Friday, November 27, 2009

दिनेश की कविता और सारा जमाना

पिछले दिनों में हरदा गया था वहां धर्मेन्द्र ने कहा की यार तेरे दोस्त दिनेश ने अदभुत कविता लिखी है और वो कविता वागर्थ में छपी है उस कविता की एक लाइन धर्मेन्द्र ने सुनाई तो मन उसी कविता को पढने को व्याकुल हो उठा । खूब ढूंढा यहाँ वहा पर कविता का कोई ठिकाना ही नही था । आखिर एक दिन पछले शनिवार को जयपुर से विवेक आया था सो उसे भारत भवन दिखाना ही था वहां चला गया सबसे पहले पुस्तकालय पर धावा बोला और वागर्थ देखा फ़िर पुस्तकालय कर्मचारी की चिरौरी करना पड़ी की भैय्या वागर्थ का अंक निकाल दे .............
बड़ी देर तक मिन्नतें करने के बाद वो तैयार हुआ फ़िर वागर्थ का अंक निकला और मैंने पढ़ी दिनेश की कविता।

तुरंत बाहर निकाल कर दिनेश को फ़ोन किया की बॉस क्या अदभुत कविता है दिनेश दिल्ली निकालने की तैय्यारी में था उस सज्जन पुरूष ने कहा की में अभी पुरी दुरुस्त कविता तुम्हे भिजवा देता हूँ उस कविता में मैंने कुछ रद्दो बदल किए है उसे भी देख लेना और यदि तुम्हारा कोई ब्लॉग हो तो उस पर डाल देना। दिनेश को बहुत सालो से जानता हूँ इतना सहज कवि मैंने कभी नही देखा जब भी रेवा जाता था में दिनेश से मिलकर आता था और बघेलखंडी बोली की हम बाते करते थे फ़ोन पर तो ढेरो बाते हो ही जाती है।
आज अचानक दिनेश की कविता मिली तो मुझे इस कवि से प्यार हो गया की साला इतना अच्छा दोस्त है और सहज है की इस बिगड़ती दुनिया में ऐसे आदमी मिलना ही मुश्किल है .......
खैर आप भी पढ़िए इस अदभुत कविता की एक मिसाल और एक कवि का ईमानदार बयान........
" आज भी खुला है
अपना घर फूंकने का विकल्प..."

उम्र का पहला पड़ाव
जिसे पहले प्यार की उम्र भी कहते है
मैंने सब कुछ छोड़कर किया प्यार
और लिखी कविता
उन दिनों प्यार ही
जीवन की पहली प्राथमिकता थी
कविता उसकी क्षतिपूर्ति
ये तो बाद में पता चला कि
इस ससुरी कविता से
जब न चोला बन सकता है न चोली
तो आप ही बताएं मैं इसका क्या करूँ ?
जब चोली से भेंट हुई तो ,
चोला ऐसा मगन हुआ कि
चोरो के गिरोह में शामिल होने की
अर्जी देने लगा
सर पर लादकर नून -तेल लकड़ी
अपने को ईमानदार चोर घोषित करता हुआ
जब किसी तरह शामिल हुआ चोर बाजार में
तो चोली की अपनी शर्ते थी
और चोले की अपनी सीमा
तब जाकर पता चला कि सुर या तुलसीदास मुझसे
अधिक ' कुटिल-खल-कामी' नही रहे होंगे
अवसर मिलता तो 'सब पतितन को टिको' हो जाता
हो सकता है कुम्भनदास फतेहपुर सीकरी से
बैरंग लौटा दिए हो
अराजक करार देकर ।

बहरहाल
मेरी 'पनहिया' कई बार टूटी
पैरो में लुढ़ककर आ गिरी पगड़ी
कई बार
पर मैंने नही लिखी
आत्मालोचन कि वैसी कवितायें ।





Sunday, November 22, 2009

खिलचीपुर की महिलाए और महिला सममेलन










हाल ही में खिलचीपुर गया था वहां बायपास नामक संस्था काम करती है महिला सशक्तिकरण का वहां एक दिवसीय महिला सम्मलेन था वहा के कुछ खुबसूरत फोटो आप भी देखिये जनाब...........हाँ हनीफ से भी मिला राजगढ़ में और हिना के हाथो बने मैथी के पराठे खाए , प्यारी सी बच्ची से भी मिला ।
मुजीब अच्छा ड्राईवर था, बहुत सम्हाल कर गाड़ी चलाई उसने और मुझे सुरक्षित ले आया देवास में, आते समय हिमांशु से मिलना तो एक वरदान जैसा ही था हिमांशु आजकल शाजापुर में न्यायाधीश है खूब अच्छा लगता है जब हिमांशु और रवि को मिलता हो तो....... ये दोनों मुझे बहुत उम्मीद दिलाते है की न्याय अभी हो सकता है.....और न्यायपालिका में कुछ लोग है जो लोगो को न्याय दिलाने में सचमुच सहाय हो सकते है इस भीषण समय में भी जब लोग न्याय पर से अपना विश्वास खो रहे है................

भारत भवन में लगी एक कविता जो मोहित के लिए है........


भारत भवन में लगी एक कविता जिसने मुझे बहुत कुछ सीखा दिया, ज़िन्दगी के प्रति भी और समाज के प्रति भी। कल जयपुर से विवेक आया था- दो दिन साथ रहा मेरे , बस यूही घूमते रहे और ये कविता हाथ लग गई तो ले आया अपने मोहि के लिए.....................
यह कविता मोहित के लिए है।

अपूर्व की नई नौकरी और मेरा स्थायी अकेलापन




अपूर्व की नई नौकरी लगी है आज या कल ये होना ही था मैंने उसके साथ लगभग पांच माह साथ बिताये है और मेरे लिए ये अनमोल धरोहर है मैं क्या कहू अपूर्व............ बस इतना ही की तुम थोड़ा सा यही रह जाओगे ......... या यु कहू की पुरे का पुरा यहाँ रह जाओगे बस सिर्फ़ इतना यद् रखना यदि तुम नही तो मैं नही............ संदीप नाईक समाप्त ..........बस................................
एक पिता को यह बोझ सहना ही पड़ता है आज मैंने यह दर्द कैसे सहा है यह शब्दों में बया कारण बहुत ही मुश्किल है..........
मैंने इन पाँच महीनो में यह अच्छे से समझा है की अपने लोगो को पाने के लिए भी ख़ुद को समर्पित करना पड़ता है सब कुछ भुलाकर सिर्फ़ अपनों का हो जाना पड़ता है............. मैंने लिखना - पढ़ना छोड़ दिया....... सबसे मिलना जुलना छोड़ दिया सिर्फ़ इसलिए की मेरा बेटा मेरा हो सके......... और उसने भी बहुत प्यार सम्मान दिया......... इतना की शायद अपना जाया होता तो भी नही मिलता ............. बस अब तो जीवन सिर्फ़ इन बच्चो का है- घर के तीन बच्चे और अपूर्व और मोहित............ सब इनके लिए है और कुछ भी नही है जीवन में.................
मैंने बहुत दुःख दिए सबको, कितना सारा नाटक किया की -"मोह छुट जाए", पर कहा हो पता है- कुछ भी सोचा हुआ पुरा नही होता...............
अपूर्व एक नई दुनिया में जा रहा है- मेरा रोम रोम काँप रहा है, नई दुनिया है, बीहड़ है.... जंगल है.... मूल्यों की बेहद कमी है....... और ऐसे नए अबोध बच्चे जो सिर्फ़ अपनी..... पढ़ाई.......... मूल्य लेकर इस मायावी दुनिया में जा रहे है उन्हें सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने आप पर भरोसा रखना पड़ेगा और..... रोज़ एक नई लड़ाई लड़ना पड़ेगी काफी मशक्कत के बाद ये अपना वजूद टिका पाएंगे पर मुझे ये विश्वास है की ये ये युवा देश को एक नई राह दिखायेंगे और ईमानदारी से काम करते हुए अपने परिवार और समाज के लिए कुछ बहुत सार्थक करेंगे............
कम से कम मेरा अपूर्व, मोहित और आनेवाले तीनो बच्चे तो ऐसा ही करेंगे -ये मेरा विश्वास है..............

खूब सारा प्यार और शुभकामनाये तुम्हारे लिए अप्पू , बस ये ध्यान रखना की ये "बुढा" रोज़ तुम्हारे लिए दुआ ही करेगा कितना भी हो जाए, ये तुमसे कभी लड़ाई नही कर सकता...........क्या दुनिया में कोई अपनी ही रूह से लड़ता है???

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी एक राक्षस की उसे कोई मार नही सकता था फ़िर एक साधू ने राजकुमार को बताया की उस राक्षस की जान सात समंदर पार एक तोते में है, जबतक उस तोते को नही मारोगे , राक्षस का कोई कुछ नही बिगाड़ सकता......... यह रूपक में हमेशा से कहता आया हू तुम्हे..............पर आज मेरा "तोता" बड़ा हो गया है और अब सात समंदर पर जाने के लिए भी तैयार है, पर मेरी जान तुममे ही है और तुममे ही रहेगी -अप्पू............मेरी जान मोहित में है, मेरे सिद ,ओजस और अनि में है ............... अगर कही से भी कुछ हुआ तो ये " राक्षस मर जाएगा............"!!!!!!!!!!
खूब प्यार और दुलार के साथ स्वर्णिम भविष्य के लिए ढेर सारा प्यार और शुभकामनाये................
वही पागल और प्यार का मारा हुआ............
जो फ़िर से एक बार अकेला रह गया पहले पापा , फ़िर माँ और अब तुम भी दूर जा रहे हो......... बहुत झगडा हूँ न तुमसे.............. माफ़ी मांगने लायक भी नही रहा अब तो............ मैं ................. फ़िर भी भीगी आँखों से माफ़ी मांगता हूँ तुमसे और ये विश्वास दिलाता हूँ की मेरा प्यार कभी खत्म नही होगा...................
मुझे मुखाग्नि देना है तुम्हे.......... बस ये याद रखना ......................और मेरे लिए आ जाना एक बार ही सही पर आ जाना .........भले ही रंजिशे निभाने के लिए................

तुम्हारा ही
डैड


Saturday, November 7, 2009

सत्यमंगलम के जंगलो में अन्नपुर्णा


हाल ही में मैं तमिलनाडु के इरोड जिले में गया था वहां से सत्यमंगलम के जंगलो में गया था । ये इलाका पुरी तरह से वीरप्पन का इलाका था जो आज भी हाथी और वीरप्पन के नाम से जाना जाता है ।
दूर घने जंगलो में एक छोटे से टपरे में इस महिला ने मुझे जो खाना खिलाया था वो दुनिया भर के पॉँच सितारा होटलों से लाख गुना बेहतर था और सिर्फ़ पच्चीस रुपये में .............और उसे वो भी मांगने में संकोच हो रहा था

मुझे माँ की याद गई ............... माँ भी ऐसी ही थी कभी कोई मेरे घर से भूखा नही गया आजतक

ये ब्लॉग इसी अन्नपुर्णा को समर्पित है ..................
जब तक ऐसी अन्नापुर्नाये जिन्दा है तब तक कोई भी भूखा नही रह सकता ......... ये मेरा विश्वास है
धन्य है भारत भूमि की माताये, बहने और ऐसी अन्नापुर्नाये .................

शत शत प्रणाम.......

Some pics of Sea beach and Sathyamangalam
















प्रभाष जी का जाना देवास के लिए एक बड़ा शून्‍य

प्रभाष जी का जाना देवास के लिए एक बड़ा शून्‍य

7 November 2009 No Comment

prabhashji-paintप्रभाष जोशी मेरे अपने गृह जिले के रहने वाले थे। शिप्रा के पास एक गांव है सुनवानी महाकाल। वहीं के थे। कल रत जब आशेंद्र के एक छात्र हरिमोहन बुधोलिया ने रात तीन बजे फोन किया तो में सो रहा था। दो बार अनजान नंबर से कॉल आया तो लगा की कोई परेशान है और कुछ कहना चाहता है। सो फोन उठा लिये। हरि ने कहा की दादा, प्रभाष जी नहीं रहे। मैं तो हैरान रह गया। तुंरत अपने देवास के दोस्तों को मैसेज कर दिया। भोपाल के भास्कर में, पत्रिका में, नईदुनिया में मैसेज किया। रात को किसी को उठाने में भी डर लगता है। हरी ने यह भी बताया था कि अंतिम क्रिया उनके गांव में ही होगी, सो मैंने बहादुर को भी कहा कि यार गांव के सरपंच को बता देना ताकि इंतज़ामात हो सके।

हाल ही में मैं छतरपुर गया था। वहां प्रभाष जी की बहन से लंबी बातें हुई थीं। फिर उन्‍हीं के बेटे के साथ पीतांबरी पीठ भी गया था। प्रभाष जी की बहन ने प्रभाष जी के बारे में काफी सारी बातें बतायी थीं और मैं भी मालवा का होने के कारण उन्हें जानता था। यह मेरे लिए बहुत ही दर्दनाक ख़बर थी। जिन लोगो से मैंने बुनियादी संस्कार लिये थे दुनियादारी सीखने-समझने के, वे धीरे-धीरे दुनिया को अलविदा कह रहे हैं। हाल ही में नईम जी नहीं रहे। देवास के माहौल में कुमार गंधर्व, नईम का होना और आसपास के माहौल में राहुल बारपुते, बाबा डीके, विष्णु चिंचालकर यानि कि गुरुजी जैसे लोगो के सान्निध्य में मैंने और हम जैसे लोगों ने काफी कुछ सीखा है। आज जब ये वटवृक्ष ढल रहे हैं या ढल चुके हैं तो मन बहुत उदास हो जाता है कि अब हम जैसे लोग कहां देखें? किसको देखें? क्‍योंकि अब कोई नज़र आता नहीं।

देवास के लिए तो ये दुःख की बात है ही, पर पूरे पत्रकारिता जगत के लिए बहुत ही बड़े शून्य की व्युत्पत्ति है ये खबर…

प्रभाष जी को हार्दिक प्रणाम और श्रद्धांजलि…
संदीप नाईक
देवास, भोपाल से

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Monday, September 21, 2009

A Wonderful Poem which is Close to my HEART by Mohit

Today Sept 21 on the Morning of IDD, Mohit sent me a wonderful poem which is very close to my Heart. Here it goes..........


Life is Like that only……………

Sleep monger,

death monger,

with capsules in my palms each night,

eight at a time from sweet pharmaceutical bottles

I make arrangements for a pint-sized journey.

I’m the King of this condition.

I’m an expert on making the trip

and now they say I’m an addict.

Now they ask why.

WHY!

Don’t they know that I promised to die!

Yes

I try

to kill myself in small amounts,

an innocuous occupation.



Sunday, August 23, 2009

डॉक्टर संजय भालेराव और चेन्नई का सफर





चेन्नई यानि की मद्रास से मेरा बहुत पुराना रिश्ता है मुझे याद पड़ता है १९८२ में पहली बार अपना राष्ट्रपति पुरस्कार लेने गया था बड़ा सा मैदान था किसी क्रिश्चियन संस्था में कार्यक्रम था । जाने के पहले हम लोगो ने सोचा यहाँ तक आए है तो तिरुपति बालाजी भी हो चले। सो वहा भी चले गए थे तब तमिलनाडु में ऍम जी रामचंद्रन का शासन था और अमूमन पुरे तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध अपने शबाब पर था । हम लोग तिरुपति में सबको देखकर कबीट कबीट चिढा रहे थे क्योकि दक्षिण में तिरुपति में बाल देने का रिवाज है और हमारे लिए यह आश्चर्य जनक था क्योकि महिलाओं को बाल देते कभी देखा नही था। खूब मार खाई थी फ़िर हमारे स्काउट मास्टर ओंम प्रकाश जोशी ने पुलिस थाने में जाकर बताया की ये बच्चे राष्ट्रपति पुरस्कार लेने आए है तब कही जाकर तमिलनाडु पुलिस ने हमें एक विशेष वन में बिठाकर नीचे ले जाकर छोड़ा। आठ दिन में उस लंबे मैदान में समय कब निकल गया पता ही नही चला हां आज पहली बार कह रहा हूँ कि मेघालय कि एक लड़की मेरी जोसफ से पहली बार मिला था और शायद जिसे पहली नज़र का प्यार कहते है हुआ था । जाते समय बहुत रूअंसासा हो गया था और मेरी की हालत मेरे से ज्यादा ख़राब थी पर क्या कर सकते थे आने के बाद कुछ दिनों तक चिट्ठी पत्री चलती रही पर ये समझ आ गया था कि कुछ होना सम्भव नही है क्योकि तब ब्राह्मणी संस्कार थे और वो एक तो दूर थी, दूसरा ईसाई थी । बस भूलना पड़ता है आज यह लिखने बैठा हूँ तो सब याद आ गया है , कहाँ हो मेरी ????

दूसरी बार मद्रास में ८७ में गया था तब हम केरला जा रहे थे और वहाँ से जब ८ दिन बिताकर लौटे तो ऍम जी रामचंद्रन कि मृत्यु हो गई थी हजारो लोगो ने सर मुंडवा लिए थे सारे स्टेशन पर खाने की दुकाने बंद थी और हमें ब्रेड भी नही मिली थी आज की जयललिता उस समय की प्रमुख अभिनेत्री थी और उसने ऍम जी आर का पुरा काम अपने प्रभार में ले लिया था । यह राजनीति नही जानती थी ठीक वैसे ही जैसे इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव गाँधी बिल्कुल भोले भाले थे। जैसे तैसे खम्मम आया और हमने भूखे शेरो की तरह से इडली वडा खाया था और नागपुर आने पर पुरी सब्जी पर टूट पड़े थे । क्या दिन थे वो भी.............

तीसरी बार माँ के साथ गया था जब इंदौर देवास में डॉक्टर ने उसे दिल का मरीज बताया था और में पागलो की तरह से देवास इंदौर अकर्ता रहा था जेब में उतने रुपये भी नही थे पापा की मृत्यु और मकान के कर्ज ने माँ को और हम तीनो भाइयो को तोड़ दिया था सिर्फ़ बड़ा भाई नौकरी कर रहा था और में सिर्फ़ १२०० रुपये कमा रहा था छोटा तो पढ़ ही रहा था । सरकार से ऑपरेशन के लिए रुपये मिलते तो थे पर राज्य शासन से बाहर जाकर इलाज करवाने की अनुमति लेना पड़ती थी क्योकि तब मध्य प्रदेश के किसी भी अस्पताल में बायपास का ऑपरेशन नही होता था न ही अस्पताल इतने एडवांस हुआ करते थे कोई भी डॉक्टर इलाज की ग्यारंटी नही
लेता था। बाईपास की सुविधा देश के चुनिन्दा अस्पतालों में ही उपलब्ध थी अपोलो उसमे से एक प्रमुख था जहाँ कम से कम ऑपरेशन फ़ैल होते थे । अस्पताल के पास डॉक्टरो गिरीनाथ , सुब्रामनियम, और सत्यमुर्थि जैसे काबिल डॉक्टर थे जो चौबीसों घंटे ही अस्पताल में रहकर अपनी सेवाए देते थे और किसी मरीज को किसी भी डॉक्टरो का घर मालूम नही था न ही वो इस बात को प्रोत्साहित करते थे कि कोई मरीज उनके घर तक आए मुझे याद है कि मैंने उन तीनो डाक्टारो को अस्पताल में ही देखा था रात के २ बजे हो या सुबह के ५ !!!
मेरे साथ सारे रिश्तेदारों का एक हुजूम गया था नाना काका, लीलू आत्या , बड़े मामी, मंदा मोउशी, नंदू क्योकि नंदू का ब्लड ग्रुप "ओ" नेगेटिव था , माँ का भी "ओ" नेगेटिव था, नए शहर में एकदम से डोनर कहा से लाते , इसलिए नंदू को ले लिया था । रात को जब इंदौर कोचीन ट्रेन से उतरे तो प्लेटफोर्म पर डॉक्टर कमल लोधया मिल गए जो मेरे एकलव्य की वजह से दोस्त बने थे और वो मद्रास विश्व विद्यालय के भारतीय गणित संस्थान में प्राध्यापक थे । स्वभाव से सहज कमल ने हम सबको घर चलने को कहा था, रात के दो बजे एक आदमी एक अनजान आदमी के कुनबे को घर चलने को कह रहा हो यह तो अब अविश्वसनीय लगता है पर यह समय का सच था। पर हम गए नही॥ हम भी शरीफ ही थे लगभग........
लाला रूपचंद अपने मकान देता था यह बात मुझे डॉक्टर नवलाखे ने बताई थी जो कुछ दिन पहले ही बाईपास करवाकर आये थे। हजारो प्रकाशो वालो इलाके में है ये अपोलो अस्पताल ग्रांट ट्रंक रोड पर मद्रास में । साफ सुथरा बिल्कुल होटल जैसा पाँच सितारा होटल जैसा उस ज़माने में इतना भव्य था तो आज कैसा होगा जबकि बाजार इतना घुस गया है सब जगह पर भगवन का शुक्र है कि अब वह जाने का काम नही पड़ता और न ही पड़े तो बेहतर है , वैसे भी अब इंदौर भोपाल में ऑपरेशन हो जाते है एकदम से ठीक ठाक ।

Wednesday, August 12, 2009

एक संभावनाशील प्रशासनिक अधिकारी की असमय मौत यानि कि एक सपने का खत्म हो जाना

आज ही दिल्ली से लौटा हू दिल्ली के तीन दिन बेहद थकाऊ थे, ना मात्र काम के हिसाब से, बल्कि सूअर बुखार और चिपचिपी गर्मी के कारण , ये तीन दिन मेरे लिए बहुत ही उबाऊ थे । एक साक्षात्कार के सन्दर्भ में राजीव गाँधी फाउंडेशन दिल्ली में गया था । पद चूकि बहुत आकर्षक था इसलिए चला गया था । वह पहाड़गंज के एक होटल में रुका था हालांकि एसी लगा था फ़िर भी गर्मी इतनी खतरनाक थी कि बताया नही जा सकता मेरे चेहरे पर निशान पड़ गए। साक्षात्कार में दो दिन की प्रक्रिया थी चयन होने की पुरी उम्मीद है पर मामला रुपयों पर आकर रुकेगा वैसे भी दिल्ली के हालात देखकर मुझमे हिम्मत नही है की मै वहा जाऊ और काम करू । पता नही क्या होगा , हां यदि आठ लाख का पैकेज मिला तो हिम्मत जुटाई जा सकती है क्योकि मेरा मानना है कि पैसा छठी इन्द्री है जो पाँच इन्द्रियों को नियंत्रित करता है , खैर जो होगा देखेंगे.....

इस बीच मोहित का फ़ोन आना दिल्ली में सबसे सुखद था ,"बिल्कुल रेगिस्तान में पानी मिलने के जैसा" । उस दिन १० तारीख को जब मै लौटने ही वाला था कि उसका फ़ोन आ गया। मैंने कुछ पूछा नही सिर्फ़ पूछा कि कैसे हो बेटू । फ़िर वो बोला क्या हो रहा है कैसा चल रहा है और क्या नया मैंने बताया कि दिल्ली मै हूँ और बस रात मै बात करता हूँ। उसने बताया कि वह १४ तारीख को नही मिल पायेगा क्योकि चाचाजी के साथ वो मुंबई जा रहा है पता नही कब आना होगा और कब मिलना । ऐसा लगा कि आवाज कही दूर से आ रही हो गहरे कुए से और कही से भटकती हुई ......... पता नही क्यो में बैचैन हो उठा था , पर कुछ नही पूछा , बस हूँ हाँ करता रहा, हाँ मैंने कहा कि मुझे खून चाहिए और जाने के पहले दे जा ...... उसने हाँ कहा और बस ये कहा कि अपना ध्यान रखना मैंने कहा कि दिल्ली में अगर चयन हो गया तो मेरे साथ कौन रहेगा तो बोला घर वाले ये सब कहा समझते है में अपने चाचा के पास जा रहा हूँ ताकि उनके साथ ठेकेदारी में हाथ बटा सकू काम तो करना ही है ना सेम ???

वो एक बेहद संभावनाशील व्यक्ति है और उसमे जिस तरह की संभावनाए है , उससे इनकार नही किया जा सकता । मैंने बचपन से उसमे एक प्रशासनिक अधिकारी की छबि देखी थी और उस संभावना को लेकर में अभी तक जिन्दा था । में यह मानता हूँ कि दुसरो से वो उम्मीदे रखना बेकार है जो हम ख़ुद अपने आप से पुरी नही कर पाए ,पर , क्या करता मैंने उसे बचपन से वो ख्वाब दिखाया और उसे ख़ुद भी देखता रहा । आई आई टी के पुरे साढे चार साल तक हम दोनों यही ख्वाब देखते रहे और उसने खूब तैय्यारी भी इसमे कोई शक नही है पर क्या हो गया नही पता पर उस दिन सचिन ने बताया कि परिणाम आ गए है तो मैंने पुनीत से रोल नम्बर पूछा और देखा तो पाया कि चयन नही हुआ है बस एकदम से निरुत्साहित हो गया और सारा उत्साह ही मानो खत्म हो गया फ़िर रात में मोहित का फ़ोन आया तो मैंने कह दिया कि नही हुआ है बस ४-५ दिन बातचीत बंद रही सारे दोस्त मुझसे पूछ रहे थे अमितोष , सचिन, अनूप और भी सब............. उसने किसी का फ़ोन नही उठाया बस शांत रहा और आखिरी में समर्पण कर दिया कि अब जो चाहो जो कर लो में तैयार हूँ और घर वाले उसे अब मुंबई ले जा रहे है...............

रुक जाओ मोहित और इम्रे साथ दिल्ली चलो हम फ़िर से सब शुरू करेंगे बेटू और फ़िर अगले साल तुम वहा दमकोगे पर थोडी सी ज्यादा मेहनत और एक खवाब एक सार्थक जिंदगी तुम्हारा रास्ता देख रहा है ...................... रुक जाओ मोहित और ना मेरे लिए ना किसी के लिए अपने आप के लिए अपनी प्रतिभा के लिए थोडी सी मेहनत कर लो और थोड़े समय बाद सब ठीक हो जाएगा और मेरे साथ दिल्ली चलो मुझे भी जरुरत है........ अपूर्व को नौकरी करना ही पड़ेगी में अकेला नही रह सकता उस बेरुखे शहर में............ तुम्हारे सारे दोस्त भी यही सोचते है हम सब तुम्हे वहा ........... शिखर पर देखना चाहते है मोहित................ रुक जाओ मोहित............

Friday, August 7, 2009

प्रमोद उपाध्याय का गुजर जाना यानि कि हिन्दी के नवगीत में एक और शून्य का उपजना






आजकल बहादुर के फ़ोन आते ही डर लगने लगता है कि पता नही किसके मौत का पैगाम दे रहा हो । ऐसा ही कुछ आज हुआ दोपहर में बैठा कुछ काम कर रहा था कि उसका फ़ोन आया दिल धक्क से रह गया कि हो न हो मेरे अपने शहर में कुछ गंभीर हो गया है । जैसे ही फ़ोन उठाया वह बोला भाईसाहब एक बुरी ख़बर है मैंने कहा कि साला अब क्या हो गया , तो बोला कि प्रमोद का कल रात बारह बजे इंदौर में देहांत हो गया में चौक गया कि ये सब क्या हो गया, कहा तो वो भोपाल आने वाला था मुझसे हमेशा कहता था कि संदीप तेरे पास आकर रहूँगा और में हंसकर टाल देता था। देवास हमारा अपना कस्बा था जहा मै पढ़ा लिखा और सारे संस्कार लिए। लिखना पढ़ना मेरे अन्दर डालने वालो मे राहुल बारपुते, कुमार गन्धर्व, विष्णु चिंचालकर "गुरूजी", बाबा डिके, कालांतर मे जीवन सिंह ठाकुर डॉक्टर प्रकाश कान्त , प्रभु जोशी और मेरे अज़ीज़ दोस्त बहादुर पटेल और मनीष वैद्य का नाम लिए बगैर सब व्यर्थ हो जाएगा। बाद मे पता चला कि नईम और भी दीगर लेखक थे जो राष्ट्रीय स्तर पर नाम और काम के कारण जाने जाते थे। प्रमोद उपाध्याय उसी गाँव के थे, जहा मेरी माँ ने सन सत्तर के दशक मे बालिका शिक्षा के लिए अलख जगाया था भौरांसा । प्रमोद एक अच्छे नवगीतकार थे यह बाद मे पता चला, पर जब मे एकलव्य मे काम करता था तो अक्सर उनके घर पर मुलाक़ात हो जाती थी जब वो नाहर दरवाजे पर कोठारी के मकान मे रहते थे । पत्नी रेखा भी एक शिक्षिका ही थी और भौरांसा मे पढाती थी दो बच्चे थे विप्लव और पप्पी दूसरे का नाम मुझे याद नही आ रहा , प्रमोद से खूब गप्पे होती थी रवि का ख़ास दोस्त था तम्बाखू की दोस्ती कब करीबी दोस्ती मे बदल गई हमें पता ही नही चला ।

धीरे धीरे प्रमोद को शराब की आदत लग गई और वह बेतहाशा पीने लगा। उसकी तबियत ख़राब रहने लगी स्कूल का जाना आना कम होता गया । हा उसके नवगीत खूब छपने लगे थे । देवास में तब लिखने पढ़ने का बहुत माहौल हुआ करता था । देश में एक जबरदस्त परिवर्तन की आंधी चल रही थी हम लोग खूब पढ़ते थे , सच कहू तो लिखने पढने का संस्कार डालने वालो में जूनून था कि एक नै पौध तैयार करना है और परिवर्त लाना है देश का समाज का विकास करना है सारी सडी गली मान्यताओ को बदलना है , एक अजीब किस्म का खुमार था हम युवाओ पर और ऐसा भी नही कि यह कोई इतिहास में पहली बार हो रहा हो । मुझे लगता है कि में बहुत भाग्यशाली हु कि मुझे राहुल बारपुते, कुमार गन्धर्व, बाबा डीके और विष्णु चिंचालकर" गुरूजी" जैसे लोगो का साथ मिला , मै कह सकता हू कि मैंने इन्हे देखा ,छुआ और इनसे सिखा है । कालांतर मै देवास मे नईमजी के साथ नवगीत क्या होता है यह जाना तब समझ आया कि मुक्तक भी परिवर्तन की एक विधा है और यदि यह छंद पुरी शिद्दत से लिखा जाए तो ना मात्र सिर्फ़ हममे परिवर्तन आता है बल्कि हमें यह दुनियादारी भी समझ आती है । डॉक्टर प्रकाश कान्त का गहरा अध्ययन , जीवन सिंह ठाकुर की पैनी राजनितिक दृष्टि , प्रभु जोशी का एक फंतासी दुनिया मे ले जाना और बार बार हम चमत्कृत से होते उन्हें सुनते रहते थे ......... मेरे प्रिय कवि चंद्रकांत देवताले का नाम लिए बगैर यह सब कैसे पुरा होगा? कुमार अम्बुज , विवेक गुप्ता हमारे मित्रो में से थे जो उन दिनों लगातार लिख रहे थे । दुनिया में परिवर्तन का दौर चल रहा था पुरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता वर्ष मन रहा था और यह माना जा रहा था कि बस अब विकास सबके हिस्से में ही होगा और हम जैसे बदलाव कि महत्व्कान्षा रखने वालो को लगता था कि सारा पढ़ा हुआ अब हकीकतो में तब्दील हो जाएगा ।

रादुगा प्रकाशन मास्को कि सस्ती किताबे पढ़कर हम बड़े हुए थे , महाश्वेता देवी, शंकर, सत्यजीत राय निर्मल वर्मा जैसे लोगो को पढ़कर हम ना मात्र परिपक्व हुए बल्कि एक मोटी मोटी समझ विकसित हुई . निर्मल वर्मा का संसार हमें एक फंतासी में ले जाता था और पश्चिम की समझ भी विकसित हुई । निर्मल ने हमें पुरी सभ्यता को एक नए ढंग से देखने का नजरिया दिया . हंस , वागर्थ , पश्यन्ति, आजकल , जनमत , गंगा , साक्षात्कार, बहुवचन, और ढेरो पत्रिकाओ ने हमें छपने के मौके दिए। देश में वामपंथी सक्रिय थे ऐसा हमें लगता था और लगता था कि सर्वहारा के दिन अब आने वाले ही है और बस फ़िर क्या था खूब पढ़ना लिखना और खूब बहस करना ............ इस सबमे प्रमोद शामिल होता था अपनी आदतों और दारू के बावजूद भी वो हमेशा होश में रहता था और हम्सबसे खूब बहस करता था। वो बहुत ही अच्छे नवगीत लिखता था ये बहुत बाद में समझ आया । प्रमोद को दिखावे से बहुत चीढ़ थी और इन समाजवादियों को कोसता रहता था । नईमजी को भी गाली देता था ,मुझे यादहै कुमार गन्धर्व समारोह में वो पीछे बैठता था और फ़िर धीरे धीरे हमें कहता था कि नईमजी के गीतों में वो दम नही है , बुंदेलखंड का नाम लेकर ये भावनाओ को कैश कराते है , और अपने संबंधो को भी कैश कराते है, सारे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियो से सम्बन्ध बनाकर रखे है इन्होने .......... प्रमोद नईमजी के गीतों में मीटर और शब्दों की भी गलतिया निकालता था ,और हम उसके भाषा ज्ञान पर चमत्कृत थे और बाद में समझ आया कि उसका भाषा ज्ञान कितन वृहद् था ।

प्रमोद ने हमारे भी कई जाले साफ किए थे इसीलिए वो सारी आदतों के बावजूद भी प्रिया व्यक्ति था । बहदुर से उसकी दोस्ती बहुत घनिष्ठ थी । उसके दो बेटे थे , विप्लव और पप्पी -बाद में जब मुखर्जी नगर में प्रमोद ने घर बना लिया तो एक बार गुस्से में एक बेटे ने एक आदमी का खून कर दिया था , उस कारन वो बड़ा परेशां रहा कई दिनों तक, शरीर साथ नही देता था , शिक्षा विभाग का भला हो कि उसे उज्जैन रोड के ही एक स्कूल में ही स्थानांतरित कर दिया था और वह दीक्षा प्रदीप दुबे जैसी भली शिक्षिका थी जिसने सब सम्हाल लिया था , प्रमोद स्कूल कभी जाता ही नही था बस घर पर ही रहता था । हा पीना जारी था बदस्तूर .......... एक ऑटो आखिरी दिनों में ,ऑटो वाला उसे शराब के अड्डे पर ले जाता था और प्रमोद पीकर लौट आता था घर पर एख भाभी ने भी समझौता कर लिया था हालाँकि रखा के साथ लड़ते लड़ते उसकी उम्र निकल गई थी, रेखा भी भौरांसा में पद्धति थी , पर क्या करती आखिर पति परमेश्वर होता है...

प्रमोद कि एक आदत से सब परेशान थे उधार लेने की आदत से ........ वो अक्सर रात में आ जाता था और ले जाता था........ पर एक बात है उसने कभी उधारी बाकि नही रखी किसी की अब का नही पता क्योकि पिछले ५ बरसो से में भोपाल में हू तो जानकारी नही है पर मेरी जानकारी में उसने किसी की उधारी नही रखी..........अपनी बीमारी ने उसे मार डाला था , जीते जी आँखे लगभग अंधी हो गई थी फ़िर भी वो किसी को छोड़ता नही था , कहता था साले सम्पादक भी मादरचोद है सबके सब...... कुछ समझ नही है ,न भाषा की ,न कविता की और यहाँ चोर बैठे है सब ........... । प्रमोद जोर से हँसता था और कहता था की बस यार दिखता नही है बहादुर पटेल अपना पटवारी है और मेरा यार है वही कविताये रखेगा, दिनेश पटेल ने कुछ टाइप कर के रखी थी अब पता नही वो कहा होंगी । अक्सर अस्पताल और घर के बिच वो झूल रहा था बहादुर ही उसे इंदौर ले जाता और ले आता था पर हा अब वो लगभग शांत हो चला था । पिछले बरस मेरी माँ की जब मृत्यु हुई तो वो घर आया था और मुझे सम्जहते हुए बोला "यार संदीप , सबको मरना है प्यारे दुःख कहे को करता है में मरूँगा तो आयेगा कि नही... और धीरे धीरे बोलता रह था अपने बारे में और परिवार के बारे में । उसका बागली का प्रेम खत्म नही हुआ था बागली उसका अपना घर था और लगभग नौस्तल्जिया की तरह बागली उसके अन्दर जिन्दा था पूरी शिद्दत के साथ...........
हंस में रविन्द्र कालिया ने एक कालम शुरू किया था "ग़ालिब छूटी शराब......" उसमे भी प्रमोद ने अपना खूब चिटठा लिखा था ......... देवास में तब लिखने वालो के दो ही समूह थे जो हंस में छपे है और जो हंस में नही छपे है ..........!!!! हम सब लोग धीरे धीरे हंस में छाप ही गए पर ये रविन्द्र कालिया बनाम प्रमोद की बहस को खूब पढ़ते थे और चर्चा भी करते थे।

प्रमोद ने दरअसल में हिन्दी नवगीत को एक नै भाषा दी थी और एक नए तेवर के साथ वो लिखता था......

प्रमोद और नईमजी को बॉम्बे अस्पताल ने लील लिया । नईमजी के मृत्यु के बाद वो भी टूटा था अन्दर से और लोगो की तरह पर कह नही सकता था क्योकि जिंदगी भर तो उन्हें गालिया देता रहा । मुझे नही पता की नईमजी की मृत्यु के बाद मातम पुरसी को गया था की नही पर नईमजी के घर के लोग जरुर जायेंगे उसके घर ये मेरा विश्वास है ।

देवास में दो गीतकार रहे और इंदौर के एक ही अस्पताल ने दोनों को लील लिया यह कोई आतंक से कम है ,पर होनी को कोई टाल नही सकता यही सच है .......... बहादुर ने आखिरी तक साथ निभाया है तो निश्चित ही उसके पास स्मृतिया ज्यादा होंगी पर में सिर्फ़ यही कह सकता हु की प्रमोद तुम्हारे नए गीतों की अभी हमें जरुरत थी.पिछली बार वीर धवल पाटेकर ने अपने एवरेस्ट स्कूल में एक दिन का कार्यक्रम किया था तो हम सब साथ थे पुरा दिन कमोबेश और वो अन्ना ( प्रकाश कान्त )से मुह छिपाता रहा था । मुझसे बोला संदीप मुझे भोपाल आना है तेरे पास रुकूँगा और उस साले राजेंद्र बंधू से भी मिलूँगा जो उसका पुराना साथी था , मैंने कहा था में जब भी सात आठ दिन लगातार भोपाल में रहूँगा तभी बुलाऊंगा ताकि सबसे मिल सको और हम खूब गीत सुन सके और खूब बातें भी कर सके पर कहा हो पता है सोचा हुआ सब ........

प्रमोद का जन देवास के साहित्य में एक शुन्य का हो जन है सिर्फ़ तीन माह में दो बड़े गीतकारों का यू चुपचाप एक ही अस्पताल में गुजर जाना बेहद खलता है , दोस्तों पर क्या कोई और इलाज है हमारे पास , सिवाय नमन कहने के ........

नईमजी और प्रमोद आप दोनों बहुत याद आओगे .......... श्रद्धा सुमन ..............