Friday, December 30, 2011

नए साल के संकल्प से......

नए साल में एक ही संकल्प किसी से भावुकता के रिश्ते मत रखो .............साले इंसान जूते खाने लायक ही है बस.............इन्हें एक ही तरीके से साध सकते है प्यार मुहब्बत कुछ नहीं होता बस USE & THROW का सिद्धांत इस्तेमाल करो...........................
आप जिससे प्यार करते है यदि वो आपको विश्वास नहीं दे सकता तो उसे तुरंत छोड़ दीजिए वरना पछताने के अलावा जीवन में कुछ नहीं मिलेगा.............मेरे पास एक जीवंत उदाहरण है स्पेस माँगने के चक्कर में लोग बाग आपको यूज करते है..............

जो इंसान लगातार झूठ पे झूठ अपने लोगो से बोलता रहा हो कई दिनों तक महीनों तक उसे छोड़ देना ही बेहतर है वरना एक दिन वो आपको भी बेच कर खा जाएगा................और वो भी भावनाओं को इस्तेमाल करके.......तो यह हद बेहद तके, दोनों से परे हो जाता है मामला..............

उस इंसान को छोड़ दो जो आपको बरगला के रखता है और सिर्फ झांसे में रखता हो ................और हाँ उसे भी छोड़ दो जो आपको तो मिस काल देता हो या बेलेंस ना होने के बहाने करता हो पर अपने वालो से देर रात तक बातें करता हो..........जैसे अपने रिश्तेदारों से या माशूक से या माशूका से.............और झूठ पर झूठ बोल रहा हो............बस यही सही समय है एक नए साल को शुरू करनें का

जितने लोगो को मदद की हो उन सबको भूल जाओ और फ़िर नए सिरे से एक ऐसी जिंदगी की शुरूआत करो जहा सिर्फ आप हो, मतलब हो, मौका हो और जूते हो बस यही तरीका है जीवन जीने का क्योकि लोग एक ही झटके में औकात भूल जाते है और सारे सदकर्म भूल जाते है बस यही याद रखो कि जीवन जीने के लिए जितना मतलबी और अवसरवादी बन् सकते हो बनो.......और उन सबको माफ कभी मत करो जो आपके कंधो पर चढ़कर आज सफलता के गुम्बद चूम रहे है इन सबको याद रखो और रोज बददुआएं दो जी भरके.............

लोग कमजोर होते है और बेहद स्वार्थी. वे आपको इस्तेमाल करते है और फ़िर निचुड़े हुए निम्बू की तरह छोड़ देते है ऐसे लोगो को घेर कर इतना संत्रास दो कि वे जीवन में कभी किसी को फ़िर अपने झांसे में ना ले पाए- शहर दर शहर, गली- मोहल्ले में, चौराहों और तिराहो पर इन्हें बदनाम कर दो इतना कि ये किसी को मुह दिखाने लायक नहीं रहे...........सिर्फ लोगो को इस्तेमाल करके श्रेय और ख्याति कमाने वाले और दूसरों की नींव से अपना महल बनाने वाले ऐसे लोगो को छोडो मत .........ये सब जानते है कि ये क्या कर रहे है.............इन्हें कभी माफ मत करो...............

साकिया जाए कहाँ हम तेरे मैखाने से
शहर के शहर नज़र आते है वीराने से
ये जो कुछ लोग नज़र आते है जो दीवाने से
इनको मतलब है ना साकी से ना पैमाने से

वह आँखें मूंदकर प्यार करता है

'' हमारा प्यार बहुत-कुछ हमारी ज़िन्दगी की तरह है. आदमी जानता है कि वह बुरी तरह ख़त्म होगी, काफी जल्दी ख़त्म होगी, वह हमेशा रह सकेगी, इसकी उसे रत्तीभर उम्मीद नहीं है, फिर भी- यह सब जानते हुए भी- वह जिये चला जाता है. प्यार भी वह इसी तरह करता है, इस आकांक्षा में कि वह स्थायी रहेगा, हालांकि उसके 'स्थायित्व' में उसे ज़रा भी विश्वास नहीं है. वह आँखें मूंदकर प्यार करता है...एक अनिश्चित आशंका को मन में दबाकर- ऐसी आशंका, जिसमें सुख धीरे-धीरे छनता रहता है और वह इसके बारे में सोचता भी नहीं. ''
- ईवान क्लीमा

अलविदा- 2011

साल 2011 जा रहा है, बहुत कुछ छीन लिया इस साल ने हमसे, स्टीव जॉब, भूपेंन हजारिका, इंदिरा गोस्वामी, सत्यदेव दुबे, श्रीलाल शुक्ल, हमारे जिंदगी को गुनगुनाने वाले जगजीत बाबू, सदाबहार देव साहेब, जिंदगी के कैनवास पर सपनों के रंग भरने वाले मकबूल फिदा साहब और कलम के सिपाही अदम गोंडवी साहब .. ना जाने कितने ऐसे लोग जो काल के विशाल गाल में ऐसे समा गए है कभी लौट कर नहीं आ सकते, कुछ यादों के सहारा अलविदा- 2011. साल का आख़िरी पल ऐसे गुजरेगा पता नहीं था सारे तो लोग चले गए...........दूर देखने पर कुछ नजर नहीं आता ..........बहुत गहरे जख्म और सदमे भरा एक जिन्दगी का एक और साल रफ्ता रफ्ता गुजर ही गया..............बस अब थोड़ी बहुत चिंताएं है तो आनेवाले कल की और फ़िर उससे जुडी अपेक्षाओं, उम्मीदों और सम्भावनाओं की...... बस कही से खुशियों की खबरे मिलती रहे ताकि सपने ना लहुलूहान हो ना जीवन में दर्शन या तर्क खोजना ना पड़े...........बस इन्ही कुछ दुआओं के साथ नए साल का स्वागत और सबको ढेर सारी प्यार भरी शुभकामनाएं............

Wednesday, December 28, 2011

लिख सकूँ तो— प्यार लिखना चाहता हूँ,


लिख सकूँ तो—
प्यार लिखना चाहता हूँ,
ठीक आदमजात सा
बेखौफ़ दिखना चाहता हूँ।

थे कभी जो सत्य, अब केवल कहानी
नर्मदा की धार सी निर्मल रवानी,
पारदर्शी नेह की क्या बात करिए-
किस क़दर बेलौस ये दादा भवानी।

प्यार के हाथों
घटी दर पर बज़ारों,
आज बिकना चाहता हूँ।

आपदा-से आये ये कैसे चरण हैं ?
बनकर पहेली मिले कैसे स्वजन हैं ?
मिलो तो उन ठाकुरों से मिलो खुलकर—
सतासी की उम्र में भी जो ‘सुमन’ हैं

कसौटी हैं वो कि जिसपर-
नेह के स्वर
ताल यति गति लय
परखना चाहता हूँ।

-स्व. नईम, देवास..

लेकिन लिख बैठा मैं झुलसे तन


लिखना तो चाहा था
टेसूवन
बौराए आम,
लेकिन लिख बैठा मैं
झुलसे तन
बदली के घाम।

निर्वसना शाखाएँ, पीले पत्ते, तिनके-
परखचे उड़े जाते कर्फ्यू वाले दिन के
लिखनी तो चाही थी-
गंध पवन,
वासंती शाम,
लेकिन लिख बैठा मैं
द्रोह दलन
जन के पथ बाम।

घाटे के बजट और फागुन दिन चढ़े भाव,
हमले पर हमले, पक्षों के बौने बचाव;
लिखनी तो चाही जय यात्राएँ,
नए तीर्थ धाम,
लेकिन लिख गई मुझसे
सुविधाएँ-
बस्ती बदनाम।

-स्व. नईम, देवास..

हम आदिम ख्वाहिश का हिस्सा

हो न सके हम
छोटी सी ख्वाहिश का हिस्सा

हो न सके हम बदन उधारे बच्चों जैसा

गर्मी या बारिश का हिस्सा

हुआ न मनुवां

किसी गौर की महफिल का गायक साज़िंदा¸

अपने ही मौरूसी घर का

रहा हमेशा से कारिंदा

दास्तान हो सके न रोचक

याकि लोक में प्रचलित किस्सा

जीवन जीने की कोशिश में

लगा रहा मैं भूखा–प्यासा

होना था कविता सा¸ लेकिन

हो न सका मैं ढंग की भाषा

जनम जनम से

होता आया

इन–उन की ख्वाहिश का हिस्सा

जीवन बांध नहीं पाये हम

मंसूबे ही रहे बांधते¸

खुलकर खेल न पाये बचपन

यूं ही खिचड़ी रहे रांधते

हो न सके

जीवन जीने की

हम आदिम ख्वाहिश का हिस्सा

-स्व. नईम, देवास..
अपनी तो अपने से अनबन ठनी हुई है
जाने कबसे! कह सकना है मुश्किल थोड़ा-
बिना लगाम नहीं सधता है जैसे घोड़ा।
खाली तर्कश, पर प्रत्यंचा तनी हुई है।

घर के घर में विकट महाभारत की आंधी-
अपने ही कुल देव, देवता लगे हुए हैं
लड़वाने में! धर्म चाश्नी में कर्मों की पगे हुए हैं।
कर्ण इधर हैं उधर हवा अर्जुन ने बांधी!

अपने से अपना विश्वास उठा क्यों जाता-
धीमे-धीमे जली जा रही क्यों मनसाई?
मिलता नहीं एक से दूजा भाई भाई-
चूल्हे का चौके से रहा नहीं अब नाता।

इनके हाथ लिए तो उनके हाथों पाँचे
बदल रहे हैं क्रमशः अब ढाँचे-दर-ढाँचे
-नईम

सही इबादत के मौसम फिर कब आयेंगे?

चिट्ठी पत्री
खतो खिताबत के मौसम
फिर कब आयेंगे?
रब्बा जाने
सही इबादत के मौसम
फिर कब आयेंगे?

चेहरे झुलस गये कौमों के लू लपटों में
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में
युद्ध क्षेत्र से क्या कम है यह मुल्क हमारा
इससे बदतर
किसी कयामत के मौसम
फिर कब आयेंगे?

हवालात-सी रातें दिन कारागारों से
रक्षक घिरे हुए चोरों से बटमारों से
बंद पड़ी इजलास
जमानत के मौसम
फिर कब आयेंगे ?

ब्याह सगाई विछोह मिलन के अवसर चूके
फसलें चरे जा रहे पशु हम मात्र बिजूके
लगा अंगूठा कटवा बैठे नाम खेत से
जीने से भी बड़ी
शहादत के मौसम
फिर कब आयेंगे?
-नईम

Tuesday, December 27, 2011

एक चेहरा है, ख़यालों में कहीं खोया हुआ
होकर भी ज्यूं वो हाज़िर नहीं होता
नक्श में सुलगती है यादों की अगरबत्ती
धुआं आंखों से छलककर होंठों पे कहीं ठहर जाता है...
Chandi Dutt Shukla
मेरे लिए आज सुबह लिखी ये पंक्तियाँ

Monday, December 26, 2011



‎'' जब तक इस धरती पर आदमी जीवित रहेगा, ईश्वर कभी यहां आने का जोखिम नहीं उठाएगा. ''

[ निर्मल वर्मा, अपनी डायरी में ]

Sunday, December 25, 2011

परखने में कोई अपना नहीं रहता

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता
बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समन्दर में मिले, दरिया नहीं रहता
हजारों शेर मेरे सो गये कागज की कब्रों में
अजब मां हूं कोई बच्चा मेरा ज़िन्दा नहीं रहता
तुम्हारा शहर तो बिल्कुल नये अन्दाज वाला है
हमारे शहर में भी अब कोई हमसा नहीं रहता
मोहब्बत एक खुशबू है, हमेशा साथ रहती है
कोई इन्सान तन्हाई में भी कभी तन्हा नहीं रहता
दिसम्बर का आखरी हफ्ता,उस रोज़ रात और भोर में फर्क करना मुश्किल हो रहा था,सड़क पर कुछ लोग,अँधेरे में खम्बों पर लगी लाइट्स,और कोहरे को चीर कर आती गाड़ियों की रौशनी से मुझे उस सुनसान सी सड़क पर चलने का हौसला मिल रहा था,शायद बर्फ पड़ने की बात सुबह ही अखबारों में पढ़ी थी,कुछ ने लिखा था पेड़ों की पत्तियों और पानी पर बर्फ की एक पतली वरक जम जायगी ,पर इन सब से बेखबर आधी रात को तुम्हारे बुलाने पर आया था,काफी देर इंतज़ार के बाद, उस पेड़ के पत्तों की ओर निगाह गयी, जिसके नीचे मै खड़ा हो कर तुम्हारे घर की ओर बड़ी हसरत भरी निगाहों से देख रहा था,उसमे किसी भी तरह की हरक़त नही हो रही थी,हाथों से छुआ, तो बर्फ उँगलियों पे आ जमी,उस बर्फ को तो उँगलियों से अलग कर दिया, पर आज भी तुम्हारा वो आखरी इंतज़ार याद आता है,पत्तियों पर तो बर्फ की वजह से उन्हें सांस लेने में दिक्कत आई, पर मुझे, तुम्हारे न आने से बहुत तकलीफ हुई.!

....वहां कोई नहीं रहता इस नाम का...जिस पते से उम्र भर खत आते रहे जिन्‍़दगी के...



....वहां कोई नहीं रहता इस नाम का...जिस पते से उम्र भर खत आते रहे जिन्‍़दगी के...
दो बार तुम्हारे द्वार आया पर तुम मिले ही नहीं कही तालो में बंद और चाभी भी नहीं....दियो की रोशनी शाम के समय द्वार पर पूरी कोशिश कर रही थी कि पूरा दालान झक्क से रोशन कर दे पर कहा उस दिए की ताकत पर हाँ उसके जज्बे को सलाम करके लौट आया हर बार मै.........एक उम्मीद में कि शायद अगली बार तुम दरवाजे पर मिल जाओ.............
ये शाम है बहुत सर्द और तेज हवाओं के नाम, नदी के किनारे से गुजरता हूँ तो पुरे बदन में कपकंपी छूट जाती है, बांसों के झुरमुट के पास से सनसनाते हुए मानो लगता है कि कोई दन से गोलियाँ चला रहा है आवाजों की.....और फ़िर वो पुराना सा बड़ा सा चर्च भी बेहद शांत था आज .....जबकि आज तो वहाँ चहल-पहल होनी थी, पर ये धुंधलाती शाम और ये चारों ओर उठती भाप की दीवारें, सडके जाम है, कान सुन्न हो गए है, रूह काँप रही है, शब्द गले से निकल नहीं रहे, और आँखे पथरा गयी है, बस लग रहा है कि लों यह भी सब गुजर गया..............युही देखते देखते

यदि कोई ईश्वर के घर से भी खाली हाथ लौट आये तो.........शायद यही तो हुआ था आज............उन बांसों के झुरमुट में बहुत देर तक इंतज़ार करता रहा कि कुछ चमत्कार ही हो जाए...तुम दिख जाओ भले ही एक क्षण...बहुत देर तक सूरज की हल्की धूप कुलबुलाती रही- फ़िर तपिश भी खत्म हो गयी, धीरे धीरे शाम का सन्नाटा उस बांस के झुरमुट में पसर गया, तीन चार नन्हे दिए किसी भले से आदमी ने वहाँ लाकर लगा दिए........(ये नहीं कहूँगा कि जला दिए, जलने से सब खत्म हो जाता है पर लगाने से तो कुछ लग भी जाता है) बस फ़िर दूर से देर तक उन दियो की टिपटिपाती लौ को देखता रहा और महसूसता रहा अपने अंदर उस रोशन करने की तपस्या को और फ़िर पसीने से भीग गया एकदम.......बस फ़िर इतनी सर्द हवाओं के बीच एक चौराहे पर आकर खडा हूँ कि कहा जाऊ अब....

Saturday, December 24, 2011

नए साल के पहले के कुछ डर

बड़े पेड़ों को देखकर खुशी तो होती है पर दुःख सालता है कि पता नहीं क्यों इनके बड़े होने में कितनी सारी चीजे लग गयी और ये अकेले ही अकेले बढ़ते गए ..........बस..........पता नहीं क्यों बड़ा होने की इच्छा ही मर सी गयी है..........

रोज रोज खिडकियां खोलकर थक गया हूँ अब खिडकियां खोलने का पूरा मकसद चाहिए............और देखते देखते साल भी खत्म हो रहा है और नया भी आ ही गया है एकदम मुहाने पर..........

लों सामने आ ही गया वो.............बस यु पहुँच जाएगा एकदम से, फ़िर सब लोगो के बीच धूम मचा देगा.........और सब पागलों की तरह झूमने लगेंगे ..........पर क्या सच में ये इतना नया है क्या सच में सब कुछ बदलेगा या सिर्फ फडफडाते हुए एक नई तारीख फ़िर से इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो जायेगी....... एक केलेंडर के साथ एक नया सच और फ़िर एक नया.........पता नहीं क्यों हवाओं में ठिठुरन सी क्यूँ है आज.....

कितने लोगों से मिला हूँ इस पुरे समय में और हाँ- हाँ, तुम भी तो आये थे ........पर क्या बदला मै तो वैसा ही रहा जैसा था मुझे तो समझ नहीं आता पर तुम्हे लगा क्या कुछ................सब कहते है जीवन रोज बदलता है पर मुझे तो किचित भी एहसास नहीं हुआ आज तक........

ये जाते हुए समय की बेला है और लगता है कि आज ही सारा हिसाब कर लू...........पर तुम्ही कुछ भी याद है...............वो कहती है कि मुझे बताओ कि ये कौन नहीं सुनता, पर अब सबको कैसे बताऊ........कि.........नया साल आनेवाला है, अब तो आ ही गया, क्या इसे रोक सकते हो थोड़ी और देर के लिए............कि हम एक बार फ़िर से बात ही कर ले.............

मैंने तो अभी इसे समझा ही नही था, उस दिन उस शहर में गया था फ़िर वहाँ भी तुम आये फ़िर इस शहर में और यहाँ भी तुम आये और मै इन यादों को अभी संवारना चाहता ही था कि एकदम से किसी ने कह दिया कि ये आनेवाला है अब ..........मेरे पास तो सिवाय संताप और संत्रास के कुछ नहीं है इस को लेकर तो मै कतई भी तैयार नहीं हूँ........क्या रोकोगे इसे......ताकि मै संवार लू एक बार फ़िर से सब कुछ सहजता से ताकि ये साल मेरे मन मस्तिष्क पर ठीक से अंकित हो जाए......

बस अब तो लगता है थक सा गया हूँ............यह सब कहने की हिम्मत भी नहीं है...........क्या सब कुछ छूटकर सब कुछ फ़िर से मिल सकता है या नया शुरू करने के लिए इतना समय जिंदगी दे सकती है....कि फेयर काम कर ले अब तक को रफ काम मानकर, पता नहीं कि उहापोह में लग गया हूँ कि शायद अभी भी समय हो, पर ये साल इतनी जल्दी- जल्दी आ जाता है कि बस..........रोक लों ना इसे......थोड़ा और........

Friday, December 23, 2011

अविनाश मिश्रा की एक बेहतरीन कविता........

नदी
का
दुःख
जल
नहीं
यात्रा
है....

Abha Nivsarkar Mondhe nadi ka dukh yatraa kaise ho saktee hai....

Rajesh L Joshi

नदी
का
दुख
यात्रा
नहीं...
यक़ीन

हो
तो
मेरी
आंखो
की हिमनद
से पूछ
देखिये...
Maya Mrig नदी का जीवन ही यात्रा है...हर सुख दुख को साथ बहाते हुए....अंतहीन यात्रा

Sandip Naik कई बार हममे सब होते हुए भी हम अपनी ही करनी और नियति से जूझते रहते है और शायद यही बात अविनाश कहने की कोशिश कर रहे है..................right Avinash Mishra......................

Avinash Mishra शुक्रिया सर.... एक नया अर्थ दिया आपने इस पंक्ति को.....

Sandip Naik नहीं अवि तुमने बल्कि मेरे कई जाले साफ़ कर दिए यह अदभुत पंक्ति है जो अपने साथ साथ चलने वाली पीड़ा का बयान भी करती है और फ़िर नियति को भी स्वीकारने की चनौती भी देती है और इस सबके बाद हम फ़िर भी दोनों साथ लेकर चलते है क्योकि जीना तो हर हाल में है ही ना..........बस यात्रा और पानी दोनों का दर्द साथ लेकर.......................
Avinash Mishra बस यात्रा और पानी दोनों का दर्द साथ लेकर.......................क्या कहने....

मनोज पटेल के कुछ अनुवादों के कोट्स

1. कविताएँ लिखते हुए,
हथेली पर चीरा लग गया कागज़ से.
तकरीबन एक-चौथाई बढ़ा दी इस चीरे ने
मेरी जीवन रेखा. (वेरा पावलोवा)

2. मेरी किस्मत जहाजरानी के कारखाने में नहीं बनी
फिर भी मैनें समुन्दर के फासले तय किए. (अफजाल अहमद सैयद)

3. क्या सच में तरल थीं सभी धातुएं पहले ?
तो क्या गर खरीदी होती कार हमने कुछ पहले
दिया होता उन्होंने इसे एक कप में हमें ? (नाओमी शिहाब न्ये)

4. तुम्हारे आने से पहले
गद्द्य थी दुनिया
कविता तो अब हुई है पैदा. (निज़ार कब्बानी)

5. कालीन पर तुम्हारे पाँव
नाक-नक्श हैं
कविता के. (निज़ार कब्बानी)

6. मैं मशहूर होना चाहती हूँ वैसे ही
जैसे मशहूर होती है गरारी,
या एक काज बटन का,
इसलिए नहीं कि इन्होनें कर दिया कोई बड़ा काम,
बल्कि इसलिए कि वे कभी नहीं चूके उससे
जो वे कर सकते थे. (नाओमी शिहाब न्ये)

7. कौन देगा दिलासा मेरी माँ को
फिर रोएगा चुपके-चुपके कौन अगर मर गई मैं
और अगर कहीं मर गई मैं चटपट
तुम्हारे दिल से कौन जुदा करेगा मेरा दिल ? (लीना तिबी)

8. आदमी के ऊंचे उठे सर को
सहारा देने की खातिर
हमें तलाश है
एक रीढ़ की हड्डी की
जो रह सके
सीधी. (मिरोस्लाव होलुब)

9. ऎसी ही तो है ज़िंदगी
सात बार गिरना
और उठना आठ बार. (रोलाँ बार्थ की 'ए लवर्स डिस्कोर्स' से)

10. जब गुजर जाती है कोई खूबसूरत स्त्री
पृथ्वी खो देती है संतुलन अपना
सौ साल के मातम का एलान करता है चंद्रमा
और बेरोजगार हो जाती है कविता (निज़ार कब्बानी)

11. मैनें बीस पंक्तियाँ लिखीं प्रेम के बारे में
और कल्पना किया कि
यह घेरेबंदी
बीस मीटर पीछे हट गई है. (महमूद दरवेश)

12. मैंने अपनी पीठ पर लादा था अपने कामरेड को.
और उसे अपने नीचे मेरी झुकी हुई पीठ
ग्लोब के उभरे हुए हिस्से जैसी लगती है. (येहूदा आमिखाई)

13. रेत, मैं तुम्हें मुबारकबाद देता हूँ.
सिर्फ तुम ही ढाल सकती हो
पानी और मरीचिका को
एक ही प्याले में. (अडोनिस)

14. अगर जैतून के पेड़ जानते होते उन हाथों को
जिन्होनें उन्हें रोपा था
उनके तेल आंसुओं में बदल गए होते. (महमूद दरवेश)


15. अगर लौट सकूं शुरूआत तक
कुछ कम अक्षर चुनूंगा अपने नाम के लिए. (महमूद दरवेश)

Thursday, December 22, 2011

हम जो अभिशापित हैं.
हारी हुई लड़ाइयों के साथ खड़े होने को..
हम जूलियस फ्यूचिक हैं..
आखिरी जंग में आखिरी बचे दुश्मन
की आखिरी गोली
अपने सीने के नाम दर्ज करने को तैयार
जीत के पहले मर जाना बुरा तो है..
पर जरूरी भी..
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मै नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैं हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चलें
दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे

-विनोद शुक्ल- वागर्थ जुलाई -०७ अंक १४४

Monday, December 19, 2011

देखना असल में देख पाना होता तो हम सच में सच देख पाते, पर हम जो देखते है वो सिर्फ देखना ही होता है देखना दिखाना तो कतई नहीं ...फ़िर देखना क्या है ...........???
“Everything tells me that I am about to make a wrong decision, but making mistakes is just part of life. What does the world want of me? Does it want me to take no risks, to go back to where I came from because I didn't have the courage to say "yes" to life?”
― Paulo Coelho

मन की गाँठे

ये कोहरे की एक शाम है सूरज बहुत लजाते हुए दिन भर कुछ ना दे पाने की खता और अपराध बोध में अभी अभी छुपा है, हवाएं अभी भी झूम रही है मानो पुरे वेग से सबको निचोड़ देंगी और फ़िर कोहराम मचाकर दम ले लेंगी, धूप मानो अपना चरित्र ही भूल गयी, दूर तक साय साय है, बेहद घना कोहरा है कही दूर से कोई गुजरता है तो भक् से गाड़ी का तेज बिखर जाता है और फ़िर एक सन्नाटा पसर जाता है कोई नजर नहीं आता इस प्रहर में.......जीवन जैसा हो रहा है यह समय, बिलकुल कुछ समझ नहीं आ रहा, बस आवाजों का शोर है और एक फीट तक भी देख नहीं पा रहा हूँ ना समय को, ना अपने आपको, ना सुन पा रहा हूँ पदचाप को और ना कुछ सूझ रहा है.......यह कैसा समय है यह कैसा चक्र है.... हर तरफ कोहरा है और कही से कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं आती, कही से यह कोहरा छंटता नजर नहीं आता......क्या लिखा है और क्या होगा बेहद मायूसी है(मन की गाँठे)
जीवन की इस आपाधापी में इतना पा लिया है कि अब कुछ पाने की इच्छा खत्म हो गयी है बस एक बात सीखी है कि अब किसी बात का पश्चाताप नहीं है जो भी किया है, जो भी कहा, जो भी लिखा, सोचा समझा, गुना, बुना और उसका कोई मलाल नहीं है अब................बस सब कुछ खत्म, सब कुछ ...............जीवन में पश्चाताप करना / रखना कोई हल नहीं है बस जो किया,जैसा किया, ठीक था............समय की मांग थी, परिस्थितियाँ वैसी थी और हालात उन सब के बीच वैसे ही थे जैसे थे बस वो किया जो उचित लगा .......अब कोई पछतावा नहीं है............(एडन बायफ का एक फ्रेंच गीत सुनकर)

प्रशासन पुराण 38

राजधानी से आया बड़ा अधिकारी था जब सारे काम निपट गए थ्री जिले की थ्री स्टार होटल में तो स्थानीय कार्यालय वाले को बुला लिया और दफ्तर पहुंचा, पूछने लगा कितने का स्टाफ है? जी बारह लोग है दस यहाँ है और दो ब्लोक में है, ब्लोक में कौन है, जी एक मेडम है और एक पुरुष है, अच्छा मेडम कौन है और वो ब्लोक में क्यों है उसे जिले में लाओ भाई , जी असल में उनकी अभी शादी नहीं हुई है...... अरे वाह फ़िर तो बताओ वहा का निरीक्षण करवाओ कभी, बल्कि अगले हफ्ते ही प्लान कर लों. जी साहब. अरे यहाँ टाँगे चलते है? जी.......तो आप क्या कर रहे है टाँगे वालो के लिए कोई हितग्राही मूलक योजना है? जी अभी तो नहीं है बनाते है......अरे हाँ ये रेलवे के ट्रेक तकलीफ देते है आज मेरी गाड़ी दो बार रुक गयी क्रोसिंग पर भाई सांसदों और विधायको को कहो कि वे जनभागीदारी से अंडरब्रिज बनवाएं. जी साब,छोटा अधिकारी बोल रहा था....और हाँ वो ब्लोक में कब चलना है.....क्या नाम है उस मेडम का......शादी क्यों नहीं की अभी तक..... जी पता नहीं .....सर वो विभाग को कुछ सामग्री चाहिए थी......हाँ हाँ टाँगे वालो के लिए कुछ योजना बनाओ फ़िर दे देंगे भाई...और वो ब्लोक का प्लान करो....जी.....हाँ ये सेवफल बड़ी खराब सी बदबू देते है जैसे कोई सदियों का बीमार हो.... जी साहब.....तो बिस्कुट कहा है? जी वो है ना अरे जुगतराम लाओ भाई बिस्कुट लाओ......और ये टाँगे वालो का क्या करना है इन्हें विधायक निधि से या स्वेच्छानुदान से कुछ नहीं करवा सकते क्या....... छोटा साहब परेशान था जी साहब.....देखता हूँ......(प्रशासन पुराण 38)

गरम रोटी की महक पागल बना देती मुझे- दयानंद पाण्डेय

अदम गोंडवी आज सुबह क्या गए लगता है हिंदी कविता की सुबह का अवसान हो गया।हिंदी कविता में नकली उजाला, नकली अंधेरा, बिंब, प्रतीक, फूल, पत्ती, चिडिया, गौरैया, प्रकृति, पहाड आदि देखने- बटोरने और बेचने वाले तो तमाम मिल जाएंगे पर वह मटमैली दुनिया की बातें बेलागी और बेबाकी के साथ करने वाले अदम को अब कहां पाएंगे? कबीर सा वह बांकपन, धूमिल सा वह मुहावरा, और दुष्यंत सा वह टटकापन सब कुछ एक साथ वह सहेजते थे और लिखते थे – गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे/पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें। अब कौन लिखेगा- जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे/ कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे। या फिर काजू भुनी प्लेट मे ह्विस्की गिलास में/ उतरा है रामराज विधायक निवास में। या फिर, जितने हरामखोर थे कुर्बो-जवार में/ परधान बन के आ गए अगली कतार में।
गुज़रे सोमवार जब वह आए तभी उन की हालत देख कर अंदाज़ा हो गया था कि बचना उन का नमुमकिन है। तो भी इतनी जल्दी गुज़र जाएंगे हमारे बीच से वह यह अंदाज़ा नहीं था।वह तो कहते थे यूं समझिए द्रौपदी की चीर है मेरी गज़ल में। और जो वह एशियाई हुस्न की तसवीर लिए अपनी गज़लों में घूमते थे और कहते थे कि, आप आएं तो कभी गांव की चौपालों में/ मैं रहूं न रहूं भूख मेज़बां होगी। और जिस सादगी से, जिस बुलंदी और जिस टटकेपन के ताव में कहते थे, जिस निश्छलता और जिस अबोधपन को जीते थे कविता और जीवन दोनों में अब वह दुर्लभ है। तुम्हारी फ़ाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है/ मगर ये आंकडे झूठे हैं ये दावा किताबी है। या फिर ज़ुल्फ़-अंगडाई-तबस्सुम-चांद-आइना-गुलाब/भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इन का शबाब। उनके शेरों की ताकत देखिए और फिर उनकी सादगी भी। देखता हूं कि लोग दू ठो कविता, दू ठो कहानी या अलोचना लिख कर जिस अहंकार के सागर में कूद जाते हैं और फ़तवेबाज़ी में महारत हासिल कर लेते हैं इस बेशर्मी से कि पूछिए मत देख कर उबकाई आती है। पर अदम इस सब से कोसों दूर ठेंठ गंवई अंदाज़ में धोती खुंटियाये ऐसे खडे हो जाते थे कि उन पर प्यार आ जाता था। मन आदर और श्रद्धा से भर जाता था। और वो जो शमशेर कहते थे कि बात बोलेगी/ हम नहीं/ भेद खोलेगी आप ही को साकार करते जब उन की गज़लें बोलती थी और प्याज की परत दर परत भेद खोलती थीं, व्यवस्था और समाज की तो लोग विभोर हो जाते थे। हम जैसे लोग न्यौछावर हो जाते थे। अदम मोटा पहनते ज़रुर थे पर बात बहुत महीन करते थे। उन के शेर जैसे व्यवस्था और समाज के खोखलेपन और दोहरेपन पर तेज़ाब डालते थे। वह उन में से नहीं थे कि कांख भी छुपी रहे और मुट्ठी भी तनी रहे। वह तो जब मुट्ठी तानते थे तो उन की कांख भी दीखती ही थी। वह वैसे ही नहीं कहते थे कि – वर्गे-गुल की शक्ल में शमशीर है मेरी गज़ल। तो गज़ल को जामो मीना से निकाल कर शमशीर की शक्ल देना और कहीं उस पर पूरी धार चढा कर पूरी ताकत से वार भी करना किसी को जो सीखना हो तो अदम से सीखे। हां वह व्यवस्था से अब इतना उकता गए थे कि उन की गज़लों में भूख और लाचारी के साथ साथ नक्सलवाद की पैरवी भी खुले आम थी। उन का एक शेर है- ये नई पीढी पे मबनी है वही जजमेंट दे/ फ़लसफ़ा गांधी का मौजू है के नक्सलवाद है। वह यहीं नहीं रुके और लिख गए कि -लगी है होड सी देखो अमीरों और गरीबों में/ ये गांधीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है/ तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के/ यहां जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है।
अदम के पास अगर कुछ था तो बेबाक गज़लों की जागीर ही थी। और वही जागीर वह हम सब के लिए छोड गए हैं। और बता गए हैं कि - घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है/ बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है। वह तो बता गए हैं – भीख का ले कर कटोरा चांद पर जाने की ज़िद / ये अदा ये बांकपन ये लंतरानी देखिए/ मुल्क जाए भाड में इससे इन्हें मतलब नहीं/ कुर्सी से चिपटे हुए हैं जांफ़िसानी देखिए। वह बताते भी थे कि अदम के साथ गमों की बरात होती है। तो लोग ज़रा नहीं पूरा बिदक जाते थे। घुटनों तक धोती उठाए वह निपट किसान लगते भी थे। पर जब कवि सम्मेलनों में वह ठेंठ गंवई अंदाज़ में खडे होते थे तो वो जो कहते हैं कि कवि सम्मेलन हो या मुशायरा लूट ले जाते थे। पर यह एक स्थिति थी। ज़मीनी हकीकत एक और थी कि कवि सम्मेलनों और मुशायरों में उन्हें वाहवाही भले सब से ज़्यादा मिलती थी, मानदेय कहिए, पारिश्रमिक कहिए उन्हें सब से कम मिलता था। लतीफ़ेबाज़ और गलेबाज़ हज़ारों में लेते थे पर अदम को कुछ सौ या मार्गव्यय ही नसीब होता था। वह कभी किसी से इस की शिकायत भी नहीं करते थे। रोड्वेज की बस या रेलगाडी के जनरल डब्बे में सवारी बन कर चलना उन की आदत थी। वह आम आदमी की बात सिर्फ़ कहते भर नहीं, आम आदमी बन कर रहते जीते भी थे। उन के पांव की बिवाइयां इस बात की बराबर चुगली भी खाती थीं। वह वैसे ही नहीं लिख गए कि, भूख के अहसास को शेरो सुखन तक ले चलो/ या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो/ जो गज़ल माशूक के जलवों से वाकिफ़ हो गई/ उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो। और वह बेवा की माथे की शिकन से और आगे भी गज़ल को ले भी आए इस बात का हिंदी जगत को फख्र होना चाहिए। उन की शुरुआत ही हुई थी चमारों की गली से। कि, आइए, महसूस करिए ज़िंदगी के ताप को/ मैं चमारो की गली तक ले चलूंगा आप को। इसी कविता ने अदम को पहचान दी फिर काजू भुनी प्लेट में ह्विस्की गिलास में/ उतरा है रामराज विधायक निवास में शेर ने उन्हें दुनिया भर में परिचित करवा दिया। उन की तूती बोलने लगी। फिर तो वह हिंदी गज़ल की मुकम्मल पहचान बन गए। उर्दू वालों ने भी उन्हें सिर माथे बिठाया और उन की तुलना मज़ाज़ से होने लगी। समय से मुठभेड नाम से जब उन का संग्रह आया तो सोचिए कि कैफ़ भोपाली ने लंबी भूमिका हिंदी में लिखी और उन्हें फ़िराक, जोश और मज़ाज़ के बराबर बिठाया। हिंदी और उर्दू दोनों में उन के कद्रदान बहुतेरे हो गए।
तो भी अदम असल में खेमे और खाने में भी कभी नहीं रहे। लोग लोकप्रिय होते हैं वह जनप्रिय थे, जनवाद की गज़ल गुनगुनाने और जनवाद ही को जीने ओढने और बिछाने वाले। यह अनायास नहीं था कि उन के पास इलाज के लिए न पैसे थे न लोगबाग। कभी मुलायम सिंह के जन्म दिन पर आयोजित होने वाले कवि सम् के साथ साथ मुलायम भी उन की सादी और बेबाक गज़लों पर रीझ जाते थे। तो मुलायम उन्हें भूले नहीं। अब की जब वह बीमार पडे तो न सिर्फ़ सब से पहले उन्हों ने इलाज खर्च के लिए हाथ बढाया बल्कि आज सुबह जब पांच बजे उन के निधन की खबर आई तो आठ बजे ही मुलायम सिंह पी जी आई पहुंच भी गए।बसपा की रैली की झंझट के बावजूद। न सिर्फ़ पहुंचे उन का पार्थिव शरीर गोंडा में उन के पैतृक गांव भिजवाने के लिए सारा प्रबंध भी करवाया। लखनऊ से गोंडा तक रास्ते भर लोगों ने उन का पार्थिव शरीर रोक रोक कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। लखनऊ में भी बहुतेरे लेखक और संस्कृतिकर्मियों समाजसेवियों ने उन्हें पालिटेक्निक चौराहे पर श्रद्धांजलि दी। उन के एक भतीजे को पानीपत से आना है। सो अंत्येष्टि कल होगी।
अदम अब नहीं हैं पर कर्जे में डूब कर गए हैं। तीन लाख से अधिक का कर्ज़ है।किसान सोसाइटी से डेढ लाख लिए थे अब सूद लग कर तीन लाख हो गए हैं। रिकवरी को ले कर उन के साथ बदतमीजी हो चुकी है। ज़मीन उन के गांव के दबंगों ने दबा रखी है। है कोई उन के जाने के बाद भी उन के परिवारीजनों को इस सब से मुक्ति दिलाने वाला? एक बात और। अदम गोंडवी का निधन लीवर सिरोसिस से हुआ है। यह सभी जानते हैं। पर यह लीवर सीरोसिस उन्हें कैसे हुई कम लोग जानते हैं। वह ट्रेन से दिल्ली से आ रहे थे कि रास्ते में उन के साथ जहर खुरानी हो गई। वह होश में तो आए पर लीवर डैमेज कर के। जाने क्या चीज़ जहरखुरानों ने उन्हें खिला दी। पर अब जब वह बीमार हो कर आए तो उन की मयकशी ही चरचा में रही। यह भी खेदजनक था। उन के ही एक मिसरे में कहूं तो आंख पर पट्टी रहे और अक्ल पर ताला रहे। तो कोई कुछ भी नहीं कर सकता। उन के एक शेर में ही बात खत्म करुं कि, एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए/ चार छै चमचे रहें माइक रहे माला रहे। अब यह बात हर हलके में शुमार है अदम गोंडवी, यह भी आप जान कर ही गए होंगे। पर क्या कीजिएगा भारत भूषण का एक गीत है कि ये असंगति ज़िंदगी के साथ बार बार रोई/ चाह में और कोई/ बांह में और कोई! तो अदम के पास गज़लें थीं, शोहरत थी पर दौलत नहीं थी। उन का जीवन कुछ इस तरह बीता कि इक हाथ में कलम है और एक हाथ में कुदाल/ वाबस्ता हैं ज़मीन से सपने अदीब के। आमीन अदम गोंडवी, एक बार फिर आमीन ! हां गीतों की राजकुमार भारत भूषण का भी कल रात मेरठ के एक अस्पताल में निधन हो गया। इन दोनों रचनाकारों को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि !

अदम गोंडवी की ग़ज़लें





अदम गोंडवी की ग़ज़लें............हिन्दुस्तान ने एक शायर ही नहीं खोया बल्कि एक मुकम्मिल इंसान खो दिया है जो लोगो से लोगो की बात कराता था.............और बस इसी तरह से लड़ते भिडते और मौत से भी जीत गया वो........किसी से मदद की गुहार नहीं लगाई और किसी का मोहताज भी नहीं रहा धन्य है ऐसे अदम गोंडवी और धन्य है उनकी धारदार लेखनी.........नमन.........

काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास मे
उतरा है रामराज विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में

पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

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मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की

आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की

यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी
ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की?

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की

याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार
होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की.

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वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

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हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये

हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये

हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये

छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये

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जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में
गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गयी
राम सुधि की झोपड़ी सरपंच की चौपाल में

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए
हम को पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में

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तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है

लगी है होड़-सी देखो अमीरी औ गरीबी में
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है

तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

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वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करें

लोकरंजन हो जहां शम्बूक-वध की आड़ में
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें

कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्या करें

बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है
ठूंठ में भी सेक्स का एहसास लेकर क्या करें

गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें

Sunday, December 18, 2011

श्रद्धांजलि अदम साहब को









काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में,
उतरा है रामराज विधायक निवास में!
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत,
इतना असर है खादी के उजले लिबास में!!

जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे

ये बन्दे-मातरम का गीत गाते हैं सुबह उठकर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे

सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे
वो अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे

(अदम गोंडवी जी को विनम्र श्रृद्धांजलि।)

Thursday, December 15, 2011

Yeh Hosla Kaise Juke,
Yeh Aarzoo Kaise Ruke - 2

Manzil Muskil to kya,
Bundla Sahil to kya,
Tanha Ye Dil to Kya
Ho Hooo

Raah Pe Kante Bikhre agar,
Uspe to phir bhi chalna hi hai,
Saam Chhupale Suraj magar,
Raat ko ek din Dhalana hi hai,

Rut ye tal jayegi,
Himmat rang layegi,
Subha phir aayegi
Hoooo

Yeh Hosla Kaise Juke,
Yeh Aarzoo Kaise Ruke - 2

Hogi hame to rehmat ada,
Dhup kategi saaye tale,
Apni khuda se hai ye Dua,
Manzil lagale humko gale

Zurrat so baar rahe,
Uncha Ikraar rahe,
Zinda har pyar rahe
Hoooo

Yeh Hosla Kaise Juke,
Yeh Aarzoo Kaise Ruke

वह नहीं यह होने के अर्थ पर विचार करता रहता हूँ

"यह जो मैं लिखता रहता था, अचानक लगा, हास्यास्पद था। मैं शब्द नहीं पा सका। मैंने संसार को देखा विशालकाय, स्पंदित, पत्थर के जंगले पर अपनी कुहनियाँ टिकाये हुए। नदियाँ बहती रहीं, पाल बादल को चीरता रहा,
सूर्यास्त गश खा गये।"
- चेस्लाव मीलोष।

और अक्सर बारम्बार
अपनी बुझती हुई सिगरेट के साथ
लाल मदिरा पीते हुए
वह नहीं यह होने के अर्थ पर विचार करता रहता हूँ
.....
-मिवोश (अनु: चंद्रकांत देवताले)


Wednesday, December 14, 2011

प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है।
नये परिदों को उडने में वक्त तो लगता है।
जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था ।
लम्बी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है।
प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है।
गाठं अगर लग जाय तो फ़िर रिशते हो या दूरी
लाख करे कोशिश खुलने में वक्त तो लगता है।
प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है।
नये परिदों को उडने में वक्त तो लगता है।
हमने इलाजे जख्में दिल में ढूंढ लिया लेकिन
गहरे जख्मों को भरने मे वक्त तो लगता है।
प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है।
नये परिदों को उडने में वक्त तो लगता है।

Saturday, December 10, 2011

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिये
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्यों बच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं।

गोरख पाण्डेय

Friday, December 9, 2011

Satya Patel की जय हो......

बांदा के बुद्धिजीवियों कलाप्रेमियो ने शबरी नाम से एक संस्था का गठन
किया है. यह समिति साहित्य, संस्कृति,समाज व राजनीति में जनता के गरीब व
वंचित हिस्सों की दावेदारी और संघर्षो का बढ़ावा देने का काम करती है.यह
समिति खास तौर पर ग्रामीण इलाको में रहने वाले खेती-किसानी व मजदूरी पर
निर्भर जनसमुदाय के बीच लोकतान्त्रिक समतामूलक धर्मनिरपेक्ष समाज के
निर्णय के लिए प्रयासरत व्यक्तियों व समूहों के साथ अंतर्क्रिया का मंच
प्रदान करती है.यह समिति महिलाओ बाल श्रमिको और वरिष्ट नागरिको के प्रति
होने वाले अन्यायों का प्रतिकार और उनके स्वाभिमान पूर्वक जीने के लिए
वाजिब संघर्षो का समर्थन करती है.यह समिति प्रतिवर्ष महान कथाकार
प्रेमचंद की स्मृति में कथा लेखन के लिए रूपए 15000/ का प्रतिवर्ष सम्मान
देती है. यह समिति अपने उपरोक्त अभियान के लिए किसी तरह की कोई सरकारी मदद
नहीं लेती है. प्रतिवर्ष समिति अपनी स्थानीय जनता की मदद से ही सारे
आयोजन करती है. इस वर्ष यह पुरस्कार इंदौर के युवा कथाकार सत्यनारायण पटेल को दिया गया है, बधाई हो सत्तू महाराज तुम्हे भी और तुम्हारे कहानी संग्रह "लाल छींट वाले लुगडी का सपना " को भी जिसकी बदौलत तुम्हे यह पुरस्कार मिला वाह रे मालवा की माटी के शेर.....!!!!!!Satya Patel की जय हो......

Monday, December 5, 2011