Thursday, October 19, 2017

Milk Sweet Diwali and Ayodhya 19 Oct 17


यदि तुम्हारे एक कमरे में लाश पड़ी हो तो 
(सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता) 
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एक दिन पहले दीवाली कैसे मन गई
ब्राह्मण हूं , चित्त पावन मराठी ब्राह्मण और विशुद्ध पूजा पाठी कर्मकांडी परिवार से हूं , ( मै नहीं करता कुछ पर संस्कार सारे है , विधि विधान और सारे नियम कायदे मालूम है अच्छे से - याद रखियेगा) तो जानता हूं कि मुहूर्त, समय और दिन विशेष का क्या महत्व है ? मुझे ना सिखाएं कि दिन क्या और मुहूर्त क्या होता है। नौटंकी करना है , राजनीति या घटियापन यह मुझे मत बताना। एक दिन पहले मनाने का कोई ना रिवाज था ना है ।
जितने विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए दियों में तेल लगाया गया और बत्ती जलाने का खर्च हुआ उसके बदले कुपोषित बच्चों को पर्याप्त पोषण और दवाइयां दी जा सकती थी। इतना तेल उनके खाने, सब्जी या दाल में डलवा देते योगीजी तो उनका प्रोटीन, वसा बढ़ जाता कमजोर शरीर में और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती उन बच्चों की जो रोज आपके तंत्र में बेमौत मर रहे है। हम गरीब परिवारों को सिखाते है कि बच्चो, गर्भवती महिलाओं की सब्जी , दाल या आटे में ऊपर से एक चम्मच तेल डाल दें ताकि तेल शरीर में जाएं। पर आज एक लाख सत्तर हजार दियों को जलता देख बहुत खुशी भी हुई और थोड़ा दुख भी कि मेरे देश के एक प्रांत के बच्चे मर रहे है और पूरी मशीनरी उस श्रम का दुरुपयोग कर रही है जो मेहनत से तेल का उपयोग करती है।
यह कौनसा धरम है जिसमें खाने वाले तेल से लेकर चोपर का तेल और सरकारी मशीनरी का समय नाटक और स्वांग, सेल्फ इमेज बनाने में बरबाद किया जा रहा है ? मै दुखी हूं और द्रवित भी !
हिन्दू प्रमाणपत्र बांटने वाले यहां रायता नहीं फैलाए , धर्म की व्याख्या यह गरीब ब्राह्मण आपसे ज्यादा जानता है और जीवन मौत का मतलब भी।
झारखंड में एक बेटी आपके घटिया नियम से मर जाती है और 95 वर्ष का एक बूढ़ा ग्राम टगर जिला सतना में मर जाता है क्योंकि शासन से मिली पात्रता पर्ची गुम हो गई और वह अपनी पत्नी के साथ तीन दिन भूखा रहता है।
शर्म करिए नौटंकीबाजों शर्म करिए। एक बार राम राज्य पढ़ लीजिए कि क्या था !
आज पहली बार अपनी जाति लिख रहा हूं क्योंकि आपको ऐसी ही भाषा समझ आती है शायद ।

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आप जहां है जरा एक छोटा सा सर्वे करें
आपके आसपास कितने घरों में गाय या भैंस है
यदि गांव कस्बे में है तो कितनी गाय भैंस है कुल
इनमे से कितनी और कितना दूध दोनों वक़्त कुल देती है
अब इस मात्रा को कुल उपलब्ध गाय भैंस द्वारा दिए जाने वाले दूध से कुल औसत दूध की मात्रा निकालिए
अब अपने आसपास, कस्बे, शहर में मिठाई की दुकान की गणना करें
वहां उपलब्ध मिठाईयों में ज्यादा प्रतिशत खोवा यानी मावे की मिठाईयों का ही होता है बंगाली और रबड़ी जैसी विशुद्ध पतली मिठाई सहित
अब सोचिए कि एक दुकान पर औसत कितना खोवा या मावा लगभग रोज और इन दिनों लगता होगा
अब जरा वापिस आइए जहां आपने कुल उत्पादित दूध की मात्रा निकाली थी
अब तुलना कीजिए कि कुल दूध और अपने कस्बे में लगने वाला कुल खोवा या मावा कैसे बना होगा
यदि दूध बेचने वाला परिवार दसवां भाग भी घर में चाय, बच्चो के लिए, दही, छाछ , घी के लिए रखता हो और बाकी बेच देता हो तो क्या फिर भी मिठाई की दुकानों पर लगने वाले खोवे या मावे की पूर्ति कर पा रहा है
हर दुकानदार कहता है कि उसका मावा असली है और गांव से आए दूध से खुद बनवाते है तो "भाई , यह बताओ कि तुमने कितनी गाय या भैंस पाली है , खोवे के लिए ना सही अपने घर के बच्चों की पौष्टिकता के लिए, घर की बहन बेटियों के पीने के लिए जो गर्भवती या धात्री है या छोटे बच्चे जो शून्य से छह बरस तक के है"
जरा दिमाग लगाइए कि ये दुधारू गाय सड़कों पर क्यों है, क्यों भारत सबसे बड़ा बीफ निर्यातक है, कुल मिलाकर बात इतनी है कि हमारे पास अब दूध की नदियां नहीं है और ना ही वैसी प्रजातियां
लब्बो लुबाब यह है कि मावे की मिठाई का लालच छोड़े रंग बिरंगी मावे की मिठाईयों को छोड़कर अपने घर की परंपरागत मिठाईयां जो दालों से जैसे बेसन या मूंग के आटे से बनती है, चावल से बनती है , सिंगाड़े या राजगीर से बनती है उसकी मिठाईयां खाइए, बनाइए और संस्कृति भी बचाईए और अपने परिवार की पौष्टिकता भी बढ़ाइए
आपसे अनुरोध ही कर सकता हूं
दीवाली की शुभकामनाएं , अपने मन से मैल, कचरा निकाल कर परिवार और मित्रों के साथ त्योहार मनाइए और पकवान बनाएं तो मुझे भी याद करिए बस सफेद जहर (शक्कर) का प्रयोग कम करें।
बहुत बधाई, प्यार और शुभकामनाएं आप सबके लिए

Monday, October 16, 2017

Posts between 10 to 16 Oct 17



“This is the precept by which I have lived: Prepare for the worst; expect the best; and take what comes.”

इश्क ने गालिब मुकम्मल कर दिया
वरना आदमी भी थे किस काम के
- अशोक मिजाज़ बद्र
सागर मप्र

मित्रों को बहुत प्यार, दुआओं और दुलार सहित समर्पित !
मैं तुम्हें बु‍द्धिमत्ता की लड़ाई के लिए ललकारता लेकिन मैं देख रहा हूं कि तुम निहत्थे हो।
- विलियम शेक्सपीयर

जनाबे शेख से कह दो जो ये समझाने आए है
कि हम दैरो हरम से होते हुए मयखाने आए है।

Praises are my wages

Thursday, October 12, 2017

ले मशालें चल पड़े है लोग मेरे गाँव के 12 Oct 2017


ले मशालें चल पड़े है लोग मेरे गाँव के

दोपहर हो चली है और उमरिया सेशन पर उतर कर हम जेनिथ के दफ्तर पहुंचे है. यहाँ साथी बिरेन्द्र इंतज़ार कर रहे है और हम नहाकर और थोड़ा सा नाश्ता करके गाँव की ओर निकल पड़ते है. रास्ते में बिरेन्द्र ने बताया कि अभी तक हम लोग नौ गाँव तक पहुंच चुके है. काफी सीख मिल रही है और यह हम सबके लिए मात्र यात्रा ही नहीं वर्ना जनमानस को समझने का एक बड़ा मौक़ा भी है और कुछ करने का अवसर भी. प्रशासन की ओर से कई प्रकार का सहयोग भी है और लोगों के साथ हम मिलकर कुछ कर पा रहे है. आज जीप के ड्राइवर के घर किसी का दसवां ठा अतः वह गाडी खड़ी करके चला गया ठा, नया ड्राइवर आया है जिसका गाँव को लेकर कोई ख़ास अनुभव नहीं है, वह गाडी चला रहा है और सोच रहा है कि ये लोग पेंट शर्ट पहने बाबू लोग क्यों धूल धक्के खाते हुए गाँव जा रहे है, अपने ड्राईवर साथी को दया भाव से याद करते हुए वह कहता है कि आखिर क्या है ऐसा कि आप लोग गाँव में काम करते हो, शहर छोड़कर? मै हल्के से मुस्कुरा देता हूँ यह कहकर कि एक बार दिन भर हमारे साथ रहो फिर समझ आयेगा.
रास्ते में सडक के दोनों ओर दूर तक फैले हुए खेत है बंजर जमीन और सडकों पर खालीपन, एकाध इक्का दुक्का आदमी दिख जाता है या किशोर वय की स्त्रियाँ जो हँसते हुए लौट रही है एक से पूछा तो बोली लकड़ी का गट्ठा बेचकर लौट रही है, छः किलोमीटर चलकर उमरिया गई थी सुबह चार बजे उठकर जंगल जाती है, लकडियाँ बीनती है, गट्ठर बनाते है और सुबह सात के आसपास सर पर भारी गट्ठर लेकर शहर की ओर चल देते है, शहर आकर एक नियत स्थान पर बैठ जाती है, लड़कियों में दोस्ती है, स्त्रियाँ हंस लेती है जी भरके, मन की बात कर लेती है अपने सुख दुःख बाँट लेती है, दस बजे के आसपास - गठ्ठर की कीमत मिल जाती साठ से नब्बे रूपये तक बस लेकर गाँव लौट रही है, हाथ में कुछ सब्जी है, थोड़ी सी कुछ जरूरत की चीजें बस हँसते हुए लौट रही है कि आज माल बिक गया. यह कहानी इन लड़कियों और स्त्रियों की है जो अपने घर में आजीविका में मदद करती है.
मगरधरा गाँव का नाम है तीन ओर से गाँव पहुँच सकते है, जिला मुख्यालय से लगभग पन्द्रह किलो मीटर है यह गाँव पर आजादी के सत्तर बरस बाद भी यहाँ ना पहुँच मार्ग है, ना माकूल इंतजामात - बस है तो आजादी के बाद की बदहाल स्थिति, सरकारी सफलता की धज्जियां उड़ाने वाले दावों की पोल खोल, और गरीब त्रस्त आदिवासी समुदाय जो गौंड है. गाँव में मात्र पांचवी तक स्कूल है , दो टोलों में आंगनवाडी और बस ना स्वास्थ्य की सुविधा ना कुछ और. जब पहुंचे तो कुछ लोग बैठे हुए थे. जेनिथ संस्था के अजमत महिलाओं के समूह में घिरे है और चूल्हे पर खिचड़ी पक रही है दो बज रहा है, बच्चों का शोर है, दोनों आंगनवाडी वाली दीदी अपनी सहायिकाओं के साथ मौजूद है, महिलायें हंस रही है कि एक मर्द उन्हें खाना बनाना सिखा रहा है, पुरुष एक ओर बैठे है.
दस्तक न्याय और बाल अधिकार यात्रा चार जिलों – पन्ना, उमरिया, सतना और रीवा, में विकास संवाद, भोपाल के सहयोग से निकल रही है लगभग सौ से डेढ़ सौ गाँव में यह यात्रा जा रही है. लगभग पचास हजार लोग हर जिले में प्रत्यक्ष रूप से सम्पर्क में लाने की योजना है और सरकारी योजनाओं की जानकारी के साथ पड़ताल भी करना है कि जमीनी हकीकत क्या है? दुविधा यह है कि जब योजनाओं की जानकारी नहीं, कोई देखभाल करने वाला नहीं और निष्क्रिय पंचायतें है तो लोगों तक वो भी एक ऐसे समुदाय तक कैसे चीजें पहुंचे जो सदियों से उपेक्षित है और उन्हें शिक्षित करने का किसी को समय भी नहीं है. इस गाँव का इतिहास यह है कि १९४७ के पहले इसे कही से विस्थापित कर बसाया गया था, पास में एक नाला बहता था जो आज सूखा पड़ा है, वहाँ एक मोटा मगर था जो हर आने जाने वाले को पकड़ लेता था इसलिए लोगों ने इस नए बसाए गए गाँव का नाम मगर धरा रख दिया, एक बुजुर्ग ने हंसकर कहा कि अब तो सरकार जैसा मगर कोई नहीं जो एक बार किसी दफ्तर में फंस जाए उसे विभाग मगर की तरह से निगल लेता है!
गाँव में स्कूल में शिक्षक है पर अनियमित है, आंगनवाडी ठीक चलती है कार्यकर्ता कहती है कि राशन तो हम दे देते है गर्भवती और धात्री महिलाओं को बच्चों के लिए भी पर ये लोग खाते नहीं है. अजमत के लिए ये चुनौती थी, सो उसने गाँव की महिलाओं को आज इकठ्ठा किया हुआ है और सबके घर से दालान में लगी सब्जियां बुलवाई है, यदि कुछ आसपास के जंगल में लगी है तो तोड़कर लाने को कहा है ताकि वह एक पौष्टिक खिचड़ी बना सके, गाँव में सहजन यानी मूंगा के पेड़ बहुतायत में है तो उसकी भी पत्तियाँ तोड़कर लाने को कहा है और यह काम किशोर बड़ी तन्मयता से कर रहे है. अजमत, भूपेन्द्र का काम शुरू हो गया है उन्होंने चावल के साथ कोदो, कुटकी, ज्वार के साथ खड़ा और मोटा अनाज भी मंगवाया है. और सारी सब्जियां मिलाकर एक बड़े तपेले में खिचड़ी चढ़ा दी है, महिलायें बच्चे कौतुक से चूल्हे के पास खड़े पकती हुई खिचड़ी को देख रहे है, कई प्रकार का आटा जो पूरे गाँव से आया है, में नमक मिर्च मूंगा की पत्तियाँ डालकर गुंथा जा रहा है ताकि गरमागरम पुड़ियाँ निकाली जा सके तेल भी शायद गुल्ली यानी महुआ के बीज का है. महिलायें हंस रही थी पर अब गंभीरता से सुन रही है देख रही है कि कैसे पौष्टिक सामग्री बनती है. आज सारा गाँव एक साथ खायेगा बगैर किसी भेदभाव और उंच नीच के.
मै बातचीत शुरू करता हूँ, समस्याएं गिनाने लगते है लोग - सब्जी नहीं मिलती, फल नहीं खरीद पाते, अंडा नहीं होता, मछलियाँ कम हो गई है, मुश्किल से दस घरों में बकरी पालन होता है गाय तो है पर ना दूध देती है ना और किसी काम की है, बैल बहुत कम है, खेती पर संकट है पानी नहीं है बावजूद इसके कि दो कुएं है, एक तालाब, एक नाला जिसे ये लोग झिरिया कहते है. पिछले साल गर्मी में पानी के संकट के बाद जेनिथ संस्था के साथियों के साथ मिलकर कुओं की सफाई की थी पानी भरा है अभी तक, शायद ये गर्मियां निकल जाये और पीने का पानी बच पाए, हेंडपंप का भरोसा नहीं है क्योकि सूख जाते है और पानी भी लाल है. भोला आदिवासी बहुत पुराने है गाँव के कहते है पहले जंगल था हमारा और ढेर सारी चीजें मिल जाती थी पर अब वन विभाग ने हमारे ही जंगल में हमें आने जाने से मना कर दिया है, सूखी लकड़ी लाने में भी दिक्कत है, मैंने कहा आप लोग पेड़ काटते है तो बिफर पड़े- बोले हम तो उतनी ही लेते है जितनी जरुरत होती है एक भी घर में आपको दो समय जलने वाली लकड़ी दिखा जाए तो मै गाँव छोड़ दूंगा फिर शांत हुए बोले साहब आदिवासी कभी भी कोई चीज इकट्ठा नहीं करता यह तो आप जैसे लोगों के घरों में होता है कि दो दो साल का सामान इकट्ठा होता है हम रखेंगे कहाँ, हमारा ठौर ना ठिकाना, मजदूरी करने बाहर जाना पड़ता है साल में मुश्किल से छः माह घर रह पाते है. खेती से जो अन्न उगता है उससे चार माह की गुजर होती है, राशन की दूकान से मिले अनाज से तीन माह बाकी तो मजदूरी ना हो तो हम भूखे मर जाये. जंगल से कुछ मिलता नहीं थाली में गेहूं और धान के सिवाय कुछ नहीं पुराना सब खत्म हो गया, अब जियें कैसे?
गाँव से दो लडके उमरिया में कम्प्यूटर में डिप्लोमा कर रहे है, तीन चार लड़कियां आठवी तक पढ़ रही है , चार लोग सरकारी नौकरी में है जिसमे से तीन शिक्षक है और एक महिला सीधी जिले में खाद्य अधिकारी है. कहते है लड़कियों को तो हम भी पढ़ना चाहते है अधिकारी भी बनाना चाहते है अपर इतने जंगल और पहाड़ी से घिरे क्षेत्र से रोज आना जाना संभव नहीं है. सुजीत सिंह जो कम्प्यूटर में डिप्लोमा कर रहे है, रोज शोर्ट कट से बीस किलोमीटर उमरिया आना जाना करते है, हँसते हुए बोले सर रोज नहीं जा पाता, थक जाता हूँ घर में भी खेती का काम होता है, और फिर पढाई भी नहीं होती कॉलेज में.
“यात्रा में जब प्लानिंग हो रही थी तो हमें लगा कि पचास दिन तक घर से बाहर रहना एक सजा है हम सबके लिए क्योकि घर से बच्चों से दूर कैसे रहेंगे पर अब यात्रा निकल पड़ी है तो अच्छा लग रहा है, लोगों की समस्याएं बहुत है, हम जो काम दो साल से करने की कोशिश कर रहे है कि समुदाय को प्रेरित करें और जोड़े उसके लिए यात्रा बहुत मददगार साबित हो रही है” भूपेन्द्र कहते है. अजमत कहते है “क्या निकलेगा यह कहना मुश्किल है पर हमें ख़ुशी यह है कि लोग संगठित है और अब वे समझ रहे है, बदलाव करना चाहते है, बच्चों को पढाना चाहते है, स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता है अस्पतालों में डिलीवरी का प्रतिशत बढ़ा है, टीकाकरण नियमित है और खेती किसानी को लेकर बहुत चिंतित है अब वे क्रॉप पैटर्न भी बदल रहे है नया अन्न भी लगा रहे है और प्रयोग भी करने में रूचि है”. रजनी स्थानीय आदिवासी समुदाय से है और जेनिथ की कार्यकर्ता है वे कहती है “मेरे घर से मुझे पूरी छुट दी है कि मै यात्रा मे रहूँ मेरी पालकों को कोई डर नही है, मै अकेली लड़की हूँ इस लम्बी यात्रा में पर मेरे साथी अच्छे है मै सबपर भरोसा कराती हूँ और यात्रा में महिलाओं के साथ मिलकर उनके स्वास्थ्य और पोषण पर बात करती हूँ, मै खुद भी बहुत सीख रही हूँ.” विनय कहते है “चुनौतियां कई है कैमरा चार्ज करने से लेकर बिजली तक की पर हम भी जिद्दी है इसे पूरा करेंगे” बिरेन्द्र कहते है कि “इस यात्रा से हम सीधे लोगों तक पहुँच रहे है, प्रशासन को रोज शाम को रिपोर्ट करके समस्याएं बता रहे है कुछ त्वरित हल हो रही है कुछ के लिए समय लग रहा है, रोजगार ग्यारंटी योजना, सामाजिक सुरक्षा पेंशन के केस मिल रहे है, पानी की विकराल समस्या है हर जगह, पंचायतों की वैधानिक समितियां लगभग ठप्प है, हम पंचायतों की उपेक्षा से परेशान है सचिवों की मनमर्जी और सरपंचों का उदासीन होना भी एक बड़ा कारण है क्योकि वे प्रस्ताव भेजते है अपर होता कुछ नहीं.”
मीडिया का सहयोग है. भोदल सिंह से लेकर कई ऐसे लोग मिलें जिनकी समस्याएं है पर ये नीतिगत मामले है जिनपर राज्य स्तरीय पैरवी की जरुरत है स्थानीय प्रशासन के बूते की बात नहीं है.
विकास संवाद के सचिन जैन कहते है कि मूल रूप से चार जिलों में दो लाख लोगों तक सीधे पहुंचकर हम लोग सीखना भी चाहते है समझना भी कि प्रदेश के इन पिछड़े जिलों में सरकारी योजनाओं की स्थितीत क्या है, बच्चों के अधिकारों की स्थिति क्या है पोषण की स्थिति क्या है क्योकि बच्चों के पोषण का माला सीधे खेती, आजीविका, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ा है, यह यात्रा हमें कई प्रकार के समुदाय की पहल, प्रशासनिक प्रक्रियाएं और वर्तमान के जमीनी हालत दिखा रही है. पन्ना जैसे जिले में सिलिकोसिस से हर माह दो मूत हो रही है, हर माह में बच्चे मर रहे है, व्यवस्थाएं नाकाफी है बावजूद इसके प्रशासन अपने सत्र पर प्रयास कर रहा है पर जिस अंदाज में उपेक्षित आदिवासी समुदाय है ये प्रयास अपर्याप्त है. वरिष्ठ मीडियाकर्मी राकेश मालवीय जो बारीकी से इस यात्रा पर नजर रखे है कहते है कि “हम मीडिया के माध्यम से वंचित और आदिवासी समुदाय की दैनंदिन समस्याएं उठाने का प्रयास भी कर रहे है और समझना भी चाहते है कि आखिर गैप कहाँ है. एक बच्चे की किपोषण से मौत यानी पूरी व्यवस्था के लिए प्रश्न है कि आखिर कुल जमा हमारा विकास का अर्थ क्या है?”
गांधी जयंती पर शुरू हुई यह यात्रा बाल अधिकार दिवस यानी 20 नवम्बर तक चलेगी, उम्मीद की जाना चाहिए कि इसमें से जो निकले उस पर सरकार, प्रशासन मंथन करें और अपनी रणनीति बनाए.

संदीप नाईक, उमरिया से
(स्वतंत्र टिप्पणीकार और सामाजिक कार्यकर्ता)

Tuesday, October 10, 2017

आत्म मुग्ध पगली आलोचक 10 Oct 2017



हिंदी साहित्य की आत्म मुग्ध पगली आलोचक आजकल बहुत चहक रही है और उस मूर्ख को लगता है कि हिंदी के युवा लेखक उसकी मेधा और सुंदरता पर मोहित है।
अरे पगली, नादां घसियारी हिंदी में दो रुपए कौड़ी के दाम से हर ऐरा गैरा नत्थू खैरा घटिया किस्म की पत्रिकाएं निकाल रहा है। दो रुपए के अख़बारों की गिनती नहीं है। इतना छपा हुआ कचरा है कि सात आठ रुपए में रद्दी भी नहीं पड़ती । ये सब कागज कारे करने को तेरी उजबक किस्म की बकवास छापकर पाठक नाम कुंठित और अपराध बोध से ग्रस्त चूहों से रुपया ऐंठते है और दिमाग और विचारधारा को गिरवी रखकर सरकारी विज्ञापन जुगाड़ते है।
अब सोच पगली, तेरे लंबे बकवास भरे आलेख, टटपुंजिया लेखकों की लुगदी की तरह लिखी उबाऊ और चालीस पेज से लेकर दस हजार शब्दों की आलोचना पढ़ता कौन है , तेरे स्त्री विमर्श, नैन मटक्की यात्राओं और बकवास और सड़क छाप प्रवचन नुमा बीज वक्तव्य सुनता कौन है।
ये पी एच डी कर रहे युवा मित्र बड़ी आस से दूर दराज के गांवों से बाप महतारी का पसीना बहाकर विश्व विद्यालयों में आए है, अपने गुरुओं के तलुएं चाटकर और मेहनत करके एमए, एमफिल कर रहे है, हाड़तोड़ मेहनत से नेट पास किए है , रात जाग कर किताबें लिखी है और जेबखर्च से भूखे रहकर अपनी किताबें छपवाई है। छोटे कमरों में जिंदगी जीते हुए सबको प्यार से विस्तार देकर ये संसार में खुशियां बांट रहे है, इनके जीवन में जहर मत घोल, ग्रहण रूपी दाग मत बन पगली !!!
इनका शोषण मत कर मंथरा ! ये बच्चे ईमानदार और सच्चे है इनका खून मत पी, और उन दंभी पाखंडी साहित्यकारों का खून मत पी जो तृतीय श्रेणी कर्मचारी के पद पर नौकरी करके मदमस्त प्रकाशक को खून देकर किताबें छपवाते है और छोटे मोटे पुरस्कार के लिए तू आलोचना लिखकर उनका खून जोंक की तरह पीती है। बाज आजा, अब बहुत हो गया छिन्नमस्ता !!!
अरे पगली तू जहां है ना वहां कोई भी घसीयारन बैठेगी तो इससे तो बेहतर करेगी क्योंकि वह जगह ही ऐसी है। बाज आ जा, बहुत हो गया इश्क मुहब्बत, जितना तू हक रखती थी उससे ज्यादा पा लिया और अब निकल लें पतली गली से
तेरा होना आलोचना में हिंदी का कलुषित संसार में स्थाई ग्रहण का होना है और अब समय है कि अपने स्त्री होने के फायदे उठाना बन्द कर और मनुष्यता के नाते ही सही निकल लें

Sunday, September 24, 2017

दो समसामयिक कवितायें Sept 2017


दो समसामयिक कवितायें 

1

स्त्री के प्रेम से वंचित आदमी किसी का नहीं होता 
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कैसे लौट गए तुम
गाय भैंसों के व्यवसायिक मेले में भाषण देकर 

तनिक भी धुंजे नहीं तुम
एक बार भी नहीं पूछा कि ये क्यों हुआ
ये भारत माता की लाडली लक्ष्मी बेटियों को 
मां दुर्गा के आगमन पर क्यों पीटा इन लड़कियों को

तुम्हारे ही लोग वहां है जहां सरस्वती का वास है
वहीं लोग भारत माता के बहाने देवियों को पीट रहे है
शैला मसूद हो या बनारस के गंगा घाट पर विराजित ये देवियां
तुम्हे दिल्ली जाने की इतनी जल्दी क्या थी 
क्यों एक बार भी गए नहीं झांकने भी 
नरभक्षी कुलपति और पुलिस को लताड़ा नहीं

तुम चुप हो कब से क्यों बोलते नहीं 
पहलू खान, नजीब, जुनैद, अखलाख को मार दिया जब
उना में दलितों को जिंदा जला दिया
रोज जब दलित मर रहे है देश के गड्ढों में 
जानते हो ना इन्हे भी संविधान में उतना ही हक है जीने का
सम्मान और गरिमा के साथ जितना तुम्हे

यहां मौत का हिसाब उन लंबी पंक्तियों का नहीं है
जो एक अवसाद में ली गई अवस्था में किया था तुमने 
ये लड़कियां वहीं है जिन्होंने तुम्हे दिल्ली या लखनऊ में
तख्त नशी किया है और जेहादी हो गई थी
क्या मां गंगा ने तुम्हे इनके लिए बुलाया था

गलती तुम्हारी नहीं, ना ही उस मठाधीश की 
संसार में मनुष्य ही मनुष्य से प्रेम करता है और रचता है
तुम दोनों मशीन हो, बच्चो और स्त्री के प्रेम से वंचित 
इसलिए निष्ठुर और निरापद हो
यह समय का ही दुष्चक्र है कि तुम वहां हो जहां कोई नहीं होता
तुम्हे भी वही आना होगा जहां सब कुछ ख़तम हो चुका होगा

© संदीप नाईक

2

प्यार में डूबी लड़की सर्वनाम हो जाती है 
____________________________

1
प्लेटफॉर्म पर रेलों की आवाजाही में

ख़तम होती शाम के झुरमुट में 
एक लड़की खड़ी एक लड़के से टिककर
हंस रही है
यहां प्लेटफॉर्म ख़तम होता है और लंबी पटरियां शुरू
रेल आती जाती है और तेज़ आवाज में
लड़की की हंसी दबती है 
पर उसके हाथ भींच लेते है 
लड़का उसकी हंसी में बहुत कुछ सुनता है
चुप रहता है, उदास हो जाता है 
रेलें गुजर रही है आहिस्ते से

2
आवारा भीड़ जो सड़क पर सरक रही है 
एक सिग्नल पर ताक रही है लड़की 
उस पार जहां से रोज गुजरने वाला लड़का
फिर खड़ा है आज हेलमेट उतारकर
लड़की अपनी छोटी सी गाड़ी पर टिकाती है हाथ
बालों की सलवटों को संवारते हुए 
मुस्कुराती है दांत काटते ऐसे कि लड़का देख लें
ट्राफिक के बीच कुछ साफ नहीं है
धुंधला सा है यह रोज गुजरने वाला प्यार
और लाल बत्ती हर रोज हरी होने पर 
सरकता है प्यार भी भीड़ के साथ भीड़ के पार

3
यह शहर का एक तालाब है
लड़की है उसकी सहेली 
लड़का है और उसका दोस्त
सहेली और दोस्त सिर्फ संगी है 
इन दो प्रेमियों के कि जमाने से छुपे प्रेम 
सहेली और दोस्त दोनों जानते है कि
इस प्रेम का कुछ भविष्य नहीं
बस वे भी उन्हें झुरमुट और पेड़ की आड़ में जाने तक
देखते है और इस तरह से सहेली और दोस्त में
पनपता है प्यार 
लड़का लड़की बेखबर है 
तालाब सूख रहा है बेचैनी बढ़ गई है जीवन में

4
एक साहित्य की गोष्ठी में कविता पढ़ता है लड़का
लड़की सुनती है शब्दों को गुनती है
मुस्कुराती है जब कविता में वह, उसने, कहा था 
या कि कुछ और ऐसे शब्द आते है जिन्हे 
हिंदी में संज्ञा के बदले सर्वनाम कहते है
वो कागज़ खींच लेती है लड़के से
कविता की गोष्ठी में और भी लोग पढ़ रहे है
कविता का धुंधलका उन दोनों को ओंस में भिगोता है
गोष्ठी ख़तम होकर लड़का अपने कागज़ में
पेंसिल के निशान ढूंढता है 
निराश होता है कि कहीं कोई चिन्ह नहीं
लड़की ऊपर आंखें करते आसमान को घूरते निकलती है
संसार की गोष्ठियां चल रही है 
लड़की कोई अक्षर नहीं चीन्हती 
लड़का अक्सर जमीन मापते लौट आता है घर


Posts of III week of Sept 17 - BHU, My Democratic Values and other


हिंसा कहीं भी हो मै उसका विरोधी हूं, इंसान को कोई हक नहीं कि वह जाति धर्म के आधार पर किसी को मारें या गालियां दें।
वंचित , दलित, आदिवासी और कमजोर के साथ हूं और इसमें कोई गलत नहीं है , आप उद्योगपतियों के, नेताओं और देश बेचने वालों के तलवे चाटे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता आपकी प्रतिबद्धता से।
किसी भी तरह की तानाशाही के खिलाफ हूं क्योंकि हम भारतीय संविधान के फ्रेम वर्क में जीने के लिए जन्मे है और संविधान मुझे समता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व के मूल्य ही नहीं सिखाता बल्कि इन्हे अपने जीवन में उतारने के लिए बाध्य भी करता है और यह भी कहता है कि मै अंधविश्वासों को मानने के बजाय वैज्ञानिक चेतना के प्रसार और प्रचार के लिए काम करूं।
मै मानता हूं कि अस्तो मा सदगमय यानि शिक्षा अंधेरों से उजालों की ओर जाने का साधन है ।
सेक्युलर शब्द मेरे लिए आदर्श है क्योंकि यह संविधान में है, जो भक्त इस शब्द का उच्चारण कर सोचते है कि वे आहत कर रहे है उन्हें देश का संविधान पढ़ना चाहिए क्योंकि अगर वे संविधान की इज्जत नहीं कर सकते (जैसा भी है) तो उन्हें राष्ट्रवादी होने का कोई हक नहीं है।
किसी भी धर्म और राजनैतिक विचारधारा को मानने के लिए मै मैच्योर और स्वतंत्र हूं और धार्मिक और हिन्दू होने का प्रमाणपत्र भाजपा या दो कौड़ी के कम अक्ल भक्तों से लेने की जरूरत नहीं है। दूसरा मुझे क्या , क्यों और किस पर लिखना है यह में तय करूंगा आप जैसे मूर्ख नहीं। कृपया मुझे ज्ञान देकर अपने कुजात संस्कार सार्वजनिक ना करें - एक बार उन मां बाप का सोच लें जिन्होंने आपको बड़ी उम्मीदों से पाला है कि आप उनका नाम ऊंचा कर यश कमाएंगे।
मेरे निजी या सार्वजनिक जीवन में कौन आदर्श होंगे यह मै तय करूंगा और निश्चित ही वे आडवाणी, मोदी, अमित शाह, मोहन भागवत, लालू, नीतीश, मायावती, अखिलेश, राहुल , सोनिया , सीताराम येचुरी या दिग्विजय नहीं होंगे। वो मेधा पाटकर हो सकती है , मदर टेरेसा या मेरी मां। यह आप तय नहीं करेंगे।
ना मुझे भाजपा से मतलब है और ना कांग्रेस से। चुनी हुई सरकार के निर्णयों से मेरे जीवन के सामाजिक आर्थिक मूल्य और जीवन शैली प्रभावित होती है और कोई भी सरकार हो मुझे एक नागरिक के रूप में अपनी बात देश , समाज और मेरे निजी हक में ना मात्र कहने का अधिकार है बल्कि सवाल करने और निंदा करने का भी हक है। आप जैसे कुढ़ मगज लोगों को यहां टांग अड़ा कर अपने कुसंस्कार या खानदानी गुण दोष दिखाने की जरूरत नहीं है।
अगली बार यदि आपने मेरे निजी मूल्यों को आघात पहुंचाया और बदतमीजी की तो आपको अपने बाप मां से जाकर पूछना चाहिए कि क्या उन्होंने एक कपूत को पैदा किया या क्यों किया ? हिंदी समझ आती है ना ? 
अभी भी नहीं आया समझ में तो चुपचाप अन्फ्रेंड कर निकल लें बजाय इसके कि मै आपकी सार्वजनिक भद्द पिटवाकर ब्लॉक करके रुखसत करूं।

मै मुतमईन हूं कि आपको यह समझ आया होगा।

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देवास में चित्रकला से लेकर संगीत और तमाम तरह के राजनेताओं या फालतू के लोगों / कलाकारों को लीज पर जमीन दी हुई है गैलरी, भवन या स्मारकों के लिए।
उद्देश्य यह था कि ये लोगों को कला के गुर सिखाए और कलाओं का प्रचार प्रसार करें, परन्तु ना तो ये लोग कुछ काम कर रहे और ना ही कलाओं को फैला रहे है। सिर्फ बरसों से जमीन दबाकर बैठे है और अपने धंधे में कमा रहे है।
मानो जमीन लीज पर नहीं लीद पर हो।
ये लोग शहर के बीचोबीच बेशकीमती जमीन का या तो इस्तेमाल करें या प्रशासन दान दी हुई महंगी सरकारी जमीन राजसात कर लें और जनहित में उपयोग करें। शहर में झुग्गियां बहुत है, शहरी मिशन में लोगों को पक्के मकान बनाकर दें और इसकी राशि प्रधानमंत्री आवास योजना से दी जा सकती है। गरीब अवाम को भी शहर के बीच अच्छी जमीन पर रहने के अवसर मिलें।
धंधेबाजों को सरकारी जमीन का इस्तेमाल ना करने दें या प्रशासन इन जमीनों पर सार्वजनिक शौचालय बना दें।
नवागत कलेक्टर को लिख रहा हूं कि तुरन्त एक्शन लें नवरात्रि में लोगों को फायदा तो मिलें।
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बड़ा घटिया कुलपति है, लड़कियों को ही ताड़ता रहता है क्या दिल्ली जाने पर या अपने कैम्पस में ।
"ये पूरा मामला सुनियोजित है। कुछ लड़कियाँ दिल्ली विश्वविद्यालय और जे एन यू से आई थीं। इन्हें मैं पहचानता हूँ"
- जी सी त्रिपाठी, वी सी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, नैशनल टेलिविज़न पर 
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मैंने पूरी जिम्मेदारी से लिखा है यह।
क्या एक कुलपति को इतना समय होता है कि वाह दिल्ली या जे एन यू जैसे विशाल वि वि की लड़कियों को देखे और उनके चेहरे याद रखें और दोबारा अपने कैंपस में आने पर पहचान लें
यह दुर्भाग्य है अगर वह सही कह रहा है तो कि हमने कुलपति नहीं एक एक्स रे मशीन लगा रखी है
तीसरा वह जे एन यू को क्यों लक्षित कर रहा है क्योंकि उसे मालूम है कि भक्त वामपंथी को आसानी से फंसा कर मामला रफा दफा कर देंगे और बनारस की धर्म प्रेमी जनता फिर इस दुष्चक्र में फंस कर सब भूल जाएगी
वामपंथ, नक्सलवाद, मुस्लिम , आतंकवाद और अंत में राष्ट्रहित ऐसे मुद्दे है जिनपर आम भारतीय फंसता ही नहीं बल्कि आसानी से यकीन कर लेता है और यह एक बड़ी चाल है इस पूरी लॉबी की
या फिर आपको राहुल की तरह पप्पू का ट्रोल चलाकर धराशाई करेंगे
और सबसे महत्वपूर्ण बात कि वे बनारस की लड़कियों को क्या इतना मूर्ख समझ रहे है कि वे किसी के भी बहकावे में आ जाएंगी और किसी और के प्रभाव में लाठी खाने को तैयार हो जाएंगी
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यह बयान निश्चित ही गंभीर है और उन्हें पट्टी पढ़ाकर दिलवाया गया है ताकि मोदी जी या योगी की धूमिल होती प्रतिष्ठा में देश प्रेम का ज्वार और ज्वर जीवंत किया का सकें।
अगर वो सच बोल रहा है तो सी सी टीवी की जांच हो, आगमन स्थल पर रजिस्टर की जांच हो और जे एन यू से अनुपस्थित लड़कियों के प्रमाण लिए जाएं।
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यह एक तरह की पितृ सत्ता का ही प्रचारक है कि लड़कियां गाय है और कोई भी उन्हें हांक सकता है
जो लोग कहते है ना - अरे इन्हे घर मत बुलाओ ये घर उजाड़ने वाली औरतें है। 
ठीक यही बात जो जेंडर की बहस का मुद्दा है, वहीं कुलपति का कथन है

सोचो यह कहां की उपज है और कैसे जन्मा होगा ?

Thursday, September 21, 2017

Posts of Sept III Week 2017



साहित्य में कहानी,कविता, आलोचना या गद्य को समझना किसी की बपौती नहीं है और जो बैनर लगाकर समझाने या सुधारने का ठेका लिए बैठ गए है उनसे दरिद्र कोई नहीं है ।
चार कविता, दो कहानी लिखकर आप जो खुद को मठाधिश समझकर स्वयंभू खुदा बन बैठे है और फतवे जारी करने का उपक्रम कर रहे है ना इसका नुकसान और को तो नहीं आपको ज्यादा हो रहा है।
कहानी, कविता या आलोचना का कोई फ्रेम नहीं होता ना ही कोई क्रमबद्ध फार्मूला पर आप जिस तरह से अपनी समझ से कविता , कहानी और आलोचना पर जजमेंटल हो जाते हो और अपने को श्रेष्ठता के पलड़े में भारी करके दूसरों को हल्का कर देते हो वह बहुत ओछापन ही नहीं वरन कष्टदायी भी है । बाज आ जाओ हे संदिग्ध साहित्यकार। जब अपनी प्रतिबद्धता और सरलता शंकित है तो दूसरों की स्थापनाओं पर सवाल उठाना और उन पर सवाल उठाने का अधिकार किसने दे दिया ?
अपने विचारधारा के अनुरूप खुदा बन चुके आकाओं की ओर मत देखो, उनकी लल्लो चप्पों के लिए अपनी रचनात्मकता की बलि मत दो और उनको खुश रखने के लिए अपने लोगों को किसी वेदी पर बलि मत चढ़ाओं। यह याद रखना जरूरी है कि साहित्य किसी का पूर्ण कालिक पेशा नहीं है , यह सिर्फ एक मानसिक आनंद और कुछ कर गुजरने की एक तफ्तीश है किसी ऐतिहासिक शख्स के बरक्स कुछ पन्नों में हर्फों में जिंदा रह जाने की कशिश । इस भ्रम को तोड़ने का हक किसी ने किसी को नहीं दिया है।
यदि आपकी खुद की समझ कमजोर और शंकित है तो मेहरबानी करके अपने एक्स्पोज़र बढ़ाइए , हिंदी के अतिरिक्त भी साहित्य और विविध विषय पढ़कर, समझकर अपनी हीनता को कम कीजिए।
सिर्फ हिंदी के चार वामपंथी , संघी या लोकप्रियता के लिए वैश्या से खराब जीवन जीने वाले कवि, कहानीकार, आलोचक और गद्यकारों के परे जाकर भी दुनिया के विस्तृत फलक पर फैलें उदीयमान और स्थापित लोगों को भी गुनिये और समझिए वरना आप दो तुच्छ प्रकाशकों, चार दरबारी कवियों और छह कहानी - उपन्यास के कुंठित लोगों में डूबकर ख़तम हो जाएंगे।
यह समय वायवीय संवेदनाओं के बीच स्थापित मूल्यों, मान्यताओं और संप्रेषण के साथ भीड़ में अपनी अस्मिता, कद और प्रतिष्ठा को एक समवाय और संतुलन के साथ बचाकर रखने का भी विकट काल है जिसमें यदि आपने कुछ भी हरकत की तो एक त्रिशंकु की तरह से आजीवन उम्र भटकने के लिए फेंक दिए जाएंगे। समझ रहे हो ना !!!
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भारत के पढ़े लिखे प्रबुद्ध दलित, दलितों को भड़काकर बुद्ध धर्म ग्रहण करने को उकसा रहे है, बावजूद इसके कि वो यह भलीभांति जानते है कि धर्म बदलने से जात नहीं बदलेगी।
ये सज्जन जो शांति का लबादा ओढ़े नौटंकी कर रहे है इसका नाम है बौद्ध भिक्षु अशीन विराथु जुलाई, 2013 को टाइम मैगज़ीन ने इसे कवर पेज पर छापा और इसकी हेडलाइन थी, 'द फेस ऑफ बुद्धिस्ट टेरर'।
यह व्यक्ति मुसलमानों के बारे में कहता है कि 'आप कितने भी उदारवादी क्‍यों न हों, लेकिन पागल कुत्ते के साथ नहीं सो सकते।' म्यांमार में वर्षों से मुसलमानों के विरोध में आग उगलने का काम करता रहा है। इसे 25 वर्ष तक जेल की सजा भी हुई थी, बाद में रिहा कर दिया गया था। जिस राजकुमार सिद्धार्थ ने राजपाट छोड़कर समूचे संसार में चोर, उचक्कों, वेश्याओं को एकत्रित कर सहज और सरल इंसान बनाया अब बुद्ध के अनुकरणकरता अब इस भाषा ही नहीं व्यवहार पर उतर आए है।
यानि अब आप भारत के दलितों को बुद्धत्व देकर बोधी ज्ञान देना चाहते है कि हिन्दू या ब्राह्मण या सवर्ण आपके लिए कुत्तों के समान है। मुझे समझ नहीं आता कि क्यों आखिर बौद्ध धर्म में परिवर्तन करने के लिए कुछ लोग उकसा रहे है जबकि इसी शांति प्रिय धर्म ने शर्म बेचकर दो सौ मुसलमानों के घरों को जलाया है और हिंसा की है।
जो काम गौतम बुद्ध नहीं कर पाएं वो उनके अनुयाई कर रहे है - मूर्ति लगाना, पूजा पाठ, संपत्ति इकट्ठा करना, मठ और गढ़ बनाना, सारे प्रपंच करना और हिंसा ही बचा था तो वो भी शुरू कर दिया।
दलित आंदोलन समता, रोजगार, इज्जत, न्याय, आजीविका और योग्यता बढ़ा कर अपने हक लेने की बात नहीं करता बल्कि उन्हें गुमराह करके भटकाने की बात जरूर करता है, स्वाभिमान जगाने के बजाय आजाद भारत में आरक्षण जैसी बैसाखी लेने की बात करता है , क्योंकि अगर दलित पढ़ लिख गये तो इनकी बकैती की दुकानदारी और बरगलाने के धंधे बन्द हो जाएंगे।
इसलिए कभी लगता है कि दलितों का नुक़सान जितना प्रबुद्ध लोगों ने किया है उतना और किसी ने नहीं। इसलिए दलितों में फाड़ भी है और वीभत्सता भी बहुत।
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देवास में चित्रकला से लेकर संगीत और तमाम तरह के राजनेताओं या फालतू के लोगों / कलाकारों को लीज पर जमीन दी हुई है गैलरी, भवन या स्मारकों के लिए।
उद्देश्य यह था कि ये लोगों को कला के गुर सिखाए और कलाओं का प्रचार प्रसार करें, परन्तु ना तो ये लोग कुछ काम कर रहे और ना ही कलाओं को फैला रहे है। सिर्फ बरसों से जमीन दबाकर बैठे है और अपने धंधे में कमा रहे है।
मानो जमीन लीज पर नहीं लीद पर हो।
ये लोग शहर के बीचोबीच बेशकीमती जमीन का या तो इस्तेमाल करें या प्रशासन दान दी हुई महंगी सरकारी जमीन राजसात कर लें और जनहित में उपयोग करें। शहर में झुग्गियां बहुत है, शहरी मिशन में लोगों को पक्के मकान बनाकर दें और इसकी राशि प्रधानमंत्री आवास योजना से दी जा सकती है। गरीब अवाम को भी शहर के बीच अच्छी जमीन पर रहने के अवसर मिलें।
धंधेबाजों को सरकारी जमीन का इस्तेमाल ना करने दें या प्रशासन इन जमीनों पर सार्वजनिक शौचालय बना दें।
नवागत कलेक्टर को लिख रहा हूं कि तुरन्त एक्शन लें नवरात्रि में लोगों को फायदा तो मिलें।
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Tuesday, September 19, 2017

मेधा पाटकर - वापिस जाओ 17 Sept 2017



मेधा पाटकर - वापिस जाओ 
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मप्र में अब किसी आंदोलन और जमीन पर काम करने वालों को अपना बोरिया बिस्तर उठा लेना चाहिए।

मेधा पाटकर को भी, नया नारा हो मेधा पाटकर वापिस जाओ
क्योंकि अब कोई अर्थ नहीं है जब सरकार, सत्ता और सुप्रीम कोर्ट भी आपके साथ नहीं, समझ नहीं, सरोकार नहीं और संवेदना नहीं और तथाकथित मध्यम वर्ग भी ना किसानों के साथ ना विस्थापितों के तो आप किसके लिए लड़ रहे है और जिनके लिए लड़ रहे है उनकी दो कौड़ी की औकात बनाकर रख दी सरकार ने तो, कोई अर्थ है ?
नर्मदा आंदोलन को आधार बनाकर जिन लोगों ने अपनी दुकानें, व्यक्तिगत छबि बना ली और राजनीति से राजधानियों में पसर गए उनसे ही सीख लें मेधा ताई। और वो लोग जिनके सहारे पानी में और जेल में बैठकर 35 बरस हो गए वो लोग मुआवजा लेकर, उन्हीं लोगों को वोट देते रहें जो शोषक बनकर लगातार छल कर रहे है। मेधा को अपने आंदोलन के साथियों को भी अब विदा कहना चाहिए इस तरह कि उनके इगो हर्ट ना हो और आंख की शर्म भी दोनों तरफ से बची रहें। अपने दुनियाभर में फैले सपोर्ट समूह से वे माफी मांगे और फिर निकल लें धीरे से , कहीं बस जाए या डेवलेपमेंट स्टडी पढाएं या ए डी बी ज्वाइन कर लें - यहां अब हमको शांत रहने दें , बहुत हो गई नाटक नौटंकी !!!
मुझे याद है जब बांध की ऊंचाई बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट बगैर जांच के और एफिडेविड पढ़े फैसला सुना दिया था और दूरदर्शन पर मेधा पाटकर रोई थी तब से आज तक क्या मिला जेल और असफलता के। सीखने के लिए नसीहत और नजीर बन जाने के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन और मेधा एक बेहतरीन उदाहरण है। अब अच्छा यह होगा कि वो इन कमजर्फ लोगों को छोड़े और अन्य लोगों की तरह कहानियां सुनाए , लिखे , सेमिनार करें और घूमे फिरें ।
लोकतंत्र में लोक की कोई औकात नहीं और जब बहुमत देश की सत्ता और उद्योगपति , शहरी आबादी के भले और विकास के लिए हर नाजायज मांग का समर्थन करता है तो लगातार 35 वर्षों से एक ही जगह चिपककर रहना और हारी हुई लड़ाई लड़ने का कोई औचित्य अब नहीं है।
अब हमें नारा लगाना चाहिए मेधा पाटकर वापिस जाओ इसके अलावा इस बेशरम युग में मुझे कोई और नारा नजर आता नहीं। मै पूरे होशो हवास में यह कहकर मुतमईन हूं कि इससे घाटी में शांति आएगी, विकास होगा, समृद्धि आएगी और चार बड़े राज्यों के लोगों को भी सुख मिलेगा। राजनैतिक स्तर पर और कानूनी स्तर पर यह आंदोलन ख़तम है रहा सवाल प्रशासन और मुआवजे या विस्थापन का तो छनैरा भी बस ही गया, टिहरी भी डूब गया था, तवा, भाखड़ा बांध के उदाहरणों से सबक नहीं लिया था क्या ?
चलिए सो जाइए , आज मोदी जी के जन्मदिन को भारतीय इतिहास में याद किया जाएगा कि एक राज्य के चालीस हजार परिवारों का सत्यानाश करके देश के विकास में नया अध्याय रचने वाले लोग भी इस युग में है और अविकसित कौम की प्रतिनिधि मेधा पाटकर भी और उनके सारे वे सहयोगी जो अपने तर्क और बुद्धि से माकूल अवसर पर पदाचाप पहचानकर आंदोलन से निकल आए।
मेधा पाटकर वापिस जाओ।

तुझ से पहले जो इक शख़्स यहाँ तख़त नशीन था
उसको भी अपने ख़ुदा होने का इतना ही यक़ीन था
- हबीब जालिब