनर है, जिससे लोगों का भला हो सकता है और आप समाज को कोई सेवा प्रदान कर सकते हैं।

तो हमने बेयरफुट कॉलेज की स्थापना की, और हमने पेशेवर होने की नयी परिभाषा गढ़ी।

आखिर पेशेवर किसको कहा जाए? एक पेशेवर व्यक्ति वो है, जिसके पास हुनर हो, आत्म-विश्वास हो और भरोसा हो। जमीन के भीतर पानी का पता लगाने वाला पेशेवर है। एक पारंपरिक दाई एक पेशेवर है। एक कढ़ाई गढ़ने वाला पेशेवर है। सारी दुनिया में ऐसे पेशेवर भरे पड़े हैं। ये आपको दुनिया के किसी भी दूर-दराज गांव में मिल जाएंगे। और हमें लगा कि इन लोगों को मुख्यधारा में आना चाहिए और दिखाना चाहिए कि इनका ज्ञान और इनकी दक्षता विश्व-स्तर की है। इसका इस्तेमाल किया जाना जरूरी है और इसे बाहरी दुनिया के सामने लाना जरूरी है – कि ये ज्ञान और कारीगरी आज भी काम की है।

कॉलेज में महात्मा गांधी की जीवन-शैली और काम के तरीके का पालन होता है। आप जमीन पर खाते हैं, जमीन पर सोते हैं, जमीन पर ही चलते हैं। कोई समझौता, लिखित दस्तावेज नहीं है। आप मेरे साथ 20 साल रह सकते हैं और कल जा भी सकते हैं। और किसी को भी 100 डॉलर महीने से ज्यादा नहीं मिलता है। यदि आप पैसा चाहते हैं, आप बेयरफुट कॉलेज मत आइए। आप काम और चुनौती के लिए आना चाहते हैं, आप बेयरफुट आ सकते हैं। यहां हम चाहते हैं कि आप आएं और अपने आइडिया पर काम करें। चाहे जो भी आपका आइडिया हो, आ कर उस पर काम कीजिए। कोई फर्क नहीं पड़ता, यदि आप फेल हो गये तो। गिर कर, चोट खा कर, आप फिर शुरुआत कीजिए। ये शायद अकेला ऐसा कॉलेज हैं, जहां गुरु शिष्य है और शिष्य गुरु है। और अकेला ऐसा कॉलेज जहां हम सर्टिफिकेट नहीं देते हैं। जिस समुदाय की आप सेवा करते हैं, वो ही आपको मान्यता देता है। आपको दीवार पर कागज का टुकड़ा लटकाने की जरूरत नहीं है, ये दिखाने के लिए कि आप इंजीनियर हैं।

तो जब मैंने ये सब कहा, तो उन्होंने पूछा, “ठीक है, बताओ क्या संभव है। तुम क्या कर रहे हो? ये सिर्फ बतकही है, जब तक तुम कुछ कर के नहीं दिखाते।”

तो हमने पहला बेयरफुट कॉलेज बनाया, सन 1986 में। इसे 12 बेयरफुट आर्किटेक्टों ने बनाया था, जो कि अनपढ़ थे, 1.5 डॉलर प्रति वर्ग फुट की कीमत में। 150 लोग यहां रहते थे, और काम करते थे।

उन्हें 2002 में आर्किटेक्चर का आगा खान पुरस्कार मिला। पर उन्हें लगता था, कि इस के पीछे किसी मान्यता प्राप्त आर्किटेक्ट का हाथ जरूर होगा।

मैंने कहा, “हां, उन्होंने नक्शे बनाये थे, मगर बेयरफुट आर्किटेक्टों ने असल में कॉलेज का निर्माण किया।” शायद हम ही ऐसे लोग होंगे, जिन्होंने 50,000 डॉलर का पुरस्कार लौटा दिया, क्योंकि उन्हें हम पर विश्वास नहीं हुआ, और हमें लगा जैसे वो लोग कलंक लगा रहे हैं, तिलोनिया के बेयरफुट आर्किटेक्टों के नाम पर।

मैंने एक जंगल-अफसर से पूछा – मान्यताप्राप्त, पढ़े-लिखे अफसर से – मैंने कहा, “इस जगह पर क्या बनाया जा सकता है?”

उसने मिट्टी पर एक नजर डाली और कहा, “यहां कुछ नहीं हो सकता। जगह इस लायक नहीं है। न पानी है, मिट्टी पथरीली है।”

मैं कठिन परिस्थिति में था। और मैंने कहा, “ठीक है, मैं गांव के बूढ़े के पास जा कर पूछूंगा कि “यहां क्या उगाना चाहिए?”

उसने मेरी ओर देखा और कहा, “तुम ये बनाओ, वो बनाओ, ये लगाओ, और काम हो जाएगा।”

और वो जगह आज ऐसी दिखती है।

मैं छत पर गया और सारी औरतों ने कहा, “यहां से जाओ। आदमी नहीं चाहिए क्योंकि हम इस तरकीब को आदमियों को नहीं बताना चाहते। ये छत को वाटरप्रूफ करने की तकनीक है।”

(हंसी)

इसमें थोड़ा गुड़ है, थोड़ी पेशाब है और ऐसी कई चीजें जो मुझे नहीं पता है। लेकिन इसमें पानी नहीं चूता है। 1986 से आज तक, पानी नहीं चुआ है। इस तकनीक को, औरतें मर्दों को नहीं बताती हैं।

(हंसी)

ये अकेला ऐसा कॉलेज है, जो पूरी तरह सौर-ऊर्जा पर चलता है। सूरज से ही सारी बिजली आती है। छत पर 45 किलोवाट के पैनल लगे हैं। और सब कुछ अगले 25 सालों तक सिर्फ सौर-ऊर्जा से चल सकता है। तो जब तक दुनिया में सूरज है, हमें बिजली की कोई समस्या नहीं होगी। मगर सबसे बढ़िया बात ये है कि इसे स्थापित किया था एक पुजारी ने, एक हिंदू पुजारी ने, जिसने सिर्फ आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी – कभी स्कूल नहीं गया, कभी कॉलेज नहीं गया। इन्हें सौर-तकनीकों के बारे में ज्यादा जानकारी है विश्व के किसी भी और व्यक्ति के मुकाबले, ये मेरी गारंटी है।

भोजन, यदि आप बेयरफुट कॉलेज में आएंगे, आपको सौर-ऊर्जा से बना मिलेगा। मगर जिन लोगों ने उस सौर-चूल्हे को बनाया है, वो स्त्रियां हैं, अनपढ़ स्त्रियां, जो अपने हाथ से अत्यंत जटिल सौर-चूल्हा बनाती हैं। ये परवलय (पैराबोला) आकारा का बिना रसोइये का चूल्हा है। दुर्भाग्य से, ये आधी जरमन हैं, वो इतनी सूक्ष्मता से नाप-जोख करती हैं।

(हंसी)

आपको भारतीय महिलाएं इतनी सूक्ष्म नाप-तोल करती नहीं मिलेंगी। बिलकुल आखिरी इंच तक, वो उस चूल्हे को बना सकती हैं और यहां साठ व्यक्ति दिन में दो बार सौर-चूल्हे का खाना खाते हैं।

हमारे यहां एक दंत-चिकित्सक हैं। वो दादी-मां है, अनपढ़ है और दांतों की डाक्टर हैं। वो दांतों की देखभाल करती हैं करीब 7000 बच्चों के।

बेयरफुट टेक्नॉलाजी

ये 1986 है। किसी इंजीनियर, या आर्किटेक्ट ने इस बारे में नहीं सोचा। मगर हम बारिश के पानी को छत से इकट्ठा कर रहे थे। बहुत ही कम पानी बर्बाद होता है। सारी छतों को जमीन के नीचे बने 400,000 लीटर के टैंक से जोड़ा हुआ है। और पानी बर्बाद नहीं होता। यदि हमें चार साल लगातार भी सूखे का सामना करना पड़े, तो भी हमारे पास पानी होगा, क्योंकि हम बारिश के पानी को इकट्ठा करते हैं।

60 फीसदी बच्चे स्कूल इसलिए नहीं जा पाते, क्योंकि उन्हें जानवरों की देखभाल करनी होती है – भेड़, बकरी – घर के काम। तो हमने सोचा कि एक स्कूल खोला जाए रात में, बच्चो को पढ़ाने के लिए। क्योंकि तिलोनिया के रात के स्कूलों में 75,000 बच्चों से ज्यादा रात को पढ़ चुके हैं, क्योंकि ये बच्चों की सहूलियत के लिए है, ये शिक्षकों की सहूलियत के लिए नहीं है। और हम यहां क्या पढ़ाते हैं? प्रजातंत्र, नागरिकता, अपनी जमीनों की नाप कैसे करें, अगर आपको पुलिस पकड़ ले, तो क्या करें, यदि आपका जानवर बीमार हो जाए, तो क्या करें। यही हम रात के स्कूलों में पढ़ाते हैं। क्योंकि सारे स्कूल मे सौर-ऊर्जा है।

हर पांच साल में, हम चुनाव करते हैं। 6 से ले कर 14 साल तक के बच्चे इस प्रजातांत्रिक प्रणाली में हिस्सा लेते हैं, और वो एक प्रधानमंत्री चुनते हैं। इस वक्‍त जो प्रधानमंत्री है, उसकी उम्र है 12 वर्ष। वो सुबह 20 बकरियों की देखभाल करती है, मगर शाम को वो प्रधानमंत्री हो जाती है। उसका अपना मंत्रिमंडल है, शिक्षा मंत्री, बिजली मंत्री, स्वास्‍थ्‍य-मंत्री। और वो असल में देखभाल करते हैं करीब 150 स्कूलों के 7000 बच्चों की।

पांच साल पहले उसे विश्व बालक पुरस्कार से नवाजा गया था और वो स्वीडन गयी थी। पहली बार गांव से बाहर निकली थी। कभी स्वीडन देखा नहीं। लेकिन आसपास की चीजों से जरा भी प्रभावित नहीं।

स्वीडन की रानी, जो वहीं थीं, मेरी ओर मुड़ी और कहा, “क्या आप इस बच्ची से पूछेंगे कि इतना आत्म-विश्वास कहां से आता है? ये केवल 12 साल की है और किसी से प्रभावित नहीं होती।”

और वो लड़की, जो उनकी बायें ओर है, मेरी ओर मुड़ी, और रानी की आंखों में आंखें डाल कर बोली, “कृपया इन्हें बता दीजिए कि मैं प्रधानमंत्री हूं।”

(हंसी)

जहां साक्षरता बहुत कम है, हम कठपुतलियों का इस्तेमाल करते हैं। कठपुतिलियों के सहारे हम अपनी बात रखते हैं। हमारे पास जोखिम चाचा है, जो करीब 300 साल के हैं। ये मेरे मनोवैज्ञानिक हैं। ये ही मेरे शिक्षक हैं। यही मेरे चिकित्सक हैं। यही मेरे वकील हैं। यही मुझे दान देते हैं। यही धन भी जुटाते हैं, मेरे झगड़े भी सुलझाते हैं। ये मेरे गांव की समस्या का समाधान करते हैं। यदि गांव में तनाव हो, या फिर स्कूलों में हाजिरी कम हो रही हो और अध्यापकों और अभिभावकों के बीच मनमुटाव हो, तो ये कठपुतली अध्यापकों और अभिभावकों को सारे गांव के सामने बुलाती है और कहती है, “हाथ मिलाइए। हाजिरी कम नहीं होनी चाहिए।” ये कठपुतलियां विश्व-बैंक की बेकार पड़ी रिपोर्टों से बनी हैं।

(हंसी)

तो इस विकेंद्रित और पारदर्शी तरीके से, गांवों को सौर-ऊर्जा देने के तरीके से, हमने सारे भारत में काम किया है। लद्दाख से ले कर भूटान तक। सब जगहों पर सौर-ऊर्जा उन लोगों द्वारा लायी गयी, जिन्हें प्रशिक्षण दिया गया।

हम लद्दाख गये। वहां हमने एक महिला से पूछा कि आप, माइनस 40 डिग्री सेंटिग्रेट पर, छत से बाहर आयी हैं, क्योंकि बर्फ से आजू-बाजू के रास्ते बंद है … और हमने पूछा, “आपको क्या लाभ हुआ सौर ऊर्जा से?” और एक मिनट तक सोचने के बाद उसने कहा, “ये पहली बार है कि मैं सर्दियों में अपने पति का चेहरा देख पायी।”

(हंसी)

हम अफगानिस्तान गये। भारत में हमने एक बात ये सीखी कि मर्दों को आप कुछ नहीं सिखा सकते।

(हंसी)

आदमी उच्‍छृंखल होते हैं। आदमी महत्वाकांक्षी होते हैं। वो एक जगह टिक कर बैठना नहीं पाते और उन सबको एक प्रमाण-पत्र चाहिए होता है।

(हंसी)

दुनिया भर में, यही चाहत है आदमियों की, एक प्रमाण-पत्र चाहिए। क्यों? क्योंकि वो गांव छोड़ना चाहते हैं, और शहर जाना चाहते हैं, नौकरी करने के लिए। तो हमने इसका एक बेहतरीन तरीका निकाला। बूढ़ी दादियों को प्रशिक्षण देने का। अपनी बात दूर-दूर तक फैलाने का आज की दुनिया में क्या तरीका है? टेलीविजन? नहीं। टेलीग्राफ? नहीं। टेलीफोन? नहीं। एक स्त्री को बता दीजिए बस!

(हंसी)

तो हम पहली बार अफगानिस्तान गये और हमने तीन स्त्रियों को चुना और कहा, “हम इन्हें भारत ले जाना चाहते हैं।”

उन्होंने कहा, “असंभव। ये तो अपने कमरे तक से बाहर नहीं निकलती हैं, और तुम भारत ले जाने की बात करते हो।”

मैंने कहा, “मैं एक छूट दे सकता हूं। मैं उनके पतियों को भी साथ ले जाऊंगा।”

तो मैं उनके पतियों को भी ले आया। जाहिर है, औरतें आदमियों से कहीं ज्यादा बुद्धिमान होती हैं। छह महीने के भीतर, हम इन औरतों को कैसे बदल दें? इशारों की भाषा से। तब आप लिखित चीजों पर भरोसा नहीं करते। बोलचाल की भाषा से भी काम नहीं बनता। आप इशारों की भाषा इस्तेमाल करते हैं। और छह महीनों में, वो सौर-इंजीनियर बन गयीं। वो वापस जा कर अपने गांव में सौर-बिजली ले आयीं।

इस स्‍त्री ने वापस जा कर, पहली बार किसी गांव में सौर-बिजली लगायी, एक कारखाना लगाया। अफगानिस्तान का पहला गांव, जहां सौर-बिजली आयी, तीन औरतों द्वारा किया गया था। ये स्त्री एक महान दादी मां है। 55 साल की उम्र में इसने अफगानिस्तान में 200 घरों को सौर-बिजली दी है। और ये खराब भी नहीं हुई है। ये असल में अफगानिस्तान के इंजीनियरिंग विभाग गयी और वहां के मुख्य-अधिकारी को बता कर आयी कि एसी और डीसी में फर्क क्या होता है। उसे नहीं पता था। इन तीन औरतों ने 27 और औरतों को प्रशिक्षण दिया है और अफगानिस्तान के 100 गांवों में सौर-बिजली लगवा दी है।

हम अफ्रीका गये, और हमने यही किया। ये सारी औरतें जो एक मेज पर बैठी हैं, अलग-अलग आठ देशों की हैं, सब बतिया रही हैं, मगर बिना एक भी शब्द समझे, क्योंकि वो सब अलग-अलग भाषा बोल रही हैं। मगर इनकी भाव-भंगिमाएं गजब की हैं। ये एक दूसरे से बतिया भी रही हैं और सौर-इंजीनियर बन रही हैं।

मैं सियरा ल्योन गया और वहां एक मंत्री से मिला, जो रात के घनघोर अंधेरे में ड्राइविंग कर रहे थे। एक गांव पहुंचा। वापस आया। गांव पहुंचा, और कहा, “इसकी क्या कहानी है?”

उन्होंने कहा, “इन दो दादी-मांओं ने…”

“दादियों ने?” मंत्री साहब को भरोसा ही नहीं हुआ।

“वो कहां गयी थी?”

“भारत से लौट कर आयी हैं।”

वो सीधे राष्ट्रपति के पास गया। उसने कहा, “आपको पता है कि सियरा ल्योन में एक सौर-बिजली युक्त गांव है?”

जवाब मिला, “नहीं।”

अगले दिन आधे से ज्यादा मंत्रिमंडल इन औरतों से मिलने आ गया।

“कहानी क्या है?”

तो उन्होंने मुझे बुलाया और कहा, “क्या आप मेरे लिए 150 दादियों को प्रशिक्षण दे सकते हैं?”

मैंने कहा, “जी नहीं, महामहिम। मगर ये दे सकती हैं। ये दादियां।”

तो उन्होंने सियरा ल्योन में मेरे लिए पहला बेयरफुट ट्रेनिंग सेंटर बनवाया… और 150 दादियों को सियरा ल्योन में प्रशिक्षण मिल चुका है।

गाम्बिया

हम गाम्बिया में एक दादी मां को चुनने के लिए गये। एक गांव में पहुंचे। मुझे पता था कि मैं किस स्त्री को चुनना चाहता हूं। सब लोग साथ जुटे और उन्होंने कहा, “इन दो स्त्रियों को ले जाएं।”

मैंने कहा, “नहीं, मैं तो उसे ले जाना चाहता हूं।”

उन्होंने कहा, “क्यों? उसे तो भाषा भी नहीं आती। आप उसे जानते नहीं हैं।”

मैंने कहा, “मुझे उसकी भाव-भंगिमाएं और बात करने का तरीका अच्छा लगता है।”

“उसका पति नहीं मानेगा: नहीं होगा।”

तो पति को बुलाया गया। वो आया। अकड़ से चलता हुआ, नेताओं की तरह, मोबाइल लहराता हुआ।

“नहीं होगा।”

“क्यों नहीं?”

“उसे देखो, वो कितनी सुंदर है।”

मैंने कहा, “हां, बहुत सुंदर है।”

“अगर किसी भारतीय आदमी के साथ भाग गयी तो?”

ये उसका सबसे बड़ा डर था।

मैंने कहा, “वो खुश रहेगी, और तुम्हें मोबाइल पर कॉल करेगी।”

वो दादी मां की तरह गयी और एक शेरनी बन कर वापस लौटी। वो हवाई-जहाज से बाहर निकली और प्रेस से ऐसे बतियाने लगी, जैसे ये उसके लिए आम बात हो और हमेशा से यही करती रही हो। उसने राष्ट्रीय प्रेस को सम्हाला और वो प्रसिद्ध हो गयी।

जब मैं छह महीने बाद उस से मिला, मैंने कहा, “तुम्हारा पति कहां है?”

“अरे, कहीं होगा, उससे क्या फर्क पड़ता है।”

(हंसी)

सफलता की कहानी।

(हंसी)

मैं अपनी बात ये कह कर खत्‍म करना चाहूंगा कि मुझे लगता है कि समाधान आपके अंदर ही होता है। समस्या का हल अपने अंदर ढूंढिए। और उन लोगों की बात सुनिए, जो आपसे पहले समाधान कर चुके हैं। सारी दुनिया में ऐसे लोग मौजूद हैं। चिंता ही मत करिए। विश्व बैंक की बात सुनने से बेहतर है कि आप जमीनी लोगों की बातें सुनें। उनके पास दुनिया भर के हल हैं।

मैं अंत में महात्मा गांधी की कही बात दोहराना चाहता हूं।

“पहली बार वो आपको अनसुना कर देते हैं … फिर वो आप पर हंसते हैं … फिर वो आपसे लड़ते हैं … और फिर आप जीते जाते हैं।”

धन्यवाद।

अनुवाद : स्‍वप्निल कांत दीक्षित, संपादन : वत्‍सला श्रीवास्‍तव

(अनुवादक के बारे में : स्वप्निल कांत दीक्षित। आईआईटी से स्नातक होने के बाद, कोर्पोरेट सेक्टर में दो साल काम किया। फिर साथियों के साथ जागृति यात्रा की शुरुआत की। यह एक वार्षिक रेल यात्रा है, और 400 युवाओं को देश में होने वाले बेहतरीन सामाजिक एवं व्यावसायिक उद्यमों से अवगत कराती है। इसका उद्देश्य युवाओं में उद्यमिता की भावना को जगाना, और उद्यम-जनित-विकास की एक लहर को भारत में चालू करना है। इस यात्रा में ये युवक जगह-जगह से नये सृजन के लिए उत्‍साह बटोरते चलते हैं। स्वप्निल उन युवकों में से हैं, जो बनी-बनायी लीक पर चलने में यकीन नहीं रखते। यात्रा की एक झलक यहां देखें।)


२६ जनवरी के अवसर पर " नि‍त्‍यानंद गायेन"

Nityanand Gayen : २६ जनवरी के अवसर पर
भूख-शोषण
और धर्म की गुलामी में
किन्तु सुना है मैंने
कई बार-
हम आज़ाद हो चुके हैं
उन्हें कहते हुए
कुछ तो सच्चाई होगी
उनकी बातों में
वे शायद सच में आज़ाद हैं
तभी तो लूट रहे हैं
जी भर कर
उन्हें लूटने की आज़ादी है
मेरी आज़ादी के नाम पर
मिली है मुझे
गरीबी, शोषण, अशिक्षा
और कुछ आरक्षण का वादा
एक सरकारी कागज़ पर
उन्हें मालूम था
मुझे पढना नही आता .

अग्निपथ करण जौहर की एक बढ़िया फिल्म

अग्निपथ करण जौहर की एक बढ़िया फिल्म है ना मात्र उन्होंने अपने पिता को एक बेहतरीन तोहफा दिया वरन कसा हुआ निर्देशन, प्रभावी डायलाग, फिल्मांकन, दृश्य और सबसे बढ़िया कलाकारों का एकदम सही चयन और उनसे पूरा काम लेने की अदभुत कला करण के पास ही हो सकती थी. यह फिल्म सिर्फ फिल्म नहीं, वरन एक विचित्र समय में मानक, उपमाओ और बिम्बों को बायस्कोप के जरिये देखने का मौका है; जहां ऋषि कपूर अपने जीवन के श्रेष्ठ रोल में है, वही इस वर्ष के सारे खलनायको के पुरस्कार संजय दत्त ले जायेंगे ......प्रियंका चोपडा को स्पेस नहीं मिला इसलिए वो अपने जौहर नहीं दिखा पाई, पर ओमपुरी, ऋतिक, जरीना वहाब और बाकी किरदारों ने गजब ढा दिया है. ऋतिक की बहन बनी छोटी सी लडकी ने "मिली" फिल्म की जया भादुड़ी की याद दिला दी- वही निश्चलता, भोली सी आँखे और सहजपन..... गीत संगीत और कैमरे के अदभुत संयोजन से यह फिल्म आज के दिन दो अजीज मित्रों के साथ देखना बहुत ही सुखद अनुभव है. करण जौहर निश्चित ही बधाई के पात्र है बस विजय दीनानाथ चौहान के रूप में अमिताभ की कोई बराबरी नहीं और डैनी का रोल भी उस अग्निपथ में अप्रतिम था ही...........पर यह आज की अग्निपथ है जहा मेरे अपने अनुज देवास के चेतन पंडित को प्रकाश झा की फ्रेम से बाहर आते देखकर और दमदार अभिनय करते देखना वास्तव में एक अलौकिक अनुभव है.........बधाई चेतन तुम छा गए भाई.................हाँ केटरीना ने अपने लटको झटको में जरूर नयापन लाकर दिखाया कि वो वाकई चिकनी चमेली का रोल निभाने में सफल रही है बहुत हॉट और पुरे शरीर का प्रदर्शन कर केटरीना ने दिखा दिया कि अभिनय के साथ उसमे आयटम गर्ल का रोल निभाना और बॉक्स ऑफिस पर तालिया बटोरना आता है चिकनी चमेली से अन्य तीन गीत बेहतर है और फ़िर मुम्बई के गणेश विसर्जन का दृश्यांकन भी करण की प्रतिभा है...............

आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें: अल्‍लामा इकबाल की रचना। रब्‍बानी ब्रदर्स की आवाज़।

आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें: अल्‍लामा इकबाल की रचना। रब्‍बानी ब्रदर्स की आवाज़।


अकसर यू-ट्यूब पर ग़ोता लगाने से कुछ अनमोल गाने हाथ लग जाते हैं।
और इस बार भी यही हूआ है।

इस बार हमें मिली है अल्‍लामा इक़बाल की रचना 'एक नया शिवाला'।
इसे एक निजी कंपनी ने अपनी सीरीज़ 'म्‍यूजिक का तड़का' के लिए तैयार करवाया है। और आवाज़ें हैं रब्‍बानी ब्रदर्स की। रब्‍बानी ब्रदर्स कहने से तो वैसे भी समझ नहीं आता। पर अगर हम कहें कि इसे मुर्तज़ा, क़ादिर और रब्‍बानी मुस्‍तफा ने गाया है, तो शायद कुछ लोग इन गायकों को फौरन समझ जायेंगे। असल में ये तीनों रामपुर-सहसवान घराने के नामी गायक पद्म-भूषण उस्‍ताद गुलाम मुस्‍तफ़ा ख़ां के बेटे हैं। ज़ाहिर है कि उन्‍हीं के शिष्‍य भी हैं। यहां ये बता देना ज़रूरी लगता है कि इन भाईयों में से मुर्तज़ा और क़ादिर ने ए.आर.रहमान के निर्देशन में कई फिल्‍मों में गाया है। जिनमें 'पिया हाजी अली' (फिज़ां), 'नूर-उन-अल्‍लाह' (फिल्‍म मीनाक्षी), 'चुपके से' (फिल्‍म साथिया) और 'तेरे बिना बेस्‍वादी रतियां' (फिल्‍म गुरू) शामिल हैं। मुर्तज़ा आजकल रहमान की म्‍यूजिक अकादमी में गायकी सिखाते हैं।

ज़ाहिर है कि जब ये तीनों भाई एक प्रोजेक्‍ट के लिए जमा हुए तो इनके सामने अपने परिवार और घराने की विरासत का ख्‍याल रखने की चुनौती तो रही ही होगी।

आज के ज़माने में गैर फिल्‍मी देशभक्ति रचनाएं ज्‍यादा नहीं आ रहीं। यही हाल फिल्‍मों का भी है। साल दो साल में एकाध गाना आता है, और अकसर वो भी असरदार नहीं होता। ऐसे में रब्बानी ब्रदर्स की ये रचना अगर आपको रोक ले तो इसमें उनकी गायकी और अल्‍लामा इकबाल की लेखनी दोनों का योगदान माना जाए।


इक़बाल की ये रचना वाक़ई क्रांतिकारी और साहसी है। पढिए और सुनिए।
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं

song: aa ek naya shivala
lyrics: allama iqbaal
singer: rabbani brothers (murtaza, qadir, rabbani)
duration: 2 mints.



सच कह दूं ऐ बिरहमन गर तू बुरा ना माने
तेरे सनमक़दों के बुत हो गए पुराने

अपनों से बैर रखना तूने बुतों से सीखा
जंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने

तंग आके मैंने आखिर दैर-ओ-हरम को छोड़ा
वाइज़ का वाज़ छोड़ा, छोड़े तेरे फ़साने

पत्‍थर की मूरतों में समझा तू ख़ुदा है
ख़ाक-ए-वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है

आ ग़ैरियत के परदे एक बार फिर उठा दे
बिछड़ों को फिर मिला दे, नक्‍श-ए-दुई मिटा दे

सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्‍ती
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें

दुनिया के तीरथों से ऊंचा हो अपना तीरथ
दामान-ए-आस्‍मां से इसका कलस मिला दे

हर सुबह उठ के गायें मंतर वो मीठे मीठे
सारे पुजारियों को मय पीत की पिला दे

शक्ति भी शांति भी भक्‍तों के गीत में है
धरती के वासियों की मुक्ति पिरीत में है



मुमकिन है कि उर्दू के कई अलफ़ाज़ के मायने समझ ना आएं। इसलिए इस नज़्म का अंग्रेज़ी अनुवाद। जो मुझे इस ब्‍लॉग से मिला। जिसने भी अनुवाद किया है बढिया काम किया है।

I’ll tell you truth, oh Brahmin, if I may make so bold!
These idols in your temples—these idols have grown old,

To hate your fellow‐mortals is all they teach you, while
Our God too sets his preachers to scold and to revile;


Sickened, from both your temple and our shrines I have run,
Alike our preachers’ sermons and your fond myths I shun.


In every graven image you fancied God: I see
in each speck of my country’s poor dust, divinity.


Come, let us lift suspicion’s thick curtains once again,
Unite once more the sundered, wipe clean division’s stain.


Too long has lain deserted the heart’s warm habitation—
Come, build here in our homeland an altar’s new foundation,


And rise a spire more lofty than any of this globe,
With high pinnacle touching the hem of heaven’s robe!


And there at every sunrise let our sweet chanting move
The hearts of all who worship, pouring them wine of love:


Firm strength, calm peace, shall blend in the hymns the votary sings—
For from love comes salvation to all earth’s living things.

कैसा और किसका गणतंत्र ?

परेड देखकर थोड़ा सा रोम्मंचित तो हो ही जाता हूँ खासकरके भ्रष्ट फौज में कुछ लोग जब इस देश नामक चिड़िया पर अपनी जान दे देते है..........और ये युवा अधिकारी अपने पीछे छोड़ जाते है बिलखते परिजन और असीम भावनाएं..............और देश एक तमगे के अलावा क्या देता है अपनी पेंशन लेने के लिए भी इन्हें कितनी मुसीबते झेलना पडती है यह अकथनीय है...........देश .............अरे कहा है वो देश और कहा है वो लोग.......कैसा और किसका गणतंत्र .?
दिल्ली तो दिल्ली है इस शहर ने जितना देश का भला किया उससे ज्यादा नुकसान भी किया है सौ बार उजडने के बाद फ़िर फ़िर बसी और बाकी पुरे हिन्दुस्तान को उजाडा है............और सरे लोग आतंकित है यहाँ के बाशिंदों से और यहाँ की फिजाओं से...............राजपथ और अपने ताकत का गुमान, दर्शक दीर्घा में बैठे लोग और इसा सबके बीच नेताओं का हुजूम बस यही सब रह गया है गणतंत्र के नाम पर और हम जैसे लोग सिर्फ तुक्र टुकुर देखते रहते है दिल्ली की और............बोल दिल्ली तू क्या कहती है..
गणतंत्र दिवस के पहले तो कोई संदेश नहीं आये, सारे दोस्तों को इसकी याद नहीं रहती............नए साल के सन्देश पच्चीस दिन पहले आ जाते है .............
बहुत ही कमीनी मानसिकता है हमारी देश याद नहीं रहता........

खैर............छोडो ना क्या सुबह सुबह मै भी दुखडा ले बैठा........

"वेलेंटाइन दिवस" की सबको अग्रिम शुभकामनाएं............


Wednesday, January 25, 2012

सूरज को सोचता हूं

Nityanand Gayen की कलम से.............


अब कभी -कभी मैं
सूरज को सोचता हूं
उसके अकेलेपन को सोचता हूं
उसकी जलन की पीड़ा को सोचता हूं
कैसे सह रहा है वह
इस जलन को सदियों से
ख़ामोशी से ?
निथर हो कर
मैं यह सोचता हूं

बुद्धिजीवियों के उद्धार का ठेका

सत्यनारायण के साथ मुझे बांदा जाना था सुनील और बहादुर जा रहे है और मुझे भी शबरी पुरस्कार वितरण समारोह में जाना था पर हमने सिस्टम बनाए है जो आदमी को मारने के लिए ईजाद किये गए है आदमी को किस तरह से इतना हैरान परेशान किया जाए कि वो त्रस्त होकर गुलाम बन् जाए और फ़िर बिलकुल गुलामो की तरह से व्यवहार करने लगे.......एक गंदे नाले में पड़ा हुआ सिस्टम और बेहद धूर्त दर्जे के घटिया लोग, सिवाय मक्कारी और रूपया कमाने के जिन्हें कुछ ना आता हो और ऊपर से सरकारी मुलम्मा पहनकर ओढकर बिछाकर ये लोग किस लोकतंत्र की बात करते है .....शर्मनाक है यह सब, राज्य और कल्याणकारी राज्य का सपना संजोये हुए हमने १९५० को गणतंत्र बनाया था और कल उसकी बरसी है दुर्भाग्य की ऐसे लीचड लोग जिन्हें लोकतंत्र के "ल" में यकीन नहीं, ना आस्था- वो इस देश के बुद्धिजीवियों के उद्धार का ठेका लिए बैठे है.....खून खोल रहा है आज देश के नाम , नेताओं के नाम, भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट्स के नाम, दो कौड़ी के बाबूओ के नाम.... दिल करता है कि बगावत करके सबको ठीक कर दू और तंत्र उखाड फेंकू..................रास्ता किधर है.........????

Monday, January 23, 2012

सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है

सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

- पाश

Nityanand Gayen एक बार फ़िर.......

Nityanand Gayen एक बार फ़िर.......

तुम भी दूरी मापती होगी
हम दोनों की आखरी दिवाली पर
तुमने दिया था जो घड़ी मुझे
आज भी बंधता हूं उसे
मैं अपनी कलाई पर
घड़ी - घड़ी समय को देखने के लिए

उस घड़ी में
समय रुका नही कभी
एक पल के लिए
तुम्हारे जाने के बाद भी
निरंतर चलती रही
वह घड़ी
समय के साथ अपनी सुइओं को मिलाते हुए
घड़ी की सुइओं को देखकर
मैंने भी किया प्रयास कई बार
उस समय से बाहर निकलने की
जहाँ तुमने छोड़ा था मुझे अकेला
समय के साथ
किन्तु सिर्फ समय निकलता गया
और
मैं रुका ही रह गया
वहीँ पर
निकल न पाया
वहां से अब तक
जहाँ छोड़ा था तुमने
मुझे नही पता तुम्हारे घड़ी के बारे में
क्या वह भी चल रही है
तुम्हारे साथ
तुम्हारी तरह ?
कितनी दूर निकल गई हो
कभी देखा है
पीछे मुड़कर ?
जनता हूं
आगे निकलने की चाह रखने वाले
कभी मुड़कर नही देखते पीछे
पर मुझे लगता है
कभी -कभी अकेले में
तुम भी दूरी मापती होगी
हम दोनों के बीच की .

Nityanand Gayen की जादूई कलम ............

मैंने लिखे उन्हें ख़त
मिले उन्हें मेरे ख़त
किन्तु जबाव न आया मेरे किसी ख़त का
मेरे ख़त के जबाव में
कोई ख़त न भेज कर
उन्होंने मेरे खतों का जबाव दिया
खामोश रहकर .
कहीं कभी किसी दिन
हम दोनों मिल जाएं
जीवन के किसी राह पर
तब क्या हम
मिल पायेंगे
ठीक पहले की तरह ?
अक्सर मेरे मन में
यह सवाल उठता है
उस वक्त
शायद हम याद करेंगे
उस पल को
जब हम बिछड़े थे
एक - दुसरे से

मिलन से भी कठिन होगा
मिलन को यादगार बनाना
मन में उठे सवालों का
तब हम जवाब खोजेंगे
और
खोजेंगे कुछ शब्द
एक -दुजे को संबोधित करने के लिए
और सोचेंगे यह कि
कौन था जिम्मेदार
हमारे बिछड़ने का
ताकते रहेंगे एक -दुसरे का चेहरा
कुछ छ्णों तक
शर्म भरी आँखों से
देखेंगे
एक - दुसरे कि आँखों में
और शायद -
बनावटी खुशी की एक चादर
ओड़ने का प्रयास करेंगे
अपने चहरों पर
फिर से
एक औपचारिक मिलन बन जायेगा
यह मिलन
जैसे मिलते हैं -
दो अजनबी कभी - कभी
किसी सुनसान सड़क पर

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हमसे ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

बेफ़ायदा अलम नहीं, बेकार ग़म नहीं
तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये ने'आमत भी कम नहीं

मेरी ज़ुबाँ पे शिकवा-ए-अह्ल-ए-सितम नहीं
मुझको जगा दिया यही एहसान कम नहीं

या रब! हुजूम-ए-दर्द को दे और वुस'अतें
दामन तो क्या अभी मेरी आँखें भी नम नहीं

ज़ाहिद कुछ और हो न हो मयख़ाने में मगर
क्या कम ये है कि शिकवा-ए-दैर-ओ-हरम नहीं

शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हक़ीक़तन
तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं

मर्ग-ए-ज़िगर पे क्यों तेरी आँखें हैं अश्क-रेज़
इक सानिहा सही मगर इतनी अहम नहीं

- जिगर मुरादाबादी
हमसे बदल गया वो निगाहें तो क्या हुआ !
जिंदा हैं कितने लोग मुहब्बत किये बगैर !!

या तो इसे सब कुछ चाहिए या कुछ भी नहीं.............

जिंदगी में जो भी मिला उसे स्वीकारता गया पर अब लगता है कि एक पसंद होनी चाहिए, समझौते ना करना पड़े इतनी शक्ति अब होनी चाहिए चाहे कुछ भी हो जाए और तमाम उम्र तो लड़ते भिडते रहे पर अब सम्मान, पद, प्रतिष्ठा और वो सब कुछ लेना होगा जो एक अदद जीवन जीने के लिए चाहिए होता है .....मराठी में कहते है खायेंगे तो सोना या भूखों मर जायेंगे..........या जगजीत की गजल के शब्दों में कहू तो दिल भी किसी बच्चे की तरह जिद पर अड़ा है या तो इसे सब कुछ चाहिए या कुछ भी नहीं............. — with Mohit Dholi and 2 others.

Sunday, January 22, 2012

हम जिसे अपना मानते है सबसे ज्यादा वही हमारे लिए परेशानी का सबब बनते है...................
जीवन जीने के लिए बहुत हिम्मत की जरूरत होती है और यार दोस्त वगैरह सब धोखा है................ठीक वैसे ही जैसे प्यार मुहब्बत..............................

Saturday, January 21, 2012

एक जीवन जीने के लिये कितने लोगो की जरूरत पडती है.................आज आलोक से बातें हो रही थी तो उसने एक अदभुत वाक्य कहा कि " मुझे जीवन के लिए ज्यादा लोगो की जरूरत नहीं है" बात तो सही थी........मैंने भी अपने आप में झाँक कर देखा और पूछा कि क्या बात सही है और अपने जीवन में अपना सकता हूँ..........तो कोई बहुत ठोस जवाब नहीं आया....................पता नहीं बहुत उहापोह है और बेचैनी भी............

Friday, January 20, 2012

राख हुए सपने


'गुलाबी' के
सपने तो बहुत थे
उन्हें तोड़ने वाले
कहाँ कम थे ?

रंगीन चूड़ियों
का सपना
सहृदय बालम
का सपना

सबको अपना
बनाने का सपना

जलाई जाएगी
उसे केरोसिन डालकर
नही था
ये सपना गुलाबी का
पर ........................
राख हुए सब सपने
गुलाबी के साथ
Nityanand Gayen

बेवफ़ा हो जायें _अहमद फराज


इस से पहले के बेवफ़ा हो जायें
क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जायें

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल क्या से क्या हो जायें

हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
और कहीं और मुब्तला हो जायें

इश्क़ भी खेल है नसीबों का
ख़ाक हो जायें किमिया हो जायें

अब के गर तू मिले तो हम तुझ से
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जायें

बन्दगी हम ने छोड़ दी है ‘फराज़’
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जायें

Thursday, January 19, 2012

मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं


जिंदगी तूने लहू लेके दिया कुछ भी नहीं
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं

हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं

या खुदा अब के ये किस रंग से आई है बहार
ज़र्द ही ज़र्द है पेडों पे हरा कुछ भी नहीं

दिल भी इक जिद पे अडा है किसी बच्चे की तरह
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं.....

Wednesday, January 18, 2012

फ़िर एक बार फराज़ ................



अपने हालात का भी एहसास नहीं मुझको "फ़राज़"
मैंने औरों से सुना है के परेशां हूँ मैं!
कोई रूठे अगर तुमसे, उसे फ़ौरन मना लेना ,
कि जंग में अक्सर , जुदाई जीत जाती है !!

सरकारी नौकरी लग जाए किसी भी तरह से....

मप्र जैसे गरीब राज्य में जिस तरह से रोज भ्रष्टाचार के किस्से सामने आ रहे है और दूसरे, तीसरे और चौथे दर्जे के कर्मचारी पकड़ा रहे है वो बेहद चिंतनीय है, हो सकता है कि जोशी दंपत्ति और योगीराज जैसे शूरवीरों को पकडने के बाद लोकायुक्त की नजर प्रशासन सेवा पर नहीं पड़ रही या पडने दी जा रही है पर जिस अंदाज में छोटे कर्मचारियों के यहाँ करोडो की अकूत संपत्ति मिल रही है वो दर्शाता है कि ये सब लोग स्थानीय नेताओं और छुटभैय्ये के हाथो बिके हुए है और आम आदमी बेहद मजबूर है....आज एक सेवानिवृत कर्मचारी ने बताया कि निम्न श्रेणी का बाबू भी रोज अपनी टेबल से तीन हजार का गल्ला रोज उठा रहा है और इसमे से वो कम से कम दो हजार अपने घर ले जा रहा है....यहाँ तक कि चपरासी भी बेहद शेर हो गए है इस तंत्र में, शर्मनाक है यह सब. जितना मै उम्मीद कर रहा था पारदर्शिता और मूल्य प्रदत्त शासन की वो उतना ही खोखला साबित हो रहा है पिछले साढ़े तीन बरसो में भ्रष्टाचार ने खासकरके सरकारी कर्मचारियों के घरों से मिली संपत्ति से पुरे प्रदेश के बजट का उद्धार हो सकता है...मुझे आजतक नहीं पता कि जोशी दंपत्ति और बाकी से बरामद रूपयों का हिसाब क्या हुआ और वो जमा पूंजी और जेवर इत्यादि कहा गए....शर्मनाक है ऐसे देश प्रदेश का नागरिक होना. एक बार मजाक में लिखा था कि मेरा भी मन है कमाने का पर अब लगता है कि सरकारी नौकरी लग जाए किसी भी तरह से....

सरकारी नौकरी लग जाए किसी भी तरह से....

मप्र जैसे गरीब राज्य में जिस तरह से रोज भ्रष्टाचार के किस्से सामने आ रहे है और दूसरे, तीसरे और चौथे दर्जे के कर्मचारी पकड़ा रहे है वो बेहद चिंतनीय है, हो सकता है कि जोशी दंपत्ति और योगीराज जैसे शूरवीरों को पकडने के बाद लोकायुक्त की नजर प्रशासन सेवा पर नहीं पड़ रही या पडने दी जा रही है पर जिस अंदाज में छोटे कर्मचारियों के यहाँ करोडो की अकूत संपत्ति मिल रही है वो दर्शाता है कि ये सब लोग स्थानीय नेताओं और छुटभैय्ये के हाथो बिके हुए है और आम आदमी बेहद मजबूर है....आज एक सेवानिवृत कर्मचारी ने बताया कि निम्न श्रेणी का बाबू भी रोज अपनी टेबल से तीन हजार का गल्ला रोज उठा रहा है और इसमे से वो कम से कम दो हजार अपने घर ले जा रहा है....यहाँ तक कि चपरासी भी बेहद शेर हो गए है इस तंत्र में, शर्मनाक है यह सब. जितना मै उम्मीद कर रहा था पारदर्शिता और मूल्य प्रदत्त शासन की वो उतना ही खोखला साबित हो रहा है पिछले साढ़े तीन बरसो में भ्रष्टाचार ने खासकरके सरकारी कर्मचारियों के घरों से मिली संपत्ति से पुरे प्रदेश के बजट का उद्धार हो सकता है...मुझे आजतक नहीं पता कि जोशी दंपत्ति और बाकी से बरामद रूपयों का हिसाब क्या हुआ और वो जमा पूंजी और जेवर इत्यादि कहा गए....शर्मनाक है ऐसे देश प्रदेश का नागरिक होना. एक बार मजाक में लिखा था कि मेरा भी मन है कमाने का पर अब लगता है कि सरकारी नौकरी लग जाए किसी भी तरह से....

‎"कुछ रिश्ते ऊपर से दिखाई नहीं देते।"



उन्होंने कहा...मुझे कभी-कभी डर लगता है...क्रिश्चियन होने से ? मैंने पूछा...नहीं, वह बोली, अगर उन्होंने मुझे क़ब्र में दफ़ना दिया और मेरे भीतर जान बची हो ? मैं चाहती हूं कि मुझे ज़मीन में गाड़ने से पहले थोड़ा-सा जलाया जाए, ताकि अगर जीवित हूं, तो थोड़ी-सी जलन लगते ही उठ खड़ी हूं।...एक बार क़ब्र के भीतर गई, तो कोई मेरी आवाज़ भी नहीं सुन सकेगा...कैसी पागल थी...?
‎"कुछ रिश्ते ऊपर से दिखाई नहीं देते।"

(अंतिम अरण्य, निर्मल वर्मा)

गोरख पाण्डेय-जनकवि--समझदारों का गीत ...........


हवा का रुख कैसा है,हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं,हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है,हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं।

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिये
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्योंबच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं।

हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़ियाधसान होती है।

हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहां विरोध ही बाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं,हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं।

वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफे़द और
सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते है
भाई Kuldeep Singh की दीवार से साभार

Tuesday, January 17, 2012

देवास के ओटले पर हिन्दी के सशक्त कवि एकांत श्रीवास्तव — 28 January at 17:30.




प्रिय साथी,
सुनना, गुनना और बोलना हमारी परम्परा ही नहीं बल्कि संस्कृति का एक अभिन्न अंग है. हमारे मालवे में बड़े बूढ़े और सयाने लोग इसी सब के साथ हमेंशा लगे रहते है ओर सबके साथ सब कुछ साझा करते है, और यही हमारी ताकत है. हम सब देवास के लोग जो लिखने -पढने का शौक रखते है कुछ िखते पढते ओर गुनते बुनते है सबके साथ साझा ही नहीं करते पर दूसरों को भी सुनने में और समझने में यकीन करते है.

देवास में लिखने पढने वालो की एक वृहद लंबी परम्परा रही है संगीत, साहित्य, चित्रकला ओर ना ना प्रकार की ललित कलाएं इस शहर की विशेषता है और इस कला को हम साकार होते देखते है जब अपनी ही माटी के लोग उठते और खड़े होते है पूरी प्रतिबद्धता ओर उत्साह के साथ कि देश- प्रदेश में सबके साथ सबके लिए कुछ सार्थक करेंगे. ओटले के प्रथम आयोजन में दिल्ली के ड़ा जीतेंद्र श्रीवास्तव के कविता पाठ को हम भूले नहीं है अभी, उस आयोजन की गरिमा और गंभीरता को आप सबने रेखांकित भी किया था.

देवास के ओटले पर हम सब मिल रहे है दूसरी बार फ़िर से हिन्दी के सशक्त कवि एकांत श्रीवास्तव के साथ. एकांत हिन्दी के मात्र एक ऐसे कवि है, जो ना मात्र कविता को जीते है वरन वे कविता की उस अकादमिक पीढ़ी से आते है जो कविता के पुरे संसार को अपने तईं एक नया मुहावरा, नई समझ और नया विस्तार देते है. एकांत का काव्य संसार कविता की एक ऐसी दुनिया है जहां प्रयोग, नवाचार, शब्द, अर्थ और कथन अपना एक बिम्ब ही नहीं गढते वरन पुरजोर तरीके से कविता की मुखालफत करते है. अविभाजित म् प्र के छत्तीसगढ़ में जन्मे एकांत ने अपनी भाषा के संस्कार तो लिए ही है, परन्तु दुनियावी अनुभवों की थाती से वे एक ऐसी कविता का अनुशासन लेकर आये कि उन्होंने परम्परागत रचनाधर्म की कई सीमाओं को तोड़ा और कविता की दुनिया में नई समझ, उपज और व्याख्या प्रस्तुत की. कई पुस्तकों के रचनाकार भाई एकांत को दीर्घकालीन संपादन का भी वृहद अनुभव है. वागर्थ जैसी नामचीन पत्रिका के समपादक होने के नाते उन्होंने नए कवियों को भी तराशा और मंच दिया. एक परिपक्व कवि, संपादक और बेहतरीन इंसान एकांत को सुनना और चर्चा करना अपने आप में एक सुखान्त अनुभव है.
इस अवसर पर अशोकनगर के युवा एवं प्रतिष्ठित यशस्वी चित्रकार पंकज दीक्षित की कविता पोस्टर प्रदर्शनी को भी हम देखेंगे और समझेंगे, साथ ही हमारे निमाड अंचल (मनावर) के व्यंग्यकार गोविन्द सेन के बोधी प्रकाशन, जयपुर द्वारा प्रकाशित व्यंग्य संग्रह का एकांत श्रीवास्तव लोकार्पण भी करेंगे.
इस बहुमूल्य समय के विचारवान कार्यक्रम में आप सभी सादर आमंत्रित है.

स्थान- बी आर सी भवन, चिमणाबाई हायर सेकेंडरी स्कूल के पीछे, मील रोड, देवास.
दिनांक- 28 जनवरी 2012,
समय- शाम 530 बजे से
संपर्क- मनीष-9826013806, बहादुर-9827340666, संदीप-9425919221, दिनेश- 9406885093

निवेदक- “ओटला" के साथी – हम और आप.

Monday, January 16, 2012



सगे कुए शेरे अजदानुम, हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ? रहे आजाद या ज़द में हमन दुनिया से यारी क्या ? जो बिछड़े हैं प्यारे से, भटकते दर बा दर फिरते, हमारा यार है हममे, हमन को इंतजारी क्या ? न पल बिछड़े पिया हम से, न हम बिछड़े पियारे से, इन्ही से निह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ? कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से, जो चलना राह नाजिक है, हमन से बोझ भारी क्या ?

इक मुद्दत से मेरी माँ नहीं सोई ताबिश
मैंने एक बार कहा था मुझे डर लगता है..
घर के दरवाजे खोल रखे है मैने,,,,
देखते है कौन आता है मुझे मनाने के लिए,,,,,,,,,

ये दर्द अपना है ,किसी गैर का नहीं
जख्म है ,
भर जाने दो ...
मरहम लगाने कोई आएगा नहीं ...