Tuesday, February 20, 2018

Manohar Parrikar , CM with Lots of Love and prayers for you 20 Feb 2018

Manohar Parrikar , CM, Goa
 with Lots of Love and Prayers for you 

पर्रिकर ने बीफ़ ज़्यादा खा लिया क्या ? विदेश जाना पड़ रहा है इलाज के लिए
मैं के रिया था एक बार रामदेव को दिखा देते पेले !

धिक्कार है नेहरू से लेकर मोदी सरकार तक जिसने सत्तर वर्षों में देश मे एक भी अस्पताल विकसित नही किया जहां सारी सुविधाएं हो, जांच हो और समुचित इलाज हो सकें। इससे तो सिंगापुर ठीक है छोटा सा बित्ता भर देश जहां विश्व का बेहतरीन अस्पताल है। क्या हमारे डाक्टर और पैरा मेडिकल स्टाफ इतना योग्य नही कि एक आदमी का इलाज कर सकें।
हजारों लाखों बच्चों को मारकर किसकी दुआएं मिलेंगी सोचा कभी, तुम सब इतने कमींन हो कि नवजात बच्चों और गर्भवती महिलाओं का पोषाहार खा जाते हो और उन्हें मरने को छोड़ देते हो तो क्या इलाज की व्यवस्था करोगे ?
मुम्बई में कोकिला बेन अस्पताल भी नही, क्या अपोलो फोर्टिस और एम्स मात्र बिल देने की मशीनें है , PGIs लखनऊ और चण्डीगढ़ सिर्फ डिग्री देने की गौ है ? यह सवाल आपको नही मथते तो आपको अब समझ आ रहा कि स्वास्थ्य में बजट की कमी और शिक्षा में मूर्ख लोगों को लीडरशिप देने का क्या अर्थ है ?
आये दिन उठ सुठकर कोई भी ससुरा पंच पार्षद या प्रतिपक्ष का नेता विदेश चला जाता है और हमारी मेहनत का रुपया बर्बाद होता है इनके इलाज में।
जिस देश की संस्कृति पर गर्व करके आप तमाम पतंजलि और आयुवेदाचार्यों को याद कर फुले नही समाते वे कहां चले जाते है। पोछ दो सुश्रुत, चरक के नाम बन्द कर दो बैद्यनाथ और हमदर्द की दुकान, उस रामदेव को अनुदान देना बंद करो और सब अस्पताल बन्द करके आधार कार्ड बनवाते रहो सुतियों और फिर हवाई टिकिट बांटो।
अब चुनाव आ रहा है जाहिर है उल्टी दस्त तो लगेंगे ही तुम्हे
भाजपा नही विदेश में जाने का विरोध है 

जब तक पूरा नही पढोगे चश्मा हटाकर तब तक कुछ नही पल्ले पड़ेगा वकील साब। 

सही है पर जिस देश मे बच्चों को मरने के लिए छोड़ दिया जाए, स्वास्थ्य का बजट कम करके रामदेव जैसे व्यवसायी को हर प्रकार की छूट दी जाए वहां मनोहर पर्रिकर को विदेश जाने की जरूरत क्यों है। क्या व्यापमं अब देश व्यापी समस्या है ? 
अगर तंज भी समझ नही आ रहा तो क्या करें कोई ?

क्यों नही कैंसर अस्पताल बनवाये और जो है वे क्यों नही दक्ष है । 

मैंने सबको घसीटा है। हम सब दोषी है जो सत्ता के भूखे नालायकों जो मूल सुविधा ना देने पर कुछ नही बोलें और ये घोटालेबाजो के साथ पार्टियां उड़ाते रहें। 

भाजपा की बात ही नही , कैंसर से 5 % आबादी पीड़ित है सबको भेजो आप जिसे पढ़ते हो संविधान वहां तो सब बराबर है ना आनंद बाबू राजा या रंक फिर भेदभाव क्यो ?

मेरी पूरी दुआएं उनके साथ है पर 126 करोड़ के लोगों का क्या

कभी सोनिया, कभी कोई यानी हर कोई जनता की गाढ़ी कमाई का रुपया उजाड़ने विदेश जाता है। क्यों ना यहां के अस्पताल बन्द कर सबको सरकार विदेश भेजें।

Monday, February 19, 2018

Posts of 16/17 Feb 2018



यदि देश की पूरी जनता न्यूनतम राशि बैंक में ना रखने पर दण्ड देने से मना कर दें और अपने खाते ही बंद करवा दें तो इस सरकार की खटिया खड़ी हो जाएगी
रिजर्व बैंक के इस तुगलकी आदेश का विरोध कीजिये और उखाड़ फेंकिए मक्कारों और भ्रष्ट लोगों को ।
बैंक से झगड़िये, बैंक लोकपाल को शिकायत करिये और संगठित होकर अपना प्रतिरोध दर्ज करिये।
नही तो इस बैंक व्यवस्था को उखाड़िये।
जिस इंदिरा गांधी ने हिम्मत कर बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था दुर्भाग्य देखिये कि उसी पद पर बैठकर नरेंद्र मोदी सरकार ने बैंक व्यवस्था को तहस नहस कर दिया।
इससे शर्मनाक क्या होगा कि आम जन से जुड़ी एक संस्था को भ्रष्ट सरकार ने भ्रष्ट बनाकर दीवालिया बना दिया और अपने स्वार्थ के लिए अपने ही लोगों से इस स्थापित व्यवस्था को भंग कर देश की जनता का विश्वास खो दिया।
मूर्खों की बातों में ना आकर अपने हित का सोचिये, ये देश इन नीरव मोदी , अम्बानी , अडानी या मेहुल चौकसे से लेकर भ्रष्ट राजनेताओं और अंध भक्तों का नही हम सबका है। बोलिये वरना ये कल आपको मार डालेंगे और आपकी मृत्यु का बेशर्मी से जश्न मनाएंगे।

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देश की सर्वोच्च से लेकर तहसील स्तर की परीक्षा से उत्तीर्ण होकर आए लोग जब शौचालय सर्वे और देश के सुशासन की स्थानीय इकाइयाँ पूरा ध्यान अपने कस्बे शहर को सिर्फ और सिर्फ स्वच्छ बनाने में लगी हो तो विकास की प्राथमिकता सरकार की क्या है यह समझना रोचक ही नही आवश्यक भी है।
सुबह उठकर प्रधान सेवक की आवाज बांटती गाड़ियों का प्रयोजन प्रशंसनीय है पर सारी प्राथमिकता सिर्फ संडास और कचरे पर आकर टिक जाए तो गंदगी कहां कहां है सोच से लेकर क्रियान्वयन तक मे आसानी से समझा जा सकता है।
मैं विरोधी नही हूँ पर एक नम्बर की होड़ ने जिस तरह से कलेक्टर, निगमायुक्त और पूरी मशीनरी काम कर रही है वह चिंताजनक इसलिए है कि बाकी सारे काम ठप्प है। यह देश कब तक लुभावने नारों, जुमलों और कोरे आश्वासनों पर चलेगा। सातवे वेतन आयोग का मोटा रुपया खाकर हमारे टुकड़ों पर पलने वाले कर्मचारी सिर्फ संडास का काम करें यदि आपको यह समझ नही आता तो आपकी बुद्धि पर तरस आता है। और इस संडास के पीछे की गंदगी में सत्ता पक्ष हम सबको मल में धकेल रहा है।
जाइये जिला कलेक्टर से , निगम आयुक्त से हिम्मत कर पूछिये कि क्या आप इसलिए आये थे कि संडास बनवाओगे इसलिए इतनी पढ़ाई की थी कि इस सरकार के दबाव में आप अपने संविधानिक कर्तव्य भूल जाये ? लिखिए और आवाज उठाइये इस जड़ और जर्जर हो चुकी प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ।
तय करिये - नौकरी, आजीविका, रोजगार , विकास , सौहाद्र, भाईचारा, समानता, समता, सबका उत्थान या संडास की प्राथमिकता ?
देश हमारा है और चन्द कांग्रेसी या सत्ता पक्ष को तय करना है कि हमारा वर्तमान और भविष्य कैसा हो या हम आप करेंगे यह निर्णय।

Friday, February 16, 2018

पाब्लो नेरुदा - "इस तरह मरते है हम" - अनुवाद - संदीप नाईक



"इस तरह मरते है हम"
पाब्लो नेरुदा 
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अनुवाद - संदीप नाईक 

मरना शुरू होता है धीरे से 
जब तक शुरू ना हो एक यात्रा 
शुरू नहीं करते बांचना जीवन का ककहरा
सुनना शुरू नहीं करते जीवन संगीत और अनहद नाद 
शुरू नहीं करते पहचानना अपने आपको 
इस तरह मरना शुरू करते है धीमे से 
मार देते है जब अपने जमीर को 
बंद कर देते है दूसरों से मदद लेना अपने लिए

तो मरना शुरू करते हो आप
अपनी बनाई आदतों के गुलाम बनते हुए 
एक ही पथ पर चलाते हुए जीवन को 
अगर नहीं बदलते ढर्रा अपना रोजमर्रा का 
नहीं खोज पाते जीवन के रंग बिरंगी संसार को 
मुखातिब नहीं होते अगर अनजान लोगों से 
तो यकीन मानिए आप मरना शुरू कर रहे हो

जान ना पायें अपने आप को और अनजान रहे अपनी ही प्रकृति से 
उद्दाम और अशांत भावों को समझने में असमर्थ 
समझाने में उन्हें, जिनको देखकर खुद की ही आँखों में चमक आ जाती है 
अपनी तेज साँसों के स्पंदन को ह्रदय में उछलता महसूस करो 
तब हो जाता है मरना शुरू

असंतुष्टि भी नहीं बदल पाती जीवन का एकाकी राग 
पगुराए प्रेम से व्यथित होकर भी नहीं बदलना चाहते 
अनिश्चित कल के लिए जोखिम लेने को तत्पर ना हो 
दौड़ ना जाएँ एक पनीले स्वप्न के पीछे 
भागे ना हो महत्वपूर्ण क्षणों के अवसर पर एक बार भी जीवन में 
कुछ ऐसा करने कि जो दिल ने चाहा करें और चाहे 
दिमाग कहें कि चढ़ती धुप में एक मदमस्त बेखौफ घोड़े को ना दौडाओ

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए Posts from 10 to 15 Feb 2018



हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए 


पसीना तो अभी से आने लगा है 2018 की फरवरी ही बीत रही है, केंद्र सरकार के बने बनाये खेल के परखच्चे उड़ने लगे है । मोदी सरकार के वादों पे क्या जिये और क्या किया ये सवाल लोग उठा रहे है।
परभणी और गडचिरोली की दास्तान बहुत भयावह है। यहाँ के बहुत अंदर के गांवों के लोगों से मिलकर भयावह कहानियां सुनकर हैरान हूं।
शिक्षा, स्वास्थ्य और खेती की ही बातें भयावह है। मराठवाड़ा और विदर्भ के इलाको में दूर दूर तक फैले भ्रष्टाचार, महंगाई, राजनीति और प्रशासन के संजाल में गुम्फित किसानों की दरिद्रता , विपन्न स्थिति और दहला देने वाली कहानियां सुनकर आपको इस विशाल देश का नागरिक होने में शर्म महसूस होगी।
अच्छी बात है कि आदिवासी और दलित युवा पढ़कर आये है बहुत बारीकी से सबकुछ समझकर अपने समुदाय, जंगल और जमीन के लिए लड़ रहे है। वे भीम राव अम्बेडकर को आदर्श मानकर फुले और सावित्रीबाई का अनुसरण करते हुए सही काम कर रहे है। इनकी बातचीत और चर्चा में जो बगावती तेवर, व्यवस्था के प्रति आक्रोश और बदलाव का जज्बा नजर आता है वह स्तुत्य है।
सबसे अच्छी बात जो मुझे लगी कि कर्वे कॉलेज और टाटा सामाजिक शोध संस्थान तुलजापुर और मुम्बई कैम्पस ने इस क्षेत्र के युवाओं को समाज विज्ञान में दीक्षित करके बहुत बड़ा काम किया है। दूसरा स्थानीय एनजीओ ने इन्हें मौके उपलब्ध कराकर इनकी क्षमता का इस्तेमाल भी बेहतरीन किया है।
मुझे 3 ऐसे युवा मिलें जिन्हें 2011 मैंने तुलजापुर में पढ़ाया था जब वे टाटा के मुम्बई कैम्पस में प्रवेश के लिए तैयारी कर रहे थे। आज पी एच डी करके वे यहां जिस दम खम से लगे है और देश प्रदेश की राजनीति, संघिकरण और प्रशासन की खामियां उजागर करते है वह दर्शाता है कि शिक्षा का बदलाव से क्या सम्बन्ध है और बाबा साहब के सपनों को कैसे ये अंजाम दे रहे है। प्रोफेसर साईबाबा से लेकर गडचिरोली के नक्सलवाद पर बात करते हुए मेरी अपनी भी समझ साफ हुई है और यह स्वस्थ है। ब्राह्मणवाद को गलियाते ये लोग जातीय व्यवस्था के कुचक्र में फंसे लोगों को उबारकर मानवीय गरिमा के अनुरूप व्यवहार चाहते है जो उन्हें वर्तमान व्यवस्था में नही मिल रही है।
भाई Kailash Wankhede , अग्रज Asang Ghosh जी की कहानियां और कविताएं याद आई । काश हम लोग कभी साझा यहाँ आकर इन लोगों से, इन युवाओं से मिल सकें और कुछ सार्थक रच पाएं।
बहरहाल इन सबके लिए बहुत प्यार और दुआएं कि इनके सपने बड़े हो और सफल हो।
Satyajit KaleVishnu Govindwad , Akshat Krishna Ganesh Mane - मैं , संतोष मैकाले के भाई सुनील से मिला जो कल्पना का भी भाई है। तुम सबको यहाँ खूब याद किया पिछले 4 दिनों में। तुलजापुर कैम्पस के तुम सब युवा लोग आज कितना बढ़िया और प्रेरणादायी काम कर रहे हो वह सच मे महत्वपूर्ण और जरूरी है।

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हिन्दी में अश्लील लिखकर आज के युवा कवि और लड़कियों की निहायत निजी समस्याओं का सार्वजनिक प्रदर्शन कर लिखने वाली कवियित्रियों सेे हिंदी कविता का कोई भला नही होने वाला है पर अब यह फार्मूला बाजार में चल पडा है और इसी को सीढ़ी बनाकर ये लोग यश कीर्ति की पताकाएं फहराकर जीवन में इस शार्टकट से सब कुछ पा लेना चाहते है.
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मेरा सुझाव है कि एक पंचायत बुला लें नवजात शिशुओं की मामाजी के बंगले पर ताकि मामाजी उन्हें डाँट भी सकें कि मर क्यों रहें हो और घोषणा कर सकें कि मंदिर में दर्शन करने से शिशु मृत्यु दर नही बढ़ेगी और प्रदेश का नाम रोशन होगा। आप कहेंगे तो इन शिशुओं के लिए एक शिशु यात्रा भी किसी मठाधीश की अगुवाई में निकालें नर्मदा किनारे !
शायद मामाजी को याद भी नही होगा कि अपने बंगले पर कितना अरबों रुपया पंचायतों पर फूंक दिया और नतीजा क्या निकला। अपने नवरत्नों के सुझावों में मदांध होकर क्या पाया क्या खोया पर अब इस साल के अंत मे विचार करेंगे जब चुनाव से बाहर होंगे। इन्हें नर्मदा परिक्रमा कर रहें दिग्विजय सिंह को देखकर भी भय नही लगता कि सत्ता का अंत कितना भयावह होता है। नवजात बच्चों की इनके तन्त्र द्वारा की जा रही सामुहिक सोउद्देष्य हत्या को रोक नही पा रहें - अभी तक पोषाहार और पूरक आहार की कोई नीति नही बनी है। गत 15 वर्षों में आंगनवाड़ी में भ्रष्टाचार होता रहा और सरकार चुप रही - क्यों ?
मप्र में 15 सालों में कुपोषण , शिशु और मातृ मृत्यु दर की पूछो ही मत पर ना विपक्ष में कुछ दम है और सत्ता को यात्राएँ और नाटक से फुर्सत नही है। और मजेदार यह कि इन्हें अब शर्म भी नही आती
Deepak Tiwari जी, जो वरिष्ठ पत्रकार है, ने आज दो समाचारों को तुलना करते हुए सवाल उठाया है कि क्या जरूरी है ? पर मुख्यमंत्री को कोई फर्क पड़ता है क्या, आखिरी दिनों में दीनहीन बनकर समेटने में लगे है । जितना नुकसान प्रदेश और भाजपा का इस इकलौते आदमी ने किया है उतना तो कांग्रेस पूरे देश का 56 वर्षों में नही कर पाई।
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चचा जान
एक बात सुन लो और गाँठ बांध लो, अपने इस्मार्ट फोन फेंक दो समंदर में और चुपचाप अजान देते रो, तुम एक वही काम ढंग से कर सकते हो ! बोलो क्यों,
इसलिए कि इस्मार्ट फोन में बीडीओ कॉलिंग होती हेगी, चेहरे दिखते है, बीडीओ चलते है, फोटू दिखती है और जे सब बुतपरस्ती है मियाँ, तौहीन है खुदा की और इस्लाम के ख़िलाफ़ है !!!
अरे जाहिलों , एक छोटी सी बच्ची अभिनय कर रही है व्यवसायिक तौर पर और जहीन वह लड़का भी रुपयों के लिए - शोहरत के लिए जीवन का बेहतरीन अभिनय कर रहा है। कितने लोगों की मेहनत के बाद यह दो मिनिट का बीडीओ बना है खां और तुम रपट करा बैठे। अजीब अहमक हो और परले दर्जे के उजबक !!!
तुम देखें ही क्यों , गर नैन मटक्के से दिक्कत है तो, उन शेखों को कोसो और समझाओं ना जो छोटी बच्चियों को अपनी हवस बुझाने के लिए खरीद कर ले जाते है।
हद कर रहे हो , कितने पिछड़े और मूर्ख हो, तुम्हारे मजबूत संस्कारों की जड़ एक बीडीओ देखने से हिल गई, अर्थात "मन भाये और मुंडी हिलाएं"
कौन मानता है तुम्हे जे तो बताओ मियाँ, इतना भी क्या अपराध बोध और अटेंशन सीकिंग व्यवहार कि मुहब्बत पर जल भूनकर रपट लिखाने चले गए! ओये ठंड रख भई , ये देश, दुनिया मुहब्बत करने वालों से आबाद और ज़िंदा है और मंजूर नही तो जाओ दोजख में और ज़िंदा रहने दो सबको, तुम ससुरे होते कौन हो पहरेदार की भूमिका निभाने वाले ?
तुम एक रपट लिखाओगे हम हजार प्रियाओं के बीडीओ डालेंगे, तुम एक लव जिहाद पकड़ोगे हम लाख बार प्रेम करेंगे। जाहिलों, गंवारों और मूर्खों से दुनिया चलती तो हिटलर, सिकन्दर , हलाकू , औरंगजेब या सद्दाम हुसैन से लेकर जिया उल हक की मजार घूमकर आ जाओ और जगह मिलें तो वही बगल में हम मजनूँ खोदकर तुम्हे भी सुला देंगे, तशरीफ़ तो तुम्हारी बचेगी ना तब तक बैठने लायक !
याद रखना, जो भी मुहब्बत के रास्ते मे जितनी टाँग अड़ाएगा वह उतनी ही शिद्दत से मुहब्बत के पौधे रोपेगा। मैं मुतमईन हूँ कि हम मुहब्बत करने वाले तुम जैसे कमज़र्फ और जाहिलों से डरेंगे नही।
प्रिया पर मुझे गर्व है, मेरी बिटिया होती तो उससे 100 बीडीओ रोज बनवाता ताकि तुम जैसे कम अक्ल लोगों को जलभुनकर खुद किसी अरब सागर में जाकर डूब मरने के रास्ते खुलते। तुम हो या कोई भी , तुम सब मानसिक रोगी हो और खुजली के मरीज, जाओ किसी सड़क छाप नीम हकीम जैसे डाक्टर शाहनी, चोपड़ा के पास दिमागी भगन्दर और मुंह की बवासीर का इलाज करवाओ।
मुहब्बत के दुश्मन जरा होश में आ !!!
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देश मे सक्षम राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट होता तो ये सरकार एक पल में बर्खास्त हो जाती, इतनी भ्रष्ट, अविश्वसनीय और दादागिरी वाली तो काँग्रेस भी नही थी। न्याय से लेकर बैंक और लोगों की रोजी रोटी का सत्यानाश करने वाली इस सरकार को इतिहास में सबसे नाकाम्याब और लोकतंत्र के विरुद्ध काम करने वाली निकम्मी सरकार के रूप में याद रखा जाएगा।
अब समझिए राष्ट्रपति पद पर एक अनजान चेहरे को लाकर थोपना और दीपक मिश्रा को मुख्य न्यायाधीश बनाने का खेल।
चार न्यायाधीश यूँही बाहर नही आये थे और रजत शर्मा से लेकर सुधीर चौधरी, विद्यानाथ झा, रोहित सरदाना या अर्णब को टुकड़े यूँही नही डाले जा रहे।
गुंडागर्दी से लेकर भलाई तक के सभी काम क्या और कैसे हो रहे समझिए। आज आपके बचत पर इन्होंने डाका डाला है कल आपके घर मे झांकेंगे ।
अब तो भक्ति बन्द करिये या श्मशान में जाकर अक्ल आएगी, गेहूं खाते है या गोबर ?

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ये है असली मोदियापा
ललित
नीरव

और तीसरा
बूझो तो जानो
ये बीमारी खतरनाक और हद से ज्यादा घातक है।
क्यों ना राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को कहा जाए कि कोई कारगर जवाब ढूँढे इसका।
पूरे देश जो कूड़ा घर बना रखा है इन्होंने !
गोबर खाकर जो भक्त बनें है
नही सुधरेंगे, नही सुधरेंगे !!!


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जिस दिन भी एक समझदार प्रशासक, पुलिस कर्मी और न्यायाधीश आ गया यकीन मानिए ये सारे फोर्ब्ज, टाईम्स वाले करोड़पति और राजनेता जेल की चक्की पिसेंगे और देश मे सचमुच अच्छे दिन आएंगे। नीरव मोदी, चौकसे, अम्बानी बन्धु, अडानी और इस माला के सब मोती ! देश का नेतृत्व बिल्कुल खाली है मने कि एकदम नीचे से ऊपर तक और सबसे ऊपर तक सब खाली मटके, थोथे चने और बाजे भी नी घने !

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चार मोदी भारत भूमि के, चारों धूर्त प्रवीन,
आईपीएल खाके एक चल दिया, बाकी रह गए तीन.

तीन मोदी भारत भूमि के, उड़ने लग गए वो,
सृजन घोटाला किया एक ने, बाकी रह गए दो.

दो मोदी भारत भूमि के, दोनों नहीं थे नेक,
बैंक लूटकर एक भग लिया, बाकी रह गया एक.

एक मोदी भारत भूमि का, फेंके है दौड़ा-दौड़ा, 
झोला लेकर ये भी चल देगा, बाक़ी बचेगा पकौड़ा.

Rahul Kotiyal 
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रवि शंकर प्रसाद भोत ग़ुस्से में है
एक पत्रकार ने पूछ लिया शाम को पत्रकार वार्ता में कि
" ये एन मोदी जो रुपया लेकर भाग गया है और देश को चुना लगाया है, सरकार क्या कर रही है" ?
रवि बाबू - " आपको शर्म आना चाहिए देश के प्रधान मंत्री के खिलाफ ऐसा बोल रहे हो, आपको देख लूंगा ..."
पत्रकार - " सर जी मैं एन मोदी मतलब नीरव मोदी की बात कर रहा हूँ "
रवि बाबू - " साले, मुझे क्या बेवकूफ समझा है , एन का मतलब मुझे या सरकार या देश को नही समझता क्या"
इतना कहकर वो माईक उठाकर मारने के दौड़ पड़े !!!

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रविशंकर प्रसाद ने कल कहा कि '' फोटो की राजनीति न करे कांग्रेस ... हमारे पास भी खूब फोटो हैं आपके नेताओं के घोटालेबाज़ मेहुल और नीरव के साथ के "
हार्दिक की सीडी से लेकर सबकी सीडी है तुम्हारे पास, तुम मंत्री हो या सड़कछाप वीडियो मिक्सिंग करने वाले घसियारे।
और यही काम रह गया है भाजपा के पास अब कि दूसरों के शयन कक्ष में वयस्क लोगों की सीडी ही बनाते रहें। 
शर्म करो, या आदत पड़ गई है अपने आदर्श की जिन्होंने एक महिला का पीछा करते करते उसका जीना मुहाल कर दिया था।

साला देश है या मूर्खो का जमघट, देश का केबिनेट मंत्री सरे आम पत्रकार वार्ता में सीडी जैसे कायर हथियार की बात कर बदला लेने जैसी बात करता है। कल इसकी हरकत और थोबड़े पर आया गुस्सा इसकी असली औकात बता रहा था।
जब किसी के पास कोई तर्क और दिमाग़ नही रह जाता तो दूसरों के चरित्र पर हमला करता है जो असल मे सबसे आसान है और नीचता की हद !
यह देश का दुर्भाग्य ही है कि हमें ऐसे लोग हमेशा से मिलते रहें है जो अपनी कमजोरियों को दूसरों के चरित्र पर आरोप लगाने में माहिर है।
यह चरित्र आपको प्रशासन, राजनीति, कार्पोरेट्स, उद्योग, एनजीओ और मिडिया में बहुत आसानी से मिल जाएंगे। यह समय अब इतना खतरनाक है कि सबसे नाकारा, निकम्मे, हरामखोर और भ्रष्ट लोग या जिनके भी कम्फर्ट ज़ोन पर सवाल उठाये जाते है - वे सबसे पहले अपने गुण दोष देखने के बजाय या काम करने के बजाय सामने वाले के चरित्र पर दाग लगाने की शुरुवात करते है ताकि लोगों का ध्यान मूल मुद्दों से भटककर चटखारों में लग जाये।
दिक्कत यह भी है कि खुले दिमाग वाले नकली, पाखंडी और तथाकथित बुद्धिजीवी भी इनके बहकावे में आ जाते है और रविशंकर जैसे घटिया लोगों की बात मान लेते है जोकि एक तरह का डिफेंस मैकेनिज्म होता है। आम लोगों की तो समझ बहुत ही दयनीय और कमजोर होती है।
सावधान रहिये और किसी के चरित्र पर संदेह करने से पहले कहने वाले व्यक्ति और कहे जाने वाले की नीयत पर शक कीजिये और उस तार को ढूँढिये जो क्या आग पैदा करने वाला है।
रविशंकर जैसे उन तमाम लोगों को याद रखना चाहिए कि वयस्क व्यक्ति की निजी जिंदगी होती है और उसमें ताक झांक करना नीचता, लम्पट और कमीनगी की हद से गुजरा हुआ व्यवहार है। और अब सुप्रीम कोर्ट निजता के हक की बात को भी मूल अधिकार के रूप में निरूपित कर चुका है अगर यह समझ नही है तो अरब सागर में डूब मरो कम्बख्तों।

Tuesday, February 6, 2018

"मैं हताशा को जानता था, आदमी को नही" 6 Feb 2018


"मैं हताशा को जानता था, आदमी को नही"
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दरअसल में यह एक खीज है जो अपढ़ लोग पढ़े लिखे और योग्य लोगों के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे है। इसे एक षड्यंत्र के रूप में देखें जिसमे चाय बनाने वाली इमेज को एक विश्व विख्यात अर्थ शास्त्री के खिलाफ और अँग्रेजी बोलने लिखने और बाहर पढ़कर आने वाले महात्मा गांधी, नेहरू, राजीव गांधी, इटली से बहू बनकर आई सोनिया गांधी और राहुल गांधी को एक मजाक बनाकर चाय बनाने वाले की इमेज को पुख्ता किया गया।
जिस तरह से इस व्यवस्था और इनकी आई टी सेल ने दुष्प्रचार किया वह बेहद गलीज़ और अभद्र था कम से कम पार्टी प्रमुख और प्रधान मंत्री की गरिमा के अनुकूल तो नही था। भारत जैसे देश के मुखिया की छबि को चाय वाला बनाकर दुनिया मे परोसना भी एक तरह का निवेश लाने का ही कदम था और इसके लिए अगर आप मोदी के पहले दो साल देखें तो वे देश छोड़ विदेश में ही रहें और सूचना के अधिकार कानून की धज्जियां उड़ाकर सरकार उनसे संबंधित सारी जानकारियां छुपाती रही शिक्षा की बात हो या किसी स्टेशन पर चाय बेचने की- इतने विशाल देश में एक व्यक्ति नही मिला जो इस बात का गवाह हो।
फिर तीन साल के अंत में जब गुब्बारे फूटने लगें और लोगों ने 15 लाख से लेकर रोज़गार, महंगाई, नोटबन्दी, जी एस टी से लेकर सैनिकों की मौत के मुद्दों पर जवाब मांगे , ईवीएम की धांधलियों से लेकर गोरखपुर में बच्चों की मौत का हिसाब मांगा तो जाहिर है भाजपा और संघ में बौखलाहट थी। तीन साल में मोदी ने मीडिया को कभी फेस नही किया बल्कि खरीदकर विदेशियों का रूपया उजाड़ने वाले खेल , बुलेट ट्रेन के मुंगेरीलाल वाले सपने दिखाने के लिये ही मीडिया का बेजा इस्तेमाल किया।
आखिर में जब कुछ भी नही बचा, सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों ने न्याय पर सवाल किए और मुख्य न्यायाधीश के पूर्वाग्रह और सरकार का आदमी बन फैसले लेने पर खुलकर सामने आए और जस्टिस लोया की मौत ने सुगबुगाहट से ढलती सर्दी के मौसम में गर्मी ला दी तो सुधीर चौधरी जैसे घटिया और उजबक पत्रकार को साक्षात्कार दिया जो पूर्ण रूपेण स्क्रिप्टेड था और दुनिया के इतिहास का निकृष्टम साक्षात्कार ।
विदेशी निवेश लाने के नाम पर हर वर्ष गुजरात से शुरू कर मप्र और तमाम राज्यों में जो गत 15 वर्षों में इन्वेस्टर मीट हुई या नौटन्की, स्टार्ट अप से लेकर विनिवेश और युवाओं के लिए जो ऋण का हवाई किला खड़ा किया गया वह भी ध्वस्त हो गया। संडास बनाने में भी फेल हो गए कूड़ा कचरा इकठ्ठा करने के नाम पर सौ शहरों में स्थानीय व्यापारियों और अपने लोगों को स्मार्ट सिटी के नाम पर लॉलीपॉप दिए गए और अरबों रुपये की बर्बादी कर दी - बगैर पानी का इंतज़ाम किये संडास के ढाँचे बनाकर लोगों की मजार बना दी।
फिर एक भयानक मजाक किया और कहा कि पकौड़े बनाना भी रोजगार है । निश्चित है और बेहद सम्मानजनक है। इसमें कोई शर्म की बात नही, यह एक गिरा हुआ काम बताना भी लोगों की गलत व्याख्या है जैसे विरोध में लोग पोलिश करते है या झाड़ू लगाते है तो क्या पेशा खराब है पर एक वैज्ञानिक समय मे और डिजिटल प्रमोशन के समय मे पकौड़े का विकल्प देना मानसिक दिवालियापन है। यह सुधीर चौधरी , रोहित सरदाना या रजत शर्मा जैसे मूर्ख पत्रकारों का रविश कुमार को दिया एक जवाब भी है जिसे बड़ी शातिरी से रचा और बुना गया है। क्योंकि रविश लगातार शिक्षा के गिरते स्तर, नौकरी के मुद्दे उठाकर जागृति फैला रहे है।
आज अमित शाह ने राष्ट्रपति ( ??? ) के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव देते हुए मोदी और सुधीर जैसे लोगों के विकल्पहीनता अर्थात पकौड़ों की मजबूरी पर टिप्पणी करते हुए दुनिया की सबसे बड़ी, संगठित, अनुशासित और सांस्कृतिक पार्टी के घुटने टेक देने की बात कही है। आज का दिन याद रखा जाना चाहिए इस मामले में कि ये पार्टी बजट के बहाने देश को बरगला रही है, झूठ के आंकड़ें पेश कर रही है लोकतंत्र के सर्वोच्च मन्दिर में और देश के पढ़े लिखे युवाओं को रोजगार देने के बजाय ठुल्ला दिखा रही है और इन्ही मुद्दों पर जब युवाओं ने सवाल उठाये तो उन्हें देश द्रोही कहकर उनके विवि में टैंक रखवाने की धौंस दी जा रही है। मप्र से लेकर उत्तर पूर्व तक असन्तोष है बस इनके पास घुटने टेकने के अलावा कुछ नही बचा, आज अमित शाह ने यह घोषणा कर दी।
कल 4 युवा मारे आपके समधी ने जिसकी अम्मा को शॉल भेजी थी और जिसकी बिरियानी खाने 3 साल में दस बार चले गए आप। नींद आ जाती है आपको, कसम से मैं सोया नही सारी रात !
अब तो महबूबा के साथ सरकार है आपकी, बाकी सब छोड़ो ये बताओ कश्मीरी पंडितों को बसाने का मुद्दा उठा नही रहें , अभी तक 3.5 साल में तो सबको बसाकर व्यवस्थित कर देना था। ये तो सॉफ्ट मुद्दा है और कुछ करना नही है आपको !
क्यो नही बात करते कश्मीरी पंडितों की अब या महबूबा का दबाव है ? अफजल गुरु की रिश्तेदार से कैसा याराना निभा रहे है। इसी कश्मीर में रोज जवान मार रहा है पाकिस्तान फिर क्यों नही दस सिर मार रहे ? संघ भी ध्यान नही दे रहा -भागवत जी के मुख से तीन साल में एक बार भी पंडित का प नही निकला , क्यों ?
बोलती क्यों बन्द है सरकार - 370 हटाओ नेहरू को खूब गालियां दी है, अब तो आप ही आप हो, हिम्मत करो। 26 जनवरी पर लाल चौक चले जाते - आडवाणी जी मे ये हिम्मत थी - उम्रदराज होकर भी शेर थे, अटल जी के मुरीद इसलिए है लोग कि कर्णसिंह और शेख अब्दुल्ला को घास नही डाली कभी और आप तो महबूबा से दोस्ती निभा बैठे हो जो सेना पर रोज FIR कर रही है। गजब की समझ है
क्या सम्हाल रहे है मालिक - बेरोजगारी, विदेश नीति, शौचालय, स्मार्ट सिटी, 370, 377, दीपक मिश्रा, जस्टिस लोया हत्याकांड, शिक्षा, स्वास्थ्य, विदेशी निवेश, बाबा रामदेव, अम्बानी अडानी, राज्यों में बढ़ती हार , पार्टी के अंदर सर्जिकल स्ट्राइक, कश्मीर, गुजरात, उत्तर पूर्व, कर्नाटक , जी एस टी , नोटबन्दी के दुष्परिणाम, योगी, शिवराज, वसुंधरा, रमणसिंह, यशवंत सिन्हा, गोरखपुर, किम जोंग, अहमदाबाद के झूले, साबरमती आश्रम, गोडसे की कहानी, दस लाख के सूट, सुधीर चौधरी, 600 करोड़ मतदाता, कर्नाटक जैसे छोटे से राज्य में 7 लाख गांव या देश ? आपकी बौखलाहट और गैर अकादमिक क्षमता से हमदर्दी है माई बाप !!!
कल घुटने टेक ही दिए न आपकी पार्टी ने यह कहकर कि पकौड़ा पुराण ही शाश्वत सत्य है और यही वर्तमान और भविष्य है। चुनाव तो जीत जाओगे 2019 में पर 2024 तक अपने लोगों को क्या दोगे - बाबाजी का घँटा ?
कभी आईना देखते हो बाबा ?
अरे हाँ काशी कब से नही गए हो अपने इलाके में ?
शर्मनाक मगर सत्य है !

(शीर्षक पंक्ति - विनोद कुमार शुक्ल की कविता से) 

Monday, February 5, 2018

नीलाम्बर की छाँह में 4 Feb 2018


नीलाम्बर की छाँह में 
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नीला रंग बहुत पसंद है मुझे क्योकि जब साँसों को विराम देना हो तो कुछ ना करो बस एकाध चुटकी कही से कुछ लेकर फांक लो, शरीर की ये जो शिराएँ हल्का नीलापन लिए रहती है ना गहरे भाव से नीली हो जाएंगी इतनी कि इनके अंदर धंसी हुई धमनियां जो ताज़ा खून लेकर स्वच्छंद बहती है , को भी अपने नीलेपन में समा लेंगी जैसे आसमान समा लेता है हर रंग को अपने में !
बहुत दिनों तक मिला नही फिर वो, दिखा नही किसी से पूछा तो पता चला कि शहर से दूर एक दुनिया बसाने की जद्दोजहद में लगा है और सबसे मिलना भी कमोबेश बन्द कर दिया था !
अचानक एक दिन भोर के सपने में दूर से हाथ हिलाते हुए भिन्नाट निकल गया कही। मैं स्मृतियों में याद कर रहा था कौन था वो ?
सुबह नलों में पानी आ रहा था - गर्मियों की दस्तक ने ठंडे पानी से स्नेह बढ़ा दिया है , मुझे आसमान के लाल से नीले होने का बेसब्री से इंतज़ार हर सुबह रहता हैं। आज भी था, जाहिर है मैं जल्दी से छत पर भाग जाना चाहता था।
किसी दोस्त का ही फोन आया था और मैं ताज़े उष्ण पानी को बगैर छुए ही घर चला गया उसके। लोग इकठ्ठे थे और दो बाँस के बीच खप्पचियों मे पड़ा वो मुस्कुरा रहा था। पूरा शरीर नीला पड़ा था - एक नई दुनिया मे उसका नीला पड़ाव एक नील क्रांति से होकर आया था। गेंदे से पीला, गुलाब से सुर्ख लाल और शेवन्ति के फ़ूलों से उसे धवल बनाया जा रहा था।
शिराओं और धमनियों का नीलापन आसमान में एकाकार हो रहा था - यह भी एक सुबह थी !!!

Saturday, February 3, 2018

सूट बूट की सरकार के समानान्तर एक असली आदमी


सूट बूट की सरकार के समानान्तर एक असली आदमी 
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मेरी दिलचस्पी त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मणिक सरकार (बांग्ला डायलेक्ट के लिहाज से मानिक सरकार) के बजाय उनकी पत्नी पांचाली भट्टाचार्य से मिलने में थी। मैंने सोचा कि निजी जीवन के बारे में `पॉलिटिकली करेक्ट` रहने की चिंता किए बिना वे ज्यादा सहज ढंग से बातचीत कर सकती हैं, दूसरे यह भी पता चल सकता है कि एक कम्युनिस्ट नेता और कड़े ईमानदार व्यक्ति के साथ ज़िंदगी बिताने में उन पर क्या बीती होगी। पर वे मेरी उम्मीदों से कहीं ज्यादा सहज और प्रतिबद्ध थीं, मुख्यमंत्री आवास में रहने के जरा भी दंभ से दूर। बातचीत में जिक्र आने तक आप यह भी अनुमान नहीं लगा सकेंगे कि वे केंद्र सरकार के एक महकमे सेंट्रल सोशल वेलफेयर बोर्ड के सेक्रेट्री पद से रिटायर हुई महिला हैं।
फौरन तो मुझे हैरानी ही हुई कि एक वॉशिंग मशीन खरीद लेने भर से वे अपराध बोध का शिकार हुई जा रही हैं। मैंने एक अंग्रेजी अखबार की एक पुरानी खबर के आधार पर उनसे जिक्र किया था कि मुख्यमंत्री अपने कपड़े खुद धोते हैं तो उन्होंने कहा कि जूते खुद पॉलिश करते हैं, पहले कपड़े भी नियमित रूप से खुद ही धोते थे पर अब नहीं। वे 65 साल के हो गए हैं, उनकी एंजियोप्लास्टी हो चुकी है, बायपास सर्जरी भी हुई, ऊपर से भागदौड़, मीटिंगों, फाइलों आदि से भरी बेहद व्यस्त दिनचर्या। पांचाली ने बताया कि दिल्ली में रह रहे बड़े भाई का अचानक देहांत होने पर मैं दिल्ली गई थी तो भाभी ने जोर देकर वादा ले लिया था कि अब वॉशिंग मशीन खरीद लो। लौटकर मैंने माणिक सरकार से कहा तो वे राजी नहीं हुए। मैंने समझाया कि हम दोनों के लिए ही अब खुद अपने कपड़े धोना स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक नहीं है तो उन्होंने पैसे तय कर किसी आदमी से इस काम में मदद लेने का सुझाव दिया। कई दिनों की बहस के बाद उन्होंने कहा कि तुम तय ही कर चुकी हो तो सलाह क्यों लेती हो।
सीएम आवास के कैम्प आफिस के एक अफसर से मैंने हैरानी जताई कि क्या मुख्यमंत्री के कपड़े धोने के लिए सरकारी धोबी की व्यवस्था नहीं है तो उसने कहा कि यह इस दंपती की नैतिकता से जुड़ा मामला है। मणिक सरकार ने मुख्यमंत्री आवास में आते ही अपनी पत्नी को सुझाव दिया था कि रहने के कमरे का किराया, टेलिफोन, बिजली आदि पर हमारा कोई पैसा खर्च नहीं होगा तो तुम्हें अपने वेतन से योगदान कर इस सरकारी खर्च को कुछ कम करना चाहिए। और रसोई गैस सिलेंडर, लॉन्ड्री (सरकारी आवास के परदे व दूसरे कपड़ों की धुवाई) व दूसरे कई खर्च वे अपने वेतन से वहन करने लगीं, अब वे यह खर्च अपनी पेंशन से उठाती हैं।
मैंने बताया कि एक मुख्यमंत्री की पत्नी का रिक्शा से या पैदल बाज़ार निकल जाना, खुद सब्जी वगैरहा खरीदना जैसी बातें हिंदी अखबारों में भी छपी हैं। यहां के लोगों को तो आप दोनों की जीवन-शैली अब इतना हैरान नहीं करती पर बाहर के लोगों में ऐसी खबरें हैरानी पैदा करती हैं। उन्होंने कहा कि साधारण जीवन और ईमानदारी में आनंद है। मैंने तो हमेशा यही सोचा कि मणिक मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे तो ये स्टेटस-प्रोटोकोल आदि छूटेंगे ही, तो इन्हें पकड़ना ही क्यों। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से मेरे पति पर कोई उंगली उठे। मेरा दफ्तर पास ही था सो पैदल जाती रही, कभी जल्दी हुई तो रिक्शा ले लिया। सेक्रेट्री पद पर पहुंचने पर जो सरकारी गाड़ी मिली, उसे दूर-दराज के इलाकों के सरकारी दौरों में तो इस्तेमाल किया पर दफ्तर जाने-आने के लिए नहीं। सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद अब सीआईटीयू में महिलाओं के बीच काम करते हुए बाहर रुकना पड़ता है। आशा वर्कर्स के साथ सोती हूं तो उन्हें यह देखकर अच्छा लगता है कि सीएम की पत्नी उनकी तरह ही रहती है। एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता के लिए नैतिकता बड़ा मूल्य है और एक नेता के लिए तो और भी ज्यादा। मात्र 10 प्रतिशत लोगों को फायदा पहुंचाने वाली नई आर्थिक नीतियों और उनसे पैदा हो रहे लालच व भ्रष्टाचार से लड़ाई के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता और उससे मिलने वाली नैतिक शक्ति सबसे जरूरी चीजें हैं।
दरअसल, मणिक सरकार पिछले साल विधानसभा चुनाव में अपने नामांकन के बाद अचानक देश भर के अखबारों में चर्चा में आ गए थे। नामांकन के दौरान उन्होंने अपनी सम्पत्ति का जो हलफनामा दाखिल किया था, उसे एक राष्ट्रीय न्यूज एजेंसी ने फ्लेश कर दिया था। जो शख्स 1998 से लगातार मुख्यमंत्री हो, उसकी निजी चल-अचल संपत्ति अढ़ाई लाख रुपये से भी कम हो, यह बात सियासत के भ्रष्ट कारनामों में साझीदार बने मीडिया के लोगों के लिए भी हैरत की बात थी। करीब अढ़ाई लाख रुपये की इस सम्पत्ति में उनकी मां अंजलि सरकार से उन्हें मिले एक टिन शेड़ के घर की करीब 2 लाख 22 हजार रुपये कीमत भी शामिल है। हालांकि, यह मकान भी वे परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए ही छोड़ चुके हैं। इस दंपती के पास न अपना घर है, न कार। कम्युनिस्ट नेताओं को लेकर अक्सर उपेक्षा या दुष्प्रचार करने वाले अखबारों ने `देश का सबसे गरीब मुख्यमंत्री` शीर्षक से उनकी संपत्ति का ब्यौरा प्रकाशित किया। किसी मुख्यमंत्री का वेतन महज 9200 रुपये मासिक (शायद देश में किसी मुख्यमंत्री का सबसे कम वेतन) हो, जिसे वह अपनी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी (माकपा) को दे देता हो और पार्टी उसे पांच हजार रुपये महीना गुजारा भत्ता देती हो, उसका अपना बैंक बेलेंस 10 हजार रुपये से भी कम हो और उसे लगता हो कि उसकी पत्नी की पेंशन और फंड आदि की जमाराशि उनके भविष्य के लिए पर्याप्त से अधिक ही होगी, तो त्रिपुरा से बाहर की जनता का चकित होना स्वाभाविक ही है।
हालांकि, संसदीय राजनीति में लम्बी पारी के बावजूद लेफ्ट पार्टियों के नेताओं की छवि अभी तक कमोबेश साफ-सुथरी ही ही रहती आई है। त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और केरल की लेफ्ट सरकारों में मुख्यमंत्री रहे या केंद्र की साझा सरकारों में मंत्री रहे लेफ्ट के दूसरे नेता भी काजल की इस कोठरी से बेदाग ही निकले हैं। लेफ्ट पार्टियों ने इसे कभी मुद्दा बनाकर अपने नेताओं की छवि का प्रोजेक्शन करने की कोशिश भी कभी नहीं की। मणिक सरकार से उनकी साधारण जीवन-शैली और `सबसे गरीब मुख्यमंत्री` के `खिताब` के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मेरी पार्टी और विचारधारा मुझे यही सिखाती है। मैं ऐसा नहीं करुंगा तो मेरे भीतर क्षय शुरू होगा और यह पतन की शुरुआत होगी। इसी समय केंद्र की कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के लिए अभूतपूर्व बदनामी हासिल कर चुकी थी और उसकी जगह लेने के लिए बेताब भारतीय जनता पार्टी केंद्र में अपनी पूर्व में रही सरकार के दौरान हुए भयंकर घोटालों और अपनी पार्टी की राज्य सरकारों के मौजूदा कारनामों पर शर्मिंदा हुए बगैर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश को स्वच्छ व मजबूत सरकार देने का वादा कर रही थी। अल्पसंख्यकों की सामूहिक हत्याओं और अडानी-अंबानी आदि घरानों पर सरकारी सम्पत्तियों व सरकारी पैसे की बौछार में अव्वल लेकिन आम-गरीब आदमी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण आदि मसलों पर फिसड्डी गुजरात को विकास का मॉडल और इस आधार पर खुद को देश का भावी मजबूत प्रधानमंत्री बताते घूम रहे नरेंद्र मोदी की शानो शौकत भरी जीवन-शैली के बरक्स मणिक सरकार की `सबसे गरीब-ईमानदार मुख्यमंत्री की छवि` वाली अखबारी कतरनों ने विकल्प की तलाश में बेचैन तबके को भी आकर्षित किया जिसने इन कतरनों को सोशल मीडिया पर जमकर शेयर किया। हालांकि, ये कतरनें मणिक सरकार की व्यक्तिगत ईमानदारी के तथ्यों को जरा और मिथकीय बनाकर तो पेश करती थीं पर इनमें भयंकर आतंकवाद, आदिवासी बनाम बंगाली संघर्ष व घोर आर्थिक संकट से जूझ रहे पूरी तरह संसाधनविहीन अति-पिछड़े राज्य को जनपक्षीय विकास व शांति के रास्ते पर ले जाने की उनकी नीतियों की कोई झलक नहीं मिलती थी। लोकसभा चुनाव में जाने से पहले माकपा का शीर्ष नेतृत्व सेंट्रल कमेटी की मीटिंग के लिए अगरतला में जुटा तो उसने प्रेस कॉन्फ्रेंस और सार्वजनिक सभा में त्रिपुरा के विकास के मॉडल को देश के विकास के लिए आदर्श बताते हुए कॉरपोरेट की राह में बिछी यूपीए, एनडीए आदि की जनविरोधी आर्थिक नीतियों की कड़ी आलोचना की। दरअसल, मणिक सरकार और त्रिपुरा की उनके नेतृत्व वाली माकपा सरकार की उपलब्धियां उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी की तरह ही उल्लेखनीय हैं लेकिन उनका जिक्र कॉरपोरेट मीडिया की नीतियों के अनुकूल नहीं पड़ता है।
लेकिन, भ्रष्टाचार में डूबे नेताओं के लिए मणिक सरकार की ईमानदारी को लेकर छपी छुटपुट खबरों से ही अपमान महसूस करना स्वाभाविक था। गुजरात के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान के सिलसिले में अगरतला आए तो वे विशाल अस्तबल मैदान (स्वामी विवेकानंद मैदान) में जमा तीन-चार हजार लोगों को संबोधित करते हुए अपनी बौखलाहट रोक नहीं पाए। उन्होंने कहा कि कम्युनिस्ट खुद को ज्यादा ही ईमानदार समझते हैं और इसका खूब हल्ला करते हैं। उन्होंने गुजरात के विकास की डींग हांकते हुए रबर की खेती और विकास के सब्जबाग दिखाते हुए कमयुनिस्टों को त्रिपुरा की सत्ता से बाहर कर कमल खिलाने का आह्वान किया। लेकिन, उनका मुख्य जोर बांग्लादेश सीमा से लगे इस संवेदनशील राज्य में साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने और तनाव की राजनीति पर जोर देने पर रहा। उन्होंने कहा कि त्रिपुरा में बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण खतरा पैदा हो गया है जबकि गुजरात से सटा पाकिस्तान मुझसे थर्राता रहता है। झूठ और उन्माद फैलाने के तमाम रेकॉर्ड अपने नाम कर चुके मोदी को शायद मालूम नहीं था कि मणिक सरकार की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण सीआईए-आईएसआई के संरक्षण में चलने वाली आतंकवादी गतिविधियों पर नियंत्रण और आदिवासी बनाम बंगाली वैमनस्य की राजनीति को अलग-थलग कर दोनों समुदायों में बड़ी हद तक विश्वास का माहौल बहाल करना भी है।
माकपा के नृपेन चक्रवर्ती और दशरथ देब जैसे दिग्गज नेताओं के मुख्यमंत्री रहने के बाद 1998 में मणिक सरकार को यह जिम्मेदारी दी गई थी तो विश्लेषकों ने इसे एक अशांत राज्य का शासन चलाने के लिहाज से भूल करार दिया था। 1967 में महज 17-18 बरस की उम्र में छात्र मणिक प्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ चले खाद्य आंदोलन में बढ़-चढ़कर शामिल रहे थे। उस चर्चित जनांदोलन में प्रभावी भूमिका उन्हें माकपा के नजदीक ले आई और वे 1968 में विधिवत रूप से माकपा में शामिल हो गए। वे बतौर एसएफआई प्रतिनिधि एमबीबी कॉलेज स्टूडेंट यूनियन के महासचिव चुने गए और कुछ समय बाद एसएफआई के राज्य सचिव और फिर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चुने गए। 1972 में वे माकपा की राज्य इकाई के सदस्य चुने गए और 1978 में प्रदेश की पहली माकपा सरकार अस्तित्व में आई तो उन्हें पार्टी के राज्य सचिव मंडल में शामिल कर लिया गया। 1980 के उपचुनाव में वे अगरतला (शहरी) सीट से विधानसभा पहुंचे और उन्हें वाम मोर्चा चीफ व्हिप की जिम्मेदारी सौंपी गई। 1985 में उन्हें माकपा की केंद्रीय कमेटी का सदस्य चुना गया। 1993 में त्रिपुरा में तीसरी बार वाम मोर्चा की सरकार बनी तो उन्हें माकपा के राज्य सचिव और वाम मोर्चे के राज्य संयोजक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं। 1998 में पार्टी ने उन्हें पॉलित ब्यूरो में जगह दी और त्रिपुरा विधानसभा में फिर से बहुमत में आए वाम मोर्चा ने विधायक दल का नेता भी चुन लिया। कहने का आशय यह कि यदि अशांत राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी एक मुश्किल चुनौती थी तो उनके पास जनांदोलनों और पार्टी संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का कीमती अनुभव भी था।
मणिक के मुख्यमंत्री कार्यकाल की शुरुआत को याद करते हुए जॉर्ज सी पोडीपारा (त्रिपुरा में उस समय सीआरपीएफ के आईजी) लिखते हैं कि आज के त्रिपुरा को आकर देखने वाला अनुमान नहीं लगा पाएगा कि उस समय कैसी विकट परिस्थितियां थीं जिन पर मणिक सरकार ने कड़े समर्पण, जनता के प्रति प्रतिबद्धता, विश्लेषण करने, दूसरों को सुनने, अपनी गलतियों से भी सीखने और फैसला लेने की अद्भुत क्षमता, धैर्य और दृढ़ निश्चय से नियंत्रण पाया था। जॉर्ज के मुताबिक, `एक सच्चे राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने राज्य के लिए बाधा बनी समस्याओं को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया। उस समय राज्य में आदिवासी और गैर आदिवासी समुदायों के बीच आपसी अविश्वास और वैमनस्य सबसे बड़ी चुनौती थे। दो जाति समूहों के बीच का बैर किसी भी तरह के आपसी संवाद को बांस के घने बाड़े की तरह बाधित किए हुए था। निर्दोषों की हत्या, अपहरण और संपत्ति की लूटपाट 1979 तक भी एक आम रुटीन जैसी बातें थीं। मणिक सरकार ने महसूस किया कि जब तक यह दुश्मनी बरकरार रहेगी और जनता के बड़े हिस्से एक दूसरे को बर्बाद करने पर तुले रहेंगे, राज्य गरीब और अविकसित बना रहेगा। उन्होंने अपना ध्यान इस समस्या पर केंद्रित किया और अपनी सरकार के सारे संसाधन इससे लड़ने के लिए खोल दिए।`
मणिक सरकार ने एक तरफ टीयूजेएस, टीएनवी और आमरा बंगाली जैसे आतंकी व चरमपंथी संगठनों के खिलाफ सख्ती जारी रखी, दूसरी तरफ आदिवासी इलाकों में विकास को प्राथमिकता में शामिल किया। यहां की कुछ जनजातियों के नाम भाषण में पढ़कर आदिवासियों के प्रति भाजपा के प्रेम का दावा कर गए नरेंद्र मोदी को क्या याद नहीं होगा कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों के जंगलों में रह रहे आदिवासियों को कॉरपोरेट घरानों के हितों के लिए उजाड़ने और उनकी हत्याओं के अभियान चलाने में उनकी पार्टी भाजपा और कांग्रेस दोनों की ही सरकारों की क्या भूमिका रहती आई है? इसके उलट मणिक सरकार ने त्रिपुरा में आदिवासियों के बीच लोकतांत्रिक प्रक्रिया तेज कर निर्णय लेने में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने पर बल दिया। उनकी अगुआई वाली लेफ्ट सरकार ने सुदूर इलाकों तक बिजली-पानी, स्कूल, अस्पताल जैसी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित कीं और कांग्रेस के शासनकाल में आदिवासियों की जिन ज़मीनों का बड़े पैमाने पर अवैध रूप से मालिकाना हक़ ट्रांसफर कर दिया गया था, उन्हें यथासंभव आदिवासयों को लौटाने की पूर्व की लेफ्ट सरकारों में की गई पहल को आगे बढ़ाया। प्रदेश में जंगल की करीब एक लाख 24 हेक्टेयर भूमि आदिवासियों को पट्टे के रूप में दी गई, जिसके संरक्षण के लिए उन्हें आर्थिक मदद दी जा रही है।
खास बात यह रही कि उस बेहद मुश्किल दौर में मुख्यमंत्री मणिक सरकार ने यह एहतियात रखी कि शांति स्थापित करने के प्रयास निर्दोष आदिवासयों की फर्जी मुठभेड़ में हत्याओं का सिलसिला न साबित हों। वे सेना और केंद्रीय सुरक्षा बलों के अधिकारियों से नियमित संपर्क में रहे और लगातार बैठकों के जरिए यह सुनिश्चित करते रहे कि आम आदिवासियों को दमन का शिकार न होना पड़े। इसके लिए माकपा नेताओं और कार्यकर्ताओं को इस मुहिम में आगे रहकर शहादतें भी देनी पड़ीं। यूं भी आदिवासियों के बीच लेफ्ट के संघर्षों की लम्बी परंपरा थी। त्रिपुरा में राजशाही के दौर में ही लेफ्ट लोकतंत्र की मांग को लेकर संघर्षरत था। उस समय दशरथ देब, हेमंत देबबर्मा, सुधन्वा देबबर्मा और अघोर देबबर्मा जैसी शख्सियतों द्वारा आदिवासियों को शिक्षा के अधिकार के लिए जनशिक्षा समिति के बैनर तले चलाई गई मुहिम में लेफ्ट भी भागीदार था। 1948 में वामपंथ के प्रसार के खतरे के नाम पर देश की तत्कालीन नेहरू सरकार ने जनशिक्षा समिति की मुहिम को पलीता लगा दिया और आदिवासी इलाकों को भयंकर दमन का शिकार होना पड़ा तो त्रिपुरा राज्य मुक्ति परिषद (अब त्रिपुरा राज्य उपजाति गणमुक्ति परिषद यानी जीएनपी) का गठन कर संघर्ष जारी रखा गया। 1960 और 1970 में आदिवासियों के लिए शिक्षा, रोजगार, विकास और उनकी मातृभाषा कोरबरोक को महत्व दिए जाने के चार सूत्रीय मांगपत्र पर लेफ्ट ने जोरदार आंदोलन चलाए थे। राज्य में माकपा की पहली सरकार आते ही केंद्र की कांग्रेस सरकार व राज्य के कांग्रेस व दूसरे चरमपंथी संगठनों के विरोध के बावजूद त्रिपुरा ट्राइबल एरिया ऑटोनोमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (एडीसी) के गठन जैसे कामों के चलते भी आदिवासियों में माकपा का मजबूत आधार था।
जाहिर है कि आतंकवाद के खिलाफ सख्त पहल और विकास कार्यों में तेजी के अभियान में मणिक सरकार की पारदर्शी कोशिशों को परेशानहाल आदिवासियों और खून-खराबे का शिकार हुए गरीब बंगालियों दोनों का समर्थन हासिल हुआ। हालांकि, शांति की इस मुहिम में तीन दशकों में माकपा के करीब 1179 नेताओं-कार्यकर्ताओं को जान से हाथ धोना पड़ा। कांग्रेस की राज्य इकाई हमेशा आदिवासियों और बंगाली चरमपंथी संगठनों को हवा देकर दंगे भड़काने में मशगूल रहती आई थी और इन संगठनों की बी टीमों को चुनावी पार्टनर भी बनाती रही थी। केंद्र की कांग्रेस सरकारें भी आतंकवादी संगठनों से जूझने के बजाय उनके साथ गलबहियों का खेल खेलती रहीं। लेकिन, आदिवासियों के बीच लेफ्ट का प्रभाव बरकरार रहा और राज्य में शांति स्थापित हुई तो दोनों ही समुदायों ने चैन की सांस ली। मणिक सरकार का यह कारनामा दूसरे राज्यों और केंद्र के लिए भी प्रेरणा होना चाहिए था लेकिन इसके लिए विकास की नीतियों को कमजोर तबकों की ओर मोड़ने की जरूरत पड़ती और कॉरपोरेट को सरकारी संरक्षण में जंगल व वहां के रहने वालों को उजाड़ने देने की नीति पर लगाम लगाना जरूरी होता।

मुख्यमंत्री मणिक और उनकी लेफ्ट सरकार की वैचारिक प्रतिबद्धता का ही नतीजा रहा कि बेहद सीमित संसाधनों और केंद्र सरकार की निरंतर उपेक्षा के बावजूद त्रिपुरा में जनपक्षधर नीतियां सफलतापूर्वक क्रियान्वित हो पाईं। केंद्र व दूसरे राज्यों में जहां सरकारी नौकरियां लगातार कम की जा रही हैं, एक के बाद एक, सरकारी महकमे बंद किए जा रहे हैं, वहीं त्रिपुरा सरकार ने तमाम आर्थिक संकट के बावजूद इस तरफ से अपने हाथ नहीं खींचे हैं। गरीबों के लिए सब्सिडी से चलने वाली कल्याणकारी योजनाएं बदस्तूर जारी हैं और सरकार की वर्गीय आधार पर प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं। मसलन, राज्य कर्मचारियों को केंद्र के कर्मचारियों के बराबर वेतन दे पाना मुमकिन नहीं हो पाया है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कर्मचारियों के बीच इसे मुद्दा बनाने की कोशिश की थी लेकिन मुख्यमंत्री राज्य कर्मचारियों को यह समझाने में सफल रहे थे कि केंद्र ने राज्य की मांग के मुकाबले 500 करोड़ रुपए कम दिए हैं। लेकिन, तमाम दबावों के बावजूद राज्य सरकार हर साल 52 करोड़ रुपये की सब्सिडी उन गरीब लोगों को बाज़ार मूल्य से काफी कम 6.15 रुपये प्रति किलोग्राम भाव से चावल उपलब्ध कराने के लिए देती है जिन्हें बीपीएल कार्ड की सुविधा में समाहित नहीं किया जा सका है। गौरतलब है कि बीपीएल कार्ड धारकों को तो 2 रुपये प्रति किलोग्राम चावल दिया जा ही रहा है। गरीबों को काम देने के लिए लेफ्ट के दबाव में ही यूपीए-1 सरकार में लागू की गई मनरेगा स्कीम जहां देश भर में भयंकर भ्रष्टाचार का शिकार है, वहीं त्रिपुरा इस योजना के सफल-पारदर्शी क्रियान्वयन के लिहाज से लगातार तीन सालों से देश में पहले स्थान पर है।
तार्किक आलोचना की तमाम जगहों के बावजूद त्रिपुरा सरकार की विकास की उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं। प्रदेश की 95 फीसदी जनता चिकित्सा के लिए सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है। सुदूर क्षेत्रों तक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के साथ ही राज्य सरकार अपने कॉलेजों से पढ़कर नौकरी पाने वाले डॉक्टरों को पहले पांच साल ग्रामीण क्षेत्र में सेवा करने के लिए विवश करती है। प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से त्रिपुरा उत्तर-पूर्व राज्यों में पहले स्थान पर है तो साक्षरता दर में देशभर में अव्वल है। प्राथमिक स्कूलों से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों के फैलाव, एनआईटी और दो मेडिकल कॉलेजों ने राज्य के छात्रों, खासकर आदिवासियों व दूसरी गरीब आबादी के छात्रों को आगे बढ़ने और सरकारी मशीनरी का हिस्सा बनने का मौका दिया है। सिंचाई सुविधा के विस्तार, सुनियोजित शहरीकरण, फल, सब्जी, दूध, मछली उत्पादन आदि में आत्मनिर्भरता पर त्रिपुरा गर्व कर सकता है। कभी खूनखराबे का पर्याय बन गया त्रिपुरा आज रक्तदान के क्षेत्र में भी देश में पहले स्थान पर है और इसमें आदिवासी युवकों का बड़ा योगदान है।
नरेंद्र मोदी ने अगरतला में अपने भाषण में त्रिपुरा सरकार पर रबर की खेती को बढ़ावा देने के लिए गुजरात की तरह जेनेटिक साइंस का इस्तेमाल न करने का आरोप भी लगाया था। लेकिन, रबर उत्पादन में त्रिपुरा की उपलब्धि की जानकारी मोदी को नहीं रही होगी। रबर उत्पादन में त्रिपुरा देशभर में केरल के बाद दूसरे स्थान पर है। यह बात दीगर है कि रबर की खेती से आ रहा पैसा नई चुनौतियां भी पैदा कर रहा है। मसलन, परंपरागत जंगल और खाद्यान्न उत्पादन के मुकाबले काफी ज्यादा पैसा देने वाली रबर की खेती त्रिपुरा की प्राकृतिक पारिस्थितिकी में अंसतुलन पैदा कर सकती है लेकिन उससे पहले सामाजिक असंतुलन की चुनौती दरपेश है। आदिवासियों में एक नया मध्य वर्ग पैदा हुआ है, जो गरीब आदिवासियों को सदियों के सामूहिक तानेबाने से अलग कर देखता है। उसके बीच सामाजिक-आर्थिक न्याय के सवालों पर बात करना इतना आसान नहीं रह गया है। यह नया मध्य वर्ग और दूसरे पैसे वाले लोग गरीब आदिविसियों की जमीनों को 99 साला लीज़ की आड में हड़पना चाहते हैं और एक बड़ी तबका अपनी ही ज़मीन पर मजदूर हो जाने के लिए अभिशप्त हो रहा है। माकपा के मुखपत्र `देशेरकथा` के संपादक और माकपा के राज्य सचिव मंडल के सदस्य गौतम दास कहते हैं कि उनकी पार्टी ने प्रतिक्रियावादी ताकतों से और गरीबों की शोषक शक्तियों से वैचारिक प्रतिबद्धता के बूते ही लड़ाइयां जीती हैं। उम्मीद है कि युवाओं के बीच राजनीतिक-वैचारिक अभियानों से ही इस चुनौती का भी मुकाबला किया जा सकेगा।
पड़ोसी देश बांग्लादेश के साथ त्रिपुरा सरकार के संबंधों का जिक्र भी तब और ज्यादा जरूरी हो जाता है जबकि आरएसएस और बीजेपी लम्बे समय से बांग्लादेश के साथ हिंदुस्तान के संबंधों को सिर्फ और सिर्फ नफ़रत में तब्दील कर देने पर आमादा हैं। मोदी ने उत्तर-पूर्व के दूसरे इलाकों की तरह अगरतला में भी नफ़रत की इस नीति पर ही जोर दिया। लेकिन, मुख्यमंत्री मणिक सरकार और उनकी सरकार का बांग्लादेश की सरकार साथ बेहतर संवाद है। बांग्लादेश में अमेरिका और पाकिस्तानी एंजेसियों के संरक्षण में सिर उठा रही साम्प्रदायिक ताकतों के दबाव के बावजूद वहां की मौजूदा शेख हसीना सरकार हिंदुस्तान के साथ दोस्ताना है और त्रिपुरा सरकार के साथ भी उसके बेहतर रिश्ते हैं। इस सरकार ने त्रिपुरा में आतंकवाद के उन्मूलन में भी मदद की है। अगरतला से सटे आखोरा बॉर्डर पर तनावरहित माहौल को आसानी से महसूस किया जा सकता है। बांग्लादेश के उदार, प्रगतिशील तबकों व कलाकारों के साथ त्रिपुरा के प्रगाढ़ रिश्तों को अगरतला में अक्सर होने वाले कार्यक्रमों में देखा जा सकता है जिनमें मणिक सरकार की बौद्धिक उपस्थिति भी अक्सर दर्ज होती है। त्रिपुरा के लेफ्ट, उसके मुख्यमंत्री और उसकी सरकार की यह भूमिका दोनों ओर के ही अमनपसंद तबकों को निरंतर ताकत देती है।
56 इंच का सीना जैसी तमाम उन्मादी बातों और देह भंगिमाओं के साथ घूम रहे उस शख्स से त्रिपुरा के इस सेक्युलर, शालीन, सुसंस्कृत मुख्यमंत्री की तुलना का कोई अर्थ नहीं है। कलकत्ता यूनिवर्सिटी से कॉमर्स के इस स्नातक की कला, साहित्य, संस्कृति में गहरी दिलचस्पी है और यह उसके जीवन और राजनीति का ही जीवंत हिस्सा है। बहुत से दूसरे ताकतवर राजनीतिज्ञों और अफसरों की आम प्रवृत्ति के विपरीत इस मुख्यमंत्री को सायरन-भोंपू के हल्ले-गुल्ले और तामझाम के बिना साधारण मनुष्य की तरह सांस्कृतिक कार्यक्रमों को सुनते-समझते, कलाकारों से चर्चा करते और संस्कृतिकर्मियों से लम्बी बहसें करते देखा-सुना जा सकता है।
सौजन्य - संजय भारती

Posts of I week of Feb 2018



सकल योग के हम अनाथ

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बात करने से बिगड़ती है बात

चुप रहने से संदेह पुख्ता होते है


इशारों से मजबूत होती है भंगिमा
पोजिशन लेने से बिगड़ते है अक्स
तटस्थ होने से भंग होती है स्थिति
जैसे पानी को ढाल देते है बर्तन में

समय असल में कुछ भी ना करने का है
एक चुप्पी भी आपकी मौत का कारण है

इस सबके बावजूद भयानक शोर में
एक आदमी ईंट गारा उठा रहा है
एक स्त्री आती है बुहार जाती है सड़क
एक सद्यप्रसूता दूध पिला देती है शिशु को
एक पिता टूटी चप्पल पहने निकलता है
बहनें दो रोटी ढाँककर रखती है भाई के लिये

लम्बी गाड़ी चलाते हुए ड्राईवर निस्पृह होता है 
उसके भरोसे सो जाते है हजारों यात्री नींद में
समय बख्शता नही है किसी को अपने समय में

एक शब्द कागज पर जन्मते समय शिद्दत से
रचता है भरापूरा प्रतिपक्ष व्यवस्था के ख़िलाफ़

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फिर प्रजा को समझ आया कि उन्होंने क्या ग़लती की। राजा को ईश्वर का दूत मानकर वे अपना भला करने वाला समझ रहें थे वह तो हाट बाज़ार में आने वाला फरेबी व्यापारी निकला जो उनकी फसल सस्ते में खरीदकर शहर में बड़े दल्लों को बेच देता है।
प्रजा ने समझ लिया था और दस बीस गांवों के बीच लगने वाले बाज़ार के लोगों ने सलाह मशविरा कर एक ओर से इस फरेबी और लूटखोर को हकालना शुरू कर दिया था। दुकानदार परेशान है, हाट फीका है, लोग संगठित हो रहें है और फरेबी अभी भी बीच बाज़ार में जमूरों के साथ लच्छेदार भाषा मे नई दुनिया के सपने बेचने में मशगूल हैं।
- नये जमाने मे प्रेमचंद होते तो
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एक कृतघ्न राष्ट्र का घोष
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ठीक ग्यारह बजे सायरन बजता 
सारा राष्ट्र कातर भाव से खड़ा होता

श्रद्धांजलि देता बापू को 
हत्यारे को याद कर अहिंसा की बात दोहराता

स्कूल से लौटती माँ शाम को पर्स में से 
नमकीन और पेड़ा निकालकर देती 
हम जब उछल कर खुशी से खाते तो 
दुख से भर जाती माँ और कहती 
मेरा जन्म दिन सारा राष्ट्र मनाता है
पर दुख में और हम समझ नही पाते

मरने तक ग्यारह बजे का सायरन 
हर तीस जनवरी को सुनती रही
हिंसा, अहिंसा के किस्से सुनाती रही
आज होती तो और दुखी होती 
हत्यारों का यशगान सुन 
भीग जाती आँखे उसकी शायद

अच्छा हुआ माँ गुजर गई 
सन दो हजार आठ में लम्बी बीमारी से
सायरन अब भी बजता है हर साल
हिंसा भी गूँजती है हर ओर भौंडी आवाज में
हत्यारे मुस्कुराते है मुस्तैदी से पूरी
न्याय भी कत्ल कर दिया गया है अभी
राष्ट्र अब कृतज्ञ नही है बापू के लिए

माँ और बापू दोनो नही है अब 
बापू गुजरे और माँ जन्मी सन अड़तालीस में
देश भी अड़तालीस में ही मर गया 
जो बचा है अब मुर्दा देश है जो 
हर साल सिर्फ तीस जनवरी को 
ग्यारह बजे सायरन सुनकर कोसता है
और फिर काम पर लग जाता है