Friday, November 27, 2009

दिनेश की कविता और सारा जमाना

पिछले दिनों में हरदा गया था वहां धर्मेन्द्र ने कहा की यार तेरे दोस्त दिनेश ने अदभुत कविता लिखी है और वो कविता वागर्थ में छपी है उस कविता की एक लाइन धर्मेन्द्र ने सुनाई तो मन उसी कविता को पढने को व्याकुल हो उठा । खूब ढूंढा यहाँ वहा पर कविता का कोई ठिकाना ही नही था । आखिर एक दिन पछले शनिवार को जयपुर से विवेक आया था सो उसे भारत भवन दिखाना ही था वहां चला गया सबसे पहले पुस्तकालय पर धावा बोला और वागर्थ देखा फ़िर पुस्तकालय कर्मचारी की चिरौरी करना पड़ी की भैय्या वागर्थ का अंक निकाल दे .............
बड़ी देर तक मिन्नतें करने के बाद वो तैयार हुआ फ़िर वागर्थ का अंक निकला और मैंने पढ़ी दिनेश की कविता।

तुरंत बाहर निकाल कर दिनेश को फ़ोन किया की बॉस क्या अदभुत कविता है दिनेश दिल्ली निकालने की तैय्यारी में था उस सज्जन पुरूष ने कहा की में अभी पुरी दुरुस्त कविता तुम्हे भिजवा देता हूँ उस कविता में मैंने कुछ रद्दो बदल किए है उसे भी देख लेना और यदि तुम्हारा कोई ब्लॉग हो तो उस पर डाल देना। दिनेश को बहुत सालो से जानता हूँ इतना सहज कवि मैंने कभी नही देखा जब भी रेवा जाता था में दिनेश से मिलकर आता था और बघेलखंडी बोली की हम बाते करते थे फ़ोन पर तो ढेरो बाते हो ही जाती है।
आज अचानक दिनेश की कविता मिली तो मुझे इस कवि से प्यार हो गया की साला इतना अच्छा दोस्त है और सहज है की इस बिगड़ती दुनिया में ऐसे आदमी मिलना ही मुश्किल है .......
खैर आप भी पढ़िए इस अदभुत कविता की एक मिसाल और एक कवि का ईमानदार बयान........
" आज भी खुला है
अपना घर फूंकने का विकल्प..."

उम्र का पहला पड़ाव
जिसे पहले प्यार की उम्र भी कहते है
मैंने सब कुछ छोड़कर किया प्यार
और लिखी कविता
उन दिनों प्यार ही
जीवन की पहली प्राथमिकता थी
कविता उसकी क्षतिपूर्ति
ये तो बाद में पता चला कि
इस ससुरी कविता से
जब न चोला बन सकता है न चोली
तो आप ही बताएं मैं इसका क्या करूँ ?
जब चोली से भेंट हुई तो ,
चोला ऐसा मगन हुआ कि
चोरो के गिरोह में शामिल होने की
अर्जी देने लगा
सर पर लादकर नून -तेल लकड़ी
अपने को ईमानदार चोर घोषित करता हुआ
जब किसी तरह शामिल हुआ चोर बाजार में
तो चोली की अपनी शर्ते थी
और चोले की अपनी सीमा
तब जाकर पता चला कि सुर या तुलसीदास मुझसे
अधिक ' कुटिल-खल-कामी' नही रहे होंगे
अवसर मिलता तो 'सब पतितन को टिको' हो जाता
हो सकता है कुम्भनदास फतेहपुर सीकरी से
बैरंग लौटा दिए हो
अराजक करार देकर ।

बहरहाल
मेरी 'पनहिया' कई बार टूटी
पैरो में लुढ़ककर आ गिरी पगड़ी
कई बार
पर मैंने नही लिखी
आत्मालोचन कि वैसी कवितायें ।





Sunday, November 22, 2009

खिलचीपुर की महिलाए और महिला सममेलन










हाल ही में खिलचीपुर गया था वहां बायपास नामक संस्था काम करती है महिला सशक्तिकरण का वहां एक दिवसीय महिला सम्मलेन था वहा के कुछ खुबसूरत फोटो आप भी देखिये जनाब...........हाँ हनीफ से भी मिला राजगढ़ में और हिना के हाथो बने मैथी के पराठे खाए , प्यारी सी बच्ची से भी मिला ।
मुजीब अच्छा ड्राईवर था, बहुत सम्हाल कर गाड़ी चलाई उसने और मुझे सुरक्षित ले आया देवास में, आते समय हिमांशु से मिलना तो एक वरदान जैसा ही था हिमांशु आजकल शाजापुर में न्यायाधीश है खूब अच्छा लगता है जब हिमांशु और रवि को मिलता हो तो....... ये दोनों मुझे बहुत उम्मीद दिलाते है की न्याय अभी हो सकता है.....और न्यायपालिका में कुछ लोग है जो लोगो को न्याय दिलाने में सचमुच सहाय हो सकते है इस भीषण समय में भी जब लोग न्याय पर से अपना विश्वास खो रहे है................

भारत भवन में लगी एक कविता जो मोहित के लिए है........


भारत भवन में लगी एक कविता जिसने मुझे बहुत कुछ सीखा दिया, ज़िन्दगी के प्रति भी और समाज के प्रति भी। कल जयपुर से विवेक आया था- दो दिन साथ रहा मेरे , बस यूही घूमते रहे और ये कविता हाथ लग गई तो ले आया अपने मोहि के लिए.....................
यह कविता मोहित के लिए है।

अपूर्व की नई नौकरी और मेरा स्थायी अकेलापन




अपूर्व की नई नौकरी लगी है आज या कल ये होना ही था मैंने उसके साथ लगभग पांच माह साथ बिताये है और मेरे लिए ये अनमोल धरोहर है मैं क्या कहू अपूर्व............ बस इतना ही की तुम थोड़ा सा यही रह जाओगे ......... या यु कहू की पुरे का पुरा यहाँ रह जाओगे बस सिर्फ़ इतना यद् रखना यदि तुम नही तो मैं नही............ संदीप नाईक समाप्त ..........बस................................
एक पिता को यह बोझ सहना ही पड़ता है आज मैंने यह दर्द कैसे सहा है यह शब्दों में बया कारण बहुत ही मुश्किल है..........
मैंने इन पाँच महीनो में यह अच्छे से समझा है की अपने लोगो को पाने के लिए भी ख़ुद को समर्पित करना पड़ता है सब कुछ भुलाकर सिर्फ़ अपनों का हो जाना पड़ता है............. मैंने लिखना - पढ़ना छोड़ दिया....... सबसे मिलना जुलना छोड़ दिया सिर्फ़ इसलिए की मेरा बेटा मेरा हो सके......... और उसने भी बहुत प्यार सम्मान दिया......... इतना की शायद अपना जाया होता तो भी नही मिलता ............. बस अब तो जीवन सिर्फ़ इन बच्चो का है- घर के तीन बच्चे और अपूर्व और मोहित............ सब इनके लिए है और कुछ भी नही है जीवन में.................
मैंने बहुत दुःख दिए सबको, कितना सारा नाटक किया की -"मोह छुट जाए", पर कहा हो पता है- कुछ भी सोचा हुआ पुरा नही होता...............
अपूर्व एक नई दुनिया में जा रहा है- मेरा रोम रोम काँप रहा है, नई दुनिया है, बीहड़ है.... जंगल है.... मूल्यों की बेहद कमी है....... और ऐसे नए अबोध बच्चे जो सिर्फ़ अपनी..... पढ़ाई.......... मूल्य लेकर इस मायावी दुनिया में जा रहे है उन्हें सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने आप पर भरोसा रखना पड़ेगा और..... रोज़ एक नई लड़ाई लड़ना पड़ेगी काफी मशक्कत के बाद ये अपना वजूद टिका पाएंगे पर मुझे ये विश्वास है की ये ये युवा देश को एक नई राह दिखायेंगे और ईमानदारी से काम करते हुए अपने परिवार और समाज के लिए कुछ बहुत सार्थक करेंगे............
कम से कम मेरा अपूर्व, मोहित और आनेवाले तीनो बच्चे तो ऐसा ही करेंगे -ये मेरा विश्वास है..............

खूब सारा प्यार और शुभकामनाये तुम्हारे लिए अप्पू , बस ये ध्यान रखना की ये "बुढा" रोज़ तुम्हारे लिए दुआ ही करेगा कितना भी हो जाए, ये तुमसे कभी लड़ाई नही कर सकता...........क्या दुनिया में कोई अपनी ही रूह से लड़ता है???

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी एक राक्षस की उसे कोई मार नही सकता था फ़िर एक साधू ने राजकुमार को बताया की उस राक्षस की जान सात समंदर पार एक तोते में है, जबतक उस तोते को नही मारोगे , राक्षस का कोई कुछ नही बिगाड़ सकता......... यह रूपक में हमेशा से कहता आया हू तुम्हे..............पर आज मेरा "तोता" बड़ा हो गया है और अब सात समंदर पर जाने के लिए भी तैयार है, पर मेरी जान तुममे ही है और तुममे ही रहेगी -अप्पू............मेरी जान मोहित में है, मेरे सिद ,ओजस और अनि में है ............... अगर कही से भी कुछ हुआ तो ये " राक्षस मर जाएगा............"!!!!!!!!!!
खूब प्यार और दुलार के साथ स्वर्णिम भविष्य के लिए ढेर सारा प्यार और शुभकामनाये................
वही पागल और प्यार का मारा हुआ............
जो फ़िर से एक बार अकेला रह गया पहले पापा , फ़िर माँ और अब तुम भी दूर जा रहे हो......... बहुत झगडा हूँ न तुमसे.............. माफ़ी मांगने लायक भी नही रहा अब तो............ मैं ................. फ़िर भी भीगी आँखों से माफ़ी मांगता हूँ तुमसे और ये विश्वास दिलाता हूँ की मेरा प्यार कभी खत्म नही होगा...................
मुझे मुखाग्नि देना है तुम्हे.......... बस ये याद रखना ......................और मेरे लिए आ जाना एक बार ही सही पर आ जाना .........भले ही रंजिशे निभाने के लिए................

तुम्हारा ही
डैड


Saturday, November 7, 2009

सत्यमंगलम के जंगलो में अन्नपुर्णा


हाल ही में मैं तमिलनाडु के इरोड जिले में गया था वहां से सत्यमंगलम के जंगलो में गया था । ये इलाका पुरी तरह से वीरप्पन का इलाका था जो आज भी हाथी और वीरप्पन के नाम से जाना जाता है ।
दूर घने जंगलो में एक छोटे से टपरे में इस महिला ने मुझे जो खाना खिलाया था वो दुनिया भर के पॉँच सितारा होटलों से लाख गुना बेहतर था और सिर्फ़ पच्चीस रुपये में .............और उसे वो भी मांगने में संकोच हो रहा था

मुझे माँ की याद गई ............... माँ भी ऐसी ही थी कभी कोई मेरे घर से भूखा नही गया आजतक

ये ब्लॉग इसी अन्नपुर्णा को समर्पित है ..................
जब तक ऐसी अन्नापुर्नाये जिन्दा है तब तक कोई भी भूखा नही रह सकता ......... ये मेरा विश्वास है
धन्य है भारत भूमि की माताये, बहने और ऐसी अन्नापुर्नाये .................

शत शत प्रणाम.......

Some pics of Sea beach and Sathyamangalam
















प्रभाष जी का जाना देवास के लिए एक बड़ा शून्‍य

प्रभाष जी का जाना देवास के लिए एक बड़ा शून्‍य

7 November 2009 No Comment

prabhashji-paintप्रभाष जोशी मेरे अपने गृह जिले के रहने वाले थे। शिप्रा के पास एक गांव है सुनवानी महाकाल। वहीं के थे। कल रत जब आशेंद्र के एक छात्र हरिमोहन बुधोलिया ने रात तीन बजे फोन किया तो में सो रहा था। दो बार अनजान नंबर से कॉल आया तो लगा की कोई परेशान है और कुछ कहना चाहता है। सो फोन उठा लिये। हरि ने कहा की दादा, प्रभाष जी नहीं रहे। मैं तो हैरान रह गया। तुंरत अपने देवास के दोस्तों को मैसेज कर दिया। भोपाल के भास्कर में, पत्रिका में, नईदुनिया में मैसेज किया। रात को किसी को उठाने में भी डर लगता है। हरी ने यह भी बताया था कि अंतिम क्रिया उनके गांव में ही होगी, सो मैंने बहादुर को भी कहा कि यार गांव के सरपंच को बता देना ताकि इंतज़ामात हो सके।

हाल ही में मैं छतरपुर गया था। वहां प्रभाष जी की बहन से लंबी बातें हुई थीं। फिर उन्‍हीं के बेटे के साथ पीतांबरी पीठ भी गया था। प्रभाष जी की बहन ने प्रभाष जी के बारे में काफी सारी बातें बतायी थीं और मैं भी मालवा का होने के कारण उन्हें जानता था। यह मेरे लिए बहुत ही दर्दनाक ख़बर थी। जिन लोगो से मैंने बुनियादी संस्कार लिये थे दुनियादारी सीखने-समझने के, वे धीरे-धीरे दुनिया को अलविदा कह रहे हैं। हाल ही में नईम जी नहीं रहे। देवास के माहौल में कुमार गंधर्व, नईम का होना और आसपास के माहौल में राहुल बारपुते, बाबा डीके, विष्णु चिंचालकर यानि कि गुरुजी जैसे लोगो के सान्निध्य में मैंने और हम जैसे लोगों ने काफी कुछ सीखा है। आज जब ये वटवृक्ष ढल रहे हैं या ढल चुके हैं तो मन बहुत उदास हो जाता है कि अब हम जैसे लोग कहां देखें? किसको देखें? क्‍योंकि अब कोई नज़र आता नहीं।

देवास के लिए तो ये दुःख की बात है ही, पर पूरे पत्रकारिता जगत के लिए बहुत ही बड़े शून्य की व्युत्पत्ति है ये खबर…

प्रभाष जी को हार्दिक प्रणाम और श्रद्धांजलि…
संदीप नाईक
देवास, भोपाल से

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