Friday, April 30, 2010

दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ

यूँही ही हमेशा जुल्म से उलझती रही है खल्क( जनता)
न उनकी रस्म नयी है न अपनी रीत नयी
यूँही हमेशा खिलाये है हमने आग में फूल
न उनकी हार नयी है न अपनी जीत नयी
फैज़ अहमद फैज़

Sunday, April 25, 2010

अम्बर की एक और कविता......

दो नदियाँ: लखुंदर और महानदी
लखुंदर


नदी में दोलते है सहस्रों सूर्य,

स्वच्छ दर्पण झिलमिला रहा हैं.

मुख न देख

पाओगी तुम स्नान के पश्चात्,
छांह ज्यों ही पड़ेगी
सूर्य का चपल बिम्ब घंघोल
देगा आकृति,
पुतलियाँ ही दिखेंगी तैरती मछलियों सी,

इस वर्ष वर्षा बहुत हुई है इसलिए

अब तक ऊपर ऊपर तक भरी है नदी.

पूछता हूँ

'नदी का नाम लखुंदर कैसे
पड़ गया?'
युवा नाविक बता नहीं पाता
'लखुंदर' का तत्सम रूप
क्या होगा...

नांव हो जाती है

तब तक पार
दिखती हैं मंदिर की ध्वजा

अगली बार

'नहाऊंगा नदी में' करते हुए संकल्प
चढ़ता हूँ सीढियां.

पीछे जल बुलाता हैं.



महानदी


मध्यदेश का सीना

ताम्बई, स्थूल व रोमिल. पड़ी
है महानदी उस पर,
पहनकर वनों की मेखला
घिसे रजत की श्याम

द्रोण के सूती नीलाम्बर से

ढंके देह मेदस्वी,
बाट जोह रही सूर्ज की.

मछलियाँ पेट में कर

रही है निरंतर उत्पात. दिनों
से मछुआरों का दल
नहीं आया. उदबिलावों
का झुण्ड ही उदरस्थ
करता हैं शैतान मछलियाँ पर
यह तो सहस्र हैं. अब
सहन न होती यह चपलता.

कब आएँगी यहाँ

घनचुम्बी पालों वाली नांवें,
डालेंगी जाल, तब
आराम से सोऊँगी मैं.

कीच में गिरी गेंद

सी मैली और बैचैन महानदी
पार की छत्तीसगढ़
में, जाता था जब बंगाल.

Thursday, April 22, 2010

अम्बर पांडे की बेहतरीन कविता

अम्बर पांडे मेरे अच्छे दोस्तों में शरीक है और मेरी साहित्यिक भाषा में कहू तो अम्बर मेरा भावनात्मक संबल है जिसे अंग्रेजी में Emotional Anchor कहते है उसकी मेधा का में कायल हूँ और जो समझ उसकी कविता को लेकर है वो अप्रतिम है में हमेशा अम्बर से कहता हूँ कि मेरा सब कुछ ले लो और अपनी कविताये मेरे नाम कर दो और बस मुस्कुराकर कहता है कि आप भी न...... बस.............

कविता

दारिद्र और विद्या
{हमारे संस्कृत के गुरु बिंदुमाधव मिश्र की बातें , जिसे मैंने कविता मे बांध लिया है.}

तम्बाकू निगल लिया हो भैया जैसे
अपना जीवन बस
ऐसे ही बीत गया.

साल दो साल जो और है
ऐसे ही निबट जायेंगे वह भी.
दो जून का चून
लकड़ी-कपडा-तेल-नून
बखत पर मिल गए
अपने लिए पर्व हो गया.

कितना कुछ करने को रह गया
जीवन जुटाने मे ही लग गया
जीने के उपकरण
हजार किये खटकरम

कट गयी जैसी कटनी थी
तुम बताओ

क्या क्या पढ़ रहे हो?
उससे भी बढ़कर
लिख क्या रहे हो बन्धु आजकल

और यह क्या
इतने दुबलाते क्यों जा रहे हो
काठ जैसे दिख रहे है हाथ

जरा दही-दूध पिया करो
घी खाओ
में तो नहीं हो पाया तुम्हारा
चक्रपाणि ब्रह्मचारी
मगर तुम्हे मेरा महापंडित जरूर बनना है.

बोलो बनोगे की नहीं
हड्डियाँ अपनी मजबूत करो
देखो कितनी भूमि कितना विस्तार
पड़ा है
जहाँ आदमी के पैरों की नहीं है छाप.

{ चक्रपाणि ब्रह्मचारी-महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन की आत्मकथा 'मेरी जीवन यात्रा' के एक पात्र है.}

Wednesday, April 21, 2010

खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर/
दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बग़ैर।
मैं क्यूँकर कहूँ तुम आओ कि दिल की कशिश से
वो आयेँगे दौड़े आप मेरे घर कहे बग़ैर।
क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बग़ैर।
बेदर्द तू सुने न सुने लेकिन ये दर्द-ए-दिल
रहता नहीं है आशिक़-ए-मुज़तर कहे बग़ैर।
तकदीर के सिवा नहीं मिलता कहीं से भी दिलवाता ऐ "ज़फ़र" है मुक़द्दर कहे बग़ैर।
- बहादुर शाह ज़फ़र




Tuesday, April 13, 2010

सारा लोहा उन लोगो का अपनी केवल धार ........

कुछ लोगों ने अपनी धार तेज करना शुरु किया।

इतनी धार लगाई कि बस धार ही रह गई,

लोहा खत्म हो गया...

अब अपनी केवल धार लेकर एक-दूसरे से ही लोहा ले रहे हैं...।’

सतपुड़ा के घने जंगल.....


बचपन में पढ़ी एक खुबसूरत कविता मयूर दुबे के सौजन्य से .........
"सतपुड़ा के घने जंगल।
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

झाड ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।

सड़े पत्ते, गले पत्ते,
हरे पत्ते, जले पत्ते,
वन्य पथ को ढँक रहे-से
पंक-दल मे पले पत्ते।
चलो इन पर चल सको तो,
दलो इनको दल सको तो,
ये घिनोने, घने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

अटपटी-उलझी लताऐं,
डालियों को खींच खाऐं,
पैर को पकड़ें अचानक,
प्राण को कस लें कपाऐं।
सांप सी काली लताऐं
बला की पाली लताऐं
लताओं के बने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

मकड़ियों के जाल मुँह पर,
और सर के बाल मुँह पर
मच्छरों के दंश वाले,
दाग काले-लाल मुँह पर,
वात- झन्झा वहन करते,
चलो इतना सहन करते,
कष्ट से ये सने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल|

अजगरों से भरे जंगल।
अगम, गति से परे जंगल
सात-सात पहाड़ वाले,
बड़े छोटे झाड़ वाले,
शेर वाले बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,
कम्प से कनकने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

इन वनों के खूब भीतर,
चार मुर्गे, चार तीतर
पाल कर निश्चिन्त बैठे,
विजनवन के बीच बैठे,
झोंपडी पर फ़ूंस डाले
गोंड तगड़े और काले।
जब कि होली पास आती,
सरसराती घास गाती,
और महुए से लपकती,
मत्त करती बास आती,
गूंज उठते ढोल इनके,
गीत इनके, बोल इनके

सतपुड़ा के घने जंगल
नींद मे डूबे हुए से
उँघते अनमने जंगल।

जागते अँगड़ाइयों में,
खोह-खड्डों खाइयों में,
घास पागल, कास पागल,
शाल और पलाश पागल,
लता पागल, वात पागल,
डाल पागल, पात पागल
मत्त मुर्गे और तीतर,
इन वनों के खूब भीतर।
क्षितिज तक फ़ैला हुआ सा,
मृत्यु तक मैला हुआ सा,
क्षुब्ध, काली लहर वाला
मथित, उत्थित जहर वाला,
मेरु वाला, शेष वाला
शम्भु और सुरेश वाला
एक सागर जानते हो,
उसे कैसा मानते हो?
ठीक वैसे घने जंगल,
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल|

धँसो इनमें डर नहीं है,
मौत का यह घर नहीं है,
उतर कर बहते अनेकों,
कल-कथा कहते अनेकों,
नदी, निर्झर और नाले,
इन वनों ने गोद पाले।
लाख पंछी सौ हिरन-दल,
चाँद के कितने किरन दल,
झूमते बन-फ़ूल, फ़लियाँ,
खिल रहीं अज्ञात कलियाँ,
हरित दूर्वा, रक्त किसलय,
पूत, पावन, पूर्ण रसमय
सतपुड़ा के घने जंगल,
लताओं के बने जंगल।

- भवानी प्रसाद मिश्र

Wednesday, April 7, 2010

देवास के नर्मदा नायक और देवास में पानी के लिए मरते खलनायक






नईम जी की स्मृति में उस दिन कार्यक्रम था हम दोपहर को नईम जी घर से भोजन कर लौट रहे थे अचानक महेश्वर ने कहा कि वो क्या है ...... मैंने बहादुर को कहा कि भाई गाड़ी रोको फिर महेश्वर और ओम प्रभाकर को भी गाड़ी से उतरने को कहा फिर उन्हें ये अद्भुत दृश्य दिखाया
देवास में पानी कि समस्या नई नहीं है ये वही मालवा का शहर है जहाँ "डग डग रोटी -पग पग नीर " की बात खून में डाली जाती है पर पानी तो खत्म हो गया है
आज मेरे शहर में हर १२ दिनों में पानी आता है कितने ही नेता जीत गए हम सब को उल्लू बनाकर पर पानी नहीं आया हाँ अब रोज़ झगड़े होने लगे है खून हो जाते है पर हमारे नर्मदा नायको और नायिकाओ को कोई फर्क नहीं पड़ता ॥
महेश्वर ये देखकर विचलित हो गए पर क्या कोई हमारे शहर का बाशिंदा इस पीड़ा को समझेगा??? अब तो इतना भी पानी नहीं की इन्हें कहू कि डूब मरो चुल्लू भर पानी में ...........

मधुशाला और विकास -गन्ना, राजनीति और शोषण





उस दिन शनि शिन्गानापुर में जाते हुए हम सब लोगो को गन्ना देखकर मधुशाला की याद आ गई, माफ़ कीजिये बच्चन वाली नहीं, गन्ने के रस वाली-- हमारे मालवे में गर्मियों की छुट्टियों में जगह- जगह मधुशालाएँ खुल जाती है और पार्को के आसपास तो विशेष रूप से ये अक्सर माहौल बना देती है । उस दिन हमने जी भरकर रस पिया खूब ताज़ा रस निम्बू वाला और बस अदरक की कमी अखर रही थी । सजह ही मैंने पूछा की गन्ना अबकी बार तो बहुत है तो अनिल बोला, जो रस बेच रहा था, कहने लगा कि "साहब फिर भी तीन हज़ार प्रति टन है , मैं हर दिन तीस गिलास बेच पाता हूँ , मैंने देखा कि जिस अंदाज़ में भीड़ बढ़ रही थी उसे देखकर नहीं लग रह था कि वो सिर्फ तीस गिलास बेच पाता होगा ........ मेरे सामने ही कम से कम ७० गिलास बेच चूका था फिर मैंने तस्वीरें खींचना चाहा तो अपने नौकर को आगे कर दिया कहने लगा कि में अनजान लोगो को तस्वीरें नहीं देता फिर मैंने देखा कि वो अपनी दुकान पर बाल मजदूरो से काम करवा रह है और किसानो को भी ठग रहा है फिर लगा कि वो भी ठीक सरकार की तरह किसानो का जानी दुश्मन है, वो मूक बधिर बैल का भी शोषण कर रहा था, बस अच्छी बात यह थी कि उसकी मशीन बिजली से नहीं चल रही थी- हाँ पैसा ज़रूर उगल रही थी गन्ने से और महंगे नारियल पानी से। सारे रास्ते भर हम गन्ने की चर्खियाँ देखते रहे और मैं सोचता रहा की कैसे अपने ही लोग अपनों को शोषित करते है और किसान मर रहे है.......... रोज़ रोज़ दुष्चक्र में.......किसको चिंता है अपुन तो रस पियो पैसा फेंको और आगे बढ़ो भाड़ में जाये किसान reliance world में सब मिल जाता है.......गेहू चना साफ सुथरा और बढ़िया पाकेट में
कहा है बाल ठाकरे जी और महाराष्ट्र के महा नेता लोग...... किसानो के बड़े बड़े विदर्भी नेता ...........
जय महाराष्ट्र का नारा बुलंद करने वाले .....अम्बेडकर की मूर्तिया लगाने वाली पैंथर पार्टियाँ और नक्सलवादी कामरेड साथी..............

पकज की कविता

"संदीप भाई, अपनी ही एक कविता आपकी नजर-


नए शहर के अनजान माहौल में


हमें याद नहीं करना पड़ता,


बरबस ताजा हो उठता है


अपना गाँव, कोई मित्र ।


खाना खाते-खाते


माँ याद हो आती है


जैसे गाड़ी बिगड़ने पर


याद आ जाता है पुराना मिस्त्री ।


उदास होने पर


साहस दे जाती हैं वे बातें,


जो कही थीं सबने, बरसों पहले


घर से निकलते वक्त ।


जीवन में जब भी


मिलती है खुशी


पुराने साथी ही याद आते हैं


पहले-पहल ।
"

पंकज शुक्ला, नईदुनिया की टीम से , मेरा फेस बुक पर कमेन्ट पढ़कर

Sula Vineyards, Nashik and 22 Wonderful Wine Bottles









Recently I had been to Nashik and visited Sula Vineyards. We were taken to a round of the factory and we saw how the wonderful wine is prepared. Akshay and Gaurav were the persons who fascinated us with their in depth knowledge about the wines. We were also offered six types of Premium Wines.......had wonderful tastes of wines and lovely snacks at the time of Sun Set....
I brought 22 Bottles of Wines for me and entire Friend Circle.....
Here are the pics of Wine factory........
So guys come and Cheers!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
जिंदगी जब भी तेरे बज़्म में लाती है हमें
ये ज़मीं चाँद से भी बेहतर नज़र आती है हमें ...........


Tuesday, April 6, 2010

अनीता और नितिन के घर नाशिक मैं एक घंटा-- क्या बात है अनीता.... !!!!



Recently I had been to Nashik with Mohit and Amit and I went to Anita's house. Anita Borkar is very old friend of mine and she is not only a good person but very creative lady as well for her works.... in the way she analyze and gives similes & metaphors is really amazing. It was indeed a great boon to be with the creative family. Nitin, her husband is also a nice decent person and great person....... really amazing. I could not meet Sakhi as she was in Udaipur learning from Swaraj university. Anita is now working with some Asia based organization. this is just to recall and rejuvenate with old friends as I got in SULA Vineyards

नईम जी याद में एक अनूठा कार्यक्रम- देवास की ताज़ा खबर- "लिखा नहीं कुछ बहुत दिनों से लिखने जैसा "








देवास में नईम जी को गुजरे हुए ९ अप्रैल को पूरा एक साल हो जायेगा.....
उनके परिवार और देवास के उत्साही लोगो ने मिलजुलकर एक अनूठा कार्यक्रम किया १ अप्रैल को मल्हार स्मृति मंदिर में जिसमे प्रकाश कान्त और बहादुर पटेल का जिक्र किये बिना यह सब अधुरा रह जायेगा.......
इस शाम के लिए लोग सुबह से ही इक्कट्ठे हो गए थे विजयबहादुर सिंह जहाँ कोलकत्ता से आये वही महेश्वर दिल्ली से आये, कुबेर दत्त दिल्ली से थे यश मालवीय अलाहाबाद से थे
यह एक्बेहद पारिवारिक शाम थी जिसमे नईम जी के चाहने वाले थे और नईम जी के मुरीद थे ........ सुनील ने एक बात सही कही थी कि स्वर्गीय नईम जी के साथ लगाना संभव ही नहीं है......
विजय बहादुर ने कहा कि जैसे कबीर हो गए है वैसे ही नईम भी हो गए है....
कुबेर दत्ता ने नईम कि परंपरा को हिंदी साहित्य कि अनूठी परंपरा कहा जब नईम बेहद मुहफट और साफगोई कि भाषा बोलने लगे थे .....
नईम जी की दो पुस्तकों का विमोचन किया गया सुल्ताना दीदतब बेहद भावुक हो गई थी जब उन्हें मंच पर बुलाया गया...
नईम जी की यद् में फ़िलहाल इतना ही.....
बस इतना कि " किसको अपनी पीर परोसे किसको सुनाये दुखड़ा सुखडा, लिखा नहीं कुछ बहुत दिनों से लिखने जैसा"...
देवास में इस तरह के कार्यक्रमों में जाना बेहद emotional हो जाता है लगता है कि बस सब छोड़कर घर चला जाऊ... जहाँ सब तो अपने है और यहाँ इस भोपाल शहर में क्या है एक कुत्ता भी पहचान का नहीं है और सूअर भी घुर घुर करताहै...... कितने लोग मिले जिनसे मिले बरसो हो गए थे पर जिस आत्मीयता से वो मिले वो शायद उनकी महानता है ..... एक किसी का नाम लिखकर में सबको कमतर नहीं आंक सकता....
देवास मेरा शहर है और एक लौटूंगा में बिलकुल रीतकर ताकि कोई फिर से भर सके मुझे अपना समझ कर एक खाली घड़े सा... शहर मुझे तोड़ता भी है और जोड़ता भी है।
ओम प्रभाकर के घर पर महेश्वर जी के तीन गीत सुने और मैंने भी कबीर और भूपेन हजारिका का एक गीत सुनाया ........ कितने सहज है लोग अभी भी.....
देवास मुझे आज भी खींचता है पर बस वो सब नहीं मिलेगा मुझे जो मैं पाना चाहता हूँ...